०३ अठारह बौद्ध निकाय

भगवान बुद्ध के परिनिर्वाण के अनन्तर बुद्धवचनों में प्रक्षेप (अन्य वचनों को डाल देना) और अपनयन (कुछ बुद्धवचनों को हटा देना) न होने देने के लिए क्रमशः तीन संगीतियों का आयोजन किया गया। प्रथम संगीति बुद्ध के परिनिर्वाण के तत्काल बाद प्रथम वर्षावास के काल में ही राजगृह में महाकाश्यप के संरक्षकत्व में सम्पन्न हुई। इसमें आनन्द ने सूत्र (इसमें अभिधर्म भी सम्मिलित है) और उपालि ने विनय का संगायन किया। इस तरह इस संगीति में सम्मिलित पाँच सौ अर्हत् भिक्षुओं ने प्रथम बार बुद्धवचनों का त्रिपिटक आदि में विभाजन किया।
भगवान् बुद्ध के परिनिर्वाण के बाद सौ वर्ष बीतते-बीतते आयुष्मान् यश ने वैशाली के वज्जिपुत्तक भिक्षुओं को विनयविपरीत दस वस्तुओं का आचरण करते हुए देखा, जिसमें सोने-चाँदी का ग्रहण भी एक था। अनेक भिक्षुओं की दृष्टि में उनका यह आचरण अनुचित था। इसका निर्णय करने के लिए द्वितीय संगीति बुलाई गई। महास्थविर रेवत की अध्यक्षता में सम्पन्न इस संगीति में सम्मिलित सात सौ अर्हत् भिक्षुओं ने उन (वज्जिपुत्तक भिक्षुओं) का आचरण विनयविपरीत निश्चित किया।
वैशाली के वज्जिपुत्तक भिक्षुओं ने महास्थविरों के इस निर्णय को अमान्य कर दिया और कौशाम्बी में एक पृथक् संगीति आयोजित की, जिसमें दस हजार भिक्षु सम्मिलित हुए थे। यह सभा ‘महासंघ’ या ‘महासंगीति’ कहलाई तथा इस सभा को मानने वाले महासांघिक कहलाए।
इस प्रकार बौद्ध संघ दो भागों या निकायों में विभक्त हो गया, स्थविरवादी और महासांघिक । आगे चलकर भगवान् के परिनिर्वाण के २३६ वर्ष बाद सम्राट अशोक के काल में आयोजित तृतीय संगीति के समय तक बौद्ध संघ अठारह निकायों में विकसित हो गया था। ____ महासांघिक भी कालान्तर में दो भागों में विभक्त हो गए- १. एकव्यावहारिक और २. गोकुलिक। गोलुलिक से भी दो शाखाएं विकसित हुई, यथा- १. प्रज्ञप्तिवादी और २. बाहुलिक या बाहुश्रुतिक। बाहुलिक से चैत्यवादी नामक एक और शाखा प्रकट हुई। इस तरह महासांधिक से पाँच शाखाएं निकलीं, जो महासांघिक के साथ कुल ६ निकाय होते हैं। दूसरी ओर स्थविरवादी भी पहले दो भागों में विभक्त हुए, यथा- वज्जिपुत्तक और महीशासक। वज्जिपुत्तक ४ भागों में विभक्त हुए, यथा- १. धर्मोत्तरीय, २. भद्रयाणिक, ३. छनागरिक (पाण्णागरिक) और ४. सम्मितीय। महीशासक से भी दो शाखाएं विकसित हुई, यथा- धर्मगुप्तिक और सर्वास्तिवादी। सर्वास्तिवादियों से क्रमशः काश्यपीय, काश्यपीय २८६ बौद्धदर्शन से सांक्रान्तिक और सांक्रान्तिक से सूत्रवादी (सौत्रान्तिक) निकाय विकसित हुए। इस प्रकार स्थविरवादी निकाय से ११ निकाय विकसित हुए, जो स्थविरवादी निकाय के साथ कुल १२ होते हैं। दोनों प्रकार के निकायभेद मिलकर कुल अठारह निकाय होते हैं।

  • अठारह निकायों का यह उपर्युक्त विभाजन-क्रम दीपवंश नामक ग्रन्थ के अनुसार वर्णित है। आचार्य विनीतदेव, आचार्य वसुमित्र एवं आचार्य भव्य आदि ने अठारह निकायों की विभिन्न तालिकाएं प्रस्तुत की हैं। उनमें साम्य होते हुए भी विभिन्नताएं भी बहुत हैं। सब तालिकाओं को मिलाकर देखने पर निकायों की संख्या अठारह से कहीं अधिक हो जाती हैं। स्वयं पालि परम्परा में ही उपर्युक्त अठारह निकायों के अतिरिक्त हैमवत, राजगिरिक, सिद्धार्थिक, पूर्वशैलीय, अपरशैलीय और वजिरिय निकायों के नाम उपलब्ध होते हैं। फिर भी सभी नैकायिक निकायों की संख्या १८ मानने पर ही बल देते हैं। कुछ विद्वानों ने एक निकाय का अन्य निकाय में अन्तर्भाव करके १८ संख्या निश्चित करने का प्रयास किया है।

