०२० पिशाचक्षयणम् ...{Loading}...
Whitney subject
- To discover sorcerers: with an herb.
VH anukramaṇī
पिशाचक्षयणम्।
१-९ मातृनामा। मातृनामा। अनुष्टुप्, १ स्वराट्, ९ भुरिक्।
Whitney anukramaṇī
[Mātṛnāman.—navarcam. mātṛnāmadāivatam. ānuṣṭubham: 1. svarāj; 9. bhurij.]
Whitney
Comment
Found in Pāipp. viii. (in the verse-order 1-4, 7, 6, 8, 9, 5). Reckoned by Kāuś. (8. 25) to the cātanāni; and by the schol. (8. 24, note) added to the mātṛnāmāni: with good reason, if we may trust the Anukr. (which adds to what is given above: anena mātṛnāmāu ’ṣadhim evā ’stāut); but the comm. says nothing about it. The hymn is used by itself (28. 7) to accompany the binding on of an amulet of sadampuṣpā ’ever-flowering’ (or, as the comm. and schol. say, trisandhyā) in a healing ceremony (the comm. says, against brahmagraha and the like).
Translations
Translated: Ludwig, p. 525; Grill, 2, 133; Griffith, i. 159; Bloomfield, 68, 398; Weber, xviii. 84.—See also Hillebrandt, Veda-chrestomathie, p. 48.
Griffith
A charm for the acquisition of superhuman powers of sight
०१ आ पश्यति
विश्वास-प्रस्तुतिः ...{Loading}...
आ प॑श्यति॒ प्रति॑ पश्यति॒ परा॑ पश्यति॒ पश्य॑ति।
दिव॑म॒न्तरि॑क्ष॒माद्भूमिं॒ सर्वं॒ तद्दे॑वि पश्यति ॥
मूलम् ...{Loading}...
मूलम् (VS)
आ प॑श्यति॒ प्रति॑ पश्यति॒ परा॑ पश्यति॒ पश्य॑ति।
दिव॑म॒न्तरि॑क्ष॒माद्भूमिं॒ सर्वं॒ तद्दे॑वि पश्यति ॥
०१ आ पश्यति ...{Loading}...
Whitney
Translation
- He (?) looks on, he looks toward, he looks away, he looks: the sky,
the atmosphere, then the earth—all that, O divine one (f.), he looks at.
Notes
Ppp. has the 2d sing, paśyasi all the five times, and it is an easier
reading (adopted by Grill in his translation), especially in d,
unless we may emend devi to devī́; according to the comm., the
subject throughout is the wearer of the amulet, and the divine one, as
is also indicated by Kāuś., is the sadampuṣpā plant, a plant evidently
having something about it that resembles or suggests eyes. Ppp. reads
ā for āt in c. ⌊Read prá for práti in a? Pronounce
divāntar- in c.⌋
Griffith
It sees in front, it sees behind, it sees afar away, it sees The sky, the firmament, and earth: all this, O Goddess, it beholds.
पदपाठः
आ। प॒श्य॒ति॒। प्रति॑। प॒श्य॒ति॒। परा॑। प॒श्य॒ति॒। पश्य॑ति। दिव॑म्। अ॒न्तरि॑क्षम्। आत्। भूमि॑म्। सर्व॑म्। तत्। दे॒वि॒। प॒श्य॒ति॒। २०.१।
अधिमन्त्रम् (VC)
- मातृनामौषधिः
- मातृनामा
- अनुष्टुप्
- पिशाचक्षयण सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः
ब्रह्म की उपासना का उपदेश।
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः
पदार्थान्वयभाषाः - (देवि) हे दिव्यशक्ति परमात्मन् ! तू, (तत्) विस्तार करनेवाला वा विस्तीर्ण ब्रह्म आप (आ) अभिमुख (पश्यति) देखता है, (प्रति) पीछे से (पश्यति) देखता है, (परा) दूर से (पश्यति) देखता है, और (पश्यति) सामान्यतः देखता है। (दिवम्) सूर्यलोक, (अन्तरिक्षम्) मध्यलोक (आत्) और भी (भूमिम्) भूमि अर्थात् (सर्वम्) सबको (पश्यति) देखता है ॥१॥
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः
भावार्थभाषाः - वह ब्रह्म सब संसार को एक रस देखता रहता है, इसलिये सब मनुष्य उसकी उपासना करके दुष्कर्मों से बचकर सत्कर्मों में प्रवृत्त रहें ॥१॥
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी
टिप्पणी: १−(आ) अभिमुखम् (पश्यति) अवलोकयति (प्रति) प्रतिमुखम् (परा) दूरतः (पश्यति) अविशेषेण साक्षात्करोति (दिवम्) सूर्यलोकम् (अन्तरिक्षम्) मध्यलोकम् (आत्) अपि च (भूमिम्) पृथिवीम् (सर्वम्) सकलम् (तत्) त्यजितनियजिभ्यो डित्। उ० १।१३२। इति तनु विस्तारोपकृतिशब्दोपतापेषु-अदि, स च डित्। विस्तारकं विस्तीर्णं वा, ब्रह्मनामैतत्। (देवि) हे दिव्यशक्ते त्वं तद् ब्रह्म भवत् (पश्यति) ॥
०२ तिस्रो दिवस्तिस्रः
विश्वास-प्रस्तुतिः ...{Loading}...
