१२३ सौमनसम्

१२३ सौमनसम् ...{Loading}...

Whitney subject
  1. For the success of an offering.
VH anukramaṇī

सौमनसम्।
१-५ भृगुः। विश्वे देवाः। त्रिष्टुप्, ३ द्विपदा साम्म्यनुष्टुप्, ४ एकावसाना द्विपदा प्राजापत्या भुरिगनुष्टु।

Whitney anukramaṇī

[Bhṛgu.—pañcarcam, vāiśvadevam. trāiṣṭubham: 3. 2-p. sāmny anuṣṭubh; 4. 1-av. 2-p. prājāpatyā bhurig anuṣṭubh.]

Whitney

Comment

⌊Partly prose, 3 and 4.⌋ This hymn and the one following are not found in Pāipp. Its uses by Kāuś. and Vāit. with hymn 122 are explained under that hymn. And vss. 3-5 appear also in Vāit. (2. 15), at the parvan sacrifice, in the ceremony of pravaraṇa. ⌊For the whole anuvāka, see under h. 114.⌋

Translations

Translated: Muir, v. 293 (vss. 2,4,5); Ludwig, p. 302; Griffith, i. 313.

०१ एतं सधस्थाः

विश्वास-प्रस्तुतिः ...{Loading}...

ए॒तं स॑धस्थाः॒ परि॑ वो ददामि॒ यं शे॑व॒धिमा॒वहा॑ज्जा॒तवे॑दाः।
अ॑न्वाग॒न्ता यज॑मानः स्व॒स्ति तं स्म॑ जानीत पर॒मे व्यो᳡मन् ॥

०१ एतं सधस्थाः ...{Loading}...

Whitney
Translation
  1. This one, O ye associates (? sadhástha), I deliver to you, whom
    Jātavedas shall carry [as] a treasure; the sacrificer follows after
    well-being; him do ye recognize in the highest firmament.
Notes

The verse is found also in VS. (xviii. 59) and K. (xl. 13). VS. reads,
in a, sadhastha and te (for vas); in b, it puts śevadhím
after āváhāt; in c, it reads a. yajñápatir vo átra. The comm.
explains sadhasthās as meaning ’the gods’ (saha tiṣṭhanty ekatra
svarge loke sthāne yajamānena saha nivasanti
).

Griffith

Ye who are present, unto you I offer this treasure brought to us by Jatavedas Happily will the sacrificer follow: do ye acknowledge him in highest heaven.

पदपाठः

ए॒तम्। स॒ध॒ऽस्थाः॒। परि॑। वः॒। द॒दा॒मि॒। यम्। शे॒व॒ऽधिम्। आ॒ऽवहा॑त्। जा॒तऽवे॑दाः। अ॒नु॒ऽआ॒ग॒न्ता। यज॑मानः। स्व॒स्ति। तम्। स्म॒। जा॒नी॒त॒। प॒र॒मे। विऽओ॑मन्। १२३.१।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • विश्वे देवाः
  • भृगु
  • त्रिष्टुप्
  • सौमनस्य सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

