०३५ मृत्युसंतरणम्

०३५ मृत्युसंतरणम् ...{Loading}...

Whitney subject
  1. Extolling a rice-mess offering.
VH anukramaṇī

मृत्युसंतरणम्।
१-७ प्रजापतिः। अतिमृत्युः। त्रिष्टुप्, ३ भुरिग्जगती।

Whitney anukramaṇī

[Prajāpati.—ātimartyam.* trāiṣṭubham: 3. bhurij; 4. jagatī.]

Whitney

Comment

Not found in Pāipp. Used by Kāuś. (66. 11) in the sava sacrifices, with a sava for escaping death (atimṛtyu) and, according to the comm., also in the ceremony of expiation for the birth of twin calves (109. 1; he reads yam odanam iti, instead of yamāu janayati, which the edition has). *⌊The Berlin Anukr. reads ātimārcyam.⌋

Translations

Translated: Ludwig, p. 438; Griffith, i. 177; Weber, xviii. 139.

Griffith

Magnification of the Odana or oblation of milk and rice

०१ यमोदनं प्रथमजा

विश्वास-प्रस्तुतिः ...{Loading}...

यमो॑द॒नं प्र॑थम॒जा ऋ॒तस्य॑ प्र॒जाप॑ति॒स्तप॑सा ब्र॒ह्मणेऽप॑चत्।
यो लो॒कानां॒ विधृ॑ति॒र्नाभि॒रेषा॒त्तेनौ॑द॒नेनाति॑ तराणि मृ॒त्युम् ॥

०१ यमोदनं प्रथमजा ...{Loading}...

Whitney
Translation
  1. The rice-mess which Prajāpati, first-born of righteousness, cooked
    with fervor (tápas) for Brahmán; which, separator of the worlds, shall
    not harm (?)—by that rice-mess let me overpass death.
Notes

For the obscure and questionable nā́ ’bhiréṣāt in c (no tense-stem
réṣa occurs elsewhere in AV.) the comm. reads nābhir ekā; Ludwig,
ignoring accent and pada-text (ná: abhi॰réṣāt), understands
nābhi-reṣāt “breach of the navel”; two of our mss. (O.Op.) read
nā́bhiréṣāṁ ⌊and Weber conjectured nā́bhir eṣām⌋. The refrain is found
also as concluding pāda of a verse in ĀpśS. iv. 11. 3. The Anukr. does
not note that b is jagatī.

Griffith

Odana which Prajapati, the firstborn of Order, dressed with fervour for the Brahman, which guards the worlds from breaking atIthe centre,–I with this Odana will conquer Mrityu.

पदपाठः

यम्। ओ॒द॒नम्। प्र॒थ॒म॒ऽजाः। ऋ॒तस्य॑। प्र॒जाऽप॑तिः। तप॑सा। ब्र॒ह्मणे॑। अप॑चत्। यः। लो॒काना॑म्। विऽधृ॑तिः। न। अ॒भि॒ऽरेषा॑त्। तेन॑। ओ॒द॒नेन॑। अति॑। त॒रा॒णि॒। मृ॒त्युम्। ३५.१।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • अतिमृत्युः
  • प्रजापतिः
  • त्रिष्टुप्
  • मृत्युसंतरण सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