ति॒स्रो दिव॑स्ति॒स्रः पृ॑थि॒वीः षट्चे॒माः प्र॒दिशः॒ पृथ॑क्।
त्वया॒हं सर्वा॑ भू॒तानि॒ पश्या॑नि देव्योषधे ॥
मूलम् ...{Loading}...
मूलम् (VS)
ति॒स्रो दिव॑स्ति॒स्रः पृ॑थि॒वीः षट्चे॒माः प्र॒दिशः॒ पृथ॑क्।
त्वया॒हं सर्वा॑ भू॒तानि॒ पश्या॑नि देव्योषधे ॥
०२ तिस्रो दिवस्तिस्रः ...{Loading}...
Whitney
Translation
- Three skies, three earths, and these six directions severally—by
thee let me see all beings, O divine herb.
Notes
Ppp. has mahī (for -īḥ) instead of pṛthak in b, and in the
second half-verse, tathā ’ham sarvā yātṝṇa paśyāmi. Some of our mss.
(P.M.) give páṣyāṇi in d. Pāda a is redundant by a syllable,
unless we pronounce pṛthvī́s. ⌊For the triplicity, comm. cites RV. ii.
27. 8 and AB. ii. 17 end.⌋
Griffith
Through thee, O godlike Plant, may I behold all creatures that exist, Three several heavens, three several earths, and these six regions one by one.
पदपाठः
ति॒स्रः। दिवः॑। ति॒स्रः। पृ॒थि॒वी। षट्। च॒। इ॒माः। प्र॒ऽदिशः॑। पृथ॑क्। त्वया॑। अ॒हम्। सर्वा॑। भू॒तानि॑। पश्या॑नि। दे॒वि॒। ओ॒ष॒धे॒। २०.२।
अधिमन्त्रम् (VC)
- मातृनामौषधिः
- मातृनामा
- स्वराडनुष्टुप्
- पिशाचक्षयण सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः
ब्रह्म की उपासना का उपदेश।
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः
पदार्थान्वयभाषाः - (देवि) हे दिव्य शक्ति, (ओषधे) तापनाशक परमात्मन् ! (त्वया) तेरे सहारे से (अहम्) मैं (तिस्रः) तीनों (दिवः) सूर्य लोकों, (तिस्रः) तीनों (पृथिवीः) भूमियों (च) और (इमाः) इन (षट्) छह (प्रदिशः) फैली हुई दिशाओं और (सर्वा) सब (भूतानि) सृष्ट पदार्थों को (पृथक्) नाना प्रकार से (पश्यानि) देखूँ ॥२॥
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः
भावार्थभाषाः - मनुष्य परमेश्वर की महिमा के साथ तीन उत्तम, मध्यम और अधम प्रकार से संसार के सब पदार्थों को साक्षात् करके विज्ञानपूर्वक उनसे उपकार लेवे ॥२॥
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी
टिप्पणी: २−(तिस्रः) उत्तममध्यमाधमरूपेण त्रिसंख्याकाः (दिवः) द्युलोकान् (पृथिवीः) भूलोकान् (षट्) प्राच्याद्या ऊर्ध्वाधोदिग्भ्यां सह षट्संख्याकाः (च) (इमाः) परिदृश्यमानाः (प्रदिशः) प्रकृष्टा दिशाः (पृथक्) नानारूपेण (त्वया) ब्रह्मणा सहायेन (अहम्) उपासकः (सर्वा) सर्वाणि (भूतानि) भूतजातानि (पश्यानि) साक्षात्करवाणि (देवि) हे दिव्यशक्ते (ओषधे) हे अन्नाद्योषधिवत् तापनाशक परमात्मन् ॥
०३ दिव्यस्य सुपर्णस्य
विश्वास-प्रस्तुतिः ...{Loading}...
दि॒व्यस्य॑ सुप॒र्णस्य॒ तस्य॑ हासि क॒नीनि॑का।
सा भूमि॒मा रु॑रोहिथ व॒ह्यं श्रा॒न्ता व॒धूरि॑व ॥
मूलम् ...{Loading}...