विद्वानों से सत्सङ्ग का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (सधस्थाः) हे साथ-साथ बैठनेवाले सज्जनो ! (वः) तुम्हारे लिये (एतम्) इस (शेवधिम्) सुखनिधि परमेश्वर को (परिददामि) सब प्रकार से देता हूँ [उपदेश करता हूँ], (यम्) जिस [परमेश्वर] को (जातवेदाः) विज्ञान को प्राप्त वेदार्थ जाननेवाला पुरुष (आवहात्) अच्छे प्रकार प्राप्त होवे, और [जिसके द्वारा] (यजमानः) परमेश्वर का पूजनेवाला (स्वस्ति) कल्याण (अन्वागन्ता) लगातार पावेगा, (परमे) परम उत्तम (व्योमन्) आकाश में वर्तमान (तम्) उस परमेश्वर को तुम (स्म) अवश्य (जानीत) जानो ॥१॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - जो मनुष्य विद्वानों से मिलकर सदाचारी होते हैं, वे ही सर्वव्यापी परमेश्वर से मिलते हैं। ॥१॥ मन्त्र १, २ कुछ भेद से यजुर्वेद में हैं−अ० १८।५९।६०, इनका अर्थ भगवान् दयानन्द सरस्वती के आधार पर यहाँ किया गया है ॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: १−(एतम्) सर्वव्यापकम् (सधस्थाः) सहस्थानाः (परि) सर्वतः (वः) युष्मभ्यम् (ददामि) (यम्) (शेवधिम्) शेवं सुखं धीयते यस्मिंस्तं निधिम्−निरु० २।४। सुखनिधिं परमात्मानम् (आवहात्) लेटि रूपम्। समन्तात् प्राप्नुयात् (जातवेदाः) जातप्रज्ञो वेदार्थवित् (अन्वागन्ता) गमेर्लुट्। निरन्तरमागमिष्यति। प्राप्स्यति (यजमानः) परमेश्वरपूजकः (स्वस्ति) कल्याणम् (तम्) परमात्मानम् (स्म) अवश्यम् (परमे) प्रकृष्टे (व्योमन्) अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते। पा० ३।२।७५। इति अव रक्षणे−मनिन्। ज्वरत्वरस्रिव्यवि०। पा० ६।४।२०। इति ऊठि कृते गुणः। सुपां सुलुक्०। सप्तम्या लुक्। न ङिसम्बुद्ध्योः। पा० ८।२।८। नलोपाभावः। व्योमन्=व्यवने−निरु० ११।४०। व्योमनि। आकाशे ॥

०२ जानीत स्मैनम्

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जा॑नी॒त स्मै॑नं पर॒मे व्यो᳡म॒न्देवाः॒ सध॑स्था वि॒द लो॒कमत्र॑।
अ॑न्वाग॒न्ता यज॑मानः स्व॒स्ती᳡ष्टा॑पू॒र्तं स्म॑ कृणुता॒विर॑स्मै ॥

०२ जानीत स्मैनम् ...{Loading}...

Whitney
Translation
  1. Recognize ye him in the highest firmament; ye divine associates, ye
    know [his] world there; the sacrificer follows after well-being; make
    ye what he has offered and bestowed plain for him.
Notes

This verse is found with the preceding in VS. (xviii. 60) and K. (xl.
13), and also in TB. (iii. 7. 13³⁻⁴), but with considerable variants: at
the beginning, etám jānātha (TB. jānītāt) par-; in b, TB.
vṛ́kās for dévās, both VS. and TB. sadh- unaccented, which is
better, but VS. vida, which is bad, and both rūpám asya (for lokám
átra
), which gives a better sense; for c, both yád āgáchāt
pathíbhir devayā́nāis;
in d, both iṣṭāpūrté, and VS. kṛṇavātha,
but TB. kṛṇutāt, both without sma.

Griffith

Do ye acknowledge him in highest heaven: ye know the world here present in assembly. In peace will he who sacrifices follow: show him the joy which comes from pious actions.

पदपाठः

जा॒नी॒त। स्म॒। ए॒न॒म्। प॒र॒मे। विऽओ॑मन्। देवाः॑। सध॑ऽस्थाः। वि॒द। लो॒कम्। अत्र॑। अ॒नु॒ऽआ॒ग॒न्ता। यज॑मानः। स्व॒स्ति। इ॒ष्टा॒पू॒र्तम्। स्म॒। कृ॒णु॒त॒। आ॒विः। अ॒स्मै॒। १२३.२।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • विश्वे देवाः
  • भृगु
  • त्रिष्टुप्
  • सौमनस्य सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

