००३ सपत्नत्क्षयणो वरणमणिः

००३ सपत्नत्क्षयणो वरणमणिः ...{Loading}...

Whitney subject
  1. With an amulet of varaṇá.
VH anukramaṇī

सपत्नत्क्षयणो वरणमणिः।
१-२५ अथर्वा। वरणमणिः, वनस्पतिः चन्द्रमाः। अनुष्टुप्, २-३, ६ भुरिक् त्रिष्टुप्,
८, १३-१४ पथ्यापङ्क्तिः, ११, १६ भुरिक्, १५, १७-२५ षट्-पदा जगती।

Whitney anukramaṇī

[Atharvan.—pañcaviṅśakam . mantroktavaraṇadevatyam uta vānaspatyaṁ; cāndramasam, ānuṣṭubham: 2, 3, 6. bhurik triṣṭubh; 8, 13, 14. pathyāpan̄kti; 11, 16. bhurij; 15, 17-25. 6-p. jagatī.]

Whitney

Comment

Found also in Pāipp. xvi. (in the verse-order 1-7, 9, 8, 10-13, 15, 14, 16, 17, 19, 22, 21, 20, 18, 24; 23 and 25 are wanting). Quoted (vs. 1) in Kāuś. 19. 22, with three other hymns, in connection with the binding on of amulets for welfare. Not noticed in Vāit.

Translations

Translated: Zimmer, p. 60 (17 vss.); Henry, 9, 53; Griffith, ii. 11; Bloomfield, 81, 605.

Griffith

Purusha, Primeval Man or humanity personified

०१ अयं मे

विश्वास-प्रस्तुतिः ...{Loading}...

अ॒यं मे॑ वर॒णो म॒णिः स॑पत्न॒क्षय॑णो॒ वृषा॑।
ते॒ना र॑भस्व॒ त्वं शत्रू॒न्प्र मृ॑णीहि दुरस्य॒तः ॥

०१ अयं मे ...{Loading}...

Whitney
Translation
  1. This varaṇá [is] my rival-destroying, virile (vṛ́ṣan) amulet;
    with it do thou take hold of thy foes, slaughter thy injurers
    (durasy-).
Notes

The varaṇa is a tree, the Cratœva Roxburghii found throughout India.
The name comes doubtless from the root vṛ ‘cover, protect, ward off’;
and the hymn is full of allusions to a connection with that root; ⌊cf.
the play in iv. 7. 1 and vi. 85. 1⌋. Ppp. reads throughout varuṇa,
which is also in later Skt. recognized as a form of the tree-name.

Griffith

Here is my charm the Varana, slayer of rivals, strong in act. With this grasp thou thine enemies, crush those who fain would injure thee.

पदपाठः

अयम्। मे॒। व॒र॒णः। म॒णिः। स॒प॒त्न॒ऽक्षय॑णः। वृषा॑। तेन॑। आ। र॒भ॒स्व॒। त्वम्। शत्रू॑न्। प्र। मृ॒णी॒हि॒। दु॒र॒स्य॒तः। ३.१।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • वरणमणिः, वनस्पतिः, चन्द्रमाः
  • अथर्वा
  • अनुष्टुप्
  • सपत्नक्षयणवरणमणि सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

सब सम्पत्तियों के पाने का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (अयम्) यह (मणिः) प्रशंसनीय (वरणः) वरण [स्वीकार करने योग्य वैदिक बोध, अथवा वरना वा वरुण औषध] (मे) मेरे (सपत्नक्षयणः) वैरियों का नाश करनेवाला (वृषा) वीर्यवान् है। [हे प्राणी !] (तेन) उस से (त्वम्) तू (शत्रून्) शत्रुओं को (आ रभस्व) पकड़ ले, और (दुरस्यतः) दुराचारियों को (प्र मृणीहि) मार डाल ॥१॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - जैसे सद्वैद्य वरण आदि औषध द्वारा शरीर के रोगों का नाश करता है, वैसे ही विद्वान् वेदविद्या द्वारा आत्मिक दोष मिटावे ॥१॥ (वरणः) वरण औषधिविशेष है, उसका वर्णन इस प्रकार है−देखो भावप्रकाश, पूर्णखण्ड, वटादिवर्ग, श्लोक ५६।५७ ॥ वरुण [के नाम] वरण, सेतु, तिक्तशाक, कुमारक हैं। वरना पित्तकारक, मलभेदक, और कफ़, मूत्रकृच्छ्र, पथरी, वात, गुल्म, वात से उत्पन्न रक्तविकार और कृमि को मिटाता है, वह उष्ण, अग्नि को दीपन करनेवाला, कसैला, मधुर, कड़वा, चर्परा, रूखा और हलका होता है ॥१॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: १−(अयम्) प्रसिद्धः (मे) मम (वरणः) अ० ६।८५।१। वृञ् वरणे स्वीकरणे-युच्। स्वीकरणीयः। वेदबोधः। वरुणौषधिर्वा (मणिः) अ० १।२९।१। मण कूजे-इन्। प्रशंसनीयः (सपत्नक्षयणः) शत्रुनाशकः (वृषा) वीर्यवान् (तेन) (आरभस्व) निगृहाण (त्वम्) (शत्रून्) (प्रमृणीहि) सर्वथा मारय (दुरस्यतः) अ० १।२९।२। दुरस्य-शतृ। दुष्टीयतः। अनिष्टं कर्तुमिच्छून् ॥

०२ प्रैणाञ्छृणीहि प्र

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प्रैणा॑ञ्छृणीहि॒ प्र मृ॒णा र॑भस्व म॒णिस्ते॑ अस्तु पुरए॒ता पु॒रस्ता॑त्।
अवा॑रयन्त वर॒णेन॑ दे॒वा अ॑भ्याचा॒रमसु॑राणां॒ श्वः श्वः॑ ॥

०२ प्रैणाञ्छृणीहि प्र ...{Loading}...

Whitney
Translation
  1. Crush them, slaughter, take hold; be the amulet thy forerunner in
    front; the gods by the varaṇá warded off the hostile practice
    (abhyācārá) of the Asuras from one morrow to another.
Notes

The comm. to Prāt. iii. 80 quotes the beginning of the verse as example
of eṇa after pra. It is unnecessary to view, with the Anukr., the
verse as redundant. Ppp. combines te ‘stu in b.

Griffith

Break them in pieces; grasp them and destroy them. This Amu- let shall go before and lead thee. With Varana the Gods, from morn to morning, have warded off the Asuras’ enchantment.

पदपाठः

प्र। ए॒ना॒न्। शृ॒णी॒हि॒। प्र। मृ॒ण॒। आ। र॒भ॒स्व॒। म॒णिः। ते॒। अ॒स्तु॒। पु॒रः॒ऽए॒ता। पु॒रस्ता॑त्। अवा॑रयन्त। व॒र॒णेन॑। दे॒वाः। अ॒भि॒ऽआ॒चा॒रम्। असु॑राणाम्। श्वःऽश्वः॑। ३.२।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • वरणमणिः, वनस्पतिः, चन्द्रमाः
  • अथर्वा
  • भुरिक्त्रिष्टुप्
  • सपत्नक्षयणवरणमणि सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

सब सम्पत्तियों के पाने का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (एनान्) इनको (प्रशृणीहि) कुचल डाल, (प्रमृण) मार डाल, (आ रभस्व) पकड़ ले, (मणिः) प्रशंसनीय [वैदिक बोध] (ते) तेरा (पुर एता) अगुआ (पुरस्तात्) सामने (अस्तु) होवे। (देवाः) देवताओं [विजयी लोगों] ने (वरणेन) वरण [श्रेष्ठ वैदिक बोध वा वरना औषध] से (असुराणाम्) सुरविरोधी [दुष्टों] के (अभ्याचारम्) विरुद्ध आचरण को (श्वः श्वः) एक आगामी कल से दूसरी कल को (अर्थात् पहिले से ही) (अवारयन्त) रोका था ॥२॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - जैसे दूरदर्शी पूर्वज महात्माओं ने उत्तम ज्ञानों और उत्तम औषधों द्वारा आत्मिक और शारीरिक रोग मिटाये हैं, वैसे ही सब मनुष्य उत्तम गुणों और उत्तम ओषधियों के सेवन से उन्नति करें ॥२॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: २−(प्र) प्रकर्षेण (एनान्) शत्रून् (शृणीहि) नाशय (प्र) (मृण) (आरभस्व) (मणिः) (ते) तव (अस्तु) (पुर एता) अग्रगामी (पुरस्तात्) अग्रे (अवारयन्त) निवारितवन्तः (वरणेन) म० १। स्वीकरणीयेन। वैदिकबोधेन। वरुणौषधेन (देवाः) विजिगीषवः (अभ्याचारम्) विरुद्धाचरणम् (असुराणाम्) सुरविरोधिनाम् (श्वः श्वः) आगामिन्यागामिनि दिवसे। पूर्वविचारेणेत्यर्थः ॥

०३ अयं मणिर्वरणो

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अ॒यं म॒णिर्व॑र॒णो वि॒श्वभे॑षजः सहस्रा॒क्षो हरि॑तो हिर॒ण्ययः॑।
स ते॒ शत्रू॒नध॑रान्पादयाति॒ पूर्व॒स्तान्द॑भ्नुहि॒ ये त्वा॑ द्वि॒षन्ति॑ ॥

०३ अयं मणिर्वरणो ...{Loading}...