मूलम् (VS)
दि॒व्यस्य॑ सुप॒र्णस्य॒ तस्य॑ हासि क॒नीनि॑का।
सा भूमि॒मा रु॑रोहिथ व॒ह्यं श्रा॒न्ता व॒धूरि॑व ॥
०३ दिव्यस्य सुपर्णस्य ...{Loading}...
Whitney
Translation
- Of that heavenly eagle art thou the eye-pupil; thou here hast
ascended the earth as a wearied bride (vadhū́) a litter.
Notes
Ppp. puts divyasya after suparṇasya. The ground of the comparisons
made in the verse is altogether obscure, and the comm. casts no light
upon them. ⌊Bloomfield discusses this vs., AJP. xvii. 402.⌋
Griffith
The pupil, verily, art thou of that celestial Engle’s eye. On earth hast thou alighted as a weary woman seeks her couch.
पदपाठः
दि॒व्यस्य॑। सु॒ऽप॒र्णस्य॑। तस्य॑। ह॒। अ॒सि॒। क॒नीनि॑का। सा। भूमि॑म्। आ। रु॒रो॒हि॒थ॒। व॒ह्यम्। श्रा॒न्ता। व॒धूःऽइ॑व। २०.३।
अधिमन्त्रम् (VC)
- मातृनामौषधिः
- मातृनामा
- अनुष्टुप्
- पिशाचक्षयण सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः
ब्रह्म की उपासना का उपदेश।
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः
पदार्थान्वयभाषाः - (तस्य) उस (दिव्यस्य) दिव्य गुणवाले (सुपर्णस्य) यथावत् पालनीय जीव की तू (ह) अवश्य (कनीनिका) कमनीया देवी, अथवा नेत्र तारा समान (असि) है। (सा=सा त्वम्) उस तूने (भूमिम्) हृदय भूमि को (आ रुरोहिथ) प्राप्त किया है, (इव) जैसे (श्रान्ता) थकी हुई, वा शान्त स्वभाव, वा जितेन्द्रिय (वधूः) स्त्री (वह्यम्) अपने पाने योग्य पदार्थ को [प्राप्त करती है] ॥३॥
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः
भावार्थभाषाः - जैसे-जैसे योगी समाधि लगाकर परमात्मा की महिमा देखता है, वैसे-वैसे ही परमात्मा उसके हृदय में दृढ़ भूमि होता है, जैसे जितेन्द्रिय स्त्री वा पुरुष ठिकाने पर पहुँचकर ठहर जाता है ॥३॥
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी
टिप्पणी: ३−(दिव्यस्य) दिव्यस्वभावस्य (सुपर्णस्य) पॄ पालनपूरणयोः-न। सुष्ठु यथावत् पालनीयस्य जीवस्य (तस्य) प्रसिद्धस्य (ह) प्रसिद्धौ (असि) (कनीनिका) कनी दिप्तिकान्तिगतिषु-ईन, कन्, टाप्, अत इत्वम्। कमनीया। यद्वा, चक्षुस्तारावत् प्रदर्शिका (सा) सा त्वं देवी (भूमिम्) योगिनो हृदयभूमिम् (आ रुरोहिथ) आरूढवती, प्राप्तवती (वह्यम्) अघ्न्यादयश्च। उ० ४।११२। इति वह-थक्। यद्वा। वह्यं करणम्। पा० ३।१।१०२। इति वह-यत्। प्रापणीयं पदार्थं स्थानं वा (श्रान्ता) श्रमु तपःखेदयोः=क। अध्वश्रमयुक्ता। शान्ता। जितेन्द्रिया (वधूः) वहेर्धश्च। उ० १।८३। इति वह प्रापणे-ऊ प्रत्ययः, हस्य धः। वहति सुखानि। यद्वा। बन्ध-ऊः, नलोपः, बध्नाति प्रेम्णा या। नारी, स्त्री (इव) यथा ॥
०४ तां मे
विश्वास-प्रस्तुतिः ...{Loading}...
तां मे॑ सहस्रा॒क्षो दे॒वो दक्षि॑णे॒ हस्त॒ आ द॑धत्।
तया॒हं सर्वं॑ पश्यामि॒ यश्च॑ शू॒द्र उ॒तार्यः॑ ॥
मूलम् ...{Loading}...
मूलम् (VS)
तां मे॑ सहस्रा॒क्षो दे॒वो दक्षि॑णे॒ हस्त॒ आ द॑धत्।
तया॒हं सर्वं॑ पश्यामि॒ यश्च॑ शू॒द्र उ॒तार्यः॑ ॥
०४ तां मे ...{Loading}...
Whitney
Translation
- May the thousand-eyed god set it in my right hand; with it do I see
every one, both who is śūdra and [who] Āryan.
