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01.191
विश्वास-प्रस्तुतिः
मा᳓ बिभेर्न᳓ म᳓रिष्यसि प᳓रि त्वा पामि सर्व᳓तः ।
घने᳓न हन्मि वृ᳓श्चिकम᳓हिं᳓ दण्डे᳓नागतम् ॥ १७ ॥
मूलम्
मा बि॑भे॒र्न मरि॑ष्यसि॒ परि॑ त्वा पामि स॒र्वतः॑ ।
घ॒नेन॑ हन्मि॒ वृश्चि॑क॒महिं द॒ण्डेना॑गतम् ॥ १७ ॥
Chaubey En
Do not be afraid of being bitten; you will not die. I protect you from all sides. I kill with weapon the scorpion (vṛścika) and with stick the serpent who have come here.
Chaubey हि
डरो मत तुम नहीं मरोगे, तुम्हारी चारों तरफ से रक्षा करता हूँ । बिच्छु को कठोर पत्थर से मारता हूँ, (तथा) आये हुये सर्प को डण्डे से मारता हूँ ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आदित्यरथवेगे᳓न वि᳓ष्णोर्बाहुबले᳓न च ।
गरुळपक्षनिपा᳓तेन भू᳓मिं गच्छ महा᳓यशाः ॥ १८ ॥
मूलम्
आ॒दि॒त्य॒र॒थ॒वे॒गेन॒ विष्णो॑र्बाहुब॒लेन॑ च ।
ग॒रु॒ळ॒प॒क्ष॒नि॒पाते॑न॒ भूमिं॑ गच्छ म॒हाय॑शाः ॥ १८ ॥
Chaubey En
You, the possessor of great glory, go to the earth with the speed of the chariot of the Sun; with the power of the hands of Viṣṇu and with flapping of wings of Garuḍa.
Chaubey हि
महान् यशस्वी (तुम) सूर्य के रथ की वेग से, विष्णु की भुजाओं के बल से तथा गरुड के पंख के गिरने की शीघ्र गति से भूमि पर जाओ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गरु᳓ळस्य जातमात्रे᳓ण त्र᳓यो लोकाः᳓ प्रक᳓म्पिताः ।
प्रक᳓म्पिता म᳓ही स᳓र्वा स᳓शैलवनकानना ॥ १९ ॥
मूलम्
ग॒रुळ॑स्य जातमा॒त्रेण॒ त्रयो॑ लो॒काः प्र॒कम्पि॑ताः ।
प्र॒कम्पि॑ता॒ मही॒ सर्वा॒ सशै॑लवनकानना ॥ १९ ॥
Chaubey En
The three regions trembled verily with the birth of Garuḍa; the entire earth quivered along with all the mountains, the forests, and the gardens.
Chaubey हि
गरुड के उत्पन्न होने मात्र से तीनों लोक प्रकम्पित हो गये, सम्पूर्ण महती पृथिवी पर्वत, जंगल तथा उपवनों सहित प्रकम्पित हो गई।
विश्वास-प्रस्तुतिः
ग᳓गनं नष्ट᳓चन्द्रा᳓कं ज्यो᳓तिर्धं न प्र काश᳓ते᳓ ।
देव᳓ता भयभीता᳓श्च मा᳓रुतो न᳓ प्लवायति मा᳓रुतो न᳓ प्लवायत्यों᳓ न᳓मः ॥ २० ॥ [१७]
मूलम्
गग॑नं॒ न॒ष्टच॒न्द्राकं॒ ज्योति॑र्धं न प्र का॒शते ।
दे॒वता॑ भयभी॒ताश्च॒ मारु॑तो॒ न प्ल॑वायति॒ मारु॑तो॒ न प्ल॑वाय॒त्यों नमः॑ ॥ २० ॥ [१७]
Chaubey En
The sky (became) bereft of the moon and the sun; the luminous world does not shine; the gods became terrified; the wind does not blow; the wind does not blow. A Salute to (that state of existence).
Chaubey हि
चन्द्र और सूर्य के प्रकाश से रहित आकाश प्रकाशित नहीं हो रहा है, देवता भयभीत हो गये हैं, प्रचण्ड मरुद्गण भी प्रवाहित नहीं हो रहे हैं; प्रचण्ड मरुद्गण भी प्रकाशित नहीं हो रहे हैं। (उस अवस्था को) मैं नमस्कार करता हूँ ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
भोः᳓ सर्प भद्र भद्रं᳓ ते दूरं᳓ गच्छ महा᳓यशाः ।
जनमेजय᳓स्य यज्ञान्ते᳓ आस्तीकवचनं᳓ स्मर ॥ २१ ॥
मूलम्
भोः स॑र्प भद्र भ॒द्रं ते॑ दू॒रं ग॑च्छ म॒हाय॑शाः ।
ज॒न॒मे॒ज॒यस्य॑ यज्ञा॒न्ते आ॑स्तीकवच॒नं स्म॑र ॥ २१ ॥
Chaubey En
O gentle serpent, good be to you; (you) the possessor of great glory, (please) do go away; you remember the words of Āstīka Muni, (uttered) at the end of (Serpent)-sacrifice of Janamejaya.
Chaubey हि
कल्याणकारी सर्प, तुम्हारा कल्याण होवे; महान् यशस्वी तुम दूर चले जाओ । जनमेजय के सर्पयज्ञ के अन्त में कहे गये आस्तीकमुनि के वचन का स्मरण करो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आस्तीकवचनं᳓ श्रुत्वा᳓ यः᳓ सर्पो᳓ न᳓ निव᳓र्तते ।
शतधा᳓ भिद्यते मूर्ध्नि᳓ शिंशवृक्षफलं᳓ यथा ॥ २२ ॥
मूलम्
आ॒स्ती॒क॒व॒च॒नं श्रु॒त्वा यः स॒र्पो न नि॒वर्त॑ते ।
श॒त॒धा भि॑द्यते मू॒र्ध्नि शिं॑शवृक्षफ॒लं य॑था ॥ २२ ॥
Chaubey En
The serpent, who having heard the name of Āstīka Muni, does not go back, his head is broken into hundreds of pieces like the fruit of śiṁśa (śiṁśapa) tree.
Chaubey हि
आस्तीकमुनि के वचन को सुनकर जो सर्प वापस नहीं लौट जाता, उसका शिर शिंशवृक्ष के फल की तरह सैकड़ों भागों में खण्डित हो जाता है।
विश्वास-प्रस्तुतिः
यो᳓ जरत्का᳙रुणा जातो᳓ रं᳓जेत् कन्यां᳙ महा᳓यशाः ।
त᳓स्य सर्पा᳓प भद्रं᳓ ते दूरं᳓ गच्छ महा᳓यशाः ॥ २३ ॥
मूलम्
यो ज॑र॒त्का॑रुणा जा॒तो रंजे॑त् क॒न्यां॑ म॒हाय॑शाः ।
तस्य॑ स॒र्पाप॑ भ॒द्रं ते॑ दू॒रं ग॑च्छ म॒हाय॑शाः ॥ २३ ॥
Chaubey En
He, who is born of Jaratkāru, and (who) is possessor of high glory, if he bites a girl, O serpent, you, as such, would be deprived of welfare (so, you), the possessor of high glory, go afar.
Chaubey हि
जो जरत्कारु से उत्पन्न हुआ है तथा जो महान् यशस्वी है, वह (यदि) कन्या को डसता है, ऐसे तुम्हारा कल्याण तुमसे अलग हो जायेगा। (इसलिये) महान् यश वाले तुम दूर चले जाओ ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
अ᳓सितिं चा᳓र्थसिद्धिं च सु᳓नीतिं चा᳓पि यः᳓ स्म᳓रेत् ।
दि᳓वा वा य᳓दि वा रात्रौ᳓ ना᳓स्ति सर्पभयं᳓ हरेत् ॥ २४ ॥
मूलम्
असि॑तिं॒ चार्थ॑सिद्धिं च॒ सुनी॑तिं॒ चापि॒ यः स्मरे॑त् ।
दिवा॑ वा॒ यदि॑ वा रा॒त्रौ नास्ति॑ सर्पभ॒यं ह॑रेत् ॥ २४ ॥
Chaubey En
Whosoever remembers Asiti, Arthasiddhi and Sunīti by day or night, there is no fear to him of a serpent.
Chaubey हि
जो कोई (व्यक्ति) असिति, अर्थसिद्धि तथा सुनीति का स्मरण दिन में या रात्रि में करता है, उसको सर्प का भय नहीं हो सकता।
विश्वास-प्रस्तुतिः
अग᳓स्तिर्मा᳓धवश्चैव᳓ मुचु᳓कुन्दो महा᳓मुनिः ।
कपिलो᳓ मु᳓निरास्तीकः᳓ पञ्चै᳓ते सुखशायि᳓नः ॥ २५ ॥
मूलम्
अ॒गस्ति॒र्माध॑वश्चै॒व मु॒चुकु॑न्दो म॒हामु॑निः ।
क॒पि॒लो मुनि॑रास्ती॒कः प॒ञ्चैते॑ सुखशा॒यिनः॑ ॥ २५ ॥
Chaubey En
Agasti, Mādhava, Mahāmuni, Mucukunda, Kapilamuni and Āstīka, these five have happy sleep.
Chaubey हि
अगस्ति, माधव, महामुनि मुचुकुन्द, कपिलमुनि और आस्तीक ये पांच सर्वदा सुखपूर्वक सोने वाले हैं।
विश्वास-प्रस्तुतिः
न᳓र्मदायै न᳓मः प्रात᳓र्न᳓र्मदायै न᳓मो नि᳓शि ।
न᳓मो ऽस्तु नर्मदे तु᳓भ्यं त्राहि᳓[[??]] मां᳓ विषस᳓र्पतः ॥ २६ ॥
मूलम्
नर्म॑दायै॒ नमः॑ प्रा॒तर्नर्म॑दायै॒ नमो॒ निशि॑ ।
नमो॑ ऽस्तु नर्मदे॒ तुभ्यं॑ त्रा॒हि[[??]] मां वि॑ष॒सर्प॑तः ॥ २६ ॥
Chaubey En
Salutation (be) to the Narmadā in the morning; salutation (be) to the Narmadā in the night. O Narmadā, salutation be to you; protect me from the poison of the serpent.
Chaubey हि
नर्मदा को प्रातःकाल नमस्कार करता हूँ; नर्मदा को रात्रिकाल में नमस्कार करता हूँ । (इसलिये) हे नर्मदे, तुम्हारे लिये मेरा सदा नमस्कार हो; विषैले सर्प से (तुम) मेरी रक्षा करो ।
02.44
विश्वास-प्रस्तुतिः
भद्रं᳓ व᳓द दक्षिणतो᳓ भद्र᳓मुत्तरतो᳓ वद ।
भद्रं᳓ पुर᳓स्तान्नो वद भद्रं᳓ पश्चा᳓त्कपिञ्जल ॥ १ ॥
मूलम्
भ॒द्रं वद॑ दक्षिण॒तो भ॒द्रमु॑त्तर॒तो व॑द ।
भ॒द्रं पु॒रस्ता॑न्नो वद भ॒द्रं प॒श्चात्क॑पिञ्जल ॥ १ ॥
Chaubey En
O Kapinjala, speak auspicious words from the south; speak auspicious words from the north; speak auspicious words from the fore, and speak auspicious words from the back.
Chaubey हि
हे कपिञ्जल, दक्षिण की ओर से कल्याणकारी शुभ शब्द बोलो, उत्तर की ओर से कल्याणकारी शुभ शब्द बोलो, तथा पीछे से कल्याणकारी शुभ शब्द बोलो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
भद्रं᳓ वद पुत्रै᳓र्भद्रं᳓ वद गृहे᳓षु च ।
भद्र᳓मस्मा᳓कं वद भद्रं᳓ नो अ᳓भयं वद ॥ २ ॥
मूलम्
भ॒द्रं व॑द पु॒त्रैर्भ॒द्रं व॑द गृ॒हेषु॑ च ।
भ॒द्रम॒स्माकं॑ वद भ॒द्रं नो॒ अभ॑यं वद ॥ २ ॥
Chaubey En
(O Kapiñjala) speak auspicious words with sons; and speak auspicious words in the houses; speak auspicious words for us; speak for us the auspicious words of fearlessness.
Chaubey हि
(हे कपिञ्जल) पुत्रों सहित कल्याणकारी शुभ शब्द हमारे लिये बोलो, हमारे लिये कल्याणकारी शब्द (बोलो), भयरहित (होने का शब्द) हमारे लिये बोलो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
भद्र᳓मध᳓स्तान्नो वद भद्र᳓मुप᳓रिष्टाद् वद ।
भद्रं᳓भद्रं न आ᳓ वद भद्रं᳓ नः सर्व᳓तो वद ॥ ३ ॥
मूलम्
भ॒द्रम॒धस्ता॑न्नो वद भ॒द्रमु॒परि॑ष्टाद् वद ।
भ॒द्रंभ॑द्रं न॒ आ व॑द भ॒द्रं नः॑ स॒र्वतो॑ व॑द ॥ ३ ॥
Chaubey En
Speak auspicious words for us from below; speak auspicious words from above; speak for us all auspicious words; speak for us auspicious words from all sides.
Chaubey हि
(हे कपिञ्जल,) नीचे से हमारे लिये कल्याणकारी शुभ शब्द बोलो; ऊपर से हमारे लिये कल्याणकारी शुभ शब्द बोलो; हमारे लिये हर प्रकार का कल्याणकारी शुभ वचन चारों तरफ से बोलो; हमारे लिये कल्याणकारी शुभ शब्द सभी ओर से बोलो।
विश्वास-प्रस्तुतिः
असपत्नं᳓ पुर᳓स्तान्नः शिवं᳓ दक्षिणत᳓स्कृधि ।
अ᳓भयं स᳓ततं पश्चा᳓द् भद्र᳓मुत्तरतो᳓ गृहे᳓ ॥ ४ ॥
मूलम्
अ॒स॒प॒त्नं पु॒रस्ता॑न्नः शि॒वं द॑क्षिण॒तस्कृ॑धि ।
अभ॑यं॒ सत॑तं प॒श्चाद् भ॒द्रमु॑त्तर॒तो गृ॒हे ॥ ४ ॥
Chaubey En
(Speak) about absence of enmity for us from the fore; make auspicious sounds from the south; (speak) always about absence of fear from the back and auspicious words from the north in our house.
Chaubey हि
(हे कपिञ्जल,) सामने से हमारे लिये शत्रुरहित (होने का शब्द) करो, दक्षिण की ओर से हमारे लिये मङ्गलकारी (शब्द) करो; पश्चिम की ओर से निरन्तर भयरहित होने का (शब्द बोलो), उत्तर की ओर से कल्याणकारी शुभ (शब्द) हमारे घर में (बोलो) ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
यौव᳓नानि महयसि जिग्यु᳓षामिव दुन्दुभिः᳓ ।
श᳓कुन्तक प्रदक्षिणं᳓ श᳓तपत्राभि᳓ नो वद ॥ ५ ॥ [ १३ ] {४}
मूलम्
यौ॒वना॑नि महयसि जि॒ग्युषा॑मिव दुन्दु॒भिः ।
शकु॑न्तक प्रदक्षि॒णं शत॑पत्रा॒भि नो॑ वद ॥ ५ ॥ [ १३ ] {४}
Chaubey En
O Bird of omen (Śakuntaka), you enhance the youthhood (of our persons) as the battle-drum (inspires) the aspirers of victory. O Śakuntaka, O possessor of hundred wings, speak auspicious words for us from all directions clockwise.
Chaubey हि
(हे शकुन्तक), (हमारे लोगों की) युवावस्था को तुम बढ़ाते हो, जैसे दुन्दुभि विजय की इच्छा रखने वाले (सैनिकों) के (उत्साह) को। हे सौ पंख वाले शकुन्तक, चारों तरफ से प्रदक्षिण क्रम से हमारे लिये (कल्याणकारी शब्द) बोलो ।
05.44
विश्वास-प्रस्तुतिः
जाग᳓र्षि त्वं᳓ भु᳓वने जातवेदो जाग᳓र्षि य᳓त्र य᳓जते हवि᳓ष्मान् ।
इदं᳓ हविः᳓ श्रद्द᳓धानो जुहो᳓मि ते᳓न पासि गु᳓ह्यं ना᳓म गो᳓नाम् ॥ १६ ॥ [ २५ ] {३}
मूलम्
जा॒गर्षि॒ त्वं भुव॑ने जातवेदो जा॒गर्षि॒ यत्र॒ यज॑ते ह॒विष्मा॑न् ।
इ॒दं ह॒विः श्र॒द्दधा॑नो जु॒होमि॒ तेन॑ पासि॒ गुह्यं॒ नाम॒ गोना॑म् ॥ १६ ॥ [ २५ ] {३}
Chaubey En
O Jātavedas, the knower of the wealth, you (always) keep awake in the region; (you) keep awake where the sacrificer offers (the oblations). I, having faith in you, offer this oblation; verily with that you protect the hidden name i.e. the nourishing property of the cows.
Chaubey हि
हे समस्त उत्पन्न पदार्थ को जानने वाले अग्नि, तुम सम्पूर्ण भुवन में सदैव जागते रहते हो, जहाँ (भी) हविः प्रदान करने वाला यजमान तुम्हें हविः प्रदान करता है । श्रद्धाभाव से युक्त मैं यह हविः तुम्हारे लिये समर्पित करता हूँ; उसी से तुम सम्पूर्ण गायों (पोषणकारी तत्त्वों) के अन्दर निहित (पोषक) तत्त्वों की रक्षा करते हो ।
05.49
विश्वास-प्रस्तुतिः
सूक्तान्ते᳓ तृ᳓णान्यग्ना᳓व᳓रण्ये वोदके᳓ ऽपि वा ।
य᳓त्स्तृ᳓णैरध्य᳓यनं त᳓द᳓धीतं भवति ध्रुव᳓म् ॥ ६ ॥ [ ३ ]
मूलम्
सू॒क्ता॒न्ते तृणा॑न्य॒ग्नावर॑ण्ये वोद॒के ऽपि॑ वा ।
यत्स्तृणै॑र॒ध्यय॑नं॒ तदधी॑तं भवति ध्रु॒वम् ॥ ६ ॥ [ ३ ]
Chaubey En
The study with offering kuśa (grass) in the fire or in the water at the end of a sūkta, is knowledge indeed. That study verily becomes knowledge by expansion (of what has been studied).
Chaubey हि
सूक्त (अध्ययन) के अन्त में कुशाओं को अग्नि या जल में डालकर जो अध्ययन किया जाता है, वह निश्चित ही अध्ययन की परिपूर्णता के लिये होता है ।
05.51
विश्वास-प्रस्तुतिः
स्वस्त्य᳓यनं ता᳓र्क्ष्यम᳓रिष्टनेमिं मह᳓द्भूतं वायसं᳓ देव᳓तानाम् ।
असुर᳓घ्न᳓मि᳓न्द्रसखं सम᳓त्सु बृहद्यशो ना᳓वमिवा᳓ रुहेम ॥ १६ ॥
मूलम्
स्व॒स्त्यय॑नं॒ तार्क्ष्य॒मरि॑ष्टनेमिं म॒हद्भू॑तं वाय॒सं दे॒वता॑नाम् ।
अ॒सु॒रघ्नमिन्द्र॑सखं स॒मत्सु॑ बृहद्यशो॒ नाव॑मि॒वा रु॑हेम ॥ १६ ॥
Chaubey En
The Tārkṣya (the Garuḍa or Viṣṇu), having auspicious movement and the felly of whose wheel (nemi) is unhurt, (who is) the most powerful Being, (who is) a large bird of gods, (who is) the killer of demons (darkness), who has Indra as his ally in the battlefields and who is the possessor of great glory, we ride (depend) on him as if (he is) a boat.
Chaubey हि
कल्याणकारी ढंग से गन्तव्य तक पहुँचाने वाले, जिसके रथ की परिधि कभी हिंसित नहीं होती, महान् सत्त्व वाले, असुरों को नष्ट करने वाले, इन्द्र जिसके मित्र हैं, तथा जो महान् यश वाले हैं, उस देवताओं के पक्षी गरुड (विष्णु) पर हम नाव की तरफ आरूढ (आश्रित) हों ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
अंहोमु᳓चमाङ्गिरसं᳓ ग᳓यं च स्वस्त्या᳙त्रेयं᳓ म᳓नसा च ता᳓र्क्ष्यम् ।
प्र᳓यतपाणिः शरणं᳓ प्र᳓ पद्ये स्वस्ति᳓ संबाधे᳓ष्व᳓भयं नो अस्तु ॥ १७ ॥ [ ७ ]
मूलम्
अं॒हो॒मुच॑माङ्गिर॒सं गयं॑ च स्व॒स्त्या॑त्रे॒यं मन॑सा च॒ तार्क्ष्य॑म् ।
प्रय॑तपाणिः शर॒णं प्र प॑द्ये स्व॒स्ति सं॑बा॒धेष्वभ॑यं नो अस्तु ॥ १७ ॥ [ ७ ]
Chaubey En
With folded hands, I surrender (myself) with my whole heart and mind to Tārkṣya (i.e. Viṣṇu), the remover of all sins, the most vital essence of the body, the ultimate goal of life, and the protector from all sides. Let welfare and absence of fear be for us in all confrontations.
Chaubey हि
समस्त पापों से मुक्त करने वाले, शरीर के प्रत्येक अंग में रस रूप में विद्यमान सबके परम गन्तव्य, अत्रिवंशियों का कल्याण करने वाले तार्क्ष्य (विष्णु) की शरण में मन से दोनों हाथ फैलाकर जाता हूँ। समस्त बाधाओं में हमारा कल्याण हो तथा हमें किसी प्रकार का भय न हो ।
05.84
विश्वास-प्रस्तुतिः
व᳓र्षन्तु ते विभावरि दिवो᳓ अभ्र᳓स्य विद्यु᳓तः ।
रो᳓हन्तु सर्वबीजा᳓न्य᳓व ब्रह्मद्वि᳓षो जहि ॥ ४ ॥ [ २९ ]
मूलम्
वर्ष॑न्तु ते विभावरि दि॒वो अ॒भ्रस्य॑ वि॒द्युतः॑ ।
रोह॑न्तु सर्वबी॒जान्यव॑ ब्रह्म॒द्विषो॑ जहि ॥ ४ ॥ [ २९ ]
Chaubey En
O Illuminous (The Earth), may the electric sparks of cloud fall down for you from the sky. May all seeds grow up. You destroy the haters of prayers.
Chaubey हि
हे विशिष्ट प्रकाशवाली पृथिवी, द्युलोक से मेघ की विद्युत्-रश्मियाँ तुम्हारे ऊपर बरसें (जिससे) सम्पूर्ण (पार्थिव) बीज अङ्कुरित हों; जो उत्पादन से द्वेष करने वाले (तत्त्व) हैं, उनको नष्ट करो ।
05.88
विश्वास-प्रस्तुतिः
हि᳓रण्यवर्णां ह᳓रिणीं सुवर्णरजत᳓स्रजाम् ।
चन्द्रां᳓ हिरण्म᳓यीं लक्ष्मीं᳓ जा᳓तवेदो म᳓मा᳓ वह ॥ १ ॥
मूलम्
हिर॑ण्यवर्णां॒ हरि॑णीं सुवर्णरज॒तस्र॑जाम् ।
च॒न्द्रां हि॑र॒ण्मयीं॑ ल॒क्ष्मीं जात॑वेदो॒ ममा व॑ह ॥ १ ॥
Chaubey En
O Jātavedas (the Fire-god), bring to me the Lakṣmī, having golden colour, the attractor (of many), bearing golden- and silver-coloured garlands, attractive, and adorned with gold.
Chaubey हि
हे सबको जानने वाले अग्नि, स्वर्णिम वर्ण वाली, सबके हृदय को आकृष्ट करने वाली, सोने तथा चांदी की माला धारण करने वाली, प्रकाशमान, स्वर्णमयी लक्ष्मी को मेरे लिये लाओ ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
तां᳓ म आ᳓ वह जातवेदो लक्ष्मी᳓म᳓नपगामिनीम् ।
य᳓स्यां हि᳓रण्यं विन्दे᳓यं गा᳓म᳓श्वं पु᳓रुषानह᳓म् ॥ २ ॥
मूलम्
तां म॒ आ व॑ह जातवेदो ल॒क्ष्मीमन॑पगामिनीम् ।
यस्यां॒ हिर॑ण्यं वि॒न्देयं॒ गामश्वं॒ पुरु॑षान॒हम् ॥ २ ॥
Chaubey En
O Jātavedas (the Fire-god), bring to me the Lakṣmī, who is never to leave me and in whom I may get gold, cow, horse and men.
Chaubey हि
हे सबको जानने वाले अग्नि, कभी हमसे दूर न जाने वाली उस लक्ष्मी को मेरे लिये लाओ, जिसमें मैं स्वर्णादि रत्न-धन, गाय-अश्व आदि पशु-धन तथा पुत्र-पौत्र-मित्र-नौकर आदि पुरुष-धन को प्राप्त करूँ ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
अश्वपूर्वां᳓ रथमध्यां᳓ हस्तिनादप्रमोदि᳓नीम् ।
श्रि᳓यं देवी᳓मु᳓प ह्वये श्री᳓र्मा देवी᳓ जुषताम् ॥ ३ ॥
मूलम्
अ॒श्व॒पू॒र्वां र॑थम॒ध्यां ह॑स्तिनादप्रमो॒दिनी॑म् ।
श्रियं॑ दे॒वीमुप॑ ह्वये॒ श्रीर्मा॑ दे॒वी जु॑षताम् ॥ ३ ॥
Chaubey En
I invoke the Goddess Śrī, (who is) accompanied with horses in the front, chariots in the middle and who is extremely happy with the sound of elephants. Let the Goddess Śrī be happy with me.
Chaubey हि
घोड़े जिसके आगे हैं, रथ जिसके मध्य में हैं, और चिंघाड़ते हुये हाथी जिसको प्रमुदित करने वाले हैं, उस शोभायुक्त देवी लक्ष्मी को मैं पुकारता हूँ । वह श्रीस्वरूपा देवी लक्ष्मी मुझे स्वीकार करे।
विश्वास-प्रस्तुतिः
कां᳓ सोस्मितां᳓ हि᳓रण्यप्राकारामार्द्रां᳓ ज्व᳓लन्तीं तृप्तां᳓ तर्प᳓यन्तीम् ।
पद्मेस्थितां᳓ प᳓द्मवर्णां ता᳓मिहो᳓प ह्वये श्रि᳓यम् ॥ ४ ॥
मूलम्
कां सो॒स्मि॒तां हिर॑ण्यप्राकारामा॒र्द्रां ज्वल॑न्तीं तृ॒प्तां त॒र्पय॑न्तीम् ।
प॒द्मे॒स्थि॒तां पद्म॑वर्णां॒ तामि॒होप॑ ह्वये॒ श्रिय॑म् ॥ ४ ॥
Chaubey En
I invoke here that Śrī who is indescribable, always smiling, covered with thin golden cloth, always graceful, shining with brilliance, (always) satisfied, granting pleasure to others’ satisfaction, sitting on lotus, and herself being lotus-coloured.
Chaubey हि
ब्रह्मरूपा, सदा मुस्कान से युक्त रहने वाली, स्वर्णिम आवरण वाली, कोमल, प्रकाशमान, सदा तृप्त रहने वाली तथा दूसरों को (धन्य-धान्य से) प्रसन्न करने वाली, कमल पर निवास करने वाली, कमल के समान सुन्दर कमनीय वर्ण वाली उस लक्ष्मी का मैं आह्वान करता हूँ ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
चन्द्रां᳓ प्रभासां᳓ यश᳓सा ज्व᳓लन्तीं श्रि᳓यं लोके᳓ देव᳓जुष्टामुदारा᳓म् ।
तां᳓ प᳓द्मनेमिं श᳓रणं प्र᳓ पद्ये᳓ ऽलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां᳓ वृणोमि ॥ ५ ॥ [ ३५ ]
मूलम्
च॒न्द्रां प्र॑भा॒सां य॒शसा॒ ज्वल॑न्तीं॒ श्रियं॑ लो॒के दे॒वजु॑ष्टामुदा॒राम् ।
तां पद्म॑नेमिं॒ शर॑णं॒ प्र प॒द्ये ऽल॑क्ष्मीर्मे नश्यतां॒ त्वां वृ॑णोमि ॥ ५ ॥ [ ३५ ]
Chaubey En
I, in this world, surrender myself to that Śrī who is attractive, shining with brilliance, burning with glory, worshipped by the gods, benevolent and having lotus as axle of her chariot. May my scarcity of wealth (poverty) come to its end, and (with this desire) I choose you (O Goddess Śrī).
Chaubey हि
आह्लादकारी, अत्यन्त प्रकाश वाली, अपनी कीर्ति से सर्वत्र प्रकाशित होने वाली, देवताओं से सेवित, उदार, कमल का घेरा वाली उस लक्ष्मी की मैं शरण में जाता हूँ । मेरी अलक्ष्मी (दरिद्रता) नष्ट होवे। (हे लक्ष्मी, इन गुणों से युक्त) तुम्हारा मैं वरण करता हूँ ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आ᳓दित्यवर्णे त᳓पसो᳓ ऽधि जातो᳓ व᳓नस्प᳓तिस्त᳓व वृक्षो᳓ ऽथ बिल्वः᳓ ।
त᳓स्य फ᳓लानि त᳓पसा᳓ नुदन्तु माया᳓न्तरा या᳓श्च बाह्या᳓ अ᳓लक्ष्मीः ॥ ६ ॥
मूलम्
आदि॑त्यवर्णे॒ तप॒सो ऽधि॑ जा॒तो वन॒स्पति॒स्तव॑ वृ॒क्षो ऽथ॑ बि॒ल्वः ।
तस्य॒ फला॑नि॒ तप॒सा नु॑दन्तु मा॒यान्त॑रा॒ याश्च॑ बा॒ह्या अल॑क्ष्मीः ॥ ६ ॥
Chaubey En
O the possessor of the brilliance of the Sun, the bilva tree, born out of your penance, may its fruit, (blessed) with your penance, take away the inner ignorance and all types of scarcity and shortage from my life outside.
