१० महायान साहित्य

महायानसूत्र

महायानसूत्र अनन्त हैं। उनमें कुछ उपलब्ध हैं, और कुछ मूल रूप में अनुपलब्ध हैं। भोट-भाषा, चीनी भाषा में अनेक सूत्रों के अनुवाद उपलब्ध हैं। कुछ सूत्र अवश्य ऐसे हैं, जिन का महायान बौद्ध परम्परा में अत्यधिक आदर है। ऐसे सूत्रों की संख्यायः है। इन ६ सूत्रों को ‘नव धर्म’ भी कहते हैं तथा ‘वैपुल्यसूत्र’ भी कहते हैं। वे इस प्रकार हैं-सद्धर्मपुण्डरीक, ललितविस्तर, लकावतार, सुवर्णप्रभास, गण्डव्यूह, तथागतगुह्यक, समाधिराज, दशभूमीश्वर एवं अष्टसाहसिका आदि प्रज्ञापारमितासूत्र।

(०१) सद्धर्मपुण्डरीक

महायान वैपुल्यसूत्रों में यह अन्यतम एवं एक आदृत सूत्र है। ‘पुण्डरीक’ का अर्थ ‘कमल’ होता है। ‘कमल’ पवित्रता और पूर्णता का प्रतीक होता है। जैसे पक (कीचड़) में उत्पन्न होने पर भी कमल उससे लिप्त नहीं होता, वैसे लोक में उत्पन्न होने पर भी बुद्ध लोक के दोषों से लिप्त नहीं होते। इसी अर्थ में सद्धर्मपुण्डरीक यह ग्रन्थ का सार्थक नाम है।
चीन, जापान, कोरिया, तिब्बत आदि महायानी देशों में इसका बड़ा आदर है और यह सूत्र बहुत पवित्र माना जाता है। चीनी भाषा में इसके छह अनुवाद हुए, जिसमें पहला अनुवाद ई. सन् २२३ में हुआ। धर्मरक्ष, कुमारजीव, ज्ञानगुप्त और धर्मगुप्त इन आचार्यों के अनुवाद भी प्राप्त होते हैं। चीन और जापान में आचार्य कुमारजीव- कृत इसका अनुवाद अत्यन्त लोकप्रिय है। ईसवीय ६१५ वर्ष में जापान के एक राजपुत्र शी-तोकु-ताय-शि ने इस पर एक टीका लिखी, जो अत्यन्त आदर के साथ पढ़ी जाती है। इस ग्रन्थ पर आचार्य वसुबन्धु ने ‘सद्धर्म-पुण्डरीकशास्त्र’ नामक टीका लिखी, जिसका बोधिरुचि और रत्नमति ने लगभग ५०८ ईसवीय वर्ष में चीनी भाषा में अनुवाद किया था। इसका सम्पादन १९६२ में प्रो. एच. कर्न एवं बुनियिउ नंजियों ने किया। _____ इस ग्रन्थ में कुल २७ अध्याय हैं, जिन्हें ‘परिवर्त’ कहा गया है। प्रथम निदान परिवर्त में इसमें उपदेश की पृष्ठभूमि और प्रयोजन की चर्चा करते हुए कहा गया है कि यह ‘वैपुल्यसूत्रराज’ है। इस परिच्छेद का मुख्य प्रतिपाद्य तो भगवान् का यह कहना है कि “तथागत नाना निरुक्ति और निदर्शनों (उदाहरणों) से, विविध उपायों से नाना अधिमुक्ति, रुचि और (बुद्धि की) क्षमता वाले सत्त्वों को सद्धर्म का प्रकाशन करते हैं। सद्धर्म कत्तई तर्कगोचर नहीं है। तथागत सत्त्वों को तत्त्वज्ञान का सम्यग् अवबोध कराने के लिए ही लोक में उत्पन्न हुआ करते हैं। तथागत यह महान् कृत्य एक ही यान पर आधिष्ठित होकर करते हैं, वह एक यान है ‘बुद्धयान’ उससे अन्य कोई दूसरा और तीसरा यान नहीं है। वह बुद्धमय ही सर्वज्ञता को प्राप्त कराने वाला है। अतीत, अनागत और प्रत्युत्पन्न तीनों कालों ५०४ बौद्धदर्शन के बुद्धों ने बुद्धयान को ही अपनाया है। वे बुद्धयान का ही तीन यानों (श्रावकयान, प्रत्येक बुद्धयान और बोधिसत्त्वयान) के रूप में निर्देश करते हैं। अतः बुद्धयान ही एकमात्र यान है।
एकं हि यानं द्वितीयं न विद्यते तृतीयं हि नैवास्ति कदापि लोके’। " द्वितीय उपायकौशल्यं परिवर्त में भगवान् ने शारिपुत्र के लिए व्याकरण किया कि वह अनागत काल में पद्मनाभ नाम के तथागत होंगे और सद्धर्म का प्रकाश करेंगे। शारिपुत्र के बारे में व्याकरण सुनकर जब वहाँ उपस्थित १२ हजार श्रावकों को विचिकित्सा उत्पन्न हुई तब उसे हटाते हुए भगवान् ने तृतीय औपम्यपरिवर्त में एक उदाहरण देते हुए कहा कि किसी महाधनी पुरुष के कई बच्चे हैं, वे खिलौनों के शौकीन हैं। उसके घर में आग लग जाए, उसमें बच्चे घिर जाएं और निकलने का एक ही द्वार हो, तब पिता बच्चों को पुकार कर कहता है- आओ बच्चों, खिलौने ले लो, मेरे पास बहुत खिलौने हैं, जैसे गोरथ, अश्वरथ, मृगरथ आदि। तब वे बच्चे खिलौन के लोभ में बाहर आ जाते हैं। तब शारिपुत्र, वह पुरुष उन सभी बच्चों को सर्वोत्कृष्ट गोरथ देता है। जो अश्वरथ और मृगरथ आदि हीन हैं, उन्हें नहीं देता। ऐसा क्यों ? इसलिए कि वह महाधनी है और उसका कोष (खजाना) भरा हुआ है। भगवान् कहते हैं कि उसी प्रकार ये सभी मेरे बच्चे हैं, मुझे चाहिए कि इन सबको समान मान कर उन्हें ‘महायान’ ही दूँ। क्या शारिपुत्र, उस पिता ने तीनों यानों को बताकर एक ही ‘महायान’ दिया, इसमें क्या उनका मृषावाद है ? शारिपुत्र ने कहा नहीं भगवन् तथागत महाकारुणिक हैं, वह सभी सत्त्वों के पिता हैं। वे दुःखरूपी जलते हुए घर से बाहर लाने के लिए तीनों यानों की देशना करते हैं, किन्तु अन्त में सबको बुद्धयान की ही देशना देते हैं।
• व्याकरणपरिवर्त नामक षष्ठ (छठवें) परिच्छेद में श्रावकयान के अनेक स्थविरों के बारे में, जो महायन में प्रविष्ट हो चुके थे, व्याकरण किया गया है। बुद्ध कहते हैं कि महास्थविर महाकाश्यप भविष्य में ‘रश्मिप्रभास’ तथागत होंगे। स्थविर सुभूति, ‘शशिकेतु’, महाकात्यायन ‘जाम्बूनदप्रभास’ तथा महामौदलयायन ‘तमालपत्र चन्दनगन्ध’ नाम के तथागत होंगे। पञ्चभिक्षुशतव्याकरण परिवर्त में पूर्ण मैत्रायणीपुत्र आदि अनेक भिक्षुओं के बुद्धत्व-प्राप्ति का व्याकरण किया गया है। नवम परिवर्त में आयुष्मान् आनन्द और राहुल आदि दो सहस्र श्रावकों के बारे में बुद्धत्व-प्राप्ति का व्याकरण है।
१. द्र.-सद्धर्मपुण्डरीकसूत्र, २:५४, पृ. ३१ (दरभङ्गा-संस्करण १६६०।
महायान साहित्य ५०५ उस समय वहाँ महाप्रजापति गौतमी और भिक्षुणी राहुलमाता यशोधरा आदि परिषद् में दुःखी होकर इसलिए बैठी थीं कि भगवान् ने हमारे बारे में बुद्धत्व का व्याकरण क्यों नहीं किया ? भगवान् ने उनके चित्त का विचार जानकर कृपापूवर्क उनका भी व्याकरण किया। म ____ सद्धर्मपुण्डरीक के इस संक्षिप्त पर्यालोचन से महायान बौद्ध-धर्म का हीनयान से सम्बन्ध स्पष्ट होता है। पालि-ग्रन्थों में दो प्रकार की धर्म देशना है। एक दानकथा, शीलकथा आदि उपाय धर्म देशना हैं तथा दूसरी ‘सामुक्कंसिका धम्मदेशना है’, जिसमें चार आर्यसत्यों की देशना दी जाती है। इस सद्धर्मपुण्डरीक में चार आयसत्यों की देशना तथा सर्वज्ञताज्ञान पर्यवसायी दो देशनाएं हैं। यह सर्वज्ञताज्ञान प्राप्त कराने वाली देशना भगवान् ने शारिपुत्र आदि को जो पहले नहीं दीं, यह उनका उपायकौशल्य है। यह द्वितीय देशना ही परमार्थ देशना है। इसमें शारिपुत्र आदि महास्थविरों और महाप्रजापति गौतमी आदि स्थविराओं को बुद्धत्व प्राप्ति का आश्वासन दिया गया है। हीनयान में उपदिष्ट धर्म भी बुद्ध का ही है। उसे एकान्ततः मिथ्या नहीं कहा गया है, किन्तु वह केवल उपायसत्य है, परमार्थसत्य तो बुद्धयान ही है।
सद्धर्मपुण्डरीक में बुद्धयान एवं तथागत की महिमा का वर्णन है, तथापि इस ग्रन्थ के कुछ अध्यायों में अवलोकितेश्वर आदि बोधिसत्त्वों की महिमा का भी पुष्कल वर्णन है। अवलोकितेश्वर बोधिसत्त्व करुणा की मूर्ति हैं। अवलोकितेश्वर ने यद्यपि बोधि की प्राप्ति की है, तथापि जब तक संसार में एक भी सत्त्व दुःखी और बद्ध रहेगा, तब तक निर्वाण प्राप्त नहीं करने का उनका संकल्प है। वे निर्वाण में प्रवेश नहीं करेंगे। वे सदा बोधिसत्त्व की साधना में निरत रहते हैं। इससे उनकी महिमा कम नहीं होती। बोधिसत्त्व अवलोकितेश्वर के नाम मात्र के उच्चारण में अनेक दुःखों और आपदाओं से रक्षण की शक्ति है। हम बोधिसत्त्वों की श्रद्धा के साथ उपासना का प्रारम्भ इस ग्रन्थ में देखते हैं।

(०२) ललितविस्तर

वैपुल्यसूत्रों में यह एक अन्यतम और पवित्रतम महायानसूत्र माना जाता है। इसमें सम्पूर्ण बुद्धचरित का वर्णन है। बुद्ध ने पृथ्वी पर जो-जो क्रीडा (ललित) की, उनका वर्णन होने के कारण इसे ‘ललितविस्तर’ कहते हैं। इसे ‘महाव्यूह’ भी कहा जाता है। इसमें कुल २७ अध्याय हैं, जिन्हें ‘परिवर्त’ कहा जाता है। तिब्बती भाषा में इसका अनुवाद उपलब्ध है। समग्र मूल ग्रन्थ का सम्पादन डॉ. एस. लेफमान ने किया था।
प्रथम अध्याय में रात्रि के व्यतीत होने पर ईश्वर, महेश्वर, देवपुत्र आदि जेतवन में पधारे और भगवान् की पादवन्दना कर कहने लगे- “भगवन, ललितविस्तर नामक धर्मपर्याय का व्याकरण करें। भगवान् का तुषितलोक में निवास, गर्भावक्रान्ति, जन्म, कौमार्यचर्या, सर्व मारमण्डल का विध्वंसन इत्यादि का इस ग्रंथ में वर्णन है। पूर्व के तथागतों ५०६ बौद्धदर्शन ने भी इस ग्रंथ का व्याकरण किया था। " भगवान ने देवपुत्रों की प्रार्थना स्वीकार की। तदनन्तर अविदूर निदान (अर्थात् तुषितलोक से च्युति से लेकर सम्यग् ज्ञान की प्राप्ति तक) की कथा से प्रारम्भ कर समग्र बुद्धचरित का वर्णन सुनाने लगे।
बोधिसत्त्व ने क्षत्रिय कुल में जन्म लेने का निर्णय किया। भगवान् ने बताया कि बोधिसत्त्व शुद्धोदन की महिषी मायादेवी के गर्भ में उत्पन्न होंगे। वही बोधिसत्त्व के लिए उपयुक्त माता है। जम्बूद्वीप में कोई दूसरी स्त्री नहीं है, जो बोधिसत्त्व के तुल्य महापुरुष का गर्भ धारण कर सके। बोधिसत्त्व ने महानाग अर्थात् कुञ्जर के रूप में गर्भावक्रान्ति की। ___ मायादेवी पति की आज्ञा से लुम्बिनी वन गईं, जहाँ बोधिसत्त्व का जन्म हुआ। उसी समय पृथ्वी को भेदकर महापद्म उत्पन्न हुआ। नन्द, उपनन्द आदि नागराजाओं ने शीत और उष्ण जल की धारा से बोधिसत्त्व को स्नान कराया। बोधिसत्त्व ने महापद्म पर बैठकर चारों दिशाओं का अवलोकन किया। बोधिसत्त्व ने दिव्यचक्षु से समस्त, लोकधातु को देखा और जाना कि शील, समाधि और प्रज्ञा में मेरे तुल्य कोई अन्य सत्त्व नहीं है। पूर्वाभिमुख हो वे सात पग चले। जहाँ-जहाँ बोधिसत्त्व पैर रखते थे, वहाँ-वहाँ कमल प्रादुर्भूत हो जाता था। इसी तरह दक्षिण और पश्चिम की दिशा में चले। सातवें कदम पर सिंह की भांति निनाद किया और कहा कि मैं लोक में ज्येष्ठ और श्रेष्ठ हूँ। यह मेरा अन्तिम जन्म है। मैं जाति, जरा और मरण दुःख का अन्त करूँगा। उत्तराभिमुख हो बोधिसत्त्व ने कहा कि मैं सभी प्राणियों में अनुत्तर हूँ। नीचे की ओर सात पग रखकर कहा कि मार को सेना सहित नष्ट करूँगा और नारकीय सत्त्वों पर महाधर्ममेघ की वृष्टि कर निरयाग्नि को शान्त करूँगा। ऊपर की ओर भी सात पग रखे और अन्तरिक्ष की ओर देखा। पल कि यार _सातवें परिवर्त में बुद्ध और आनन्द का संवाद है, जिसका सारांश है कि कुछ त अभिमानी भिक्षु बोधिसत्त्व की परिशुद्ध गर्भावक्रान्ति पर विश्वास नहीं करेंगे, जिससे उनका घोर अनिष्ट होगा तथा जो इस सूत्रान्त को सुनकर तथागत में श्रद्धा का उत्पाद करेंगे, अनागत बुद्ध भी उनकी अभिलाषा पूर्ण करेंगे। जो मेरी शरण में आते हैं, वे मेरे मित्र हैं। मैं उनका कल्याण साधित करूँगा। इसलिए हे आनन्द, श्रद्धा के उत्पाद के लिए यत्न करना चाहिए।
बुद्ध की गर्भावक्रान्ति एवं जन्म की जो कथा ललितविस्तर में मिलती है, वह पालिग्रंथों में वर्णित कथा से कहीं-कहीं पर भिन्न भी है। पालिग्रंथों में विशेषतः संयुक्तनिकाय, दीघनिकाय आदि में यद्यपि बुद्ध के अनेक अद्भुत धर्मों का वर्णन है, तथापि वे अद्भुत धर्मों से समन्वागत होते हुए भी अन्य मनुष्यों के समान जरा, मरण आदि दुःख एवं दौर्मनस्य के अधीन थे। पालिग्रन्थों के अनुसार बुद्ध लोकोत्तर केवल इसी अर्थ में है कि उन्होंने मोक्ष के मार्ग का अन्वेषण किया था तथा उनके द्वारा उपदिष्ट मार्ग का अनुसरण करने से दूसरे लोग भी निर्वाण और अर्हप्व पद प्राप्त कर सकते हैं। परन्तु महासांघिक लोकोत्तरवादी ५०७:० महायान साहित्य निकाय के लोग इसी अर्थ में लोकोत्तर शब्द का प्रयोग नहीं करते। इसीलिए लोकोत्तरता को लेकर उनमें वाद-विवाद था।
आगे का ललितविस्तर का वर्णन महावग्ग की कथा से बहुत कुछ मिलता-जुलता है। जहाँ समानता है, वहाँ भी ललितविस्तर में कुछ बातें ऐसी हैं, जो अन्यत्र नहीं पाई जातीं। उदाहरणार्थ शाक्यों के कहने से जब शुद्धोदन कुमार को अपने देवकुल में ले गये तो सब प्रतिमाएं अपने-अपने स्वरूप में आकर कुमार के पैरों पर गिर पड़ी। इसी तरह कुमार क जब शिक्षा के लिए लिपिशाला में ले जाये गये तो आचार्य, कुमार के तेज को सहन नहीं कर पाये और मूर्च्छित होकर गिर पड़े। तब बोधिसत्त्व ने आचार्य से कहा- आप मुझे किस लिपि की शिक्षा देंगे। तब कुमार ने ब्राह्मी, खरोष्ठी, पुष्करसारि, अंग, बंग, मगध आदि ६४ लिपियाँ गिनाईं। आचार्य ने कुमार का कौशल देखकर उनका अभिवादन किया।
बद्ध के जीवन की प्रधान घटनाएं हैं- निमित्त दर्शन, जिनसे बुद्ध ने जरा, व्याधि, मृत्यु एवं प्रव्रज्या का ज्ञान प्राप्त किया। इसके अतिरिक्त अभिनिष्क्रमण, बिम्बिसार केला समीप गमन, दुष्करचर्या, मारधर्षण, अभिसंबोधि एवं धर्मचक्रप्रवर्तन आदि घटनाएं हैं। जहाँ के तक इन घटनाओं का सम्बन्ध है, ललितविस्तर का वर्णन बहुत भिन्न नहीं है। किन्तु ललितविस्तर में कुछ अतिशयताएँ अवश्य हैं। २७वें परिवर्त में ग्रन्थ के माहात्म्य कार वर्णन है।
यह निश्चित है कि जिन शिल्पियों ने जावा में स्थित बोरोबुदूर के मन्दिर को प्रतिमाओं से अलंकृत किया था, वे ललितविस्तर के किसी न किसी पाठ से अवश्य परिचित थे। शिल्प में बुद्ध का चरित इस प्रकार उत्कीर्ण है, मानों शिल्पी ललितविस्तर को हाथ में लेकर इस कार्य में प्रवृत्त हुए थे। जिन शिल्पियों ने उत्तर भारत में स्तूप आदि कलात्मक वस्तुओं को बुद्धचरित के दृश्यों से अलंकृत किया था, वे भी ललितविस्तर में वर्णित बुद्ध कथा से परिचित थे।