ब्रह्मविद्या का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (ऋतस्य) सत्य के (यम्) जिस (ओदनम्) वृद्धि करनेवाले परमात्मा को (प्रथमजाः) प्रख्यात पुरुषों में उत्पन्न हुए, (प्रजापतिः) प्रजापालक योगी जन ने (तपसा) अपने तप, सामर्थ्य से (ब्रह्मणे) ब्रह्म की प्राप्ति के लिये (अपचत्) परिपक्व अर्थात् हृदय में दृढ़ किया है। (यः) जो परमात्मा (लोकानाम्) सब लोकों का (विधृतिः) विधाता (न) कभी नहीं (अभिरेषात्) घटता है, (तेन) उस (ओदनेन) बढ़ानेवाले वा अन्नरूप परमात्मा के साथ (मृत्युम्) मृत्यु के कारण [निरुत्साह आदि दोष] को (अति=अतीत्य) लाँघकर (तराणि) मैं तर जाऊँ ॥१॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - जिस परमात्मा को ऋषि मुनि महात्मा लोग साक्षात् करते चले आये हैं, उसी के गुणों को हम जानकर पुरुषार्थ के साथ अपने जीवन को सुधारें ॥१॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: १−(यम्) (ओदनम्) सू० ३४। म० १। सेचकं प्रवर्धकं वा परमात्मानम् (प्रथमजाः) प्रथमेषु श्रेष्ठपुरुषेषु जातः (ऋतस्य) सत्यस्य परब्रह्मरूपस्य (प्रजापतिः) प्रजानां पालको योगिजनः (तपसा) स्वसामर्थ्येन (ब्रह्मणे) ब्रह्मप्राप्तये (अपचत्) पक्वं हृदये दृढं कृतवान् (यः) ओदनः (लोकानाम्) ब्रह्माण्डानाम् (विधृतिः) विधारयिता (न) निषेधे (अभिरेषात्) रिष हिंसायाम्-लडर्थे लेट्, कर्मण्यर्थे। रेष्यते। नश्यति (तेन) (ओदनेन) सेचकेन प्रवर्धकेन अन्नरूपेण वा परमात्मना (अति) अतीत्य (तराणि) पारं गच्छानि प्राप्नवानि (मृत्युम्) मरणकारणं निरुत्साहम् ॥

०२ येनातरन्भूतकृतोऽति मृत्युम्

विश्वास-प्रस्तुतिः ...{Loading}...

येनात॑रन्भूत॒कृतोऽति॑ मृ॒त्युं यम॒न्ववि॑न्द॒न्तप॑सा॒ श्रमे॑ण।
यं प॒पाच॑ ब्र॒ह्मणे॒ ब्रह्म॒ पूर्वं॒ तेनौ॑द॒नेनाति॑ तराणि मृ॒त्युम् ॥

०२ येनातरन्भूतकृतोऽति मृत्युम् ...{Loading}...

Whitney
Translation
  1. That by which the being-makers overpassed death; which they
    discovered by fervor, by toil (śráma); which the bráhman of old
    cooked for Brahmán—by that rice-mess let me overpass death.
Notes

The comm. explains bhūtakṛ́tas as prāṇināṁ kartāro devāḥ, but
ṛṣayas is always the noun used with it.

Griffith

Whereby the World-Creators vanquished Mrityu, that which they found by fervour, toil and trouble, That which prayer first made ready for the Brahman,–I with this Odana will conquer Mrityu.

पदपाठः

येन॑। अत॑रन्। भू॒त॒ऽकृतः॑। अति॑। मृ॒त्युम्। यम्। अ॒नु॒ऽअवि॑न्दन्। तप॑सा। श्रमे॑ण। यम्। प॒पाच॑। ब्र॒ह्मणे॑। ब्रह्म॑। पूर्व॑म्। तेन॑। ओ॒द॒नेन॑। अति॑। त॒रा॒णि॒। मृ॒त्युम्। ३५.२।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • अतिमृत्युः
  • प्रजापतिः
  • त्रिष्टुप्
  • मृत्युसंतरण सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