Notes
Ppp. has hast’ ādadat at end of b, and, for second half-verse,
tato ‘haṁ sarvaṁ paśyāmi adbhūtaṁ (sic) yac ca bhavyam. Paśyāni
would be an acceptable emendation in c. The comm. (with one of SPP’s
mss.) reads tvayā in c; he regards the “god” in a as Indra.
Griffith
The God who hath a thousand eyes give me this Plant in my right hand! I look on every one therewith, each Sudra and each Aryan man.
पदपाठः
ताम्। मे॒। स॒ह॒स्र॒ऽअ॒क्षः। दे॒वः। दक्षि॑णे। हस्ते॑। आ। द॒ध॒त्। तया॑। अ॒हम्। सर्व॑म्। प॒श्या॒मि॒। यः। च॒। शू॒द्रः। उ॒त। आर्यः॑। २०.४।
अधिमन्त्रम् (VC)
- मातृनामौषधिः
- मातृनामा
- अनुष्टुप्
- पिशाचक्षयण सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः
ब्रह्म की उपासना का उपदेश।
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः
पदार्थान्वयभाषाः - (सहस्राक्षः) असंख्य दर्शन शक्तिवाला अथवा सहस्रों व्यवहारोंवाला (देवः) प्रकाशस्वरूप परमात्मा (दक्षिणे) प्रवृद्ध (हस्ते) प्रकाश के निमित्त (ताम्) उपकारशक्ति (मे) मुझ को (आ) सब ओर से (दधत्) दान कर रहा है, (तया) उस [उपकारशक्ति] से (अहम्) मैं (सर्वम्) सबको (पश्यामि) देखता हूँ, (यः च) जो कोई (शूद्रः) शोचनीय शूद्र अर्थात् मूर्ख (उत) अथवा (आर्यः) प्राप्त करने योग्य आर्य अर्थात् विद्वान् [ब्राह्मण, क्षत्रिय वा वैश्य] हो ॥४॥
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः
भावार्थभाषाः - सर्वव्यवहारकुशल, सर्वद्रष्टा, सर्वनियन्ता जगदीश्वर की दी हुई उपकारशक्ति द्वारा मनुष्य सब मनुष्यों और पदार्थों का यथावत् विवेक करके संसार की उन्नति करे ॥४॥
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी
टिप्पणी: ४−(ताम्) तनु विस्तारे, उपकृतौ च-ड। टाप्। विस्तृतिम् उपकृतिम् (मे) मह्यम् (सहस्राक्षः) अ० ४।१६।४। बहुदर्शकः। बहुव्यवहारवान्। असंख्यदर्शनः। (देवः) प्रकाशदानादिगुणयुक्तः परमेश्वरः (दक्षिणे) अ० ४।११।४। समर्थे। प्रवृद्धे (हस्ते) हसिमृग्रिण्०। उ० ३।८६। इति हस विकाशे-तन्। विकाशे। प्रकाशे निमित्ते (आ) समन्तात् (दधत्) ददद् वर्तते (तया) विस्तृत्या (अहम्) उपासकः (सर्वम्) शूद्रमार्यं च (पश्यामि) साक्षात्करोमि निर्णयामि (यः) (च) पक्षान्तरे (शूद्रः) शुचेर्दश्च। उ० २।१९। इति शुच शोके-रक्, चस्य दः, धातोर्दीर्घश्च। शोचनीयः। मूर्खः (उत) विकल्पे (आर्यः) ऋहलोर्ण्यत्। पा० ३।१।१२४। इति ऋ गतौ-ण्यत्। अर्त्तुं प्राप्तुं योग्यः। पूज्यः। श्रेष्ठः विद्वान्। ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यो वा। महाकुलकुलीनार्यसभ्यसज्जनसाधवः-इत्यमरः, १७।३ ॥
०५ आविष्कृणुष्व रूपाणि
विश्वास-प्रस्तुतिः ...{Loading}...
आ॒विष्कृ॑णुष्व रू॒पाणि॒ मात्मान॒मप॑ गूहथाः।
अथो॑ सहस्रचक्षो॒ त्वं प्रति॑ पश्याः किमी॒दिनः॑ ॥
मूलम् ...{Loading}...
मूलम् (VS)
आ॒विष्कृ॑णुष्व रू॒पाणि॒ मात्मान॒मप॑ गूहथाः।
अथो॑ सहस्रचक्षो॒ त्वं प्रति॑ पश्याः किमी॒दिनः॑ ॥
०५ आविष्कृणुष्व रूपाणि ...{Loading}...
Whitney
Translation
- Make manifest [thy] forms; do not hide thyself away; then mayest
thou, O thousand-eyed one, look upon the kimīdíns.
Notes
Literally (in d) ‘meet with thy look.’ Ppp. begins c with evā
instead of atho, and ends d with paśyāmy āyata. The abbreviation
in c of the stem -cakṣus to -cakṣu is one of those noted in the
Prāt. rules ii. 59 and iv. 100.