निकायों की परिभाषा

महासांघिक

ज्ञात है कि वैशाली में आयोजित द्वितीय संगीति से निष्कासित वज्जिपुत्तक भिक्षुओं ने कौशाम्बी में पृथक् संगीति का आयोजन किया था, जिसमें दस हजार भिक्षु सम्मिलित हुए थे। उन्होंने वहाँ ‘महासांघिक’ नामक एक स्वतन्त्र निकाय की स्थापना की। महासंघ का शब्दार्थ ही महासभा होता है। हेनसांग के मतानुसार यह सभा राजगृह की प्रथम संगीति के अवसर पर ही राजगृह के नजदीक आयोजित हुई थी। आचार्य बुद्धघोष, वसुमित्र आदि के अनुसार वैशाली की द्वितीय संगीति के बाद ही इस निकाय का प्रादुर्भाव हुआ।
मृत्युभव और उपपत्तिभव के बीच में एक अन्तराभव होता है, जहाँ सत्त्व मरने के बाद और पुनर्जन्म ग्रहण करने के बीच कुछ दिनों के लिए रहता है। कुछ सर्वास्तिवादी आदि बौद्ध उस अन्तराभव का अस्तित्व स्वीकार करते हैं और कुछ बौद्ध निकाय उसे नहीं मानते। भोट विद्वान् पद्म-ग्यल्-छन् का कहना है कि महासांघिक अन्तराभव के अस्तित्व को नहीं मानते। वसुबन्धु के अभिधर्म-कोश-स्वभाष्य में ऐसा उल्लेख मिलता है कि दूसरे कुछ नैकायिक अन्तराभव नहीं मानते। यह सम्भव है कि महासांघिक ही उनके अन्तर्गत आते हों और इसीलिए पद्म-ग्यल्-छन् ने वैसा कहा हो। वैसे स्थविरवादी बौद्ध भी १. विस्तार के लिए द्रष्टव्य-सौत्रान्तिकदर्शनम्, पृ. ४., (तिब्बती-संस्थान-प्रकाशन, सन् १६६०)। २. अभिधर्मकोशभाष्य, पृ. ४०५-४०६ (बौद्ध भारती संस्करण)।
२८७ अठारह बौद्ध निकाय अन्तराभव नहीं मानते।

स्थविरवाद

‘स्थविरवाद’ शब्द के अनेक अर्थ होते हैं। स्थविर का अर्थ ‘वृद्ध’ भी है और ‘प्राचीन’ भी। अतः वृद्धों का या प्राचीनों का जो वाद (मार्ग) है, वह ‘स्थविरवाद’ है। ‘स्थविर’ शब्द स्थिरता को भी सूचित करता है। विनय-परम्परा के अनुसार जिस भिक्षु के उपसम्पदा के अनन्तर दस वर्ष बीत गए हों तथा जो विनय के अङ्गों और उपागों का अच्छा ज्ञाता होता है, वह ‘स्थविर’ कहलाता है। इसके अलावा वह भी स्थविर कहलाता है जो स्थविरगोत्रीय होता है। अर्थात जिसकी रुचि और अध्याशय आदि स्थविरवादी सिद्धान्तों की ओर अधिक प्रवण होते हैं और जो उन सिद्धान्तों का श्रद्धा के साथ व्याख्यान करता है। ऐसे स्थविरों का वाद ‘स्थविरवाद’ है।

सर्वास्तिवाद

किसी समय (प्राचीन काल में) पश्चिमोत्तर भारत में विशेषतः मथुरा, कश्मीर और गान्धार आदि प्रदेशों में सर्वास्तिवादियों का बहुल प्रचार था। सर्वास्तिवादी सिद्धान्तों को मानने वाले बौद्ध आजकल विश्व में शायद ही कहीं हों। किन्तु भोटदेशीय भिक्षु-परम्परा सर्वास्तियावादी विनय का अवश्य अनुसरण करती है। कतिपय विशिष्ट सिद्धान्तों के आधार पर ‘सर्वास्तिवाद’ यह नामकरण हुआ है। इसमें प्रयुक्त ‘सर्व’ शब्द का तात्पर्य तीनों कालों अर्थात् भूत, भविष्य और वर्तमान कालों से हैं। जो लोग वस्तुओं की तीनों कालों में सत्ता मानते हैं और जो तीनों कालों का द्रव्यतः अस्तित्व स्वीकार करते हैं, वे ‘सर्वास्तिवादी’ कहलाते हैं। एकव्यावहारिक जो लोग एक क्षण में बुद्ध की सर्वज्ञता का उत्पाद मानते हैं, वे ‘एकव्यावहारिक’ कहलाते हैं। अर्थात् इनके मतानुसार एक चित्तक्षण से सम्प्रयुक्त प्रज्ञा के द्वारा समस्त धर्मों का अवबोध हो जाता है। इस एकक्षणावबोध को स्वीकार करने के कारण इनका यह नामकरण हुआ है। महावंसटीका के अनुसार एकव्यावहारिक और गोकुलिक ये दोनों निकाय सभी कुशल-अकुशल संस्कारों को ज्वालारहित अङ्गार से मिश्रित भस्मनिरय के समान समझते हैं।

