०६७ दीर्घायुत्वम्

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Whitney subject
  1. For long life and prosperity.
VH anukramaṇī

दीर्घायुत्वम्।
१-८ ब्रह्मा। सूर्यः। प्राजापत्या गायत्री।

Whitney anukramaṇī

[Brahman.—aṣṭāu. sāuryam. prājāpatyā gāyatrī.]

Whitney

Comment

Not found in Pāipp. According to the comm., it is used in the same manner as the two preceding hymns. ⌊Cf. khila to RV. i. 50.⌋

Translations

Translated: Griffith, ii. 319.

Griffith

A prayer for long life

०१ पश्येम शरदः

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पश्ये॑म श॒रदः॑ श॒तम् ॥

०१ पश्येम शरदः ...{Loading}...

Whitney
Translation
  1. May we see a hundred autumns.
Notes
Griffith

A hundred autumns may we see.

पदपाठः

पश्ये॑म। श॒रदः॑। श॒तम्। ६७.१।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • सूर्यः
  • ब्रह्मा
  • प्राजापत्या गायत्री
  • दीर्घायु सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

जीवन के स्वास्थ्य का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (शतम्) सौ (शरदः) वर्षों तक (पश्येम) हम देखते रहें ॥१॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - हम सब लोग प्रयत्न करें कि परमेश्वर की प्रार्थना सदा करते हुए युक्त आहार-विहार से ऐसे स्वस्थ और नीरोग रहें कि सब इन्द्रियाँ नेत्र, मुख, नासिका, मन आदि सौ वर्ष से भी अधिक पूरे दृढ़ और सचेत रहें, जिससे हम अपना कर्तव्य जीवनभर सावधानी के साथ किया करें ॥१-८॥ मन्त्र १ तथा २ ऋग्वेद में हैं-७।६६।१६ और सब सूक्त कुछ भेद से यजुर्वेद में है-३६।२४

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: १−(पश्येम) अवलोकयेम (शरदः) शरद्ऋतून्। संवत्सरान्। कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे। पा० २।३।५। इति सर्वत्र द्वितीया (शतम्) शतसंख्याकान् ॥

०२ जीवेम शरदः

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जीवे॑म श॒रदः॑ श॒तम् ॥

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Whitney
Translation
  1. May we live a hundred autumns.
Notes
Griffith

A hundred autumns may we live.

पदपाठः

जीवे॑म। श॒रदः॑। श॒तम्। ६७.२।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • सूर्यः
  • ब्रह्मा
  • प्राजापत्या गायत्री
  • दीर्घायु सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

जीवन के स्वास्थ्य का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (शतम्) सौ (शरदः) वर्षों तक (जीवेम) हम जीते रहें ॥२॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - हम सब लोग प्रयत्न करें कि परमेश्वर की प्रार्थना सदा करते हुए युक्त आहार-विहार से ऐसे स्वस्थ और नीरोग रहें कि सब इन्द्रियाँ नेत्र, मुख, नासिका, मन आदि सौ वर्ष से भी अधिक पूरे दृढ़ और सचेत रहें, जिससे हम अपना कर्तव्य जीवनभर सावधानी के साथ किया करें ॥१-८॥ मन्त्र १ तथा २ ऋग्वेद में हैं-७।६६।१६ और सब सूक्त कुछ भेद से यजुर्वेद में है-३६।२४

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: २−(जीवेम) प्राणान् धारयेम ॥

०३ बुध्येम शरदः

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बुध्ये॑म श॒रदः॑ श॒तम् ॥

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Whitney
Translation
  1. May we wake a hundred autumns.
Notes
Griffith

A hundred autumns may we know.

पदपाठः

बुध्ये॑म। श॒रदः॑। श॒तम्। ६७.३।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • सूर्यः
  • ब्रह्मा
  • प्राजापत्या गायत्री
  • दीर्घायु सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

जीवन के स्वास्थ्य का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (शतम्) सौ (शरदः) वर्षों तक (बुध्येम) हम समझते रहें ॥३॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - हम सब लोग प्रयत्न करें कि परमेश्वर की प्रार्थना सदा करते हुए युक्त आहार-विहार से ऐसे स्वस्थ और नीरोग रहें कि सब इन्द्रियाँ नेत्र, मुख, नासिका, मन आदि सौ वर्ष से भी अधिक पूरे दृढ़ और सचेत रहें, जिससे हम अपना कर्तव्य जीवनभर सावधानी के साथ किया करें ॥१-८॥ मन्त्र १ तथा २ ऋग्वेद में हैं-७।६६।१६ और सब सूक्त कुछ भेद से यजुर्वेद में है-३६।२४

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: ३−(बुध्येम) बुध्येमहि। जानीयाम ॥

०४ रोहेम शरदः

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रोहे॑म श॒रदः॑ श॒तम् ॥

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Whitney
Translation
  1. May we ascend (ruh) a hundred autumns.
Notes
Griffith

A hundred autumns may we grow.