(०३) लङ्कावतार

वैपुल्यसूत्रों में यह एक महत्त्वपूर्ण महायानसूत्र है। ज्ञातव्य है कि महायान के अनुयायी दार्शनिक द्विविध हैं- योगाचार एवं माध्यमिक। दोनों ही महायानसूत्रों को प्रामाणिक बुद्धवचन मानते हैं। फिर भी अपने-अपने दर्शनों की पृष्ठभूमि के अनुसार उन सूत्रों का नीतार्थ एवं नेयार्थ में विभाजन करते हैं। उदाहरणार्थ : दृश्यं न विद्यते बाह्यं चित्तं चित्रं हि दृश्यते। देहभोगप्रतिष्ठानं चित्तमात्रं वदाम्यहम् ॥

(लङ्कावतारसूत्र- ३:३३) लङ्कावतारसूत्र के इस वचन के आधार पर योगाचार दार्शनिक बाह्यार्थ का निषेध मानते हैं तथा इसे नीतार्थ सूत्र मानते हैं। जबकि सूत्राचार स्वातन्त्रिक माध्यमिक ५०८ बौद्धदर्शन मण भावविवेक और उनके अनुयायियों का कहना है कि इसके द्वारा बाह्यार्थ का निषेध नहीं, अपितु सृष्टिकर्ता ईश्वर, महेश्वर एवं स्वतन्त्र कर्ता एवं भोक्ता आत्मा का निषेध होता है। प्रासङ्गिक माध्यमिक इस सूत्र को नेयार्थ मानते हैं। योगाचार दार्शनिक इसी सूत्र के आधार पर विज्ञप्तिमात्रता या चित्तमात्रता की स्थापना करते हैं। उनकी सष्टि में लडकावतार सूत्र उनके दर्शन का पोषक एक महत्त्वपूर्ण सूत्र है। इसी के आधार पर वे बाह्यार्थ की सत्ता का निषेध कर विज्ञान की द्रव्यसत्ता एवं आलयविज्ञान आदि की सत्ता का प्रतिपादन करते हैं। ____ इस सूत्र में कुल १० परिवर्त हैं। प्रथम परिवर्त में लड्केश्वर रावण को भगवान् ने धर्मोपदेश किया है। इसमें बुद्ध के साथ राक्षसाधिपति रावण का संवाद प्रतिपादित है। बोधिसत्त्व महामति के कहने पर रावण भगवान् से धर्म और अधर्म के बारे में प्रश्न करता है। द्वितीय परिवर्त में महामति बोधिसत्त्व भगवान् से एक सौ आठ प्रश्न पूछता है। ये सभी प्रश्न मूल विज्ञानवादी सिद्धान्त से सम्बन्धित हैं। इनमें निर्वाण, बन्थ-मोक्ष, आलयविज्ञान, मनोविज्ञान, शून्यता आदि गम्भीर विषयों के बारे में प्रश्न हैं। तृतीय परिवर्त में कहा गया है कि तथागत ने जिस रात्रि में सम्यक् संबोधि प्राप्त की और जिस रात्रि में महापरिनिर्वाण प्राप्त किया, इसके बीच उन्होंने एक भी अक्षर का उच्चारण नहीं किया। सभी सत्त्वों ने अपनी पात्रता और पुण्य के अनुसार उनके मुख से निकलती हुई देशना का श्रवण किया। सप्तम परिवर्त पर्यन्त प्रमुख दार्शनिक सिद्धान्तों की चर्चा है। अष्टम परिवर्त में मांस भक्षण का निषेध है। नवम परिवर्त में अनेक धारणियों का निरूपण है। अन्तिम दसवाँ परिवर्त अत्यधिक लम्बा है। इसमें लगभग ८८४ श्लोक हैं, जिसमें विज्ञानवाद की चर्चा है, साथ ही, उसमें अनेक भविष्यवाणियों का वर्णन है। __लङ्कावतारसूत्र के चीनी भाषा में अनुवाद उपलब्ध हैं। ई. सन् ४४३ में गुणप्रभ ने, ई. सन् ५१३ में बोधिरुचि ने तथा ई. ७००-७०४ में शिक्षानन्द ने अनुवाद किये। इसके तिब्बती अनुवाद भी प्राप्त हैं।

(०४) सुवर्णप्रभास

महायानसूत्रसाहित्य में सुवर्णप्रभास की महत्त्वपूर्ण सूत्रों में गणना की जाती है। चीन और जापान में इसके प्रति अतिशय श्रद्धा है। फलस्वरूप धर्मरक्ष ने ४१२-४२६ ईसवी में, परमार्थ ने५४८ ईसवी में, यशोगुप्त ने ५६१-५७७ ईसवी में, पाओक्की ने ५६७ ईसवी में तथा इत्सिंग ने ७०३ ईसवी में इसका चीनी भाषा में अनुवाद किया। इसी तरह जापानी भाषा में भी तीन या चार अनुवाद हुए। तिब्बती भाषा में भी १. यस्यां रात्र्यां चा= चाधिगमा धिगमो यस्यां च परिनिर्वृतः।
एतस्मिन्नन्तरे नास्ति मया किञ्चित् प्रकाशितम् ॥

द्र. - लङ्कावतारसूत्र, ३:७, पृ. १४४ (जापानी संस्करण) महायान साहित्य ५०६ इसका अनुवाद उपलब्ध है। साथ ही उइगर (Uigur) और खोतन में भी इसका अनुवाद हुआ। इन अनुवादों से यह सिद्ध होता है कि इस सूत्र का आदर एवं लोकप्रियता व्यापक क्षेत्र में थी। इस सूत्र में दर्शन, नीति, तन्त्र एवं आचार का उपाख्यानों द्वारा सुस्पष्ट निरूपण किया गया है। इस तरह बौद्धों के महायान सिद्धान्तों का विस्तृत प्रतिपादन है। इसमें कुल २१ परिवर्त हैं।
प्रथम परिवर्त में सुवर्णप्रभास के श्रवण का माहात्म्य वर्णित है। द्वितीय परिवर्त में जिस विषय की आलोचना की गई है, वह अत्यन्त महत्वपूर्ण है। बुद्ध ने दीर्घायु होने के दो कारण बताए हैं। प्रथम प्राणिवध से विरत होना तथा द्वितीय प्राणियों के अनुकूल भोजन प्रदान करना। बोधिसत्त्व रुचिरकेतु को सन्देह हुआ कि भगवान् ने दीर्घायुष्कता के दोनों साधनों का आचरण किया, फिर भी अस्सी वर्ष में ही उनकी आयु समाप्त हो गई। अतः उनके वचन का कोई प्रामाण्य नहीं है। म इस शंका का समाधान करने के लिए चार बुद्ध अक्षोभ्य, रत्नकेतु, अमितायु और दुन्दुभिस्वर की कथा की तथा लिच्छिविकुमार ब्राह्मण कोण्डिन्य की कथा की अवतारणा की गई। आशय यह है कि बुद्ध का शरीर पार्थिव नहीं है, अतः उसमें सर्षप (सरसों) के बराबर भी धातु नहीं है तथा उनका शरीर धर्ममय एवं नित्य है। अतः पूर्वोक्त शंका का कोई अवसर नहीं है। तथा हि : यदा शशविषाणेन निःश्रेणी सुकृता भवेत्। स्वर्गस्यारोहणार्थाय तदा धातुर्भविष्यति॥

अनस्थिरुधिरे काये कुतो थातुर्भविष्यति’। अपि च. मम न बुद्धः परिनिर्वाति न धर्मः परिहीयते। सत्त्वानां परिपाकाय परिनिर्वाणं निदर्श्यते॥

अचिन्त्यो भगवान् बुद्धो नित्यकायस्तथागतः।
देशेति विविधान् व्यूहान् सत्त्वानां हितकारणात् । तृतीय परिवर्त में रुचिरकेतु बोधिसत्त्व स्वप्न में एक ब्राह्मण को दुन्दुभि बजाते देखता है और दुन्दुभि से धर्मगाथाएं निकल रही हैं। जागने पर भी बोधिसत्त्व को गाथाएं याद रहती हैं और वह उन्हें भगवान् के सामने निवेदित करता है। चतुर्थ परिवर्त में महायान के मौलिक १. द्र.- सुवर्णप्रभाससूत्र, तथागतायुः प्रमाणनिर्देशपरिवर्त, पृ. ८ (दरभङ्गा-संस्करण १६६७) २. द्र.-सुवर्णप्रभाससूत्र, तथागतायुःप्रमाणनिर्देशपरिवर्त, पृ. ६ (दरभङ्गा-संस्करण १६६७) ५१० नी बौद्धदर्शन सिद्धान्तों का गाथाओं द्वारा उपपादन किया गया है। पञ्चम परिवर्त में बुद्ध के स्तव हैं, जिनका सामूहिक नाम कमलाकर है। इनमें बुद्ध की महिमा का वर्णन है। षष्ठ परिवर्त में वस्तुमात्र की शून्यता के परिशीलन का निर्देश है। सप्तम में सुवर्णप्रभास के माहात्म्य का वर्णन है। अष्टम परिवर्त में सरस्वती देवी बुद्ध के सम्मुख आविर्भूत हुईं और सुवर्णप्रभास में प्रतिपादित धर्म का व्याख्यान करने वाले धर्मभाणक को बुद्ध की प्रतिभा से सम्पन्न करने की प्रतिज्ञा की। नवम परिवर्त में महादेवी बुद्ध के सम्मुख प्रकट हुईं और घोषणा की कि मैं व्यावहारिक और आध्यात्मिक सम्पत्ति से धर्मभाणक को सम्पन्न करूँगी।
_दशम परिवर्त में विभिन्न तथागतों एवं बोधिसत्त्वों के नामों का संकीर्तन किया गया है। एकादश परिवर्त में दृढा नामक पृथ्वी देवी भगवान् के सम्मुख उपस्थित हुई और कहा कि धर्मभाणक के लिए जो उपवेशन-पीठ है, वह यथासम्भव सुखप्रदायक होगा। साथ ही आग्रह किया कि धर्मभाणक के धर्मामृत से अपने को तृप्त करूँगी। द्वादश परिवर्त में यक्ष सेनापति अपने अट्ठाइस सेनापतियों के साथ भगवान् के पास आये और सुवर्णप्रभास के प्रचार के लिए अपने सहयोग का वचन दिया। साथ ही धर्मभाणकों की रक्षा का आश्वासन भी दिया। त्रयोदश परिवर्त में राजशास्त्र सम्बन्धी विषयों का प्रतिपादन है। चतुर्दश परिवर्त में सुसम्भव नामक राजा का वृत्तान्त है। पञ्चदश परिवर्त में यक्षों और अन्य देवताओं ने सुवर्णप्रभास के श्रोताओं की रक्षा की प्रतिज्ञा की। षोडश परिवर्त में भगवान ने दश सहस्र देवपुत्रों के बुद्धत्व लाभ की भविष्यवाणी की। सप्तदश परिवर्त में व्याधियों के उपशमन करने का विवरण दिया गया है। अष्टादश परिवर्त में जलवाहन द्वारा मत्स्यों को बौद्धधर्म में प्रवेश कराने की चर्चा है। उन्नीसवें परिवर्त में भगवान ने बोधिसत्त्व अवस्था में एक व्याघ्री की भूख मिटाने के लिए अपने शरीर का परित्याग किया था, उसकी चर्चा है। बीसवें परिवर्त में सुवर्णरत्नाकरछत्रकूट नामक तथागत की बोधिसत्त्वों द्वारा की गई गाथामय स्तुति प्रतिपादित है। इक्कीसवें परिवर्त में बोधिसत्त्वसमुच्चया नामक कुल-देवता द्वारा व्यक्त सर्वशून्यताविषयक गाथाएं उल्लिखित हैं।

