१३८ क्लबत्वम्

१३८ क्लबत्वम् ...{Loading}...

Whitney subject
  1. To make a certain man impotent.
VH anukramaṇī

क्लबत्वम्।
१-५ अथर्वा। वनस्पतिः। अनुष्टुप्, ३ पथ्यापङ्क्तिः।

Whitney anukramaṇī

[Atharvan (klībakartukāmaḥ).—pañcarcam. vānaspatyam. ānuṣṭubham: 3. pathyāpan̄kti.]

Whitney

Comment

Found (except vs. 5) also in Pāipp. i. Used by Kāuś. (48. 32) in a rite of sorcery, with wrapping, crushing, and burying urine and fæces.

Translations

Translated: Weber, Ind. Stud. v. 246; Ludwig, p. 470; Geldner, Ved. Stud. i. 131 (in part and with comment); Griffith, i. 322, 474; Bloomfield, 108, 537.

०१ त्वं वीरुधाम्

विश्वास-प्रस्तुतिः ...{Loading}...

त्वं वी॒रुधां॒ श्रेष्ठ॑तमाभिश्रु॒तास्यो॑षधे।
इ॒मं मे॑ अ॒द्य पुरु॑षं क्ली॒बमो॑प॒शिनं॑ कृधि ॥

०१ त्वं वीरुधाम् ...{Loading}...

Whitney
Translation
  1. Thou art listened to, O herb, as the most best of plants; make thou
    now this man for me impotent (klībá), opaśá-wearing.
Notes

The opaśá is some head-ornament worn distinctively by women (comm.
strīvyañjanam). Geldner holds that opaśa, kurīra (vs. 2), and
kumba (vs. 3) all mean alike ‘horn.’ Ppp. reads pāuruṣam in c.
The comm. does not attempt to identify the plant addressed.

Griffith

O Plant, thy fame is spread abroad as best of all the herbs that grow. Unman for me to-day this man that he may wear the horn of hair.

पदपाठः

त्वम्। वी॒रुधा॑म्। श्रेष्ठ॑ऽतमा। अ॒भि॒ऽश्रु॒ता। अ॒सि॒। ओ॒ष॒धे॒। इ॒मम्। मे॒। अ॒द्य। पुरु॑षम्। क्ली॒बम्। ओ॒प॒शिन॑म्। कृ॒धि॒। १३८.१।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • नितत्नीवनस्पतिः
  • अथर्वा
  • अनुष्टुप्
  • क्लीबत्व सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

निर्बलता हटाने का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (ओषधे) हे ओषधि ! (त्वम्) तू (वीरुधाम्) सब ओषधियों में (श्रेष्ठतमा) अति श्रेष्ठ और (अभिश्रुता) बड़ी विख्यात (असि) है। (मे) मेरे लिये (अद्य) अब (इमम्) इस (क्लीबम्) बलहीन (पुरुषम्) पुरुष को (ओपशिनम्) सब प्रकार उपयोगी (कृधि) बना ॥१॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - वैद्य उत्तम ओषधि द्वारा बलहीन पुरुषों को बलवान् बनावें ॥१॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: १−(त्वम्) (वीरुधाम्) लतानां मध्ये (श्रेष्ठतमा) अतिशयेन प्रशस्या (अभिश्रुता) सर्वतः प्रख्याता (असि) (ओषधे) (इमम्) (मे) मदर्थम् (अद्य) इदानीम् (पुरुषम्) (क्लीबम्) क्लीबृ अधार्ष्ये−अच्। अधृष्टम्। निवीर्य्यम् (ओपशिनम्) आङ्+उप+शीङ् शयने−ड, इनि। ओपशः=उपशयः=उपयोगः। समन्तादुपयोगिनम्। (कृधि) कुरु ॥

०२ क्लीबं कृध्योपशिनमथो

विश्वास-प्रस्तुतिः ...{Loading}...

क्ली॒बं कृ॑ध्योप॒शिन॒मथो॑ कुरी॒रिणं॑ कृधि।
अथा॒स्येन्द्रो॒ ग्राव॑भ्यामु॒भे भि॑नत्त्वा॒ण्ड्यौ᳡ ॥

०२ क्लीबं कृध्योपशिनमथो ...{Loading}...