ब्रह्मविद्या का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (येन) जिस परमात्मा के साथ (भूतकृतः) प्राणियों को [उत्तम] बनानेवाले पुरुष (मृत्युम्) मृत्यु के कारण निरुत्साह आदि को (अति=अतीत्य) लाँघकर (अतरन्) तर गये हैं, और (यम्) जिसको (तपसा) ब्रह्मचर्य आदि तप और (श्रमेण) परिश्रम से (अन्वविन्दन्) उन्होंने अनुक्रम से पाया है। और (यम्) जिसको (ब्रह्मणे) ब्रह्मा, [वेदज्ञानी] के लिये (ब्रह्म) वेद ने (पूर्वम्) पहिले ही (पपाच) परिपक्व वा दृढ किया था। (तेन) उस (ओदनेन) बढ़ानेवाले वा अन्नरूप परमात्मा के साथ…. म० १ ॥२॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - जिस परमात्मा को पाकर महाउपकारी जनों ने तप और परिश्रम से अनेक विघ्नों को हटाकर सुख प्राप्त किया है और जिसका प्रतिपादन वेदों ने किया है, उसी के ज्ञान से सब मनुष्य अपने क्लेश टालकर आनन्द पावें ॥२॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: २−(येन) ओदनेन (अतरन्) पारं प्राप्नुवन् (भूतकृतः) भूतानां प्राणिनां कर्तार उपकर्तारः पुरुषाः (अति) अतीत्य (मृत्युम्) मरणहेतुं निरत्साहादिकम् (यम्) (अन्वविन्दन्) अनुक्रमेण प्राप्नुवन् (तपसा) ब्रह्मचर्येण (श्रमेण) श्रमु तपसि खेदे च-घञ्। परिश्रमेण। ब्रह्माभ्यासेन। (यम्) (पपाच) पक्वं दृढं चकार (ब्रह्मणे) ब्रह्मज्ञानिने (ब्रह्म) वेदः (पूर्वम्) प्रथमम्। अन्यत् पूर्ववत् म० १ ॥

०३ यो दाधार

विश्वास-प्रस्तुतिः ...{Loading}...

यो दा॒धार॑ पृथि॒वीं वि॒श्वभो॑जसं॒ यो अ॒न्तरि॑क्ष॒मापृ॑णा॒द्रसे॑न।
यो अस्त॑भ्ना॒द्दिव॑मू॒र्ध्वो म॑हि॒म्ना ते॑नौद॒नेनाति॑ तराणि मृ॒त्युम् ॥

०३ यो दाधार ...{Loading}...

Whitney
Translation
  1. That which sustained the all-nourishing earth; which filled the
    atmosphere with sap; which, uplifted, established the sky with might—by
    that rice-mess let me overpass death.
Notes

The comm. explains viśvabhojasam by kṛtsnasya prāṇijātasya
bkogyabhūtām
.

Griffith

That which upholds the Earth, the all-sustainer, that which hath filled air’s middle realm with moisture, Which, raised on high in grandeur, stablished heaven,–I with this Odana will conquer Mrityu.

पदपाठः

यः। दा॒धार॑। पृ॒थि॒वीम्। वि॒श्वऽभो॑जसम्। यः। अ॒न्तरि॑क्षम्। आ॒ऽअपृ॑णात्। रसे॑न। यः। अस्त॑भ्नात्। दिव॑म्। ऊ॒र्ध्वः। म॒हि॒म्ना। तेन॑। ओ॒द॒नेन॑। अति॑। त॒रा॒णि॒। मृ॒त्युम्। ३५.३।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • अतिमृत्युः
  • प्रजापतिः
  • भुरिक्त्रिष्टुप्
  • मृत्युसंतरण सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

ब्रह्मविद्या का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (यः) जिस परमेश्वर ने (विश्वभोजसम्) सबका पालन करनेवाली (पृथिवीम्) पृथिवी को (दाधार) धारण किया था, (यः) जिसने (अन्तरिक्षम्) अन्तरिक्ष को (रसेन) रस अर्थात् अन्न वा जल से (आ अपृणात्) भर दिया है। (यः) जिसने (महिम्ना) अपनी महिमा से (ऊर्ध्वः) ऊँचा होकर (दिवम्) प्रकाशमान सूर्य को (अस्तभ्नात्) ठहराया है। (तेन) उस (ओदनेन) बढ़ानेवाले वा अन्नरूप परमात्मा के साथ…. म० १ ॥३॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - परमात्मा ने पृथिवी आदि लोकों और सब चराचर जगत् को रचकर धारण किया है और जो सबसे ऊपर विराजमान है, उसकी महिमा को विचार कर हम अपनी उन्नति करें ॥३॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: ३−(यः) ओदनः (दाधार) धृतवान् (पृथिवीम्) भूमिम् (विश्वभोजसम्) भुज पालनाभ्यवहारयोः-असुन्। सर्वस्य पालयित्रीम् (अन्तरिक्षम्) मध्यलोकम् (आ-अपृणात्) पॄ पालनपूरणयोः-लङ्। सम्यक् पूरितवान् (रसेन) अन्नेन-निघ० २।७। उदकेन-निघ० १।१२। (अस्तभ्नात्) स्तन्भु रोधने-लङ्। अवरुद्धवान्। दृढीकृतवान् (दिवम्) प्रकाशमानं सूर्यम् (ऊर्ध्वः) उपरि वर्तमानः सन् (महिम्ना) महत्त्वेन। प्रभावेण। अन्यत् पूर्ववत् म० १ ॥

०४ यस्मान्मासा निर्मितास्त्रिंशदराः

विश्वास-प्रस्तुतिः ...{Loading}...