लोकोत्तरवाद

कुछ लोग बुद्ध के काय में सास्रव धर्मों का बिल्कुल अस्तित्व नहीं मानते और कुछ मानते हैं। ये लोकोत्तरवादी बुद्ध की सन्तति में सास्रव धर्मों का अस्तित्व सर्वथा नहीं मानते।
૨cs बौद्धदर्शन Tho इनके मतानुसार सम्यक् सम्बोधि की प्राप्ति के अनन्तर बुद्ध के सभी आश्रय अर्थात् चित्त, चैतसिक, रूप आदि परावृत्त होकर निरास्रव और लोकोत्तर हो जाते हैं। यहाँ ‘लोकोत्तर’ शब्द अनास्रव के अर्थ में प्रयुक्त है। जो इस अनास्रवत्व को स्वीकार करते हैं, वे लोकोत्तरवादी हैं। यहाँ ‘लोकोत्तर’ शब्द का अर्थ मानवोत्तर के अर्थ में नहीं है। इनकी मान्यता के अनुसार क्षणभङ्गवाद की दृष्टि से पहले सभी धर्म सास्रव होते हैं। बोधिप्राप्ति के अनन्तर सास्रव धर्म विरुद्ध हो जाते हैं और अनास्रव धर्म उत्पन्न होते हैं। यह ज्ञात नहीं है कि ये लोग महायानियों की भाँति बुद्ध का अनास्रव ज्ञानधर्मकाय मानते हैं अथवा नहीं।

प्रज्ञप्तिवादी

कुछ वादी ऐसे होते हैं, जो परस्पर आश्रित सभी धर्मों को प्रज्ञप्त (कल्पित) मानकर उनके प्रति सत्यतः अभिनिवेश करते हैं, वे ही प्रज्ञप्तिवादी है। महावंशटीका के अनुसार ‘रूप भी निर्वाण की भाँति परमार्थतः है’-ऐसा मानने वाले प्रज्ञप्तिवादी कहलाते हैं।

वात्सीपुत्रीय

का स्थविरवादी संघ से जो सर्वप्रथम निकायभेद विकसित हुआ, वह वात्सीपुत्रीय निकाय ही है। स्थविरों से इनका सैद्धान्तिक मतभेद था। ये लोग पुद्गलास्तित्ववादी थे। अर्थात् ये पुद्गल के द्रव्यतः अस्तित्व के पक्षपाती थे और उसे अनिर्वचनीय कहते थे। यह निकाय स्थविरवादियों का प्रमुख प्रतिपक्ष रहा है। यही कारण है कि तृतीय संगीति के अवसर पर जो सम्राट अशोक के काल में पाटलिपुत्र (पटना) में आयोजित हुई थी, उसमें मुद्गलीपुत्र तिष्य ने स्वविरवाद से भिन्न सत्रह निकायों का खण्डन करते हुए जिस ‘कथावत्थु’ नामक ग्रन्थ की रचना की थी. उस ग्रन्थ में उन्होंने सर्वप्रथम पद्गलवादी वात्सीपत्रीयों का ही खण्डन किया। इससे यह भी निष्कर्ष प्रतिफलित होता है कि तृतीय संगीति से पूर्व ही इनका अस्तित्व था। कौशाम्बी, मथुरा तथा अवन्ती आदि इनके प्रमुख केन्द्र थे।

सम्मितीय

न इस निकाय के प्रवर्तक आर्य महाकात्यायन माने जाते हैं। ये वे ही आचार्य हैं, जिन्होंने दक्षिणापथ (अवन्ती) में सर्वप्रथम सद्धर्म की स्थापना की। उस प्रदेश के निवासियों के आचार में बहुत भिन्नता देखकर विनय के नियमों में कुछ संशोधनों का भी इन्होंने सुझाव रखा था। इसी निकाय से आवन्तक और कुरुकुल्लक निकाय विकसित हुए। कभी-कभी सम्मितीयों का संग्रह वात्सीपुत्रीयों में और कभी वात्सीपुत्रीयों का संग्रह सम्मितीयों में भी देखा जाता है। इसका कारण उनके समान सिद्धान्त हो सकते हैं।
अठारह बौद्ध निकाय २८६ अनिर्वचनीय पुद्गल के अस्तित्व को स्वीकार करना ही इनके सिद्धान्तों की समानता है। भारहारसूत्र को ये लोग अपने विशिष्ट सिद्धान्त की पुष्टि के लिए प्रस्तुत करते हैं। इस सूत्र के अनुसार पाँच उपादान स्कन्ध ‘भार’ हैं और पुद्गल ही ‘भारहार’ है, क्योंकि वह भार का वहन करता है। पुनश्च, वे कहते हैं कि भगवान् ने रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान स्कन्धों को अनात्म कहा है न कि आत्मा सर्वथा नहीं है-ऐसा कहा है। वह बाई आंख से नहीं देखता’-ऐसा कहने का यह अर्थ यह नहीं है कि दाहिनी आंख से भी नहीं देखता, अन्यथा बायां विशेषण व्यर्थ हो जाएगा। इसी तरह रूप अनात्म है, वेदना अनात्म है-इत्यादि जानना चाहिए।
इन उपर्युक्त कथनों के आधार पर कुछ विद्वानों का कथन है कि सम्मितीय सर्वथा आत्मवादी हैं-यह नहीं माना जा सकता। यद्यपि वे अनिर्वचनीय द्रव्यसत् पुद्गल मानते हैं, तथापि वे पाँच स्कन्धों से तथा नित्य-अनित्य से पुद्गल को भिन्न या अभिन्न स्वीकार नहीं करते। उन (सम्मितीयों) का कहना है कि पाँच स्कन्धों को आत्मा मानने में युक्तिविरोध होता है तथा पाँच स्कन्धों से भिन्न मानने पर तैर्थिकों के आत्मवाद को मानने का दोष (प्रसंग) उपस्थित होता है। इसलिए वे दोनों न मानकर केवल पुद्गल की द्रव्यसत्ता मात्र स्वीकार करते हैं। __ मालूम होता है कि वे पुद्गल को प्रज्ञप्तिसत् कहना नहीं जानते थे, जैसा कि अन्य बौद्ध मतावलम्बी नैकायिक मानते हैं। इसलिए वे उसे ‘अनिर्वचनीय’ कहते हैं। ___ अनित्यता के बारे में भी उनका अपना विशिष्ट मत है। वे विनाश को सहेतुक मानते हैं, जब कि अन्य बौद्ध अहेतुक विनाश स्वीकार करते हैं। इसलिए ये लोग चित्त-चैतसिकों को छोड़कर अन्य धर्मों के उत्पाद के बाद जब तक उनका भङ्ग नहीं हो जाता, तब उनकी स्थिति स्वीकार करते हैं। केवल चित्त-चैतसिक ही उनके अनुसार सर्वथा क्षणिक हैं, न कि सभी धर्म। स्थिति के बिना उत्पाद के बाद ही विनाश जैसा सौत्रान्तिक आदि मानते हैं, वैसे ये लोग नहीं मानते।