Whitney
Translation
  1. This amulet, the varaṇá, all-healing, thousand-eyed, yellow,
    golden—it shall make thy foes go downward; do thou, in front, damage
    them that hate thee.
Notes

Ppp. reads hiraṇmayaḥ at end of b, and yas for sa at beginning
of c. The verse is rather svarāj than bhurij.

Griffith

This charm, this Varana healeth all diseases, bright with a thou- sand eyes and golden glister. This charm shall conquer and cast down thy foemen. Be thou the first to slay the men who hate thee.

पदपाठः

अ॒यम्। म॒णिः। व॒र॒णः। वि॒श्वऽभे॑षजः। स॒ह॒स्र॒ऽअ॒क्षः। हरि॑तः। हि॒र॒ण्ययः॑। सः। ते॒। शत्रू॑न्। अध॑रान्। पा॒द॒या॒ति॒। पूर्वः॑। तान्। द॒भ्नु॒हि॒। ये। त्वा॒। द्वि॒षन्ति॑। ३.३।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • वरणमणिः, वनस्पतिः, चन्द्रमाः
  • अथर्वा
  • भुरिक्त्रिष्टुप्
  • सपत्नक्षयणवरणमणि सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

सब सम्पत्तियों के पाने का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (अयम्) यह (मणिः) प्रशंसनीय (वरणः) वरण [वरणीय, मानने योग्य, वैदिक बोध वा वरना औषध] (विश्वभेषजः) समस्त भय जीतनेवाला, (सहस्राक्षः) सहस्रों व्यवहारवाला, (हरितः) सिंह [समान] (हिरण्ययः) तेजोमय है। (सः) वह (ते) तेरे (शत्रून्) शत्रुओं को (अधरान्) नीचे (पादयाति) गिरावे, (पूर्वः) पहिले होकर तू (तान्) उन्हें (दभ्नुहि) दबा ले, (ये) जो (त्वा) तुझसे (द्विषन्ति) वैर करते हैं ॥३॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - दूरदर्शी मनुष्य आत्मिक और शारीरिक रोग मिटाकर स्वस्थ होकर आनन्द भोगे ॥३॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: ३−(अयम्) (मणिः) प्रशंसनीयः (वरणः) म० १। (विश्वभेषजः) सर्वभयजेता (सहस्राक्षः) अ० ४।१६।४। बहुव्यवहारोपेतः (हरितः) सिंहरूपः (हिरण्ययः) तेजोमयः (सः) वरणः (ते) तव (शत्रून्) (अधरान्) नीचान् (पादयाति) पातयेत् (पूर्वः) प्रथमः सन् (तान्) (दभ्नुहि) वशीकुरु (ये) (त्वा) (द्विषन्ति) वैरायन्ते ॥

०४ अयं ते

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अ॒यं ते॑ कृ॒त्यां वित॑तां॒ पौरु॑षेयाद॒यं भ॒यात्।
अ॒यं त्वा॒ सर्व॑स्मात्पा॒पाद्व॑र॒णो वा॑रयिष्यते ॥

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Whitney
Translation
  1. This varaṇá [shall ward off] the witchcraft extended for thee;
    this shall shield thee against fear arising from men, this against all
    evil.
Notes

Ppp. preserves unity of construction through the verse, by reading, for
b, c: pāuruṣeyam ayaṁ vadham: ayaṁ te sarvaṁ pāpmānaṁ.

Griffith

This will stay witchcraft wrought for thee, will guard thee from the fear of man: From all distress and misery this Varana will shield thee well.

पदपाठः

अ॒यम्। ते॒। कृ॒त्याम्। विऽत॑ताम्। पौरु॑षेयात्। अ॒यम्। भ॒यात्। अ॒यम्। त्वा॒। सर्व॑स्मात्। पा॒पात्। व॒र॒णः। वा॒र॒यि॒ष्य॒ते॒। ३.४।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • वरणमणिः, वनस्पतिः, चन्द्रमाः
  • अथर्वा
  • अनुष्टुप्
  • सपत्नक्षयणवरणमणि सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

सब सम्पत्तियों के पाने का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (अयम् अयम्) यही [वरण] (ते) तेरे लिये (वितताम्) फैली हुई (कृत्याम्) हिंसा को (पौरुषेयात्) मनुष्य से किये हुए (भयात्) भय से, और (अयम्) यह (वरणः) वरण [वैदिक बोध वा वरना औषध ही] (त्वा) तुझको (सर्वस्मात्) सब (पापात्) पाप से (वारयिष्यते) रोकेगा ॥४॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - मनुष्य वैदिक ज्ञान और पथ्य खान-पान से बलवान् होवें ॥४॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: ४−(अयम्) (ते) तुभ्यम् (कृत्याम्) अ० ४।९।५। हिंसाम् (वितताम्) विस्तृताम् (पौरुषेयात्) अ० ७।१०५।१। पुरुषेण कृतात् (भयात्) दरात् (अयम्) (त्वा) सर्वस्मात् (पापात्) दुःखात् (वरणः) म० १। वैदिकबोधो वरुणौषधं वा (वारयिष्यते) वृञ् आवरणे−लृट्। प्रतिरोत्स्यति ॥

०५ वरणो वारयाता

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व॑र॒णो वा॑रयाता अ॒यं दे॒वो वन॒स्पतिः॑।
यक्ष्मो॒ यो अ॒स्मिन्नावि॑ष्ट॒स्तमु॑ दे॒वा अ॑वीवरन् ॥

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Whitney
Translation
  1. The varaṇá, this divine forest-tree, shall ward off; the yákṣma
    that has entered into this man—that have the gods warded off.
Notes

We had this verse above, as vi. 85. 1. The Anukr. takes no notice in
either place of the deficient syllable in a. Ppp. reads here, for
b, idaṁ devo bṛhaspatiḥ; and, for c, yakṣmā pratiṣṭhā yo
‘smin;
⌊and then tam u etc.⌋.

Griffith

Guard against ill of varied kind is Varana this heavenly Plant. The Gods have stayed and driven off Consumption which had seized this man.

पदपाठः

व॒र॒णः। वा॒र॒या॒तै॒। अ॒यम्। दे॒वः। वन॒स्पतिः॑। यक्ष्मः॑। यः। अ॒स्मिन्। आऽवि॑ष्टः। तम्। ऊं॒ इति॑। दे॒वाः। अ॒वी॒व॒र॒न्। ३.५।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • वरणमणिः, वनस्पतिः, चन्द्रमाः
  • अथर्वा
  • अनुष्टुप्
  • सपत्नक्षयणवरणमणि सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

सब सम्पत्तियों के पाने का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (अयम्) यह (देवः) दिव्यगुणवाला (वनस्पतिः) सेवनीय गुणों का रक्षक (वरणः) वरण [वैदिक बोध वा वरना औषध] [उस राजरोग को] (वारयातै) हटावे (यः) जो (यक्ष्मः) राजरोग (अस्मिन्) इस [पुरुष] में (आविष्टः) प्रवेश कर गया है, (तम्) उस को (उ) निश्चय करके (देवाः) व्यवहार जाननेवाले विद्वानों ने (अवीवरन्) हटाया है ॥५॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - मनुष्य पूर्वज विद्वानों के समान प्रयत्न करके आत्मिक और शारीरिक रोगों का नाश करे ॥५॥ यह मन्त्र आ चुका है-अथर्व० ६।८५।१ ॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: ५−अयं मन्त्रो व्याख्यातः-अथर्व० ६।८५।१ ॥

०६ स्वप्नं सुप्त्वा

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स्वप्नं॑ सु॒प्त्वा यदि॒ पश्या॑सि पा॒पं मृ॒गः सृ॒तिं यति॒ धावा॒दजु॑ष्टाम्।
प॑रिक्ष॒वाच्छ॒कुनेः॑ पापवा॒दाद॒यं म॒णिर्व॑र॒णो वा॑रयिष्यते ॥

०६ स्वप्नं सुप्त्वा ...{Loading}...