(०५) गण्डव्यूह

बोधिसत्त्वसाधना के अध्ययन में गण्डव्यूह एक महत्त्वपूर्ण महायानसूत्र है। ग्रन्थ का प्रारम्भ इस प्रकार होता है। एक समय भगवान् श्रावस्ती के जेतवन में महाव्यूह कूटागार में विहार कर रहे थे। उनके साथ समन्तभद्र, मञ्जुश्री प्रमुख पाँच हजार बोधिसत्त्व थे, जो समन्तभद्र बोधिसत्त्वचर्या में प्रतिष्ठित थे और सर्वज्ञताज्ञान के अभिलाषी थे। उन्होंने निवेदन किया कि भगवान् पूर्ण सर्वज्ञताप्रस्थान एवं तथागत सर्वसत्त्व देशनानुशासनी प्रातिहार्य आदि अनेक प्रातिहार्य बताएं। तब भगवान् सिंहविजृम्भित समाधि में समाहित हुए और उसी समय अवर्णनीय प्रातिहार्य दिखलाई पड़े। वहाँ शारिपुत्र, मौद्गलयायन, महाकाश्यप आदि महाश्रावक भी उपस्थित थे, किन्तु वे जेतवन में स्थित होने पर भी इस अद्भुत प्रातिहार्य को न देख सके, क्योंकि वे श्रावक सर्वज्ञता की विपक्ष अक्लिष्ट अविद्या से युक्त थे तथा महायान साहित्य ५११ सर्वज्ञताभौमिक कुशलमूल से अपरिगृहीत थे। तब मञ्जुश्री बोधिसत्त्व अनेक देव, देवता और बोधिसत्त्वों के साथ अपने विहार से निकले और भगवान् की पूजा कर सत्त्वपरिपाक के लिए दक्षिणापथ की ओर चल पड़े।
तब आयुष्मान् शारिपुत्र ने बुद्ध के आनुभाव और मञ्जुश्री की कृपा से इस विहार को देखा और भगवान् को प्रणाम कर ६० भिक्षुओं के साथ उन्होंने मञ्जुश्री का अनुगमन किया। प्रवास में शारिपुत्र ने मञ्जुश्री की महान् विभूति की प्रशंसा की। जैसे-जैसे शारिपुत्र उनके गुणों का कीर्तन करते रहे, वैसे-वैसे, उन साठ भिक्षुओं के चित्त प्रसाद (निर्मलता) को प्राप्त होते गये। उनका चित्त बुद्ध धर्मों में परिणत हुआ। उन्होंने मञ्जुश्री से प्रार्थना की कि उनको भी बोधिसत्त्व-विभूति प्राप्त हो। ____ तब मञ्जुश्री ने उन भिक्षुओं से कहा- भिक्षुओं, दस प्रकार के चित्तोत्पाद के समन्वागम से महायान में सम्प्रस्थित कुलपुत्र तथागतभूमि को प्राप्त होता है। जो कुलपुत्र श्रद्धायुक्त होकर चित्तोत्पाद करता है, वह तथागतभूमि को प्राप्त होता है। मञ्जुश्री से इस धर्मनय को सुनकर वे भिक्षु ‘सर्वबुद्धविदर्शनासङ्गविषय’ नामक समाधि को प्राप्त हुए। उस समाधि के आनुभाव से उन्होंने दशदिशाओं के तथागतों का और सत्त्वों का दर्शन किया। इस प्रकार सर्व बुद्धधर्मों की परिनिष्पत्ति में वे भिक्षु प्रतिष्ठित हुए।
_मञ्जुश्री बोधिसत्त्व ने उन भिक्षुओं को सम्यक् संबोधि में प्रतिष्ठित करके दक्षिणापथ के धन्याकर नामक महानगर की ओर प्रस्थान किया। वहाँ पहुँचने पर उन्होंने ‘धर्मधातुनयप्रभास’ नामक सूत्रान्त का प्रकाशन किया। वहाँ उनकी परिषद् में सुधन नामक एक श्रेष्ठी-पुत्र बैठा था। उसने यह सूत्रान्त सुना। अनुत्तर सम्यक् संबोधि की अभिलाषा से उसका चित्त व्याकुल हुआ और उसने मञ्जुश्री से बोधिसत्त्वचर्या के उपदेश की प्रार्थना की। म मञ्जुश्री ने श्रेष्ठीपुत्र सुधन का साधुकार किया और कहा- हे कुलपुत्र, सर्वज्ञता की परिनिष्पत्ति का आदि और अन्त कल्याणमित्रों का सेवन एवं पर्युपासन है। इसी से कुलपुज्ञ, समन्तभद्रचर्यामण्डल की परिपूर्णता होती है। हे कुलपुत्र, इसी दक्षिणपथ में सुग्रीव नाम का एक पर्वत है। वहाँ मेघश्री नामक भिक्षु हैं। तुम उनके पास जाकर बोधिसत्त्वचर्या पूछो। वह कल्याणमित्र तुम्हें समन्तभद्रचर्यामण्डल का उपदेश करेंगे।
तब आर्य सुधन से मञ्जुश्री से विदा ली और मेघश्री के पास पहुँचे। मेघश्री ने उन्हें सागरमेघ नामक भिक्षु के पास भेजा। इस प्रकार लगभग पचास भिन्न-भिन्न जगहों पर सुधन ने भिन्न-भिन्न कल्याणमित्रों की पर्युपासना की। प्रत्येक कल्याणमित्र ने उनका अभिनन्दन किया और उन्हें बोधिसत्त्वचर्या में एक-एक कदम आगे बढ़ाया। इस प्रकार भारतवर्ष के कोने-कोने में आर्य सुधन ने चक्रमण (भ्रमण) किया। उन्होंने बुद्धमाता महामाया और बुद्धपत्नी गोपा (यशोधरा) से भी भेंट की। कल्याणमित्र की खोज में५१२ बौद्धदर्शन घूमते-घूमते वह अन्त में समुद्रकच्छ नामक जनपद में स्थित वैरोचव्यूहालङ्कार नामक विहार के कूटागार में मैत्रेय बोधिसत्त्व के दर्शनार्थ पहुंचे और उनसे कहा-आर्य, मैं अनुत्तर सम्यक् संबोधि में प्रस्थित हूँ, किन्तु बोधिसत्त्वचर्या नहीं जानता। आर्य, आप मुझे बोधिसत्त्वचर्या बताएं।
आर्य मैत्रेय ने आर्य सुधन की प्रशंसा की और बोधिचित्तोत्पाद का माहात्म्य बतलाया। कुलपुत्र, यदि तुम बोधिसत्त्वचर्या जानने के लिए उत्सुक हो तो इस वैरोचनव्यूहालकारगर्भ के महाकूट में प्रवेश करके देखो। वहां तुम बोधिसत्त्वचर्या की परिपूर्ति और परिनिष्पत्ति को जानोगे। मैत्रेय के आनुभाव से सुधन ने कूटागार में समस्त लोकों के बुद्धों का और बोधिसत्त्वों का दर्शन किया। समाधि से उठकर मैत्रेय ने कहा-कुलपुत्र, धर्मों की यही धर्मता है। यह सारा विश्व माया, स्वप्न एवं प्रतिभासोपम है। कुलपुत्र, जो तुमने अभी देखा है, वह न कहीं से आया है, न कहीं गया है। कुलपुत्र, यही बोधिसत्त्वों की गति है।
___ हे कुलपुत्र, मैंने तुम्हें संक्षेप से बताया है। अब तुम बोधिसत्त्वचर्या के बारे में विशेष जानकारी के लिए कल्याणमित्र मञ्जुश्री के पास जाओ और उनसे प्रश्न करो। वह मञ्जुश्री बोधिसत्त्व परमपारमिता प्राप्त हैं।
तब सुधन ने परम श्रद्धा से मञ्जुश्री की प्रार्थना की। दश हजार योजन दूर स्थित होते हुए भी मञ्जुश्री बोधिसत्त्व ने महाकरुझणा से प्रेरित हो सुधन के मस्तक पर अपना हाथ रखकर उनका अभिनन्दन किया। उसे असंख्य बुद्ध धर्मों में प्रतिष्ठित किया, अनन्त ज्ञानमहावभास को प्राप्त कराया तथा अपर्यन्त धारणी, समाधि एवं अभिज्ञाओं से विभूषित किया और समन्तभद्रचर्यामण्डल में प्रतिष्ठित किया।
इस प्रकार गण्डव्यूह में बोधिसत्त्वचर्या का अद्भुत वर्णन है। यह सूत्र ‘अवतंसक सूत्र’ के नाम से परिचित है।

(०६) तथागतगुह्यक

प्रारम्भिक तन्त्र महायानसूत्रों से बहुत मिलते-जुलते हैं। उदाहरणार्थ मञ्जुश्रीमूलकल्प अवतंसक के अन्तर्गत ‘महावैपुल्यमहायानसूत्र’, के रूप में प्रसिद्ध है। विद्वानों की राय है कि तथागतगुह्य, गुह्यसमाजतन्त्र तथा अष्टादशपटल तीनों एक ही हैं। अर्थात् तीनों नाम पर्यायवाची हैं, किन्तु डॉ. विन्टरनित्न का कहना है कि शिक्षासमुच्चय नामक ग्रन्थ में जो तथागतगुह्यसूत्र के उद्धरण मिलते हैं, वे गुह्यसमाज से भिन्न हैं। अतः तथागतगुह्यसूत्र एवं गुह्यसमाजतन्त्र का अभेद नहीं है। अर्थात् भिन्न-भिन्न हैं। ‘अष्टादश’ इस नाम से यह प्रकट होता है कि इस ग्रन्थ में अठारह अध्याय या परिच्छेद हैं।
तथागतगुह्यसूत्र के अनुसार बोधिसत्त्व प्रणिधान करता है कि श्मशान में स्थित उसके मृत शरीर का तिर्यग् योनि में उत्पन्न प्राणी यथेच्छ उपभोग करें और इस परिभोग की वजह महायान साहित्य से वे स्वर्ग से उत्पन्न हो। इतना ही नहीं, वह उनके परिनिर्वाण का भी हेतु हो।
पुनश्च, तदनुसार बोधिसत्त्व धर्मकाय से प्रभावित होता है, इसलिए वह अपने दर्शन, श्रवण और स्पर्श से भी सत्त्वों का हित करता है। उसी सूत्र में अन्यत्र उल्लिखित है कि जैसे शान्तमति, जो वृक्ष मूल से उखड़ गया हो, उसकी सभी शाखाएं डालियां और पत्ते सूख जाते हैं, उसी प्रकार सत्कायदृष्टि का नाश हो जाने से बोधिसत्त्व के सभी क्लेश शान्त हो जाते हैं। अपि च, महायान में प्रस्थित बोधिसत्त्व के ये चार धर्म विशेष गमन के और अपरिहाणि के हेतु होते हैं। कौन चार ? श्रद्धा, गौरव, निर्मानता (अनहंकार) एवं वीर्य । पुनश्च, बोधिसत्तत्त्व सर्वदा अप्रमादी होता है और अप्रमाद का अर्थ है ‘इन्द्रियसंवर’। वह न निमित्त का ग्रहण करता है और न अनुव्यञ्जन का। वह सभी धर्मों के आस्वाद, आदीनव और निःसरण को ठीक-ठीक जानता है। और भी, अप्रमाद अपने चित्त का दमन करता है, दूसरों के चित्तों की रक्षा, क्लेश में अरति एवं धर्म में रति है। योनिशः प्रयुक्त बोधिसत्त्व ‘जो है उसे अस्ति के रूप में और ‘जो नहीं है उसे नास्ति के रूप में जानता है।
तथागतगुह्यसूत्र के अनुसार जिस रात्रि में तथागत ने अभिसम्बोधि प्राप्त की तथा जिस रात्रि में परिनिर्वाण प्राप्त करेंगे, इस बीच में तथागत ने एक भी अक्षर न कहा और न कहेंगे। प्रश्न है कि तब समस्त सुर, असरु, मनुष्य, किन्नर, सिद्ध, विद्याधर, नाग आदि ALLGERLE ARNER १. ये मे मृतस्य कालगतस्य मांसं परिभुञ्जीरन्, स एव तेषां हेतुर्भवेत् स्वर्गोपपत्तये यावत् परिनिर्वाणाय ____ तस्य शीलवतः। द्र.-तथागतगुह्यसूत्र, शिक्षासमुच्चय में उद्धृत, पृ. ८६ (दरभङ्गा संस्करण, १६६६) २. स धर्मकायप्रभावितो दर्शनेनापि सत्त्वानामर्थ करोति, श्रवणेनापि स्पर्शनेनापि सत्त्वानामर्थ करोति।
द्र.-तथागतगुह्यसूत्र, शिक्षासमुच्चय में उद्धृत, पृ. ८६ (दरभङ्गा संस्करण १६६०) ३. तद्यथापि नाम शान्तमते, वृक्षस्य मूलच्छिन्नस्य सर्वशाखापत्रपलाशाः शुष्यन्ति, एवमेव शान्तमते, सत्कायदृष्ट्युपशमात् सर्वक्लेशा उपशाम्यन्तीति-द्र. तथागतगुह्य-सूत्र, शिक्षासमुच्चय में उद्धृत, पृ. १३० (दरभङ्गा संस्करण, १६६०) चत्वार इमे महाराज, धर्मा महायानसंम्प्रतिस्थितानां विशेषगामितायै संवर्तन्तेऽपरिहाणाय च। कतमे चत्वारः ? श्रद्धा महाराज, विशेषगामितायै संवर्ततेऽपरिहाणाय….गौरवं…निर्मानता….वीर्य महाराज विशेषगामितायै संवर्ततेऽपरिहाणाय। द्र.-तथागतगुह्यसूत्र, शिक्षासमुच्चय में उद्धृत, पृ. १६८ र (दरभङ्गा संस्करण, १६६०) ५. तत्र कतमोप्रमादः ? यदिन्द्रियसंवरः। स चक्षुषा रूपाणि दृष्ट्वा न निमित्तग्राही भवति नानुव्यञ्जन-ग्राही। …..सर्वधर्मेष्वास्वादं चादीनवं च निःसरणं च यथाभूतं प्रजानाति। द्र.-तथागतगुह्यसूत्र, शिक्षासमुच्चय में उद्धृत, पृ. १६१।
अप्रमादो यत् स्वचित्तस्य दमनम्, परचित्तस्य रक्षा, क्लेशरतेरपरिकर्मणा, धर्मरतेरनुवर्तनम, यावदयमुच्यतेप्रमाद। द्र.-तथागतगुह्यसूत्र, शिक्षासमुच्चय में उद्धृत, पृ. १६१ (दरभङ्गा संस्करण, १६६०) १७. योनिशः प्रयुक्तो हि गुह्यकाधिपते, बोधिसत्त्वो यदस्ति तदस्तीति प्रजानाति, यन्नास्ति तन्नास्तीति प्रजानीति। द्र.-तथागतगुह्यसूत्र शिक्षासमुच्चय में उद्धृत पृ. १६१ (दरभङ्गा संस्करण, १६६०) ५१४ बौद्धदर्शन विनेयजनों को उन्होंने कैसे विविध प्रकार की देशना की ? मात्र एक क्षण की ध्वनि के उच्चारण से वह विविधजनों के मानसिक अन्धकार का नाश करने वाली, उनके बुद्धिरूपी कमल को विकसित करने वाली, जरा, मरण आदि रूपी नदी और समुद्र का शोषण करने वाली तथा प्रलयकालानल को लज्जित करने वाली शरत्कालिक अरुण-प्रभा के समान थी। वस्तुतः जैसे तूरी नामक वाद्ययन्त्र वायु के झोकों से बजती है, वहां कोई बजाने वाला नहीं होता, फिर भी शब्द निकलते हैं, वैसे ही सत्त्वों की वासना से प्रेरित होकर बुद्ध की वाणी भी निःसृत होती है, जबकि उनमें किसी भी प्रकार की कल्पना नहीं होती। नाना आशय वाले सत्त्व समझते हैं कि तथागत के मुख से वाणी निकल रही है। उन्हें ऐसा लगता है, मानों भगवान् हमें धर्म की देशना कर रहे हैं और हम देशना सुन रहे हैं, किन्तु तथागत में कोई विकल्प नहीं होता, क्योंकि उन्होंने समस्त विकल्प जालों का प्रहाण कर दिया है। का इस प्रकार हम देखते हैं कि आचार्य शान्तिदेव के शिक्षासमुच्चय और चन्द्रकीर्ति की प्रसन्नपदा मूलमाध्यमिककारिकाटीका में अनेक स्थलों पर तथागतगुह्यसूत्र के उद्धरण उपलब्ध हैं, जिनका हमने भी यथासम्भव पादटिप्पणी में उल्लेख किया है। यदि ये उद्धरण प्रकाशित वर्तमान गुह्यसमाज में उपलब्ध नहीं होते है- तो समझा जाना चाहिए कि तथागतगुह्यसूत्र और गुह्यसमाज अभिन्न नहीं है, जैसे कि कुछ विद्वानों की धारणा है। आचार्य शान्तिदेव और चन्द्रकीर्ति क काल में ये दोनों अवश्य भिन्न-भिन्न थे।