यस्मा॒न्मासा॒ निर्मि॑तास्त्रिं॒शद॑राः संवत्स॒रो यस्मा॒न्निर्मि॑तो॒ द्वाद॑शारः।
अ॑होरा॒त्रा यं प॑रि॒यन्तो॒ नापुस्तेनौ॑द॒नेनाति॑ तराणि मृ॒त्युम् ॥

०४ यस्मान्मासा निर्मितास्त्रिंशदराः ...{Loading}...

Whitney
Translation
  1. That out of which were fashioned the thirty-spoked months; out of
    which was fashioned the twelve-spoked year; that which circling
    days-and-nights did not attain—by that rice-mess let me overpass death.
Notes

SPP. gives in c the pada-reading ahorātrā́ḥ, as required by the
participle pariyántas; all the pada-mss. have -trā́; the comm. has
paryantas, but explains it as paryāvartamānās, and says nothing
about the abnormal form. The verse (11 + 13: 11 + 11 = 46) is in no
respect a jagatī; the ejection of yásmāt in b would make it
regular.

Griffith

From which the months with thirty spokes were moulded, from which the twelve-spoked year was formed and fashioned. Which circling day and night have ne’er o’ertaken,–I with this Odana will conquer Mrityu.

पदपाठः

यस्मा॑त्। मासाः॑। निःऽमि॑ता। त्रिं॒शत्ऽअ॑राः। स॒म्ऽव॒त्स॒रः। यस्मा॑त्। निःऽर्मि॑तः। द्वाद॑शऽअरः। अ॒हो॒रा॒त्राः। यम्। प॒रि॒ऽयन्तः॑। न। आ॒पुः। तेन॑। ओ॒द॒नेन॑। अति॑। त॒रा॒णि॒। मृ॒त्युम्। ३५.४।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • अतिमृत्युः
  • प्रजापतिः
  • जगती
  • मृत्युसंतरण सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

ब्रह्मविद्या का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (यस्मात्) जिस [परमात्मा] से (त्रिंशदराः) तीस अरोंवाले (मासाः) महीने (निर्मिताः) बने हैं, (यस्मात्) जिससे (द्वादशारः) बारह अरों [के समान महीनों]वाला (संवत्सरः) संवत् (निर्मितः) बना है। (यम्) जिस को (परियन्तः) घूमते हुए (अहोरात्राः) दिन-रात (न) नहीं (आपुः) पकड़ सके हैं। (तेन) उस (ओदनेन) बढ़ानेवाले वा अन्नरूप परमात्मा के साथ… म० १ ॥४॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - परमात्मा ने दिन-रात आदि कालचक्र बनाया है परन्तु वह अनादि अनन्त होने से काल के अधिकार से बाहिर है। उसीकी उपासना सब मनुष्य करें ॥४॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: ४−(यस्मात्) ओदनात्परमेश्वरात् (मासाः) मस परिमाणे-घञ्। मस्यते परिमीयते कालोऽनेन स मासः। शुक्लकृष्णपक्षद्वयात्मकाः कालाः (निर्मिताः) रचिताः (त्रिंशदराः) रथचक्रावयवाः कीलका अराः। चक्रवदावर्तमानत्वान्मासास्तथा रूप्यन्ते। त्रिंशत्संख्याकानि दिनानि अरा इव येषां ते तथोक्ताः (संवत्सरः) अ० १।३५।४। द्वादशमासात्मकः कालः (यस्मात्) (निर्मितः) (द्वादशारः) द्वादशमासा अराइव चक्रे स्थिता यस्मिन् स तथाभूतः (अहोरात्राः) अहानि च रात्रयश्च (यम्) परमात्मानम् (परियन्तः) परिगच्छन्तः। परिवर्त्तमानाः (न) निषेधे (आपुः) प्राप्तवन्तः। अन्यत् पूर्ववत्। म० १ ॥

०५ यः प्राणदः

विश्वास-प्रस्तुतिः ...{Loading}...