पदपाठः

रोहे॑म। श॒रदः॑। श॒तम्। ६७.४।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • सूर्यः
  • ब्रह्मा
  • प्राजापत्या गायत्री
  • दीर्घायु सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

जीवन के स्वास्थ्य का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (शतम्) सौ (शरदः) वर्षों तक (रोहेम) हम चढ़ते रहें ॥४॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - हम सब लोग प्रयत्न करें कि परमेश्वर की प्रार्थना सदा करते हुए युक्त आहार-विहार से ऐसे स्वस्थ और नीरोग रहें कि सब इन्द्रियाँ नेत्र, मुख, नासिका, मन आदि सौ वर्ष से भी अधिक पूरे दृढ़ और सचेत रहें, जिससे हम अपना कर्तव्य जीवनभर सावधानी के साथ किया करें ॥१-८॥ मन्त्र १ तथा २ ऋग्वेद में हैं-७।६६।१६ और सब सूक्त कुछ भेद से यजुर्वेद में है-३६।२४

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: ४−(रोहेम) आरूढा भवेम ॥

०५ पूषेम शरदः

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पूषे॑म श॒रदः॑ श॒तम् ॥

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Whitney
Translation
  1. May we prosper a hundred autumns.
Notes
Griffith

A hundred autumns may we thrive.

पदपाठः

पूषे॑म। श॒रदः॑। श॒तम्। ६७.५।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • सूर्यः
  • ब्रह्मा
  • प्राजापत्या गायत्री
  • दीर्घायु सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

जीवन के स्वास्थ्य का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (शतम्) सौ (शरदः) वर्षों तक (पूषेम) हम पुष्ट होते रहें ॥५॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - हम सब लोग प्रयत्न करें कि परमेश्वर की प्रार्थना सदा करते हुए युक्त आहार-विहार से ऐसे स्वस्थ और नीरोग रहें कि सब इन्द्रियाँ नेत्र, मुख, नासिका, मन आदि सौ वर्ष से भी अधिक पूरे दृढ़ और सचेत रहें, जिससे हम अपना कर्तव्य जीवनभर सावधानी के साथ किया करें ॥१-८॥ मन्त्र १ तथा २ ऋग्वेद में हैं-७।६६।१६ और सब सूक्त कुछ भेद से यजुर्वेद में है-३६।२४

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: ५−(पूषेम) पूष पुष्टौ। पुष्टिं लभेमहि ॥

०६ भवेम शरदः

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भवे॑म श॒रदः॑ श॒तम् ॥

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Whitney
Translation
  1. May we be a hundred autumns.
Notes
Griffith

A hundred autumns may we be.

पदपाठः

भवे॑म। श॒रदः॑। श॒तम्। ६७.६।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • सूर्यः
  • ब्रह्मा
  • प्राजापत्या गायत्री
  • दीर्घायु सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

जीवन के स्वास्थ्य का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (शतम्) सौ (शरदः) वर्षों तक (भवेम) हम बने रहें ॥६॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - हम सब लोग प्रयत्न करें कि परमेश्वर की प्रार्थना सदा करते हुए युक्त आहार-विहार से ऐसे स्वस्थ और नीरोग रहें कि सब इन्द्रियाँ नेत्र, मुख, नासिका, मन आदि सौ वर्ष से भी अधिक पूरे दृढ़ और सचेत रहें, जिससे हम अपना कर्तव्य जीवनभर सावधानी के साथ किया करें ॥१-८॥ मन्त्र १ तथा २ ऋग्वेद में हैं-७।६६।१६ और सब सूक्त कुछ भेद से यजुर्वेद में है-३६।२४

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: ६−(भवेम) स्याम। वर्तेमहि ॥

०७ भूयेम शरदः

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भूये॑म श॒रदः॑ श॒तम् ॥

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Whitney
Translation
  1. May we adorn a hundred autumns.
Notes
Griffith

A hundred autumns may we bide.

