१४० सुमङ्गलौ दन्तौ ...{Loading}...
Whitney subject
- With the first two upper teeth of a child.
VH anukramaṇī
सुमङ्गलौ दन्तौ।
१-३ अथर्वा। ब्रह्मणस्पतिः, दन्ताः। (अनुष्टुप् १) १ उरोबृहती, २ उपरिष्टाज्ज्योतिष्मती त्रिषटुप्, ३ आस्तारपङ्क्तिः।
Whitney anukramaṇī
[Atharvan.—brāhmaṇaspatyam uta mantroktadantadevatyam. ānuṣṭubham: 1. urobṛhatī; 2. upariṣṭājjyotiṣmatī triṣṭubh; 3. āstārapan̄kti.]
Whitney
Comment
Found also in Pāipp. xix. Used by Kāuś. (46. 43-46) in an expiatory rite when the two upper teeth of a child appear first; it “is made to bite the things mentioned in the text; and both it and its parents are made to eat of the grain so mentioned after it has been boiled in consecrated water.”
Translations
Translated: Zimmer, p. 321; Grill, 49, 176; Griffith, i. 323; Bloomfield, 110, 540.
०१ यौ व्याघ्राववरूढौ
विश्वास-प्रस्तुतिः ...{Loading}...
यौ व्या॒घ्रावव॑रूढौ॒ जिघ॑त्सतः पि॒तरं॑ मा॒तरं॑ च।
तौ दन्तौ॑ ब्रह्मणस्पते शि॒वौ कृ॑णु जातवेदः ॥
मूलम् ...{Loading}...
मूलम् (VS)
यौ व्या॒घ्रावव॑रूढौ॒ जिघ॑त्सतः पि॒तरं॑ मा॒तरं॑ च।
तौ दन्तौ॑ ब्रह्मणस्पते शि॒वौ कृ॑णु जातवेदः ॥
०१ यौ व्याघ्राववरूढौ ...{Loading}...
Whitney
Translation
- The (two) tigers that, having grown down, desire to devour father
and mother—those (two) teeth, O Brahmaṇaspati, make thou propitious, O
Jātavedas.
Notes
Our P.M.W. read kṛṇuhi in d. Ppp., instead of d, gives the
refrain of 2, 3: mā hiṅs- etc.
Griffith
Two tigers have grown up who long to eat the mother and the sire: Soothe, Brahmanaspati, and thou, O Jatavedas, both these teeth.
पदपाठः
यौ। व्या॒घ्रौ। अव॑ऽरूढौ। जिघ॑त्सतः। पि॒तर॑म्। मा॒तर॑म्। च॒। तौ। दन्तौ॑। ब्र॒ह्म॒णः॒। प॒ते॒। शि॒वौ। कृ॒णु॒। जा॒त॒ऽवे॒दः॒। १४०.१।
अधिमन्त्रम् (VC)
- ब्रह्मणस्पतिः
- अथर्वा
- उरोबृहती
- सुमङ्गलदन्त सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः
बालक के अन्नप्राशन का उपदेश।
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः
पदार्थान्वयभाषाः - (व्याघ्रौ) व्याघ्र के समान बलवान् (यौ) जो (दन्तौ) ऊपर नीचे के दाँत (अवरूढौ) उत्पन्न होकर (पितरम्) पिता को (च) और (मातरम्) माता को (जिघत्सतः) काटने की इच्छा करते हैं। (ब्रह्मणः) हे अन्न के (पते) स्वामी ! (जातवेदः) हे उत्पन्न पदार्थों के ज्ञानवाले गृहस्थ ! (तौ) उन दोनों को (शिवौ) सुखकारक (कृणु) कर ॥१॥
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः
भावार्थभाषाः - जब दाँत निकलने पर बालक माता-पिता को काटने लगे, तब गृहस्थ उनका अन्नप्राशन करके उस का पोषण करे ॥१॥
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी
टिप्पणी: १−(यौ) (व्याघ्रौ) अ० ४।३।१। सिंहो व्याघ्र इति पूजायाम्−निरु० ३।१८। व्याघ्रवद्बलवन्तौ (अवरूढौ) प्रादुर्भूतौ (जिघत्सतः) अद भक्षणे सन्। लुङ्सनोर्घस्लृ। पा० २।४।३७। इति घस्लृ। सः स्यार्धधातुके। पा० ७।४।४९। इति सस्य तः। अत्तुं कर्तितुमिच्छतः (पितरम्) (मातरम्) (च) (तौ) (दन्तौ) अ० ४।३।६। उपरिनीचस्थदन्तगणौ (ब्रह्मणः) अन्नस्य−निघ० २।७। (पते) स्वामिन् (शिवौ) सुखकरौ (कृणु) कुरु (जातवेदः) हे जातानां वेदित गृहस्थ ॥
०२ व्रीहिमत्तं यवमत्तमथो
विश्वास-प्रस्तुतिः ...{Loading}...