Griffith
Make manifest the forms of things; hide not their essences from sight. And, thou who hast a thousand eyes, look the Kimidins in the face.
पदपाठः
आ॒विः। कृ॒णु॒ष्व॒। रू॒पाणि॑। मा। आ॒त्मान॑म्। अप॑। गू॒ह॒थाः॒। अथो॒ इति॑। स॒ह॒स्र॒च॒क्षो॒ इति॑ सहस्रऽचक्षो। त्वम्। प्रति॑। प॒श्याः॒। कि॒मी॒दिनः॑। २०.५।
अधिमन्त्रम् (VC)
- मातृनामौषधिः
- मातृनामा
- अनुष्टुप्
- पिशाचक्षयण सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः
ब्रह्म की उपासना का उपदेश।
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः
पदार्थान्वयभाषाः - (रूपाणि) [पदार्थों के] रूपों अर्थात् बाहिरी आकार को (आविष्कृणुष्व) प्रकट करदे, (आत्मानम्) [वस्तुओं के] आत्मा अर्थात् भीतरी स्वभाव को (मा अप गूहथाः) गुप्त मत रख (अथो) और भी (सहस्रचक्षो) हे असंख्य दर्शन शक्तिवाले परमात्मन् ! (त्वम्) तू (किमीदिनः) अब क्या, वह क्या हो रहा है, ऐसे गुप्त कर्म करनेवाले लुतरे लोगों को (प्रति) अत्यक्ष (पश्याः) देखले ॥५॥
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः
भावार्थभाषाः - मनुष्य पदार्थों के आकार और गुण को स्थूल और सूक्ष्म रीति से पहिचानकर दोषों से बचें और दूसरों को बचावें ॥५॥
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी
टिप्पणी: ५−(आविष्कृणुष्व) प्रकटीकुरु। प्रकाशय (रूपाणि) खष्पशिल्पशष्प०। उ० ३।२८। इति रु शब्दे-प प्रत्ययः, दीर्घश्च। यद्वा, रूप रूपस्य दर्शने करणे वा-अच्। पदार्थानां बाह्याकारान् (मा अप गूहथाः) गुहू संवरणे। संवृतम् आच्छादितं मा कार्षीः (आत्मानम्) अ० १।१८।३। पदार्थानां सूक्ष्मस्वभावं सारं तत्त्वं वा (अथो) अपि च (सहस्रचक्षो) भृमृशीङ्०। उ० १।७। इति चक्षिङ् कथने दर्शने च-ड। हे बहुदर्शनशक्ते परमात्मन् (त्वम्)। (प्रति) प्रत्यक्षम् (पश्य) दृशेर्लेटि आडागमः। अवलोकय (किमीदिनः) अ० १।७।१। किमिदानीं वर्तते किमिदं वर्तते-इत्येवमन्वेषमाणान् पिशुनान् राक्षसान् ॥
०६ दर्शय मा
विश्वास-प्रस्तुतिः ...{Loading}...
द॒र्शय॑ मा यातु॒धाना॑न्द॒र्शय॑ यातुधा॒न्यः॑।
पि॑शा॒चान्त्सर्वा॑न्दर्श॒येति॒ त्वा र॑भ ओषधे ॥
मूलम् ...{Loading}...
मूलम् (VS)
द॒र्शय॑ मा यातु॒धाना॑न्द॒र्शय॑ यातुधा॒न्यः॑।
पि॑शा॒चान्त्सर्वा॑न्दर्श॒येति॒ त्वा र॑भ ओषधे ॥
०६ दर्शय मा ...{Loading}...
Whitney
Translation
- Show me the sorcerers; show the sorceresses; show all the piśācás:
with this intent I take hold of (ā-rabh) thee, O herb.
Notes
For second half-verse, Ppp. has āpaspṛg eva tiṣṭhantaṁ darśaya māṁ
kimīdinam.
Griffith
Make me see Yatudhanas, make thou Yatudhanis visible. Make me see all Pisachas With this prayer, O Plant, I hold thee fast.
