००७ असुरक्षयणम्

००७ असुरक्षयणम् ...{Loading}...

Whitney subject
  1. For blessings.
VH anukramaṇī

असुरक्षयणम्।
१-३ अथर्वा। सोमः, अदितिः, ३ देवाः। गायत्री, १ निचृत्।

Whitney anukramaṇī

[Atharvan.—sāumyam: 3. vāiśvadevī. gāyatram; 1. nicṛt.]

Whitney

Comment

Found also in Pāipp. xix. The hymn appears in Kāuś. (46. 4) as a help in removing obstacles to sacrifice, or an expiation for sacrificing for an improper person; and it is reckoned (note to 25. 36) to the svastyayana gaṇa; for its use by 50. 13, see under vi. 1.

Translations

Translated: Florenz, 256 or 8; Griffith, i. 248.

०१ येन सोमादितिः

विश्वास-प्रस्तुतिः ...{Loading}...

येन॑ सो॒मादि॑तिः प॒था मि॒त्रा वा॒ यन्त्य॒द्रुहः॑।
तेना॒ नोऽव॒सा ग॑हि ॥

०१ येन सोमादितिः ...{Loading}...

Whitney
Translation
  1. By what road, O Soma, Aditi or friends go, not hostile, by that do
    thou come to us with aid.
Notes

The comm. understands mitrās ‘friends’ to mean “Aditi’s twelve sons,
Mitra etc.”; i.e. as the equivalent of ādityā́s, which is not
impossible. ⌊The description as nicṛt belongs rather to 8. 1.⌋

Griffith

येन॑ सो॒मादि॑तिः प॒था मि॒त्रा वा॒ यन्त्य॒द्रुहः॑ ।
तेना॒ नोऽव॒सा ग॑हि ॥१॥

पदपाठः

येन॑। सो॒म॒। अदि॑तिः। प॒था। मि॒त्राः। वा॒। यन्ति॑। अ॒द्रुहः॑। तेन॑। नः॒। अव॑सा। आ। ग॒हि॒। ७.१।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • सोमः
  • अथर्वा
  • निचृद्गायत्री
  • असुरक्षयण सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

सुख की प्राप्ति का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (सोम) हे बड़े ऐश्वर्यवाले जगदीश्वर ! (येन पथा) जिस मार्ग से (अदितिः) अदीन पृथिवी (वा) और (मित्राः) प्रेरणा करने हारे सूर्य आदि लोक (अद्रुहः) द्रोहरहित होकर (यन्ति) चलते हैं। (तेन) उसी से (अवसा) रक्षा के साथ (नः) हमें (आ गहि) आकर प्राप्त हो ॥१॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - मनुष्य सत्य वेदपथ पर चल कर प्रीतिपूर्वक परस्पर रक्षा करें, जैसे सूर्यादि लोक परस्पर आकर्षण से परस्पर उपकार करते हैं ॥१॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: १−(येन) (सोम) परमैश्वर्यवन् (अदितिः) अ० २।२८।४। अदीना पृथिवी (पथा) मार्गेण (मित्राः) अ० ३।८।१। डुमिञ् प्रक्षेपणे−क्त्र। प्रेरकाः सूर्यादिलोकाः (वा) चार्थे (यन्ति) संचरन्ति (अद्रुहः) अद्रोग्धारः सन्तः (तेन) पथा (नः) अस्मान् (अवसा) रक्षणेन सह (आ गहि) आगच्छ ॥

०२ येन सोम

विश्वास-प्रस्तुतिः ...{Loading}...

येन॑ सोम साह॒न्त्यासु॑रान्र॒न्धया॑सि नः।
तेना॑ नो॒ अधि॑ वोचत ॥

०२ येन सोम ...{Loading}...

Whitney
Translation
  1. By what, O Soma, overpowering one, thou shalt make the Asuras subject
    to us, by that do ye bless us.
Notes

Ppp. has, for a, yebhis soma sahantya, and, for c, tenā no
‘vitā
⌊that is, avitā́bhuvaḥ, thus relieving the embarrassing
change of number ⌊in the verb⌋ from a, b to c; emendation to
vocatāt in our c would accomplish the same result.