यः प्रा॑ण॒दः प्रा॑ण॒दवा॑न्ब॒भूव॒ यस्मै॑ लो॒का घृ॒तव॑न्तः॒ क्षर॑न्ति।
ज्योति॑ष्मतीः प्र॒दिशो॒ यस्य॒ सर्वा॒स्तेनौ॑द॒नेनाति॑ तराणि मृ॒त्युम् ॥

०५ यः प्राणदः ...{Loading}...

Whitney
Translation
  1. That which became breath-giving, possessing breath-giving ones (?);
    for which worlds rich in ghee flow; whose are all the light-filled
    directions—by that rice-mess let me overpass death.
Notes

The pada-text does not divide prāṇadáḥ, and it makes the division
prāṇadá॰vān, which the translation follows; our text (either by a
misprint or by an unsuccessful

attempt at emendation) reads

-dā́vān;

-dā́vā

, as nom. of

-dā́van

, might be an improvement; the comm. reads

-davām

, viewing it as gen. pl. of

prāṇa-dū

, from

‘burn,’ and he explains it as “moribund” (

mumūrṣu: prāṇāir jigamiṣubhiḥ paritāpyante

)!

Griffith

Which hath become breath-giver, life-bestower; to which the worlds flow full of oil and fatness, To whom belong all the refulgent regions,–I with this Odana will conquer Mrityu.

पदपाठः

यः। प्रा॒ण॒दः। प्रा॒ण॒दऽवा॑न्। ब॒भूव॑। यस्मै॑। लो॒काः। घृ॒तऽव॑न्तः। क्षर॑न्ति। ज्योति॑ष्मतीः। प्र॒ऽदिशः॑। यस्य॑। सर्वाः॑। तेन॑। ओ॒द॒नेन॑। अति॑। त॒रा॒णि॒। मृ॒त्युम्। ३५.५।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • अतिमृत्युः
  • प्रजापतिः
  • त्रिष्टुप्
  • मृत्युसंतरण सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

ब्रह्मविद्या का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (यः) जो परमेश्वर (प्राणदः) प्राण देनेवाला और (प्राणदवान्) प्राणदाताओं [सूर्य पृथिवी वायु आदि] का रखनेवाला (बभूव) हुआ और (यस्मै) जिसके लिये (घृतवन्तः) प्रकाशमान वा सारवान् (लोकाः) सब लोक (क्षरन्ति) बहते हैं। और (यस्य) जिस की ही (सर्वाः) सब (ज्योतिष्मतीः=०-त्यः) तेजोमय (प्रदिशः) बड़ी दिशाएँ हैं। (तेन) उस (ओदनेन) बढ़ानेवाले वा अन्नरूप परमात्मा के साथ… म० १ ॥५॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - सब लोक-लोकान्तर और सब पदार्थ परमेश्वर के वशवर्ती हैं। उसकी आज्ञा पालन से हम सदा सुखी रहें ॥५॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: ५−(यः) ओदनः। परमात्मा (प्राणदः) प्राणदाता (प्राणदवान्) प्राणदैः प्राणप्रदैः सूर्यपृथिवीवाय्वादिभिर्युक्तः (बभूव) (यस्मै) परमेश्वराय (लोकाः) दृश्यमानानि भुवनानि (घृतवन्तः) दीप्तिमन्तः। सारवन्तः (क्षरन्ति) स्रवन्ति (ज्योतिष्मतीः) प्रशस्ततेजस्काः। प्रकाशवत्यः (प्रदिशः) प्रकृष्टा दिशाः (यस्य) ओदनस्य सम्बन्धिन्यः सन्ति (सर्वाः) समस्ताः। अन्यत् पूर्ववत्। म० १ ॥

०६ यस्मात्पक्वादमृतं सम्बभूव

विश्वास-प्रस्तुतिः ...{Loading}...