(०७) समाधिराज

वैपुल्यसूत्रों में समाधिराजसूत्र भी एक पवित्रतम एवं समादृत महायानसूत्र है। इसमें उच्चतम एवं दार्शनिक उपदेशों का समावेश है। इसे ‘चन्द्रप्रदीपसूत्र’ भी कहते हैं। चीनी परम्परा और आचार्य शान्तिदेव इसे चन्द्रप्रदीपसूत्र कहना पसन्द करते हैं, जब कि प्रज्ञाकर दोनों नामों का प्रयोग पृथक् ग्रन्थ के रूप में करते हैं। तथा संस्कृत १. यां च शान्तमते, रात्रिं तथागतोऽनुत्तरां सम्यक्संबोधिमभिसंबुद्धः, यां च रात्रिमुपादाय परिनिर्वास्यति, अस्मिन्नन्तरे तथागतेन एकाक्षरमपि नोदाहृतं न प्रसाहृतं न प्रवाहरिष्यति। कथं तर्हि भगवता ….. विनेयजनेभ्यो विविधप्रकारेभ्यो धर्मदेशना देशिता ? एकक्षणवागुदाहारेणैव तत्तज्जनमनस्तमोहरणी… शरदरुणमहाप्रभेति।
न मिलनातील का तदेव सूत्रे हातामा कर दिया। यथा यन्त्रकृतं तूर्य वाद्यते पवनेरितम् । न चात्र वादकः कश्चिनिरन्त्यथ च स्वराः॥

कामकलीय पिक क. एवं पूर्वसुशुद्धत्वात् सर्वसत्त्वाशयेरिता। आ ज पमा वाग्निश्चरति बुद्धस्य न चास्यास्तीह कल्पना॥

द्र.-तथागतगुह्यसूत्र, प्रसन्नपदा में उद्धृत पृ. १५५ नाना (दरभङ्गा संस्करण, १६६०) अथ च यथाधिमुक्ताः सर्वसत्त्वा नानाधातवाशयास्तां तां विविधां तथागतवाचं निश्चरन्तीं संजानन्ति। तेषामिदं पृथक् भवति- अथ। भगवान् अस्मभ्यमिमं धर्म देशयति, वयं च तथागतस्य धर्मदेशनां शृणमः। तथागतो न कल्पयति न विकल्पयति सर्वविकल्पजालवासनाप्रपञ्चविगतो हि शान्तमते, तथागतः। द्र.-तथागतगुह्यसूत्र, प्रसन्नपदा में उद्धृत, पृ. २३६ (दरभङ्गा संस्करण, १६६०) महायान साहित्य ५१५ नामों को सुरक्षित रखने वाली तिब्बती परम्परा के अनुसार वे इसे ‘सर्वधर्मस्वभावसमताविपञ्चित समाधिराज’ कहते हैं। एक अनुमान यह है कि चन्द्रप्रदीपसूत्र बहुत विशाल ग्रन्थ रहा होगा, इसका लघु संस्करण ही वर्तमान समाधिराज है।
धामा समस्तसुगतोद्रीर्णसर्वसूत्राधिराजतः आर्यचन्द्रप्रदीपाद्धि यथालब्धं ब्रवीम्यहम् ॥

___ उपर्युक्त अनुमान के लिए पर्याप्त प्रमाण नहीं है, क्योंकि शान्तिदेव और प्रज्ञाकर द्वारा चन्द्रप्रदीप के लिए गये सम्पूर्ण उद्धरण समाधिराज के वर्तमान संस्करण में उपलब्ध होते हैं। दूसरी ओर मूल ग्रन्थ की गिलगित में प्राप्त मातृका का आकार बहुत छोटा है। इस ग्रन्थ में कुल ४० अध्याय या परिच्छेद हैं, जिन्हें ‘परिवर्त’ कहा गया है।
ही मिथिलाविद्यापीठ, दरभङ्गा से प्रकाशित इस ग्रन्थ का आधार डॉ. नलिनाक्षदत्त द्वारा विभिन्न मातृकाओं की सहायता से १६४१-५४ में सम्पादित ग्रन्थ है। तिब्बती अनुवाद में संस्कृत ग्रन्थ का पूरा नाम ‘सर्वधर्मस्वभावसमता-विपञ्चित समाधिराज’ उपलब्ध है। यह अनुवाद वीं शताब्दी में शैलेन्द्रबोधि और धर्मशील द्वारा किया गया है, जो ‘क-ग्युर’ नामक संग्रह में प्राप्य है। चीनी भाषा में इसके तीन अनुवाद पाये जाते हैं। पहला पूर्ण अनुवाद नरेन्द्रयशस् द्वारा ई. ५५० में, दूसरा अधूरा अनुवाद शिक्-सिया-कुङ् द्वारा ई. सन् ४२०-७६ में तथा तीसरा अधूरा अनुवाद नगान-शे-कास द्वारा ई. सन् १४८ में किया गया। अन्तिम अनुवाद इस समय अप्राप्य है। चीनी अनुवादों में सर्वत्र इसका नाम ‘चन्द्रप्रदीपसूत्र’ ही है।
_ ग्रन्थ का मुख्य प्रतिपाद्य विषय शून्यता है, जो सर्वधर्मसमता का आश्रय है। इसमें विभिन्न चित्तसमाधियों का विस्तृत वर्णन है। विषय का प्रतिपादन प्रश्नोत्तरके रूप में किया गया है। प्रश्नकर्ता बोधिसत्त्व चन्द्रप्रभ है और बुद्ध उन प्रश्नों का उत्तर देते हैं। सम्भवतः इस ग्रन्थ के ‘चन्द्रप्रदीप’ इस नाम का कारण भी यही है। ग्रन्थ के प्रारम्भ में चन्द्रप्रदीप ने अनेक प्रश्न किये, जिसका उत्तर बुद्ध ने यह कह कर दिया कि एक गुण पर अधिकार कर लेने से सम्पूर्ण गुणों की प्राप्ति हो जाती है और बोधिसत्त्व अनुत्तर सम्यक् संबोधि को भी शीघ्र प्राप्त कर लेता है। वह एक गुण यह है कि बोधिसत्त्व सभी सत्त्वों में समचित्त, हितचित्त, अप्रतिहतचित्त और अविषमचित्त होता है।
LAL १. द्र.-पी.एल. वैद्य, समाधिराजसूत्र की प्रस्तावना, पृ. १४ (दरभङ्गा संस्करण, १६६०) २. एकधर्मेण कुमार, समन्वागतो बोधिसत्त्वो महासत्त्व एतान् गुणान् प्रतिलभते, क्षिप्रं चानुत्तरां सम्यक् सम्बोधिमधिसंबुध्यते। कतमेनेकधर्मेण? इह कुमार, बोधिसत्त्वो महासत्त्वः सर्वसत्त्वेषु समचित्तो भवति हितचित्तोऽप्रतिहतचित्तोऽविषमचित्तः। द्रष्टव्य- समाधिराजसूत्र, निदानपरिवर्त, पृ. ३ (दरभङ्गा-संस्करण १६६१) ५१६ बौद्धदर्शन सभी सत्त्वों में समचित्त, हितचित्त, अप्रतिहत चित्त एवं अविषमचित्त रहने वाला बोधिसत्त्व सर्वधर्मस्वभावसमता समाधि क्या है ? वह कायसंवर, वाक्संवर और मनःसंवर ही है’। इसके बाद ‘सर्वधर्मस्वभावानुबोध प्रतिवेधज्ञान’ तक की, जो समस्त बुद्धधर्मों का आधार है, व्याख्या की गई है। ग्रन्थ में इस विषय का विस्तृत वर्णन है, क्योंकि यह वैपुल्यसूत्र है। शैली पुनरावृत्तिप्रधान है। ___ सर्वधर्मसमता का अर्थ शून्यता है, जो एक प्रकार से प्रतीत्यसमुत्पाद ही है। माध्यमिक परम्परा में इसलिए इस ग्रन्थ का अत्यधिक आदर है। इसीलिए आचार्य चन्द्रकीर्ति ने इसका उल्लेख ‘आर्यसमाधिराजभट्टारक’ के रूप में अपने ग्रन्थों में अनेक बार किया है। माध्यमिक सिद्धान्तों की पुष्टि इस ग्रन्थ के द्वारा अधिक होती है। लड़कावतारसूत्र भी माध्यमिक सिद्धान्तों की पुष्टि के लिए उद्धृत किया जाता है, किन्तु वह योगाचार एवं माध्यमिक दोनों की मिश्रित रूप से संपुष्टि करता है। अतः माध्यमिक परम्परा में समाधिराज का अधिक महत्त्व है। तुलनात्मक दृष्टि में समाधिराज में लड़कावतार की अपेक्षा माध्यमिक बौद्धमत का प्राचीनतर रूप निहित है।

(०८) दशभूमीश्वर

गण्डव्यूह की भाँति यह सूत्र भी अवतंसक का एक भाग माना जाता है। इसमें बोधिसत्त्व की दस आर्यभूमियों का विस्तृत वर्णन है, जिन भूमियों पर क्रमशः अधिरोहण करते हुए बुद्धत्व अवस्था तक साधक पहुँचता है। ‘महावस्तु’ में इस सिद्धान्त का पूर्वरूप उपलब्ध होता है। इस ग्रन्थ में उक्त सिद्धान्त का परिपाक हुआ है।
महायान में इस सूत्र का अत्युच्च स्थान है। इसे दशभूमिक, दशभूमीश्वर एवं दशभूमक नाम से भी जाना जाता है। आर्य असङ्ग ने ‘दशभूमक’ शब्द का ही प्रयोग किया है। इसकी लोकप्रियता एवं प्रामाणिकता में यह प्रमाण है कि अत्यन्त प्राचीनकाल में ही इसके तिब्बती, चीनी, जापानी एवं मंगोलियन अनुवाद हो गये थे। श्री धर्मरक्ष ने इसका चीनी अनुवाद ई. सन् २६७ में रि दिया था। इसके प्रतिपादन की शैली में लम्बे-लम्बे समस्त पद एवं रूपकों की भरमार है। मिथिलाविद्यापीठ ने डॉ. जोनेस राडर के संस्करण के आधार पर इसका पुनः संस्करण किया है।
ज्ञात है कि महायान में दस आर्यभूमियाँ मानी जाती हैं, यथा- प्रमुदिता, विमला, प्रभाकरी, अर्चिष्मती, सुदर्जया, अभिमुखी, दूरङ्गमा, अचला, साधुमती एवं धर्ममेधा। आर्यावस्था से पूर्व जो पृथग्जन भूमि होती है, उसे ‘अधिमुक्तिचर्याभूमि’ कहते हैं। महायान में पाँच मार्ग होते हैं- सम्भारमार्ग, प्रयोगमार्ग, दर्शनमार्ग, भावनामार्ग एवं अशैक्षमार्ग।
१. तत्र कुमार, सर्वसत्त्वेषु समचित्तो बोधिसत्त्वो महासत्त्वो हितचित्तोऽप्रतिहतचित्तोऽविषमचित्त इमं सर्वधर्मस्वभावसमताविपञ्चितं नाम समाधि प्रतिलभते। कतमश्च स कुमार, सर्वधर्मस्वभावसमताविपञ्चितो नाम समाधि ? यदुत कायसंवरः, वाक्यसंवरः, मनःसंवर। द्र.- समाधिराजसूत्र, पृ. ४ (दरभङ्गा-संस्करण १६६१) महायान साहित्य ५१७ दर्शनमार्ग प्राप्त होने पर बोधिसत्त्व ‘आर्य’ कहलाने लगता है। उपर्युक्त दस भूमियाँ आर्य की भूमियाँ हैं। दर्शनमार्ग की प्राप्ति से पूर्व बोधिसत्त्व पृथग्जन होता है। सम्भारमार्ग एवं प्रयोगमार्ग पृथग्जनमार्ग हैं और उनकी भूमि अधिमुक्तिचर्याभूमि कहलाती है।
म महायानगोत्रीय व्यक्ति बोधिचित्त का उत्पाद कर महायान में प्रवेश करता है। पृथग्जन अवस्था में सम्भारमार्ग एवं प्रयोगमार्ग का अभ्यास कर दर्शनमार्ग प्राप्त करते ही आर्य होकर प्रथम प्रमुदिता भूमि को प्राप्त करता है।
पारमिताएं भी दस होती हैं, यथा-दान, शील, शान्ति, वीर्य, ध्यान, प्रज्ञा, उपायकौशल, प्रणिधान, बल एवं ज्ञान पारमिता। बोधिसत्त्व प्रत्येक भूमि में सामान्यतः इन सभी पारमिताओं का अभ्यास करता है, किन्तु प्रत्येक भूमि में किसी एक पारमिता का प्राधान्य हुआ करता है। ग्रन्थ में इन भूमियों के वैशिष्ट्य का विस्तृत प्रतिपादन किया गया है, किन्तु हम संक्षेप में यहाँ परिचयात्मक निरूपण कर रहे हैं।

(०१) प्रमुदिता

संबोधि को तथा सत्त्वहित की सिद्धि को आसन्न देखकर इस भूमि में प्रकृष्ट (तीव्र) मोद (हर्ष) उत्पन्न होता है, अतः इसे ‘प्रमुदिता’ भूमि कहते हैं। इस अवस्था में बोधिसत्त्व पांच भयों से मुक्त हो जाता है, यथा- जीविकाभय, निन्दाभय, मृत्युभय, दुर्गतिभय एवं परिषद्शारद्य (लज्जा का) भय। जो बोधिसत्त्व प्रमुदिता भूमि में अधिष्ठित हो जाता है, वह जम्बूद्वीप पर आधिपत्य करने में समर्थ हो जाता है। इस भूमि में बोधिसत्त्व सामान्यतः दान, प्रियवचन, परहितसम्पादन (अर्थचर्या) एवं समानार्थता (सर्वधर्मसमता)- इन कृत्यों का सम्पादन करता है। विशेषतः इस भूमि में उसकी दानपारमिता की पूर्ति होती है।