विद्वानों से सत्सङ्ग का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (सधस्थाः) हे साथ-साथ बैठनेवाले (देवाः) विद्वानो ! (परमे) परम उत्तम (व्योमन्) आकाश में वर्तमान (एनम्) इस [परमात्मा] को (स्म) अवश्य (जानीत) जानो, और (अत्र) इस [परमात्मा] में (लोकम्) संसार को (विद) जानो [और जिसके द्वारा] (यजमानः) परमेश्वर का पूजनेवाला (स्वस्ति) कल्याण (अन्वागन्ता) लगातार पावेगा, (इष्टापूर्तम्) यज्ञ, वेदाध्ययन, अन्नदान आदि पुण्य कर्म को, (अस्मै) इस परमेश्वर की प्राप्ति के लिये (स्म) अवश्य (आविः) प्रकाशित (कृणुत) करो ॥२॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - सब मनुष्य विद्वानों के सत्सङ्ग से योगाभ्यास और धर्म्म का आचरण करके परमेश्वर को जान कर आनन्द करें ॥२॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: २−(एनम्) सर्वव्यापकं परमेश्वरम् (देवाः) विद्वांसः (विद) लोडर्थे−लट्। वित्त, जानीत (लोकम्) संसारम् (अत्र) अस्मिन् परमात्मनि (इष्टापूर्त्तम्) अ० २।१२।४। यज्ञवेदाध्ययनान्नप्रदानादिपुण्यकर्म। (कृणुत) कुरुत (आविः) प्रकाशे (अस्मै) परमात्मप्राप्तये। अन्यद् गतम्−म० १ ॥

०३ देवाः पितरः

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देवाः॒ पित॑रः॒ पित॑रो॒ देवाः॑।
यो अस्मि॒ सो अ॑स्मि ॥

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Whitney
Translation
  1. O gods! O Fathers! O Fathers! O gods! who I am, he am I.
Notes

The comm., with his usual carelessness of accent, takes the vocatives
here for nominatives. Some of SPP’s authorities (also our O.s.m.) omit
the accent of the first asmi.

Griffith

Gods are the Fathers, and the Fathers Gods. I am the very man I am.

पदपाठः

देवाः॑। पित॑रः। पित॑रः। देवाः॑। यः। अस्मि॑। सः। अ॒स्मि॒। १२३.३।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • विश्वे देवाः
  • भृगु
  • द्विपदा साम्न्यनुष्टुप्
  • सौमनस्य सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

विद्वानों से सत्सङ्ग का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (देवाः) विद्वान् लोग (पितरः) माननीय, और (पितरः) पालन करनेवाले लोग (देवाः) विजयी होते हैं। मैं (यः) चलने फिरनेवाला [उद्योगी] (अस्मि) हूँ, मैं ही (सः) दुःख मिटानेवाला (अस्मि) हूँ ॥३॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - विद्वान् ही परस्पर पालन करके विजयी, और आत्मविश्वासी और उद्योगी ही परस्पर सहायक होते हैं ॥३॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: ३−(देवाः) विद्वांसः (पितरः) पालयितारः। माननीयाः (देवाः) विजिगीषवः (यः) या प्रापणे−ड। गन्ता। उद्योगी (अस्मि) अहं वर्ते (सः) षो अन्तकर्मणि−ड। दुःखनाशकः ॥

०४ स पचामि

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स प॑चामि॒ स द॑दामि।
स य॑जे॒ स द॒त्तान्मा यू॑षम् ॥

०४ स पचामि ...{Loading}...

Whitney
Translation
  1. He do I cook, he do I give, he do I offer; [as] he, let me not be
    parted from what is given.
Notes

That is, from my gifts, or their reward. The comm. counts and explains
these two quasi-verses, 3 and 4, as one. But the Anukr. reckons this
hymn (as it reckoned the preceding one) as one of five verses
(pañcarca), and SPP’s edition as well as ours so divides. ⌊‘As that
one, I cook’ etc. would be an equally accurate translation, and the
English of it is not so harsh.⌋

Griffith

I cook, I give, I offer up oblation. From what I gave let me not be disparted.