Whitney
Translation
  1. Do thou make him impotent, opaśá-wearing, likewise make him
    kurī́ra-wearing; then let Indra with the (two) pressing-stones split
    both his testicles.
Notes

Ppp. gives kṛtvā for kṛdhi in a (combining kṛtvo ’p-), and
reads throughout klīva and opaśu; in c, d it has ubhābhyām asya
gr. indro bhinaitv ā
. The comm. explains kurīra as = keśa, and
quotes from TS. iv. 1. 5³ the phrase sinīvālī́ sukapardā́ sukurīrā́
svāupaśā́;
and also, from an unknown source, stanakeśavatī strī syāl
lomaśaḥ puruṣaḥ smṛtaḥ
.

Griffith

Make him a eunuch with a horn, set thou the crest upon his- head. Let Indra with two pressing-stones deprive him of his manly strength.

पदपाठः

क्ली॒बम्। कृ॒धि॒। ओ॒प॒शिन॑म्। अथो॒ इति॑। कु॒री॒रिण॑म्। कृ॒धि॒। अथ॑। अ॒स्य॒। इन्द्रः॑। ग्राव॑ऽभ्याम्। उ॒भे इति॑। भि॒न॒त्तु॒। आ॒ण्ड्यौ᳡। १३८.२।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • नितत्नीवनस्पतिः
  • अथर्वा
  • अनुष्टुप्
  • क्लीबत्व सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

निर्बलता हटाने का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (क्लीबम्) बलहीन पुरुष को (ओपशिनम्) उपयोगी (कृधि) बना, (अथो) और भी (कुरीरिणम्) कर्मकारी (कृधि) बना। (अथ) और (इन्द्रः) बड़े ऐश्वर्यवाले वैद्य आप (ग्रावभ्याम्) पत्थर समान दो दृढ शस्त्रों से (अस्य) इस [रोगी] के (उभे) दोनों (आण्ड्यौ) आण्डी [वा अण्डिनी, दोनों अण्डकोश के रोग] को (भिनत्तु) छेदे ॥२॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - वैद्य अण्डकोष के आण्डी, अण्डिनी, पथरी आदि रोगों को दृढ़ शस्त्रों से तोड़ कर ओषधि करें ॥२॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: २−(क्लीबम्) म० १। निर्बलम् (कृधि) कुरु (ओपशिनम्) म० १। समन्तादुपयोगिनम् (अथो) अपि च (कुरीरिणम्) अ० ५।३१।२। कृञ उच्च। उ० ४।३३। डुकृञ् करणे−ईरन्, तत इनि। कर्मवन्तम् (अथ) पुनः (अस्य) रोगिणः (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् वैद्यः (ग्रावभ्याम्) अ० ३।१०।५। पाषाणवद् दृढाभ्यां शस्त्राभ्याम् (उभे) द्वे (भिनत्तु) छिनत्तु (आण्ड्यौ) अण्ड−अण्, ङीप्। अण्डकोशभवौ। आण्डीरोगौ ॥

०३ क्लीब क्लीबम्

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क्लीब॑ क्ली॒बं त्वा॑करं॒ वध्रे॒ वध्रिं॑ त्वाकर॒मर॑सार॒सं त्वा॑करम्।
कु॒रीर॑मस्य शी॒र्षणि॒ कुम्बं॑ चाधि॒निद॑ध्मसि ॥

०३ क्लीब क्लीबम् ...{Loading}...

Whitney
Translation
  1. Impotent one, I have made thee impotent; eunuch (vádhri), I have
    made thee eunuch; sapless one, I have made thee sapless; the kurī́ra
    and the kúmba we set down upon his head.
Notes

The comm. explains kurīra here as ‘a net of hair’ (keśajāla) and
kumba as ‘its ornament’ (tadābharaṇam), and he quotes from ĀpśS. x.
9. 5 the sentence atra patnīśirasi kumbakurīram adhy ūhate. Both words
plainly signify some distinctively womanish head-dress or ornament. Ppp.
reads (as also our P.s.m.) kumbham in e; and, for c, arasaṁ
tvā ’karam arasā ’raso ’si
.

Griffith

I have unmanned thee, eunuch! yea, impotent! made thee- impotent, and robbed thee, weakling! of thy strength. Upon his head we set the horn, we set the branching ornament.