Whitney
Translation
  1. If, having slept, thou shalt see an evil dream; if a wild beast
    (mṛgá) shall run a disagreeable course—from overmuch (? pari-)
    sneezing, from the evil utterance of a bird (śakúni), this amulet, the
    varaṇá, shall shield thee.
Notes

The translation implies in b emendation of yáti to yádi, which
seems unavoidable. Ppp., however, appears to have yati; it reads
further in b mṛgaśrutaṁ and ajuṣṭaṁ, in c paricchavā, ⌊and
in d vārayātāi⌋. The verse is included in the duḥsvapnanāśana
gaṇa:
see note to Kāuś. 46. 9.

Griffith

If in thy sleep thou see an evil vision, oft as the beast repeats his loathed approaches, This Amulet, this Varana will guard thee from sneeze, and from the bird’s ill-omened message.

पदपाठः

स्वप्न॑म्। सु॒प्त्वा। यदि॑। पश्या॑सि। पा॒पम्। मृ॒गः। सृ॒तिम्। यति॑। धावा॑त्। अजु॑ष्टाम्। प॒रि॒ऽक्ष॒वात्। श॒कुनेः॑। पा॒प॒ऽवा॒दात्। अ॒यम्। म॒णिः। व॒र॒णः। वा॒र॒यि॒ष्य॒ते॒। ३.६।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • वरणमणिः, वनस्पतिः, चन्द्रमाः
  • अथर्वा
  • भुरिक्त्रिष्टुप्
  • सपत्नक्षयणवरणमणि सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

सब सम्पत्तियों के पाने का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (यदि) जो तू (सुप्त्वा) सोकर (पापम्) बुरे (स्वप्नम्) स्वप्न को (पश्यासि) देखे, (यति=यदि) जो (मृगः) वनैला पशु (अजुष्टाम्) अप्रिय (सृतिम्) मार्ग में (धावात्) दौड़े। (शकुनेः) पक्षी [गिद्ध वा चील्ह] के (परिक्षवात्) नाक के फुरफुराहट से और (पापवादात्) [मुख के] कठोर शब्द से (अयम्) यह (मणिः) प्रशंसनीय (वरणः) वरण [स्वीकार करने योग्य वैदिक बोध वा वरना औषध] (वारयिष्यते) रोकेगा ॥६॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - मनुष्य आत्मिक और शारीरिक बल बढ़ाकर कुस्वप्न आदि रोगों और हिंसक पशुओं और पक्षियों की दुष्टता से निर्भय रहें ॥६॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: ६−(स्वप्नम्) सुप्तस्य मानसिकवृत्तिभेदम् (सुप्त्वा) शयित्वा (यदि) सम्भावनायाम् (पश्यासि) अवलोकेथाः (पापम्) दुःखप्रदम् (मृगः) अरण्यपशुः (सृतिम्) मार्गम् (यति) दस्य तः। यदि (धावात्) शीघ्रं गच्छेत् (अजुष्टाम्) अप्रियाम् (परिक्षवात्) टुक्षु नासाशब्दे-अप्। नासातो वायुनिःसरणजन्यशब्दात् (शकुनेः) पक्षिणः। गृध्रचिल्हादेः (पापवादात्) दुष्टशब्दात्। अन्यद् व्याख्यातम् ॥

०७ अरात्यास्त्वा निरृत्या

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अरा॑त्यास्त्वा॒ निरृ॑त्या अभिचा॒रादथो॑ भ॒यात्।
मृ॒त्योरोजी॑यसो व॒धाद्व॑र॒णो वा॑रयिष्यते ॥

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Whitney
Translation
  1. From the niggard, from perdition, from sorcery, also from fear, from
    the more violent deadly weapon of death, the varaṇá shall shield thee.
Notes

Ppp. reads, for d, tvaṁ varuṇo vāraya.

Griffith

From Mischief, from Malignity, from incantation, from alarm, From death, from stronger foeman’s stroke the Varana will guard thee well.

पदपाठः

अरा॑त्याः। त्वा॒। निःऽऋ॑त्याः। अ॒भि॒ऽचा॒रात्। अथो॒ इति॑। भ॒यात्। मृ॒त्योः। ओजी॑यसः। व॒धात्। व॒र॒णः। वा॒र॒यि॒ष्य॒ते॒। ३.७।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • वरणमणिः, वनस्पतिः, चन्द्रमाः
  • अथर्वा
  • अनुष्टुप्
  • सपत्नक्षयणवरणमणि सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

सब सम्पत्तियों के पाने का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (वरणः) वरण [स्वीकार करने योग्य वैदिक बोध वा वरना औषध] (त्वा) तुझको (अरात्याः) कंजूसी से, (निर्ऋत्याः) महामारी, (अभिचारात्) विरुद्ध आचरण से, (भयात्) भय से, (मृत्योः) मृत्यु [आलस्य आदि] से (अथो) और (ओजीयसः) अधिक बलवान् के (वधात्) वज्र से (वारयिष्यते) रोकेगा ॥७॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - मनुष्य विवेकी और बलवान् होकर सब विपत्तियों से बचे ॥७॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: ७−(अरात्याः) अ० १।२।२। रा दाने-क्तिन्। अदानात्। कृपणत्वात् (त्वा) (निर्ऋत्याः) अ० २।१०।१। कृच्छ्रापत्तेः सकाशात् (अभिचारात्) विरुद्धाचरणात् (अथो) अपि च (भयात्) (मृत्योः) मरणात्। आलस्यात् (ओजीयसः) अ० ५।२।४। बलवत्तरस्य (वधात्) वज्रात्-निघ० २।२०। (वरणः) म० १ (वारयिष्यते) ॥

०८ यन्मे माता

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यन्मे॑ मा॒ता यन्मे॑ पि॒ता भ्रात॑रो॒ यच्च॑ मे॒ स्वा यदेन॑श्चकृ॒मा व॒यम्।
ततो॑ नो वारयिष्यते॒ऽयं दे॒वो वन॒स्पतिः॑ ॥

०८ यन्मे माता ...{Loading}...

Whitney
Translation
  1. What sin my mother, what my father, and what my own brothers, what we
    ourselves have done, from that shall this divine forest-tree shield us.
Notes

Ppp. reads tasmāt for tatas in d, and, for e, idaṁ deva
bṛhaspatiḥ:
compare its version of 5 b.

Griffith

Each sinful act that we have done,–my mother, father, and my friends,– From all the guilt this heavenly Plant will be our guard and sure defence.

पदपाठः

यत्। मे॒। मा॒ता। यत्। मे॒। पि॒ता। भ्रात॑रः। यत्। च॒। स्वाः। यत्। एनः॑। चकृ॒मः। व॒यम्। ततः॑। नः॒। वा॒र॒यि॒ष्य॒ते॒। अ॒यम्। दे॒वः। वन॒स्पतिः॑। ३.८।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • वरणमणिः, वनस्पतिः, चन्द्रमाः
  • अथर्वा
  • पथ्यापङ्क्तिः
  • सपत्नक्षयणवरणमणि सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

सब सम्पत्तियों के पाने का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (यत्) जो कुछ (एनः) पाप (मे माता) मेरी माता ने, (यत्) जो कुछ (मे पिता) मेरे पिता ने, (यत्) जो कुछ (मे भ्रातरः) मेरे भाइयों ने (च) और (स्वाः) ज्ञातिवालों ने और (यत्) जो कुछ (वयम्) हमने (चकृम) किया है (ततः) उस से (नः) हमको (अयम्) यह (देवः) दिव्य गुणवाला (वनस्पतिः) सेवनीय गुणों का रक्षक [पदार्थ] (वारयिष्यते) बचावेगा ॥८॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - मनुष्यों को योग्य है कि वे अपने बन्धुओं सहित सदा विवेकी और बलवान् रह कर पाप कर्म से बचें ॥८॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: ८−(यत्) यत् किञ्चित् (मे) मम (भ्रातरः) सहोदराः (स्वाः) ज्ञातयः (एनः) पापम् (चकृम) कृतवन्तः (ततः) पापात् (नः) अस्मान् (वारयिष्यते) प्रतिरोत्स्यते (अयम्) (देवः) दिव्यगुणः (वनस्पतिः) अ० ६।८५।१। वननीयानां सेवनीयानां गुणानां पालकः। अन्यत् सुगमम् ॥

०९ वरणेन प्रव्यथिता

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व॑र॒णेन॒ प्रव्य॑थिता॒ भ्रातृ॑व्या मे॒ सब॑न्धवः।
अ॒सूर्तं॒ रजो॒ अप्य॑गु॒स्ते य॑न्त्वध॒मं तमः॑ ॥

०९ वरणेन प्रव्यथिता ...{Loading}...

Whitney
Translation
  1. Driven (vyath) forth by the varaṇá, my enemies (bhrā́tṛvya)
    [who are my] kinsmen have gone unto unlighted (? asū́rta) space
    (rájas); let them go to lowest darkness.
Notes

⌊Bloomfield discusses asū́rta, JAOS. xvi., p. clxii = PAOS. Dec. 1894.⌋

Griffith

Affrighted by the Varana let my rivals near akin to me Pass to the region void of light: to deepest darkness let them go.