यस्मा॑त्प॒क्वाद॒मृतं॑ संब॒भूव॒ यो गा॑य॒त्र्या अधि॑पतिर्ब॒भूव॑।
यस्मि॒न्वेदा॒ निहि॑ता वि॒श्वरू॑पा॒स्तेनौ॑द॒नेनाति॑ तराणि मृ॒त्युम् ॥

०६ यस्मात्पक्वादमृतं सम्बभूव ...{Loading}...

Whitney

यस्मा॑त् प॒क्वाद॒मृतं॑ संब॒भूव॒ यो गा॑य॒त्र्या अधि॑पतिर्ब॒भूव॑ ।
यस्मि॒न् वेदा॒ निहि॑ता वि॒श्वरू॑पा॒स्तेनौ॑द॒नेनाति॑ तराणि मृ॒त्युम्॥६॥

Griffith

From which, matured, sprang Amrit into being, which hath become Gayatris lord and ruler, In which the perfect Vedas have been treasured,–I with this Odana will conquer Mrityu,

पदपाठः

यस्मा॑त्। प॒क्वात्। अ॒मृत॑म्। स॒म्ऽब॒भूव॑। यः। गा॒य॒त्र्याः। अधि॑ऽपतिः। ब॒भूव॑। यस्मि॑न्। वेदाः॑। निऽहि॑ताः। वि॒श्वऽरू॑पाः। तेन॑। ओ॒द॒नेन॑। अति॑। त॒रा॒णि॒। मृ॒त्युम्। ३५.६।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • अतिमृत्युः
  • प्रजापतिः
  • त्रिष्टुप्
  • मृत्युसंतरण सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

ब्रह्मविद्या का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (यस्मात् पक्वात्) जिस परिपक्व परमात्मा से (अमृतम्) मोक्ष (संबभूव) उत्पन्न हुआ, (यः) जो (गायत्र्याः) गायत्री [स्तुति वा वेदवाणी] का (अधिपतिः) अधिपति (बभूव) हुआ, (यस्मिन्) जिसमें (विश्वरूपाः) सबसे कीर्तन योग्य अथवा सबका निरूपण करनेवाले (वेदाः) वेद (निहिताः) निधिरूप से स्थित हैं। (तेन) उस (ओदनेन) बढ़ानेवाले वा अन्नरूप परमात्मा के साथ (मृत्युम्) मरण के कारण [निरुत्साह आदि दोष] को (अति=अतीत्य) लाँघकर (तराणि) मैं तरजाऊँ ॥६॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - जिस परमात्मा ने कल्याणमयी वेदवाणी देकर मनुष्यों को मोक्ष का अधिकारी किया है, उसके गुण कर्म स्वभाव को पहिचान कर हम सदा पुरुषार्थ करते रहें ॥६॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: ६−(यस्मात्) परमात्मनः (पक्वात्) दृढस्वभावात् (अमृतम्) अमरणहेतुः। मोक्षः (संबभूव) उत्पन्नं बभूव (यः) (गायत्र्याः) अ० ३।३।२। अभिनक्षियजि०। उ० ३।१०५। इति गै शब्दे-अत्रन्, स च णित्, ङीप्। गायत्रं गायतेः स्तुतिकर्मणः-निरु० ७।१२। गायनीयायाः स्तुतेः। वेदवाण्याः। (अधिपतिः) स्वामी (बभूव) (यस्मिन्) (वेदाः) विद ज्ञाने, विद सत्तायाम्, विद्लृ लाभे विद विचारणे-घञ्। धर्मब्रह्मप्रतिपादकानि ऋग्यजुःसामाथर्वात्मकानि अपौरुषेयाणि शास्त्राणि (निहिताः) निधिरूपेण स्थापिताः (विश्वरूपाः) खष्पशिल्पशष्पवाष्परूपपर्पतल्पाः। उ० ३।२८। इति रु शब्दे-प, दीर्घश्च। यद्वा रूप रूपक्रियायाम् अच्, रूयते रूप्यते वा रूपम्। सर्वै रूयमाणाः कीर्त्यमानाः। सर्वेषां पदार्थानां रूपका निरूपकाः। अन्यत् पूर्ववत् ॥

०७ अव बाधे

विश्वास-प्रस्तुतिः ...{Loading}...