(०२) विमला

दौःशील्य एवं आभोग आदि सभी मलो से व्यपगत (रहित) होने के कारण यह भूमि ‘विमला’ कही जाती है। इस भूमि में बोधिसत्त्व शील में प्रतिष्ठित होकर दस प्रकार के कुशलकर्मों का सम्पादन करता है। इस भूमि में चार संग्रह वस्तुओं’ में प्रियवादिता एवं शीलपारमिता का प्राधान्य होता है।

(०३) प्रभाकरी

विशिष्ट (महान) धर्मों का अवभास कराने के कारण यह भूमि ‘प्रभाकरी’ कहलाती है। इस अवस्था में बोधिसत्त्व सभी संस्कार धर्मों को अनित्य, दुःख, अनात्म एवं शून्य देखता है। सभी वस्तुएं उत्पन्न होकर विनष्ट हो जाती हैं। वे अतीत अवस्था में संक्रान्त नहीं होती, भविष्य में कहीं जाकर स्थित नहीं होतीं तथा वर्तमन में भी कहीं उनका अवस्थान नहीं होता। शरीर दुःखस्कन्धात्मक है- ऐसा बोधिसत्त्व अवधारण करता है। उसमें क्षान्ति, शम, औदार्य एवं प्रियवादिता आदि गुणों का उत्कर्ष होता है। इस भूमि में अवस्थित बोधिसत्त्व इन्द्र के समान बन जाते हैं। इस भूमि में सत्त्वहितचर्या बलवती होती है और क्षान्तिपारमिता का आधिक्य होता है तथा बोधिसत्त्व दूसरों में धर्म का अवभास करता है। हीर १. चार संग्रह ये हैं - दान, प्रियवादित्व, अर्थचर्या एवं समानार्थता।
५१८ बौद्धदर्शन का

(०४) अर्चिष्मती

बोधिपाक्षिक प्रज्ञा इस भूमि में क्लेशावरण एवं ज्ञेयावरण का दहन करती है। बोधिपाक्षिक धर्म अर्चिष् (ज्वाला) के समान होते हैं। फलतः बोधिपाक्षिक धर्म और प्रज्ञा से युक्त होने के कारण यह भूमि ‘अर्चिष्मती’ कहलाती है। बोधिसत्त्व इस भूमि में दस प्रकार के धर्मालोक के साथ अधिरूढ होता है। बोधिपाक्षिक धर्म सैंतीस होते है। , यथा- चार स्मृत्युपस्थान, चार प्रधान, चार ऋद्धिपाद, पाँच इन्द्रिय, पाँच बल, सात बोध्यङ्ग और आठ आर्यमार्ग (आर्यअष्टाङ्गिक मार्ग) बोधिसत्त्व इन बोधिपाक्षिक धर्मों का इस भूमि में विशेष लाभ करता है। अन्य पारिमताओं की अपेक्षा इस भूमि में वीर्यपारमिता की प्रधानता होती है तथा संग्रह वस्तुओं में समानार्थता अधिक उत्कर्ष को प्राप्त होती है।

(०५) सुदुर्जया

बोधिसत्त्व इस भूमि में सत्त्वों का परिपाक और अपनी चित्त की विशेष रूप से रक्षा करता है। ये दोनों कार्य अत्यन्त दुष्कर हैं। इन पर जय प्राप्त करने के कारण यह भूमि ‘सुदुर्जया’ कहलाती है। बोधिसत्त्व इस भूमि में दस प्रकार की चित्तविशुद्धियों को प्राप्त करता है तथा चतुर्विध आर्यसत्व के यथार्थज्ञान का लाभ करता है। इस स्थिति में बोधिसत्त्व को यह उपलब्धि होती है कि सम्पूर्ण विश्व शून्य है। सभी प्राणियों के प्रति उसमें महाकरुणा का प्रादुर्भाव होता है तथा महामैत्री का आलोक उत्पन्न होता है। वह दान, प्रियवादिता एवं धर्मोपदेश आदि के द्वारा संसार में कल्याण के मार्ग का निर्देश करता है। इस भूमि में अन्य पारमिताओं की अपेक्षा ध्यानपारमिता की प्रधानता होती है। __

(०६) अभिमुखी

इस भूमि में प्रज्ञा का प्राधान्य होता है। प्रज्ञापारमिता की वजह से संसार और निर्वाण दोनों में प्रतिष्ठित नहीं होने के कारण यह भूमि संसार और निर्वाण दोनों के अभिमुख होती है। इसलिए ‘अभिमुखी’ कहलाती है। इस भूमि में बोधिसत्त्व बोध्यङ्गों की निष्पत्ति का विशेष प्रयास करते हैं। इस भूमि में प्रज्ञापारमिता अन्य पारमिताओं की अपेक्षा अधिक प्रधान होती है।

(०७) दूरङ्गमा

संबोधि को प्राप्त कराने वाले एकायन मार्ग से अन्वित होने के कारण यह भूमि उपाय और प्रज्ञा के क्षेत्र में दूर तक प्रविष्ट है, क्योंकि बोधिसत्त्व अभ्यास की सीमा को पार कर गया है, इसलिए यह भूमि ‘दूरङ्गमा’ कहलाती है। इस अवस्था में बोधिसत्त्व शून्यता, अनिमित्त और अप्रणिहित इन त्रिविधि विमोक्ष या समाधियों का लाभ करता है। इस भूमि में अन्य पारमिताओं की अपेक्षा ‘उपायकौशल पारमिता’ अधिक बलवती होती है।

(०८) अचला

नाम से ही स्पष्ट है कि इस भूमि पर अधिरूढ होने पर बोधिसत्त्व की परावृत्ति (पीछे लौटने) की सम्भावना नहीं रहती। इस भूमि में वह अनुत्पत्तिक धर्मक्षान्ति से समन्वित होता है। निमित्ताभोगसंज्ञा और अनिमित्ताभोगसंज्ञा इन दोनों संज्ञाओं से विचलित नहीं होने के कारण यह भूमि ‘अचला’ कहलाती है। इस भूमि का लाभ करने पर बोधिसत्त्व निर्वाण की भी इच्छा नहीं करते, क्योंकि ऐसा करने पर सभी दुःखी प्राणियों का कल्याण करने की उनकी जो प्रतिज्ञा है, उसके भङ्ग होने की आशंका होती है। वे ALLA महायान साहित्य ५१६ लोक में ही अवस्थान करते हैं। इनका पूर्व प्रणिधान इस अवस्था में बलवान होता है। जो बोधिसत्त्व इस भूमि में अवस्थान करते हैं, उनमें आयुर्वशिता, चेतोवशिता, कर्मवशिता आदि दश वशिताएं तथा आशयबल, अध्याशय बल, महाकरुणा आदि दश बल सम्पन्न होते हैं। इस भूमि में अन्य पारमिताओं की अपेक्षा ‘प्रणिधान पारमिता’ का आधिक्य रहता है।

(०९) साधुमती

चार प्रतिसंविद् (विशेष ज्ञान) होती हैं, यथा- धर्मप्रतिसंविद्, अर्थप्रतिसंविद्, निरुक्तिप्रतिसंविद् एवं प्रतिभानप्रतिसंविद् । इस भूमि में बोधिसत्त्व इन चारों प्रतिसंविद् में प्रवीण (= साधु अर्थात् कर्मण्य) हो जाता है, इसलिए यह भूमि ‘साधुमती’ कहलाती है। धर्मप्रतिसंविद् के द्वारा वह धर्मों के स्वलक्षण को जानता है। अर्थप्रतिसंविद् के द्वारा धर्मों के विभाग को जानता है। निरुक्तिप्रतिसंविद् के द्वारा धर्मों को अविभक्त देशना को जानता है तथा प्रतिभानप्रतिसंविद् के द्वारा धर्मों के अनुप्रबन्ध अर्थात् निरवच्छिन्नता को जानता है। इस अवस्था में बोधिसत्त्व कुशल और अकुशलों की निष्पत्ति के प्रकार को ठीक-ठीक जान लेता है। इस भूमि में पारमिताओं में ‘बल पारमिता’ का प्राधान्य होता है।

(१०) धर्ममेघा

धर्मरूपी आकाश विविध समाधिमुख और विविध धारणीमुख रूपी मेघों से इस भूमि में व्याप्त हो जाता है, अतः यह भूमि ‘धर्ममेघा’ कहलाती है। यह भूमि अभिषेक भूमि आदि नामों से भी परिचित है। इस भूमि में बोधिसत्त्व की ‘सर्वज्ञानाभिषेक समाधि’ निष्पन्न होती है। बोधिसत्त्व जब इस समाधि का लाभ करते हैं तब वे ‘महारत्नराजपद्म’ नामक आसन पर उपविष्ट दिखलाई पड़ते हैं। वे अज्ञान से उत्पन्न क्लेश रूपी अग्नि का धर्ममेघ के वर्णन से उपशमन करते हैं। अर्थात् क्लेशरूपी अग्नि को बुझा देते हैं, इसलिए इस भूमि का नाम ‘धर्ममेघा’ है। इस भूमि में उनकी ‘ज्ञानपारामता’ अन्य पारमिताओं की अपेक्षा प्राधान्य का लाभ करती है।

प्रज्ञापारमितासूत्र

प्रज्ञापारमितासूत्र प्रमुखतः भगवान् बुद्ध द्वारा गृध्रकूट पर्वत पर द्वितीय धर्मचक्र के काल में उपदिष्ट देशनाएं हैं। कालान्तर में ये सूत्र जम्बूद्वीप में विलुप्त हो गये। आचार्य नागार्जुन ने नागलोक जाकर उन्हें प्राप्त किया और वे वहाँ से पुनः जम्बूद्वीप लाए। प्रज्ञापारमितासूत्रों के दो पक्ष हैं। एक दर्शनपक्ष है, जिसे प्रज्ञापक्ष या शून्यतापक्ष भी कहा जाता है। दूसरा है साधनापक्ष, जिसे उपायपक्ष या करुणापक्ष भी कहा जाता है। नागार्जुन ने प्रज्ञापारमितासूत्रों के दर्शनपक्ष को अपनी कृतियों द्वारा प्रकाशित किया। प्रज्ञापारमितासूत्रों के आधार पर उन्होंने प्रमुखतः मूलमाध्यमिककारिका आदि ग्रन्थों में शून्यता-दर्शन को युक्तियों द्वारा प्रतिष्ठापित किया, जिसे आगे चलकर उनके अनुयायियों ने और अधिक विकसित किया। प्रज्ञापारमितासूत्रों के साधनापक्ष को आर्य असंग ने अपनी कृतियों द्वारा प्रकाशित किया। तदनन्तर उनके अनुयायियों ने उसे और अधिक पल्लवित एवं पुष्पित किया।
५२० बौद्धदर्शन शून्यता, अनुत्पाद, अनिरोध आदि पर्यायवाची शब्द हैं। सभी धर्मों की निःस्वभावता प्रज्ञापारमितासूत्रों का मुख्य प्रतिपाद्य है। प्रज्ञापारमितासूत्रों की संख्या अत्यधिक है। शतसाहसिका (एक लाख श्लोकात्मक) प्रज्ञापारमिता से लेकर एकाक्षरी प्रज्ञापारमिता तक ये सूत्र पाये जाते हैं। महायानी वैपुल्यसूत्रों के दो प्रकार हैं। एक प्रकार के वे सूत्र हैं, जिनमें बुद्ध, बोधिसत्त्व, बुद्धयान आदि की महत्ता प्रदर्शित की गई है। ललितविस्तर, सद्धर्मपुण्डरीक आदि सूत्र इसी प्रकार के हैं। दूसरे प्रकार में वे सूत्र आते हैं, जिनमें शून्यता और प्रज्ञा की महत्ता प्रदर्शित है, ये सूत्र प्रज्ञापारमितासूत्र ही हैं। शून्यता और महाकरुणा- इन दोनों का समन्वय प्रज्ञापारमितासूत्रों में दृष्टिगोचर होता है। ___ महायान साहित्य में प्रज्ञापारमितासूत्रों का अत्यधिक महत्त्व है। अन्य सूत्रों में अधिकतर बुद्ध और बोधिसत्त्वों का संवाद दिखलाई देता है, जबकि प्रज्ञापारमितासूत्रों में बुद्ध सुभूति नामक स्थविर से प्रश्न करते हैं। सुभूति और शारिपुत्र इन दो स्थविरों का शून्यता के बारे में संवाद ही तात्त्विक एवं गम्भीर है। इन सूत्रों की प्राचीनता इसी से प्रमाणित है कि ई. सन् १७६ में प्रज्ञापारमितासूत्र का चीनी भाषा में रूपान्तर हो गया था। प्रायः सभी बौद्ध धर्मानुयायी देशों में इन सूत्रों का अत्यधिक समादर है।
नेपाली परम्परा के अनुसार मूल प्रज्ञापारमिता महायान सूत्र सवा लाख श्लोकात्मक है। पुनः एक लक्षात्मक, पच्चीस हजार, दस हजार और आठ हजार श्लोकात्मक प्रज्ञापारमितासूत्र भी प्रकाशित हैं। चीनी और तिब्बती परम्परा में इसके और भी अनेक प्रकार हैं। संस्कृत में निम्नलिखित सूत्र अंशतः या पूर्णरूपेण उपलब्ध होते हैं १. शतसाहनिकाप्रज्ञापारमिता, २. पञ्चविंशतिसाहस्त्रिका प्रज्ञापारमिता, ३. अष्टसाहस्रिका प्रज्ञापारमिता, ४. सार्धद्विसाहस्रिका प्रज्ञापारमिता, ५. सप्तशतिका प्रज्ञापारमिता, ६. वज्रच्छेदिका (त्रिशतिका) प्रज्ञापारमिता, ७. अल्पाक्षरा प्रज्ञापारमिता, ८. भगवती प्रज्ञापारमितासूत्र आदि।
प्रज्ञापारमितासूत्रों को जननीसूत्र भी कहते हैं। प्रज्ञापारमिता के बिना बुद्धत्व का लाभ सम्भव नहीं है, अतः यह बुद्धत्व को उत्पन्न करने वाली है। इसी अर्थ में इसे जननी, बुद्धमाता आदि शब्दों से भी अभिहित करते हैं। इन्हें ‘भगवती’ भी कहते हैं, जो इनके प्रति अत्यधिक आदर का सूचक है। जननीसूत्रों का तीन में विभाजन भी किया जाता है, यथा विस्तृत, मध्यम एवं संक्षिप्त जिनजननीसूत्र । शतसाहस्रिका प्रज्ञापारमिता विस्तृत जिनजननीसूत्र है, जिसका उपदेश भगवान् ने मृदु-इन्द्रिय और विस्तृतरुचि विनेयजनों के लिए किया है। मध्येन्द्रिय और मध्यरुचि विनेयजनों के लिए मध्यम जिनजननी अर्थात् पञ्चविंशति साहस्रिका प्रज्ञापारमिता का तथा तीक्ष्णेन्द्रिय और संक्षिप्तरुचि विनेयजनों के लिए संक्षिप्त जिनजननी अर्थात् अष्टसाहस्रिका प्रज्ञापारमिता का भगवान् ने उपदेश किया है। इन सभी में अष्टसाहस्रिका पूर्णतः उपलब्ध है, अतः उसका यहाँ निरुपण किया जा रहा है।
AL महायान साहित्य ५२१ हैं