Chaubey हि
हे आदित्य के समान वर्ण वाली लक्ष्मी, वृक्षों में श्रेष्ठ बिल्व वृक्ष तुम्हारे तेज से उत्पन्न हुआ है । तुम्हारे तेज से उसके फल इन्द्रिय सम्बन्धी आन्तरिक अज्ञान तथा कर्मेन्द्रिय सम्बन्धी बाह्य जो दरिद्रता आदि अलक्ष्मी है, उसे दूर करें ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
उ᳓पैतु मां᳓ देवसखः᳓ कीर्ति᳓श्च मणि᳓ना सह᳓ ।
प्रादु᳓र्भूतो᳓ ऽस्मि रा᳓ष्ट्र् ऽस्मि᳓न् कीर्तिं᳓ वृद्धिं᳓ ददातु मे ॥ ७ ॥
मूलम्
उपै॑तु॒ मां दे॑वस॒खः की॒र्तिश्च॑ म॒णिना॑ स॒ह ।
प्रा॒दुर्भू॒तो ऽस्मि॒ राष्ट्र् ऽस्मिन् की॒र्तिं वृ॒द्धिं द॑दातु मे ॥ ७ ॥
Chaubey En
May he, whose friends are gods, and his glory, with precious gems, come to me. I have taken my birth in this nation, may he grant me glory, growth and prosperity.
Chaubey हि
हे लक्ष्मी, धनादि प्रदान करने वाली देवताओं की मित्रता तथा विविध रत्न-रूप धन के साथ कीर्ति मेरे पास आवे । मैं इस राष्ट्र में उत्पन्न हुआ हूँ, (वह लक्ष्मी) मेरे लिये (इस राष्ट्र में) कीर्ति और वृद्धि प्रदान करे ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
क्षुत्पिपासा᳓मलां ज्येष्ठा᳓म᳓लक्ष्मीं नाशयाम्य᳓हम् ।
अ᳓भूतिम᳓समृद्धिं च स᳓र्वां नि᳓र्णुद मे गृ᳓हात् ॥ ८ ॥
मूलम्
क्षु॒त्पि॒पा॒साम॑लां ज्ये॒ष्ठामल॑क्ष्मीं नाशया॒म्यह॑म् ।
अभू॑ति॒मस॑मृद्धिं च॒ सर्वां॒ निर्णु॑द मे॒ गृहा॑त् ॥ ८ ॥
Chaubey En
I destroy the Alakṣmī (the absence of wealth), the eldest one, having the form of hunger, thirst and dirtiness. (O Goddess of wealth,) banish from my house (nation) all types of dearth and poverty.
Chaubey हि
भूख और प्यास से सदा मलिन, अत्यन्त बूढी अलक्ष्मी को मैं नष्ट करता हूँ । हे लक्ष्मी, सम्पूर्ण अवैभव तथा असमृद्धि को मेरे घर से दूर करो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गन्ध᳓द्वारां दुराध᳓र्षां नित्य᳓पुष्टां करीषि᳓णीम् ।
ईश्व᳓रीं स᳓र्वभूतानां ता᳓मिहो᳓प ह्वये श्रि᳓यम् ॥ ९ ॥
मूलम्
ग॒न्धद्वा॑रां दुरा॒धर्षां॑ नि॒त्यपु॑ष्टां करी॒षिणी॑म् ।
ई॒श्वरीं॒ सर्व॑भूतानां॒ तामि॒होप॑ ह्वये॒ श्रिय॑म् ॥ ९ ॥
Chaubey En
I invoke here that Śrī, who is pleased with fragrance, the most powerful, growing day by day, abounding in cattle wealth, and the ruler of all beings.
Chaubey हि
गन्धग्रहणरूप लक्षण वाली, किसी के द्वारा दबाई न जाने वाली, नित्य बढ़ने वाली, गाय-अश्व आदि पशु-रूप समृद्धि वाली तथा सभी प्राणियों के ऊपर शासन करने वाली उस लक्ष्मी का आह्वान करता हूँ ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
म᳓नसः का᳓ममा᳓कूतिं वाचः᳓ सत्य᳓मशीमहि ।
पशूनां᳓ रूप᳓म᳓न्नस्य म᳓यि श्रीः᳓ श्रयतां य᳓शः ॥ १० ॥ [ ३६ ]
मूलम्
मन॑सः॒ काम॒माकू॑तिं वा॒चः स॒त्यम॑शीमहि ।
प॒शू॒नां रू॒पमन्न॑स्य॒ मयि॒ श्रीः श्र॑यतां॒ यशः॑ ॥ १० ॥ [ ३६ ]
Chaubey En
May we obtain the fulfilment of our desires and intention of the mind, the truthfulness of the speech, and the (various) forms of cattle and grain. Let the Goddess Śrī bestow on me the glory.
Chaubey हि
(हे लक्ष्मी,) मन की कामना, संकल्प शक्ति तथा वाणी की सत्यता को हम प्राप्त करें । पशुओं की समृद्धि, अन्न का भोग, लक्ष्मी तथा यश मुझ में स्थित हों ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
कर्द᳓मेन प्रजा᳓ भूता᳓ म᳓यि सं᳓ भव कर्द᳓म᳓ ।
श्रि᳓यं वासय मे गृहे᳓ मात᳓रं पद्ममालि᳓नीम् ॥ ११ ॥
मूलम्
क॒र्दमे॑न प्र॒जा भू॒ता मयि॒ सं भ॑व क॒र्दम ।
श्रियं॑ वासय मे गृ॒हे मा॒तरं॑ पद्ममा॒लिनी॑म् ॥ ११ ॥
Chaubey En
The offsprings have been created by Kardama; O Kardama, reside in me. Make the Mother Śrī, wearing lotus-garlands, stay in my house forever.
Chaubey हि
जिस (तुझ) कर्दम नामक पुत्र के द्वारा लक्ष्मी सुपुत्रा हुई है, वह तुम हे कर्दम, मेरे घर में होवो और कमल की माला धारण करने वाली अपनी माता लक्ष्मी को मेरे कुल में निवास करावो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आ᳓पः सृजन्तु स्नि᳓ग्धानि चि᳓क्लीत व᳓स मे गृहे᳓ ।
नि᳓ च देवीं᳓ मात᳓रं श्रि᳓यं वासय मे कुले᳓ ॥ १२ ॥
मूलम्
आपः॑ सृजन्तु॒ स्निग्धा॑नि॒ चिक्ली॑त॒ वस॑ मे गृ॒हे ।
नि च॑ दे॒वीं मा॒तरं॒ श्रियं॑ वासय मे कु॒ले ॥ १२ ॥
Chaubey En
Let the waters bring smoothness; O Ciklîta, reside in my house and make the Goddess Mother Śrī reside in my family.
Chaubey हि
सभी प्रकार के जल स्निग्ध ओषधियो को उत्पन्न करें । हे (लक्ष्मी के पुत्र) चिक्लीत, मेरे घर में निवास करो और अपनी माता देवी लक्ष्मी को भी मेरे कुल में निवास करावो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आर्द्रां᳓ पुष्करि᳓णीं यष्टिं᳓ सुव᳓र्णां हेममालि᳓नीम् ।
सूर्यां᳙ हिरण्म᳙यीं लक्ष्मीं᳓ जा᳓तवेदो म᳓मा᳓ वह ॥ १३ ॥
मूलम्
आ॒र्द्रां पु॑ष्क॒रिणीं॑ य॒ष्टिं सु॒वर्णां॑ हेममा॒लिनी॑म् ।
सू॒र्यां॑ हिर॒ण्म॑यीं ल॒क्ष्मीं जात॑वेदो॒ ममा व॑ह ॥ १३ ॥
Chaubey En
O Jātavedas (Agni, the source of all wealth), bring to me the Lakṣmī, who is very kind, residing in the lotus pond, keeping a mace in her hand, possessing a beautiful colour, wearing golden chains, having the lustre of the sun, and adorned with gold.
Chaubey हि
हे सबको जानने वाले अग्नि, पूर्ण युवावस्था को प्राप्त हुई, कमल धारण करने वाली, अत्यन्त पुष्ट अङ्ग वाली, पिङ्गल वर्ण वाली, कमल की माला धारण करने वाली, सूर्य के समान प्रकाश वाली, हिरण्य से युक्त लक्ष्मी को मेरे पास लावो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आर्द्रां᳓ पुष्करि᳓णीं पुष्टां᳓ पिंगलां᳓ पद्ममालि᳓नीम् ।
चन्द्रां᳓ हिर᳓ण्मयीं लक्ष्मीं᳓ जा᳓तवेदो म᳓मा᳓ वह ॥ १४ ॥ *
मूलम्
आ॒र्द्रां पु॑ष्क॒रिणीं॑ पु॒ष्टां पिं॑ग॒लां प॑द्ममा॒लिनी॑म् ।
च॒न्द्रां हि॒रण्म॑यीं ल॒क्ष्मीं जात॑वेदो॒ ममा व॑ह ॥ १४ ॥ *
Chaubey En
O Jātavedas, bring to me the Lakṣmī, who is very kind, residing in the lotus pond, well-accomplished of reddish-colour, wearing golden chains, having an attractive complexion and adorned with gold all over.
Chaubey हि
हे सबको जानने वाले अग्नि, कोमल अङ्ग वाली (अथवा उदार चित्त वाली), कमल धारण करने वाली, हाथ में वेत धारण करने वाली, सुन्दर वर्ण वाली, सोने की माला धारण करने वाली, आह्लादकारी (चांदी-रूप में) तथा स्वर्णरूपा लक्ष्मी को मेरे पास लावो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
तां᳓ म आ᳓ वह जातवेदो लक्ष्मी᳓म᳓नपगामिनीम् ।
य᳓स्यां हि᳓रण्यं प्र᳓भूतं गा᳓वो दास्यो᳓ ऽश्वान् विन्दे᳓यं पु᳓रुषानह᳓म् ॥ १५ ॥
मूलम्
तां म॒ आ व॑ह जातवेदो ल॒क्ष्मीमन॑पगामिनीम् ।
यस्यां॒ हिर॑ण्यं॒ प्रभू॑तं॒ गावो॑ दा॒स्यो ऽश्वा॑न् वि॒न्देयं॒ पुरु॑षान॒हम् ॥ १५ ॥
Chaubey En
O Jātavedas, bring to me the Lakṣmī who should never depart and from whom I may get ample gold, cows, servants, horses and men.
Chaubey हि
हे सबको जानने वाले अग्नि, हमसे कभी अलग न होने वाली उस लक्ष्मी को मेरे पास लावो, जिससे मैं बहुत-सा स्वर्ण, गाय-अश्व आदि पशु-धन व दासी, पुत्र, पौत्र आदि पुरुष-धन को प्राप्त करूँ ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
यः᳓ शु᳓चिः प्र᳓यतो भूत्वा᳓ जुहु᳓यादा᳓ज्यमन्वह᳓म् ।
श्रियः᳓ पञ्चदशर्चं᳓ च श्री᳓कामः स᳓ततं जपेत् ॥ १६ ॥ [ ३७ ]
मूलम्
यः शुचिः॒ प्रय॑तो भू॒त्वा जु॒हुया॒दाज्य॑मन्व॒हम् ।
श्रि॒यः प॑ञ्चदश॒र्चं च॒ श्रीका॑मः॒ सत॑तं जपेत् ॥ १६ ॥ [ ३७ ]
Chaubey En
Whosoever, having become pure and sinless, offers the oblation of clarified butter daily, (he gets the blessings of Lakṣmī). A man desirous of wealth should chant daily (the hymn) of Lakṣmī, comprising the (above) fifteen ṛks.
Chaubey हि
जो व्यक्ति बाह्य तथा आभ्यन्तर रूप से पवित्र होकर प्रतिदिन इन मन्त्रों से घृत की आहुति प्रदान करता है (उसकी मनोकामना पूर्ण होती है)। लक्ष्मी प्राप्ति की कामना वाले व्यक्ति को इन पन्द्रह ऋचाओं वाले सूक्त का नित्य पाठ या जप करना चाहिए।
05.89
विश्वास-प्रस्तुतिः
प᳓द्मानने प᳓द्मिनि प᳓द्मपत्रे पद्म᳙प्रिये प᳓द्मदलायताक्षि ।
वि᳓श्वप्रिये वि᳓श्वमनो ऽनुकूले त्वत्पादपद्मं᳓ म᳓यि सं᳓ नि᳓ धत्स्व ॥ १ ॥
मूलम्
पद्मा॑नने॒ पद्मि॑नि॒ पद्म॑पत्रे॒ प॒द्म॑प्रिये॒ पद्म॑दलायताक्षि ।
विश्व॑प्रिये॒ विश्व॑मनो ऽनुकूले त्वत्पादप॒द्मं मयि॒ सं नि ध॑त्स्व ॥ १ ॥
Chaubey En
O Devī having lotus-like face, O possessor of lotus, O residing on lotus leaf, O lover of lotus, O wide lotus-eyed, O lovely to all, O congenial to the mind of all, you keep your lotus-feet on me.
Chaubey हि
हे कमल के समान सुन्दर मुख वाली, हे विकसित कमल सदृश युवती, हे कमल के पत्ते पर निवास करने वाली, हे कमल से प्रेम करने वाली, हे कमल के पत्र सदृश विशाल नेत्र वाली, हे सबकी प्रिय, हे सबके मन के अनुकूल रहने वाली, तुम अपने चरण-कमल को मेरे (हृदय) में सम्यक् प्रकार से प्रतिष्ठित करो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
प᳓द्मानने प᳓द्मऊरु प᳓द्माक्षि प᳓द्मसंभवे ।
त᳓न्मे भजसि प᳓द्माक्षि येन सौ᳓ख्यं ल᳓भाम्यह᳓म् ॥ २ ॥
मूलम्
पद्मा॑नने॒ पद्म॑ऊरु॒ पद्मा॑क्षि॒ पद्म॑संभवे ।
तन्मे॑ भजसि॒ पद्मा॑क्षि येन॒ सौख्यं॒ लभा॑म्य॒हम् ॥ २ ॥
Chaubey En
O Devī having lotus-like face, having lotus-like thigh, lotus-eyed, O born of lotus, you provide me wealth from which I get immense pleasure.
Chaubey हि
हे कमल के समान सुन्दर मुख वाली, हे कमल के समान विशाल जंघाओं वाली, हे कमल के समान नेत्र वाली, हे कमल से उत्पन्न होने वाली, हे कमल के समान नेत्र वाली, वह तुम मुझे वह प्रदान करती हो, जिससे मैं (हर प्रकार का) सुख प्राप्त करता हूँ ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
अ᳓श्वदायि गो᳓दायि ध᳓नदायि म᳓हाधने ।
ध᳓नं मे जुषतां देवि सर्व᳓कामाँश्च देहि मे ॥ ३ ॥
मूलम्
अश्व॑दायि॒ गोदा॑यि॒ धन॑दायि॒ महा॑धने ।
धनं॑ मे जुषतां देवि स॒र्वका॑माँश्च देहि मे ॥ ३ ॥
Chaubey En
O giver of horse, O giver of cow, O giver of wealth, O possessor of great wealth, O goddess, grant me wealth and fulfil all my desires.
Chaubey हि
हे अश्वधन प्रदान करने वाली, हे गोधन प्रदान करने वाली, हे धन प्रदान करने वाली, हे श्रेष्ठ धन वाली, (तुम्हारे द्वारा प्रदत्त) धन मुझे प्रसन्न करे । हे देवी ! मेरी सम्पूर्ण इच्छाओं को पूर्ण करो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पुत्रपौत्रं᳓ ध᳓नं धान्यं᳙ हस्त्यश्वाश्वतरै᳓ र᳓थैः ।
प्रजानां᳓ भवसि मातरा᳓युष्मन्तं करोतु मा᳓म् ॥ ४ ॥
मूलम्
पु॒त्र॒पौ॒त्रं धनं॑ धा॒न्यं॑ हस्त्यश्वाश्वत॒रै रथैः॑ ।
प्र॒जा॒नां भ॑वसि मात॒रायु॑ष्मन्तं करोतु॒ माम् ॥ ४ ॥
Chaubey En
O mother, for procreation you become bestower of sons, grandsons, wealth, and grain, drawn by chariots yoked with elephants, horses and mules; make me enjoy longevity of life.
Chaubey हि
हाथी, घोड़े, खच्चर, रथ आदि से युक्त पुत्र, पौत्र, धन, धान्य आदि अपनी प्रजाओं को देने वाली होती हो, इसलिए हे माता मुझे दीर्घायु से युक्त करो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
ध᳓नमग्नि᳓र्ध᳓नं वायु᳓र्ध᳓नं सू᳓र्यो ध᳓नं व᳓सुः ।
ध᳓नमि᳓न्द्रो बृ᳓हस्प᳓तिर्व᳓रुणो ध᳓नमुच्यते ॥ ५ ॥
मूलम्
धन॑म॒ग्निर्धनं॑ वा॒युर्धनं॒ सूर्यो॒ धनं॒ वसुः॑ ।
धन॒मिन्द्रो॒ बृह॒स्पति॒र्वरु॑णो॒ धन॑मुच्यते ॥ ५ ॥
Chaubey En
Agni is (called) wealth; wind is (called) wealth; sun is (called) wealth; Vasu is (called) wealth; Indra is (called) wealth; Bṛhaspati is (called) wealth; and Varuṇa is called wealth.
Chaubey हि
अग्नि को धन (कहा जाता है), वायु को धन (कहा जाता है), सूर्य को धन (कहा जाता है), वसु को धन (कहा जाता है), इन्द्र को धन (कहा जाता है), बृहस्पति तथा वरुण को धन कहा जाता है।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वै᳓नतेय सो᳓मं पिब सो᳓मं पिबतु वृत्रहा᳓ ।
सो᳓मं ध᳓नस्य सोमि᳓नो म᳓ह्यं ददातु सोमि᳓नः ॥ ६ ॥
मूलम्
वैन॑तेय॒ सोमं॑ पिब॒ सोमं॑ पिबतु वृत्र॒हा ।
सोमं॒ धन॑स्य सो॒मिनो॒ मह्यं॑ ददातु सो॒मिनः॑ ॥ ६ ॥
Chaubey En
O son of Vinatā, drink soma. May Indra, the killer of Vṛtra, drink soma. Let the possessors of soma give me the soma (pleasure) of wealth.
Chaubey हि
हे विनता के पुत्र (गरुड), सोम का पान करो; वृत्र को मारने वाले (इन्द्र) सोम का पान करें । सोम से युक्त (व्यक्ति) के धन का (धन-रूप सोम लक्ष्मी) मुझे प्रदान करें ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
न᳓ क्रो᳓धो न᳓ च मात्सर्यं᳓ न᳓ लोभो᳓ ना᳓शुभा मतिः᳓ ।
भ᳓वन्ति कृत᳓पुण्यानां भक्ता᳓नां श्रीसूक्तं᳓ जपेत् ॥ ७ ॥
मूलम्
न क्रोधो॒ न च॑ मात्स॒र्यं न लो॒भो नाशु॑भा म॒तिः ।
भव॑न्ति कृ॒तपु॑ण्यानां भ॒क्तानां॑ श्रीसू॒क्तं ज॑पेत् ॥ ७ ॥
Chaubey En
Neither anger nor envy, neither greed nor evil thought come to the worshippers, who have accomplished meritorious acts in their former lives. (Therefore) one should chant the hymn addressed to the Goddess Śrī always.
Chaubey हि
श्रीसूक्त का जप करते हुये पुण्य कर्म करने वाले भक्तों को न तो कभी क्रोध होता है, न कभी ईर्ष्या, न कभी लोभ होता है और न ही कभी अशुभ बुद्धि होती है ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वि᳓ष्णुपत्नीं क्षमां᳓ देवीं᳓ माधवीं᳓ [[??]]माध᳓वप्रियाम् ।
लक्ष्मीं᳓ प्रिय᳓सखीं देवीं᳓ न᳓माम्यच्युतव᳓ल्लभाम् ॥ ८ ॥
मूलम्
विष्णु॑पत्नीं क्ष॒मां दे॒वीं मा॑ध॒वीं [[??]]मा॒धव॑प्रियाम् ।
ल॒क्ष्मीं प्रि॒यस॑खीं दे॒वीं नमा॑म्यच्युत॒वल्ल॑भाम् ॥ ८ ॥
Chaubey En
I bow to the Goddess Lakṣmī, the consort of Viṣṇu, Kṣamā (the Earth), Mādhavī, the beloved of Mādhava, the dearest friend and the favourite spouse of Acyuta (Viṣṇu).
Chaubey हि
विष्णु की पत्नी क्षमारूपा, वसन्त की शोभा वाली, विष्णुप्रिया, प्रियसखी, अच्युत विष्णु की वल्लभा (प्रियतमा) देवी लक्ष्मी को मैं नमस्कार करता हूँ ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
महालक्ष्मीं᳓ च विद्महे वि᳓ष्णुपत्नीं च धीमहि । त᳓न्नो लक्ष्मीः᳓ प्र᳓ चोदयात् ॥ ९ ॥
मूलम्
म॒हा॒ल॒क्ष्मीं च॑ विद्महे॒ विष्णु॑पत्नीं च धीमहि । तन्नो॑ ल॒क्ष्मीः प्र चो॑दयात् ॥ ९ ॥
Chaubey En
May we know the Mahālakṣmī and meditate upon the consort of Viṣṇu; may that Lakṣmī, impel us.
Chaubey हि
महालक्ष्मी को हम प्राप्त करें (या जानें), विष्णु-पत्नी का हम (सदा) चिन्तन करें । वह (जगज्जननी) लक्ष्मी हमें (सत्कर्मों द्वारा धनार्जन में) प्रेरित करे ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
श्रीर्व᳓र्चस्वमा᳓युष्य᳙१मा᳓रोग्यमा᳓विधात्प᳓वमानं महीयते ।
धान्यं᳙ १ धनं प᳓शुं बहुपुत्रलाभं᳓ शत᳓संवत्सरं दीर्घ᳓मा᳓युः ॥ १० ॥ [ ३८ ]
मूलम्
श्री॒र्वर्च॑स्व॒मायु॒ष्य॑१॒मारो॑ग्य॒मावि॑धा॒त्पव॑मानं महीयते ।
धा॒न्यं॑ १ धनं॒ पशुं॑ बहुपुत्रला॒भं श॒तसं॑वत्सरं दी॒र्घमायुः॑ ॥ १० ॥ [ ३८ ]
Chaubey En
May the Śrī bestow upon us the vital power, longevity and freedom from diseases; being pure she is worshipped for grain, wealth, cattle, attainment of many sons and long life for hundred years.
Chaubey हि
लक्ष्मी हमें ब्रह्मवर्चस्, आयुष्य, आरोग्य तथा नित्य पवित्रता प्रदान करें। वह लक्ष्मी अन्न, धन, पशु, पुत्र-पौत्र तथा सौ वर्ष की लम्बी आयु प्रदान करने के लिये (सबके द्वारा) पूजित होती हैं ।
06.44
विश्वास-प्रस्तुतिः
च᳓क्षुश्च श्रो᳓त्रं च म᳓नश्च वा᳓क् च प्राणापानौ᳓ दे᳓हं इदं᳓ शरी᳓रम् ।
द्वौ᳓ प्रत्य᳓ञ्चावनुलोमौ᳓ विसर्गा᳓वेतं᳓ तं मन्ये द᳓शयन्त्रमु᳓त्समम् ॥ २५ ॥
मूलम्
चक्षु॑श्च॒ श्रोत्रं॑ च॒ मन॑श्च॒ वाक् च॑ प्राणापा॒नौ देहं॑ इ॒दं श॒रीर॑म् ।
द्वौ प्र॒त्यञ्चा॑वनुलो॒मौ वि॑स॒र्गावे॒तं तं॑ म॑न्ये॒ दश॑यन्त्र॒मुत्स॑मम् ॥ २५ ॥
Chaubey En
I consider this body consisting of the eye, the ear, the mind, the speech, the two vital breaths — the prāṇa and apāna —, the form (deha), the two creations — inverted and direct — as the tenfold water-raising-machine.
Chaubey हि
आँख, कान, मन, वाक्, प्राण-अपान से युक्त तथा अनुलोम-प्रतिलोम रूप दो बहाव वाले इस शरीर को दश फौव्वारों वाला जल यन्त्र मानता हूँ ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
उ᳓रश्च पृष्ठ᳓श्च क᳓रौ च बाहू᳓ जं᳓घे चोरू᳓ उद᳓रं शिर᳓श्च ।
रो᳓माणि मांसं᳓ रुधिरास्थिमज्ज᳓मेत᳓च्छ᳓रीरं जल᳓बुद्बुदोपमम् ॥ २६ ॥
मूलम्
उर॑श्च पृ॒ष्ठश्च॒ करौ॑ च बा॒हू जंघे॑ चो॒रू उ॒दरं॑ शि॒रश्च॑ ।
रोमा॑णि मां॒सं रु॑धिरास्थिम॒ज्जमे॒तच्छरी॑रं ज॒लबु॑द्बुदोपमम् ॥ २६ ॥
Chaubey En
This body — consisting of the heart, the back, the two palms, the two arms, the two thighs, the two breasts, the belly, the head, the hair, the flesh, the blood, the bone, the marrow — is just like a bubble in the water.
Chaubey हि
हृदय, पीठ, दो हथेलियां, दो भुजायें, दो जंघाये, दो स्तन, पेट, शिर, रोम, मांस, रुधिर, हड्डी एवं मज्जा से युक्त यह शरीर जल के बुलबुले के समान है।
विश्वास-प्रस्तुतिः
भ्रु᳓वौ लला᳓टे च त᳓था च क᳓र्णौ ह᳓नू कपोलौ᳓ छु᳓बु᳓कस्त᳓था च ।
ओ᳓ष्ठौ च दन्ता᳓श्च त᳓थैव᳓ जिह्वाँ᳓ एत᳓च्छ᳓रीरं मुखरत्न᳓कोशम् ॥ २७ ॥ [ २० ]
मूलम्
भ्रुवौ॑ ल॒लाटे॑ च॒ तथा॑ च॒ कर्णौ॒ हनू॑ कपो॒लौ छुबुक॒स्तथा॑ च ।
ओष्ठौ॑ च द॒न्ताश्च॒ तथै॒व जि॒ह्वाँ ए॒तच्छरी॑रं मुखर॒त्नको॑शम् ॥ २७ ॥ [ २० ]
Chaubey En
(I consider) this head, consisting of the two eye-brows on the forehead, the two ears, the two jaws, the two cheeks, the chin, the two lips, the teeth, the tongue as the treasurehouse of gems in the body.
Chaubey हि
ललाट पर दो भौहें, दो कान, दो जबड़े, दो गाल, ठुड्डी, दो ओँठ, दाँत तथा जिह्वा से युक्त इस मुख-मण्डल को शरीर में स्थित दश रत्नों का कोश मानता हूँ ।
07.56
विश्वास-प्रस्तुतिः
स्व᳓प्न᳓ स्व᳓प्ना᳓धिक᳓रणे स᳓र्वं नि᳓ ष्वापया ज᳓नम् ।
आसूर्य᳓मन्या᳓न्त्स्वापय ह्यद्या᳙१हं᳓ जागृयामिह᳓ ॥ १ ॥
मूलम्
स्वप्न स्वप्नाधि॒कर॑णे॒ सर्वं॒ नि ष्वा॑पया॒ जन॑म् ।
आ॒सू॒र्यम॒न्यान्त्स्वा॑पय॒ ह्य॒द्या॑१॒हं जा॑गृयामि॒ह ॥ १ ॥
Chaubey En
O dream, in the realm of sleeping do make all people sleep; make others sleep till the rising of the sun; may I keep awake in my heart here.
Chaubey हि
हे स्वप्न, (शयन) के आधार इस गृह (शरीर) में सभी जनों को अच्छी प्रकार से सुला दो । सूर्योदयपर्यन्त अन्य सबको सुला दो, (किन्तु) मैं यहाँ अपने हृदय में जागता रहूं ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
अजगरो᳓ ना᳓म सर्पः᳓ स᳓र्पि᳓रविषो᳓ महा᳓न् ।
त᳓स्मिन्हि᳓ सर्पः᳓ सु᳓धितस्ते᳓न त्वा स्वापयामसि ॥ २ ॥
मूलम्
अ॒ज॒ग॒रो नाम॑ स॒र्पः सर्पिर॑वि॒षो म॒हान् ।
तस्मि॒न्हि स॒र्पः सुधि॑त॒स्तेन॑ त्वा स्वापयामसि ॥ २ ॥
Chaubey En
The serpent, called Ajagara, the great, who has clarified butter (ghee) in him is poisonless; in him the serpent is well-placed; we make you sleep with him.
Chaubey हि
अजगर नाम का सर्प है, जिसके अन्दर घृत है; वह महान् (सर्प) बिना विष का है । उसी (गृह) में सर्प अच्छी प्रकार से स्थित है, उसी के साथ तुमको सुला रहा हूं ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सर्पः᳓ सर्पो᳓ अजगरः᳓ सर्पि᳓रविषो᳓ महा᳓न् ।
त᳓स्य शुष्का᳓त्सि᳓न्धवस्त᳓स्य गाध᳓मशीमहि ॥ ३ ॥
मूलम्
स॒र्पः स॒र्पो अ॑जग॒रः स॒र्पिर॑वि॒षो म॒हान् ।
तस्य॑ शु॒ष्कात्सिन्ध॑व॒स्तस्य॑ गा॒धम॑शीमहि ॥ ३ ॥
Chaubey En
The serpent, the great serpent Ajagara has clarified butter (ghee) in him and (is) poisonless. From his dry (mouth) the rivers (flow). May we attain his fordable place.
Chaubey हि
(वह) सर्पणशील सर्प, अजगर, अन्दर घृत वाला है, (वह) महान् (सर्प) बिना विष का है । उसके शुष्क (मुख) से समुद्र प्रवाहित होता है, हम उसकी थाह को प्राप्त करें ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
काळिको᳓ ना᳓म सर्पो᳓ न᳓वनागसह᳓स्रबलः ।
यमुनहृदे᳓ ह सो᳓ जातो ३ ऽसौ᳓ नारायणवा᳓हनः ॥ ४ ॥
मूलम्
का॒ळि॒को नाम॑ स॒र्पो नव॑नागस॒हस्र॑बलः ।
य॒मु॒न॒हृ॒दे ह॒ सो जा॑तो॒ ३ ऽसौ ना॑रायण॒वाह॑नः ॥ ४ ॥
Chaubey En
The serpent, known as Kālika, the possessor of strength of a thousand young elephants; verily he is born in the Yamunā river. He is the carrier of Nārāyaṇa.
Chaubey हि
(वह) काळिक नाम का सर्प नये सहस्र हाथियों के बल वाला है। वही यमुना-सरोवर में पैदा हुआ है, वही नारायण का वाहन है ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
य᳓दि काळिकदूत᳓स्य य᳓दि काःकाळिका᳓द्भय᳓म् ।
जन्मभूमिं᳓ प᳓रिक्रान्तो नि᳓र्विषो याति काळिकः᳓ ॥ ५ ॥
मूलम्
यदि॑ काळिकदू॒तस्य॒ यदि॑ काःकाळि॒काद्भ॒यम् ।
ज॒न्म॒भू॒मिं परि॑क्रान्तो॒ निर्वि॑षो याति काळि॒कः ॥ ५ ॥
Chaubey En
If there is a fear from the messenger of Kāḷika, if there is a fear from the Kāḥkḷika particular type of serpent; moving in the area of the birthplace the Kāḷika becomes poisonless.