महीशासक

प्रिलुस्की महोदय के अनुसार ये लोग स्थविर पुराण के अनुयायी थे। ज्ञात है कि पुराण वही स्थविर है, जो राजगृह में जब प्रथम संगीति हो रही थी, तब दक्षिणगिरि से चारिका करते हुए पाँच सौ भिक्षुओं के साथ वहीं (राजगृह में) ठहरे हुए थे। संगीतिकारक भिक्षुओं ने उनसे संगीति में सम्मिलित होने का निवेदन किया, किन्तु उन्होंने उनके कार्य की प्रशंसा करते हुए भी उसमें भाग लेने से इन्कार कर दिया और कहा कि मैंने भगवान् के मुंह से जैसा सुना है, उसी का अनुसरण करूंगा।
करूंगा। मामा जी का

धर्मगुप्तक

परमार्थ के मतानुसार इस निकाय के प्रवर्तक महामौद्गलयायन के शिष्य स्थविर है ने २६० बौद्धदर्शन धर्मगुप्त थे। प्रिलस्की और फ्राउवाल्लर का कहना है कि ये धर्मगुप्त यौनक धर्मरक्षित से अभिन्न हैं।

काश्यपीय

__पालिपरम्परा और सांची के अभिलेखों से ज्ञात होता है कि कश्यपगोत्रीय भिक्षु समस्त हिमवत्प्रदेश के निवासियों के आचार्य थे। चीनी भाषा में उपलब्ध ‘विनयामातृका’ नामक ग्रन्थ से भी उपर्युक्त कथन की पुष्टि होती है। इसीलिए काश्यपीय और हैमवत अभिन्न प्रतीत होते हैं। सुवर्षक और सद्धर्मवर्षक भी इन्हीं का नाम है। इस निकाय का हिमवत्प्रदेश में प्रचार सम्भवतः महाराज अशोक के काल में सम्पन्न हुआ, जब तृतीय संगीति के अनन्तर उन्होंने विभिन्न प्रदेशों में सद्धर्म के प्रचारार्थ धर्मदूतों को प्रेषित किया था।

विभज्यवाद

आचार्य वसुमित्र के मतानुसार यह निकाय सर्वास्तिवादी निकाय के अन्तर्गत गृहीत होता है। स्थविरवादी भी अपने को विभज्यवादी कहते हैं। आचार्य भव्य के अनुसार यह निकाय स्थविरवाद से भिन्न है। कुछ लोगों के अनुसार इन्हें हेतुवादी भी कहा जाता है। इस निकाय का यह विशिष्ट अभिमत है कि किये हुए कर्म का जब तक फल या विपाक उत्पन्न नहीं हो जाता, जब तक उस अतीत कर्म का द्रव्यतः अस्तित्व होता है। जिसने अभी फल नहीं दिया है, उस अतीत कर्म की और वर्तमान कर्म की द्रव्यसत्ता है तथा जिसने फल दे दिया है, उस अतीत कर्म की और अनागत कर्म की प्रज्ञप्तिसत्ता है-इस प्रकार कर्मों के बारे में इनकी व्यवस्था है। कर्मों के इस प्रकार के विभाजन के कारण ही इस निकाय का नाम ‘विभज्यवाद’ है। हेतुवादी भी इन्हीं का काम है। भूत, भौतिक समस्त वस्तुओं के हेतु होते हैं, यह इनका अभिमत है। कथावत्थु और उसकी अट्ठकथा में इस निकाय के बारे में पुष्कल चर्चा उपलब्ध होती है।