पदपाठः

सः। प॒चा॒मि॒। सः। द॒दा॒मि॒। सः। य॒जे॒। सः। द॒त्तात्। मा। यू॒ष॒म्। १२३.४।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • विश्वे देवाः
  • भृगु
  • एकावसाना द्विपदा प्राजापत्या भुरिगनुष्टुप्
  • सौमनस्य सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

विद्वानों से सत्सङ्ग का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (सः) क्लेशनाशक मैं [अन्न] को (पचामि) परिपक्व करता हूँ, (सः) वही मैं (ददामि) दान करता हूँ, (सः) वही मैं (यजे) विद्वानों को पूजता हूँ (सः) वह मैं (दत्तात्) दान से [सुपात्रों के लिये] (मा यूषम्) पृथक् न होऊँ ॥४॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - मनुष्य पुरुषार्थ के साथ सुपात्रों का सत्कार करके कीर्तिमान् होवें ॥४॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: ४−(सः)−म० ३। क्लेशनाशकः (पचामि) पाकेन संस्करोमि (सः) प्रसिद्धः (ददामि) दानानि करोमि (यजे) देवान् पूजयामि (दत्तात्) सुपात्रेभ्यो दानात् (मा यूषम्) यु मिश्रणामिश्रणयोः−माङि लुङि च्लेः सिच्, छान्दसो दीर्घः। पृथक्कृतो मा भूवम् ॥

०५ नाके राजन्प्रति

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नाके॑ राज॒न्प्रति॑ तिष्ठ॒ तत्रै॒तत्प्रति॑ तिष्ठतु।
वि॒द्धि पू॒र्तस्य॑ नो राज॒न्त्स दे॑व सु॒मना॑ भव ॥

०५ नाके राजन्प्रति ...{Loading}...

Whitney
Translation
  1. In the firmament, O king, stand firm; there let this stand firm; know
    of what we have bestowed, O king; do thou, O god, be well-willing.
Notes

The comm. understands the addresses of this verse as made to Soma, which
is very questionable; and the “this” of b to be the iṣṭāpūrtám,
which (or dattám, vs. 4) is right. It must be by a corruption of the
text that the Anukr. does not define the verse as an anuṣṭubh.

Griffith

O King, take thou thy stand in heaven, there also let that gift be placed. Recognize, King, the gift which we have given, and be gracious, God!

पदपाठः

नाके॑। रा॒ज॒न्। प्रति॑। ति॒ष्ठ॒। तत्र॑। ए॒तत्। प्रति॑। ति॒ष्ठ॒तु॒। वि॒ध्दि। पू॒र्तस्य॑। नः॒। रा॒ज॒न्। सः। दे॒व॒। सु॒ऽमनाः॑। भ॒व॒। १२३.५।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • विश्वे देवाः
  • भृगु
  • त्रिष्टुप्
  • सौमनस्य सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

विद्वानों से सत्सङ्ग का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (राजन्) हे समर्थ मनुष्य ! (नाके) सुखस्वरूप परमात्मा में (प्रति तिष्ठ) प्रतिष्ठा पा, (तत्र) उसी [परमात्मा] में ही (एतत्) यह [तेरा पुण्य कर्म] (प्रति तिष्ठतु) प्रतिष्ठा पावे। (राजन्) हे विद्या से प्रकाशमान ! (नः) हमारे लिये (पूर्तस्य) अन्न दान आदि पुण्य कर्म का (विद्धि) ज्ञान कर, (सः) वह तू, (देव) हे गतिशील ! (सुमनाः) प्रसन्नचित्त (भव) हो ॥५॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - मनुष्य अपने सब शुभ कर्मों को परमात्मा में समर्पण करके पुण्य कर्म करता हुआ सदा प्रसन्न रहे ॥५॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: ५−(नाके) दुःखरहिते सुखस्वरूपे परमात्मनि (राजन्) हे समर्थ जीव (प्रति तिष्ठ) प्रतिष्ठया स्थितो भव (तत्र) तस्मिन् परमात्मनि (एतत्) पूर्तम्। पुण्यकर्म (प्रति तिष्ठतु) प्रतिष्ठया स्थितं भवतु (विद्धि) ज्ञानं कुरु (पूर्तस्य) अ० २।१२।४। अन्नप्रदानादिपुण्यकर्मणः (नः) अस्मभ्यम् (राजन्) (सः) स त्वम् (देव) उद्योगिन् (सुमनाः) प्रसन्नचित्तः (भव) ॥