Chaubey हि
यदि उस काळिक सर्प के दूत को काःकालिक (सर्प की एक विशेष जाति) से भय है तो (यह कतई नहीं, क्योंकि) जन्मभूमि को पार करने पर वह काळिक विषरहित हो जाता है।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आ᳓ याहीन्द्र पथि᳓भिरीळिते᳓भिर्यज्ञ᳓मिमं᳓ नो भागधे᳓यं जुषस्व ।
तृप्तां᳓ जहुर्मा᳓तुलस्येव यो᳓षा भाग᳓स्ते पैतृष्वसेयी᳓ वपा᳓मिव ॥ ६ ॥
मूलम्
आ या॑हीन्द्र प॒थिभि॑रीळि॒तेभि॑र्य॒ज्ञमि॒मं नो॑ भाग॒धेयं॑ जुषस्व ।
तृ॒प्तां ज॑हु॒र्मातु॑लस्येव॒ योषा॑ भा॒गस्ते॑ पैतृष्वसे॒यी व॒पामि॑व ॥ ६ ॥
Chaubey En
O Indra, come by the adorable paths to our sacrifice and enjoy this share (offered to you). Your share has been offered as a woman (gets) the share of the brother of the mother (maternal uncle) and the daughter of the sister of father (gets) like a mound or heap (thrown away by the ants).
Chaubey हि
हे इन्द्र, प्रशंसनीय मार्गों से आवो और हमारे (द्वारा अर्पित अपने) इस यज्ञभाग को प्रीतिपूर्वक स्वीकार करो, जिस प्रकार कोई स्त्री तृप्त होने पर भी अपने मामा के द्वारा प्रदत्त धन को (हर्षपूर्वक) ग्रहण करती है । यह तुम्हारा भाग बुआ को दी गई सम्पत्ति के समान (पुनः वापस लेने के लिये नहीं) है ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
यशस्करं᳓ ब᳓लवन्तं प्रभुत्वं᳓ त᳓मेव᳓ राजाधिपति᳓र्बभूव ।
सं᳓कीर्णनागाश्वपतिर्नरा᳓णां सुमङ्ग᳓ल्यं स᳓ततं दीर्घ᳓मा᳓युः ॥ ७ ॥
मूलम्
य॒श॒स्क॒रं बल॑वन्तं प्रभु॒त्वं तमे॒व रा॑जाधिप॒तिर्ब॑भूव ।
संकी॑र्णनागाश्वपतिर्न॒राणां॑ सुम॒ङ्गल्यं॒ सत॑तं दी॒र्घमायुः॑ ॥ ७ ॥
Chaubey En
To him the kingship, accompanied with lordship of elephants and horses, confers glory, power and excelling might; let it always bring good fortune and longevity.
Chaubey हि
हाथी, अश्व तथा मनुष्यों से युक्त जो राजाधिपतित्व है, वही यश देने वाला, बल से युक्त प्रभुत्व का द्योतक, सुन्दर मङ्गल वाला तथा अत्यन्त सुदीर्घ आयु वाला होता है ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
कर्कोटको᳓ ना᳓म सर्पो᳓ यो᳓ दृ᳓ष्टीविष उच्य᳓ते ।
त᳓स्य सर्प᳓स्य सर्पत्वं᳓ त᳓स्मै सर्प न᳓मो ऽस्तु ते ॥ ८ ॥ [ २३ ] (३)
मूलम्
क॒र्को॒ट॒को नाम॑ स॒र्पो यो दृष्टी॑विष उ॒च्यते॑ ।
तस्य॑ स॒र्पस्य॑ स॒र्प॒त्वं तस्मै॑ सर्प॒ नमो॑ ऽस्तु ते ॥ ८ ॥ [ २३ ] (३)
Chaubey En
The serpent, named Karkoṭaka, who is poisonous by the mere look; the serpenthod is indeed of that serpent; to thee, O serpent, be my salutation.
Chaubey हि
कर्कोटक नाम का सर्प जिसको देखने मात्र से ही विष-व्याप्त करने वाला कहा जाता है, उसी सर्प का सर्पत्व है; हे सर्प, उस तुमको मेरा नमस्कार है ।
07.97
विश्वास-प्रस्तुतिः
य᳓स्य व्रतं᳓ पश᳓वो य᳓न्ति स᳓र्वे य᳓स्य व्रत᳓मुपति᳓ष्ठन्त आ᳓पः ।
य᳓स्य व्रते᳓ पुष्टिपति᳓र्नि᳓विष्टस्तं᳓ स᳓रस्वन्तम᳓वसे हुवेम ॥ ७ ॥ [ २० ]
मूलम्
यस्य॑ व्र॒तं प॒शवो॒ यन्ति॒ सर्वे॒ यस्य॑ व्र॒तमु॑प॒तिष्ठ॑न्त॒ आपः॑ ।
यस्य॑ व्र॒ते पु॑ष्टि॒प॒तिर्निवि॑ष्ट॒स्तं सर॑स्वन्त॒मव॑से हुवेम ॥ ७ ॥ [ २० ]
Chaubey En
Whose command follow all the animals; whose command obey the waters; by whose command the lord of prosperity is seated; that Sarasvān, the lord of waters, we invoke here for our protection.
Chaubey हि
जिसके नियम का सभी पशु अनुपालन करते हैं; जिसके नियम का पालन सभी प्रकार के जल करते हैं; जिसके नियम में सभी पोषण तत्त्वों के अधिपति समाविष्ट हैं, उस सरस्वान् को हम अपनी रक्षा के लिये पुकारते हैं ।
07.104
विश्वास-प्रस्तुतिः
उपप्र᳓वद मण्डूकि वर्ष᳓मा᳓ वद तादुरि ।
म᳓ध्ये ह्रद᳓स्य प्लवस्व विगृ᳓ह्य चतु᳓रः पदः᳓ ॥ ११ ॥ [ ४ ]
मूलम्
उ॒प॒प्रव॑द मण्डूकि व॒र्षमा व॑द तादुरि ।
मध्ये॑ ह्र॒दस्य॑ प्लवस्व वि॒गृह्य॑ च॒तुरः॑ प॒दः ॥ ११ ॥ [ ४ ]
Chaubey En
O female frog, speak out; O Tādurî, the female swimmer, predict the rains; swim in the midst of the pond having spread out your four legs.
Chaubey हि
हे मेंढकी बोलो; हे जल में तैरने वाली मेंढकी, वर्षा के लिये भविष्यवाणी करो । अपने चारों पैरों को फैलाकर सरोवर के मध्य में तैरो ।
09.68
विश्वास-प्रस्तुतिः
य᳓न्मे ग᳓र्भे व᳓सतः पाप᳓मु᳓ग्रं᳓ य᳓ज्जा᳓यमानस्य च कि᳓ञ्चिदन्य᳓त् ।
जात᳓स्य य᳓च्चा᳓पि च व᳓र्धतो मे त᳓त्पावमानी᳓भिरहं पु᳙नामि ॥ १ ॥
मूलम्
यन्मे॒ गर्भे॒ वस॑तः पा॒पमुग्रं यज्जाय॑मानस्य च॒ किञ्चि॑द॒न्यत् ।
जा॒तस्य॒ यच्चापि॑ च॒ वर्ध॑तो मे॒ तत्पा॑वमा॒नीभि॑रहं॒ पु॑नामि ॥ १ ॥
Chaubey En
Whatever ferocious sins have been committed by me while residing in the womb, and whichever others while taking birth; whatever after taking birth and (what) in the process of my growth, those (sins) I purify by (reciting) these pāvamānī ṛks.
Chaubey हि
गर्भ में रहते हुये जो कुछ भयंकर पाप (हमने किया है); जो कुछ अन्य पाप उत्पन्न होते समय; जो कुछ उत्पन्न होने के बाद तथा जो कुछ पाप आयु के बढ़ने के साथ हमने किया है, उन सबको पावमानी ऋचाओं के द्वारा पवित्र करता हूँ ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
माता᳓पित्रो᳓र्य᳓न्न᳓ कृतं᳓ व᳓चो मे य᳓त्स्थावरं᳓ जङ्ग᳓ममाबभू᳓व ।
वि᳓श्वस्य य᳓त्प्रहृषितं᳓ व᳓चो मे त᳓त्पावमानी᳓भिरहं᳓ पुनामि ॥ २ ॥
मूलम्
मा॒तापि॒त्रोर्यन्न कृ॒तं वचो॑ मे॒ यत्स्था॑व॒रं ज॒ङ्गम॑माब॒भूव॑ ।
विश्व॑स्य॒ यत्प्र॑हृषि॒तं वचो॑ मे॒ तत्पा॑वमा॒नीभि॑र॒हं पु॑नामि ॥ २ ॥
Chaubey En
Whatever (sins) have been committed by me by disobeying the words of my parents, whatever to the non-moving and moving-ones; whatever to all my well-wishers; those (sins), I purify by reciting the pāvamānī ṛks.
Chaubey हि
जो माता-पिता के वचनों का पालन न करने से, जो स्थावर तथा जंगम प्राणियों को कष्ट देकर तथा जो अपने शुभचिन्तकों से अनुचित वचन बोलकर हमने (पाप) किया है, उन सभी (पापों से) अपने को मैं पावमानी ऋचाओं के द्वारा पवित्र करता हूँ ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
क्रयविक्रया᳓द्योनिदोषा᳓द् भक्ष्या᳓द्भो᳓ज्यात्प्रतिग्रहा᳓त् ।
अ᳓संभोजनाच्चा᳓पि नृशंसं त᳓त्पावमानी᳓भिरहं᳓ पुनामि ॥ ३ ॥
मूलम्
क्र॒य॒वि॒क्र॒याद्यो॑निदो॒षाद् भ॒क्ष्याद्भोज्या॑त्प्रतिग्र॒हात् ।
असं॑भोजना॒च्चापि॑ नृशंसं॒ तत्पा॑वमा॒नीभि॑र॒हं पु॑नामि ॥ ३ ॥
Chaubey En
Whatever cruel sins, I have accrued through purchase and sale, sexual defilement, drinking and eating, accepting donation, and eating with whom one ought not to eat, those I purify with the pāvamānī ṛks.
Chaubey हि
वस्तुओं के क्रय-विक्रय से, व्यभिचार कर्म के दोष से, खान-पान से, अन्यों को भोजन कराने में, किसी से दानादि लेने से, जिनके साथ नहीं खाना चाहिये उनके साथ खाने से, जो कोई पाप मैंने किया है, पावमानी ऋचाओं के द्वारा अपने को पवित्र करता हूँ ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गोघ्ना᳓त्त᳓स्करत्वात्स्त्रीवधा᳓द्य᳓च्च कि᳓ल्बिषम् ।
पापकं᳓ च च᳓रणेभ्यस्त᳓त्पावमानी᳓भिरहं᳓ पुनामि ॥ ४ ॥
मूलम्
गो॒घ्नात्तस्क॑रत्वात्स्त्री॒व॒धाद्यच्च॒ किल्बि॑षम् ।
पा॒प॒कं च॒ चर॑णेभ्य॒स्तत्पा॑वमा॒नीभि॑र॒हं पु॑नामि ॥ ४ ॥
Chaubey En
(Whatever) sins (I have committed) through killing of a cow, thieving, slaying of a woman and observance of sinful acts, those I purify with the pāvamānī ṛks.
Chaubey हि
गो-वध से, चोरी से, स्त्री-वध से तथा पापपूर्ण कर्म के आचरण करने से, जो कुछ घोर पाप मैंने किया है, पावमानी ऋचाओं के द्वारा उन पापों से अपने को पवित्र करता हूँ ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
ब्र᳓ह्मवधात्सुरापा᳓नात्सुवर्ण᳓स्तेयाद्वृषलीमिथुनसंगमा᳓त् ।
गुरो᳓र्दाराभिगमना᳓च्च त᳓त्पावमानी᳓भिरहं᳓ पुनामि ॥ ५ ॥ [ १९ ]
मूलम्
ब्रह्म॑वधात्सुरा॒पाना॑त्सुव॒र्णस्ते॑याद्वृषलीमिथुनसंग॒मात् ।
गु॒रोर्दा॑राभिगम॒नाच्च॒ तत्पा॑वमा॒नीभि॑र॒हं पु॑नामि ॥ ५ ॥ [ १९ ]
Chaubey En
Whatever (sins I have committed) through killing of a brāhmaṇa, drinking of wine, stealing of gold, having copulation with a woman during her menstruation (or a woman of a low caste), doing sexual intercourse with the wife of the teacher, those I purify with the pāvamānī ṛks.
Chaubey हि
ब्रह्म-हत्या से, सुरापान करने से, स्वर्ण की चोरी करने से, ऋतुकाल में स्त्री-भोग करने से, गुरु की पत्नी के साथ समागम से जो पाप मैंने किया है, पावमानी ऋचाओं के द्वारा उस पाप से अपने को पवित्र करता हूँ ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
बालघ्ना᳓न्मातृपितृवधा᳓द् भू᳓मितस्करात्सर्ववर्णगमनमिथुनसंगमा᳓त् ।
पापे᳓भ्यश्च प्रति᳓ग्र᳓हात्सद्यः᳓ प्र᳓ हरन्ति स᳓र्वदुष्कृतं त᳓त्पावमानी᳓भिरहं᳓ पुनामि ॥ ६ ॥
मूलम्
बा॒ल॒घ्नान्मा॑तृपितृव॒धाद् भूमि॑तस्करात्सर्ववर्णगमनमिथुनसंग॒मात् ।
पा॒पेभ्य॑श्च प्र॒तिग्रहा॑त्स॒द्यः प्र ह॑रन्ति॒ सर्व॑दुष्कृतं॒ तत्पा॑वमा॒नीभि॑र॒हं पु॑नामि ॥ ६ ॥
Chaubey En
(The sins which I have committed) by killing a child, killing of mother and father, stealing of land, having copulation with women of all castes and from all sins, and that from taking donations, those I purify with the pāvamānī ṛks, which immediately throws out all the wrong deeds.
Chaubey हि
बाल-वध से, माता-पिता के वध से, भूमि की चोरी करने से, सभी वर्ण की स्त्रियों के साथ मैथुन करने से तथा किसी का दान लेने से जो पाप होता है, उन सभी पापों तथा अन्य दुष्कर्मों को जो दूर करती है, उन पावमानी ऋचाओं के द्वारा मैं अपने को पवित्र करता हूँ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
अमन्त्र᳓म᳓न्नं य᳓त्कि᳓ञ्चिद्धूय᳓ते᳓ च᳓ हुता᳓शने ।
संवत्सर᳓कृतं पापं᳓ त᳓त्पावमानी᳓भिरहं᳓ पुनामि ॥ ७ ॥
मूलम्
अ॒म॒न्त्रमन्नं॒ यत्किञ्चि॑द्धू॒यते च हु॒ताश॑ने ।
सं॒व॒त्स॒रकृ॑तं पा॒पं तत्पा॑वमा॒नीभि॑र॒हं पु॑नामि ॥ ७ ॥
Chaubey En
Whatever oblation offered in the sacrificial fire without an accompanying mantra, and whatever sins done in the year, those I purify with the pāvamānī ṛks.
Chaubey हि
बिना मन्त्र का उच्चारण किये अग्नि में अन्न की आहुति देने से उत्पन्न तथा संवत्सर पर्यन्त किये पाप को (जो दूर करती है), उन पावमानी ऋचाओं के द्वारा अपने को पवित्र करता हूँ ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
दु᳓र्यष्टं दु᳓रधीतं पापं᳓ य᳓च्चाज्ञान᳓तो कृत᳓म् ।
अ᳓याजिताश्चासंयाज्यास्त᳓त्पावमानी᳓भिरहं᳓ पुनामि ॥ ८ ॥
मूलम्
दुर्य॑ष्टं॒ दुर॑धीतं पा॒पं यच्चा॑ज्ञा॒नतो॑ कृ॒तम् ।
अया॑जिताश्चासंया॒ज्या॒स्तत्पा॑वमा॒नीभि॑र॒हं पु॑नामि ॥ ८ ॥
Chaubey En
Whatever (oblation) wrongly offered, whatever wrongly studied and whatever sins done unknowingly; (whatever) not offered and (offered) without saṃyājyā mantras, those I purify with the pāvamānī ṛks.
Chaubey हि
गलत ढंग से अग्नि में आहुति डालने, गलत ढंग से मन्त्र का अध्ययन करने, अज्ञान से कर्म करने, आहुति न डालने तथा संयाज्या ऋचाओं के बिना आहुति डालने से उत्पन्न जो पाप हैं, उनसे पावमानी ऋचाओं के द्वारा अपने को मैं पवित्र करता हूँ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
ऋत᳓स्य यो᳓नयो ऽमृ᳓तस्य धा᳓म स᳓र्वा देवे᳓भ्यः पु᳓ण्यगन्धाः ।
ता᳓ न आ᳓पः प्र᳓ वहन्तु पापं᳓ शुद्धो᳓ गच्छामि सुकृ᳓तामु लोकं᳓
त᳓त्पावमानी᳓भिरहं᳓ पुनामि ॥ ९ ॥
मूलम्
ऋ॒तस्य॒ योन॑यो॒ ऽमृत॑स्य॒ धाम॒ सर्वा॑ दे॒वेभ्यः॒ पुण्य॑गन्धाः ।
ता न॒ आपः॒ प्र व॑हन्तु पा॒पं शु॒द्धो ग॑च्छामि सु॒कृता॑मु लो॒कं
तत्पा॑वमा॒नीभि॑र॒हं पु॑नामि ॥ ९ ॥
Chaubey En
The very roots of ṛta (the Eternal Cosmic Law), the abode of amṛta (immortality) and all the sweet-scented (waters) for the gods, may these waters wash out our sins. Having become purified, I go to the region of the pious ones; I purify myself with the pāvamānī ṛks.
Chaubey हि
जो ऋत की मूलाधार हैं, अमृत का स्थान हैं, पुण्य सुगन्ध वाली हैं तथा सभी देवताओं के लिये हैं, वे जल देवियाँ हमारे पाप को दूर करें । मैं पवित्र होकर पुण्यात्माओं के लोक को जाता हूँ । उन पावमानी ऋचाओं के द्वारा मैं अपने को पवित्र करता हूँ ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
इ᳓न्द्रः सुदीती᳓ सह᳓ मा पुनातु सो᳓मः स्वस्त्या᳓ व᳓रुणः सुनीत्या᳓ ।
यमो᳓ रा᳓जा प्रमृणा᳓भिः पुनातु मा जात᳓वेदा मोर्ज᳓यन्त्या पुनातु ॥ १० ॥ [ २० ]
मूलम्
इन्द्रः॑ सुदी॒ती स॒ह मा॑ पुनातु॒ सोमः॑ स्व॒स्त्या वरु॑णः सुनी॒त्या ।
य॒मो राजा॑ प्रमृ॒णाभिः॑ पुनातु मा जा॒तवे॑दा मो॒र्जय॑न्त्या पुनातु ॥ १० ॥ [ २० ]
Chaubey En
May Indra purify me with his auspicious brilliance; Soma with welfare, (and) Varuṇa with good guidance. May the king Yama purify me with destruction (of enemies); may Agni, the knower of all, purify me with his sharpened energy.
Chaubey हि
इन्द्र अपने सुन्दर तेज से, सोम अपने कल्याण से तथा वरुण अपने सुन्दर नेतृत्व से एक साथ मुझे पवित्र करें । राजा यम शत्रुओं के विनाश द्वारा मुझे पवित्र करे; सभी उत्पन्न पदार्थों को जानने वाला अग्नि अपनी ऊर्जा से मुझे पवित्र करे ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पावमानीः᳓ स्वस्त्य᳓यनीः सुदु᳓घा हि᳓ घृतश्च्यु᳓तः ।
ऋ᳓षिभिः सं᳓भृतो र᳓सो ब्राह्मणे᳓ष्वमृ᳓तं हित᳓म् ॥ ११ ॥
मूलम्
पा॒व॒मा॒नीः स्व॒स्त्यय॑नीः सु॒दुघा॒ हि घृ॑त॒श्च्युतः॑ ।
ऋषि॑भिः॒ संभृ॑तो॒ रसो॑ ब्राह्म॒णेष्व॒मृतं॑ हि॒तम् ॥ ११ ॥
Chaubey En
The pāvamānī ṛks, leading to welfare par excellence, yielding abundance, and distilling clarified butter, the essence of universal pleasure, gathered by the seers, has been placed as ambrosia in the brāhmaṇas.
Chaubey हि
कल्याण की ओर ले जाने वाली, सुन्दर दोहन वाली तथा शाश्वत आनन्द-रूप घृत बरसाने वाली जो पावमानी ऋचाएँ हैं, वे ऋषियों के द्वारा रस के रूप में एकत्रित की गई हैं तथा ब्राह्मणों के अन्दर अमृत रूप में प्रतिष्ठित हैं ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पावमानी᳓र्दिशन्तु न इम᳓ल्लोँक᳓म᳓थो अमु᳓म् ।
का᳓मान्त्स᳓मर्धयन्तु नो देवै᳓र्देवीः᳓ समा᳓हिताः ॥ १२ ॥
मूलम्
पा॒व॒मा॒नीर्दि॑शन्तु न इ॒मल्लोँ॒कमथो॑ अ॒मुम् ।
कामा॒न्त्सम॑र्धयन्तु नो दे॒वैर्दे॒वीः स॒माहि॑ताः ॥ १२ ॥
Chaubey En
Let pāvamānī ṛks direct us to this world and thereafter to that heavenly world. Let the goddesses, accompanied by the gods, fulfil our desires.
Chaubey हि
(ये) पावमानी ऋचायें हमें इस लोक तथा उस परम लोक की ओर निर्देशित करें । देवताओं के साथ एकमत होती हुई ये देवियाँ हमारी सम्पूर्ण कामनाओं को सम्यक् प्रकार से परिपूर्ण करें ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
ये᳓न देवाः᳓ पवि᳓त्रेणात्मा᳓नं पुन᳓ते स᳓दा । ते᳓न सह᳓स्रधारेण प᳓वमानः पुनातु मा ॥ १३ ॥
मूलम्
येन॑ दे॒वाः प॒वित्रे॑णा॒त्मानं॑ पु॒नते॒ सदा॑ । तेन॑ स॒हस्र॑धारेण॒ पव॑मानः पुनातु मा ॥ १३ ॥
Chaubey En
With which purifying grass, the pavitra, the gods always purify themselves, with the same thousand-edged (pavitra) may the Pavamāna (Soma) purify me.
Chaubey हि
जिस पवित्र के द्वारा देवगण सदा अपने को पवित्र करते हैं, उस सहस्रों धार वाले पवित्र से पवमान सोम मुझे पवित्र करे।
विश्वास-प्रस्तुतिः
प्राजापत्यं᳓ पवि᳓त्रं शतो᳓द्यामं हिरण्म᳓यम् ।
ते᳓न ब्रह्मवि᳓दो वयं᳓ पूतं᳓ ब्र᳓ह्म पुनातु मा ॥ १४ ॥
मूलम्
प्रा॒जा॒प॒त्यं प॒वित्रं॑ श॒तोद्या॑मं हिर॒ण्मय॑म् ।
तेन॑ ब्रह्म॒विदो॑ व॒यं पू॒तं ब्रह्म॑ पुनातु मा ॥ १४ ॥
Chaubey En
The pavitra (the purifying grass), belonging to Prajāpati, raised hundredfold, golden-coloured, by that we are brahmavids, the knowers of Brahman (prayer). Let the purified Brahman purify me.
Chaubey हि
प्रजापति से उत्पन्न, सहस्र शाखाओं वाला जो स्वर्णमय पवित्र है, उससे हम लोग ब्रह्मवेत्ता हुये हैं । पवित्र हुआ मन्त्र मुझे पवित्र करे।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पावमानीः᳓ स्वस्त्य᳓यनीर्या᳓भिर्ग᳓च्छति नान्दन᳓म् ।
पुण्याँ᳙श्च भक्षा᳓न् भक्षयत्यमृतत्वं᳓ च गच्छति ॥ १५ ॥
मूलम्
पा॒व॒मा॒नीः स्व॒स्त्यय॑नी॒र्याभि॒र्गच्छ॑ति नान्द॒नम् ।
पु॒ण्याँ॑श्च भ॒क्षान् भ॑क्षयत्यमृत॒त्वं च॑ गच्छति ॥ १५ ॥
Chaubey En
The pāvamānī ṛks, leading to welfare par excellence, and with which one goes to paradise, (verily with those) the meritorious man enjoys there the fruits of his meritorious deeds and attains immortality.
Chaubey हि
कल्याण की ओर ले जाने वाली ये पावमानी ऋचायें, जिनके द्वारा व्यक्ति आनन्द-रूप स्वर्गलोक को प्राप्त होता है, (उन्हीं के द्वारा वह) सम्पूर्ण पुण्यों के फलों को भोगता है, तथा (अन्त में) अमृतत्व को प्राप्त होता है।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पावमानं᳓ पितॄ᳓न्देवा᳓न् ध्या᳓येद्य᳓श्च स᳓रस्वतीम् ।
पितॄँ᳓स्त᳓स्यो᳓प तिष्ठेत क्षीरं᳓ सर्पि᳓र्म᳓धूदक᳓म् ॥ १६ ॥ [ २१ ]
मूलम्
पा॒व॒मा॒नं पि॒तॄन्दे॒वान् ध्याये॒द्यश्च॒ सर॑स्वतीम् ।
पि॒तॄँस्तस्योप॑ तिष्ठेत क्षी॒रं स॒र्पिर्मधू॑द॒कम् ॥ १६ ॥ [ २१ ]
Chaubey En
One who meditates upon pāvamāna (sūkta), forefathers, gods and Sarasvatī, the milk, clarified butter, honey, and waters (offered by him to them) reside with the forefathers.
Chaubey हि
जो व्यक्ति पवमान (सूक्त), पितरों, देवताओं तथा सरस्वती का ध्यान करता है, उसके द्वारा प्रदत्त दूध, घृत, मधु तथा जल पितरों को प्राप्त होता है ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
ऋ᳓षयस्तु᳓ त᳓पस्तेपुः स᳓र्वे स्वर्गजिगीष᳓वः ।
त᳓पसस्तपसो ऽग्र्यं तु᳓ पावमानी᳓रृचो᳓ जपेत् ॥ १७ ॥
मूलम्
ऋष॑य॒स्तु तप॑स्तेपुः॒ सर्वे॑ स्वर्गजिगी॒षवः॑ ।
तप॑सस्तप॒सो॒ ऽग्र्यं॒ तु पा॑वमा॒नीर्ऋ॒चो ज॑पेत् ॥ १७ ॥
Chaubey En
All the seers, desirous of going to heaven, performed penance. But because of being the supreme among all penances, one should chant verily the pāvamānī ṛks.
Chaubey हि
स्वर्ग जाने की इच्छा वाले सभी ऋषियों ने तपस्या की, किन्तु प्रत्येक प्रकार की तपस्या से श्रेष्ठ पावमानी ऋचाओं का जप करना चाहिये ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पावमानं᳓ प᳓रं ब्र᳓ह्म ये᳓ प᳓ठन्ति मनीषि᳓णः ।
सप्त᳓ ज᳓न्म भवेद् वि᳓प्रो धनाढ्यो᳓ वेदपारगः᳓ ॥ १८ ॥
मूलम्
पा॒व॒मा॒नं परं॒ ब्रह्म॒ ये पठ॑न्ति मनी॒षिणः॑ ।
स॒प्त जन्म॑ भवे॒द् विप्रो॑ धना॒ढ्यो वे॑दपार॒गः ॥ १८ ॥
Chaubey En
The wise ones, who read the Pāvamāna (Sūkta/Maṇḍala), the great Brahman, become enlightened (vipra), up to their seven births, prosperous and having gone through the study of the Veda up to the end.
Chaubey हि
(इस) पवमान (सूक्त/मण्डल) रूप परम ब्रह्म का जो मनीषी सदा पाठ करते हैं, वे सात जन्म तक विप्र, धनी तथा वेद का अन्त तक पारायण करने वाले होते हैं ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
द᳓शो᳓त्तराण्यृचां᳓ चैत᳓त्पावमानीः᳓ शता᳓नि ष᳓ट् ।
एत᳓ज्जु᳓ह्वञ्ज᳓पश्चैव᳓ घोरं᳓ मृत्युभयं᳓ जयेत् ॥ १९ ॥
मूलम्
दशोत्त॑राण्यृ॒चां चै॒तत्पा॑वमा॒नीः श॒तानि॒ षट् ।
ए॒तज्जुह्व॒ञ्जप॑श्चै॒व घो॒रं मृ॑त्युभ॒यं ज॑येत् ॥ १९ ॥
Chaubey En
A person, offering oblations, and reciting the pāvamānī ṛks six hundred and ten in number conquers the fear of death.
Chaubey हि
दश अधिक छः सौ (६१०) इन पावमानी ऋचाओं से आहुतियां प्रदान करता हुआ, तथा जप करता हुआ व्यक्ति घोर मृत्यु के भय को जीत जाता है ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पावमानं᳓ प᳓रं ब्र᳓ह्म शुक्रं᳓ ज्यो᳓तिः सनात᳓नम् ।
ऋ᳓षीँ᳓स्त᳓स्यो᳓प तिष्ठेत क्षीरं᳓ सर्पि᳓र्म᳓धूदक᳓म् ॥ २० ॥ [ २२ ] [५]
मूलम्
पा॒व॒मा॒नं परं॒ ब्रह्म॑ शु॒क्रं ज्योतिः॑ स॒ना॒तन॑म् ।
ऋषीँस्तस्योप॑ तिष्ठेत क्षी॒रं स॒र्पिर्मधू॑द॒कम् ॥ २० ॥ [ २२ ] [५]
Chaubey En
(One who meditates upon) the pāvamāna (sūkta), the great prayer, the lustrous, shining and the eternal, the milk, clarified butter, honey and water (offered by him), reach the seers.
