१४१ गोकर्णयोर्लक्ष्यकरणम्

१४१ गोकर्णयोर्लक्ष्यकरणम् ...{Loading}...

Whitney subject
  1. With marking of cattle’s ears.
VH anukramaṇī

गोकर्णयोर्लक्ष्यकरणम्।
१-३ विश्वामित्रः। अश्विनौ। अनुष्टुप्।

Whitney anukramaṇī

[Viśvāmitra.—āśvinam. ānuṣṭubham.]

Whitney

Comment

Found also in Pāipp. xix. (in the verse-order 1, 3, 2). Used by Kāuś. (23. 12-16) in a ceremony for welfare called citrākarman: after due preparation and ceremony, the ears are cut with vs. 2, and the blood is wiped off and eaten (by the creature, comm.) with vs. 3. The hymn is reckoned (note to 19. 1) to the puṣṭika mantras. The schol. also uses vs. 2 in the ceremony of letting loose a bull (note to 24. 19).

Translations

Translated: Ludwig, p. 469; Zimmer, p. 234; Griffith, i. 324.

०१ वायुरेनाः समाकरत्त्वष्टा

विश्वास-प्रस्तुतिः ...{Loading}...

वा॒युरे॑नाः स॒माक॑र॒त्त्वष्टा॒ पोषा॑य ध्रियताम्।
इन्द्र॑ आभ्यो॒ अधि॑ ब्रवद्रु॒द्रो भू॒म्ने चि॑कित्सतु ॥

०१ वायुरेनाः समाकरत्त्वष्टा ...{Loading}...

Whitney
Translation
  1. May Vāyu collect them; let Tvashṭar stay fast in order to [their]
    prosperity; may Indra bless them; let Rudra take care for [their]
    numbers.
Notes

Samā́karat (p. sam॰ā́karat) might, of course, also be indicative
(sam-ā́-akarat). Ppp., in c, combines indrā ”bhyo, and reads
bruvat; in d, it has ‘va gachatu for cikitsatu. The comm.
renders dhriyatām by dhārayatu, and d by
pādāsyādirogaparihāreṇa bahvīḥ karotu.

Griffith

Vayu collected these: to find their sustenance be Tvashtar’s care: May Indra bless and comfort them, and Rudra look that they increase.

पदपाठः

वा॒युः। ए॒नाः॒। स॒म्ऽआक॑रत्। त्वष्टा॑। पोषा॑य। ध्रि॒य॒ता॒म्। इन्द्रः॑। आ॒भ्यः॒। अधि॑। ब्र॒व॒त्। रु॒द्रः। भू॒म्ने। चि॒कि॒त्स॒तु॒। १४१.१।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • अश्विनौ
  • विश्वामित्र
  • अनुष्टुप्
  • गोकर्णलक्ष्यकरण सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

वृद्धि करने का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (वायुः) शीघ्रगामी आचार्य (एनाः) इन [प्रजाओं] को (समाकरत्) एकत्र करे, (त्वष्टा) सूक्ष्मदर्शी वह (पोषाय) [उनके मानसिक और शारीरिक] पोषण के लिये (ध्रियताम्) स्थिर रहे। (इन्द्रः) बड़े ऐश्वर्यवाला वही (आभ्यः) इन [प्रजाओं] से (अधि) अनुग्रहपूर्वक (ब्रवत्) बोले, (रुद्रः) ज्ञानदाता अध्यापक (भूम्ने) उनकी वृद्धि के लिये (चिकित्सतु) शासन करे ॥१॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - जितेन्द्रिय दूरदर्शी आचार्य विद्यालय में ब्रह्मचारियों को उत्तम विद्या से समृद्ध करे ॥१॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: १−(वायुः) शीघ्रगाम्याचार्यः (एनाः) प्रजाः। विद्यार्थिगणान् (समाकरत्) करोतेर्लेट्। संयोजयेत् (त्वष्टा) अ० २।५।६। त्वक्षू तनूकरणे−तृन्। सूक्ष्मदर्शी (पोषाय) मानसिकशारीरिकपोषणाय (ध्रियताम्) धृङ् अवस्थाने। स्थिरो भवतु (इन्द्रः) परमैश्वर्यवानाचार्यः (आभ्यः) प्रजाभ्यः (अधि) अधिकमनुग्रहपूर्वकम् (ब्रवत्) वदेत् (रुद्रः) अ० २।२७।६। रुत् ज्ञानं राति ददातीति यः ज्ञानदाता (भूम्ने) अ० ५।२८।३। बहुत्वाय। वर्धनाय (चिकित्सतु) कित व्याधिप्रतीकारे निग्रहे अपनयने नाशने संशये च। गुप्तिज्किद्भ्यः सन्। पा० ३।१।५। इति कितेः सन्। निगृह्णातु। शास्तु ॥

०२ लोहितेन स्वधितिना

विश्वास-प्रस्तुतिः ...{Loading}...

लोहि॑तेन॒ स्वधि॑तिना मिथु॒नं कर्ण॑योः कृधि।
अक॑र्तामश्विना॒ लक्ष्म॒ तद॑स्तु प्र॒जया॑ ब॒हु ॥

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Whitney
Translation
  1. With the red knife (svádhiti), make thou a pair (mithuná) on
    [their] two ears; the Aśvins have made the mark; be that numerous by
    progeny.
Notes

The comm. explains mithunam as strīpuṅsātmakaṁ cihnam, and regards
it as applied to the calf’s ears. ⌊If the comm. is correct on this
point, as is altogether likely, this marking the cattle’s ears with
marks resembling the genitals is a bit of symbolism most interesting to
the student of folk-lore.⌋ The ‘red’ knife is doubtless of copper ⌊so
also the comm.⌋. Ppp. reads lakṣmi in c (but lakṣma in vs. 3).
MB. (i. 8. 7) has the first half-verse, with kṛtam for kṛdhi.