निकाय-परम्परा

_ आचार्य विनीतदेव आदि प्रमुख आचार्यों की मान्यता है कि चार ही मूल निकाय हैं, जिनसे आगे चल कर सभी अठारह निकाय विकसित हुए। वे हैं-आर्य सर्वास्तिवादी, आर्य महासांघिक, आर्यस्थविर एवं आर्य सम्मितीय। मूलसंघ से जो यह विभाजन हुआ या अठारह या उससे अधिक निकायों का जो जन्म हुआ, वह किसी गतिशील श्रेष्ठ धर्म का लक्षण है, न कि हास का। भगवान् बुद्ध ने स्वयं ही किसी भी शास्ता के वचन या किसी पवित्र ग्रन्थ के वचन को अन्तिम प्रमाण मानने से अपने अनुयायी भिक्षुओं को मना कर दिया था। उन्होंने स्वतन्त्र चिन्तन, अपने अनुभव की प्रामाणिकता, वस्तुसङ्गत दृष्टि और उदार विचारों के जो बीज भिक्षुसंघ में निक्षिप्त (स्थापित) किये थे, उन्हीं बीजों से कालान्तर में अठारह बौद्ध निकाय २६१ विभिन्न शाखाओं वाला सद्धर्म रूपी महावृक्ष विकसित हुआ, जिसने भारत सहित विश्व के कोटि-कोटि विनेय जनों की आकांक्षाएं अपने पुष्प, फल, पत्र और छाया के द्वारा पूर्ण की और आज भी कर रहा है। (१) आर्य सर्वास्तिवादियों की परम्परा क्षत्रिय वंश में उत्पन्न आर्य राहुलभद्र ने स्थापित की, जिनके बारे में भगवान् बुद्ध का कहना था कि ये शैक्ष्य पुद्गलों में अग्रगण्य हैं। इस निकाय में संस्कृत भाषा में प्रातिमोक्षसूत्र के पाठ की परम्परा थी। इस परम्परा में संघाटी में ६ से लेकर २५ तक पट्टिकाएं होती थीं, जिन पर पद्म, रत्न और पत्र का अंकन होता था। (२) आर्य महासांघिकों की परम्परा की स्थापना ब्राह्मणकुल में उत्पन्न आर्य महाकाश्यप ने की, इनके बारे में भगवान् बुद्ध ने कहा था कि ये स्वाध्यायपारायण करने वालों में अग्रगण्य हैं। इस परम्परा के प्रातिमोक्षसूत्र का पाठ प्राकृत भाषा में होता था तथा वि संघाटी में ७ से लेकर २३ तक पट्टिकाएं होती थीं और उन पर शंख का अंकन होता था। (३) आर्य स्थविरवादी परम्परा के प्रवर्तक ब्राह्मणकुल में उत्पन्न आर्य महाकात्यायन थे।
जिनके बारे में भगवान् बुद्ध ने कहा था कि ये ऐसे लोगों में अग्रगण्य हैं, जो क्रूर और हिंसक प्रवृत्ति के लोगों से व्याप्त पर्वतीय सीमान्त प्रदेशों में जाकर सद्धर्म का प्रचार करते हैं। इस परम्परा के प्रातिमोक्षसूत्र का पाठ पैशाची भाषा में होता था तथा संघाटी में ५ से २१ तक पट्टिकाएं होती थीं, जिन पर श्रीवत्स का अंकन किया जाता था।
(४) आर्य सम्मितियों की परम्परा का प्रवर्तन नापित कुल में उत्पन्न आर्य भदन्त उपालि ने किया था। भगवान् ने उनके बारे में घोषणा की थी कि ये विनयधरों में अग्रगण्य हैं। इस परम्परा के प्रातिमोक्षसूत्र का पाठ अपभ्रंश भाषा में होता था। इस परम्परा में भी संघाटी में ५ से लेकर २१ तक पट्टिकाएं होती थीं तथा उन पर श्रीवत्स का अंकन होता था।
इन चारों मूल निकायों के आपसी भेदों के आधार प्रमुख रूप से विनयसूत्र, भिक्षुसंघ के नियम, उपनियम आदि आचार थे, जो देश और काल के कारण भिन्न-भिन्न हो गये थे, तथापि उनके दार्शनिक विचारों में और सूत्र के व्याख्यानों में मतभेद बिल्कुल नहीं थे-ऐसा नहीं कहा जा सकता। हां, यह कहा जा सकता है कि वे भेदों के प्रमुख आधार नहीं थे।

अठारह निकायों के सामान्य सिद्धान्त

आचार्य वसुमित्र, भावविवेक आदि महापण्डितों के ग्रन्थों का अध्ययन करने के૨૬૨ बौद्धदर्शन अनन्तर हम उन दार्शनिक सिद्धान्तों का संक्षेप में प्रतिपादन करना चाहते हैं, जिनके बारे में सभी अठारह निकाय प्रायः सहमत हैं। शाका

(१) ज्ञान में ग्राह्य (विषय) के आकार का अभाव

बौद्ध दार्शनिकों में इस विषय पर पर्याप्त चर्चा उपलब्ध होती है कि ज्ञान जब अपने विषय में प्रवृत्त होता है, तब विषय के आकार को ग्रहण करके अर्थात् विषय के आकार से आकारित (साकार) होकर विषय ग्रहण करता है या निराकार रहते हुए। सौत्रान्तिकों का मानना है कि चक्षुर्विज्ञान नीलाकार होकर नील विषय में प्रवृत्त होता है। उनका कहना है कि जिस समय चक्षुर्विज्ञान उत्पन्न होता है, उस समय उसका ग्राह्य (नील आलम्बन) निरुद्ध रहता है। क्योंकि नील आलम्बन कारण है और चक्षुर्विज्ञान उसका कार्य। कारण को कार्य से नियत पूर्ववर्ती होना चाहिए। इसलिए नील आलम्बन चक्षुर्विज्ञान से एक क्षण पूर्व निरुद्ध हो जाता है। किन्तु ज्ञान में विषय का आकार विद्यमान होने से वह ज्ञान ‘नीलज्ञ’ कहा जाता है। - वैभाषिक-प्रमुख अन्य निकायों के मतानुसार चक्षुर्विज्ञान विषय के आकार से आकारित होकर आलम्बन में प्रवृत्त नहीं होता, अपितु निराकार ज्ञान में विषय का प्रतिभास हुआ करता है। इनके अनुसार घट, पट आदि स्थूल आकार नहीं, अपितु उनके आरम्भक परमाणु चक्षुरिन्द्रिय में आभासित होते हैं, अतः चक्षुर्विज्ञान घट आदि के नीलाकार का ग्रहण न करते हुए उनमें प्रवृत्त होता है। सौत्रान्तिक मत में चक्षुर्विज्ञान में परमाणु का प्रतिभास नहीं माना जाता, अपितु उनके द्वारा आरब्ध स्थूल नील घटाकार का प्रतिभास माना जाता है। वैभाषिक इससे सहमत नहीं है। उनका कहना है कि चक्षुर्विज्ञान नहीं, अपितु चक्षुरिन्द्रिय रूप को देखती है। यदि चक्षुर्विज्ञान रूप को देखेगा तो विज्ञान की गति अप्रतिहत (बेरोकटोक) होने से दीवार आदि के उस पार स्थित रूप को भी उसे देखना चाहिए, क्योंकि दीवार आदि वस्तु किसी जड़ पदार्थ को ही आगे जाने से रोक सकती है, ज्ञान को नहीं। किन्तु दीवार के उस पार स्थित रूप दिखाई नहीं देता, इससे सिद्ध होता है कि चक्षर्विज्ञान रूप को नहीं देखता, अपितु जड़ चक्षुरिन्द्रिय रूप को देखती है, जिसकी अग्रगति दीवार के कारण अवरुद्ध हो जाती है।