पदपाठः

व॒र॒णेन॑। प्रऽव्य॑थिताः। भ्रातृ॑व्याः। मे॒। सऽब॑न्धवः। अ॒सूर्त॑म्। रजः॑। अपि॑। अ॒गुः॒। ते। य॒न्तु॒। अ॒ध॒मम्। तमः॑। ३.९।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • वरणमणिः, वनस्पतिः, चन्द्रमाः
  • अथर्वा
  • अनुष्टुप्
  • सपत्नक्षयणवरणमणि सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

सब सम्पत्तियों के पाने का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (वरणेन) वरण [स्वीकार करने योग्य वैदिक बोध वा वरना औषध] द्वारा (प्रव्यथिताः) पीड़ित किये गये (मे) मेरे (भ्रातृत्याः) वैरी लोग (सबन्धवः) अपने बन्धुओं सहित (असूर्तम्) न जाने योग्य (रजः) लोक [देश] में (अपि) ही (अगुः) गये हैं। (ते) वे लोग (अधमम्) अति नीचे (तमः) अन्धकार में (यन्तु) जावें ॥९॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - सर्वनियन्ता परमेश्वर द्वारा और बलवान् राजा की नीति से दुष्ट लोग सदा बन्दीगृह आदि भोगते रहे हैं और सदा भोगते रहें ॥९॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: ९−(वरणेन) म० १। श्रेष्ठेन (प्रव्यथिताः) अतिपीडिताः (भ्रातृव्याः) शत्रवः (मे) मम (सबन्धवः) बान्धवैः सहिताः (असूर्तम्) नसत्तनिषत्तानुत्त०। पा० ८।२।६१। नञ्+सृ गतौ-क्त, ऋकारस्य उत्वम्। असरणीयमगन्तव्यम् (रजः) लोकम् (अपि) एव (अगुः) प्रापुः (ते) शत्रवः (यन्तु) गच्छन्तु (अधमम्) अतिनीचम् (तमः) अन्धकारम् ॥

१० अरिष्टोऽहमरिष्टगुरायुष्मान्त्सर्वपूरुषः तम्

विश्वास-प्रस्तुतिः ...{Loading}...

अरि॑ष्टो॒ऽहमरि॑ष्टगु॒रायु॑ष्मा॒न्त्सर्व॑पूरुषः।
तं मायं व॑र॒णो म॒णिः परि॑ पातु दि॒शोदि॑शः ॥

१० अरिष्टोऽहमरिष्टगुरायुष्मान्त्सर्वपूरुषः तम् ...{Loading}...

Whitney
Translation
  1. Unharmed [am] I, with unharmed kine, long-lived, having all my
    men; let this amulet, the varaṇá, protect me, being such, from every
    quarter.
Notes

Ppp. reads in b -pāuruṣaḥ (as usual, where pūr- and not pur-
is meant).

Griffith

Safe are my cattle, safe am I, long-lived with all my men around. This Varana, mine Amulet, shall guard me well on every side.

पदपाठः

अरि॑ष्टः। अ॒हम्। अरि॑ष्टऽगुः। आयु॑ष्मान्। सर्व॑ऽपुरुषः। तम्। मा॒। अ॒यम्। व॒र॒णः। म॒णिः। परि॑। पा॒तु॒। दि॒शःऽदि॑शः। ३.१०।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • वरणमणिः, वनस्पतिः, चन्द्रमाः
  • अथर्वा
  • अनुष्टुप्
  • सपत्नक्षयणवरणमणि सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

सब सम्पत्तियों के पाने का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (अहम्) मैं (अरिष्टः) न हारा हुआ, (अरिष्टगुः) न हारी हुई विद्यावाला, (आयुष्मान्) उत्तम जीवनवाला और (सर्वपुरुषः) सब पुरुषोंवाला हूँ। (तम्) उस (मा) मुझको (अयम्) यह (मणिः) प्रशंसनीय (वरणः) वरण [स्वीकार करने योग्य वैदिक बोध वा वरना औषध] (दिशोदिशः) दिशा-दिशा से (परि पातु) सब प्रकार बचावे ॥१०॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - दृढ़स्वभाव विद्वान् मनुष्य शरीर से बलवान् होकर परमेश्वर में विश्वास करके परस्पर रक्षा करें ॥१०॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: १०−(अरिष्टः) अहिंसितः (अहम्) (अरिष्टगुः) गौर्वाङ्नाम-निघ० १।११। गोस्त्रियोरुपसर्जनस्य। पा० १।२।४८। गोर्ह्रस्वः। अहिंसितविद्यः (आयुष्मान्) उत्तमजीवनोपेतः (सर्वपुरुषः) सर्वपुरुषयुक्तः (तम्) तादृशम् (मा) माम् (दिशोदिशः) सर्वस्या दिशायाः सकाशात्। अन्यत् पूर्ववत् ॥

११ अयं मे

विश्वास-प्रस्तुतिः ...{Loading}...

अ॒यं मे॑ वर॒ण उर॑सि॒ राजा॑ दे॒वो वन॒स्पतिः॑।
स मे॒ शत्रू॒न्वि बा॑धता॒मिन्द्रो॒ दस्यू॑नि॒वासु॑रान् ॥

११ अयं मे ...{Loading}...

Whitney
Translation
  1. This varaṇá on my breast, king, divine forest-tree—let it drive
    (bādh) away my foes, as Indra the barbarians, the Asuras.
Notes

The verse is quoted in the schol. to Kāuś. 10. 2. Ppp. combines varuṇo
’rasi
, as the meter requires, but as the Anukr. takes pains not to
authorize. Ppp. also exchanges the second halves of vss. 11 and 12.

Griffith

This Varana is on my breast, the sovran, the celestial Plant. Let it afflict my foemen as Indra quelled fiends and Asuras.

पदपाठः

अ॒यम्। मे॒। व॒र॒णः। उर॑सि। राजा॑। दे॒वः। वन॒स्पतिः॑। सः। मे॒। शत्रू॑न्। वि। बा॒ध॒ता॒म्। इन्द्रः॑। दस्यू॑न्ऽइव। असु॑रान्। ३.११।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • वरणमणिः, वनस्पतिः, चन्द्रमाः
  • अथर्वा
  • भुरिगनुष्टुप्
  • सपत्नक्षयणवरणमणि सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

सब सम्पत्तियों के पाने का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (अयम्) यह (राजा) राजा, (देवः) दिव्य गुणवाला (वनस्पतिः) सेवनीय गुणों का रक्षक (वरणः) वरण [स्वीकार करने योग्य वैदिक बोध वा वरना औषध] (मे) मेरे (उरसि) हृदय में है। (सः) वह (मे) मेरे (शत्रून्) शत्रुओं को (वि बाधताम्) हटा देवे, (इव) जैसे (इन्द्रः) इन्द्र [बड़ा ऐश्वर्यवान् पुरुष] (असुरान्) सज्जनों के विरोधी (दस्यून्) डाकुओं को [हटाता है] ॥११॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - विद्वान् मनुष्य परमात्मा में श्रद्धा करके आत्मा और शरीर की उन्नति करता हुआ प्रतापी शूरों के समान शत्रुओं का नाश करे ॥११॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: ११−(उरसि) हृदये (राजा) ऐश्वर्यवान् (शत्रून्) अरीन् (वि) विशेषेण (बाधताम्) निवारयतु (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् (दस्यून्) चौरान् महासाहसिकान् (इव) यथा (असुरान्) सज्जनविरोधकान् ॥

१२ इमं बिभर्मि

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इ॒मं बि॑भर्मि वर॒णमायु॑ष्माञ्छ॒तशा॑रदः।
स मे॑ रा॒ष्ट्रं च॑ क्ष॒त्रं च॑ प॒शूनोज॑श्च मे दधत् ॥

१२ इमं बिभर्मि ...{Loading}...

Whitney
Translation
  1. I bear this varaṇá being long-lived, one of a hundred autumns; may
    it assign to me both kingdom and authority, to me cattle and force.
Notes

Ppp., as noted above, reads for the second half of this verse our 11
c, d, and vice versa.

Griffith

Through hundred autumn seasons, long to live, I wear this Varana. May it bestow on me great strength, cattle, and royalty and power.