अव॑ बाधे द्वि॒षन्तं॑ देवपी॒युं स॒पत्ना॒ ये मेऽप॑ ते भवन्तु।
ब्र॑ह्मौद॒नं वि॑श्व॒जितं॑ पचामि शृ॒ण्वन्तु॑ मे श्र॒द्दधा॑नस्य दे॒वाः ॥

०७ अव बाधे ...{Loading}...

Whitney

अव॑ बाधे द्वि॒षन्तं॑ देवपी॒युं स॒पत्ना॒ ये मेऽप॒ ते भ॑वन्तु ।
ब्र॒ह्मौ॒द॒नं वि॑श्व॒जितं॑ पचामि शृ॒ण्वन्तु॑ मे श्र॒द्दधा॑नस्य दे॒वाः ॥७॥

Griffith

I drive away the hostile God-despiser: far off be those who are mine adversaries, I dress Brahmaudana that winneth all things. May the Gods hear me who believe and trust them.

पदपाठः

अव॑। बा॒धे॒। द्वि॒षन्त॑म्। दे॒व॒ऽपी॒युम्। स॒ऽपत्नाः॑। ये। मे॒। अप॑। ते। भ॒व॒न्तु॒। ब्र॒ह्म॒ऽओ॒द॒नम्। वि॒श्व॒ऽजित॑म्। प॒चा॒मि॒। शृ॒ण्वन्तु॑। मे॒। श्र॒त्ऽदधा॑नस्य। दे॒वाः। ३५.७।

अधिमन्त्रम् (VC)
  • अतिमृत्युः
  • प्रजापतिः
  • त्रिष्टुप्
  • मृत्युसंतरण सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः

ब्रह्मविद्या का उपदेश।

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः

पदार्थान्वयभाषाः - (द्विषन्तम्) द्वेष करनेवाले (देवपीयुम्) देवताओं के हिंसक को (अव बाधे) मैं हटाता हूँ। (ये) जो (मे) मेरे (सपत्नाः) प्रतियोगी हैं, (ते) वे (अप भवन्तु) हट जावें। (विश्वजितम्) संसार के जीतनेवाले (ब्रह्मौदनम्) सबसे बड़े सींचनेवाले वा अन्नरूप परमात्मा को (पचामि) पक्का [हृदय में दृढ़] करता हूँ। (देवाः) व्यवहारकुशल विद्वान् लोग (श्रद्दधानस्य) श्रद्धा रखनेवाले (मे) मेरी [वार्ता] (शृण्वन्तु) सुनें ॥७॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः

भावार्थभाषाः - मनुष्य जगदीश्वर में पूरी भक्ति करके पुरुषार्थपूर्वक अपने सब विघ्नों को हटा कर आनन्द भोगें ॥७॥ इति सप्तमोऽनुवाकः ॥

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी

टिप्पणी: ७−(अव बाधे) अपवारयामि (द्विषन्तम्) हिंसन्तम् (देवपीयुम्) पीयतिर्हिंसाकर्मा-निरु० ४।२५। खरुशङ्कुपीयु०। उ० १।३६। इति पीयतेः-कु। देवानां हिंसकम् (सपत्नाः) अ० १।९।२। शत्रवः (ये) (मे) मम (अपभवन्तु) दूरे गच्छन्तु (ते) शत्रवः (ब्रह्मौदनम्) ओदन इति व्याख्यातम्-सू० ३४ म० १। प्रवृद्धं सेचकं प्रवर्धकम् अन्नरूपं वा परमात्मानम् (विश्वजितम्) सर्वस्य जेतारम् (पचामि) परिपक्वं दृढं करोमि (शृण्वन्तु) आकर्णयन्तु (मे) मम वाक्यम् (श्रद्दधानस्य) श्रद्धाधारकस्य (देवाः) व्यवहारिणो विद्वांसः ॥