Griffith

Take thou the iron axe and make a pair by marks upon their ears. This sign the Asvins have impressed: let these increase and multiply.

पदपाठः

लोहि॑तेन। स्वऽधि॑तिना। मि॒थु॒नम्। कर्ण॑योः। कृ॒धि॒। अक॑र्ताम्‌। अ॒श्विना॑। लक्ष्म॑। तत्। अ॒स्तु॒। प्र॒ऽजया॑। ब॒हु। १४१.२।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • अश्विनौ
  • विश्वामित्र
  • अनुष्टुप्
  • गोकर्णलक्ष्यकरण सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

वृद्धि करने का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - [हे आचार्य !] (लोहितेन) प्रकाश के साथ और (स्वधितिना) और आत्मधारण सामर्थ्य के साथ (कर्णयोः) हमारे दोनों कानों में (मिथुनम्) विज्ञान (कृधि) कर। (अश्विना) कामों में व्याप्तिवाले माता-पिता ने (लक्ष्म) [हम में] शुभ लक्षण (अकर्ताम्) किया है (तत्) वह [शुभलक्षण] (प्रजया) सन्तान के साथ (बहु) अधिक समृद्ध (अस्तु) होवे ॥२॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - जहाँ गुणी माता-पिता और आचार्य बालकों के शिक्षक होते हैं, वहाँ बालक गुणी धनी और बली होते हैं ॥२॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: २−(लोहितेन) अ० ६।१२७।१। प्रादुर्भावेन प्रकाशेन सह (स्वधितिना) स्व+धि धारणे−क्तिन्। आत्मधारणेन (मिथुनम्) क्षुधिपिशिमिथिभ्यः कित्। उ० ३।५५। इति मिथृ वधे मेधायां च−उनन्। विज्ञानम् (कर्णयोः) कॄवृजॄ०। उ० ३।१०। इति कॄ विक्षेपे−न। श्रोत्रयोः (कृधि) कुरु (अकर्ताम्) कृतवन्तौ (अश्विना) अ० २।२९।६। कार्येषु व्यापकौ मातापितरौ (लक्ष्म) सर्वधातुभ्यो मनिन्। उ० ४।१४५। इति लक्ष दर्शनाङ्कनयोः आलोचने च−मनिन्। शुभलक्षणम् (तत्) लक्ष्म (अस्तु) (प्रजया) सन्तत्या (बहु) बहुलं समृद्धम् ॥

०३ यथा चक्रुर्देवासुरा

विश्वास-प्रस्तुतिः ...{Loading}...

यथा॑ च॒क्रुर्दे॑वासु॒रा यथा॑ मनु॒ष्या᳡ उ॒त।
ए॒वा स॑हस्रपो॒षाय॑ कृणु॒तं लक्ष्मा॑श्विना ॥

०३ यथा चक्रुर्देवासुरा ...{Loading}...

Whitney
Translation
  1. As the gods and Asuras made [it], as human beings also, so, O
    Aśvins, make ye the mark, in order to thousand-fold prosperity.
Notes
Griffith

Even as Gods and Asuras, even as mortal men have done, Do ye, that these may multiply in thousands, Asvins! make the mark.

पदपाठः

यथा॑। च॒क्रुः॒। दे॒व॒ऽअ॒सु॒राः। यथा॑। म॒नु॒ष्याः᳡। उ॒त। ए॒व। स॒ह॒स्र॒ऽपो॒षाय॑। कृ॒णु॒तम्। लक्ष्म॑। अ॒श्वि॒ना॒। १४१.३।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • अश्विनौ
  • विश्वामित्र
  • अनुष्टुप्
  • गोकर्णलक्ष्यकरण सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

वृद्धि करने का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (यथा) जैसे (देवासुराः) व्यवहार जाननेवाले बुद्धिमानों ने (उत) और (यथा) जैसे (मनुष्याः) मननशील पुरुषों ने [शुभलक्षण को] (चक्रुः) किया है। (अश्विना) हे कर्तव्यों में व्यापक माता-पिता ! (एव) वैसे ही (सहस्रपोषाय) सहस्रों प्रकार के पोषण के लिये [हम में] (लक्ष्म) शुभलक्षण (कृणुतम्) तुम करो ॥३॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - माता-पिता को योग्य है कि पूर्वज महात्माओं के समान अपने सन्तानों को शुभगुणी बनावे ॥३॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: ३−(यथा) येन प्रकारेण (चक्रुः) कृतवन्तः (देवासुराः) असुरत्वं प्रज्ञावत्त्वम्−निरु० १।३४। व्यवहारिणः प्रज्ञावन्तः (यथा) (मनुष्याः) अ० ३।४।६। मननशीलाः (उत) अपि च (एव) एवम् (सहस्रपोषाय) अपरिमितवृद्धये (कृणुतम्) कुरुतम् (लक्ष्म)−म० २। शुभलक्षणम् (अश्विना) कर्तव्यव्यापकौ मातापितरौ ॥