पदपाठः

इ॒मम्। बि॒भ॒र्मि॒। व॒र॒णम्। आयु॑ष्मान्। श॒तऽशा॑रदः। सः। मे॒। रा॒ष्ट्रम्। च॒। क्ष॒त्रम्। च॒। प॒शून्। ओजः॑। च॒। मे॒। द॒ध॒त्। ३.१२।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • वरणमणिः, वनस्पतिः, चन्द्रमाः
  • अथर्वा
  • अनुष्टुप्
  • सपत्नक्षयणवरणमणि सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

सब सम्पत्तियों के पाने का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (आयुष्मान्) उत्तम जीवनवाला, (शतशारदः) सौ वर्ष जीवनवाला (इमम्) वरणम्) वरण [स्वीकार करने योग्य वैदिक बोध वा वरना औषध] को (बिभर्मि) धारण करता हूँ। (सः) वह (मे) मेरे (राष्ट्रम्) राज्य (च) और (क्षत्रम्) क्षत्रिय धर्म को (च) और (पशून्) पशुओं (च) और (मे) मेरे (ओजः) बल को (दधत्) पुष्ट करे ॥१२॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - मनुष्य को योग्य है कि आत्मिक और शरीरिक बल द्वारा संसार की रक्षा करें ॥१२॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: १२−(इमम्) प्रत्यक्षम् (बिभर्मि) धरामि (वरणम्) म० १। श्रेष्ठम् (आयुष्मान्) (शतशारदः) अ० १।३५।१। शतसंवत्सरयुक्तः (सः) वरणः (मे) मम (राष्ट्रम्) राज्यम् (च) (क्षत्रम्) क्षत्रियधर्मम् (च) (पशून्) (ओजः) बलम् (च) (मे) (दधत्) पोषयेत् ॥

१३ यथा वातो

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यथा॒ वातो॒ वन॒स्पती॑न्वृ॒क्षान्भ॒नक्त्योज॑सा।
ए॒वा स॒पत्ना॑न्मे भङ्ग्धि॒ पूर्वा॑ञ्जा॒ताँ उ॒ताप॑रान्वर॒णस्त्वा॒भि र॑क्षतु ॥

१३ यथा वातो ...{Loading}...

Whitney
Translation
  1. As the wind breaks with force the trees, the forest-trees, so do
    thou break my rivals, those born before and after; let the varaṇá
    defend thee.
Notes

Ppp. reads jīrṇān for vṛkṣān in b; and, in c, -tnāṅs tvaṁ
bhan̄dhi
. ⌊With d, cf. the Ppp. vs. cited under iii. 6. 2.⌋

Griffith

As with its might the wind breaks down the trees, the sovrans of the wood, So break and rend my rivals, born before me and born after. Let the Varana protect thee well.

पदपाठः

यथा॑। वातः॑। वन॒स्पती॑न्। वृ॒क्षान्। भ॒नक्ति॑। ओज॑सा। ए॒व। स॒ऽपत्ना॑न्। मे॒। भ॒ङ्ग्धि॒। पूर्वा॑न्। जा॒तान्। उ॒त। अप॑रान्। व॒र॒णः। त्वा॒। अ॒भि। र॒क्ष॒तु॒। ३.१३।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • वरणमणिः, वनस्पतिः, चन्द्रमाः
  • अथर्वा
  • पथ्यापङ्क्तिः
  • सपत्नक्षयणवरणमणि सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

सब सम्पत्तियों के पाने का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (यथा) जैसे (वातः) वायु (वनस्पतीन्) वनस्पतियों [बिना फूल-फल देनेवाले पीपल आदि] और (वृक्षान्) वृक्षों को (ओजसा) बल से (भनक्ति) तोड़ता है, (एव) वैसे ही (मे) मेरे (सपत्नान्) शत्रुओं को (भङ्ग्धि) तोड़ डाल, (पूर्वान्) पहिले (जातान्) उत्पन्नों (उत) और (अपरान्) पिछलों को (वरणः) वरण [स्वीकार करने योग्य वैदिक बोध वा वरना औषध] (त्वा) तेरी (अभि) सब ओर से (रक्षतु) रक्षा करे ॥१३॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - मनुष्य आत्मिक और शारीरिक बल से वायुसमान शीघ्रगामी होकर दोषों और शत्रुओं का नाश करे ॥१३॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: १३−(यथा) येन प्रकारेण (वातः) वायुः (वनस्पतीन्) पुष्पं विना जायमानफलान् अश्वत्थादीन् वृक्षान् (वृक्षान्) स्थावरयोनिविशेषान् विटपान् (भनक्ति) छिनत्ति (ओजसा) बलेन (एव) तथा (सपत्नान्) शत्रून् (मे) मम (भङ्ग्धि) भिन्धि (पूर्वान्) प्रथमान् (जातान्) उत्पन्नान् (उत्) अपि (अपरान्) अर्वाचीनान् (वरणः) म० १। स्वीकरणीयः (त्वा) (अभि) सर्वतः (रक्षतु) पातु ॥

१४ यथा वातश्चाग्निश्च

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यथा॒ वात॑श्चा॒ग्निश्च॑ वृ॒क्षान्प्सा॒तो वन॒स्पती॑न्।
ए॒वा स॒पत्ना॑न्मे प्साहि॒ पूर्वा॑ञ्जा॒ताँ उ॒ताप॑रान्वर॒णस्त्वा॒भि र॑क्षतु ॥

१४ यथा वातश्चाग्निश्च ...{Loading}...

Whitney
Translation
  1. As both wind and fire devour (psā) the trees, the forest-trees, so
    do thou devour my rivals, those born etc. etc.
Notes

Ppp. again relieves the redundancy of expression by reading sarvān
instead of vṛkṣān in b; also it has in c -tnāṅs tvam for
-tnān me.

Griffith

As Agni and the wind devour the trees, the sovrans of the wood, Even so devour my rivals, born before me and born after. Let the Varana protect thee well.

पदपाठः

यथा॑। वातः॑। च॒। अ॒ग्निः। च॒। वृ॒क्षान्। प्सा॒तः। वन॒स्पती॑न्। ए॒व। स॒ऽपत्ना॑न्। मे॒। प्सा॒हि॒। पूर्वा॑न्। जा॒तान्। उ॒त। अप॑रान्। व॒र॒णः। त्वा॒। अ॒भि। र॒क्ष॒तु॒। ३.१४।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • वरणमणिः, वनस्पतिः, चन्द्रमाः
  • अथर्वा
  • पथ्यापङ्क्तिः
  • सपत्नक्षयणवरणमणि सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

सब सम्पत्तियों के पाने का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (यथा) जैसे (वातः) वायु (च च) और (अग्निः) अग्नि (वृक्षान्) वृक्षों और (वनस्पतीन्) वनस्पतियों को (प्सातः) खाते हैं, (एव) वैसे ही (मे) मेरे (सपत्नान्) शत्रुओं को (प्साहि) खा ले, (पूर्वान्) पहिले…. म० १३ ॥१४॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - मन्त्र १३ के समान है ॥१४॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: १४−(प्सातः) भक्षतः (प्साहि) भक्ष। अन्यत् पूर्ववत् ॥

१५ यथा वातेन

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यथा॒ वाते॑न॒ प्रक्षी॑णा वृ॒क्षाः शेरे॒ न्य᳡र्पिताः।
ए॒वा स॒पत्नां॒स्त्वं मम॒ प्र क्षि॑णीहि॒ न्य᳡र्पय।
पूर्वा॑ञ्जा॒ताँ उ॒ताप॑रान्वर॒णस्त्वा॒भि र॑क्षतु ॥

१५ यथा वातेन ...{Loading}...

Whitney
Translation
  1. As, destroyed by the wind, the trees lie prostrate (nyàrpita), so
    do thou destroy, prostrate my rivals, those born etc. etc.
Notes

Ppp. is quite corrupt in this verse, but does not appear to offer any
variant. Prá kṣiṇīhi properly ought to be divided in our text.

Griffith

As, shattered by the tempest, trees lie withering ruined on the ground. Thus over throw my rivals thou, so crush them down and ruin. them, those born before and after. Let this Varana protect thee well.

पदपाठः

यथा॑। वाते॑न। प्रऽक्षी॑णाः। वृ॒क्षाः। शेरे॑। निऽअ॑र्पिताः। ए॒व। स॒ऽपत्ना॑न्। त्वम्। मम॑। प्र। क्षि॒णी॒हि॒। नि। अ॒र्प॒य॒। पूर्वा॑न्। जा॒तान्। उ॒त। अप॑रान्। व॒र॒णः। त्वा॒। अ॒भि। र॒क्ष॒तु॒। ३.१५।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • वरणमणिः, वनस्पतिः, चन्द्रमाः
  • अथर्वा
  • षट्पदा जगती
  • सपत्नक्षयणवरणमणि सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

सब सम्पत्तियों के पाने का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (यथा) जैसे (वातेन) वायु से (प्रक्षीणाः) नष्ट कर दिये गये और (न्यर्पिताः) झुकाये हुए (वृक्षाः) वृक्ष (शेरे=शेरते) सो जाते हैं, (एव) वैसे ही (मम) मेरे (सपत्नान्) वैरियों को (त्वम्) तू (प्र क्षिणीहि) नाश कर दे और (नि अर्पय) झुका दे, (पूर्वान्) पहिले (जातान्) उत्पन्नों (उत) और (अपरान्) पिछलों को। (वरणः) वरण [स्वीकार करने योग्य वैदिक बोध वा वरना औषध] (त्वा) तेरी (अभि) सब ओर से (रक्षतु) रक्षा करे ॥१५॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - मनुष्यों को शत्रुओं के नाश करने में सदा उद्योग करना चाहिये ॥१५॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: १५−(यथा) (वातेन) वायुना (प्रक्षीणाः) विनाशिताः (वृक्षाः) (शेरे) छान्दसं रूपम्। शेरते। वर्तन्ते (न्यर्पिताः) नीचीकृताः (प्र क्षिणीहि) विनाशय (न्यर्पय) नीचय। अन्यत् पूर्ववत् ॥

१६ तांस्त्वं प्र

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तांस्त्वं प्र च्छि॑न्द्धि वरण पु॒रा दि॒ष्टात्पु॒रायु॑षः।
य ए॑नं प॒शुषु॒ दिप्स॑न्ति॒ ये चा॑स्य राष्ट्रदि॒प्सवः॑ ॥

१६ तांस्त्वं प्र ...{Loading}...