Chaubey हि
यह पवमान (मण्डल) परं ब्रह्म है, तथा प्रकाशमान सनातन ज्योति है । (जो इसका पारायण करता है) । उसका दूध, घृत, मधु तथा जल ऋषियों के पास पहुँचता है ।
09.115
विश्वास-प्रस्तुतिः
य᳓त्र त᳓त्परमं᳓ पदं᳓ वि᳓ष्णोर्लोके᳓ महीय᳓ते ।
देवैः᳓ सु᳓कृतकर्मभिस्त᳓त्र मा᳓ममृ᳓तं कृधी᳓न्द्रायेन्दो प᳓रि स्रव ॥ १ ॥
मूलम्
यत्र॒ तत्प॑र॒मं प॒दं विष्णो॑र्लो॒के म॑ही॒यते॑ ।
दे॒वैः सुकृ॑तकर्मभि॒स्तत्र॒ माम॒मृतं॑ कृ॒धीन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव ॥ १ ॥
Chaubey En
Where that Supreme abode of Viṣṇu is exalted in the space by the Gods and by the doers of meritorious deeds, they make me immortal; O Soma! flow forth for Indra.
Chaubey हि
जहाँ वह विष्णु का परम पद सर्वोच्च लोक में देवताओं तथा शुभ-कर्म करने वाले मनुष्यों के द्वारा प्रशंसित है, वहाँ हे सोम, मुझे अमृतत्व को प्राप्त कराओ तथा इन्द्र के लिये चारों तरफ से निरन्तर प्रवाहित होवो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
य᳓त्र त᳓त्परमाव्यं᳙ भूता᳓नाम᳓धिपतिः ।
भावभावी᳓ च यो᳓गीश्च त᳓त्र मा᳓ममृ᳓तं कृधी᳓न्द्रायेन्दो प᳓रि स्रव ॥ २ ॥
मूलम्
यत्र॒ तत्प॑रमा॒व्यं॑ भू॒ताना॒मधि॑पतिः ।
भा॒व॒भा॒वी च॒ योगी॑श्च॒ तत्र॒ माम॒मृतं॑ कृ॒धीन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव ॥ २ ॥
Chaubey En
Where there is that Supreme refuge, (where) the Lord of all beings, the appreciator of feelings or sentiments (resides) and (to where) the contemplative saints (go), they make me immortal; O Soma! flow forth for Indra.
Chaubey हि
जहाँ पर सर्वश्रेष्ठ (आत्माओं का) आश्रय है; (जहाँ) सभी प्राणियों के स्वामी हैं; (जहाँ) भावनाओं से प्रभावित होने वाले तथा योगी हैं; वहाँ हे सोम मुझे अमृतत्व को प्राप्त कराओ तथा इन्द्र के लिये चारों तरफ से सदा प्रवाहित होवो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
य᳓त्र देवा᳓ महा᳓त्मानः से᳓न्द्राश्च समरु᳓द्गणाः ।
ब्रह्मा᳓ च य᳓त्र वि᳓ष्णुश्च त᳓त्र मा᳓ममृ᳓तं कृधी᳓न्द्रायेन्दो प᳓रि स्रव ॥ ३ ॥
मूलम्
यत्र॑ दे॒वा म॒हात्मा॑नः॒ सेन्द्रा॑श्च सम॒रुद्ग॑णाः ।
ब्र॒ह्मा च॒ यत्र॒ विष्णु॑श्च॒ तत्र॒ माम॒मृतं॑ कृ॒धीन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव ॥ ३ ॥
Chaubey En
Where do reside the gods, the great souls along with Indra and the band of Maruts, where (do reside) Brahmā and Viṣṇu, there make me immortal; O Soma! flow forth for Indra.
Chaubey हि
जहाँ पर इन्द्र-सहित तथा मरुद्गण-सहित सभी देव तथा महात्मा लोग हैं; जहाँ ब्रह्मा तथा विष्णु हैं; वहाँ हे सोम, मुझे अमृतत्व प्रदान करो तथा इन्द्र के लिये चारों तरफ से निरन्तर प्रवाहित होवो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
य᳓त्र लो᳓क्यास्तनूत्य᳓जा: श्रद्ध᳓या त᳓पसा जिताः᳓ ।
ते᳓जश्च य᳓त्र ब्र᳓ह्म च त᳓त्र मा᳓ममृ᳓तं कृधी᳓न्द्रायेन्दो प᳓रि स्रव ॥ ४ ॥
मूलम्
यत्र॒ लोक्या॑स्तनू॒त्यजा॑: श्र॒द्धया॒ तप॑सा जि॒ताः ।
तेज॑श्च॒ यत्र॒ ब्रह्म॑ च॒ तत्र॒ माम॒मृतं॑ कृ॒धीन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव ॥ ४ ॥
Chaubey En
Where meritorious persons, risking their lives attain that abode by observing reverence and penance; where there is brilliance and the Brahman (prayer); there make me immortal; O Soma! flow forth for Indra.
Chaubey हि
जहाँ शरीर का परित्याग करने वाले लोगों ने श्रद्धा और तप से उस स्थान को प्राप्त किया है; जहाँ तेज और ब्रह्म है; वहाँ हे सोम, मुझे अमृतत्व प्रदान करो तथा इन्द्र के लिये चारों तरफ से निरन्तर प्रवाहित होवो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
य᳓त्र ग᳓ङ्गा च यमु᳓ना य᳓त्र प्रा᳓ची स᳓रस्वती ।
य᳓त्र सोमे᳓श्वरो देव᳓स्त᳓त्र मा᳓ममृ᳓तं कृधी᳓न्द्रायेन्दो प᳓रि स्रव ॥ ५ ॥ [ २८ ] (५)
मूलम्
यत्र॒ गङ्गा॑ च य॒मुना॒ यत्र॒ प्राची॒ सर॑स्वती ।
यत्र॑ सो॒मेश्व॑रो दे॒वस्तत्र॒ माम॒मृतं॑ कृ॒धीन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव ॥ ५ ॥ [ २८ ] (५)
Chaubey En
Where there are Gaṅgā and Yamunā rivers; where the Sarasvatī flows towards the east; where there is Lord Someśvara; there make me immortal; O Soma, flow forth for Indra.
Chaubey हि
जहाँ गंगा और यमुना (प्रवाहित होती हैं); जहाँ पूर्व की ओर सरस्वती (प्रवाहित हो रही) है; जहाँ सोमेश्वर देव हैं; वहाँ हे सोम, मुझे अमृतत्व प्रदान करो तथा इन्द्र के लिये चारों तरफ से निरन्तर प्रवाहित होवो ।
10.9
विश्वास-प्रस्तुतिः
सस्रु᳓षीस्त᳓दपसो दि᳓वा न᳓क्तं च सस्रु᳓षीः ।
व᳓रेण्यक्रतुरह᳓मा᳓ देवी᳓र᳓वसे हुवे ॥ १० ॥ [ ५ ]
मूलम्
स॒स्रुषी॒स्तद॑पसो॒ दिवा॒ नक्तं॑ च स॒स्रुषीः॑ ।
वरे॑ण्यक्रतुर॒हमा दे॒वीरव॑से हुवे ॥ १० ॥ [ ५ ]
Chaubey En
Having excellent intelligence, I invoke for our protection the goddesses (waters) which are ever-flowing, having it as their mission, and ever-flowing in the day and the night.
Chaubey हि
श्रेष्ठ बुद्धि वाला मैं, सदा प्रवाहित होते रहना ही जिनका कर्म है, उन सदा दिन-रात प्रवाहित होने वाली जल-देवियों का अपनी रक्षा के लिये आह्वान करता हूँ ।
10.75
विश्वास-प्रस्तुतिः
सितासिते᳓ सरि᳓ते य᳓त्र संगे᳓ त᳓त्राप्लुता᳓सो दि᳓व᳓मुत्प᳙तन्ति ।
ये᳓ वै᳓ तन्वं᳙ १ वि सृज᳓न्ति धी᳓रास्ते᳓ वै᳓ जना᳓सो अमृतत्वं᳓ भजन्ते ॥ ६ ॥
मूलम्
सि॒ता॒सि॒ते स॒रिते॒ यत्र॑ सं॒गे तत्रा॑प्लु॒तासो॒ दिवमु॒त्प॑तन्ति ।
ये वै त॒न्वं॑ १ वि सृ॒जन्ति॒ धीरा॒स्ते वै ज॒नासो॑ अमृत॒त्वं भ॑जन्ते ॥ ६ ॥
Chaubey En
Where the two rivers white (Gaṅgā) and black (Yamunā) flow forth together, there taking bath, persons go to heaven. The wise ones, who give up their body there, verily those men attain immortality.
Chaubey हि
जहाँ सफेद जल वाली (गंगा) तथा कृष्ण जल वाली (यमुना) एक साथ (संगम रूप में प्रवाहित होती) हैं, वहाँ स्नान करने वाले स्वर्ग प्राप्त करते हैं । जो बुद्धिमान वहाँ (संगम पर) शरीर का त्याग करते हैं, वे ही व्यक्ति अमृतत्व को प्राप्त करते हैं ।
10.85
विश्वास-प्रस्तुतिः
अविधवा᳓ भव वर्षा᳓णि शतं᳓ सा᳓ग्रं तु᳓ सुव्रता᳓ ।
तेजस्वी᳓ च यशस्वी᳓ च ध᳓र्मपत्नी प᳓तिव्रता ॥ ४८ ॥
मूलम्
अ॒वि॒ध॒वा भ॑व व॒र्षाणि॑ श॒तं साग्रं॒ तु सु॑व्र॒ता ।
ते॒ज॒स्वी च॑ यश॒स्वी च॒ धर्म॑पत्नी॒ पति॑व्रता ॥ ४८ ॥
Chaubey En
(O bride!) be not a widow for hundred years; devoted to your husband be ahead in observing common duties, illustrious, glorious, (as a) guardian of dharma.
Chaubey हि
हे वधू! सौ वर्ष तथा उसके आगे भी तुम सौभाग्यवती, सुन्दर व्रत वाली, तेजस्विनी, यशस्विनी, धर्म का पालन करने वाली तथा पतिव्रता होवो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जन᳓यद् बहुपु᳓त्राणि मा᳓ च दुःखं᳓ लभेत् क्व᳙ चित् ।
भर्ता᳓ ते सोमपा᳓ नि᳓त्यं भ᳓वेद्धर्मपरा᳓यणः ॥ ४९ ॥
मूलम्
ज॒नय॑द् ब॒हु॒पुत्रा॑णि॒ मा च॑ दुः॒खं ल॑भे॒त् क्व᳙ चि॑त् ।
भ॒र्ता ते॑ सोम॒पा नित्यं॒ भवे॑द्धर्मप॒राय॑णः ॥ ४९ ॥
Chaubey En
(O bride!) giving birth to many sons, may you never get any problems in life; may your husband always be the protector of Soma, and devoted to his duty.
Chaubey हि
(हे वधू,) तुम अनेक पुत्रों को जन्म देती हुई कभी भी दुःख को प्राप्त न होवो । सोमयज्ञ का सम्पादन करता हुआ तुम्हारा पति नित्य धर्म का आचरण करने वाला होवे ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
अष्ट᳓पुत्रा भव त्वं᳓ च सुभ᳓गा च प᳓तिव्रता ।
भर्तु᳓श्चैव᳓ पितु᳓र्भ्रातु᳓र्हृदयानन्दि᳓नी स᳓दा ॥ ५० ॥
मूलम्
अ॒ष्टपु॑त्रा भव॒ त्वं च॑ सु॒भगा॑ च॒ पति॑व्रता ।
भ॒र्तुश्चै॒व पि॒तुर्भ्रा॒तुर्हृ॑दयान॒न्दिनी॒ सदा॑ ॥ ५० ॥
Chaubey En
(O bride!), you be the mother of eight sons, fortunate, devoted to your husband; and (you) always be comforting to the father and brother of your husband.
Chaubey हि
(हे वधू,) तुम सुन्दर सौभाग्य वाली आठ पुत्रों को जन्म देने वाली तथा पातिव्रत्य धर्म का पालन करने वाली होवो । अपने पति के पिता (श्वसुर) तथा भाई (देवर) के हृदय को सदा आनन्द देने वाली होवो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
इ᳓न्द्रस्य॒ तु᳓ य᳓थेन्द्राणी᳓ श्रीधर᳓स्य य᳓था श्रिया᳓ ।
शङ्कर᳓स्य य᳓था गौरी᳓ तद्भ᳓र्तुर᳓पि भर्त᳓रि ॥ ५१ ॥
मूलम्
इन्द्र॑स्य॒ तु यथे॑न्द्रा॒णी श्री॑ध॒रस्य॒ यथा॑ श्रि॒या ।
श॒ङ्क॒रस्य॒ यथा॑ गौ॒री त॒द्भर्तु॒रपि॑ भ॒र्तरि॑ ॥ ५१ ॥
Chaubey En
As Indrāṇī (was very much dear) to Indra, Śrī and Lakṣmī to Viṣṇu and Gaurī to Śaṅkara, (O bride, you be dear to your husband); even more than they were (to their husbands).
Chaubey हि
जिस प्रकार इन्द्र के लिये इन्द्राणी, विष्णु के लिये श्री तथा लक्ष्मी एवं शंकर के लिये गौरी थीं, उनसे भी अधिक अपने पति के प्रति प्रेम करने वाली होवो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
अ᳓त्रेर्य᳓था᳓नसूया स्या᳓द् व᳓सिष्ठस्या᳓प्यरुन्धती᳓ ।
कौशि᳓कस्य य᳓था स᳓ती त᳓था त्व᳓म᳓पि भर्त᳓रि ॥ ५२ ॥
मूलम्
अत्रे॒र्यथान॑सूया॒ स्याद् वसि॑ष्ठ॒स्याप्य॑रुन्ध॒ती ।
कौ॒शिक॑स्य॒ यथा॒ सती॒ तथा॒ त्वमपि॑ भ॒र्तरि॑ ॥ ५२ ॥
Chaubey En
As Anasūyā was (dear) to Atri, Arundhatī to Vasiṣṭha and Satī to Kauśika (Viśvāmitra); likewise you be (dear) to your husband.
Chaubey हि
जिस प्रकार अत्रि ऋषि की पत्नी अनसूया थी, वसिष्ठ की पत्नी अरुन्धती थी, विश्वामित्र की पत्नी सती थी, वैसे ही तुम अपने पति के लिये होवो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
ध्रुवै᳓धि पो᳓ष्या म᳓यि म᳓ह्यं त्वादाद् बृ᳓हस्प᳓तिः ।
म᳓या प᳓त्या प्रजा᳓वती सं᳓ जीव शर᳓दः शत᳓म् ॥ ५३ ॥ [ २१ ]
मूलम्
ध्रु॒वैधि॒ पोष्या॒ मयि॒ मह्यं॑ त्वादा॒द् बृह॒स्पतिः॑ ।
मया॒ पत्या॑ प्र॒जाव॑ती॒ सं जी॑व श॒रदः॑ श॒तम् ॥ ५३ ॥ [ २१ ]
Chaubey En
(O wife,) be stable, you are always to be nurtured by me. The Bṛhaspati has given you to me; (you be) giver of birth to progeny with me (your) husband. You live long together (with me) for hundred years.
Chaubey हि
(हे वधू,) मेरे द्वारा सदा पोषण के योग्य तुम मेरे प्रति सदा अटल होवो। बृहस्पति ने तुमको मुझे प्रदान किया है । मुझ पति के द्वारा तुम सुन्दर सन्तान वाली होवो तथा सौ वर्ष तक एक साथ जीवो ।
10.95
विश्वास-प्रस्तुतिः
उ᳓दपप्ताम वसते᳓र्व᳓यो यथा रिण᳓न्त्वा भृ᳓गवो᳓ म᳓न्यमानाः ।
पु᳓रूरवः पु᳓नर᳓स्तं प᳓रेह्या᳓ मे म᳓नो देवजना᳓ अ᳓यांसुः ॥ १९ ॥ [ ४ ]
मूलम्
उद॑पप्ताम वस॒तेर्वयो॑ यथा रि॒णन्त्वा॒ भृग॑वो मन्य॑मानाः ।
पुरू॑रवः॒ पुन॒रस्तं॒ परे॒ह्या मे॒ मनो॑ देवज॒ना अयां॑सुः ॥ १९ ॥ [ ४ ]
Chaubey En
I have flown away as a bird from its nest; (lest) the Bhṛgus kill you thinking themselves superior; O Purūravas, go back to your house; the gods have overpowered my mind.
Chaubey हि
मैं दूर उड़ चुकी हूँ, जैसे पक्षी अपने घोंसले से; भृगु लोक अपने को बड़ा मानते हुए तुमको कहीं हिंसित न कर दें, (इसलिये) हे पुरूरवा, तुम पुनः अपने घर लौट जाओ; देवजनों ने मेरे मन को अभिभूत कर दिया है।
10.97
विश्वास-प्रस्तुतिः
य᳓च्च कृतं᳓ य᳓द᳓कृतं य᳓दे᳓नश्चकृमा᳓ वय᳓म् ।
ओ᳓षधयस्त᳓स्मात्पान्तु दुरिता᳓दे᳓नसस्प᳓रि ॥ २४ ॥ [ ११ ]
मूलम्
यच्च॑ कृ॒तं यदकृ॑तं॒ यदेन॑श्चकृ॒मा व॒यम् ।
ओष॑धय॒स्तस्मा॑त्पान्तु दुरि॒तादेन॑स॒स्परि॑ ॥ २४ ॥ [ ११ ]
Chaubey En
What has been done and what not done; whatever sin we have committed; may the herbs protect from the wrong-doing and take us out from the sin.
Chaubey हि
जो कुछ (मेरे द्वारा) किया गया है अथवा (अभी) नहीं किया गया है, और जिस पाप को हमने किया है, ओषधियाँ उन दुष्कर्मों से मेरी रक्षा करें और उस पाप से पार करें ।
10.103
विश्वास-प्रस्तुतिः
असौ᳓ या᳓ से᳓ना मरुतः प᳓रेषामभ्यै᳓ति न ओ᳓जसा स्प᳓र्धमाना ।
तां᳓ गूहत त᳓मसा᳓पव्रतेन य᳓थामी᳓षामन्यो᳓ अन्यं᳓ न᳓ जा᳓नात् ॥ १४ ॥
मूलम्
अ॒सौ या सेना॑ मरुतः॒ परे॑षाम॒भ्यैति॑ न॒ ओज॑सा॒ स्पर्ध॑माना ।
तां गू॑हत॒ तम॒साप॑व्रतेन॒ यथा॒मीषा॑म॒न्यो अ॒न्यं न जाना॑त् ॥ १४ ॥
Chaubey En
O Maruts, this army of others (enemies), which comes to us fighting with a view to conquering us by power, you hide it with darkness by making it inactive, so that none among them could know each other.
Chaubey हि
हे मरुतो, दूसरे शत्रुओं की जो यह सेना अपनी शक्ति से हमारे साथ स्पर्धा करती हुई हमारी ओर आ रही है, उसको तुम निष्क्रिय बनाते हुए अन्धकार में छिपा दो, ताकि उनमें एक-दूसरे को न जान सके ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
अन्धा᳓ अमि᳓त्रा भवतशीर्षा᳓णो अ᳓हय इव ।
ते᳓षां वो अग्नि᳓दग्धानामि᳓न्द्रो हन्तु व᳓रंवरम् ॥ १५ ॥ [ २३ ]
मूलम्
अ॒न्धा अ॒मित्रा॑ भवतशी॒र्षाणो॒ अह॑य इव ।
तेषां॑ वो अ॒ग्निद॑ग्धाना॒मिन्द्रो॑ हन्तु॒ वरं॑वरम् ॥ १५ ॥ [ २३ ]
Chaubey En
(O enemies), be blind and friendless like hoodless serpents. Let Indra kill the chieftains among you who have been burnt with fire.
Chaubey हि
(हे शत्रुओ) तुम लोग शिररहित सर्प की तरह अन्धे तथा मित्ररहित हो जावो । अग्नि से जले हुये तुम लोगों में से जो-जो बड़ा योद्धा है, उसको इन्द्र मारे ।
10.106
विश्वास-प्रस्तुतिः
हवि᳓र्भिरे᳓के स्व᳙रितः᳓ स᳓चन्ते सुन्व᳓न्त ए᳓के स᳓वनेषु सो᳓मान् ।
श᳓चीर्म᳓दन्त उत᳓ द᳓क्षिणाभिर्ने᳓ज्जिह्मा᳓यन्त्यो न᳓रकं प᳓ताम ॥ १२ ॥ [ २ ]
मूलम्
ह॒विर्भि॒रेके॒ स्व॑रि॒तः सच॑न्ते सु॒न्वन्त॒ एके॒ सव॑नेषु॒ सोमा॑न् ।
शची॒र्मद॑न्त उ॒त दक्षि॑णाभि॒र्नेज्जि॒ह्माय॑न्त्यो॒ नर॑कं॒ पता॑म ॥ १२ ॥ [ २ ]
Chaubey En
Some go to heaven from here by offering oblations (to the gods); some others press Soma in the (morning, midday and evening) with a desire to go to heaven; some others praising (the gods) with mantras (ṛks, yajus and sāmans) and giving sacrificial fee (to the ṛtviks) go to heaven; lest we by committing sin go down to hell.
Chaubey हि
कुछ लोग (देवताओं को) हवि: प्रदान कर यहाँ से स्वर्ग को प्राप्त करते हैं; कुछ दूसरे लोग, सोमयागों में (इन्द्र को) सोम प्रदान कर शची को आनन्दित करते हुये (स्वर्ग प्राप्त करते हैं), और दूसरे यज्ञ में दक्षिणादि देकर (स्वर्ग प्राप्त करते हैं)। (इन तीनों कर्मों से वंचित) हम लोग निन्दित कर्म करते हुये कहीं नरक को न प्राप्त होवें ।
10.128
विश्वास-प्रस्तुतिः
आ᳓ रात्रि पा᳓र्थिवं र᳓जः पितु᳓रप्रायि धा᳓मभिः ।
दिवः᳓ स᳓दांसि बृहती᳓ वि᳓ तिष्ठस आ᳓ त्वेषं᳓ वर्तते त᳓मः ॥ १ ॥
मूलम्
आ रा॑त्रि॒ पार्थि॑वं॒ रजः॑ पि॒तुर॑प्रायि॒ धाम॑भिः ।
दि॒वः सदां॑सि बृह॒ती वि ति॑ष्ठस॒ आ त्वे॒षं व॑र्तते॒ तमः॑ ॥ १ ॥
Chaubey En
O Night (rātri), the terrestrial region has been filled with the power and might of the Father (dyaus). You have spread forth high unto the seats of heaven. The darkness, striking with fear, spreads everywhere.
Chaubey हि
हे रात्रि, यह पृथिवीलोक पिता (द्यौ) के बल से चारों तरफ से व्याप्त है । तुम द्युलोक के सभी स्थानों को ऊंचाई तक व्याप्त कर स्थित हो । दीप्तिमान आकाश तक अन्धकार फैला है ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
ये᳓ ते रात्रि नृच᳓क्षसो यु᳓क्तासो नवति᳓र्न᳓व ।
अशीतिः᳓ सन्त्वष्टा᳓ उतो᳓ ते सप्त᳓ सप्ततिः᳓ ॥ २ ॥
मूलम्
ये ते॑ रात्रि नृ॒चक्ष॑सो॒ युक्ता॑सो नव॒तिर्नव॑ ।
अ॒शी॒तिः स॒न्त्व॒ष्टा उ॒तो ते॑ स॒प्त स॑प्त॒तिः ॥ २ ॥
Chaubey En
O Night, your watching men (gods) who are engaged in looking after the mankind are ninety-nine, eighty-eight, and seventy-seven in number.
Chaubey हि
हे रात्रि, मनुष्यों को देखने वाले देव, जो तुम्हारे द्वारा नियुक्त हैं, वे निन्यानब्बे (९९), अट्ठासी (८८) तथा सतहत्तर (७७) संख्या में हैं ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
रा᳓त्रीं प्र᳓ पद्ये जन᳓नीं सर्वभूतनिवे᳓शनीम् ।
भद्रां᳓ भ᳓गवतीं कृष्णां᳓ विश्व᳓स्य जगतो᳓ नि᳓शाम् ॥ ३ ॥
मूलम्
रात्रीं॒ प्र प॑द्ये ज॒ननीं॑ सर्वभूतनि॒वेश॑नीम् ।
भ॒द्रां भग॑वतीं कृ॒ष्णां वि॒श्वस्य॑ जग॒तो निशा॑म् ॥ ३ ॥
Chaubey En
I approach the Night, the mother, bringing rest to all beings, the auspicious one, possessing good fortune, dark and the sleeping place of all moving ones.
Chaubey हि
सभी प्राणियों को आश्रय देने वाली माता, कल्याण करने वाली तथा सम्पूर्ण जगत् को सुलाने वाली कृष्णवर्णा भगवती रात्रि की शरण में आता हूँ ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
संवे᳓शनीं᳓[[??]] संयमनीं᳓ ग्रहनक्षत्रमालि᳓नीम् ।
प्र᳓पन्नो ऽहं᳓ शिवां᳓ रा᳓त्रीं भ᳓द्रे पार᳓मशीमहि ॥ ४ ॥
मूलम्
सं॒वेश॑नीं[[??]] सं॑यम॒नीं ग्र॑हनक्षत्रमा॒लिनी॑म् ।
प्रप॑न्नो॒ ऽहं शि॒वां रात्रीं॒ भद्रे॑ पा॒रम॑शीमहि ॥ ४ ॥
Chaubey En
I have come to the auspicious Night, (who is) causing (all) to rest, controlling all, and putting on the garland of constellations and stars. O auspicious one, may we cross your boundary.
Chaubey हि
सबको निवास देने वाली, सबका सम्यक् प्रकार से एक साथ नियन्त्रण करने वाली, ग्रहों एवं नक्षत्रों की माला धारण करने वाली तथा सबका कल्याण करने वाली रात्रि की शरण में उपस्थित हूँ । हे सबका कल्याण करने वाली (रात्रि), मैं तुमको पार करूँ ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
दुर्गे᳓षु वि᳓षमे घोरे᳓ संग्रामे᳓ रिपुसंकटे᳓ ।
अग्निचोरनिपाते᳓षु सर्वग्रहनिवारणे᳓ ॥ ५ ॥
मूलम्
दु॒र्गेषु॒ विष॑मे घो॒रे सं॑ग्रा॒मे रि॑पुसंक॒टे ।
अ॒ग्नि॒चो॒र॒नि॒पा॒तेषु॑ सर्वग्रहनिवार॒णे ॥ ५ ॥
Chaubey En
In impassable (places), in uneven, terrible battlefield, in the attacks of fire and thieves and in removing the ill effects of all the planets (we approach Durgā).
Chaubey हि
दुर्गमनीय, ऊबड़-खाबड़ स्थानों में, घोर संग्राम में, शत्रु संकट में, अग्नि एवं चोरों से प्राप्त संकट में, तथा सभी ग्रहों के बुरे प्रभावों के निवारण में (हम दुर्गा की शरण में आते हैं) ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
दुर्गे᳓षु वि᳓षमेषु त्वं᳓ संग्रामे᳓षु व᳓नेषु च ।
न᳓मस्कृत्वा᳓ प्र᳓ पद्यन्ते ते᳓षां नो अ᳓भयं कुरु ॥ ६ ॥
मूलम्
दु॒र्गेषु॒ विष॑मेषु॒ त्वं सं॑ग्रा॒मेषु॒ वने॑षु च ।
नम॑स्कृ॒त्वा प्र प॑द्यन्ते॒ तेषां॑ नो॒ अभ॑यं कुरु ॥ ६ ॥
Chaubey En
O Durgā, the persons who approach you offering their salutations to you in impassable, uneven, battlefields and forests, you grant fearlessness to them and to us.
Chaubey हि
दुर्गम स्थानों में, विषम परिस्थितियों में, युद्धों में तथा जंगलों में (जो तुम्हें) नमस्कार करके तुम्हारी शरण में जाते हैं, उनको तथा हमें भयरहित करो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आदित्य᳓वर्णां त᳓पसा ज्व᳓लन्तीं वैरोचनीं᳓ च᳓न्द्रसहस्रदीप्तिम् ।
देवीं᳓ कुमारी᳓मृ᳓षिपूजितां तां᳓ तां᳓ दुर्ग᳓मातां शरणं᳓ प्र᳓ पद्ये ॥ ७ ॥
मूलम्
आ॒दि॒त्यव॑र्णां॒ तप॑सा॒ ज्वल॑न्तीं वैरोच॒नीं चन्द्र॑सहस्रदीप्तिम् ।
दे॒वीं कु॑मा॒रीमृषि॑पूजितां॒ तां तां दु॒र्गमा॑तां शर॒णं प्र प॑द्ये ॥ ७ ॥
Chaubey En
I approach, for protection, the mother Durgā, possessing colour of the sun, shining with penance, belonging to the sun, having the brilliance of thousands of moons, the goddess, the celibate, and worshipped by the seers.
Chaubey हि
आदित्य के समान वर्ण वाली, तप से प्रदीप्त, सूर्य सदृश विविध प्रकाश वाली, हजारों चन्द्रमा की कान्ति वाली, सदा कुमारी रहने वाली तथा ऋषियों द्वारा पूजित, ऐसी देवी दुर्गा माता की शरण में उपस्थित होता हूँ ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
क्षीरे᳓ण स्नापिता᳓ दुर्गा᳓ चन्द᳓नेना᳓नुलेपिता᳓ ।
बैल्वपत्रकृता᳓माला न᳓मो दुर्गे न᳓मो᳓ न᳓मः ॥ ८ ॥
मूलम्
क्षी॒रेण॑ स्नापि॒ता दु॒र्गा च॒न्दने॒नानु॑लेपि॒ता ।
बै॒ल्व॒प॒त्र॒कृ॒तामा॑ला॒ नमो॑ दु॒र्गे॒ नमो नमः॑ ॥ ८ ॥
Chaubey En
Durgā has been bathed with milk, besmeared with sandal, adorned with the garland of bilva-leaves. O Durgā, I bow down to you; I bow down.
Chaubey हि
जो दूध से स्नान कराई गई है, जिसका चन्दन से अनुलेप किया गया है, जिसने बिल्व-पत्रों की माला धारण की है, ऐसी हे दुर्गा, तुम्हें बार-बार नमस्कार है ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सर्वभूतपिशाचे᳓भ्यः सर्वशत्रुसरीसृपैः᳓ ।
देवे᳓भ्यो मा᳓नुषेभ्यश्चोभ᳓ये᳓भ्यो᳓ माभि᳓ रक्षताम् ॥ ९ ॥ [ १५ ]
मूलम्
स॒र्व॒भू॒त॒पि॒शा॒चेभ्यः॑ सर्वशत्रुसरीसृ॒पैः ।
दे॒वेभ्यो॒ मानु॑षेभ्यश्चो॒भयेभ्यो मा॒भि र॑क्षताम् ॥ ९ ॥ [ १५ ]
Chaubey En
O Durgā, protect me from all sides from all the bhūtas and piśācas (evil spirits), all enemies including serpents and both divine and human beings.