(२) ज्ञान में स्वसंवेदनत्व का अभाव

वैभाषिक प्रमुख सभी अठारह निकायों में ज्ञान में जैसे ज्ञेय (विषय) का आकार नहीं माना जाता अर्थात् जैसे उसे निराकार माना जाता है, उसी प्रकार ज्ञान में ग्राहक-आकार अर्थात् अपने स्वरूप (स्वयं) को ग्रहण करने वाला आकार भी नहीं माना जाता। स्वयं (अपने स्वरूप) को ग्रहण करने वाला ज्ञान ‘स्वसंवेदन’ कहलाता है। आशय यह कि वे अठारह बौद्ध निकाय ૨૬૩ (वैभाषिक आदि) स्वसंवेदन नहीं मानते। ज्ञात है कि बौद्ध नैयायिक सौत्रान्तिक आदि चार प्रत्यक्ष मानते हैं- इन्द्रिय प्रत्यक्ष, मानस प्रत्यक्ष, स्वसंवेदन प्रत्यक्ष और योगी-प्रत्यक्ष। इनमें से वैभाषिक आदि क्योंकि स्वसंवेदन नहीं मानते, इसलिए इनके मत में शेष तीन प्रत्यक्ष ही माने जाते हैं। __जब ज्ञान अपने विषय (ज्ञेय) नील आदि में प्रवृत्त होता है, तब ज्ञेय का आकार ज्ञान में आ जाने से ज्ञान ज्ञेयाकार हो जाता है। ज्ञान के इस अपने ज्ञेयाकार स्वरूप को ज्ञान स्वयं प्रत्यक्षतया (स्वसंवेदन प्रत्यक्ष के द्वारा) जानता है-ऐसा सौत्रान्तिक आदि बौद्धों नैयायिक मानते हैं। वैभाषिक आदि निकायों के मत में ज्ञान न तो ज्ञेयाकार होता है और न आत्मस्वरूपग्राहकाकार होता है। अर्थात् वे ज्ञान के स्वसंवेदन स्वरूप की कल्पना ही नहीं करते। इसलिए ये सर्वथा निराकार ज्ञानवादी ही हैं। जिनका

(३) बाह्यार्थ का अस्तित्व

वैभाषिक आदि के मत में ज्ञान में अतिरिक्त बाह्य वस्तुओं की सत्ता मानी जाती है। वे रूप, शब्द आदि बाह्य वस्तुएं परमाणुओं से आरब्ध (निर्मित) होती हैं, न कि विज्ञान के परिणाम के रूप में मानी जाती हैं-जैसा कि योगाचार विज्ञानवादी मानते हैं। योगाचार मतानुसार समस्त बाह्यार्थ आलयविज्ञान या मनोविज्ञान में स्थित वासना के परिणाम होते हैं। वैभाषिक ऐसा नहीं मानते। वैभाषिक मतानुसार घट आदि पदार्थों में स्थित परमाणु चक्षुरिन्द्रिय के विषय होते हैं तथा चक्षुरिन्द्रिय में स्थित परमाणु चक्षुर्विज्ञान के आश्रय होते हैं। इसलिए इनके मत में परमाणु से निर्मित घट आदि स्थूल वस्तुओं की वस्तुसत्ता नहीं मानी जाती। सौत्रान्तिकों के मतानुसार घट आदि में स्थित प्रत्येक परमाणु चक्षुर्विज्ञान का विषय नहीं होता, अतः चक्षुर्विज्ञान में भासित होने वाले घट आदि स्थूल वस्तुओं की वस्तुसत्ता मानी जाती है। जैसे वैशेषिक दार्शनिक अवयवों से अतिरिक्त एक अवयवी द्रव्य की सत्ता स्वीकार करते हैं, वैसे वैभाषिक नहीं मानते, इसलिए घट आदि के अन्तर्गत विद्यमान परमाणु ही इन्द्रिय के विषय होते हैं।