पदपाठः
द॒र्शय॑। मा॒। या॒तु॒ऽधाना॑न्। द॒र्शय॑। या॒तु॒ऽधा॒न्यः᳡। पि॒शा॒चान्। सर्वा॑न्। द॒र्श॒य॒। इति॑। त्वा॒। आ। र॒भे॒। ओ॒ष॒धे॒। २०.६।
अधिमन्त्रम् (VC)
- मातृनामौषधिः
- मातृनामा
- अनुष्टुप्
- पिशाचक्षयण सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः
ब्रह्म की उपासना का उपदेश।
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः
पदार्थान्वयभाषाः - [हे परमात्मन् !] (यातुधानान्) यातना देनेवाले दोषों को (मा) मुझे (दर्शय) दिखा, (यातुधान्यः=०-नीः) महापीड़ा देनेवाली कुवासनाओं को (दर्शय) दिखा। (सर्वान्) सब (पिशाचान्) मांस खानेवाले विघ्नों को (दर्शय) दिखा, (ओषधे) हे तापनाशक परमेश्वर ! (इति) इसके लिये (त्वा) तेरा (आरभे) मैं सहारा लेता हूँ ॥६॥
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः
भावार्थभाषाः - मनुष्य की बाहिरी कुचेष्टाएँ और भीतरी कुवासनाएँ उसकी उन्नति के महाविघ्न हैं, इसलिये वह विवेकपूर्वक उनका संशोधन करे ॥६॥
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी
टिप्पणी: ६−(दर्शय) आविष्कारय, प्रकाशय (मा) माम् (यातुधानान्) पीडाप्रदान् दोषान् (यातुधान्यः) धातुधानीः। पीडाप्रदायिकाः कुवासनाः (सर्वान्) (पिशाचान्) अ० १।१६।३। पिशितस्य मांसस्य भक्षकान् महादुःखदायिनो विघ्नान् (इति) एवमर्थम् (त्वा) त्वां परमात्मानम् (आरभे) आलभे। स्पृशामि। धारयामि ॥
०७ कश्यपस्य चक्षुरसि
विश्वास-प्रस्तुतिः ...{Loading}...
क॒श्यप॑स्य॒ चक्षु॑रसि शु॒न्याश्च॑ चतुर॒क्ष्याः।
वी॒ध्रे सूर्य॑मिव॒ सर्प॑न्तं॒ मा पि॑शा॒चं ति॒रस्क॑रः ॥
मूलम् ...{Loading}...
मूलम् (VS)
क॒श्यप॑स्य॒ चक्षु॑रसि शु॒न्याश्च॑ चतुर॒क्ष्याः।
वी॒ध्रे सूर्य॑मिव॒ सर्प॑न्तं॒ मा पि॑शा॒चं ति॒रस्क॑रः ॥
०७ कश्यपस्य चक्षुरसि ...{Loading}...
Whitney
Translation
- The eye of Kaśyapa art thou, and of the four-eyed bitch; conceal thou
not the piśācá, like the sun gliding (sṛp) in the clear sky
(vīdhrá).
Notes
That is, allow him to be no more concealed than the sun etc. Both
editions read -akṣyā́s at end of b, but it is against the authority
of the mss., all of which (save two of SPP’s which follow the comm. in
giving the true reading) omit, as in numerous other cases, the y after
the sibilant. The comm. regards Saramā as referred to; and, in futile
attempt at explaining her possession of four eyes, says etenā
’pradhṛṣyaivam uktam. ⌊Cf. Weber, Berl. St., 1895, p. 849, n. 3.⌋ He
explains the reference to eyes by the resemblance of the flowers of the
plant in question; but this looks rather like a plausible guess than
like a statement on any authority. Ppp. has for first half-verse
kaśyapasya caturakṣas syaṅtyāś caturakṣā. The comm. derives vīdhra
from vi-idh, and glosses it with antarikṣa. The Anukr. appears to
approve the abbreviation to sū́ryam ’va in c. ⌊Bloomfield thinks
that kaśyapa punningly suggests paśyaka ‘seer,’ and cites TA. i. 8.
8, kaśyapaḥ paśyako bhavati yat sarvam paripaśyati.
Griffith
Thou art the sight of Kasyapa and of the hound who hath four eyes. Make the Pisacha manifest as Surya when he rides at noon.