Chaubey हि
हे दुर्गा, सभी भूत-पिशाचों से, रेंगकर चलने वाले सर्पादि सभी शत्रुओं से, देव (प्रकोपों) से, मनुष्यकृत बाधाओं से तथा दोनों से उत्पन्न बाधाओं से मेरी रक्षा करो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
ऋग्वेदे᳓ स्तुत᳓या देवी᳓ का᳓श्यपेनोदा᳓हृता ।
जात᳓वेदप्रभा गौरी᳓ जात᳓वेदसे सुनवाम सो᳓मम् ॥ १० ॥
मूलम्
ऋ॒ग्वे॒दे स्तु॒तया॑ दे॒वी काश्य॑पेनो॒दाहृ॑ता ।
जा॒तवे॑दप्रभा गौ॒री जा॒तवे॑दसे सुनवाम॒ सोम॑म् ॥ १० ॥
Chaubey En
Because of being praised in the Ṛgveda, the Goddess Gaurī, having the brilliance of fire, has been referred to by Kāśyapa. May we press the Soma for Jātavedas Agni.
Chaubey हि
ऋग्वेद में जो देवी स्तुति की गई है, जो काश्यप के द्वारा उदाहृत है, वह गौरी अग्नि की प्रभावली है; उस जातवेदस्-रूपा देवी के लिये हम सोम का सवन करें ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सुरासुरै᳓र्द्विजवरैः᳓ पिशाचासुरराक्षसैः᳓ ।
अरातिभय᳓मु᳓त्पन्नमरातीयतो᳓ नि᳓ दहाति वे᳓दः ॥ ११ ॥
मूलम्
सु॒रा॒सु॒रैर्द्वि॑जव॒रैः पि॑शाचासुरराक्ष॒सैः ।
अ॒रा॒ति॒भ॒यमुत्प॑न्नमरातीय॒तो नि द॑हाति॒ वेदः॑ ॥ ११ ॥
Chaubey En
The fear caused by the enemies, by the gods, demons, brāhmaṇas; (and also by) piśācas, asuras and rākṣasas; may (Jātavedas) consume the wealth of those who have enmity against us.
Chaubey हि
सुर, असुर, द्विज, पिशाच, असुर तथा शत्रुओं के द्वारा जो भय उत्पन्न है, उन सभी शत्रुता करने वालों के धन को अग्नि जलावे ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
राजद्वारे᳓ पथे᳓ घोरे᳓ संग्रामे᳓षु᳓ च गौ᳓तमी ।
स᳓र्वं रक्षतु दुरितं᳓ स᳓ नः पर्षद᳓ति दुर्गा᳓णि वि᳓श्वा ॥ १२ ॥
मूलम्
रा॒ज॒द्वा॒रे प॒थे घो॒रे सं॑ग्रा॒मेषु च॒ गौत॑मी ।
सर्वं॑ रक्षतु दुरि॒तं स नः॑ पर्ष॒दति॑ दु॒र्गाणि॒ विश्वा॑ ॥ १२ ॥
Chaubey En
May Gautamī protect us from all evils, whether at the door of the king, (or) on the terrible path, (or) in the battlefields. May he (the Jātavedas Agni) make us cross over all the difficulties.
Chaubey हि
राजा के घर पर, रास्ते में, घोर संग्राम में जो कुछ दुष्कर्म हुआ है; उससे गौतमी मेरी रक्षा करे । वह जातवेदस् (अग्नि) हमें सभी विपत्तियों से पार करे ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मह᳓द्भये समुत्पन्ने᳓ स्मर᳓न्ति च जपन्ति च ।
स᳓र्वं तारय᳓ते दुर्गा᳓ नावे᳓व सि᳓न्धुं दुरिता᳓न्यग्निः᳓ ॥ १३ ॥
मूलम्
म॒हद्भ॑ये समुत्प॒न्ने स्म॒रन्ति॑ च जपन्ति च ।
सर्वं॑ तार॒यते॑ दु॒र्गा ना॒वेव॒ सिन्धुं॑ दुरि॒तान्य॒ग्निः ॥ १३ ॥
Chaubey En
(The persons) who remember and chant the praises of Goddess Durgā at the commencement of any great fear, she makes them cross over all the difficulties. The Jātavedas Agni makes one cross over the evil-doings as someone crosses over a river by a boat.
Chaubey हि
किसी भी महान् भय के उत्पन्न होने पर जो व्यक्ति दुर्गा का स्मरण करते हैं तथा जप करते हैं, दुर्गा उनको सभी प्रकार के भय से पार करती है; अग्नि सभी दुष्कृतों से पार करता है जैसे नाव से नदी ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
य᳓ इमं᳓ स्त᳓वं दुर्गा᳓याः शृण्व᳓न्ति च प᳓ठन्ति च ।
त्रिषु᳓ लोके᳓षु विख्या᳓तं त्रिषु᳓ लोके᳓षु पूजित᳓म् ॥ १४ ॥
मूलम्
य इ॒मं स्तवं॑ दु॒र्गायाः॑ शृ॒ण्वन्ति॑ च॒ पठ॑न्ति च ।
त्रि॒षु लो॒केषु॑ वि॒ख्यातं॑ त्रि॒षु लो॒केषु॑ पूजि॒तम् ॥ १४ ॥
Chaubey En
Whosoever hear and read the praise of Durgā, he becomes well known in the three lokas; and he is also worshipped throughout the three lokas.
Chaubey हि
जो व्यक्ति दुर्गा के इस स्तवन को सुनता है तथा पढ़ता है, वह तीनों लोकों में विख्यात होता है तथा तीनों लोकों में पूजा जाता है ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
अपुत्रो᳓ लभते पुत्रा᳓न् धन᳓हीनो ध᳓नं लभेत् ।
अचक्षु᳓र्लभते च᳓क्षुर्बद्धो᳓ मुच्येत ब᳓न्धनात् ॥ १५ ॥
मूलम्
अ॒पु॒त्रो ल॑भते पु॒त्रान् ध॒नही॑नो॒ धनं॑ लभेत् ।
अ॒च॒क्षुर्ल॑भते॒ चक्षु॑र्ब॒द्धो मु॑च्येत॒ बन्ध॑नात् ॥ १५ ॥
Chaubey En
The son-less (person) gets sons; the wealthless (person) gets wealth; the blind gets eyesight, and the captive gets freedom from bondage.
Chaubey हि
पुत्रहीन व्यक्ति पुत्र प्राप्त करता है; निर्धन धन प्राप्त करता है; दृष्टिहीन दृष्टि प्राप्त करता है; बन्धनयुक्त व्यक्ति बन्धन से मुक्त होता है ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
व्याधितो᳓ मुच्यते रो᳓गादरोगी᳓ श्रि᳓तमाप्नुयात् ।
सर्वं᳓ का᳓मं त्वं᳓ ददासि ना᳓रायणि न᳓मो ऽस्तु ते । का᳓त्यायनि न᳓मो ऽस्तु ते ॥ १६ ॥ [ १६ ]
मूलम्
व्या॒धि॒तो मु॑च्यते॒ रोगा॑दरो॒गी श्रित॑माप्नुयात् ।
स॒र्वं कामं॒ त्वं द॑दासि॒ नारा॑यणि॒ नमो॑ ऽस्तु ते । कात्या॑यनि॒ नमो॑ ऽस्तु ते ॥ १६ ॥ [ १६ ]
Chaubey En
One, afflicted with disease, gets freedom from disease, and the diseaseless person gets prosperity. O Nārāyaṇī, you fulfil all desires. My salutation to you; O Kātyāyanī, my salutation to you.
Chaubey हि
रोगी रोग से मुक्त होता है; नीरोग व्यक्ति धन प्राप्त करता है; हे (दुर्गा) तुम सभी कामनाओं की पूर्ति करती हो; हे नारायणी, तुम्हें नमस्कार है; हे कात्यायनी, तुम्हें नमस्कार है ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
केशी᳓ वै᳓ सर्वभूता᳓नां पञ्चमी᳓ति च ना᳓म च ।
सा᳓ मां᳓ सा᳓मे᳓ति वै᳓ देवी᳓ सर्व᳓तः प᳓रि रक्षति सर्व᳓तः प᳓रि रक्षत्यों᳓ न᳓मः ॥ १७ ॥
मूलम्
के॒शी वै स॑र्वभू॒तानां॑ पञ्च॒मीति॑ च॒ नाम॑ च ।
सा मां सामेति॒ वै दे॒वी स॒र्वतः॒ परि॑ रक्षति स॒र्वतः॒ परि॑ रक्ष॒त्यों नमः॑ ॥ १७ ॥
Chaubey En
Verily Devī is keśī (having rays) for all beings and she bears the name of pañcamī. She is verily sāman being ‘सा मां’ ‘she for me’. As such, the Goddess protects me from sides; Protects from all sides; My salutation to her.
Chaubey हि
(वह देवी) सभी प्राणियों को प्रकाश देने वाली (केशी) तथा पञ्चमी नाम वाली है “वह मुझे" (सा मां) इस रूप में वह देवी “सामन्” रूपा है । (वह) सभी प्रकार से रक्षा करती है; वह सभी प्रकार से रक्षा करती है । उस देवी को नमस्कार है ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
स्तो᳓ष्यामि प्र᳓यतो देवीं᳓ श᳓रण्यां बह्वृच᳓प्रियाम् ।
सह᳓स्रसंमितां दुर्गां᳙ जात᳓वेदसे सुनवाम सो᳓मम् ॥ १८ ॥
मूलम्
स्तोष्या॑मि॒ प्रय॑तो दे॒वीं शर॑ण्यां बह्वृ॒चप्रि॑याम् ।
स॒हस्र॑संमितां दु॒र्गां॑ जा॒तवे॑दसे सुनवाम॒ सोम॑म् ॥ १८ ॥
Chaubey En
Having become purified, I shall praise the Goddess Durgā, who is the shelter for all, beloved to the bahvṛcas (the Ṛgvedins) and equal to thousands. I may press Soma for Jātavedas.
Chaubey हि
पवित्र होकर उस देवी की, जो सबको शरण प्रदान करने वाली है, ऋग्वेदियों को प्रिय है तथा अनेक रूप वाली (सहस्रसंमिता) है, उस दुर्गा की मैं स्तुति करूँगा । जातवेदस् अग्नि के लिये हम सोम का सवन करें ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
शा᳓न्त्यर्थं त᳓द् द्विजातीना᳓मृ᳓षिभिः समुपा᳓श्रिता ।
ऋग्वेदे᳓ त्वं᳓ स᳓मु᳓त्पन्ना᳓रातीय᳓तो नि᳓ दहाति वे᳓दः ॥ १९ ॥
मूलम्
शान्त्य॑र्थं॒ तद् द्वि॑जाती॒नामृषि॑भिः समु॒पाश्रि॑ता ।
ऋ॒ग्वे॒दे त्वं समुत्प॒न्नारा॑ती॒यतो॒ नि द॑हाति॒ वेदः॑ ॥ १९ ॥
Chaubey En
(The Goddess) is worshipped by the seers with a view to bringing welfare for all (the twice-borns dvijas). (O Goddess,) you have got your birth in the Ṛgveda. (May the Goddess) consume the wealth of those who have enmity with us.
Chaubey हि
द्विजों की शान्ति के लिये ऋषियों के द्वारा उस देवी की उपासना की गई थी । (हे देवी), तुम ऋग्वेद में उत्पन्न हुई थी । जातवेदस् अग्नि शत्रुता करने वालों के धन को जलावे ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
ये᳓ त्वां᳓ दे᳓वि᳓ प्रप᳓द्यन्ते ब्राह्म᳓णा हव्यवा᳓हनीम् ।
अविद्यो᳓ बहुविद्यो᳓ वा स᳓ नः पर्षद᳓ति दुर्गा᳓णि वि᳓श्वा ॥ २० ॥
मूलम्
ये त्वां देवि प्र॒पद्य॑न्ते ब्रा॒ह्मणा॑ हव्य॒वाह॑नीम् ।
अ॒वि॒द्यो ब॑हुवि॒द्यो वा॒ स नः॑ पर्ष॒दति॑ दु॒र्गाणि॑ विश्वा॑ ॥ २० ॥
Chaubey En
O Goddess, the brāhmaṇas, whether illiterate or very learned, who approach you, the oblation-bearer, (you protect them); May she make us all cross over all the difficulties.
Chaubey हि
हे देवी, जो ब्राह्मण, चाहे विद्याहीन हो या जो बहुत विद्वान् हो, हव्य का वहन करने वाली तुम्हारी शरण में जाता है, (वह सभी बाधाओं से मुक्त हो जाता है) । वह अग्नि सम्पूर्ण दुर्गम बाधाओं से हमें पार करे ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
ता᳓मग्नि᳓वर्णां त᳓पसा ज्व᳓लन्तीं वैरोच᳓नीं᳓ कर्मफले᳓षु जुष्टा᳙म् ।
दुर्गां᳙ देवीं᳓ शरण᳓महं᳓ प्र᳓ पद्ये सु᳓तरसि त᳓रसे न᳓मः सु᳓तरसि त᳓रसे न᳓मः ॥ २१ ॥
मूलम्
ताम॒ग्निव॑र्णां॒ तप॑सा॒ ज्वल॑न्तीं वैरो॒चनीं क॑र्मफ॒लेषु॒ जु॒ष्टा॑म् ।
दु॒र्गां॑ दे॒वीं श॑र॒णम॒हं प्र प॑द्ये॒ सुत॑रसि॒ तर॑से॒ नमः॒ सुत॑रसि॒ तर॑से॒ नमः॑ ॥ २१ ॥
Chaubey En
I approach for shelter that Goddess Durgā, possessing the colour of Agni, shining with penance, belonging to the sun, and the lover of the fruits of action. O well-crosser (Goddess), salutation to you, who makes one cross over (the worldly troubles). O well-crosser, salutation to you, who make one cross over (the worldly troubles).
Chaubey हि
अग्नि के समान वर्ण वाली, तप से (सूर्य के समान) सदा प्रज्ज्वलित रहने वाली, कर्म फलों में प्रेम रखने वाली, उस दुर्गा की शरण में मैं जाता हूँ । हे अच्छी प्रकार से पार करने वाली, तुझे पार करने वाली के लिये नमस्कार है; हे अच्छी प्रकार से पार करने वाली, तुझे पार करने वाली के लिये नमस्कार है ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
दुर्गा᳓ दुर्गे᳓षु स्था᳓नेषु शं᳓ नो देवी᳓रभि᳓ष्टये ।
इमं᳓ दुर्गा᳓स्तवं पुण्यं रा᳓त्रौरात्रौ स᳓दा प᳓ठेत् ॥ २२ ॥
मूलम्
दु॒र्गा दु॒र्गेषु॒ स्थाने॑षु॒ शं नो॑ दे॒वीर॒भिष्ट॑ये ।
इ॒मं दु॒र्गास्त॑वं पुण्यं॒ रात्रौ॑रात्रौ॒ सदा॒ पठे॑त् ॥ २२ ॥
Chaubey En
One should always read the meritorious praise of Durgā, viz. śaṃ no devī abhiṣṭaye, every night at the places of Durgā.
Chaubey हि
सभी दुर्गा-स्थानों पर “शं नो देवीरभिष्टये” इस पवित्र दुर्गास्तवन का प्रत्येक रात्रि सदा पाठ करना चाहिये ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
रा᳓त्रिः कुशिकः᳓ सौभरो᳓ रात्रिस्तवं᳓ गायत्री᳓ ।
रात्रीसूक्तं᳓ जपेन्नि᳓त्यं तत्काल᳓मु᳓प पद्यते ॥ २३ ॥ [ १७ ]
मूलम्
रात्रिः॑ कुशि॒कः सौ॑भ॒रो रा॑त्रिस्त॒वं गा॑य॒त्री ।
रा॒त्री॒सू॒क्तं ज॑पे॒न्नित्यं॑ तत्का॒लमुप॑ पद्यते ॥ २३ ॥ [ १७ ]
Chaubey En
Rātri, the night (is the deity); Kuśika Saubhara (is the seer); Rātri-stava (is the sūkta); Gāyatrī (is the metre); one should chant the Rātri-sūkta daily; it gives its fruit immediately.
Chaubey हि
(इस सूक्त की देवता) रात्रि, (ऋषि) कुशिक सौभर, (इसमें) रात्रि की स्तुति तथा गायत्री छन्द है । इस रात्रि-सूक्त का नित्य जप करना चाहिये । (इससे) इसका तत्काल फल प्राप्त होता है ।
10.129 (128)
विश्वास-प्रस्तुतिः
अर्वा᳓ञ्चमि᳓न्द्रममु᳓तो हवामहे यो᳓ गोजि᳓द्धनजि᳓दश्वजि᳓द्यः᳓ ।
इमं᳓ नो यज्ञं᳓ विहवे᳓ जुषस्वास्य᳓ कुर्मो हरिवो मेदि᳓नं त्वा ॥ १० ॥ [ १९ ] (१०)
मूलम्
अ॒र्वाञ्च॒मिन्द्र॑म॒मुतो॑ हवामहे॒ यो गो॒जिद्ध॑न॒जिद॑श्व॒जिद्यः ।
इ॒मं नो॑ य॒ज्ञं वि॑ह॒वे जु॑षस्वा॒स्य कु॑र्मो हरिवो मे॒दिनं॑ त्वा ॥ १० ॥ [ १९ ] (१०)
Chaubey En
We invoke Indra from afar towards us, who is the conqueror of cows, conqueror of wealth and the conqueror of horses. O possessor of swift-going horses, listen to this sacrifice of ours in this invocation. We make you our companion.
Chaubey हि
वहाँ से इन्द्र को, जो गायों को जीतने वाला, धन को जीतने वाला तथा जो अश्व को जीतने वाला है, हम अपनी ओर बुलाते हैं । हमारे आह्वान करने पर इस यज्ञ को स्वीकार करो । हे शीघ्र दौड़ने वाले हरि-संज्ञक अश्वों वाले इन्द्र, हम तुम्हें यहाँ शक्तिशाली बनाते हैं ।
10.130
विश्वास-प्रस्तुतिः
आयुष्यं᳙ वर्चस्यं᳙ राय᳓स्पो᳓षमौ᳓द्भिदम् ।
इदं᳓ हि᳓रण्यं व᳓र्चस्वज्जै᳓त्राया᳓ विशतादु मा᳓म् ॥ १ ॥
मूलम्
आ॒यु॒ष्यं॑ वर्च॒स्यं॑ रा॒यस्पोष॒मौद्भि॑दम् ।
इ॒दं हिर॑ण्यं॒ वर्च॑स्व॒ज्जैत्रा॒या वि॑शतादु॒ माम् ॥ १ ॥
Chaubey En
May this gold, which is the preservative of life, bestowing vital power, supporting wealth, breaking through the earth and accompanied by vigour, come to me for my victory.
Chaubey हि
आयुष्य प्रदान करने वाला, वर्चस्वी बनाने वाला, धन की पुष्टि प्रदान करने वाला, पृथिवी के अन्दर से निकलने वाले वर्चस् से युक्त यह हिरण्य विजय के लिये मेरे पास आवे ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
उच्चै᳓र्वाजि᳓ पृतनाषा᳓ट् सभासाहं᳓ धनञ्जय᳓म् ।
सर्वाः᳓ स᳓मग्रा ऋ᳓द्धयो हि᳓रण्ये ऽस्मि᳓न्त्समा᳓हिताः ॥ २ ॥
मूलम्
उ॒च्चैर्वा॒जि पृ॑तना॒षाट् स॑भासा॒हं ध॑नञ्ज॒यम् ।
स॒र्वाः सम॑ग्रा॒ ऋद्ध॑यो॒ हिर॑ण्ये॒ ऽस्मिन्त्स॒माहि॑ताः ॥ २ ॥
Chaubey En
All the prosperities — high-up in strength, victory in the battle, victory in the assembly, and conquering of the wealth — are placed in this gold.
Chaubey हि
शक्ति में सर्वोच्चता, युद्ध में विजय, सभा में विजय, धन की विजय — ये सम्पूर्ण समृद्धियाँ, इस हिरण्य में समाविष्ट हैं ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
शुन᳓महं᳓ हि᳓रण्यस्य पितु᳓र्मा᳓नेव जग्रभ ।
ते᳓न मां सू᳓र्यत्वचमकरं पूरु᳓षु प्रिय᳓म् ॥ ३ ॥
मूलम्
शु॒नम॒हं हिर॑ण्यस्य पि॒तुर्माने॑व जग्रभ ।
तेन॑ मां॒ सूर्य॑त्वचमकरं पू॒रुषु॑ प्रि॒यम् ॥ ३ ॥
Chaubey En
I have taken possession of the auspicious gold as the prestige of (my) father. With that I have made my body with shining skin like sun, lovely among the clan of Pūrus (to look at).
Chaubey हि
मैंने कल्याणकारी हिरण्य को अपने पिता के सम्मान की तरह ग्रहण किया है; उसके द्वारा मैंने अपने शरीर को सूर्य की तरह चमकने वाला तथा पूरुवंशियों में प्रिय बनाया है ॥ ३ ॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
सम्रा᳓जं च विरा᳓जं चाभिष्टि᳓र्या᳓ च मे ध्रुवा᳓ ।
लक्ष्मी᳓ राष्ट्र᳓स्य या᳓ मु᳓खे त᳓या मा᳓मिन्द्र सं᳓ सृज ॥ ४ ॥
मूलम्
स॒म्राजं॑ च वि॒राजं॑ चाभि॒ष्टिर्या च॑ मे ध्रु॒वा ।
ल॒क्ष्मी रा॒ष्ट्रस्य॒ या मुखे॒ तया॒ मामि॑न्द्र॒ सं सृ॑ज ॥ ४ ॥
Chaubey En
The kingship, sovereignty and the protection (of Indra) which is my stability, and the Lakṣmī, i.e. the glory, which is in the mouth of a nation, with that O Indra, make me united.
Chaubey हि
साम्राज्य, सार्वभौम शासन तथा (इन्द्र का) संरक्षण, जो मेरी स्थिरता है, (तथा) लक्ष्मी जो राष्ट्र के मुख में है, हे इन्द्र, उस (लक्ष्मी) के साथ हमें संयुक्त करो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
अग्नेः᳓ प्र᳓जातं प᳓रि य᳓द्धि᳓रण्यममृ᳓तं᳓ ज᳓ज्ञे᳓ अ᳓धि म᳓र्त्येषु ।
य᳓ एनद् वे᳓द स᳓ इ᳓देनदर्हति जरा᳓मृत्यु᳙ भवति यो᳓ बिभ᳓र्ति ॥ ५ ॥ [ २० ]
मूलम्
अ॒ग्नेः प्रजा॑तं॒ परि॒ यद्धिर॑ण्यम॒मृतं जज्ञे अधि॒ मर्त्ये॑षु ।
य ए॑न॒द् वेद॒ स इदे॑नदर्हति ज॒रामृ॒त्यु॑ भवति॒ यो बि॒भर्ति॑ ॥ ५ ॥ [ २० ]
Chaubey En
The gold, born of Agni, has been born as immortal among the mortals; who knows it, verily he worships it; who bears it, his death comes not before old age.
Chaubey हि
अग्नि से उत्पन्न जो हिरण्य है, वह मानो मनुष्यों में अमृत के रूप में उत्पन्न हुआ है; जो उसको जानता है, वही उसको (रखने) के योग्य है; जो उसको धारण करता है, वृद्धावस्था में ही मृत्यु को प्राप्त होने वाला होता है (पहले नहीं) ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
य᳓द्वे᳓द रा᳓जा व᳓रुणो य᳓दु᳓ देवी᳓ स᳓रस्वती ।
इ᳓न्द्रो य᳓द् दस्युहा᳓ वे᳓द तन्मे व᳓र्चस आ᳓युषे ॥ ६ ॥
मूलम्
यद्वेद॒ राजा॒ वरु॑णो॒ यदु दे॒वी सर॑स्वती ।
इन्द्रो॒ यद् द॑स्यु॒हा वेद॑ तन्मे॒ वर्च॑स॒ आयु॑षे ॥ ६ ॥
Chaubey En
That which knows the King Varuṇa, which knows the Goddess Sarasvatī, which knows Indra, the killer of demons, may that (gold) be for my vital power and longevity.
Chaubey हि
जिस (हिरण्य) को राजा वरुण जानता है, जिसको देवी सरस्वती जानती है, दस्युओं का वध करने वाला इन्द्र जिसको जानता है, वह (हिरण्य) मेरे वर्चस् तथा आयुष्य के लिये होवे ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
न᳓ त᳓द्र᳓क्षांसि न᳓ पिशाचा᳓स्तरन्ति देवा᳓नामो᳓जः प्रथमजं᳓ ह्ये३त᳓त् ।
यो᳓ बिभ᳓र्ति दाक्षायणं᳓ हि᳓रण्यं स᳓ देवे᳓षु कृणुते दीर्घ᳓मा᳓युः ।
स᳓ मनुष्ये᳙षु कृणुते दीर्घ᳓मा᳓युः ॥ ७ ॥
मूलम्
न तद्रक्षां॑सि॒ न पि॑शा॒चास्त॑रन्ति दे॒वाना॒मोजः॑ प्रथम॒जं ह्ये॒३तत् ।
यो बि॒भर्ति॑ दाक्षाय॒णं हिर॑ण्यं॒ स दे॒वेषु॑ कृणुते दी॒र्घमायुः॑ ।
स म॑नु॒ष्ये॑षु कृणुते दी॒र्घमायुः॑ ॥ ७ ॥
Chaubey En
Neither the rākṣasas, the demons, nor the piśācas, the devourers overpower it, because it is the first-born strength of the gods. Whosoever bears the dākṣāyaṇahiraṇya, he enjoys his longevity among the gods; he attains longevity among the men.
Chaubey हि
उस (हिरण्य) को न तो राक्षस और न ही पिशाच अभिभूत कर सकते हैं, क्योंकि देवताओं का वह प्रथम उत्पन्न बल है । जो दाक्षायण-हिरण्य को धारण करता है, वह देवों में अपनी आयु को दीर्घ बनाता है, वह मनुष्यों में अपनी आयु को दीर्घ बनाता है ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
य᳓दा᳓बध्नन् दाक्षायणा᳓ हि᳓रण्यं शता᳓नीकाय सुमनस्य᳓मानाः ।
त᳓न्म आ᳓ बध्नामि शत᳓शारदाया᳓युष्माञ्जर᳓दष्टिर्यथा᳓सम् ॥ ८ ॥
मूलम्
यदाब॑ध्नन् दाक्षाय॒णा हिर॑ण्यं श॒तानी॑काय सुमन॒स्यमा॑नाः ।
तन्म॒ आ ब॑ध्नामि श॒तशा॑रदा॒यायु॑ष्माञ्ज॒रद॑ष्टिर्य॒थास॑म् ॥ ८ ॥
Chaubey En
When with auspicious mind the sons of Dakṣa (dexterous priests) bound the dākṣāyaṇa-hiraṇya for the King Śatānīka (one having 100 armies); verily that (gold) I put on me for hundred years, so that I may have long life attaining old age.
Chaubey हि
दक्ष के पुत्रों (निपुण-पुरोहितों) ने सुन्दर मन से जिस दाक्षायण-हिरण्य को शतानीक के लिये बाँधा था, उसी को मैं अपने सौ वर्षों तक जीवित रहने के लिये बाँधता हूँ, जिससे मैं वृद्धावस्था तक जीने वाली दीर्घ आयु को धारण करने वाला बनूं ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
घृता᳓दु᳓ल्लुप्तं म᳓धुमत् सुव᳓र्णं धनञ्जयं᳓ धरु᳓णं धारयिष्णु᳓म् ।
ऋण᳓क् सप᳓त्नान᳓धराँश्च कृण्व᳓दा᳓ रोह मां᳓ महते᳓ सौ᳓भगाय ॥ ९ ॥
मूलम्
घृ॒तादुल्लु॑प्तं॒ मधु॑मत् सु॒वर्णं॑ धनञ्ज॒यं ध॒रुणं॑ धारयि॒ष्णुम् ।
ऋ॒णक् स॒पत्ना॒नध॑राँश्च कृ॒ण्वदा रो॑ह॒ मां म॑ह॒ते सौभ॑गाय ॥ ९ ॥
Chaubey En
May the gold, drawn forth from the clarified butter, full of mead, conquering wealth, the supporter and capable of bearing, drive off foes and cause them to go down. (O gold), mount on me for the great good fortune.
Chaubey हि
घृत से निकला हुआ, मधु से युक्त, धन को जीतने वाला, दृढ़ता से धारण करने वाला तथा सदा धारण करने की इच्छा वाला (हिरण्य) है, वह शत्रुओं को नष्ट करे तथा नीचे धकेले । (हे हिरण्य,) मेरे महान् सौभाग्य के लिये मेरे शरीर में आरूढ होवो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
प्रियं᳓ मा कुरु देवे᳓षु प्रियं᳓ रा᳓जसु मा कुरु ।
प्रियं᳓ विश्वे᳓षु गोप्त्रे᳓षु म᳓यि धेहि रुचा᳓ रु᳓चम् ॥ १० ॥
मूलम्
प्रि॒यं मा॑ कुरु दे॒वेषु॑ प्रि॒यं राज॑सु मा कुरु ।
प्रि॒यं वि॒श्वेषु॑ गो॒प्त्रेषु॒ मयि॑ धेहि रु॒चा रुच॑म् ॥ १० ॥
Chaubey En
O gold, make me dear among the gods; make me dear among the kings; make me dear among all the protectors. (O gold), put in me the lustre with brightness.
Chaubey हि
(हे हिरण्य,) देवताओं में मुझे प्रिय बनाओ; राजाओं में मुझे प्रिय बनाओ; सभी रक्षकों में मुझे प्रिय बनाओ । (हे हिरण्य,) दीप्ति से दीप्तिमान (स्वर्ण) मेरे में धारण कराओ ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
अग्नि᳓र्ये᳓न विरा᳓जति सू᳓र्यो ये᳓न विरा᳓जति ।
विरा᳓ड् ये᳓न विरा᳓जति ते᳓नास्मा᳓न् ब्रह्मणस्पते विरा᳓जं समि᳓धं कुरु ॥ ११ ॥ [ २१ ]
मूलम्
अ॒ग्निर्येन॑ वि॒राज॑ति॒ सूर्यो॒ येन॑ वि॒राज॑ति ।
वि॒राड् येन॑ वि॒राज॑ति॒ तेना॒स्मान् ब्र॑ह्मणस्पते वि॒राजं॑ स॒मिधं॑ कुरु ॥ ११ ॥ [ २१ ]
Chaubey En
With which Agni shines forth, with which the sun shines forth, and with which virāṭ shines forth; O Brahmaṇaspati (the Lord of Prayer), with that lustre make us sovereign and inspired.