व्री॒हिम॑त्तं॒ यव॑मत्त॒मथो॒ माष॒मथो॒ तिल॑म्।
ए॒ष वां॑ भा॒गो निहि॑तो रत्न॒धेया॑य दन्तौ॒ मा हिं॑सिष्टं पि॒तरं॑ मा॒तरं॑ च ॥
मूलम् ...{Loading}...
मूलम् (VS)
व्री॒हिम॑त्तं॒ यव॑मत्त॒मथो॒ माष॒मथो॒ तिल॑म्।
ए॒ष वां॑ भा॒गो निहि॑तो रत्न॒धेया॑य दन्तौ॒ मा हिं॑सिष्टं पि॒तरं॑ मा॒तरं॑ च ॥
०२ व्रीहिमत्तं यवमत्तमथो ...{Loading}...
Whitney
Translation
- Eat ye (two) rice; eat ye barley; then beans, then sesame; this is
your deposited (níhita) portion for treasuring, ye (two) teeth; do not
injure father and mother.
Notes
Instead of atho māṣam in b, Ppp. has māṣām attam; it begins
c with sa for eṣa, and reads -dheyam in d. The comm.
paraphrases ratnadheyāya by ramaṇīyaphalāya. The verse (8 + 8: 8 +
7 + 11 = 42) is but ill-defined by the Anukr. ⌊It is really an
anuṣṭubh with d catalectic, and with a triṣṭubh refrain.⌋
Griffith
Let rice and barley be your food, eat also beans and sesamum. This is the share allotted you, to be your portion, ye two Teeth. Harm not your mother and your sire.
पदपाठः
व्री॒हिम्। अ॒त्त॒म्। यव॑म्। अ॒त्त॒म्। अथो॒ इति॑। माष॑म्। अथो॒ इति॑। तिल॑म्। ए॒षः। वा॒म्। भा॒गः। निऽहि॑तः। र॒त्न॒ऽधेया॑य। द॒न्तौ॒। मा। हिं॒सि॒ष्ट॒म्। पि॒तर॑म्। मा॒तर॑म्। च॒। १४०.२।
अधिमन्त्रम् (VC)
- ब्रह्मणस्पतिः
- अथर्वा
- उपरिष्टाज्ज्योतिष्मती त्रिष्टुप्
- सुमङ्गलदन्त सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः
बालक के अन्नप्राशन का उपदेश।
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः
पदार्थान्वयभाषाः - [हे दाँतों की दोनों पङ्क्तियो !] (व्रीहिम्) चावल (अत्तम्) खाओ, (यवम्) जौ (अत्तम्) खाओ, (अथो) फिर (माषम्) उरद, (अथो) फिर (तिलम्) तिल [खाओ], (वाम्) तुम दोनों का (एषः) यह (भागः) भाग [चावल जौ आदि] (रत्नधेयाय) रत्नों के रखने योग्य कोश के लिये (निहितः) अत्यन्त हित है, (दन्तौ) हे ऊपर नीचे के दाँतो ! (पितरम्) बालक के पिता (च) और (मातरम्) माता को (मा हिंसिष्टम्) मत काटो ॥२॥
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः
भावार्थभाषाः - माता पिता दाँत निकलने पर बालक को चावल, जौ आदि सामान्य अन्न और फिर अधिक पौष्टिक उरद आदि और चिकने तिल आदि चटावें, जिससे बालक पुष्ट होकर माता-पिता को सुख देवे और उन्नति करे ॥२॥
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी
टिप्पणी: २−(व्रीहिम्) इगुपधात् कित्। उ० ४।१२०। इति वृह वृद्धौ−इन्, पृषोदरादिरूपम्। आशुधान्यम् (अत्तम्) खादतम् (यवम्) यु मिश्रणामिश्रणयोः−अप्। अन्नविशेषम् (अथो) पश्चात् (माषम्) मष वधे−घञ्। अन्नविशेषम् (तिलम्) तिल स्नेहने−क। अन्नविशेषम् (एषः) व्रीहियवादिभोगः (वाम्) युवयोः (भागः) सेवनीयोंऽशः (निहितः) अत्यन्तहितः (रत्नधेयाय) रत्न+डुधाञ् यत्। रत्नधारणयोग्याय कोशाय (दन्तौ) उपरिनीचस्थदन्तगणौ (मा हिंसिष्टम्) मा पीडयतम् (पितरम्) पालकं जनकम् (मातरम्) मान्यां जननीम् (च) ॥
०३ उपहूतौ सयुजौ
विश्वास-प्रस्तुतिः ...{Loading}...