पदपाठः
क॒श्यप॑स्य। चक्षुः॑। अ॒सि॒। शु॒न्याः। च॒। च॒तुः॒ऽअ॒क्ष्याः। वी॒ध्रे। सूर्य॑म्ऽइव। सर्प॑न्तम्। मा। पि॒शा॒चम्। ति॒रः। क॒रः॒। २०.७।
अधिमन्त्रम् (VC)
- मातृनामौषधिः
- मातृनामा
- अनुष्टुप्
- पिशाचक्षयण सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः
ब्रह्म की उपासना का उपदेश।
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः
पदार्थान्वयभाषाः - [हे परमात्मन् !] तू (कश्यपस्य) रस पीनेवाले सूर्य का (च) और (चतुरक्ष्याः) पूर्वादि चार प्रकार से व्याप्तिवाली (शुन्याः) बढ़ी हुई दिशा का (चक्षुः) देखनेवाला ब्रह्म (असि) है। (पिशाचम्) मांस खानेवाले [पीड़ादायक] विघ्न को (मा तिरस्करः) गुप्त मत रख [प्रकाश करदे], (वीध्रे) विशेष चमकने के समय अर्थात् मध्याह्न में (सर्पन्तम्) चलते हुए (सूर्यमिव) सूर्य को जैसे [नहीं छिपा सकते] ॥७॥
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः
भावार्थभाषाः - परमात्मा इस सब विशाल संसार को सर्वथा देखता है और सबके दोषों को इस प्रकार जानता है, जैसे दोषहर के सूर्य को। इससे सब मनुष्य दोषों को त्याग कर सदा सुख से रहें ॥७॥
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी
टिप्पणी: ७−(कश्यपस्य) अ० २।३७।७। कश्यं जलरसं पिबतीति, तस्य, सूर्यस्य (चक्षुः) दर्शकं ब्रह्म (असि) (शुन्याः) श्वन्नुक्षन्पूषन्०। उ० १।१५९। इति टुओश्वि गतिवृद्ध्योः-कनिन्, नान्तत्वात् ङीप्। व्याप्तायाः प्रवृद्धाया दिशायाः (चतुरक्ष्याः) चतुर्+अक्षू व्याप्तौ-इन-ङीप्। पूर्वादिदिग्रूपेण चतुर्विधानि अक्षीणि व्यापनानि यस्याः सा चतुरक्षी तस्याः। चतुर्विधव्यापनशीलायाः (वीध्रे) वाविन्धेः। उ० २।२६। इति वि+इन्धी दीप्तौ-क्रन्। विशेषदीप्तिकाले। (मध्याह्ने) (सूर्यमिव) (सर्पन्तम्) गच्छन्तम् (पिशाचम्) पिशितभक्षकं विघ्नम् (मा तिरस्करः) करोतेर्माङि लुङि। कृमृदृरुहिभ्यश्छन्दसि। पा० ३।१।५९। इति च्लेः अङ् आदेशः। अन्तर्हितं मा कार्षीः। सर्वथा प्रकाशय-इत्यर्थः ॥
०८ उदग्रभं परिपाणाद्यातुधानम्
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उद॑ग्रभं परि॒पाणा॑द्यातु॒धानं॑ किमी॒दिन॑म्।
तेना॒हं सर्वं॑ पश्याम्यु॒त शू॒द्रमु॒तार्य॑म् ॥
मूलम् ...{Loading}...
मूलम् (VS)
उद॑ग्रभं परि॒पाणा॑द्यातु॒धानं॑ किमी॒दिन॑म्।
तेना॒हं सर्वं॑ पश्याम्यु॒त शू॒द्रमु॒तार्य॑म् ॥
०८ उदग्रभं परिपाणाद्यातुधानम् ...{Loading}...
Whitney
Translation
- I have seized (ud-grabh) out of his shelter (paripā́ṇa) the
sorcerer, the kimīdín; with it do I see every one, both śūdra and
Āryan.
Notes
Ppp. has in a, b -pāṇaṁ yātudhānāt kimīdinaḥ. The comm. makes
tena refer here to yāludhānam, and supplies graham to
sarvam—evidently without reason.
Griffith
Kimidin, Yatudhana from their hiding-places have I dragged. I look on every one with this, Sudra and Aryan man alike.
पदपाठः
उत्। अ॒ग्र॒भ॒म्। प॒रि॒ऽपाना॑त्। या॒तु॒ऽधान॑म्। कि॒मी॒दिन॑म्। तेन॑। अ॒हम्। सर्व॑म्। प॒श्या॒मि॒। उ॒त। शू॒द्रम्। उ॒त। आर्य॑म्। २०.८।
अधिमन्त्रम् (VC)
- मातृनामौषधिः
- मातृनामा
- अनुष्टुप्
- पिशाचक्षयण सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः
ब्रह्म की उपासना का उपदेश।
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः
पदार्थान्वयभाषाः - (परिपाणात्) रक्षास्थान [अपने हृदय देश] से (यातुधानम्) पीड़ा देने हारे (किमीदिनम्) पिशुनरूप अपने दोष को (उत् अग्रभम्) मैंने पकड़ लिया है। (तेन) उसी से (अहम्) मैं (सर्वम्) सबको (पश्यामि) देखता हूँ, (यः च) जो कोई (शूद्रः) शोचनीय शूद्र अर्थात् मूर्ख, (उत) अथवा (आर्यः) प्राप्त करने योग्य आर्य अर्थात् विद्वान् [ब्राह्मण, क्षत्रिय वा वैश्य] हो ॥८॥
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः
भावार्थभाषाः - जितेन्द्रिय पुरुष आत्मदोष के निवारण और बुरे भले के विवेक से शिवसंकल्पी होकर अविद्या का नाश और विद्या का प्रकाश करके सुखी होता है ॥८॥ इस मन्त्र के उत्तरार्ध के लिये मन्त्र ४ देखो ॥
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी
टिप्पणी: ८−(उत् अग्रभम्) उत्कर्षेण अग्रहं गृहीतवानस्मि वशीकृतवानस्मि (परिपाणात्) परिरक्षणस्थानात्। हृदयदेशात् (यातुधानम्) यातनाप्रदम् (किमीदिनम्) म० ५। पिशुनरूपं स्वदोषम् (तेन) तेन कारणेन दोषनिग्रहेण। अन्यद् व्याख्यातं म० ४ ॥
०९ यो अन्तरिक्षेण
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यो अ॒न्तरि॑क्षेण॒ पत॑ति॒ दिवं॒ यश्चा॑ति॒सर्प॑ति।
भूमिं॒ यो मन्य॑ते ना॒थं तं पि॑शा॒चं प्र द॑र्शय ॥
मूलम् ...{Loading}...