Chaubey हि
अग्नि जिससे सुशोभित होता है; सूर्य जिससे सुशोभित होता है, विराट् जिससे सुशोभित होता है, उस तेज से हे ब्रह्मणस्पति, मुझे विशिष्ट रूप से सुशोभित होने वाला तथा प्रज्ज्वलित बनाओ ।
10.145
विश्वास-प्रस्तुतिः
हिम᳓स्य त्वा जरा᳓युणा शा᳓ले प᳓रि व्ययामसि ।
उत᳓ ह्रदो᳓ हि᳓ नो भु᳓वो ऽग्नि᳓र्ददातु भेष᳓ज᳓म् ।
शीत᳓ह्रदो हि᳓ नो भुवो ऽग्नि᳓र्ददातु भेष᳓ज᳓म् ॥ १ ॥
मूलम्
हि॒मस्य॑ त्वा ज॒रायु॑णा॒ शाले॒ परि॑ व्ययामसि ।
उ॒त ह्र॒दो हि नो॒ भुवो॒ ऽग्निर्द॑दातु भे॒षजम् ।
शी॒तह्र॑दो॒ हि नो॑ भुवो॒ ऽग्निर्द॑दातु भे॒षजम् ॥ १ ॥
Chaubey En
O House, we enwrap you from all sides with outer skin of the snow; and you be a pond for us; let Agni give us medicament; be (like) a cooler pond for us; let Agni give us medicament.
Chaubey हि
हे गृह, हिम की पतली परत से तुमको चारों तरफ से आवेष्टित करता हूँ; तुम हमारे लिये एक सरोवर (के समान शीतल) होवो; अग्नि अपनी औषधि प्रदान करे; तुम हमारे लिये सरोवर होवो । अग्नि अपनी औषधि प्रदान करे ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
अन्तिका᳓दग्नि᳓रभवद्दुर्वा᳓दः शि᳓शुरा्᳓आ᳓गमत् ।
अ᳓जातपुत्रपुत्राया हृ᳓दयं म᳓म दूयते ॥ २ ॥
मूलम्
अ॒न्ति॒काद॒ग्निर॑भवद्दु॒र्वादः॒ शिशु॒रााग॑मत् ।
अजा॑तपुत्रपुत्राया॒ हृद॑यं॒ मम॑ दू॒य॒ते॒ ॥ २ ॥
Chaubey En
Let Agni be in vicinity; let child, speaking inexplicit words, come (here). Having given no birth to a child my heart is distressed.
Chaubey हि
अग्नि समीप में रहे; तुतले शब्द करने वाला शिशु हमारे घर में हो; जिसको कोई पुत्र उत्पन्न नहीं हुआ, उस माता का मेरा हृदय अत्यन्त पीड़ित हो रहा है।
विश्वास-प्रस्तुतिः
विपुलं᳓ व᳓नं बह्वा᳙काशं᳓ च᳓र जातवेदः का᳓माय ।
मां᳓ च र᳓क्ष पुत्राँ᳓श्च शरण᳓मुभौ᳓ त᳓व ॥ ३ ॥
मूलम्
वि॒पु॒लं वनं॑ ब॒ह्वा॑का॒शं चर॑ जातवेदः॒ कामा॑य ।
मां च॒ रक्ष॑ पु॒त्राँश्च॑ शर॒णमु॒भौ तव॑ ॥ ३ ॥
Chaubey En
O Jātavedas Agni, move as per your will in the vast forest, having a large sky. Protect me and my sons; both of us are in your shelter.
Chaubey हि
हे जातवेदस् अग्नि, विशाल आकाश से व्याप्त विस्तृत वन में तुम अपनी इच्छानुसार विचरण करो; मेरी रक्षा करो और मेरे पुत्रों की रक्षा करो; हम दोनों तुम्हारी शरण में हैं ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पि᳓ङ्गाक्ष लो᳓हितग्रीव कृ᳓ष्णवर्ण न᳓मो ऽस्तु ते ।
अस्म᳓न्नि᳓ बर्हीरस्योनं᳓ सागरस्योर्म᳓यो यथा ॥ ४ ॥
मूलम्
पिङ्गा॑क्ष॒ लोहि॑तग्रीव॒ कृष्ण॑वर्ण॒ नमो॑ ऽस्तु ते ।
अ॒स्मन्नि ब॑र्हीरस्यो॒नं सा॑गरस्यो॒र्मयो॑ यथा ॥ ४ ॥
Chaubey En
O Agni, the red-eyed, the red-necked, and the black-coloured, (my) salutation be to you; you remove away its deficiency from us like the waves of the ocean.
Chaubey हि
हे रक्त वर्ण के नेत्र वाले, हे लाल वर्ण की गर्दन वाले, हे कृष्ण वर्ण (के धूम) वाले, तुम्हें नमस्कार है । इस गृह की जो न्यूनता है, उसे हमसे अलग कर नष्ट करो, जिस प्रकार सागर की लहरें (अवांछित वस्तुओं को) दूर फेंकती हैं ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
इ᳓न्द्रः क्षत्रं᳓ ददातु व᳓रुणस्त᳓म᳓भि षिञ्चतु ।
श᳓त्रवो निध᳓नं यान्तु ज᳓यं त्वं᳓ ब्र᳓ह्मतेजसा ॥ ५ ॥
मूलम्
इन्द्रः॑ क्ष॒त्रं द॑दातु॒ वरु॑ण॒स्तमभि॑ षिञ्चतु ।
शत्र॑वो नि॒धनं॑ यान्तु॒ जयं॒ त्वं ब्रह्म॑तेजसा ॥ ५ ॥
Chaubey En
Let Indra give shelter (to you); let Varuṇa sprinkle water from all sides. Your enemies go to death and you get victory (over them) with the power of prayer.
Chaubey हि
इन्द्र शक्ति प्रदान करे, वरुण उसको अभिषिञ्चित करे, तुम्हारे शत्रु विनाश को प्राप्त हों; तुम अपने ब्रह्मतेज से विजय प्राप्त करो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
कपिल᳓जटीं स᳓र्वभक्षं चाग्निं᳓ प्रत्य᳓क्षदैवतम् ।
वरुणवशाँ᳓ ह्य् अ᳙१ग्निर्म᳓म पुत्राँ᳓श्च रक्षतु ॥ ६ ॥
मूलम्
क॒पि॒लज॑टीं॒ सर्व॑भक्षं चा॒ग्निं प्र॒त्यक्ष॑दैवतम् ।
व॒रु॒ण॒व॒शाँ ह्य॑१ग्नि॒र्मम॑ पु॒त्राँश्च॑ रक्षतु ॥ ६ ॥
Chaubey En
(I take) Agni, having brownish hair and all-devouring as the visible god. Let Agni protect my sons, captured by Varuṇa.
Chaubey हि
पाण्डु वर्ण की जटा वाला तथा सब कुछ खाने वाला अग्नि ही प्रत्यक्ष देवता है; वरुण के पाश में फँसे मेरे पुत्रों की अग्नि रक्षा करे ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
या᳓वदादित्यस् त᳓पति या᳓वद् भ्रा᳓जति चन्द्र᳓माः ।
या᳓वद् वा᳓तः प्रवा᳓यति ता᳓वज्जीव त᳓या सह᳓ ॥ ७ ॥
मूलम्
याव॑दादि॒त्य॒स्तप॑ति॒ याव॒द् भ्राज॑ति च॒न्द्रमाः॑ ।
याव॒द् वातः॑ प्र॒वाय॑ति॒ ताव॑ज्जीव॒ तया॑ स॒ह ॥ ७ ॥
Chaubey En
As long as the Āditya shines; as long as the moon glitters; and as long as the wind blows; you live (in this house) till that time with her (wife).
Chaubey हि
जब तक आदित्य तपता है, जब तक चन्द्रमा चमकता है; जब तक वायु बहता है, तब तक (इस गृह में) उस (पत्नी) के साथ जियो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
ए᳓कशफैर्हस्ति᳓नोद्दे᳓शे᳓न वि᳙पुले᳓न ।
पृथिवीं᳓ त्वं᳓ भुञ्जस्वै᳓कच्छत्रेण दण्डे᳓न ॥ ८ ॥
मूलम्
एक॑शफैर्ह॒स्तिनो॒द्देशेन॒ वि॑पु॒लेन॑ ।
पृ॒थि॒वीं त्वं भु॑ञ्ज॒स्वैक॑च्छत्रेण द॒ण्डेन॑ ॥ ८ ॥
Chaubey En
You enjoy the entire earth accompanied by ample horses, elephants, chariots, with one command under one umbrella with one order.
Chaubey हि
विपुल अश्वों एवं हाथियों से युक्त होकर एक छत्र के अन्दर एक दण्ड (आदेश) के द्वारा सम्पूर्ण पृथिवी का भोग करो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
ये᳓न के᳓न प्रका᳓रेण मेह᳓नाको᳓ ऽपि जीवति ।
प᳓रेषामुपका᳓रार्थं य᳓ज्जी᳓वति स᳓ जीवति ॥ ९ ॥ [ ३६ ]
मूलम्
येन॒ केन॑ प्र॒कारे॑ण मे॒हना॒को ऽपि॑ जीवति ।
परे॑षामुप॒कारा॑र्थं॒ यज्जीव॑ति॒ स जी॑वति ॥ ९ ॥ [ ३६ ]
Chaubey En
By this or that way a luxurious person also lives, but only he lives who lives for the betterment of others.
Chaubey हि
जिस किसी प्रकार से कामी व्यक्ति भी जीता है, किन्तु दूसरे के उपकार के लिये जो जीता है, वही (वस्तुतः) जीता है।
10.155
विश्वास-प्रस्तुतिः
मेधां᳓ म᳓ह्यम᳓ङ्गिरसो मेधां᳓ सप्त᳓ ऋ᳓षयो ददुः ।
मेधा᳓मि᳓न्द्रश्चाग्नि᳓श्च मेधां᳓ धाता᳓ दधातु मे ॥ १ ॥
मूलम्
मे॒धां मह्य॒मङ्गि॑रसो मे॒धां स॒प्त ऋष॑यो ददुः ।
मे॒धामिन्द्र॑श्चा॒ग्निश्च॑ मे॒धां धा॒ता द॑धातु मे ॥ १ ॥
Chaubey En
The Angirases (have given) me the intelligence; the seven great seers have given (me) the intelligence. Let Indra and Agni (put in me) the intelligence; Let Dhātā put in me the intelligence.
Chaubey हि
दिव्य अङ्गिरा ऋषियों ने मुझे मेधा प्रदान किया है; दिव्य सप्तर्षियों ने मुझे मेधा प्रदान किया है; इन्द्र और अग्नि भी हमें मेधा प्रदान करें; सबको धारण करने वाले धाता देव मुझमें मेधा धारण करावें ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मेधां᳓ मे व᳓रुणो रा᳓जा मेधां᳓ देवी᳓ स᳓रस्वती ।
मेधां᳓ मे अश्वि᳓नौ देवा᳓वा᳓ धत्तां पु᳓ष्करस्रजा ॥ २ ॥
मूलम्
मे॒धां मे॒ वरु॑णो॒ राजा॑ मे॒धां दे॒वी सर॑स्वती ।
मे॒धां मे॑ अ॒श्विनौ॑ दे॒वावा ध॑त्तां॒ पुष्क॑रस्रजा ॥ २ ॥
Chaubey En
Let King Varuṇa (put) in me the intelligence; let goddess Sarasvatī (put in me) the intelligence; let the twin gods Aśvins, bearing lotus-garlands, put in me the intelligence.
Chaubey हि
राजा वरुण मुझमें मेधा धारण करावें; देवी सरस्वती मुझमें मेधा धारण करावें; कमल-पुष्प की माला धारण करने वाले दोनों अश्विनीकुमार मुझमें मेधा धारण करावें ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
या᳓ मेधा᳓प्सरसि᳓ गन्धर्वे᳓षु च य᳓न्न᳓रे ।
दै᳓वी या᳓ मा᳓नुषी मेधा᳓ सा᳓ मा᳓मा᳓ विशतादिह᳓ ॥ ३ ॥
मूलम्
या मे॒धाप्स॑र॒सि ग॑न्ध॒र्वेषु॑ च॒ यन्नरे॑ ।
दैवी॒ या मानु॑षी मे॒धा सा मामा वि॑शतादि॒ह ॥ ३ ॥
Chaubey En
The intelligence which is in apsarases (the heavenly female divinities), in gandharvas, (the heavenly rays), and which is in men, and the intelligence which belongs to divine and human beings, may that (intelligence) come to me here.
Chaubey हि
जो मेधा दिव्य अप्सराओं, गन्धर्वों तथा जो मनुष्यों में स्थित है, जो दैवी तथा मानुषी मेधा है वह यहाँ मेरे में प्रविष्ट होवे ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
य᳓न्मे नो᳓क्तं᳓ प्र᳓ द्रवतां श᳓केयं य᳓दनुब्रुवे᳓ ।
नि᳓शामितं नि᳓ शामहै म᳓यि श्रुतं᳓ सह᳓ व्रते᳓न भूयासं ब्र᳓ह्मणा सं᳓ गमेमहि ॥ ४ ॥
मूलम्
यन्मे॒ नोक्तं प्र द्र॑वतां॒ शके॑यं॒ यद॑नुब्रु॒वे ।
निशा॑मितं॒ नि शा॑महै॒ मयि॑ श्रु॒तं स॒ह व्र॒तेन॑ भूयासं॒ ब्रह्म॑णा॒ सं ग॑मेमहि ॥ ४ ॥
Chaubey En
Whatever not mentioned here, may that rush unto me; what I have said, may I be able to get that; whatever is learnt, may we perceive that; (whatever is) heard, may that reside in me. May I be accompanied by the sacred vow (vrata); may we be accompanied by the sacred prayer (Brahman).
Chaubey हि
जो मैंने नहीं कहा वह मेधा भी मेरे पास आवे; जो मैंने कहा है उस मेधा को मैं धारण करने में समर्थ बनूं; जो कुछ मैंने सीखा है, उसकी मैं अनुभूति करूँ; जो कुछ मैंने सुनकर ज्ञान प्राप्त किया है, वह मेरे अन्तःकरण में स्थित होवे । मैं पवित्र व्रत से संयुक्त होऊँ; मैं पवित्र ज्ञान के साथ संगमन करूँ ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
श᳓रीरं मे विचक्षणं᳓ वा᳓ङ् मे म᳓धुमद्दुहा ।
अ᳓वृधमह᳓मसौ᳓ सू᳓र्यो ब्र᳓ह्मण आणी᳓ स्थः । श्रुतं᳓ मे मा᳓ प्र᳓ हासीत् ॥ ५ ॥ [ १० ]
मूलम्
शरी॑रं मे विचक्ष॒णं वाङ् मे॒ मधु॑मद्दुहा ।
अवृ॑धम॒हम॒सौ सूर्यो॑ ब्रह्म॑ण आ॒णी स्थः॑ । श्रु॒तं मे॒ मा प्र हा॑सीत् ॥ ५ ॥ [ १० ]
Chaubey En
My body is conspicuous; my speech is mead-yielding; I am not old as also is this sun; You are the pins of the Brahman; let my knowledge be not lessened.
Chaubey हि
मेरा शरीर विशिष्ट रूप में दिखने वाला होवे; मेरी वाणी मधु-पूर्ण दूध देने वाली हो; यह मैं कभी वृद्ध होने वाला नहीं हूँ, यह सूर्य भी । ब्रह्म की कील हो; मेरा ज्ञान कभी कम न होवे ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मेधां᳓ देवीं᳓ म᳓नसा रे᳓जमानां गन्धर्व᳓जुष्टां प्र᳓ति नो जुषस्व ।
म᳓ह्यं मेधां᳓ वद म᳓ह्यं श्रि᳓यं वद मेधावी᳓ भूयासमजराजरिष्णुः᳓ ॥ ६ ॥
मूलम्
मे॒धां दे॒वीं मन॑सा॒ रेज॑मानां गन्ध॒र्वजु॑ष्टां॒ प्रति॑ नो जुषस्व ।
मह्यं॑ मे॒धां व॑द॒ मह्यं॒ श्रियं॑ वद मेधा॒वी भू॑यासमजराजरि॒ष्णुः ॥ ६ ॥
Chaubey En
Make favourable to us the divine intelligence which is ever-shining and loved by the gandharvas; speak intelligence for me; speak glory for me. May I be accompanied by intelligence and also be wandering on the path of knowledge never being affected by old age.
Chaubey हि
दिव्य मेधा को, जो मन से सदा प्रकाशमान है तथा जो गन्धर्वों द्वारा सदा सेवित है, हमारे लिये अनुकूल करो । मेरे लिये मेधा की बात करो; मेरे लिये श्री की बात करो; मैं मेधावी बनूं और वृद्धावस्था से बिना प्रभावित ज्ञान के मार्ग पर सदा चलने की इच्छा वाला बनूं ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
स᳓दसस्प᳓तिम᳓द्भुतं प्रिय᳓मि᳓न्द्रस्य का᳓म्यम् ।
सनिं᳓ मेधा᳓मयासिषम् ॥ ७ ॥
मूलम्
सद॑स॒स्पति॒मद्भु॑तं प्रि॒यमिन्द्र॑स्य॒ काम्य॑म् ।
स॒निं मे॒धाम॑यासिषम् ॥ ७ ॥
Chaubey En
I have attained in opulence the intelligence, the Lord of sacrificial assembly, the wonderful, dear to and desired as well by Indra.
Chaubey हि
मैं यज्ञमण्डप के स्वामी, अद्भुत शक्ति वाले, प्रिय तथा इन्द्र के लिये वरणीय सम्पत्ति मेधा के लिये आया हूँ ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
यां᳓ मेधां᳓ देवगणाः᳓ पित᳓रश्चोपा᳓सते ।
त᳓या मा᳓मद्य᳓ मेध᳓या᳓ग्ने मेधावि᳓नं कुरु ॥ ८ ॥
मूलम्
यां मे॒धां दे॑वग॒णाः पि॒तर॑श्चो॒पास॑ते ।
तया॒ माम॒द्य मे॒धयाग्ने॑ मे॒धा॒विनं॑ कुरु ॥ ८ ॥
Chaubey En
The intelligence which all the gods and forefathers worship, O Agni, with that very intelligence make me intelligent.
Chaubey हि
जिस मेधा की सम्पूर्ण देवगण तथा पितृगण उपासना करते हैं, उस मेधा से हे अग्नि! आज मुझे मेधावी बनाओ ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मेधाव्य᳙१हं सुम᳓नाः सुप्र᳓तीकः श्रद्धा᳓मना सत्य᳓मतिः सुशे᳓वः ।
महा᳓यशा धारयिष्णुः᳓ प्रवक्ता᳓ भूया᳓सम᳓र्ये स्वध᳓या प्रयो᳓गे ॥ ९ ॥ [ ११ ] (११)
मूलम्
मे॒धा॒व्य॑१हं सु॒मनाः॑ सु॒प्रती॑कः श्र॒द्धाम॑ना स॒त्यम॑तिः सु॒शेवः॑ ।
म॒हाय॑शा धारयि॒ष्णुः प्र॑व॒क्ता भू॒यास॒मर्ये॑ स्व॒धया॑ प्र॒योगे॑ ॥ ९ ॥ [ ११ ] (११)
Chaubey En
May I be the possessor of intelligence, the possessor of good mind, the possessor of good appearance. May I be of faithful mind, of truthful thought and be gracious. May I be the possessor of greater glory, the possessor (of intelligence), a great orator in debate and equipped in the application of mantras with their magical power.
Chaubey हि
मैं मेधा को धारण करने वाला; सुन्दर मन धारण करने वाला, सत्य बुद्धि वाला, मन में सदा श्रद्धा-भाव रखने वाला, सत्य विचार वाला, शोभन सम्पत्ति वाला, महान् यशस्वी, सम्पूर्ण श्रेष्ठ गुणों को धारण करने की इच्छा वाला, प्रवचन करने वाला तथा शत्रु के प्रति मन्त्र-शक्ति का प्रयोग करने वाला बनूं ।
10.171
विश्वास-प्रस्तुतिः
ये᳓नेदं᳓ भूतं᳓ भु᳓वनं भविष्य᳓त्प᳓रिगृहीतममृ᳓तेन स᳓र्वम् ।
ये᳓न यज्ञ᳓स्ताय᳓ते सप्त᳓होता त᳓न्मे म᳓नः शिव᳓सङ्कल्पमस्तु ॥ १ ॥
मूलम्
येने॒दं भू॒तं भुव॑नं भवि॒ष्यत्परि॑गृहीतम॒मृते॑न॒ सर्व॑म् ।
येन॑ य॒ज्ञस्ता॒यते॑ स॒प्तहो॑ता॒ तन्मे॒ मनः॑ शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु ॥ १ ॥
Chaubey En
(The immortal Mind) by which everything is known in this world at present, past and future; and by which the sacrifice, etc. is performed with the help of seven ṛtviks; may that mind of mine be of auspicious resolution.
Chaubey हि
जिस अमर मन के द्वारा इस संसार में भूत, भविष्यत् और वर्तमान काल के सब पदार्थ जाने जाते हैं; और जिसके द्वारा सात होता वाला यज्ञ सम्पादित किया जाता है; वह मेरा मन शुभ संकल्प वाला हो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
ये᳓न क᳓र्माण्यप᳓सो मनीषि᳓णो यज्ञे᳓ कृण्व᳓न्ति विद᳓थेषु धी᳓राः ।
य᳓दपूर्वं᳓ यक्ष᳓मन्तः᳓ प्रजा᳓नां त᳓न्मे म᳓नः शिव᳓सङ्कल्पमस्तु ॥ २ ॥
मूलम्
येन॒ कर्मा॑ण्य॒पसो॑ मनी॒षिणो॑ य॒ज्ञे कृ॒ण्वन्ति॑ वि॒दथे॑षु॒ धीराः॑ ।
यद॑पू॒र्वं य॒क्षम॒न्तः प्र॒जानां॒ तन्मे॒ मनः॑ शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु ॥ २ ॥
Chaubey En
(The Mind) through which the dexterous and intelligent men, devoted to the performance of religious rites, do their work in sacrifice and assemblies; which is unprecedented, (which is) capable of performing sacrifices and (which is) present in the body of all living beings; may that mind of mine be of auspicious resolution.
Chaubey हि
जिस मन से कर्मनिष्ठ बुद्धिमान मेधावी पुरुष यज्ञ तथा उपासनाओं में कर्म करते हैं; जो सब (इन्द्रियों) से पहले उत्पन्न होता है और यज्ञ करने में समर्थ है; और जो प्राणिमात्र के शरीर के भीतर रहता है; वह मेरा मन शुभ संकल्प वाला हो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
ये᳓न क᳓र्माणि प्रतिर᳓न्ति धी᳓रा य᳓तो वाचा᳓ म᳓नसा ता᳓नि ह᳓न्ति ।
य᳓स्यान्वित᳓म᳓नु कृण्व᳓न्ति प्राणि᳓नस्त᳓न्मे म᳓नः शिव᳓सङ्कल्पमस्तु ॥ ३ ॥
मूलम्
येन॒ कर्मा॑णि प्रति॒रन्ति॒ धीरा॒ यतो॑ वा॒चा मन॑सा॒ तानि॒ हन्ति॑ ।
यस्या॑न्वि॒तमनु॑ कृ॒ण्वन्ति॑ प्रा॒णिन॒स्तन्मे॒ मनः॑ शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु ॥ ३ ॥
Chaubey En
(The divine Mind), through which the wise men perform their work; from which they bring to completion with speech and mind; after association of which the living beings do their work; may that mind of mine be of auspicious resolution.
Chaubey हि
जिसके द्वारा बुद्धिमान व्यक्ति अपने कर्मों का सम्पादन करते हैं; क्योंकि वाणी और मन के द्वारा ही उन कर्मों को समाप्त करते हैं, जिसके अन्वित होने पर ही प्राणी सब कार्य करते हैं; वह मेरा मन शुभ संकल्प वाला हो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
य᳓स्मिन्नृ᳓चः सा᳓म य᳙जूंषि य᳓स्मिन् प्र᳓तिष्ठिता रथनाभा᳓विवाराः᳓ ।
य᳓स्मिंश्चित्तं᳓ सर्व᳓मो᳓तं प्रजा᳓नां त᳓न्मे म᳓नः शिव᳓सङ्कल्पमस्तु ॥ ४ ॥
मूलम्
यस्मि॒न्नृचः॒ साम॒ य॑जूंषि॒ यस्मि॒न् प्रति॑ष्ठिता रथना॒भावि॑वा॒राः ।
यस्मिं॑श्चि॒त्तं स॒र्वमोतं॑ प्र॒जानां॒ तन्मे॒ मनः॑ शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु ॥ ४ ॥
Chaubey En
(The Mind) in which the ṛks, the sāman (chanting) and the yajuṣ mantras are set up like the spokes in the nave of a wheel; and in which all knowledge of living beings is woven; may that mind of mine be of auspicious resolution.
Chaubey हि
रथ-चक्र की नाभि में तिल्लियों की तरह जिस मन में ऋचायें, साम और यजुः मन्त्र प्रतिष्ठित हैं; जिसमें प्राणियों का सर्वपदार्थ-विषयक ज्ञान निहित है; वह मेरा मन शुभ संकल्प वाला हो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
य᳓त्प्रज्ञा᳓नमुत᳓ चे᳓तो धृ᳓तिश्च य᳓ज्ज्यो᳓तिरन्त᳓रमृ᳓तं प्रजा᳓सु ।
य᳓स्मान्न᳓ ऋते᳓ कि᳓ञ्चन᳓ क᳓र्म क्रिय᳓ते त᳓न्मे म᳓नः शिव᳓सङ्कल्पमस्तु ॥ ५ ॥ [ २७ ]
मूलम्
यत्प्र॒ज्ञान॑मु॒त चेतो॒ धृति॑श्च॒ यज्ज्योति॑र॒न्तर॒मृतं॑ प्र॒जासु॑ ।
यस्मा॒न्न ऋ॒ते किञ्च॒न कर्म॑ क्रि॒यते॒ तन्मे॒ मनः॑ शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु ॥ ५ ॥ [ २७ ]
Chaubey En
(The Mind) which is an instrument of distinguished knowledge, conciousness and that of steadiness itself; which is an immortal light in living beings (that directs the external organs to their respective objects); and without which no work is done; may that mind of mine be of auspicious resolution.
Chaubey हि
जो मन विशेष ज्ञान तथा सामान्य ज्ञान (का साधन) है; जो धैर्य-रूप है; जो प्राणियों के भीतर (सब इन्द्रियों को प्रेरित करने वाली) अमर ज्योति है; और जिसके बिना कोई कार्य नहीं किया जा सकता; वह मेरा मन शुभ संकल्प वाला हो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सुषारथि᳓र᳓श्वानिव य᳓न्मनुष्या᳙न्नेनीय᳓ते ऽभी᳙शुभिर्वाजि᳓न इव । हृत्प्र᳓तिष्ठं य᳓दजिरं᳓ ज᳓विष्ठं त᳓न्मे म᳓नः शिव᳓सङ्कल्पमस्तु ॥ ६ ॥
मूलम्
सु॒षा॒र॒थिरश्वा॑निव॒ यन्म॑नु॒ष्या॑न्नेनी॒यते॒ ऽभी॑शुभिर्वा॒जिन॑ इव । हृ॒त्प्रति॑ष्ठं॒ यद॑जि॒रं जवि॑ष्ठं॒ तन्मे॒ मनः॑ शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु ॥ ६ ॥
Chaubey En
(The Mind) which impels living beings to action, and controls them as a good charioteer does the horses; which resides in heart and is never old, and (which) is very swift; may that mind of mine be of auspicious resolution.
Chaubey हि
जैसे एक अच्छा सारथी घोड़ों को इधर-उधर प्रेरित करता है और लगामों से उन्हें अपने वश में रखता है, उसी प्रकार जो मन प्राणियों को बार-बार इधर-उधर प्रेरित करता है और अपने वश में रखता है; जो हृदय में स्थित है; जो बुढ़ापा से रहित और अत्यन्त वेगवान् है; वह मेरा मन शुभ संकल्प वाला हो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
य᳓ज्जा᳓ग्रतो दूर᳓मुदै᳓ति दै᳓वं त᳓दु सुप्त᳓स्य त᳓थैवै᳓ति । दूरङ्गमं᳓ ज्यो᳓तिषां ज्यो᳓तिरे᳓कं त᳓न्मे म᳓नः शिव᳓सङ्कल्पमस्तु ॥ ७ ॥
मूलम्
यज्जाग्र॑तो दू॒रमु॒दैति॒ दैवं॒ तदु॑ सु॒प्तस्य॒ तथै॒वैति॑ । दू॒र॒ङ्ग॒मं ज्योति॑षां॒ ज्योति॒रेकं॒ तन्मे॒ मनः॑ शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु ॥ ७ ॥
Chaubey En
(The divine Mind) which goes farther off (than other sense organs like eye, etc.) when one is awake; which comes back in the same way (as it goes away) when one is sleeping; (which is) far-going and which is the sole light of all external organs; may that mind of mine be of auspicious resolution.
Chaubey हि
जो मन पुरुष की जागृत् अवस्था में (नेत्र आदि अन्य ज्ञानेन्द्रियों की अपेक्षा) अधिक दूर जाता है; जो पुरुष की सुषुप्ति अवस्था में उसी प्रकार लौट आता है जिस प्रकार जागृत् अवस्था में दूर जाता है; और जो सब बाह्य इन्द्रियों का एकमात्र प्रकाशक है; वह मेरा मन शुभ संकल्प वाला हो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
ये᳓नेदं᳓ स᳓र्वं ज᳓गतो बभू᳓व त᳓देवा᳓पि मह᳓तो᳓ जात᳓वेदाः । त᳓देवा᳓ग्नि᳓स्त᳓पसो ज्यो᳓तिरे᳓कं त᳓न्मे म᳓नः शिव᳓सङ्कल्पमस्तु ॥ ८ ॥
मूलम्
येने॒दं सर्वं॒ जग॑तो ब॒भूव॒ तदे॒वापि॑ म॒हतो जा॒तवे॑दाः । तदे॒वाग्निस्तप॑सो॒ ज्योति॒रेकं॒ तन्मे॒ मनः॑ शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु ॥ ८ ॥
Chaubey En
(The Mind) by which the entire world has come out; even the great gods also. (like) Jātavedas; which itself is that Agni; which is the sole light, the result of penance; may that mind of mine be of auspicious resolution.