अष्टसाहस्रिका प्रज्ञापारमिता

इसमें कुल बत्तीस परिवर्त हैं। ग्रन्थ का प्रारम्भ इस प्रकार होता है- एक समय भगवान्, राजगृह में गृध्रकूट पर्वत पर साढ़े बारह हजार (१२,५००) भिक्षुओं के साथ विहार कर रहे थे, उनमें आनन्द को छोड़कर सभी अर्हत्, क्षीणास्रव एवं कृतकृत्य थे। उस समय भगवान् ने अधिष्ठान किया- ‘सुभूति, तुम्हें बोधिसत्त्व महासत्त्वों की प्रज्ञापारमिता का प्रतिभान हो’। भगवान् के वचन सुनकर शारिपुत्र को सन्देह हुआ कि क्या सुभूति स्थविर अपने सामर्थ्य से व्याख्यान करेंगे या बुद्धानुभाव से। स्थविर सुभूति ने बुद्धानुभाव से उनके मन की बात जानकर कहा- ‘आयुष्मन् शारिपुत्र, श्रावक जो कुछ भी भाषण करते हैं, उपदेश करते हैं, प्रकाशन करते हैं, वह सब तथागत का ही पुरुषकार है, क्योंकि हे शारिपुत्र, धर्मता के अनुकूल (अविपरीत) जो कुछ भी श्रावक कहेंगे, वह बुद्धानुभाव ही है।
तब आयुष्मान् सुभूति ने भगवान् को अञ्जलिबद्ध होकर कहा- भगवन्, बोधिसत्त्व-बोधिसत्त्व, प्रज्ञापारमिता-प्रज्ञापारमिता यद्यपि ऐसा कहा जाता है, किन्तु किस धर्म का यह अधिवचन (नाम) है ? मैं तो ऐसे किसी भी धर्म को नहीं देखता हूँ, जिसे मैं ‘बोधिसत्त्व’ कहूँ या प्रज्ञापारमिता कह सकूँ। ऐसा होने पर भी चित्त में विषाद न लाकर प्रज्ञापारमिता की भावना करते हुए बोधिसत्त्व को चाहिए कि वह बोधिचित्त को भी परमार्थतः न माने, क्योंकि वह चित्त अचित्त है, चित्त की प्रकृति प्रभास्वर है।
___ तब शारिपुत्र ने कहा- क्या आयुष्मन् सुभूति, ऐसा भी कोई चित्त है, जो अचित्त है? सुभूति ने कहा- क्या आयुष्मन् शारिपुत्र, जो अचित्तता है, उस अचित्तता में अस्तिता या नास्तिता की उपलब्धि होती है ? शारिपुत्र ने कहा- नहीं। आयुष्मन् सुभूति, वह अचित्तता क्या है ? सुभूति ने कहा- आयुष्मन् शारिपुत्र, वह अचित्तता अविकार और अविकल्प है (अविकारा आयुष्मन्, अविकल्पाऽचित्तता)। - सुभूति का वचन सुनकर शारिपुत्र ने साधुवाद किया और कहा जो श्रावकभूमि में, प्रत्येकबुद्धभूमि में और बोधिसत्त्वभूमि में भी शिक्षा ग्रहण करना चाहता है, उसे इसी प्रज्ञापारमिता का ग्रहण करना चाहिए। इसी प्रज्ञापारमिता में सभी बोधिसत्त्व धर्म उपदिष्ट हैं। उपायकौशल के साथ इसी में योग करना चाहिए।
हि तब सुभूति ने भगवान् से फिर कहा- भगवन्, मैं ‘बोधिसत्त्व’ इस नामधेय को भी नहीं जानता हूँ, क्योंकि नामधेय भी अविद्यमान है। वह न स्थित है, न अस्थित है। साथ ही, यह भी है भगवन्, कि प्रज्ञापारमिता में आचरण करते हुए बोधिसत्त्व को न रूप में, न संज्ञा में, न वेदना में, न संस्कार में और न विज्ञान में स्थित होना चाहिए, क्योंकि वह रूप में स्थित होता है तो रूपाभिसंस्कार में ही स्थित होता है, प्रज्ञापारमिता में स्थित नहीं होता। ५२२ बौद्धदर्शन अतः प्रज्ञापारमिता की पूर्ति में संलग्न बोधिसत्त्व को ‘सर्व धर्म अपरिगृहीत’ नामक अप्रमाणनियत और असाधारण समाधि की प्राप्ति करनी चाहिए। वह रूप से लेकर विज्ञान तक का परिग्रह नहीं करता। यही उसकी प्रज्ञापारमिता है। वह प्रज्ञा को बिना पूर्ण किए बीच में तब तक परिनिर्वाण को भी प्राप्त नहीं करता, जब तक दस तथागतबलों से परिपूर्ण नहीं हो जाता। यह भी उसकी प्रज्ञापारमिता है। यह भी धर्मता है कि रूप रूपस्वभाव से विरहित है, वेदना वेदनास्वभाव से….विज्ञान विज्ञानस्वभाव से विरहित है। प्रज्ञापारमिता भी प्रज्ञापारमितास्वभाव से विरहित है। सर्वज्ञता भी सर्वज्ञतास्वभाव से विरहित है। लक्षण भी लक्षणस्वभाव से विरहित है। स्वभाव भी स्वभाव से विरहित है। कि तब आयुष्मान् शारिपुत्र ने सुभूति से प्रश्न किया - क्या आयुष्मन् जो बोधिसत्त्व यहाँ (प्रज्ञापारमिता में) शिक्षित होगा, वह सर्वज्ञता को प्राप्त होगा ? _____ सुभूति ने कहा- जो बोधिसत्त्व प्रज्ञापारमिता में शिक्षित होगा, वह सर्वज्ञता को प्राप्त होगा, क्योंकि हे आयुष्मन्, सभी धर्म अजात एवं अनिर्यात हैं। ऐसा जानने पर बोधिसत्त्व सर्वज्ञता के नजदीक होता है। जैसे-जैसे वह सर्वज्ञता के समीप होता है, वैसे-वैसे वह सत्त्वपरिपाचन, कायचित्तपरिशुद्धि, लक्षणपरिशुद्धि, बुद्धक्षेत्रपरिशुद्धि और बुद्धों से समवधान करता है। इस प्रकार हे आयुष्मन्, प्रज्ञापारमिता में विहार करने से सर्वज्ञता आसन्न होती है।
तब शारिपुत्र ने भगवान् से प्रश्न किया- इस प्रकार शिक्षा प्राप्त करने वाला बोधिसत्त्व किस धर्म में शिक्षा प्राप्त करता है ? भगवान् ने कहा- शारिपुत्र, इस प्रकार शिक्षा प्राप्त करने वाला बोधिसत्त्व किसी भी धर्म में शिक्षा प्राप्त नहीं करता, क्योंकि शारिपुत्र, धर्म वैसे विद्यमान नहीं है, जैसे बाल और पृथग्जन उसमें अभिनिविष्ट हैं।
3 शारिपुत्र ने पूछा- भगवन्, धर्म कैसे विद्यमान है ? भगवान् ने कहा- जिस प्रकार वे संविद्यमान नहीं हैं, उस प्रकार वे संविद्यमान हैं। इस प्रकार वे अविद्यमान हैं। इसीलिए कहा जाता है कि यह अविद्या है। उसमें बाल एवं पृथग्जन अभिनिविष्ट हैं। उन्होंने अविद्यमान सर्व धर्मों की कल्पना की है। वे उनकी कल्पना करके दो अन्तों में आसक्त हैं। अतीत, अनागत, प्रत्युत्पन्न धर्मों की कल्पना करते हैं और नाना रूपों में अभिनिविष्ट होते हैं। इसलिए वे मार्ग को नहीं जानते। यथाभूत मार्ग को बिना जाने वे त्रैधातुक संसार से मुक्त नहीं होंगे और न वे भूतकोटि को जान सकेंगे। इसीलिए वे बाल-पृथग्जन हैं। जो १. न हि ते शारिपुत्र, धर्मास्तथा संविद्यन्ते, यथा बाल-पृथग्जना अशुतवन्तोऽभिनिविष्टाः।
द्र.-अष्टसाहस्रिका प्रज्ञापारमिता, पृ. ८ (दरभङ्गा संस्करण, १९६० २. यथा शारिपुत्र, न संविद्यन्ते, एवमविद्यमाना, तेनोच्यन्ते अविद्येति….तैरसंविद्यमानानां सर्वधर्माः कल्पिताः ते तान् कल्पयित्वा द्वयोरन्तयोः सक्ताः। तान् धर्मान् न जानन्ति, न पश्यन्ति। द्र.- अष्टसाहसिका प्रज्ञापारमिता, पृ. ८ (दरभङ्गा संस्करण, १६६०) महायान साहित्य ५२३ बोधिसत्त्व है। , वे किसी भी धर्म में अभिनिवेश नहीं करते। शारिपुत्र, वह बोधिसत्त्व सर्वज्ञता में भी शिक्षित नहीं होता, इसी कारण सभी धर्मों में शिक्षित होता है, सर्वज्ञता को प्राप्त होता तब आयुष्मान् सुभूति ने भगवान् से प्रश्न किया- भगवन्, जो ऐसा पूछे कि क्या मायापुरुष सर्वज्ञता में शिक्षित होगा ? सर्वज्ञता को प्राप्त करेगा ? ऐसा पूछने पर क्या उत्तर दिया जाए ? ___ भगवान् ने कहा- सुभति, मैं तुमसे ही प्रश्न करता हूँ कि क्या वह माया अलग है और रूप अलग है ? इसी तरह संज्ञा….विज्ञान अलग है और माया अलग है ? सुभूति ने कहा- नहीं भगवन्, रूप ही माया है, माया ही रूप है (रूपमेव भगवन्, माया मायैव रूपम्) विज्ञान ही माया है, माया ही विज्ञान है। भगवान् ने कहा- तो क्या सुभूति, इन पाँच उपादान स्कन्धों में ही क्या यह संज्ञा, प्रज्ञप्ति, व्यवहार नहीं है कि यह ‘बोधिसत्त्व’ है ? सुभूति ने कहा- भगवन्, ठीक ऐसा ही है। भगवान् ने रूप आदि को मायोपम कहा है। ये पांच उपादान स्कन्ध ही मायापुरुष हैं। किन्तु भगवन्, फिर बोधिसत्त्व क्या पदार्थ है, उसे क्यों महासत्त्व कहा जाता है ? है भगवान् ने कहा- सुभूति, बोधिसत्त्व पदार्थ अपदार्थ है (अपदार्थः सुभूते, बोधिसत्त्वपदार्थः) सर्व धर्मों की असक्तता में ही वह शिक्षित होता है। उसी से वह सम्यक् संबोधि को अभिसंबुद्ध करता है। बोधि के ही अर्थ में वह बोधिसत्त्व महासत्त्व है। महान सत्त्वराशि में, महान् सत्त्वनिकाय में वह अग्रता (श्रेष्ठता) को प्राप्त करता है, इसलिए वह ‘महासत्त्व’ है।
इस विषय में अपना विचार प्रकट करते हुए शारिपुत्र ने कहा- मैं मानता हूँ कि आत्मदृष्टि, सत्त्वदृष्टि, भव-विभव और शाश्वत - उच्छेद दृष्टि आदि महती दृष्टियों के प्रहाण के लिए धर्म का उपदेश करता है, इसलिए बोधिसत्त्व महासत्त्व है। और सुभूति ने कहा- भगवन्, बोधिचित्त, जो कि सर्वज्ञता-चित्त है, अनास्रव है और जो असाधारण है, ऐसे महान् चित्त में भी अनासक्त और अपर्यापन्न होने से बोधिसत्त्व महासत्त्व है।
नाम शरिपुत्र ने पूछा- आयुष्मन् सुभूति, क्यों ऐसे महान् चित्त में वह अनासक्त एवं अपर्यापन्न है ? ) सुभूति ने कहा - इसलिए कि वह चित्त अचित्त है। _ इसी विषय पर पूर्ण मैत्रायणीपुत्र ने कहा- भगवन्, महासन्नाहसन्नद्ध, महायान में सम्पस्थित होने के कारण वह बोधिसत्त्व ‘महासत्त्व’ कहलाता है।
भगवान् ने कहा- सुभूति, वह महासन्नाहसन्नद्ध इसलिए है कि उसका ऐसा प्रणिधान है- “अप्रमेय सत्त्वों का मुझे परिनिर्वापण करना (निर्वाण प्राप्त कराना) है। " वह ५२४ बौद्धदर्शन असंख्येय सत्त्वों का परिनिर्वापण करता है। वास्तव में सुभूति, ऐसा कोई सत्त्व नहीं है, जो परिनिर्वृत्त (निर्वाणप्राप्त) हो या कोई परिनिर्वृत्त कराता हो। सुभूति, धर्मों की यह धर्मता है कि सभी धर्म मायाधर्म हैं। लेकिन वहां न कोई जन्म पाता है, न मरता है, न अन्तर्हित होता है, उसी प्रकार सुभूति, वह बोधिसत्त्व अप्रमेय, असंख्येय सत्त्वों को परिनिर्वृत्त करता है, तथापि न कोई निर्वाण को प्राप्त होता है और न कोई निर्वाण को प्राप्त कराता है।
तब सुभूति ने कहा- तब तो भगवान् के कहने का अर्थ यह है कि बोधिसत्त्व असन्नाहसन्नद्ध ही है ? को भगवान् ने कहा- ठीक ऐसा ही है सुभूति, सर्वज्ञता अकृत है, अनभिसंस्कृत है। वे सत्त्व भी अकृत हैं, अनभिसंस्कृत हैं, जिनके लिए वह बोधिसत्त्व सन्नाहसन्नद्ध है, क्योंकि निर्वाण को प्राप्त होने वाला और प्राप्त कराने वाला दोनों अविद्यमान हैं। कही 5 सुभूति ने कहा- जो महायान- महायान कहा जाता है, वह महायान क्या पदार्थ है ? भगवन मैं मानता हूँ कि आकाशसम होने से, अतिमहान होने से वह ‘महायान’ कहलाता है। इसका न कहीं से आगम है और न कहीं निर्गम है। इसका कोई स्थान संविद्यमान नहीं है…यह यान सम है, इसलिए यह ‘महायान’ है। भगवन्, महायान नाम को कोई पदार्थ नहीं है। ‘बुद्ध’ यह भी नामधेय मात्र है। बोधिसत्त्व, प्रज्ञापारमिता, यह भी नामधेयमात्र है। ऐसा क्यों है ? जब बोधिसत्त्व रूप आदि धर्मों की प्रज्ञापारमिता के द्वारा परीक्षा करता है, तब रूप न प्राप्त होता है, न नष्ट होता है, वह रूप का न उत्पाद देखता है, न विनाश देखता है (इसी प्रकार अन्य स्कन्ध भी हैं) क्योंकि जो रूप का अनुत्पाद है, वह रूप नहीं है, जो रूप का अव्यय (अविनाश) है, वह भी रूप नहीं है। इस प्रकार अनुत्पाद और रूप तथा अव्यय और रूप-ये दोनों अद्वय हैं, अद्वैधीकार हैं।
तब आयुष्मान् शारिपुत्र ने कहा- आयुष्मन् सुभूति, आपकी देशना के अनुसार तो बोधिसत्त्व भी अनुत्पाद है। ऐसा होने पर बोधिसत्त्व दुष्करचर्या करने के लिए क्यों उत्साहित होगा ? आयुष्मान् सुभूति ने कहा- शारिपुत्र, मैं नहीं चाहता कि बोधिसत्त्व दुष्कर चर्या करें या दुष्करसंज्ञा को प्राप्त करें। दुष्करचर्या या दुष्करसंज्ञा से अप्रमेय असंख्येय सत्त्वों का हित नहीं किया जा सकता। इसलिए बोधिसत्त्व को सभी सत्त्वों के पति सुखसंज्ञा, मातृसंज्ञा, पितृसंज्ञा का उत्पाद करना चाहिए और उनके लिए आत्मविसर्जन (आत्मसमर्पण) करना चाहिए। ऐसा है, फिर भी आप (शारीपुत्र) ने जो पूछा कि क्या ‘बोधिसत्त्व अनुत्पाद है’ ? तो मैं फिर से कहता हूँ कि ठीक ऐसा ही है। बोधिसत्त्व अनुत्पाद हैं केवल बोधिसत्त्व ही नहीं, अपितु बोधिसत्त्व धर्म भी, सर्वज्ञता और सर्वज्ञताधर्म भी, पृथग्जन और पृथग्जनधर्म भी अनुत्पाद ही है।
महायान साहित्य ५२५ आयुष्मन् शारीपुत्र, यही सभी धर्मों में अनश्चित पारमिता है। यही सार्वयानिकी पारिमता है, जो कि प्रज्ञापारमिता है। ऐसी गम्भीर प्रज्ञापारमिता की देशना करने पर जिसके चित्त में द्विविधा उत्पन्न नहीं होती, वही इस गम्भीर प्रज्ञापारमिता को, इस अद्वयज्ञान को प्राप्त करता है। तब बुद्ध और शारीपुत्र ने सुभूति के उक्त वचनों का साधुवाद देते हुए अभिनन्दन किया।
हमने यहाँ प्रथम परिवर्त का संक्षेप प्रस्तुत किया है। विराट् प्रज्ञापारमिता में प्रायः इन्हीं विषयों की बार-बार चर्चा आती है। व्यवहार और परमार्थ सत्य का एकत्र निरूपण करने पर जो कठिनाई आती है, उसकी झलक शारीपुत्र और सुभूति के संवाद में मिलती है। स्थविर सुभूति और शारीपुत्र द्वारा इस चर्चा का किया जाना और भी मार्मिक है। हीनयानी अर्हतों द्वारा शून्यवाद की स्थापना कराने का यह प्रयत्न है। बोधिसत्त्व, महासत्त्व, महायान आदि शब्दों के भिन्न-भिन्न अर्थ इस परिवर्त में बताये गये हैं। अद्वयज्ञान में प्रतिष्ठित होना ही बोधिसत्त्वचर्या है। यह अद्वयज्ञान ही प्रज्ञा है, प्रज्ञापारमिता है। इस सिद्धान्त का यहाँ प्रतिपादन हैं इसी सिद्धान्त को नागार्जुन आदि आचार्यों ने दार्शनिक रूप में प्रतिष्ठित किया है।
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अवतंसक