Whitney
Translation
  1. Them, O varaṇá, do thou cut off (pra-chid), before what is
    appointed (diṣṭá), before [the end of] their life-time—them who
    strive to damage him in respect to cattle, and who are intent to damage
    his kingdom.
Notes

Ppp. reads, for b, purā dṛṣṭān parā ”yuṣaḥ. ⌊In c, pronounce
yāí ’nam.⌋

Griffith

Cut them in pieces, Varana! before their destined term of life, Those who would hurt his cattle, those who fain would harm. the realm he rules.

पदपाठः

तान्। त्वम्। प्र। छि॒न्ध्दि॒। व॒र॒ण॒। पु॒रा। दि॒ष्टात्। पु॒रा। आयु॑षः। ये। ए॒न॒म्। प॒शुषु॑। दिप्स॑न्ति। ये। च॒। अ॒स्य॒। रा॒ष्ट्र॒ऽदि॒प्सवः॑। ३.१६।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • वरणमणिः, वनस्पतिः, चन्द्रमाः
  • अथर्वा
  • भुरिगनुष्टुप्
  • सपत्नक्षयणवरणमणि सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

सब सम्पत्तियों के पाने का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (वरण) हे वरण ! [स्वीकार करने योग्य वैदिक बोध वा वरना औषध] (त्वम्) तू (तान्) उन [शत्रुओं] को (दिष्टात्) नियुक्त [प्रण] से (पुरा) पहिले और (आयुषः) आयु [के अन्त] से (पुरा) पहिले (प्र छिन्द्धि) काट डाल। (ये) जो (एनम्) इस [पुरुष] को (पशुषु) पशुओं के निमित्त (दिप्सन्ति) मार डालना चाहते हैं (च) और (ये) जो (अस्य) इसके (राष्ट्रदिप्सवः) राज्य के हानिकारक हैं ॥१६॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - मनुष्य अपनी बुद्धि और बाहुबल से प्रजा और राज्य के हानिकारक शत्रुओं का नाश करे ॥१६॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: १६−(तान्) शत्रून् (त्वम्) (प्र) (छिन्द्धि) भिन्धि (वरण) म० १। हे स्वीकरणीय (पुरा) पूर्वम् (दिष्टात्) नियुक्तात् प्रणयात् (पुरा) (आयुषः) जीवनान्तात् (ये) शत्रवः (एनम्) प्राणिनम् (पशुषु) पशूनां निमित्ते (दिप्सन्ति) दम्भितुं हन्तुमिच्छन्ति (ये) (च) (अस्य) (राष्ट्रदिप्सवः) राज्यं विनाशयितुमिच्छवः ॥

१७ यथा सूर्यो

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यथा॒ सूर्यो॑ अति॒भाति॒ यथा॑स्मि॒न्तेज॒ आहि॑तम्।
ए॒वा मे॑ वर॒णो म॒णिः की॒र्तिं भूतिं॒ नि य॑च्छतु।
तेज॑सा मा॒ समु॑क्षतु॒ यश॑सा॒ सम॑नक्तु मा ॥

१७ यथा सूर्यो ...{Loading}...

Whitney
Translation
  1. As the sun shines exceedingly, as in it brilliancy is set, so let
    the varaṇá amulet fix (ni-yam) in me fame [and] growth; let it
    sprinkle me with brilliancy; let it anoint me with glory.
Notes

Part of the mss. (P.M.D.) accent asmín in b. Ppp. reads, for c
etc., evā sapatnāṅs tvaṁ sarvān ati bhāhi syaśvo varuṇas tvā ’bhi
rakṣatu
. ⌊Either Mr. Whitney took me as locative (Gram. §492 a); or
else his ‘in me’ is an inadvertence for ‘for me.’⌋

Griffith

As Surya shines with brightest sheen, as splendour hath been stored in him, So may the Charm, the Varana, give me prosperity and fame. With lustre let it sprinkle me, and balm me with magni- ficence.

पदपाठः

यथा॑। सूर्यः॑। अ॒ति॒ऽभाति॑। यथा॑। अ॒स्मि॒न्। तेजः॑। आऽहि॑तम्। ए॒व। मे॒। व॒र॒णः। म॒णिः। की॒र्तिम्‌। भूति॑म्। नि। य॒च्छ॒तु॒। तेज॑सा। मा॒। सम्। उ॒क्ष॒तु॒। यश॑सा। सम्। अ॒न॒क्तु॒। मा॒। ३.१७।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • वरणमणिः, वनस्पतिः, चन्द्रमाः
  • अथर्वा
  • षट्पदा जगती
  • सपत्नक्षयणवरणमणि सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

सब सम्पत्तियों के पाने का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (यथा) जैसे (सूर्यः) सूर्य (अतिभाति) बड़े प्रताप से चमकता है और (यथा) जैसे (अस्मिन्) इस [सूर्य] में (तेजः) तेज (आहितम्) स्थापित है, (एव) वैसे ही (मे) मेरे लिये (मणिः) श्रेष्ठ (वरणः) वरण [स्वीकार करने योग्य, वैदिक बोध वा वरना औषध] (कीर्तिम्) कीर्ति और (भूतिम्) विभूति [ऐश्वर्य, सम्पत्ति] को (नि यच्छतु) दृढ़ करे, (तेजसा) तेज के साथ (मा) मुझे (सम्) यथावत् (उक्षतु) बढ़ावे और (यशसा) यश के साथ (मा) मुझे (सम्) यथावत् (अनक्तु) प्रकाशित करे ॥१७॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - जैसे सूर्य अपने प्रताप से जगत् में विख्यात है, वैसे ही मनुष्य ईश्वरज्ञान और शरीरबल से प्रतापी होकर संसार में अपनी कीर्ति बढ़ावे ॥१७॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: १७−(यथा) (सूर्यः) (अतिभाति) बहुप्रतापेन दीप्यते (यथा) (अस्मिन्) सूर्ये (तेजः) प्रतापः (आहितम्) स्थापितम् (एव) तथा (मे) मह्यम् (वरणः) म० १। स्वीकरणीयः (मणिः) श्रेष्ठः (कीर्तिम्) विख्यातिम् (भूतिम्) विभूतिम्। सम्पत्तिम् (नि यच्छतु) दृढीकरोतु। नियोजयतु (तेजसा) (मा) माम् (सम्) सम्यक् (उक्षतु) उक्षण उक्षतेर्वृद्धिकर्मणः-निरु० १२।९। वर्धयतु (यशसा) (सम्) (अनक्तु) अञ्जू कान्तौ। प्रदीपयतु (मा) माम् ॥

१८ यथा यशश्चन्द्रमस्यादित्ये

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यथा॒ यश॑श्च॒न्द्रम॑स्यादि॒त्ये च॑ नृ॒चक्ष॑सि।
ए॒वा मे॑ वर॒णो म॒णिः की॒र्तिं भूतिं॒ नि य॑च्छतु।
तेज॑सा मा॒ समु॑क्षतु॒ यश॑सा॒ सम॑नक्तु मा ॥

१८ यथा यशश्चन्द्रमस्यादित्ये ...{Loading}...

Whitney
Translation
  1. As glory [is] in the moon, and in the men-beholding Āditya, so let
    the varaṇá amulet etc. etc.
Notes

From here on, Ppp. has the same refrain ⌊as the Berlin text⌋, only
reading at the end mām.

Griffith

As glory dwelleth in the Moon and in the Sun who vieweth men, So may the Charm, etc.