(४) तीनों कालों की सत्ता

___ जो सभी अतीत, अनागत और प्रत्युत्पन्न कालों का अस्तित्व मानते हैं, वे सर्वास्तिवादी चार प्रकार के हैं, यथा- १. भावान्यथिक। इस मत के प्रमुख आचार्य भदन्त धर्मत्रात हैं। इनके अनुसार अध्वों (कालों) में प्रवर्तमान (गतिशील) धर्मों की द्रव्यता में अन्यथात्व नहीं होता। केवल भाव में अन्यथात्व होता है। २. लक्षणान्यथिक। इसके प्रमुख आचार्य भदन्त घोषक हैं। इनके अनुसार अध्वों में प्रवर्तमान अतीत धर्म यद्यपि अतीत-लक्षण से युक्त होता है, फिर भी वह प्रत्युत्पन्न और अनागत लक्षण से भी अवियुक्त ता २६४ बौद्धदर्शन होता है। ३. अवस्थान्यथिक। इसके प्रमुख आचार्य भदन्त वसुमित्र हैं। इनके अनुसार अध्वों में प्रवर्तमान धर्म भिन्न-भिन्न अवस्थाओं को प्राप्त कर अवस्था की दृष्टि से भिन्न-भिन्न निर्दिष्ट किया जाता है, न कि भिन्न-भिन्न द्रव्य की दृष्टि से भिन्न-भिन्न निर्दिष्ट होता है। ४. अन्यथान्यथिक। इसके प्रमुख आचार्य भदन्त बुद्धदेव हैं। इनके अनुसार अध्वों में प्रवर्तमान धर्म पूर्व, अपर की अपेक्षा से भिन्न-भिन्न कहा जाता है।
इनमें जो तीसरा पक्ष अवस्थान्यथिक नाम से विख्यात है, वही शोभन है। इसके अनुसार कारित्र (अर्थक्रिया) की दृष्टि से अध्व की व्यवस्था की जाती है। जैसे जो धर्म कारित्र को प्राप्त नहीं है, वह अनागत; जो कारित्र को प्राप्त है, वह प्रत्युत्पन्न तथा जिसका कारित्र समाप्त हो गया है, वह अतीत कहा जाता है। तीनों कालों की द्रव्यतः सत्ता को अवश्य मानने के पक्ष में ये निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत करते हैं : मोने यदि अतीत, अनागत की सत्ता न मानी जाएगी तो अतीत, अनागत को विषय (आलम्बन) बनानेवाला ज्ञान निरालम्बन हो जाएगा। आलम्बन का अभाव हो जाने से उसे ज्ञान कहना ही सम्भव नहीं होगा। अपि च, अतीत को विषय बनाने वाला योगियों का ज्ञान उत्पन्न ही नहीं हो सकेगा। पुनश्च, अतीत कर्म का कोई फल ही नहीं हो सकेगा, क्योंकि जिसकी सत्ता ही नहीं है, उसमें किसी भी प्रकार के कार्य को उत्पन्न करने की शक्ति नहीं मानी जा सकती। फलतः सारी कर्म-कर्मफल व्यवस्था के विलोप का प्रसंग उपस्थित होगा। अतः तीनों कालों का अस्तित्व अवश्य स्वीकार किया जाना चाहिए। इसका यह मतलब नहीं है कि वस्तुएं नित्य होती हैं। वैभाषिक मत के अनुसार सभी वस्तुएं उत्पाद-भङ्ग स्वभाववाली होती हैं, अतः अनित्य ही होती हैं।

(५) निरुपधिशेष निर्वाण

  • वैभाषिक आदि निकायों के मत में निरुपधिशेष निर्वाण की अवस्था में व्यक्तित्व की सर्वथा निवृत्ति (परिसमाप्ति) मानी जाती है। इस अवस्था में अनादि काल से चली आ रही व्यक्ति की नाम-रूप सन्तति सर्वथा शान्त हो जाती है, जैसे दीपक के बुझ जाने पर उसकी किसी भी प्रकार की सन्तति अवशिष्ट नहीं रहती।
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(६) बोधि से पूर्व गौतम बुद्ध का पृथग्जन होना

इन निकायों के मतानुसार जन्म ग्रहण करते समय राजकुमार सिद्धार्थ पृथग्जन ही थे। वह बोधिसत्त्व अवश्य थे और मार्ग की दृष्टि से सम्भारमार्ग की अवस्था में विद्यमान थे। घर से बाहर होकर प्रव्रज्या ग्रहण करने के अनन्तर जिस समय बोधिवृक्ष के मूल में समाधि में स्थित थे, तब उन्होंने क्रमशः प्रयोगमार्ग, दर्शनमार्ग और भावनामार्ग को प्राप्त किया। अन्त में उन्होंने उसी आसन पर सम्यक् संबुद्धत्व की प्राप्ति की। ये लोग ऐसा नहीं अठारह बौद्ध निकाय २६५ मानते कि वे पहले ही बुद्धत्व प्राप्त कर चुके थे और जम्बूद्वीप में उनका मनुष्य के रूप में अवतार हुआ था, जैसा कि महायानी बौद्ध मानते हैं। उनका शरीर भी सास्रव ही था। महापरिनिर्वाण के अनन्तर उनके व्यक्तित्व का अस्तित्व सर्वथा समाप्त हो गया, क्योंकि उन्होंने निरुपधिशेष निर्वाण प्राप्त कर लिया था।