उप॑हूतौ स॒युजौ॑ स्यो॒नौ दन्तौ॑ सुम॒ङ्गलौ॑।
अ॒न्यत्र॑ वां घो॒रं त॒न्वः१॒॑ परै॑तु दन्तौ॒ मा हिं॑सिष्टं पि॒तरं॑ मा॒तरं॑ च ॥
मूलम् ...{Loading}...
मूलम् (VS)
उप॑हूतौ स॒युजौ॑ स्यो॒नौ दन्तौ॑ सुम॒ङ्गलौ॑।
अ॒न्यत्र॑ वां घो॒रं त॒न्वः१॒॑ परै॑तु दन्तौ॒ मा हिं॑सिष्टं पि॒तरं॑ मा॒तरं॑ च ॥
०३ उपहूतौ सयुजौ ...{Loading}...
Whitney
Translation
- Invoked [are] the two conjoint, pleasant, very propitious teeth;
let what is terrible of your selves (tanū́) go away elsewhere, ye
teeth; do not injure father and mother.
Notes
Ppp. reads aghorāu sayujā saṁvidānāu, and adds at the end anyatra vāṁ
tanvo ghoratn astu. The comm. reads tanvās in c. The definition
of the Anukr. fits the verse (7 + 8: 13 + 11) very ill. ⌊Whitney’s notes
show that he had suspected sayújāu to be a misreading for suyújāu,
and the latter is the form actually given by the Index Verborum; but
further notes show that Bp. and the Anukr. read sa-. With them agree
SPP. and the comm. and Ppp. Correct the Index accordingly.⌋
Griffith
Both fellow teeth have been invoked, gentle and bringing happi- ness. Else whither let the fierceness of your nature turn away, O Teeth! Harm not your mother or your sire.
पदपाठः
उप॑ऽहूतौ। स॒ऽयुजौ॑। स्यो॒नौ। दन्तौ॑। सु॒ऽम॒ङ्गलौ॑। अ॒न्यत्र॑। वा॒म्। घो॒रम्। त॒न्वः᳡। परा॑। ए॒तु॒। द॒न्तौ॒। मा। हिं॒सि॒ष्ट॒म्। पि॒तर॑म्। मा॒तर॑म्। च॒। १४०.३।
अधिमन्त्रम् (VC)
- ब्रह्मणस्पतिः
- अथर्वा
- आस्तारपङ्क्तिः
- सुमङ्गलदन्त सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः
बालक के अन्नप्राशन का उपदेश।
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः
पदार्थान्वयभाषाः - (उपहूतौ) आपस में स्पर्धावाले, (सयुजौ) एक दूसरे से मिले हुए (दन्तौ) दोनों ओर के दाँत (स्योनौ) सुख देनेवाले और (सुमङ्गलौ) बड़े मङ्गलवाले होवें। (दन्तौ) हे दोनों ओर के दाँतो ! (वाम्) तुम्हारा (घोरम्) दुःखदायी कर्म [बालक के] (तन्वः) शरीर से (अन्यत्र) अलग (परा एतु) चला जावे (पितरम्) इसके पिता (च) और (मातरम्) माता को (मा हिंसिष्टम्) मत काटो ॥३॥
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः
भावार्थभाषाः - माता-पिता बालक के नवे निकले दाँतों को मुलहटी आदि ओषधि से स्वस्थ करें, जिससे वे सब सुख से निकलें ॥३॥
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी
टिप्पणी: ३−(उपहूतौ) ह्वेञ् स्पर्धायां शब्दे च−क्त। परस्परस्पर्धायुक्तौ (सयुजौ) समानं युञ्जानौ (स्योनौ) सुखकरौ (दन्तौ) उभयतो दन्तगणौ (सुमङ्गलौ) सुमङ्गलकरौ (अन्यत्र) पृथक् स्थाने (वाम्) युवयोः (घोरम्) क्रूरं कर्म (तन्वः) शिशुशरीरात् (परा) (दूरे) (एतु) गच्छतु। अन्यत्पूर्ववत्−म० २ ॥