Chaubey हि
जिसके द्वारा इस जगत् से यह सब उत्पन्न हुआ है, जो जातवेदा अग्नि (आदि) देवता भी महत् से उत्पन्न हुए हैं; तपस् से उत्पन्न जो एक ज्योति है; वह मेरा मन शुभ संकल्प वाला हो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
ये᳓न द्यौरुग्रा᳓ पृथिवी᳓ चा᳓न्त᳓रिक्षं ये᳓न प᳓र्वताः प्रदि᳓शो दि᳓शश्च । ये᳓नेदं᳓ ज᳓गद्व्या᳙प्तं प्रजा᳓नां त᳓न्मे म᳓नः शिव᳓सङ्कल्पमस्तु ॥ ९ ॥
मूलम्
येन॑ द्यौरु॒ग्रा पृ॑थि॒वी चान्तरि॑क्षं॒ येन॒ पर्व॑ताः प्र॒दिशो॒ दिश॑श्च । येने॒दं जग॒द्व्या॑प्तं प्र॒जानां॒ तन्मे॒ मनः॑ शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु ॥ ९ ॥
Chaubey En
(The Mind) by which the great heaven, earth and the mid-region (have come out); by which the mountains, sub-quarters and the quarters (have come out); by which the entire world of the creatures has been pervaded; may that mind of mine be of auspicious resolution.
Chaubey हि
जिस से विशाल द्यौ, पृथिवी तथा अन्तरिक्ष (व्याप्त है); जिससे पर्वत, प्रदिशायें तथा दिशायें (व्याप्त हैं); जिससे यह जगत् व्याप्त है; वह मेरा मन शुभ संकल्प वाला हो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
ये᳓ पञ्चपञ्चा᳓ द᳓शतं᳓ शतं᳓ च सह᳓स्त्रं च नियु᳓तं न्य᳙र्बुदं च । ते᳓ अग्निचित्येष्टकात्तं᳓ श᳓रीरं त᳓न्मे म᳓नः शिव᳓सङ्कल्पमस्तु ॥ १० ॥ [ २८ ]
मूलम्
ये प॑ञ्चप॒ञ्चा दश॒तं श॒तं च॑ स॒हस्त्रं॑ च नि॒युतं॒ न्य॑र्बुदं च । ते अ॑ग्निचित्येष्टका॒त्तं शरी॑रं॒ तन्मे॒ मनः॑ शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु ॥ १० ॥ [ २८ ]
Chaubey En
Which are five into five, ten, hundred, thousand, million, and hundred million; they are in the body pervaded in the agnicityeṣṭakā (piling of bricks in the agnicayana); may that mind of mine be of auspicious resolution.
Chaubey हि
जो पाँच-पाँच, दश, सौ, सहस्र, दश लाख, दश करोड़ संख्यायें हैं, वे सभी अग्निचित्येष्टकात्मक शरीर में व्याप्त हैं; वह मेरा मन शुभ संकल्प वाला हो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
ये᳓ म᳓नो हृ᳓दयं ये᳓ च देवा᳓ या᳓ दिव्या᳓ आ᳓पो यः᳓ सू᳓र्य᳓रश्मिः । ये᳓ श्रो᳓त्रं᳓ चक्षु᳓षी संच᳓रन्ति त᳓न्मे म᳓नः शिव᳓सङ्कल्पमस्तु ॥ ११ ॥
मूलम्
ये मनो॒ हृद॑यं॒ ये च॑ दे॒वा या दि॒व्या आपो॒ यः सूर्यर॑श्मिः । ये श्रोत्रं च॒क्षुषी॑ सं॒चर॑न्ति॒ तन्मे॒ मनः॑ शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु ॥ ११ ॥
Chaubey En
Which is mind, which is heart, which are the gods, which are divine waters, which is the sun-ray, which is the ear, which are the two eyes; may that mind of mine, pervading in all, be of auspicious resolution.
Chaubey हि
जो दोनों मन और हृदय है, जो देवता हैं, जो दिव्य जल हैं, जो सूर्यरश्मि है, जो दोनों कान और आँख हैं; (जो) इनमें नित्य संचरण करने वाला है; वह मेरा मन शुभ संकल्प वाला हो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
य᳓द᳓त्र षष्ठं᳓ त्रिशतं᳓ श᳓रीरं यज्ञ᳓स्य गु᳓ह्यं न᳓व नावमा᳓द्यम् । द᳓श पञ्च᳓ त्रिश᳓तं य᳓त्प᳓रं च त᳓न्मे म᳓नः शिव᳓सङ्कल्पमस्तु ॥ १२ ॥
मूलम्
यदत्र॑ ष॒ष्ठं त्रि॑श॒तं शरी॑रं य॒ज्ञस्य॒ गुह्यं॒ नव॑ नाव॒माद्य॑म् । दश॑ प॒ञ्च त्रि॒शतं॒ यत्परं॑ च॒ तन्मे॒ मनः॑ शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु ॥ १२ ॥
Chaubey En
Which is here sixth, the body comprising of three-hundred (?) (limbs), the secret, new and first boat of the sacrifice; which is ten, five, thirty, and which is above that; may that mind of mine be of auspicious resolution.
Chaubey हि
जो यहाँ छठा तीन-सौ (अंगों वाला) शरीर है; जो यज्ञ की अत्यन्त गुह्य नवीन एवं प्रथम नौका है; दश-पाँच-तीस तथा इससे जो परे भी है; वह मेरा मन शुभ संकल्प वाला हो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वे᳓दाह᳓मेतं᳓ पु᳓रुषं महा᳓न्तमादित्य᳓वर्णं त᳓मसः पर᳓स्तात् । त᳓स्य यो᳓निं प᳓रि पश्य᳓न्ति᳓ धी᳓रास्त᳓न्मे म᳓नः शिव᳓सङ्कल्पमस्तु ॥ १३ ॥
मूलम्
वेदा॒हमे॒तं पुरु॑षं म॒हान्त॑मादि॒त्यव॑र्णं॒ तम॑सः प॒रस्ता॑त् । तस्य॒ योनिं॒ परि॑ प॒श्यन्ति धीरा॒स्तन्मे॒ मनः॑ शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु ॥ १३ ॥
Chaubey En
I know that great puruṣa having the colour of the sun and above darkness; the wise men know his origin; may that mind of mine be of auspicious resolution.
Chaubey हि
आदित्य के समान वर्ण वाले तथा अन्धकार से परे उस महान् पुरुष को मैं जानता हूँ । उसके मूल स्थान को विद्वान् चारों तरफ देखते हैं; वह मेरा मन शुभ संकल्प वाला हो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
अ᳓चिन्त्यं चा᳓प्रमेयं च व्यक्ताव्यक्तपरं᳓ च य᳓त् । सू᳓क्ष्मात् सू᳓क्ष्म᳓तरं ध्यानं᳓ त᳓न्मे म᳓नः शिव᳓सङ्कल्पमस्तु ॥ १४ ॥
मूलम्
अचि॑न्त्यं॒ चाप्र॑मेयं च व्यक्ताव्यक्तप॒रं च॒ यत् । सूक्ष्मा॒त् सूक्ष्मत॑रं ध्या॒नं तन्मे॒ मनः॑ शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु ॥ १४ ॥
Chaubey En
Which is above the contemplation and above the scope of knowledge; which is above the manifested and the unmanifested; which is subtler than subtle for meditation; may that mind of mine be of auspicious resolution.
Chaubey हि
जो अचिन्त्य है, जो अप्रमेय है, व्यक्त और अव्यक्त से भी जो परे है; सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतार है, जो ध्यानमग्न है; वह मेरा मन शुभ संकल्प वाला हो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
अ᳓स्ति विनाशयित्वा᳓ स᳓र्वमिदं᳓ ना᳓स्ति पु᳓नस्त᳓थैव᳓ धृष्टं᳓ ध्रुव᳓म् । अ᳓स्ति ना᳓स्ति हितं᳓ मध्यमं᳓ प᳓रं त᳓न्मे म᳓नः शिव᳓सङ्कल्पमस्तु ॥ १५ ॥ [ २९ ]
मूलम्
अस्ति॑ विनाशयि॒त्वा सर्व॑मि॒दं नास्ति॒ पुन॒स्तथै॒व धृ॒ष्टं ध्रु॒वम् । अस्ति॒ नास्ति॑ हि॒तं म॑ध्य॒मं परं॒ तन्मे॒ मनः॑ शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु ॥ १५ ॥ [ २९ ]
Chaubey En
(Which) exists even after destroying all this; which is definitely not the same again as seen before; which exists, exists not, and (which is not) placed; which is in middle and above; may that mind of mine be of auspicious resolution.
Chaubey हि
इस सबको विनष्ट कर के जो स्थित है, किन्तु पुनः उसी रूप में निश्चित ही नहीं है; नहीं है, स्थित है, मध्यम है, उससे परे है; वह मेरा मन शुभ संकल्प वाला हो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
अ᳓स्ति ना᳓स्ति विप᳓रीतो प्रवादो᳓ ऽस्ति नास्ति स᳓र्वं वा᳓ इदं᳓ गु᳓ह्यम् । अ᳓स्ति ना᳓स्ति प᳓रात्प᳓रो य᳓त् प᳓र त᳓न्मे म᳓नः शिव᳓सङ्कल्पमस्तु ॥ १६ ॥
मूलम्
अस्ति॒ नास्ति॑ वि॒परी॑तो प्रवा॒दो ऽस्ति॑ नास्ति॒ सर्वं॒ वा इ॒दं गुह्य॑म् । अस्ति॒ नास्ति॒ परा॒त्परो॒ यत् पर॒ तन्मे॒ मनः॑ शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु ॥ १६ ॥
Chaubey En
There is contradictory statement whether it exists or does not exist; it exists and does not exist, all this is in secret; which exists and does not exist, and which is greater than great; may that mind of mine be of auspicious resolution.
Chaubey हि
(वह) है, नहीं है, यह जो विपरीत वचन कहा जाता है, नहीं है अथवा यह सब गुह्य है; वह नहीं है, पर से भी परे है, उससे भी जो परे है; वह मेरा मन शुभ संकल्प वाला हो।
विश्वास-प्रस्तुतिः
प᳓रात्प᳓रतरं᳓ य᳓च्च तत्प᳓राच्चैव᳓ तत्प᳓रम् । तत्प᳓रात्प᳓रतरं ज्ञेयं᳓ त᳓न्मे म᳓नः शिव᳓सङ्कल्पमस्तु ॥ १७ ॥
मूलम्
परा॒त्पर॑त॒रं यच्च॑ त॒त्परा॑च्चै॒व त॒त्पर॑म् । त॒त्परा॒त्पर॑तरं ज्ञे॒यं तन्मे॒ मनः॑ शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु ॥ १७ ॥
Chaubey En
Which is greater than the great and again greater than that; that should be understood as greater than the great; may that mind of mine be of auspicious resolution.
Chaubey हि
जो पर से भी परतर है, उस पर से भी जो परे है; उस पर से भी परे जो जानने योग्य है, वह मेरा मन शुभ संकल्प वाला हो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
प᳓रात्प᳓रतरो ब्रह्मा᳓ तत्प᳓रात्परतो᳓ ह᳓रिः । तत्प᳓रात्परतो᳓ ह्ये३ष᳓ त᳓न्मे म᳓नः शिव᳓सङ्कल्पमस्तु ॥ १८ ॥
मूलम्
परा॒त्पर॑तरो ब्र॒ह्मा त॒त्परा॑त्पर॒तो हरिः॑ । त॒त्परा॑त्पर॒तो ह्ये॒३ष तन्मे॒ मनः॑ शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु ॥ १८ ॥
Chaubey En
Brahmā is greater than the great; Hari (i.e. Viṣṇu) is greater than Brahmā; this is again greater than that; may that mind of mine be of auspicious resolution.
Chaubey हि
पर से भी परे ब्रह्मा है; उस पर से भी परे हरि है, उस पर से भी परे निश्चित ही यह है; वह मेरा मन शुभ संकल्प वाला हो ॥ १८ ॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
गो᳓भिर्जु᳓ष्टो ध᳓नेन ह्या᳓युषा च ब᳓लेन च । प्रज᳓या पशु᳓भिः पुष्कलार्घ्यं त᳓न्मे᳓ म᳓नः शिव᳓सङ्कल्पमस्तु ॥ १९ ॥
मूलम्
गोभि॒र्जुष्टो॒ धने॑न॒ ह्यायु॑षा च॒ बले॑न च । प्र॒जया॑ प॒शुभिः॑ पुष्कलार्घ्यं॒ तन्मे मनः॑ शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु ॥ १९ ॥
Chaubey En
Which is adorned with cows (go=organs), with wealth, with longevity, with the strength, with progeny, with cattle and which is worthy of adoration by many; may that mind of mine be of auspicious resolution.
Chaubey हि
जो गायों से, धन से, आयु से, बल से, प्रजा से, तथा पशुओं से प्रसन्न है तथा उससे भी अधिक जो महनीय है; वह मेरा मन शुभ संकल्पवाला हो ॥ १९ ॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
प्र᳓यतः प्रणवो᳓ नि᳓त्यं परमं᳓ पुरुषोत्तम᳓म् । ॐका᳓रं प᳓रमात्मा᳓नं त᳓न्मे म᳓नः शिव᳓सङ्कल्पमस्तु ॥ २० ॥ [ ३० ]
मूलम्
प्रय॑तः प्रण॒वो नित्यं॑ पर॒मं पु॑रुषोत्त॒मम् । ॐका॑रं॒ पर॑मा॒त्मानं॒ तन्मे॒ मनः॑ शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु ॥ २० ॥ [ ३० ]
Chaubey En
The prolonged praṇava is eternal; and the puruṣottama is the supreme. The syllable oṁ is a great paramātman; may that mind of mine be of auspicious resolution.
Chaubey हि
निरन्तर उच्चरित प्रणव नित्य है, परम पुरुषोत्तम है, ओङ्कार रूप परमात्मा है; वह मेरा मन शुभ संकल्प वाला हो ॥ २० ॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
यो᳓ वै᳓ वे᳓दादिषु गायत्री᳓ सर्वव्यापी᳓ महेश्वरा᳓त् । य᳓द्विरुतं᳓ त᳓था वै᳓श्यं त᳓न्मे म᳓नः शिव᳓सङ्कल्पमस्तु ॥ २१ ॥
मूलम्
यो वै वेदा॑दिषु गाय॒त्री स॑र्वव्या॒पी म॑हेश्व॒रात् । यद्वि॑रु॒तं तथा॒ वैश्यं॒ तन्मे॒ मनः॑ शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु ॥ २१ ॥
Chaubey En
Which is verily Gāyatrī in the Veda, etc., all-pervasive even than Maheśavara; which is resounding and overspreading; may that mind of mine be of auspicious resolution.
Chaubey हि
जो वेदादि में गायत्रीस्वरूप है; महेश्वर से भी अधिक सर्वव्यापी है, जो (ध्वनिरूप में) सर्वत्र गूँज रहा है, तथा सर्वव्यापक है; वह मेरा मन शुभ संकल्प वाला हो ॥ २१ ॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
यो᳓ वै᳓ वे᳓द महादेवं᳓ प᳓रमं᳓ पुरुषोत्तम᳓म् । यः᳓ स᳓र्वं य᳓स्यचित्स᳓र्वं त᳓न्मे म᳓नः शिव᳓सङ्कल्पमस्तु ॥ २२ ॥
मूलम्
यो वै वेद॑ महादे॒वं पर॒मं पु॑रुषोत्त॒मम् । यः सर्वं॒ यस्य॑चि॒त्सर्वं॒ तन्मे॒ मनः॑ शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु ॥ २२ ॥
Chaubey En
Whosoever knows Mahādeva as Supreme Lord (puruṣottama); who is every thing and whose is every thing; may that mind of mine be of auspicious resolution.
Chaubey हि
जो परम पुरुषोत्तम महादेव को जानता है; जो सब कुछ तथा जिसका सब कुछ है; वह मेरा मन शुभ संकल्प वाला हो।
विश्वास-प्रस्तुतिः
यो३सौ᳓ स᳓र्वेषु वे᳓देषु पठ्य᳓ते ह्य᳙१ज᳓ ईश्वरः᳓ । अकायो᳓ नि᳓र्गुणो᳓ ऽध्यात्मा᳓ त᳓न्मे म᳓नः शिव᳓सङ्कल्पमस्तु ॥ २३ ॥
मूलम्
यो॒३सौ सर्वे॑षु॒ वेदे॑षु॒ प॒ठ्यते॒ ह्य॑१॒ज ई॑श्व॒रः । अ॒का॒यो निर्गु॒णो ऽध्या॒त्मा तन्मे॒ मनः॑ शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु ॥ २३ ॥
Chaubey En
He is read in all the Vedas as unborn and Īśvara, the Ruler; who is body-less, quality-less, and related to the Supreme ātman; may that mind of mine be of auspicious resolution.
Chaubey हि
जो वह सभी वेदों में पढ़ा जाता है; जो अजन्मा है, सबका शासक है, शरीर-रहित है, तीनों गुणों से परे है; अध्यात्म रूप है; वह मेरा मन शुभ संकल्प वाला हो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
कैलाशशिखराभासं᳓ हिमवद्गिरिसंस्थित᳓म् । नी᳓लकण्ठं त्र्य᳙क्षं च त᳓न्मे म᳓नः शिव᳓सङ्कल्पमस्तु ॥ २४ ॥
मूलम्
कै॒ला॒श॒शि॒ख॒रा॒भा॒सं हि॑मवद्गिरिसंस्थि॒तम् । नील॑कण्ठं॒ त्र्य॑क्षं च॒ तन्मे॒ मनः॑ शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु ॥ २४ ॥
Chaubey En
(Which is) shining like the summit of the Kailāsa mountain, stationed like the Himālaya mountain, dark-blue-necked and three-eyed; may that mind of mine be of auspicious resolution.
Chaubey हि
कैलास पर्वत के शिखर के समान प्रकाश वाला है; हिमवान् पर्वत पर स्थित है; नीलकण्ठ है तथा त्रिनेत्र रूप है; वह मेरा मन शुभ संकल्प वाला हो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
कैलाशशिखरे᳓ र᳓म्ये शङ्कर᳓स्य शुभे᳓ गृहे᳓ । देव᳓तास्त᳓त्र मोदन्ति त᳓न्मे म᳓नः शिव᳓सङ्कल्पमस्तु ॥ २५ ॥
मूलम्
कै॒ला॒श॒शि॒ख॒रे रम्ये॑ शङ्क॒रस्य॑ शु॒भे गृ॒हे । दे॒वता॒स्तत्र॑ मोदन्ति॒ तन्मे॒ मनः॑ शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु ॥ २५ ॥
Chaubey En
(Which resides) at the charming summit of the Kailāsa in the splendid home of Śaṅkara; there all gods enjoy; may that mind of mine be of auspicious resolution.
Chaubey हि
रमणीय कैलास के शिखर पर शङ्कर के शुभ गृह में (जो निवास करता है), वहीं देवता निवास करते हैं; वह मेरा मन शुभ संकल्प वाला हो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं᳓ त्रैलो᳓क्यं सचराचर᳓म् । उत्पादितं᳓ ज᳓गद्व्या᳙प्तं त᳓न्मे म᳓नः शिव᳓सङ्कल्पमस्तु ॥ २६ ॥
मूलम्
आ॒ब्र॒ह्म॒स्त॒म्ब॒प॒र्य॒न्तं त्रै॒लोक्यं॑ सचराच॒रम् । उ॒त्पा॒दि॒तं जग॒द्व्या॑प्तं॒ तन्मे॒ मनः॑ शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु ॥ २६ ॥
Chaubey En
(Which) has created the three lokas along with movable and immovable things from Brahmā to a clump of grass, and (which) has pervaded the entire world; may that mind of mine be of auspicious resolution.
Chaubey हि
जिसने ब्रह्म से लेकर तृणपर्यन्त तीनों लोकों के चर एवं अचर सबको उत्पन्न किया है, तथा सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त है; वह मेरा मन शुभ संकल्प वाला हो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
य᳓ इमं᳓ शिव᳓सङ्कल्पं स᳓दा ध्या᳓यन्ति ब्राह्मणाः᳓ । ते᳓ प᳓रं मो᳓क्षं गमिष्यन्ति त᳓न्मे म᳓नः शिव᳓सङ्कल्पमस्तु ॥ २७ ॥
मूलम्
य इ॒मं शि॒वस॑ङ्कल्पं॒ सदा॒ ध्याय॑न्ति ब्राह्म॒णाः । ते परं॒ मोक्षं॑ ग॒मि॒ष्य॒न्ति॒ तन्मे॒ मनः॑ शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु ॥ २७ ॥
Chaubey En
The brāhmaṇas, who meditate upon this Śivasaṅkalpa-sūkta, will attain the highest salvation. May that mind of mine be of auspicious resolution.
Chaubey हि
जो ब्राह्मण इस शिव-संकल्प (सूक्त) का सदा ध्यान करते हैं, वे परम मोक्ष को प्राप्त होंगे; वह मेरा मन शुभ संकल्प वाला हो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
त्र्य᳙म्बकं यजामहे सुगन्धिं᳓ पुष्टिव᳓र्धनम् । उर्वारुक᳓मिव ब᳓न्धनान्मृत्यो᳓र्मुक्षीय मा ऽमृ᳓तात् । त᳓न्मे म᳓नः शिव᳓सङ्कल्पमस्तु ॥ २८ ॥ [ ३१ ]
मूलम्
त्र्य॑म्बकं यजामहे सुग॒न्धिं पु॑ष्टि॒वर्ध॑नम् । उ॒र्वा॒रु॒कमि॑व॒ बन्ध॑नान्मृ॒त्योर्मु॑क्षीय॒ मा॒ ऽमृता॑त् । तन्मे॒ मनः॑ शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु ॥ २८ ॥ [ ३१ ]
Chaubey En
We worship Lord Śiva, the three-eyed, full of fragrance, and the enhancer of sustenance. May I get freedom from the death as the watermelon from its stalk, and not from immortality. May that mind of mine be of auspicious resolution.
Chaubey हि
(अग्नि-विद्युत् तथा सूर्य रूप) तीन नेत्र वाले, सुगन्ध से युक्त, पोषण-तत्त्व को बढ़ाने वाले महादेव की हम पूजा करते हैं। (हे महादेव) मैं मृत्यु से मुक्त होऊँ जैसे तरबूज (पक जाने पर) बन्धन से (मुक्त होता है), किन्तु अमृतत्त्व से अलग न होऊँ; वह मेरा मन शुभ संकल्प वाला हो ।
10.174
विश्वास-प्रस्तुतिः
या᳓सामू᳓धश्च᳓तुर्बिलं म᳓धोः पूर्णं᳓ घृत᳓स्य च । ता᳓ नः सन्तु प᳓यस्वतीर्बह्वी᳓र्गोष्ठे᳓ घृता᳓च्यः ॥ ५ ॥
मूलम्
यासा॒मूध॒श्चतु॑र्बिलं॒ मधोः॑ पू॒र्णं घृ॒तस्य॑ च । ता नः॑ सन्तु॒ पय॑स्वतीर्ब॒ह्वीर्गो॒ष्ठे घृ॒ताच्यः॑ ॥ ५ ॥
Chaubey En
May those cows, whose udder is four-holed, full of honey and clarified butter; full of milk, yielding butter, be in plenty in the cowshed for us.
Chaubey हि
जिनका चार छिद्रों वाला थन मधु तथा घृत से परिपूर्ण है, वे दूध से भरी घृत प्रवाहित करने वाली गायें हमारी गौशाला में बहुसंख्या में हों ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
उ᳓प मै᳓तु मयोभु᳓वः ऊ᳓र्जं चौ᳓जश्च बि᳓भ्रतीः । दु᳓हाना अक्षितं᳓ प᳓यो म᳓यि गोष्ठे᳓ नि᳓ वर्तध्वं य᳓था भ᳓वान्युत्तमः᳓ ॥ ६ ॥ [ ३९ ]
मूलम्
उप॒ मैतु॑ मयो॒भुवः॒ ऊर्जं॒ चौज॑श्च॒ बिभ्र॑तीः । दुहा॑ना अक्षि॒तं पयो॒ मयि॑ गो॒ष्ठे नि व॑र्तध्वं॒ यथा॒ भवा॑न्युत्त॒मः ॥ ६ ॥ [ ३९ ]
Chaubey En
Let the cows, yielding enjoyment, bringing strength and yielding imperishable milk, come to me; (O cows) return back to my cowshed, so that I may be supreme.
Chaubey हि
सुख देने वाली, ऊर्जा और बल को धारण करने वाली तथा कभी क्षीण न होने वाले दूध को देने वाली गायें हमारे पास आवें। (हे गायों) मेरी गौशाला में लौट आवो, ताकि मैं (गोधन रूप सम्पत्ति में) सबसे उत्तम होऊँ ।
10.189
विश्वास-प्रस्तुतिः
ने᳓जमेष प᳓रा पत सु᳓पुत्रः पु᳓नरा᳓ पत । अस्यै᳓ मे पुत्र᳓कामायै ग᳓र्भमा᳓ धेहि यः᳓ पु᳓मान् ॥ ४ ॥
मूलम्
नेज॑मेष॒ परा॑ पत॒ सुपु॑त्रः॒ पुन॒रा प॑त । अ॒स्यै मे॑ पु॒त्रका॑मायै॒ गर्भ॒मा धे॑हि॒ यः पुमा॑न् ॥ ४ ॥
Chaubey En
O Nejameṣa (a demon inimical to embryo), go away; O good child, come again. (O Viṣṇu,) put embryo, which is a male, in this woman desiring to have a son for me.
Chaubey हि
हे (गर्भविरोधक) नेजमेष, दूर जावो; हे (गर्भस्थ) सुपुत्र, पुनः उत्पन्न होवो । पुत्र की इच्छा करने वाली मेरी इस (स्त्री) में (हे विष्णु) गर्भ धारण कराओ, जो पुरुष है ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
य᳓थेयं᳓ पृथिवी᳓ मह्यु᳙त्ताना᳓ ग᳓र्भमाद᳓धे । एवं᳓ त्वं᳓ ग᳓र्भमा᳓ धेहि दशमे᳓ मासि᳓ सू᳓तवे ॥ ५ ॥
मूलम्
यथे॒यं पृ॑थि॒वी म॒ह्यु॑त्ता॒ना गर्भ॒मा॒दधे॑ । ए॒वं त्वं गर्भ॒मा धे॑हि दश॒मे मा॒सि सूत॑वे ॥ ५ ॥
Chaubey En
As this great earth lying supinely puts embryo in her, likewise O woman put embryo in thy womb for its getting birth in the tenth month.
Chaubey हि
जिस प्रकार यह उत्तान महती पृथिवी गर्भ धारण करती है, उसी प्रकार (हे स्त्री) दसवें महीने में पैदा होने के लिये तुम गर्भ धारण करो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वि᳓ष्णोः श्रे᳓ष्ठेन रूपे᳓णास्यां᳓ ना᳓र्यां गवीन्या᳓म् । पु᳓मांसं पुत्र᳓मा᳓ धेहि दशमे᳓ मासि᳓ सू᳓तवे ॥ ६ ॥
मूलम्
विष्णोः॒ श्रेष्ठे॑न रू॒पेणा॒स्यां नार्यां॑ गवी॒न्याम् । पुमां॑सं पु॒त्रमा धे॑हि दश॒मे मा॒सि सूत॑वे ॥ ६ ॥
Chaubey En
Put in the groins (gavini) of this lady the male child, endowed with the handsome form of Viṣṇu, to be born in the tenth month.
Chaubey हि
इस नारी की गर्भदानी (गविनी) में विष्णु के श्रेष्ठ रूप से युक्त पुरुष पुत्र को दसवें मास पैदा होने के लिये गर्भ धारण करो ।
10.192
विश्वास-प्रस्तुतिः
अ᳓नीकवन्तमूत᳓ये ऽग्निं᳓ गीर्भि᳓र्हवामहे । स᳓ नः पर्षद᳓ति द्वि᳓षः ॥ ६ ॥ [ ५३ ]
मूलम्
अनी॑कवन्तमू॒तये॒ ऽग्निं गी॒र्भिर्ह॑वामहे । स नः॑ पर्ष॒दति॒ द्विषः॑ ॥ ६ ॥ [ ५३ ]
Chaubey En
We invoke Agni, occupying the foremost rank, with laudations. May he bring us safe across the enemies.
Chaubey हि
देवताओं के मुखरूप अग्नि को अपनी रक्षा के लिये स्तुतियों से हम पुकारते हैं । वह हमसे द्वेष करने वाले शत्रुओं को दूर भगावे ।
10.197
विश्वास-प्रस्तुतिः
संज्ञा᳓नमुश᳓ना वदत् संज्ञा᳓नं व᳓रुणो वदत् । संज्ञा᳓नमि᳓न्द्रश्चाग्नि᳓श्च संज्ञा᳓नं सविता᳓ वदत् ॥ १ ॥
मूलम्
सं॒ज्ञान॑मु॒शना॑ वदत् सं॒ज्ञानं॒ वरु॑णो वदत् । सं॒ज्ञान॒मिन्द्र॑श्चा॒ग्निश्च॑ सं॒ज्ञानं॑ सवि॒ता व॑दत् ॥ १ ॥
Chaubey En
Let Uśanā speak harmony; let Varuṇa speak harmony; let Indra and Agni speak harmony; let Savitā speak harmony.
Chaubey हि
उशना (हमारे लिये) संज्ञान (सामंजस्य) बोले; इन्द्र और अग्नि (हमारे लिये) संज्ञान बोलें; सविता हमारे लिये संज्ञान बोले ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
संज्ञा᳓नं नः स्वे᳓भ्यः संज्ञा᳓नम᳓रणेभ्यः । संज्ञा᳓नमश्विना युव᳓मिहा᳓स्मा᳓सु नि᳓ यच्छतम् ॥ २ ॥
मूलम्
सं॒ज्ञानं॑ नः॒ स्वेभ्यः॑ सं॒ज्ञान॒मर॑णेभ्यः । सं॒ज्ञान॑मश्विना यु॒वमि॒हास्मासु॒ नि य॑च्छतम् ॥ २ ॥
Chaubey En
Let harmony (be) for us from kinfolk; let harmony (be) from strangers. O Aśvins, you two establish here harmony among us.