(७) महायानसूत्रों की अप्रामाणिकता

इन सभी अठारह निकायों में महायानसूत्रों की बुद्धवचन के रूप में मान्यता स्वीकृत नहीं है। इसके लिए वे निम्नलिखित युक्तियाँ प्रस्तुत करते हैं (क) समस्त बुद्धवचन सूत्र, विनय और अभिधर्म-इन तीन पिटकों में संगृहीत हैं। राजगृह आदि में संगीतिकारकों ने इन महायानसूत्रों का किसी भी पिटक में संग्रह नहीं किया है। इसलिए ये बुद्धवचन नहीं हैं। (ख) महायान सूत्रों में बुद्ध, धर्म और संघ अर्थात् त्रिरत्न, चार आर्य सत्य तथा कर्म-कर्मफल आदि की सत्यतः सत्ता नहीं मानी जाती, क्योंकि वे सभी धर्मों को स्वभावतः शून्य मानते हैं। इस तरह वे कर्म, कर्मफल, त्रिरत्न आदि के बारे में उच्छेदवादी चार्वाकों की भाँति ही हैं। (ग) बौद्ध धर्म के सर्वमान्य अठारह निकाय हैं, किन्तु महायानसूत्रों का किसी भी निकाय में संग्रह नहीं है, क्योंकि : (१) प्रथम या द्वितीय संगीति में उनका संगायन नहीं हुआ।
महायान सूत्रों में तथागत का धर्मकाय नित्य माना गया है, जो सभी निकायों के इस सार्वभौम सिद्धान्त से विरुद्ध है कि ‘सभी संस्कार अनित्य है’। (३) महायान सूत्रों में तथागतगर्भ या आलयविज्ञान की देशना की गई है, जो लगभग आत्मदेशना की भाँति ही है। अतः यह देशना ‘सभी धर्म अनात्मक हैं’-इस सर्व बौद्धसम्मत सिद्धान्त से विपरीत है। (४) महायान सूत्रों के अनुसार तथागत निर्वाण के बाद भी उसमें विलीन नहीं होते, अपितु अप्रतिष्ठित निर्वाण में स्थित होते हैं। उनका यह सिद्धान्त सार्वनैकायिक इस मत से विपरीत है कि ‘निर्वाण शान्त है’। महायान सूत्रों में सर्वमान्य बौद्ध धर्म के विपरीत अनेक मतों का उल्लेख उपलब्ध होता है, जैसे- अर्हत् पुद्गलों की निन्दा, गृहस्थ लोगों को भी प्रव्रजित द्वारा प्रणाम किया जाना, भगवान् बुद्ध से भी अधिक बोधिसत्त्वों की प्रशंसा, गगनगर्भ आदि बोधिसत्त्वों का अर्थशून्य शब्दमात्र प्रणिधान करना आदि। (६) शाक्यमुनि बुद्ध का लीला के लिए पृथ्वी पर अवतरण, बुद्ध का सदा समाहित अवस्था में रहना, आनन्तर्य पापकर्मों के भी उन्मूलन की सम्भावना आदि बौद्ध २६६ बौद्धदर्शन धर्म के विपरीत मतों का उल्लेख महायानसूत्रों में दिखाई पड़ता है। _फलतः ये महायान सूत्र कभी भी बुद्धवचन नहीं हो सकते। प्रतीत होता है कि लोगों की वञ्चना करने के लिए मार द्वारा ये उपदिष्ट हैं। ।
महायानसूत्रों के बुद्धवचन न होने के पक्ष में और भी अनेक दोषारोपण तर्कज्वाला आदि ग्रन्थों में उपलब्ध होते हैं तथा वहाँ इन दोषारोपणों का समाधान भी उपलब्ध होता है। इसके अलावा आचार्य नागार्जुन के ग्रन्थों में, आर्य मैत्रेयनाथ के महायानसूत्रालङ्कार में, भावविवेक के मध्यमकहृदय और शान्तिदेव के बोधिचर्यावतार आदि ग्रन्थों में महायान सूत्रों की बुद्धवचनता युक्तिपूर्वक सिद्ध की गई है। इन सबका विस्तृत ज्ञान उन-उन ग्रन्थों का अवलोकन करके ही करना चाहिए।

  • आचार्य वसुमित्र, विनीतदेव, भव्य आदि के ग्रन्थों में तथा इन ग्रन्थों के आधार पर बाद में भोटदेशीय विद्वानों द्वारा रचित अनेक ग्रन्थों में अठारह निकायों से सम्बद्ध सामग्री बड़ी मात्रा में उपलब्ध होती हैं, किन्तु यहाँ संक्षेप में ही निर्देश करना अभीष्ट है।
    सम्राट् कनिष्क के समय जालन्धर या कश्मीर के कुण्डलपुर में जो चतुर्थ संगीति सम्पन्न हुई, वह मुख्यरूप से सर्वास्तिवादियों के आपसी विवादों के समाधान के लिए आयोजित की गई थी। उसमें सम्पूर्ण त्रिपिटक पर विभाषा नाम की एक टीका लिखी गई, जिसमें सूत्रों का वास्तविक अभिप्राय अभिव्यक्त किया गया था। इस टीका को प्रमाण मनानेवाले ‘वैभाषिक’ कहलाए। इस संगीति में जो सम्मिलित नहीं हुए थे अथवा इस संगीति के निष्कर्षों को जिन्होंने स्वीकार करने से इन्कार कर दिया, वे विभिन्न सर्वास्तिवादियों के रूप में प्रख्यात रहे। __ऊपर के विवरणों से यह ज्ञात होता है कि सभी अठारह (या उससे अधिक) निकायों के प्रमुख दार्शनिक मुद्दों पर प्रायः समान विचार थे। अतः बौद्ध दर्शनों का जब चार दार्शनिक प्रस्थानों में वर्गीकरण किया गया, तब इन सभी निकायों को एक में सम्मिलित करके उसे वैभाषिक दार्शनिक प्रस्थान कहा गया।
    हमारा जीवन का सवार मिसाल काय मय में