पदपाठः

क्लीब॑। क्ली॒बम्। त्वा॒। अ॒क॒र॒म्। वध्रे॑। वध्रि॑म्। त्वा॒। अ॒क॒र॒म्। अर॑स। अ॒र॒सम्। त्वा॒। अ॒क॒र॒म्। कु॒रीर॑म्। अ॒स्य॒। शी॒र्षाणि॑। कुम्ब॑म्। च॒। अ॒धि॒ऽनिद॑ध्मसि। १३८.३।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • नितत्नीवनस्पतिः
  • अथर्वा
  • पथ्यापङ्क्तिः
  • क्लीबत्व सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

निर्बलता हटाने का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (क्लीब) हे निर्बल करनेवाले रोग ! (त्वा) तुझको मैंने (क्लीबम्) निर्बल (अकरम्) कर दिया है, (वध्रे) हे बल को बाँधनेवाले रोग ! (त्वा) तुझको (वध्रिम्) शक्तिहीन (अकरम्) मैंने कर दिया है, (अरस) हे नीरस करनेवाले रोग ! (त्वा) तुझे (अरसम्) नीरस (अकरम्) मैंने कर दिया है। (अस्य) इस [स्वस्थ] पुरुष के (शीर्षणि) शिर पर (कुरीरम्) कर्म सामर्थ्य (च) और (कुम्बम्) विस्तृत आभूषण (अधिनिदध्मसि) हम अधिकारपूर्वक रखते हैं ॥३॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - मनुष्य बलहीन क्रियाहीन रोगियों को स्वस्थ और उत्साही बनावें ॥३॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: ३−(क्लीब) हे निर्बलकर रोग (क्लीबम्) निर्बलम् (त्वा) (अकरम्) अकार्षम् (वध्रे) अ० ३।९।२। हे शक्तिबन्धक रोग (वध्रिम्) शक्तिहीनम् (अरस) हे नीरसकर (अरसम्) रसहीनम्। निर्वीर्यम् (कुरीरम्)−म० २। कर्मसामर्थ्यम् (अस्य) स्वस्थस्य (शीर्षणि) शिरसि (कुम्बम्) कुबि आच्छादने−अच्। विस्तृतं भूषणं (च) (अधिनिदध्मसि) अधिकृत्य स्थापयामः ॥

०४ ये ते

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ये ते॑ ना॒ड्यौ᳡ दे॒वकृ॑ते॒ ययो॒स्तिष्ठ॑ति॒ वृष्ण्य॑म्।
ते ते॑ भिनद्मि॒ शम्य॑या॒मुष्या॒ अधि॑ मु॒ष्कयोः॑ ॥

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Whitney
Translation
  1. The two god-made tubes that [are] thine, in which stands thy
    virility, those I split for thee with a peg, on yon woman’s loins
    (muṣká).
Notes

Ppp. combines amuṣyā ’dhi in d (but perhaps the true
saṁhitā-reading?). ⌊Ppp. has a gap in the place where our śamyayā
stands.⌋

Griffith

Duas tuas venas, a Diis factas, in quibus stat vigor virilis, paxillo ligneo in testiculis ob istam mulierem tibi findo.

पदपाठः

ये इति॑। ते॒। ना॒ड्यौ᳡। दे॒वकृ॑ते॒ इति॑ दे॒वऽकृ॑ते। ययोः॑। तिष्ठ॑ति। वृष्ण्य॑म्। ते इति॑। ते॒। भि॒न॒द्मि॒। शम्य॑या। अ॒मुष्याः॑। अधि॑। मु॒ष्कयोः॑। १३८.४।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • नितत्नीवनस्पतिः
  • अथर्वा
  • अनुष्टुप्
  • क्लीबत्व सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