पदपाठः

यथा॑। यशः॑। च॒न्द्रम॑सि। आ॒दि॒त्ये। च॒। नृ॒ऽचक्ष॑सि। ए॒व। मे॒। व॒र॒णः। म॒णिः। की॒र्तिम्‌। भूति॑म्। नि। य॒च्छ॒तु॒। तेज॑सा। मा॒। सम्। उ॒क्ष॒तु॒। यश॑सा। सम्। अ॒न॒क्तु॒। मा॒। ३.१८।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • वरणमणिः, वनस्पतिः, चन्द्रमाः
  • अथर्वा
  • अनुष्टुप्
  • सपत्नक्षयणवरणमणि सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

सब सम्पत्तियों के पाने का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (यथा) जैसा (यशः) यश (चन्द्रमसि) चन्द्रमा में (च) और (नृचक्षसि) मनुष्यों को देखनेवाले (आदित्ये) सूर्य में है, (एव) वैसे ही (मे) मेरे लिये…. मन्त्र —१७ ॥१८॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - मन्त्र १७ के समान है ॥१८॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: १८−(यथा) (यशः) (चन्द्रमसि) चन्द्रमण्डले (आदित्ये) अ० १।९।१। आदीप्यमाने सूर्ये (च) (नृचक्षसि) मनुष्याणां दर्शके। अन्यत् पूर्ववत् ॥

१९ यथा यशः

विश्वास-प्रस्तुतिः ...{Loading}...

यथा॒ यशः॑ पृथि॒व्यां यथा॒स्मिञ्जा॒तवे॑दसि।
ए॒वा मे॑ वर॒णो म॒णिः की॒र्तिं भूतिं॒ नि य॑च्छतु।
तेज॑सा मा॒ समु॑क्षतु॒ यश॑सा॒ सम॑नक्तु मा ॥

१९ यथा यशः ...{Loading}...

Whitney
Translation
  1. As glory [is] in the earth, as in this Jātavedas, so let the
    varaṇá amulet etc. etc.
Notes
Griffith

As glory dwelleth in the Earth, and in this Jatavedas here, So may the Charm etc.

पदपाठः

यथा॑। यशः॑। पृ॒थि॒व्याम्। यथा॑। अ॒स्मिन्। जा॒तऽवे॑दस‍ि। ए॒व। मे॒। व॒र॒णः। म॒णिः। की॒र्तिम्‌। भूति॑म्। नि। य॒च्छ॒तु॒। तेज॑सा। मा॒। सम्। उ॒क्ष॒तु॒। यश॑सा। सम्। अ॒न॒क्तु॒। मा॒। ३.१९।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • वरणमणिः, वनस्पतिः, चन्द्रमाः
  • अथर्वा
  • अनुष्टुप्
  • सपत्नक्षयणवरणमणि सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

सब सम्पत्तियों के पाने का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (यथा) जैसा (यशः) यश (पृथिव्याम्) पृथिवी में और (यथा) जैसा (अस्मिन्) इस (जातवेदसि) उत्पन्न पदार्थों में विद्यमान [अग्नि] में है, (एव) वैसे ही (मे) मेरे लिये…. मन्त्र १७ ॥१९॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - मन्त्र १७ के समान है ॥१९॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: १९−(पृथिव्याम्) भूमौ (जातवेदसि) अ० १।७।२। जातेषु वेदो विद्यमानता यस्य तस्मिन्। अग्नौ। अन्यत् पूर्ववत् ॥

२० यथा यशः

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यथा॒ यशः॑ क॒न्या᳡यां॒ यथा॒स्मिन्त्संभृ॑ते॒ रथे॑।
ए॒वा मे॑ वर॒णो म॒णिः की॒र्तिं भूतिं॒ नि य॑च्छतु।
तेज॑सा मा॒ समु॑क्षतु॒ यश॑सा॒ सम॑नक्तु मा ॥

२० यथा यशः ...{Loading}...

Whitney
Translation
  1. As glory [is] in the maiden, as in this constructed (sámbhṛta)
    chariot, so let the varaṇá amulet etc. etc.
Notes
Griffith

As glory dwelleth in a maid, and in this well-constructed car, So may the Charm, etc.

पदपाठः

यथा॑। यशः॑। क॒न्या᳡याम्। यथा॑। अ॒स्मिन्। सम्ऽभृ॑ते। रथे॑। ए॒व। मे॒। व॒र॒णः। म॒णिः। की॒र्तिम्‌। भूति॑म्। नि। य॒च्छ॒तु॒। तेज॑सा। मा॒। सम्। उ॒क्ष॒तु॒। यश॑सा। सम्। अ॒न॒क्तु॒। मा॒। ३.२०।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • वरणमणिः, वनस्पतिः, चन्द्रमाः
  • अथर्वा
  • अनुष्टुप्
  • सपत्नक्षयणवरणमणि सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

सब सम्पत्तियों के पाने का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (यथा) जैसा (यशः) यश (कन्यायाम्) कामनायोग्य [कन्या] में और (यथा) जैसा (अस्मिन्) इस (संभृते) सुन्दर बने (रथे) रथ में है, (एव) वैसे ही (मे) मेरे लिये…. म० १७ ॥२०॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - जैसे सुशीला गुणवती कन्या से माता-पिता आदि कीर्ति पाते हैं और जैसे सुन्दर यान विमान आदि से बनानेवाले की शिल्पविद्या प्रख्यात होती हैं, वैसे ही सब मनुष्य अपनी कीर्ति बढ़ावें ॥२०॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: २०−(कन्यायाम्) अ० १।१४।२। कन प्रीतौ द्युतौ गतौ च-यक्, टाप्। कमनीयाया पुत्र्याम् (संभृते) सम्यक् पोषिते रचिते (रथे) यानविमानादौ। अन्यत् पूर्ववत् ॥

२१ यथा यशः

विश्वास-प्रस्तुतिः ...{Loading}...

यथा॒ यशः॑ सोमपी॒थे म॑धुप॒र्के यथा॒ यशः॑।
ए॒वा मे॑ वर॒णो म॒णिः की॒र्तिं भूतिं॒ नि य॑च्छतु।
तेज॑सा मा॒ समु॑क्षतु॒ यश॑सा॒ सम॑नक्तु मा ॥

२१ यथा यशः ...{Loading}...

Whitney
Translation
  1. As glory [is] in Soma-drink, as in honey-mixture [is] glory, so
    let the varaṇá amulet etc. etc.
Notes
Griffith

As glory dwelleth in the draught of Soma and the honeyed. drink, So may the Charm, etc.

पदपाठः

यथा॑। यशः॑। सो॒म॒ऽपी॒थे। म॒धु॒ऽप॒र्के। यथा॑। यशः॑। ए॒व। मे॒। व॒र॒णः। म॒णिः। की॒र्तिम्‌। भूति॑म्। नि। य॒च्छ॒तु॒। तेज॑सा। मा॒। सम्। उ॒क्ष॒तु॒। यश॑सा। सम्। अ॒न॒क्तु॒। मा॒। ३.२१।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • वरणमणिः, वनस्पतिः, चन्द्रमाः
  • अथर्वा
  • अनुष्टुप्
  • सपत्नक्षयणवरणमणि सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

सब सम्पत्तियों के पाने का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (यथा) जैसा (यशः) यश (सोमपीथे) सोमरस पीने में और (यथा) जैसा (यशः) यश (मधुपर्के) मधुपर्क [मधु, दही, घी, जल और शर्करा के पञ्चमेल वा पञ्चामृत] में है, (एव) वैसे ही (मे) मेरे लिये…. म० १७ ॥२१॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - जैसे सोमरस और मधुपर्क बल बढ़ाने में प्रसिद्ध हैं, वैसे ही मनुष्य अपनी कीर्ति फैलावे ॥२१॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: २१−(सोमपीथे) पातॄतुदिवचि०। उ० २।७। पा पाने पा रक्षणे वा-थक्। सोमरसपाने (मधुपर्के) पृची संपर्चने-घञ्। मधुनः पर्को योगोऽत्र। दधि सर्पिर्जलं क्षौद्रं सिता चैतैः पञ्चभिः संयुक्ते पदार्थे। अन्यत् पूर्ववत् ॥

२२ यथा यशोऽग्निहोत्रे

विश्वास-प्रस्तुतिः ...{Loading}...

यथा॒ यशो॑ऽग्निहो॒त्रे व॑षट्का॒रे यथा॒ यशः॑।
ए॒वा मे॑ वर॒णो म॒णिः की॒र्तिं भूतिं॒ नि य॑च्छतु।
तेज॑सा मा॒ समु॑क्षतु॒ यश॑सा॒ सम॑नक्तु मा ॥

२२ यथा यशोऽग्निहोत्रे ...{Loading}...

Whitney
Translation
  1. As glory [is] in the agnihotrá, as in the váṣaṭ-utterance
    [is] glory, so let the varaṇá amulet etc. etc.
Notes

All the mss. save P.M.O. have yaśo ‘gnihotre in a, and this is
accordingly the better-supported reading.

Griffith

As glory dwells in sacrifice to Agni, and the hallowing word, So may the Charm, etc.