Chaubey हि
संज्ञान हमारे लिये आत्मीय जनों से होवे; संज्ञान हमारे लिये दूसरे लोगों से होवे । हे अश्विनी वो, तुम दोनों यहाँ हमारे में संज्ञान प्रतिष्ठित करो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
य᳓त्कक्षी᳓वान् संव᳓ननं पुत्रो᳓ अ᳓ङ्गिरसाम᳓वेत् । ते᳓न नो ऽद्य᳓ वि᳓श्वे देवाः᳓ सं᳓ प्रियां᳓ स᳓मजीजनन् ॥ ३ ॥
मूलम्
यत्क॒क्षीवा॑न् सं॒वन॑नं पु॒त्रो अङ्गि॑रसा॒मवे॑त् । तेन॑ नो॒ ऽद्य विश्वे॑ दे॒वाः सं प्रि॒यां सम॑जीजनन् ॥ ३ ॥
Chaubey En
The mutual fondness belonging to Kakṣivān, the son of Angiras, which protects all, with the same mutual fondness let the Viśvedevā today generate the lovely longing for us.
Chaubey हि
अङ्गिरस के पुत्र कक्षीवान् का जो संवनन (परस्पर एक-दूसरे को चाहने की भावना) है, वह सबकी रक्षा करता है उसी परस्पर एक-दूसरे को चाहने की भावना से सभी देवताओं ने हमारे लिये प्रिय संवनन उत्पन्न किया है ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सं᳓ वो म᳓नांसि जानतां स᳓मा᳓कूतीर्मनामसि । असौ᳓ यो᳓ वि᳓मना जनस्तं᳓ समा᳓वर्तयामसि ॥ ४ ॥
मूलम्
सं वो॒ मनां॑सि जानतां॒ समाकू॑तीर्मनामसि । अ॒सौ यो विम॑ना जन॒स्तं स॒माव॑र्तयामसि ॥ ४ ॥
Chaubey En
Let each of you know together each one’s minds; we think together the intentions of all. This man who is apathetic to others, we bring him together.
Chaubey हि
तुम्हारे में से प्रत्येक एक दूसरे के मनों को जाने; हम परस्पर समान उद्देश्य वाला होने के लिये एक साथ चिन्तन करते हैं । यह व्यक्ति जो (दूसरों के प्रति) वैमनस्य की भावना रखता है, उसको हम अपने साथ वापस लाते हैं ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
त᳓च्छंयो᳓रा᳓ वृणीमहे गातुं᳓ यज्ञा᳓य गातुं᳓ यज्ञ᳓पतये । दै᳓वी स्वस्ति᳓रस्तु नः स्वस्ति᳓र्मा᳓नुषेभ्यः । ऊर्ध्वं᳙ जिगातु भे᳓षजं शं᳓ नो अस्तु द्विप᳓दे शं᳓ च᳓तुष्पदे ॥ ५ ॥ [ ५८ ]
मूलम्
तच्छं॒योरा वृ॑णीमहे गा॒तुं य॒ज्ञाय॑ गा॒तुं य॒ज्ञप॑तये । दैवी॑ स्व॒स्तिर॑स्तु नः स्व॒स्तिर्मानु॑षेभ्यः । ऊ॒र्ध्वं॑ जि॑गातु॒ भेष॑जं॒ शं नो॑ अस्तु द्वि॒पदे॒ शं चतु॑ष्पदे ॥ ५ ॥ [ ५८ ]
Chaubey En
We choose the auspicious gain and removal of the disease; (we choose) for sacrifice a successful completion; we choose for the sacrificer the (fruit of the sacrifices). May there be divine welfare for us; let there be welfare for men; let the medicament go upward. Let the welfare be for bipeds; let the welfare be for quadrupeds.
Chaubey हि
हम उस कल्याण की प्राप्ति तथा अकल्याण के निवारण के लिये कामना करते हैं; यज्ञ की सफलतापूर्वक समाप्ति के लिये (कामना करते हैं); यजमान के लिये यज्ञ के सम्पूर्ण फल प्राप्ति की (कामना करते हैं) । दिव्य स्वस्ति हमारे लिये होवे; सम्पूर्ण मनुष्य के लिये स्वस्ति होवे । सभी ओषधियाँ ऊपर की ओर निकलें । हम सबका कल्याण हो; दो पैर वाले (पक्षी-आदि) का कल्याण हो; चार पैर वाले (पशु आदि) का कल्याण होवे ।
10.198
विश्वास-प्रस्तुतिः
नैर्ह᳓स्त्यं सेनाद᳓रणं परिव᳓र्त्मे तु᳓ य᳓द्धविः᳓ । ते᳓नामि᳓त्राणां बाहू᳓न् ह᳓वि᳓षा शोषयामसि ॥ १ ॥
मूलम्
नै॒र्हस्त्यं॑ सेना॒दर॑णं परि॒वर्त्मे॒ तु यद्ध॒विः । तेना॒मित्रा॑णां बा॒हून् हविषा॑ शोषयामसि ॥ १ ॥
Chaubey En
The oblation which causes (enemies) handless, and destroys their army in the path, going around with that (oblation) I torture the hands of the enemies.
Chaubey हि
जो हविः चारों तरफ से मार्ग में, शत्रुओं को हाथ-रहित करती है तथा उनकी सेना को नष्ट करती है, उसी हविः से शत्रुओं की भुजाओं को शक्तिहीन बनाता हूँ ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
प᳓रि व᳓र्त्मान्येषामि᳓न्द्रः पूषा᳓ च स᳓स्रतुः । ते᳓षां वो अग्नि᳓दग्धानामग्नि᳓गूळ्हानामि᳓न्द्रो हन्तु व᳓रंवरम् ॥ २ ॥
मूलम्
परि॒ वर्त्मा॑न्येषा॒मिन्द्रः॑ पू॒षा च॒ सस्र॑तुः । तेषां॑ वो अ॒ग्निद॑ग्धानाम॒ग्निगू॑ळ्हाना॒मिन्द्रो॑ हन्तु॒ वरं॑वरम् ॥ २ ॥
Chaubey En
May Indra and Pūṣan rush upon the (enemies) on all paths from all sides; may Indra kill among them the chieftains of your (enemies), burnt by Agni, and concealed by Agni.
Chaubey हि
इन शत्रुओं के मार्गों को इन्द्र तथा पूषा चारों तरफ से अवरुद्ध कर आगे बढ़ें । अग्नि के द्वारा जिनको जला दिया गया है तथा अग्नि के द्वारा जिन्हें छिपा दिया गया है, ऐसे तुम्हारे शत्रुओं में से मुख्य-मुख्य को इन्द्र नष्ट करे ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
ऐ᳓षु नह्य वृषाजि᳓नं हरिण᳓स्य भयं᳓ यथा । प᳓राँ अमि᳓त्राँ एजत्वर्वा᳓ची गौ᳓रुपे᳓जतु ॥ ३ ॥ [ ५९ ]
मूलम्
ऐषु॑ नह्य वृषा॒जिनं॑ हरि॒णस्य॒ भ॒यं य॑था । पराँ॑ अ॒मित्राँ॑ एजत्व॒र्वाची॒ गौरु॒पेज॑तु ॥ ३ ॥ [ ५९ ]
Chaubey En
(O Indra) tie up the skin of a bull to our shoulders as to the fear of an antelope. Let the enemies go to defeat; the cow come towards us.
Chaubey हि
(हे इन्द्र) हमारे इन योद्धाओं में वृषभ-चर्म को बांधो, जिससे हरिण की तरह (शत्रुओं में) भय उत्पन्न हो । (हे इन्द्र) शत्रुओं को पीछे धकेले (जिससे) शत्रुओं का गो-आदि धन हमारे पास आवे ।
10.199
विश्वास-प्रस्तुतिः
प्रा᳓ध्वरा᳓णां पते वसो हो᳓तर्व᳓रेण्यक्रतो । तु᳓भ्यं गायत्र᳓मृच्यते ॥ १ ॥
मूलम्
प्राध्व॒राणां॑ पते वसो॒ होत॒र्वरे॑ण्यक्रतो । तुभ्यं॑ गाय॒त्रमृ॑च्यते ॥ १ ॥
Chaubey En
O lord of sacrifices and wealth, O Hotar, O doer of excellent work, the Gāyatra Sāman is chanted for you.
Chaubey हि
हे यज्ञों के स्वामी, हे सर्वत्र वास करने वाले, हे होता, हे सर्वश्रेष्ठ कर्म करने वाले (इन्द्र), तुम्हारे लिये यह गायत्र साम गाया जाता है ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गो᳓कामो अ᳓न्नकामः प्रजा᳓काम उत᳓ कश्य᳓पः । भूतं᳓ भविष्य᳓त्प्र᳓ स्तौति मह᳓द्ब्रह्मैकमक्ष᳓रम् बहु᳓ब्रह्मैकमक्ष᳓रम् ॥ २ ॥
मूलम्
गोका॑मो॒ अन्न॑कामः प्र॒जाका॑म उ॒त क॒श्यपः॑ । भू॒तं भ॑वि॒ष्यत्प्र स्तौ॑ति म॒हद्ब्र॑ह्मैकम॒क्षर॑म् ब॒हुब्र॑ह्मैकम॒क्षर॑म् ॥ २ ॥
Chaubey En
Kaśyapa, desirous of cow, desirous of grain, and desirous of progeny, prays to the one akṣara, the symbol of great brahman, one akṣara, the symbol of many Brahman for past, (present) and future.
Chaubey हि
गायों की कामना करने वाले, अन्न की कामना करने वाले तथा प्रजा की कामना करने वाले कश्यप एकाक्षर उस ब्रह्म की स्तुति करते हैं, जो भूत, भविष्य (तथा वर्तमान) में महद्ब्रह्मस्वरूप है तथा बहुब्रह्मस्वरूप भी है ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
य᳓दक्ष᳓रं भूतकृ᳓तो वि᳓श्वे देवा᳓ उ᳓पा᳓सते । महऋ᳓षिमस्य गोप्ता᳓रं जम᳓दग्निमकुर्वत ॥ ३ ॥
मूलम्
यद॒क्षरं॑ भूत॒कृतो॒ विश्वे॑ दे॒वा उपास॑ते । म॒ह॒ऋषि॑मस्य गो॒प्तारं॑ ज॒मद॑ग्निमकुर्वत ॥ ३ ॥
Chaubey En
The syllable, which all the Devas and the creators of all the beings worship, (they) assigned Jamadagni, the great seer, as a protector of that akṣara.
Chaubey हि
जिस अक्षर ब्रह्म की, सभी प्राणी तथा विश्वेदेवा उपासना करते हैं, उस (अक्षर ब्रह्म) की रक्षा के लिये महर्षि जमदग्नि को नियुक्त किया गया ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जम᳓दग्निना प्या᳙यते छ᳓न्दोभिश्चतुरुत्तरैः᳙ । रा᳓ज्ञः सो᳓मस्य भक्षे᳓ण ब्र᳓ह्मणा वीर्या᳙वता शिवा᳓ नः प्रदि᳓शो दि᳓शः सत्या᳓ नः प्रदि᳓शो दि᳓शः ॥ ४ ॥ [ ६० ]
मूलम्
ज॒मद॑ग्निना॒ प्या॑यते॒ छन्दो॑भिश्चतुरुत्त॒रैः॑ । राज्ञः॒ सोम॑स्य भ॒क्षेण॒ ब्रह्म॑णा वी॒र्या॑वता शि॒वा नः॑ प्र॒दिशो॒ दिशः॑ स॒त्या नः॑ प्र॒दिशो॒ दिशः॑ ॥ ४ ॥ [ ६० ]
Chaubey En
Jamadagni causes to increase (this akṣara) with metres, increasing by four syllables, with the power of partaking of the king soma, and with the vigour of Brahman, the prayer. Let the sub-directions and the (main) directions be auspicious for us; let the sub-directions and the (main) directions be truthful for us.
Chaubey हि
जमदग्नि ने चतुरुत्तर अर्थात् चार की बढ़ती संख्या वाले छन्दों के द्वारा, राजा सोम के भक्षण द्वारा, वीर्ययुक्त ब्रह्म के द्वारा उस (एक अक्षर) को बढ़ाया । सम्पूर्ण दिशायें तथा विदिशायें हमारे लिये कल्याणकारी हों; सभी दिशायें तथा उपदिशायें हमारे लिये सत्य हों ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
अजो᳓ य᳓त्ते᳓जो द᳓दृशे शुक्रं᳓ ज्यो᳓तिः परो᳓गुहा । त᳓दृषिः क᳓श्यपः स्तौति सत्यं᳓ ब्र᳓ह्म चराचरं᳓ ध्रुवं᳓ ब्र᳓ह्म चराचर᳓म् ॥ ५ ॥
मूलम्
अ॒जो यत्तेजो॒ ददृ॑शे शु॒क्रं ज्योतिः॑ प॒रोगु॑हा । तदृ॑षिः॒ कश्य॑पः स्तौति स॒त्यं ब्रह्म॑ चराच॒रं ध्रु॒वं ब्रह्म॑ चराच॒रम् ॥ ५ ॥
Chaubey En
The sharpness, the brilliance, the light which Aja, the unborn, saw in the cave beyond, the seer Kaśyapa lauds that Brahman, as Truth, moving and unmoving; Brahman, as stable, moving and unmoving.
Chaubey हि
अजन्मा ब्रह्म ने जिस प्रकाशमान, ज्योतिःस्वरूप तेज को सर्वोच्च गुहा में देखा था, ऋषि कश्यप उसकी ‘चर-अचर सभी सत्यस्वरूप ब्रह्म हैं’, ‘चर-अचर सभी ध्रुवस्वरूप ब्रह्म है’, उस रूप में स्तुति करते हैं ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
त्र्यायुषं᳓ जम᳓दग्नेः क᳓श्यपस्य त्र्यायुष᳓म् । अग᳓स्त्यस्य त्र्यायुष᳓म् य᳓द्देवा᳓नां त्र्यायुषं᳓ त᳓न्मे अस्तु त्र्यायुष᳓म् ॥ ६ ॥
मूलम्
त्र्या॒यु॒षं ज॒मद॑ग्नेः॒ कश्य॑पस्य त्र्यायु॒षम् । अ॒गस्त्य॑स्य त्र्यायु॒षम् यद्दे॒वानां॑ त्र्यायु॒षं तन्मे॑ अस्तु त्र्यायु॒षम् ॥ ६ ॥
Chaubey En
The three lifespan of Jamadagni, the three lifespan of Kaśyapa; the three lifespan of Agastya, and the three lifespan of gods; may that three lifespan be for us.
Chaubey हि
जमदग्नि की तीन आयु, कश्यप की तीन आयु, अगस्त्य की तीन आयु तथा देवों की जो तीन आयु है, उन सबकी तीन आयु हमारी होवे ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
त᳓च्छंयो᳓रा᳓ वृणीमहे गातुं᳓ यज्ञा᳓य गातुं᳓ यज्ञ᳓पतये दै᳓वी स्वस्ति᳓र᳓स्तु नः स्वस्ति᳓र्मा᳓नुषेभ्यः । ऊर्ध्वं᳓ जिगातु भेषजं᳓ शं᳓ नो अस्तु द्विप᳓दे शं᳓ च᳓तुष्पदे ॥ ७ ॥ [ ६१ ]
मूलम्
तच्छं॒योरा वृ॑णीमहे गा॒तुं य॒ज्ञाय॑ गा॒तुं य॒ज्ञप॑तये॒ दैवी॑ स्व॒स्तिरस्तु॑ नः स्व॒स्तिर्मानु॑षेभ्यः । ऊ॒र्ध्वं जि॑गातु भेष॒जं शं नो॑ अस्तु द्वि॒पदे॒ शं चतु॑ष्पदे ॥ ७ ॥ [ ६१ ]
Chaubey En
We choose welfare and removal of evils; (we choose) the successful accomplishment of the religious rites and the attainment of the fruits for the sacrificer. Let the divine welfare be for us; let the welfare be for all human beings. Let the medicament go upward; let the welfare be for the bipeds; and the welfare for the quadrupeds.
Chaubey हि
हम उस कल्याण की प्राप्ति तथा अकल्याण के निवारण के लिये कामना करते हैं; यज्ञ की सफलतापूर्वक समाप्ति के लिये (कामना करते हैं); यजमान के लिये यज्ञ के सम्पूर्ण फल प्राप्ति की (कामना करते हैं) । दिव्य स्वस्ति हमारे लिये होवे; सम्पूर्ण मनुष्य के लिये स्वस्ति होवे । सभी ओषधियाँ ऊपर की ओर निकले; हम सबका कल्याण हो; दो पैर वाले (पक्षि-आदि) का कल्याण हो; चार पैर वाले (पशु आदि) का कल्याण होवे ।
10.200
विश्वास-प्रस्तुतिः
विदा᳓ मघ्वन् विदा᳓ गातु᳓म᳓नु शंसिषो दि᳓शः । शि᳓क्षा शचीनां पते पूर्वीणां᳓ पुरूवसो ॥ १ ॥
मूलम्
वि॒दा म॑घ्वन् वि॒दा गा॒तुमनु॑ शंसिषो॒ दिशः॑ । शिक्षा॑ शचीनां पते पूर्वी॒णां पु॑रूवसो ॥ १ ॥
Chaubey En
O Indra, abounding in wealth (you) know (all); (you) know the directions of the worshippers where (they want) to go. O Lord of all powers, O abounding in riches, instruct us to the ancient paths.
Chaubey हि
हे धनवान् इन्द्र! तुम (सब कुछ) जानते हो; तुम अपने स्तोता के स्वर्ग-जाने की दिशाओं को जानते हो । हे सम्पूर्ण शक्तियों के स्वामी, हे प्रचुर धन वाले, हमें प्राचीन (सत्यमार्गों) को बताओ ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आभि᳓ष्ट्व᳓मभि᳓ष्टिभिः प्र᳓चेतन प्र᳓ चेतय । इ᳓न्द्र द्युम्ना᳓य न इष᳓ एवा᳓ हि᳓ शक्रः᳓ ॥ २ ॥
मूलम्
आ॒भिष्ट्वम॒भिष्टि॑भिः॒ प्रचे॑तन॒ प्र चे॑तय । इन्द्र॑ द्यु॒म्नाय॑ न इ॒ष ए॒वा हि श॒क्रः ॥ २ ॥
Chaubey En
O knower of all, you make us know with (your) these protections; O Indra, for our divine wealth and for the accomplishment of our desire. Śakra, the powerful, is he indeed.
Chaubey हि
हे प्रकृष्ट ज्ञान वाले, इन संरक्षणों के द्वारा तुम हमें ज्ञान प्रदान करो; हे इन्द्र, हमारे लिये दिव्य धन के लिये तथा हमारी अभीष्ट इच्छा (की पूर्ति) के लिये । ऐसा ही वह (इन्द्र) शक्तिशाली है ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
राये᳓ वा᳓जाय वज्रिवः श᳓विष्ठ वज्रिन्नृ᳓ञ्ज᳓से । मं᳓हिष्ठ वज्रिन्नृ᳓ञ्ज᳓स आ᳓ याहि पिब म᳓त्स्व ॥ ३ ॥
मूलम्
रा॒ये वाजा॑य वज्रिवः॒ शवि॑ष्ठ वज्रि॒न्नृञ्जसे॑ । मंहि॑ष्ठ वज्रि॒न्नृञ्जस॒ आ या॑हि पिब॒ मत्स्व॑ ॥ ३ ॥
Chaubey En
O holder of the thunderbolt, O most powerful, O possessor of the thunderbolt, you make me competent to have wealth of knowledge and the wealth of (mental) power. O possessor of the thunderbolt, you fulfil our desires; come, drink (the soma) and be rejoiced.
Chaubey हि
हे वज्र धारण करने वाले, हे सर्वशक्तिमान, हे वज्रधारण करने वाले, तुम (आध्यात्मिक ज्ञानरूप) धन के लिये, तथा (मानसिक) बल के लिये हमें सुसज्जित करते हो, पूजनीयों में श्रेष्ठ हे वज्रधारण करने वाले, तुम (हमारे) अभीष्ट को पूर्ण करते हो; आवो (सोम का) पान करो तथा आनन्दित होवो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
विदा᳓ राये᳓ सुवी᳓र्यं भु᳓वो वा᳓जानां प᳓तिर्वशाँ अ᳓नु । मं᳓हिष्ठ वज्रिन्नृञ्ज᳓से यः᳓ श᳓विष्ठः शू᳓राणाम् ॥ ४ ॥
मूलम्
वि॒दा रा॒ये सु॒वीर्यं॒ भुवो॒ वाजा॑नां॒ पति॒र्व॒शाँ॒ अनु॑ । मंहि॑ष्ठ वज्रिन्नृ॒ञ्जसे॒ यः शवि॑ष्ठः॒ शूरा॑णाम् ॥ ४ ॥
Chaubey En
(O Indra) you know the vigour (required) for wealth; you be our lord of all kinds of wealth; (all are) under your control: Most adorable, O possessor of Vajra, fulfil our desires.
Chaubey हि
(हे इन्द्र,) तुम (आध्यात्मिक ज्ञानरूप) धन के लिये अपेक्षित बल को जानते हो; तुम सभी प्रकार के धन के स्वामी बनो; सभी तुम्हारे वश में हैं । जो शूरवीरों में अधिक बल वाले हो, वह तुम हे वज्रधारण करने वाले, हमारे सभी अभीष्ट को सिद्ध करते हो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
यो᳓ मं᳓हिष्ठो मघो᳓नां चिकित्वाँ᳙ अभि᳓ नो नय । इ᳓न्द्रो विदे त᳓मु स्तुषे वशी᳓ हि᳓ शक्रः᳓ ॥ ५ ॥ [ ६२ ]
मूलम्
यो मंहि॑ष्ठो म॒घोनां॑ चिकि॒त्वाँ॑ अ॒भि नो॑ नय । इन्द्रो॑ विदे॒ तमु॑ स्तुषे व॒शी हि श॒क्रः ॥ ५ ॥ [ ६२ ]
Chaubey En
You who are the the most adorable among the possessors of wealth, the knower of all, lead us to that (wealth). Indra knows that; I verily laud him. Śakra, the powerful, is indeed the controller (of all).
Chaubey हि
जो धनियों में सबसे अधिक पूजनीय तथा सबको जानने वाले हो, वह तुम (हे इन्द्र,) उस (धन) की ओर ले चलो । इन्द्र उसको जानता है; मैं उसकी स्तुति करता हूँ । शक्र जो सर्वशक्तिमान है, वह निश्चित ही सबको वश में रखने वाला है ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
त᳓मूत᳓ये हवामहे जे᳓तारम᳓पराजितम् । स᳓ नः पर्षद᳓ति द्वि᳓षः क्र᳓तुश्छन्द ऋतं᳓ बृह᳓त् ॥ ६ ॥
मूलम्
तमू॒तये॑ हवामहे॒ जेता॑र॒मप॑राजितम् । स नः॑ पर्ष॒दति॒ द्विषः॒ क्रतु॑श्छन्द ऋ॒तं बृ॒हत् ॥ ६ ॥
Chaubey En
We invoke him, the conquerer, and (himself) not to be conquered. May he bring us through the haters; He is the Kratu-chandas, the power covering all; he is the great ṛta, the Eternal Cosmic power.
Chaubey हि
उस सबको जीतने वाले तथा स्वयं किसी के द्वारा न जीते जाने वाले इन्द्र को अपनी रक्षा के लिये पुकारता हूँ । वह (इन्द्र) हमें हमारे द्वेष करने वालों से पार करे; वह (इन्द्र) सबको आच्छादित करने वाला क्रतुच्छन्द है; वह महान् ऋत अर्थात् सबका संचालन करने वाला गतिशील तत्त्व है ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
इ᳓न्द्रं ध᳓नस्य सात᳓ये हवामहे जे᳓तारम᳓पराजितम् । स᳓ नः पर्षद᳓ति द्वि᳓षः स᳓ नः पर्षद᳓ति स्त्रि᳓धः ॥ ७ ॥
मूलम्
इन्द्रं॒ धन॑स्य सा॒तये॑ हवामहे॒ जेता॑र॒मप॑राजितम् । स नः॑ पर्ष॒दति॒ द्विषः॒ स नः॑ पर्ष॒दति॒ स्त्रिधः॑ ॥ ७ ॥
Chaubey En
We invoke Indra, the conquerer of all and (himself) unconquered (by any one). May he bring us through the haters, may he bring us through the injurers.
Chaubey हि
धन की प्राप्ति के लिये सबको जीतने वाले तथा स्वयं किसी के द्वारा पराजित न होने वाले इन्द्र का आह्वान करता हूँ । वह हमसे द्वेष करने वालों से हमें पार करे; वह हिंसा करने वालों से हमें पार करे ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पू᳓र्वस्य य᳓त्ते अद्रिवः सुम्न᳓ आ᳓ धेहि नो वसो । पूर्द्धि᳓ शविष्ठ श᳓श्वत ई᳓शे हि᳓ शक्रः᳓ ॥ ८ ॥ [ ६३ ]
मूलम्
पूर्व॑स्य॒ यत्ते॑ अद्रिवः सु॒म्न आ धे॑हि नो वसो । पू॒र्द्धि श॑विष्ठ॒ शश्व॑त॒ ईशे॒ हि श॒क्रः ॥ ८ ॥ [ ६३ ]
Chaubey En
O armed with thunderbolt, what is in your favour the previous wealth, give it to us. O wealthy one, O most mighty one, fill us in abundance. Śakra, the powerful verily rules over all.
Chaubey हि
हे हाथ में वज्र धारण करने वाले (इन्द्र), जो तुम्हारे हाथ में, पूर्व का धन है, हे धनवान, वह हमें प्रदान करो । हे सबसे अधिक बलवान इन्द्र, हमें धन से परिपूर्ण करो । सबसे अधिक शक्ति वाला इन्द्र निश्चित ही सबका शासक है ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
नूनं᳓ तं᳓ न᳓व्यं सं᳓न्यसे प्रभो ज᳓नस्य वृत्रहन् । स᳓मन्ये᳓षु ब्रवामहै शू᳓रो यो᳓ गो᳓षु ग᳓च्छति स᳓खा सुशे᳓वो अ᳓द्वयाः ॥ ९ ॥
मूलम्
नू॒नं तं नव्यं॒ संन्य॑से प्रभो॒ जन॑स्य वृत्रहन् । सम॒न्येषु॑ ब्रवामहै॒ शूरो॒ यो गोषु॒ गच्छ॑ति॒ सखा॑ सु॒शेवो॒ अद्व॑याः ॥ ९ ॥
Chaubey En
O powerful one, O killer of Vṛtra, I put before you what is new with me. We speak together among others. The hero, the friend, the very gracious one without the second, who goes among the cows (waters).
Chaubey हि
हे प्रभो, हे वृत्रहन्, निश्चित ही जो कुछ नवीन (धन) है वह सम्यक् प्रकार से तुम्हें समर्पित करता है । हम दोनों अन्यों में एक साथ बोलें । जो शूर है, सखा है, सुन्दर सुख प्रदान करने वाला है तथा अपने समान कोई दूसरा वाला नहीं है, वह गायों (जलों) में जाता है ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
एवा᳓ ज्ये३वा᳓ । एवा᳓ ह्यग्ने । एवा᳓ हीन्द्र । एवा᳓ हि᳓ पूषन् । एवा᳓ हि᳓ देवाः ॥ १० ॥
मूलम्
ए॒वा ज्ये॒३वा । ए॒वा ह्य॑ग्ने । ए॒वा ही॑न्द्र । ए॒वा हि पू॑षन् । ए॒वा हि दे॑वाः ॥ १० ॥
Chaubey En
Thus is he like this, thus (you are) O Agni; thus (you are) O Indra; thus (you are) O Pūṣan; thus (you are) O gods.
Chaubey हि
निश्चित ही वह ऐसा ही है; ऐसा ही हो तुम हे अग्नि; ऐसा ही हो तुम हे इन्द्र; ऐसा ही हो तुम हे पूषन्; ऐसे ही हो तुम लोग हे देवो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
एवा᳓ हि᳓ शक्रो᳓ वशी᳓ हि᳓ शक्रो᳓ व᳓शाँ अ᳓नु । आ᳓यो मन्या᳓य मन्य᳓व उ᳓पो मन्या᳓य मन्य᳓व उ᳓पो हि᳓ विश्व᳓थ ॥ ११ ॥
मूलम्
ए॒वा हि श॒क्रो व॒शी हि श॒क्रो वशाँ॒ अनु॑ । आयो॑ म॒न्याय॒ म॒न्यव॒ उपो॑ म॒न्याय॒ म॒न्यव॒ उपो॒ हि वि॒श्वथ॑ ॥ ११ ॥
Chaubey En
Thus is the Śakra, verily Śakra is the controller. All are after him. O Āyu, the life, for favour and for wrath you abide near; for favour and for wrath you abide near and everywhere.
Chaubey हि
ऐसा ही वह शक्र है; सबको वश में करने वाला है; अन्य सभी उसके पीछे है; हे आयु सम्मान के लिये या क्रोध के लिये हमारे समीप रहो; सम्मान के लिये या क्रोध के लिये हमेशा तुम हमारे साथ ही हो और सर्वत्र हो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
अग्नि᳓र्देवे᳓द्धः । विदा᳓ मघवन् विदो᳓म् ॥ १२ ॥
मूलम्
अ॒ग्निर्दे॒वेद्धः॑ । वि॒दा म॑घवन् वि॒दोम् ॥ १२ ॥
Chaubey En
Agni is enkindled, O Maghavan you know, you know.
Chaubey हि
अग्नि देवों के लिये प्रज्वलित हुआ है । हे मघवन तुम जानते हो ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
ॐ न᳓मो ब्र᳓ह्मणे न᳓मो ऽस्त्वग्न᳓ये न᳓मः पृथिव्यै᳓ न᳓म ओ᳓षधीभ्यः । न᳓मो वाचे᳓ न᳓मो वाच᳓स्प᳓तये न᳓मो वि᳓ष्णवे महते᳓ करोमि ॥ १३ ॥ [ ६४ ] {१२}
मूलम्
ॐ नमो॒ ब्रह्म॑णे॒ नमो॑ ऽस्त्व॒ग्नये॒ नमः॑ पृथि॒व्यै नम॒ ओष॑धीभ्यः । नमो॑ वा॒चे नमो॑ वा॒चस्पत॑ये॒ नमो॒ विष्ण॑वे मह॒ते क॑रोमि ॥ १३ ॥ [ ६४ ] {१२}
Chaubey En
Our salutation to brahman; salutation to Agni; (salutation) to the Earth; salutation to the herbs; salutation to Speech; salutation to the Lord of speech; I offer my salutation to the great Viṣṇu.
Chaubey हि
ब्रह्म को नमस्कार है; अग्नि को नमस्कार होवे; पृथिवी को नमस्कार होवे; ओषधियॉ को नमस्कार; वाणी को नमस्कार; वाचस्पति को नमस्कार; विष्णु को नमस्कार; महान् विष्णु के लिये नमस्कार।