निर्बलता हटाने का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - [हे रोगी !] (ये) जो (ते) तेरी (नाड्यौ) दो नाडियाँ (देवकृते) मद अर्थात् उन्माद से पीड़ित हैं और (ययोः) जिन दोनों में (वृष्ण्यम्) ढीलापन (तिष्ठति) स्थित है। (ते) तेरे लिये (ते) उन दोनों [नाड़ियों] को (अमुष्याः) उस [स्वस्थ नाड़ी] से अलग (मुष्कयोः) दोनों अण्डकोशों में (शम्यया) शान्तिकारक शम्या [हल के जुये के कील के समान] शस्त्र से (अधि) अधिकारपूर्वक (भिनद्मि) मैं छेदता हूँ ॥४॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - वैद्यराज विचारपूर्वक अन्य मर्म नाड़ियों को छोड़कर अण्डकोश की रोगग्रस्त नाड़ियों को छेद कर स्वस्थ करे ॥४॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: ४−(ये) (ते) तुभ्यम् (नाड्यौ) आण्ड्यौ−म० २। (देवकृते) दिवु क्रीडामदादिषु−अच्+कृञ् हिंसायाम्−क्त। मदेनोन्मादेन हिंसितम् (ययोः) नाड्योः (तिष्ठति) वर्तते (वृष्ण्यम्) कनिन् युवृषितक्षि०। उ० १।१५६। इति वृष शक्तिबन्धने−कनिन्। खलयवमाषतिलवृष०। पा० ५।१।७। इति वृषन्−यत्। वृष्णः शिथिलस्य भावो वृष्ण्यं शैथिल्यम् (ते) नाड्यौ (ते) त्वदर्थम् (भिनद्मि) छिनद्मि (शम्यया) शम शान्तौ आलोचने च−यत्, टाप्। शम्या=युगकीलकः−अमर १९।१४। शान्तिकरेण युगकीलतुल्यशस्त्रेण (अमुष्याः) तस्या नाड्याः पृथक् (अधि) अधिकृत्य (मुष्कयोः) अण्डकोशयोर्मध्ये ॥

०५ यथा नडम्

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यथा॑ न॒डं क॒शिपु॑ने॒ स्त्रियो॑ भि॒न्दन्त्यश्म॑ना।
ए॒वा भि॑नद्मि ते॒ शेपो॒ऽमुष्या॒ अधि॑ मु॒ष्कयोः॑ ॥

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Whitney
Translation
  1. As women split reeds with a stone for a cushion, so do I split thy
    member, on yon woman’s loins.
Notes

In this and the preceding verse, the comm. strangely connects muṣkáyos
with the preceding noun (nāḍyāù, śépas) and supplies śilāyās with
amúṣyās.

Griffith

Ut mulieres mattam (tegetem) facturae arundinem lapide findunt, sic fascinum tuum cum testiculis ob istam mulierem findo.

पदपाठः

यथा॑। न॒डम्। क॒शिपु॑ने। स्रियः॑। भि॒न्दन्ति॑। अश्म॑ना। ए॒व। भि॒न॒द्मि॒। ते॒। शेपः॑। अ॒मुष्याः॑। अधि॑। मु॒ष्कयोः॑। १३८.५।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • नितत्नीवनस्पतिः
  • अथर्वा
  • अनुष्टुप्
  • क्लीबत्व सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

निर्बलता हटाने का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (यथा) जैसे (स्त्रियः) स्त्रियाँ (नडम्) नरकट घास आदि को (कशिपुने) अन्न वा वस्त्र के लिये (अश्मना) पत्थर से (भिन्दन्ति) तोड़ती हैं। (एव) वैसे ही (ते) तेरे लिये (अमुष्याः) उस [नीरोग नाडी] से अलग (मुष्कयोः) दोनों अण्डकोशों के (शेपः) रोग बल को (अधि) अधिकार के साथ (भिनद्मि) मैं तोड़ता हूँ ॥५॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - जैसे किसी तृण में से अन्न वा वस्त्र की सार वस्तु बचाकर अभीष्ट भाग को तोड़ डालते हैं, वैसे ही चिकित्सक लोग मर्म स्थल को छोड़कर रोगकारक नाड़ी को छेदकर स्वस्थ करें ॥५॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: ५−(यथा) येन प्रकारेण (नडम्) तृणम् (कशिपुने) मृगय्वादयश्च। उ० १।३७। इति कश गतिशासनयोः−कु, निपातनात् साधुः। अन्नाय वस्त्राय वा−अमर० २३।१३०। (स्त्रियः) (भिन्दन्ति) आघ्नन्ति (अश्मना) पाषाणेन (एव) एवम् (भिनद्मि) (ते) तुभ्यम् (शेपः) रोगबलम् (अमुष्याः) तस्या नीरोगाया नाड्याः (अधि) अधिकृत्य (मुष्कयोः) अण्डकोशयोः ॥