पदपाठः

यथा॑। यशः॑। अ॒ग्नि॒ऽहो॒त्रे। व॒ष॒ट्ऽका॒रे। यथा॑। यशः॑। ए॒व। मे॒। व॒र॒णः। म॒णिः। की॒र्तिम्‌। भूति॑म्। नि। य॒च्छ॒तु॒। तेज॑सा। मा॒। सम्। उ॒क्ष॒तु॒। यश॑सा। सम्। अ॒न॒क्तु॒। मा॒। ३.२२।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • वरणमणिः, वनस्पतिः, चन्द्रमाः
  • अथर्वा
  • अनुष्टुप्
  • सपत्नक्षयणवरणमणि सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

सब सम्पत्तियों के पाने का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (यथा) जैसा (यशः) यश (अग्निहोत्रे) अग्निहोत्र [अग्नि में सुगन्धित द्रव्य चढ़ाने वा अग्नि का शिल्प विद्या में प्रयोग करने] में और (यथा) जैसा (यशः) यश (वषट्कारे) दान कर्म में है, (एव) वैसे ही (मे) मेरे लिये…. म० १७ ॥२२॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - जैसे अग्निहोत्र से वायुशुद्धि और शिल्पविद्या की उन्नति होती है और जैसे सुपात्रों को दान देने से कीर्ति बढ़ती है, वैसे ही मनुष्य अपना यश बढ़ावें ॥२२॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: २२−(अग्निहोत्रे) हुयामाश्रुभसिभ्यस्त्रन्। उ० ४।१६८। हु दानादानादनेषु−त्रन्। अग्नौ सुगन्धितद्रव्यदाने, अथवा अग्नेः शिल्पविद्यायां प्रयोगे (वषट्कारे) अ० ५।२६।१२। वह प्रापणे डषटि। दानकर्मणि। अन्यत् पूर्ववत् ॥

२३ यथा यशो

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यथा॒ यशो॒ यज॑माने॒ यथा॒स्मिन्य॒ज्ञ आहि॑तम्।
ए॒वा मे॑ वर॒णो म॒णिः की॒र्तिं भूतिं॒ नि य॑च्छतु।
तेज॑सा मा॒ समु॑क्षतु॒ यश॑सा॒ सम॑नक्तु मा ॥

२३ यथा यशो ...{Loading}...

Whitney
Translation
  1. As glory [is] set in the sacrificer, as in this sacrifice, so let
    the varaṇá amulet etc. etc.
Notes

Wanting in Ppp., as above noted.

Griffith

As glory is bestowed upon the patron and this sacrifice, So may the Charm, etc.

पदपाठः

यथा॑। यशः॑। यज॑माने। यथा॑। अ॒स्मिन्। य॒ज्ञे। आऽहि॑तम्। ए॒व। मे॒। व॒र॒णः। म॒णिः। की॒र्तिम्‌। भूति॑म्। नि। य॒च्छ॒तु॒। तेज॑सा। मा॒। सम्। उ॒क्ष॒तु॒। यश॑सा। सम्। अ॒न॒क्तु॒। मा॒। ३.२३।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • वरणमणिः, वनस्पतिः, चन्द्रमाः
  • अथर्वा
  • अनुष्टुप्
  • सपत्नक्षयणवरणमणि सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

सब सम्पत्तियों के पाने का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (यथा) जैसा (यशः) यश (यजमाने) यजमान [देवपूजक, सङ्गतिकारक और दानी] में और (यथा) जैसा [यश] (अस्मिन्) इस (यज्ञे) यज्ञ [देवपूजा, संगतिकरण और दान] में (आहितम्) स्थापित है, (एव) वैसे ही (मे) मेरे लिये…. म० १७ ॥२३॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - स्पष्ट है ॥२३॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: २३−(यजमाने) देवपूजासंगतिकारकदानशीले (यज्ञे) देवपूजासंगतिकारकदानकर्मणि (आहितम्) स्थापितम्। अन्यत् पूर्ववत् ॥

२४ यथा यशः

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यथा॒ यशः॑ प्र॒जाप॑तौ॒ यथा॒स्मिन्प॑रमे॒ष्ठिनि॑।
ए॒वा मे॑ वर॒णो म॒णिः की॒र्तिं भूतिं॒ नि य॑च्छतु।
तेज॑सा मा॒ समु॑क्षतु॒ यश॑सा॒ सम॑नक्तु मा ॥

२४ यथा यशः ...{Loading}...

Whitney
Translation
  1. As glory [is] in Prajāpati, as in this most exalted one, so let
    the varaṇá amulet etc. etc.
Notes

Ppp. reads jātavedasi instead of parameṣṭhini.

Griffith

As glory dwelleth in the Lord of Life and in this God Supreme,. So may the Charm, etc.

पदपाठः

यथा॑। यशः॑। प्र॒जाऽप॑तौ। यथा॑। अ॒स्मिन्। प॒र॒मे॒ऽस्थिनि॑। ए॒व। मे॒। व॒र॒णः। म॒णिः। की॒र्तिम्‌। भूति॑म्। नि। य॒च्छ॒तु॒। तेज॑सा। मा॒। सम्। उ॒क्ष॒तु॒। यश॑सा। सम्। अ॒न॒क्तु॒। मा॒। ३.२४।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • वरणमणिः, वनस्पतिः, चन्द्रमाः
  • अथर्वा
  • अनुष्टुप्
  • सपत्नक्षयणवरणमणि सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

सब सम्पत्तियों के पाने का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (यथा) जैसा (यशः) यश (प्रजापतौ) प्रजापालक [राजा] में और (यथा) जैसा [यश] (अस्मिन्) इस (परमेष्ठिनि) सब से ऊँची स्थितिवाले [परमात्मा] में है, (एव) वैसे ही (मे) मेरे लिये… म० १७ ॥२४॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - स्पष्ट है ॥२४॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: २४−(प्रजापतौ) प्रजापालके नृपतौ (परमेष्ठिनि) सर्वोपरिस्थिते परमात्मनि। अन्यत् पूर्ववत् ॥

२५ यथा देवेष्वमृतम्

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यथा॑ दे॒वेष्व॒मृतं॒ यथै॑षु स॒त्यमाहि॑तम्।
ए॒वा मे॑ वर॒णो म॒णिः की॒र्तिं भूतिं॒ नि य॑च्छतु।
तेज॑सा मा॒ समु॑क्षतु॒ यश॑सा॒ सम॑नक्तु मा ॥

२५ यथा देवेष्वमृतम् ...{Loading}...

Whitney
Translation
  1. As in the gods [is] immortality (amṛ́ta), as in them is set
    truth, so let the varaṇá amulet etc. etc.
Notes

⌊The quoted Anukr. seems to say “varaṇāu” (intending varaṇo?).⌋

Griffith

As immortality and truth have been established in the Gods, So may the Charm, the Varana, give me prosperity and fame. With lustre let it sprinkle me, and balm me with magnificence.

पदपाठः

यथा॑। दे॒वेषु॑। अ॒मृत॑म्। यथा॑। ए॒षु॒। स॒त्यम्। आऽहि॑तम्। ए॒व। मे॒। व॒र॒णः। म॒णिः। की॒र्तिम्। भूति॑म्। नि। य॒च्छ॒तु॒। तेज॑सा। मा॒। सम्। उ॒क्ष॒तु॒। यश॑सा। सम्। अ॒न॒क्तु॒। मा॒। ३.२५।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • वरणमणिः, वनस्पतिः, चन्द्रमाः
  • अथर्वा
  • षट्पदा जगती
  • सपत्नक्षयणवरणमणि सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

सब सम्पत्तियों के पाने का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (यथा) जैसे (देवेषु) विजय चाहनेवालों में (अमृतम्) अमरपन [पुरुषार्थ] और (यथा) जैसा (एषु) इनमें (सत्यम्) सत्य (आहितम्) स्थापित है, (एव) वैसे ही (मे) मेरे लिये (मणिः) श्रेष्ठ (वरणः) वरण [स्वीकार करने योग्य वैदिक बोध वा वरना औषध] (कीर्तिम्) कीर्ति और (भूतिम्) विभूति [ऐश्वर्य, सम्पत्ति] को (नि यच्छतु) दृढ़ करे, (तेजसा) तेज के साथ (मा) मुझे (सम्) यथावत् (उक्षतु) बढ़ावे और (यशसा) यश के साथ (मा) मुझे (सम्) यथावत् (अनक्तु) प्रकाशित करे ॥२५॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - जैसे विजयी शूरों में पुरुषार्थ और सत्य व्रत धारण होता है, वैसे ही मनुष्य ईश्वरज्ञान और शरीरबल से प्रतापी होकर संसार में अपनी कीर्ति बढ़ावे ॥२५॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: २५−(देवेषु) विजिगीषुषु शूरेषु (अमृतम्) अमरणम्। पौरुषम् (सत्यम्) सत्यव्रतम्। अन्यत् पूर्ववत् म० १७ ॥