Griffith

येन॑ सोम साह॒न्त्यासु॑रान् र॒न्धया॑सि नः ।
तेना॑ नो॒ अधि॑ वोचत ॥२॥

पदपाठः

येन॑। सो॒म॒। सा॒ह॒न्त्य॒। असु॑रान्। र॒न्धया॑सि। नः॒। तेन॑। नः॒। अधि॑। वो॒च॒त॒। ७.२।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • सोमः
  • अथर्वा
  • गायत्री
  • असुरक्षयण सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

सुख की प्राप्ति का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (साहन्त्य) हे विजयी शूरों में रहनेवाले (सोम) बड़े ऐश्वर्यवाले परमात्मन् ! (येन) जिस [मार्ग] से (असुरान्) असुरों को (नः) हमारे लिये (रन्धयासि) तू वश में करे, (तेन) उसी से (नः) हमारे लिये (अधि) अनुग्रह से (वोचत=अवोचत) आपने कथन किया है ॥२॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - परमेश्वर अपनी सनातनी वेदविद्या द्वारा भूत, भविष्यत् और वर्तमान में रक्षा करता है ॥२॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: २−(येन) पथा−म० १। (सोम) (साहन्त्य) भुवो झिच्। उ० ३।५०। इति षह अभिभवे−झिच्। पाथोनदीभ्यां ड्यण्। पा० ४।४।१११। इति सहन्ति−ड्यण् बाहुलकात्। हे सहन्तिषु सोढृषु जेतृषु भव (असुरान्) सुरविरोधिनो दुष्टान् (रन्धयासि) सू० ६।१। त्वं वशीकुर्याः (नः) अस्मदर्थम् (नः) (अधि) अधिकम् अनुग्रहपूर्वकम् (वोचत) लुङि प्रथमपुरुषस्य छान्दसं रूपम्। भवान् कथितवानस्ति ॥

०३ येन देवा

विश्वास-प्रस्तुतिः ...{Loading}...

येन॑ देवा॒ असु॑राणा॒मोजां॒स्यवृ॑णीध्वम्।
तेना॑ नः॒ शर्म॑ यच्छत ॥

०३ येन देवा ...{Loading}...

Whitney
Translation
  1. By what, O gods, ye did repel (vṛ) the mights of the Asuras, by
    that do ye yield refuge unto us.
Notes

Ppp. begins with yāni, and has correspondingly tebhis for tena in
c. This facilitates the rendering of avṛṇīdhvam by its natural
meaning ‘did choose’; there is no other known example of a -form
from vṛ ‘repel.’ The comm. renders it tataḥ pṛthakkṛtya yūyaṁ
sambhaktavantaḥ
. ⌊Ppp. has for c tebhir na adhi vocata.⌋

Griffith

येन॑ देवा॒ असु॑राणा॒मोजां॒स्यवृ॑णीध्वम्।
तेना॑ नः॒ शर्म॑ यच्छत ॥३॥

पदपाठः

येन॑। दे॒वाः॒। असु॑राणाम्। ओजां॑सि। अवृ॑णीध्वम्। तेन॑। नः॒। शर्म॑। य॒च्छ॒त॒। ७.३।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • विश्वे देवाः
  • अथर्वा
  • गायत्री
  • असुरक्षयण सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

सुख की प्राप्ति का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (देवाः) हे विजयी देवताओ ! (येन) जिस [मार्ग] से (असुराणाम्) असुरों के (ओजांसि) बलों को (अवृणीध्वम्) तुम ने रोका है, (तेन) उसी से (नः) हमें (शर्म) सुख (यच्छत) दान करो ॥३॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - शूर वीर पुरुष दुष्टों के जीतने में परस्पर सदा सहायक रहें ॥३॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: ३−(येन) वेदमार्गेण (देवाः) विजिगीषवः शूराः (असुराणाम्) सुरविरोधिनां शत्रूणाम् (ओजांसि) बलानि (अवृणीध्वम्) वृञ् संवरणे−लङ्। यूयं निवारितवन्तः स्थ (तेन) पथा (नः) अस्मभ्यम् (शर्म) सुखम् (यच्छत्) पाघ्राध्मा०। पा० ३।७८। इति दाण् दाने, यच्छादेशः। दत्त ॥