पदपाठः

भूये॑म। श॒रदः॑। श॒तम्। ६७.७।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • सूर्यः
  • ब्रह्मा
  • प्राजापत्या गायत्री
  • दीर्घायु सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

जीवन के स्वास्थ्य का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (शतम्) सौ (शरदः) वर्षों तक (भूयेम) हम शुद्ध रहें ॥७॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - हम सब लोग प्रयत्न करें कि परमेश्वर की प्रार्थना सदा करते हुए युक्त आहार-विहार से ऐसे स्वस्थ और नीरोग रहें कि सब इन्द्रियाँ नेत्र, मुख, नासिका, मन आदि सौ वर्ष से भी अधिक पूरे दृढ़ और सचेत रहें, जिससे हम अपना कर्तव्य जीवनभर सावधानी के साथ किया करें ॥१-८॥ मन्त्र १ तथा २ ऋग्वेद में हैं-७।६६।१६ और सब सूक्त कुछ भेद से यजुर्वेद में है-३६।२४

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: ७−(भूयेम) भू शुद्धौ-आशीर्लिङि छान्दसं रूपम्। शुध्येम ॥

०८ भूयसीः शरदः

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भूय॑सीः श॒रदः॑ श॒तात् ॥

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Whitney
Translation
  1. More autumns than a hundred.
Notes

The comm.* reckons the hymn as only one verse; the Anukr. and all the
mss. ⌊see SPP’s ed., p. 543, note 1⌋ count eight verses, and SPP. also
adopts this. The first two verses are the last two pādas of RV. vii. 66.
16; they are found also in GGS. iii. 8. 5; a third verse, with
śṛṇuyāma, is added in PGS. i. 6. 3; ⌊MS., at iv. 9. 20, has four
pādas, with śṛṇuyā́ma pushed to the fourth place by the insertion of
prábravāma (ed. prábruv-) in the third;⌋ and the series is carried
further in VS. xxxvi. 24, which, beginning as does PGS., has five pādas,
⌊with prábravāma in the fourth, and ádīnāḥ syāma in the fifth, and⌋
with the added ending bhū́yaś ca śarádaḥ śatā́t, which needs emendation.
⌊MGS., at i. 22. 11, agrees with VS.⌋ In TA. iv. 42. 5 and in HGS. i. 7.
10 ⌊the series is carried to eight pādas⌋: these agree from 1 to 7 ⌊with
páśyema, jī́vema, nándāma, módāma, bhávāma, śṛṇávāma, prábravāma⌋, and
differ only in the eighth, where TA. has ájītāḥ syāma against ajitāḥ
syāma
of HGS.; and both have the added ending jyók ca sū́ryaṁ dṛśé. In
none of the other versions is there anything to help us with the
doubtful forms in the Atharvan. In vs. 3, most of the mss. read
búddhema (some búdhema); our emendation búdhyema is given also by
the comm., and SPP. adopts it. In vs. 5, on the other hand, the mss.,
the comm., and SPP., give the wholly anomalous pū́ṣema (= puṣṭim
labhemahi
, comm.); SPP. ought to have emended to púṣyema, as we had
done. Bhū́yema (= bhūyāsma, comm.) in vs. 7 is another impossibility
retained by SPP. In vs. 8 all the mss. have bhū́yasī ⌊or -āsī⌋; but
the comm. has -sīs, and so SPP. has the courage to adopt and read it,
as we had done before. *⌊At p. 543⁹.⌋

Griffith

A hundred, yea, and even more.

पदपाठः

भूय॑सीः। श॒रदः॑। श॒तात्। ६७.८।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • सूर्यः
  • ब्रह्मा
  • प्राजापत्या गायत्री
  • दीर्घायु सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

जीवन के स्वास्थ्य का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (शतात्) सौ से (भूयसीः) अधिक (शरदः) वर्षों तक [हम देखते रहें, जीते रहें, इत्यादि] ॥८॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - हम सब लोग प्रयत्न करें कि परमेश्वर की प्रार्थना सदा करते हुए युक्त आहार-विहार से ऐसे स्वस्थ और नीरोग रहें कि सब इन्द्रियाँ नेत्र, मुख, नासिका, मन आदि सौ वर्ष से भी अधिक पूरे दृढ़ और सचेत रहें, जिससे हम अपना कर्तव्य जीवनभर सावधानी के साथ किया करें ॥१-८॥ मन्त्र १ तथा २ ऋग्वेद में हैं-७।६६।१६ और सब सूक्त कुछ भेद से यजुर्वेद में है-३६।२४ ॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: ८−(भूयसीः) अधिकतराः (शरदः) वर्षाणि (शतात्) शतसंख्याकात् ॥