चीनी त्रिपिटक एवं तिब्बती कग्युर में ‘अवतंसक’ नामक एक महायानसूत्रों का विभाग पाया जाता है। अवतंसक नामक एक बौद्ध निकाय भी उत्पन्न हुआ था। बोधिसत्त्व - उपासना का प्रकर्ष हम ‘आर्यबुद्धावतंसक’ नामक महायानसूत्र में पाते हैं। महाव्युत्पत्ति में भी इस ग्रन्थ का उल्लेख है। जापान का केगोन निकाय भी इसे मान्यता देता है। चीनी परम्परा के अनुसार छह भिन्न-भिन्न अवतंसकसूत्र थे, जिनमें छत्तीस हजार से लेकर एक लाख गाथाओं का संग्रह है। इनमें छत्तीस हजार गाथाओं का चीनी भाषान्तर बुद्धभद्र ने अन्य भिक्षुओं के सहयोग से ई. सन् ४१८ में किया था। शिक्षानन्द ने ४५०० गाथाओं का भाषान्तर सातवीं शताब्दी में किया था। अवतंसकसूत्र मूल संस्कृत में प्रायः उपलब्ध नहीं हैं, किन्तु गण्डव्यूहसूत्र एवं दशभूमकसूत्र संस्कृत में उपलब्ध हैं, जो अवतंसक साहित्य में संगृहीत माने जाते हैं।

रत्नकूट

यह भी महायानसूत्रों के विभाजन का एक प्रकार है। चीनी भाषा में रत्नकूट अनूदित है तथा तिब्बती कग्युर में भी यह संगृहीत है। यह ४६ सूत्रों का एक संग्रह है, जिसमें अक्षोभ्यव्यूह, मञ्जुश्रीबुद्धक्षेत्रगुणव्यूह, बोधिसत्त्वपिटक, पितापुत्रसमागम, काश्यपपरिवर्त, राष्ट्रपालपरिपृच्छा आदि अनेक छोटे-बड़े ग्रन्थ सम्मिलित हैं। तारानाथ के अनुसार ‘रत्नकूट धर्मपर्याय’ नामक ग्रन्थ (जिसमें एक सहस्र अध्याय थे) कनिष्क के पुत्र के समय उपनिबद्ध हुआ था। इसके कुछ मौलिक संस्कृत अंश खोतान के समीप मिले थे। कुछ विद्वानों का मत है कि रत्नकूट और काश्यपपरिवर्त एक ही ग्रन्थ है। रत्नकूट में बाद में अन्य ग्रन्थों का भी संग्रह हुआ।
५२६ बौद्धदर्शन कि काश्यपपरिवर्त में भगवान् का महाकाश्यप भिक्षु से संवाद है। बोधिसत्त्वयान और शून्यता का उसमें मुख्यतः प्रतिपादन है। एक जगह लिखा है कि ‘हे काश्यप, जिस प्रकार प्रतिपदा के चन्द्र की विशेष पूजा होती है, पूर्णिमा के चन्द्र की विशेष पूजा नहीं होती, उसी प्रकार मेरे अनुयायियों को चाहिए कि वे बोधिसत्त्वों की तथागत से भी विशेष पूजा करें, क्योंकि तथागत बोधिसत्त्वों से ही उत्पन्न होते हैं। काश्यप परिवर्त का चीनी अनुवाद ई. सन् १७८-१८४ के बीच हो गया था। रत्नकूट में अनेक परिपृच्छा ग्रन्थ संग्रहीत हैं। कि

राष्ट्रपालपरिपृच्छा

इसमें दो परिवर्त हैं। प्रथम निदानपरिवर्त है। एक समय भगवान् गृध्रकूट में अनेक बोधिसत्त्वों के साथ धर्म देशना कर रहे थे। उस समय प्रामोद्यराज नामक बोधिसत्त्व ने भगवान् की स्तुति की और अनिमेष नयनों से तथागतकाय को देखते हुए उसके मन में गम्भीर, दुरवगाह, दुर्दर्श, दुरनुबोध, अतयं, तर्कापगत, शान्त एवं सूक्ष्म धर्मधातु का विचार आया। उसने देखा कि भगवान् बुद्ध अनालय गगनगोचर हैं। उसने अनावरण बुद्धविमोक्ष की अभिलाषा की। भगवान् बुद्ध का काय ध्रुव, शिव एवं शाश्वत है। वह सर्वसत्त्वानगत और सभी बुद्धक्षेत्रों में प्रसत हैं। इस गम्भीर धर्म का अवलोकन करके वह तूष्णीभूत हो गया। धर्मधातु का ही विचार करने लगा।
तब आयुष्मान् राष्ट्रपाल तीन मास व्यतीत होने पर भगवान् के दर्शन के लिए श्रावस्ती आया। अभिवादन कर उसने भगवान् से बोधिसत्त्वचर्या के बारे में प्रश्न किया। भगवान् ने उसे बोधिसत्त्वचर्या का उपदेश किया। इस उपदेश का पालि के अङ्गुत्तर निकाय से साम्य है। हे राष्ट्रपाल, चार धर्मों से समन्वागत बोधिसत्त्व परिशुद्धि को प्राप्त करता है। कौन चार? अध्याशयप्रतिपत्ति, सर्वसत्त्व समचित्तता, शून्यताभावना और यथावादी तथाकारिता। इन चार धर्मों से समन्वागत बोधिसत्त्व परिशुद्धि का लाभ करता है। इसी प्रकार अन्य कई धर्मों की चर्चा यहाँ की गई है। प्रथम परिवर्त के अन्त में भगवान् द्वारा भविष्य का व्याकरण किया गया है, जैसे कि बुद्धशासन विकृत होगा और भिक्षु असंयमी होंगे। पालि की थेरगाथा में भी ऐसे व्याकरण हैं। अनात्मवाद की कठिनाई निम्न श्लोकों में अभिव्यक्त है।
यत्रात्मा नास्ति न च जीवो देशित पुद्गलोऽपि न कथञ्चित्। व्यर्थः श्रमोन घटते यः शीलप्रयोग संवरक्रिया च॥

यद्यस्ति चैव महायानं नात्र हि आत्म सत्त्व मनुजो वा।
व्यर्थः श्रमोऽत्र हि कृतो मे यत्र न चात्म सत्त्व उपलब्धिः’ । द्वितीय परिवर्त में पुण्यरश्मि नामक राजकुमार की जातक कथा है। राष्ट्रपालपरिपृच्छा का चीनी अनुवाद ई. सन् ५८५-५६२ के बीच हुआ। इसका तिब्बती अनुवाद भी १. द्र.-राष्ट्रपालपरिपृच्छा, महायानसूत्रसंग्रह १ भाग, पृ. १३७ (दरभङ्गा-संस्करण १६६१) मा के महायान साहित्य ५२७ उपलब्ध है। उरगपरिपृच्छा, उदयनवत्सराजपरिपृच्छा, उपालिपरिपृच्छा, चन्द्रोत्तरादारिकापरिपृच्छा, नैरात्म्यपरिपृच्छा आदि अनेक परिपृच्छाग्रन्थ भी उपलब्ध होते हैं, जिनका उल्लेख शिक्षासचमुच्चय में मिलता है। हि

कारण्डव्यूह

इसमें बोधिसत्त्व की महिमा का वर्णन है। इसे गुणकारण्डव्यूह भी कहते हैं। यह गद्य और पद्य दोनों में मिलता है। गद्य कारण्डव्यूह को सत्यव्रत सामश्रमी ने सन् १६७३ में प्रकाशित किया था। पद्य कारण्डव्यूह में एक विशेष सिद्धान्त का उल्लेख है। इसमें ‘आदिबुद्ध’ की चर्चा है। आदिबुद्ध जगत् का कर्ता है। समस्त विश्व के प्रारम्भ में स्वयम्भू, आदिनाथ प्रकट हुए और उन्होंने समाधि से विश्व को निर्मित किया। उनके सत्त्व में से अवलोकितेश्वर प्रादुर्भूत हुए, जिनके शरीर से देवों की सृष्टि हुई। इसमें अवलोकितेश्वर की महाकरुणा विशेषतः प्रदर्शित है। गद्य कारण्डव्यूह का तिब्बती अनुवाद है, किन्तु पद्य कारण्डव्यूह का तिब्बती अनुवाद उपलब्ध नहीं होता।
कारण्डव्यूह में अवलोकितेश्वर की महाकरुणा के अनेक वर्णन हैं। वह (महाकरुणा) अवीचि नामक नरक में जाकर नारकियों को दुःख से बचाती है। वह भूत, प्रेत एवं राक्षसों को भी सुख पहुँचाती है। अवलोकितेश्वर का रूप विराट है। वह स्रष्टा भी हैं। उनकी आंखों से चन्द्र और सूर्य, भू से महेश्वर, भुजाओं से ब्रह्मा, हृदय से नारायण, दन्तों से सरस्वती, मुख से मरुत्, पैरों से पृथ्वी और पेट से वरुण उत्पन्न हुए। उनकी उपासना स्वर्ग और अपवर्ग की प्रापक है। कारण्डव्यूह में तन्त्र और मन्त्रों का प्रभाव भी दृष्टिगोचर होता है। ‘ओं मणिपद्मे हूँ’ यह षडक्षर मन्त्र, जो तिब्बत में अत्यधिक प्रतिष्ठित है, वह कारण्डव्यूह में मिलता है।

अक्षोभ्यव्यूह एवं करुणा पुण्डरीक

अक्षोभ्यव्यूह और करुणापुण्डरीक नाम के दो महायानसूत्रों में क्रमशः अक्षोभ्य बुद्ध और पद्मोत्तर बुद्ध के लोकों का वर्णन है। इन दोनों का चीनी भाषा में अनुवाद ईसवीय चौथी शताब्दी से पूर्व ही हो गया था।

सुखावतीव्यूह

इस महायानसूत्र में अमिताभ बुद्ध के सुखावती लोक का वर्णन है। विस्तृत और संक्षिप्त दो सुखावतीव्यूह उपलब्ध होते हैं। मैक्समूलर ने पहले का अंग्रेजी भाषान्तर करके प्रकाशन किया है तथा दूसरे का फ्रेंच भाषान्तर जापानी विद्वानों ने किया है।
पुण्यसम्भार की चर्चा सुखावतीव्यूह में अधिक है। सुखावती में अमिताभ बुद्ध, जिन्हें अमितायु भी कहते हैं, का राज्य है। पुण्यसम्भार का अर्जन करके जो व्यक्ति मृत्यु के समय अमिताभ का चिन्तन करता है, वह बुद्धलोक को प्राप्त होता है। इस बुद्धलोक में नरक, प्रेत, असुर और तिर्यक् का अभाव है। वहाँ सर्वदा दिन ही दिन है, रात्रि नहीं। सुखावती में गर्भ से जन्म नहीं होता। वहाँ सभी सत्त्व औपपादुक ही हैं और कमलदल से उत्पन्न होते हैं। वहाँ के सत्त्व पाप से विरत और प्रज्ञा से युक्त होते हैं।
५२८ बौद्धदर्शन पर विस्तृत सुखावतीव्यूह के बारह भाषान्तर चीनी भाषा में हुए, जिनमें पाँच ही उपलब्ध हैं। इनमें सबसे पुराना अनुवाद ई. सन् १४७-१८६ के मध्य हुआ। संक्षिप्त सुखावतीव्यूह का चीनी भाषान्तर कुमारजीव, गुणभद्र और हेनसांग ने किया। अमितायुर्ध्यानसूत्र नाम का एक और ग्रन्थ चीनी भाषा में उपलब्ध है, जिसमें सुखावती को प्राप्त करने के लिए ध्यानों का वर्णन है। ये तीनों ग्रन्थ चीन और जापान में बड़े पवित्र माने जाते हैं। जापान के जोड़ो -शु और शिन्-शु ये दो बौद्ध सम्प्रदाय अमितायु के ही उपासक हैं।

अवदान साहित्य

इस शब्द की व्युत्पत्ति अज्ञात है। पालि में इसके समकक्ष ‘अपदान’ शब्द है। सम्भवतः इसका प्रारम्भिक अर्थ असाधारण या अद्भुत कार्य है। अवदान कथाएं कर्म-प्राबल्य को सिद्ध करती हैं। आजकल अवदान का अर्थ कथामात्र रह गया है। महावस्तु को भी ‘अवदान’ कहते हैं। अवदान कथाओं का प्राचीनतम संग्रह ‘अवदानशतक’ है। तीसरी शताब्दी में इसका चीनी अनुवाद हो गया था। प्रत्येक कथा के अन्त में यह निष्कर्ष दिया जाता है कि शुक्ल कर्म का शुक्ल फल, कृष्ण कर्म का कृष्ण फल तथा व्यामिश्र का व्यामिश्र फल होता है। इनमें से अनेक में अतीत जन्म की कथा दी है, जिसका फल प्रत्युत्पन्न काल में मिला। किसी अवदान में बोधिसत्त्व की कथा है। इसे हम जातक भी कह सकते हैं। क्योंकि जातक में बोधिसत्त्व के जन्म की कथा दी गयी है। किन्तु ऐसे भी अवदान हैं, जिनमें अतीत की कथा नहीं पाई जाती। कुछ अवदान ‘व्याकरण’ के रूप में हैं। अर्थात् इनमें प्रत्युत्पन्न कथा का वर्णन करके अनागत काल का व्याकरण किया गया है। तिब्बती भाषा में भी अवदान साहित्य अनूदित हुआ है।