मूलम् (VS)
यो अ॒न्तरि॑क्षेण॒ पत॑ति॒ दिवं॒ यश्चा॑ति॒सर्प॑ति।
भूमिं॒ यो मन्य॑ते ना॒थं तं पि॑शा॒चं प्र द॑र्शय ॥
०९ यो अन्तरिक्षेण ...{Loading}...
Whitney
Translation
- Whichever flies through the atmosphere, and whichever creeps across
the sky; whichever thinks the earth a refuge (nāthá)—that piśācá do
thou show forth.
Notes
Ppp. has for b bhomīś co ’pasarpati, and in c divam for
bhūmim; and its d is tvaṁ piśācaṁ dṛśe kuru. The comm. (with a
couple of SPP’s mss.) has adhi- instead of ati- in b; he glosses
nātham with svāminam. The verse is not bhurij if we combine yò
‘ntár- in a. ⌊Correct the misprinted verse-number.⌋
Here, at the end of the fourth anuvāka, with 5 hymns and 42 verses,
the old Anukr. says atha kuryād dvādaśa.
Here ends also the seventh prapāṭhaka.
Griffith
Make that Pisacha visible, the fiend who flies in middle air, The fiend who glides across the sky, and him who deems the earth his help.
पदपाठः
यः। अ॒न्तरि॑क्षेण। पत॑ति। दिव॑म्। यः। च॒। अ॒ति॒ऽसर्प॑ति। भूमि॑म्। यः। मन्य॑ते। ना॒थम्। तम्। पि॒शा॒चम्। प्र। द॒र्श॒य॒। २०.९।
अधिमन्त्रम् (VC)
- मातृनामौषधिः
- मातृनामा
- भुरिगनुष्टुप्
- पिशाचक्षयण सूक्त
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - विषयः
ब्रह्म की उपासना का उपदेश।
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पदार्थः
पदार्थान्वयभाषाः - (यः) जो [उपद्रवी] (अन्तरिक्षेण) मध्यवर्ती हृदय अवकाश द्वारा (पतति) नीचे गिरता है, (च) और (यः) जो (दिवम्) व्यवहार वा प्रकाश को (अतिसर्पति) लाँघकर रेंगता है, और (यः) जो (भूमिम्) अपनी सत्ता को [अहंकार से] (नाथम्) ईश्वर (मन्यते) मानता है, (तम्) उस (पिशाचम्) मांसभक्षक, दुःखदायक, आत्मा को (प्रदर्शय) तू दिखा दे ॥९॥
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - भावार्थः
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य मनोविकार से वेद मर्यादा छोड़ कुकर्मी बन जाता है, वह मनुष्य ईश्वरभक्ति से अपने अविद्यादि दोषों को छोड़कर सुखी होवे ॥९॥ इति चतुर्थोऽनुवाकः ॥ इति सप्तमः प्रपाठकः ॥
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी - पादटिप्पनी
टिप्पणी: ९−(यः) आत्मदोषः। उपद्रवी जनो वा (अन्तरिक्षेण) मध्यवर्त्तिना हृदयावकाशेन, तत्सहायेन (पतति) अधोगच्छति (दिवम्) इगुपधज्ञा०। पा० ३।१।१३५। इति दिवु क्रीडाविजिगीषाव्यवहारादिषु-क प्रत्ययः। व्यवहारम्। प्रकाशम् (यः) (च) (अतिसर्पति) (अतीत्य, उल्लङ्ध्य गच्छति (भूमिम्) अ० १।११।२। भू सत्तायाम्-मि। सत्ताम् (यः) (मन्यते) अहंकारेण जानाति (नाथम्) नाथ याच्ञोपतापैश्वर्याशीःषु-अच्। प्रभुम्। ईश्वरम् (तम्) (पिशाचम्) पिशिताशिनम्। दुःखदायकमात्मानम् (प्रदर्शय) अवगमय ॥