अवदानशतक

यह हीनयान का ग्रन्थ है- ऐसी मान्यता है। इसके चीनी अनुवादकों का ही नहीं, अपितु इसके अन्तरङ्ग प्रमाण भी हैं। सर्वास्तिवादी आगम के परिनिर्वाणसूत्र तथा अन्य सूत्रों के उद्धरण अवदानशतक में पाये जाते हैं। यद्यपि इसकी कथाओं में बुद्धपूजा की प्रधानता है, तथापि बोधिसत्त्व का उल्लेख नहीं मिलता। अवदानशतक की कई कथाएं अवदान के अन्य संग्रहों में और कुछ पालि-अपदानों में भी आती हैं।

दिव्यावदान

इसमें महायान एवं हीनयान दोनों के अंश पाए जाते हैं। विश्वास है कि इसकी सामग्री बहुत कुछ मूल सर्वास्तिवादी विनय से प्राप्त हुई है। दिव्यावदान में दीर्घागम, उदान, स्थविरगाथा आदि के उद्धरण प्रायः मिलते हैं। कहीं-कहीं बौद्ध भिक्षुओं की चर्याओं के नियम भी दिये गये हैं, जो इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि दिव्यावदान मूलतः विनयप्रधान ग्रन्थ है। यह ग्रन्थ गद्य-पद्यात्मक है। इसमें ‘दीनार’ शब्द का प्रयोग कई बार किया गया ह। इसमें शुङ्गकाल के राजाओं का भी वर्णन है। शार्दूलकर्णावदान का अनुवाद चीनी भाषा में २६५ ई. में हुआ था। दिव्यावदान में अशोकावदान एवं कुमारलात महायान साहित्य ५२६ की कल्पनामण्डितिका के अनेक उद्धरण हैं। इसकी कथाएं अत्यन्त रोचक हैं। उपगुप्त और मार की कथा तथा कुणालावदान इसके अच्छे उदाहरण हैं। Fa अवदानशतक की सहायता से अनेक अवदानों की रचना हुई है, यथा कल्पद्रुमावदानमाला, अशोकावदानमाला, द्वाविंशत्यवदानमाला भी अवदानशतक की ऋणी हैं। अवदानों के अन्य संग्रह भद्रकल्यावदान और विचित्रकर्णिकावदान हैं। इनमें से प्रायः सभी अप्रकाशित हैं। कुछ के तिब्बती और चीनी अनुवाद मिलते हैं।
क्षेमेन्द्र की अवदानकल्पलता का उल्लेख करना भी प्रसङ्ग प्राप्त है। इस ग्रन्थ की समाप्ति १०५२ ई. में हुई। तिब्बत में इस ग्रन्थ का अत्यधिक आदर है। इस संग्रह में १०७ कथाएं हैं। क्षेमेन्द्र के पुत्र सोमेन्द्र ने न केवल इस ग्रन्थ की भूमिका ही लिखी, अपितु अपनी ओर से एक कथा भी जोड़ी है। यह जीमूतवाहन अवदान है।

बौद्धसंकर साहित्य

महावस्तु, ललितविस्तर आदि ग्रन्थों में शुद्ध संस्कृत भाषा नहीं है। अधिकांशतया महायानसूत्रों में मिश्रसंस्कृत का प्रयोग हुआ है। यदि गद्य शुद्ध संस्कृत में है तो पद्य शुद्ध संस्कृत में नहीं है। कोई इसे गाथासंस्कृत, कोई मिश्रसंस्कृत और कोई बौद्ध संस्कृत कहते हैं। प्रोफेसर एजर्टन इसे बौद्ध संकर - संस्कृत नाम देते हैं। जन प्रो. एजर्टन के अनुसार यह भाषा मूलतः मध्यदेश की कोई प्राचीन बोलचाल की भाषा थी या उस पर आश्रित थी। यह ईसा-पूर्व की भाषा है। किन्तु प्रारम्भ से ही इसका संस्कृत के प्रति झुकाव है। इन ग्रन्थों में बहुत से शब्द शुद्ध संस्कृत के हैं, कुछ आंशिक रूप से संस्कृत है। और कुछ ऐसे हैं, जिन्होंने अपने रूप को अपरिवर्तित रखा है। इन ग्रन्थों का शब्द भण्डार बहुत कुछ मध्यदेशीय है। अर्थात् ये शब्द संस्कृत के नहीं हैं अथवा संस्कृत में उनका भिन्न अर्थ है। मनी । कुछ लोगों का मानना है कि संकर संस्कृत कोई स्वतन्त्र भाषा नहीं, अपितु भ्रष्ट संस्कृत है। किन्तु ऐसा समझना भारी भूल है। यह मध्यदेशीय भाषा है, अशुद्ध संस्कृत नहीं। इसलिए विद्वानों का कर्त्तव्य है कि उसके प्रत्येक शब्द और रूप को सुरक्षित रखें, उन्हें शुद्ध संस्कृत में परिवर्तित न करें। यह बताना मुश्किल है कि मध्यदेश कौन है और उसकी सीमा क्या है ? किन्तु इस भाषा की अपनी कुछ विशेषताएं हैं, जो अन्य भाषाओं में नहीं पाई जातीं। प्रो. एजर्टन ने इस भाषा का व्याकरण, कोश एवं रीडर लिख कर बड़ा उपकार किया है।

महावस्तु

लोकोत्तरवादी महासांघिकों का विनय ग्रन्थ है। यह एक अत्यन्त प्राचीन एवं महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। इसका प्रथम सम्पादन इ. सेना ने तीन भागों में किया है। महावस्तु का अर्थ है ‘महाविषय’ अर्थात् उपसम्पदा इत्यादि बौद्ध विनय सम्बन्धी कग। पालि के महावग्ग में जिस प्रकार प्रारम्भ में बुद्ध के बोधि प्राप्ति का, धर्मचक्र प्रवर्तन तथा संघस्थापना 9 ५३० बौद्धदर्शन का वर्णन है, उसी प्रकार महावस्तु में भगवान् बुद्ध का जीवनचरित और संघस्थापना का वर्णन मिलता है। महावस्तु के प्रारम्भ में ही चार बोधिसत्त्वचर्याओं का वर्णन किया गया है- प्रकृतिचर्या, प्रणिधानचर्या, अनुलोमचर्या एवं अनिवृत्तिचर्या। इन चार चर्याओं की पूर्ति से बोधिसत्त्व बुद्धत्व की प्राप्ति करते हैं। इन चर्याओं का उल्लेख करके ग्रन्थ का नाम दिया है- आर्यमहासांघिकानां लोकोत्तरवादिनां मध्यदेशिकानां पाठेन विनयपिटकस्य महावस्तुनो… .. इत्यादि। इस परिचय के बाद चतुर्विध उपसम्पदाओं का वर्णन है- स्वाभ उपसम्पदा, एहि भिक्षुक उपसम्पदा, दशवर्गेण गणेन उपसम्पदा एवं पञ्चवर्गेण गणेन उपसम्पदा।
बुद्ध के जीवनचरित का प्रतिपादन ही महावस्तु का मुख्य उद्देश्य है। इसलिए इसे महावस्तु-अवदान भी कहा गया है। किन्तु ललितविस्तर में जैसे जीवनचरित का व्यवस्थित रूप पाया जाता है, वैसा महावस्तु में नहीं है। जातक, सूत्र, कथा और विनय जैसे कई अंगों का मिश्रण यहाँ मिलता है। बुद्ध के जन्म की कथा पालि निदानकथा और ललितविस्तर से काफी मिलती है। महावस्तु में कई भाग ऐसे हैं, जो पालि निकायों से मिलते हैं। सुत्तनिपात के पब्बज्जासुत्त, पधानसुत्त, खग्गविषाणसुत्त, धम्मपद का सहस्सवग्ग, दीघनिकाय का महागोविन्दसुत्त, , मज्झिमनिकाय का दीघनखसुत्त आदि अनेक ऐसे सुत्तन्त हैं, जो महावस्तु में पाए जाते हैं। महावस्तु का आधे से अधिक भाग जातक और अन्य कथाओं से भरा है, जो सामान्यतः पालि जातकों का अनुसरण करता है। य माधी इसमें सन्देह नहीं कि महावस्तु का मूलरूप अत्यन्त प्राचीन है। इसकी भाषा भी प्राचीनता का सूचक है। समग्र ग्रन्थ मिश्रसंस्कृत या बौद्ध संकर संस्कृत में हैं, जबकि महायानसूत्र ग्रन्थों में मिश्र संस्कृत और शुद्ध संस्कृत दोनों प्रयोग पाए जाते हैं। इस ग्रन्थ का लोकोत्तरवादी होना भी इसकी प्राचीनता का सूचक है।

अश्वघोष साहित्य

१८६२ ई. में सिलवां लेवी द्वारा बुद्धचरित के प्रथम सर्ग के प्रकाशन से पूर्व योरप में कोई नहीं जानता था कि अश्वघोष एक महान् कवि हुए हैं। तिब्बती और चीनी आम्नाय के अनुसार अश्वघोष महाराज कनिष्क के समकालीन थे। जो प्रमाण उपलब्ध हैं, उनके अनुसार वे अश्वघोष के समकालीन या उससे कुछ पूर्ववर्ती थे। चीनी आम्नाय के अनुसार अश्वघोष का सम्बन्ध विभाषा से भी था, किन्तु विद्वानों को इसमें सन्देह है।
___ अश्वघोष की काव्यशैली सिद्ध करती है कि वह कालिदास से कई शताब्दी पूर्व थे। भास उनका अनुसरण करते हैं। शब्द प्रयोग से लगता है कि कौटिल्य के निकटवर्ती थे। अश्वघोष अपने को ‘साकेतक’ कहते हैं और माता का नाम ‘सुवर्णाक्षी’ बताते हैं। रामायण का उनके ग्रन्थों पर विशेष प्रभाव है। उनका कहना है कि शाक्य इक्ष्वाकुवंशीय थे। अश्वघोष ब्राह्मण थे, उसी प्रकार उनकी शिक्षा भी हुई थी। बाद में वे बौद्ध धर्म में दीक्षित हुए। उनके महायान साहित्य ५३१ ग्रन्थों से सिद्ध होता है कि वे बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में अत्यन्त व्यस्त थे। तिब्बती विवरण के अनुसार वे एक अच्छे संगीतज्ञ भी थे और गायकों की मण्डली के साथ भ्रमण करते थे तथा बौद्ध धर्म का प्रचार वे गानों के माध्यम से करते थे।
म बुद्धचरित, सौन्दरनन्द और शारिपुत्रप्रकरण- ये तीनों ग्रन्थ उनकी रचनाएं हैं। बुद्धचरित में बुद्ध की कथा वर्णित है। इसमें २८ सर्ग हैं। बुद्ध कथा भगवान् के जन्म से प्रारम्भ होती है और संवेगोत्पत्ति, अभिनिष्क्रमण, मारविजय, संबोधि धर्मचक्रप्रवर्तन, परिनिर्वाण आदि घटनाओं का वर्णन कर प्रथम संगीति और अशोक के राज्यकाल पर समाप्त होती है। सौन्दरनन्द में बुद्ध के भाई नन्द के बौद्ध धर्म में दीक्षित होने की कथा है। इस ग्रन्थ में १८ सर्ग हैं। समग्र ग्रन्थ सुरक्षित है। शारिपुत्रप्रकरण यह नाटक ग्रन्थ है। इसमें ६ अंक हैं। इसमें शारिपुत्र और मौद्गल्यायन के बौद्ध धर्म में दीक्षित होने की कथा वर्णित है। यह खण्डित रूप में प्राप्य है। इसका उद्धार प्रोफेसर लुडर्स ने किया है। ये तीनों ग्रन्थ एक रचयिता द्वारा रचे हुए प्रतीत होते हैं। श्री जान्सटन ने बुद्धचरित का सम्पादन किया है। पूरा अविकल ग्रन्थ संस्कृत में उपलब्ध नहीं है। प्रथम सर्ग और १४वें सर्ग का कुछ अंश खण्डित है। २-१३ सर्ग ठीक हैं। १५ सर्ग से आगे मूल संस्कृत में अनुपलब्ध है।
तिब्बती और चीनीपरम्परा अश्वघोष को अन्य ग्रन्थों का भी रचयिता मानती है। टामस ने उनकी सूची प्रकाशित की है, किन्तु वे संस्कृत में अप्राप्य हैं, इसलिए उनके बारे में कुछ कहना सम्भव नहीं है। प्रोफेसर लुडर्स को शारिपुत्रप्रकरण के साथ दो और नाटकों के अंश मिले हैं। एक के मात्र तीन पत्र मिले हैं, जिनमें बुद्ध के ऋदिबल का प्रदर्शन है। दूसरे में एक नवयुवक की कथा है, जिसने बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। किन्तु इनके अश्वघोष की रचना होने में विद्वानों में ऐकमत्य नहीं है।
तीन और ग्रन्थ अश्वघोष के बताये जाते हैं- वज्रसूची, गण्डीस्तोत्र एवं सूत्रालङ्कार। चीनी अनुवादक सूत्रालंकार को अश्वघोष की कृति मानते हैं। बाद में प्रोफेसर लुडर्स को मध्य एशिया में इस ग्रन्थ के मूल संस्कृत में कुछ अंश मिले हैं, उन्होंने सिद्ध किया है कि वहाँ ग्रन्थकार का नाम कुमारलात है और ग्रन्थ का नाम कल्पनामण्डितिका है। सामान्यतः विद्वान् इन्हें अश्वघोष की रचना नहीं मानते।
अपनी रचनाओं में अश्वघोष ने श्रद्धा की महिमा का जोरदार वर्णन किया है।
श्रद्धाङ्कुरमिमं तस्मात् संवर्धयितुमर्हसि।
तवृद्धौ वर्धते धर्मों मूलवृद्धौ यथा द्रुमः॥

(सौन्दरनन्द १२:) विद्वानों का मानना है कि अश्वघोष बाहुश्रुतिक हैं। बाहुश्रुतिक महासांघिक की शाखा है। इसलिए ये महादेव की पांच वस्तुओं को स्वीकारते हैं। इनमें से चतुर्थ के अनुसार अर्हत्फबौद्धदर्शन परप्रत्यय से ज्ञानलाभ करते हैं। पर-प्रत्यय के लिए श्रद्धा आवश्यक है। जान्सटन के अनुसार अश्वघोष बाहुश्रुतिक या कौक्कुटिक या कौक्कुलिक हैं। तारानाथ के अनुसार मातृचेट अश्वघोष का दूसरा नाम है। मातृचेट का स्तोत्र अत्यन्त लोकप्रिय था। जातकमाला के रचयिता आर्यशूर अश्वघोष के ऋणी हैं। जातकमाला में ३४ जातककथाओं का संग्रह है, लगभग सभी कथाएं पालि जातक में पाई जाती हैं।
शामक आय का विकास यो कोष ਉਸ ਨੂੰ ਮਿਕਸ ਸ ਸ ਸੀ ਨੂੰ ਵੀ ਤੇ ਸਿੰਜਲ नाममा उनादकतार कि आगीत या द छि म पनि का जीवन जी मनोमानका नाम लिया गांवाला बना आधति जीवन जीनार की महिला निजी