मूलम्
मूर्धाभिषिक्तो राजन्यो बाहुजः क्षत्रियो विराट् ॥2.8.1.1॥
शब्दाः
क्षत्रियः. (5) - मूर्धाभिषिक्त (पुं), राजन्य (पुं), बाहुज (पुं), क्षत्रिय (पुं), विराज् (पुं) ॥2.8.1.1॥
मूलम्
राजा राट्पार्थिवक्ष्माभृन्नृपभूपमहीक्षितः ॥2.8.1.2॥
शब्दाः
राजा. (7) - राज् (पुं), राज् (पुं), पार्थिव (पुं), क्ष्माभृत् (पुं), नृप (पुं), भूप (पुं), महीक्षित् (पुं) ॥2.8.1.2॥
मूलम्
राजा तु प्रणताशेषसामन्तः स्यादधीश्वरः ॥2.8.2.1॥
शब्दाः
सर्वसंनिहितनृपवशकारी. (1) - अधीश्वर (पुं) ॥2.8.2.1॥
मूलम्
चक्रवर्ती सार्वभौमो नृपोऽन्यो मण्डलेश्वरः ॥2.8.2.2॥
शब्दाः
चक्रवर्ती. (2) - चक्रवर्तिन् (पुं), सार्वभौम (पुं)
मण्डलेश्वरः. (1) - मण्डलेश्वर (पुं) ॥2.8.2.2॥
मूलम्
शास्ति यश्चाज्ञया राज्ञः स सम्राडथ राजकम् ॥2.8.3.2॥
शब्दाः
सम्राट्. (1) - सम्राट् (पुं)
राजसमूहः. (1) - राजक (नपुं) ॥2.8.3.2॥
मूलम्
राजन्यकं च नृपतिक्षत्रियाणां गणे क्रमात् ॥2.8.4.1॥
शब्दाः
क्षत्रियसमूहः. (1) - राजन्यक (नपुं) ॥2.8.4.1॥
मूलम्
मन्त्री धीसचिवोऽमात्योऽन्ये कर्मसचिवास्ततः ॥2.8.4.2॥
शब्दाः
मन्त्री. (3) - मन्त्रिन् (पुं), धीसचिव (पुं), अमात्य (पुं)
सहायकारिः. (1) - कर्मसचिव (पुं) ॥2.8.4.2॥
मूलम्
महामात्राः प्रधानानि पुरोधास्तु पुरोहितः ॥2.8.5.1॥
शब्दाः
प्रधानोद्योगस्थाः. (2) - महामात्र (पुं), प्रधान (नपुं)
धर्माध्यक्षः. (2) - पुरोधस् (पुं), पुरोहित (पुं) ॥2.8.5.1॥
मूलम्
द्रष्टरि व्यवहाराणां प्राड्विवाकाक्षदर्शकौ ॥2.8.5.2॥
शब्दाः
न्यायाधीशः. (2) - प्राड्विवाक (पुं), अक्षदर्शक (पुं) ॥2.8.5.2॥
मूलम्
प्रतीहारो द्वारपालद्वास्थद्वास्थितदर्शकाः ॥2.8.6.1॥
शब्दाः
द्वारपालकः. (5) - प्रतीहार (पुं), द्वारपाल (पुं), द्वाःस्थ (पुं), द्वास्थित (पुं), दर्शक (पुं) ॥2.8.6.1॥
मूलम्
रक्षिवर्गस्त्वनीकस्थोऽथाध्यक्षाधिकृतौ समौ ॥2.8.6.2॥
शब्दाः
राज्ञः रक्षिगणम्. (2) - रक्षिवर्ग (पुं), अनीकस्थ (पुं)
अधिकारी. (2) - अध्यक्ष (पुं), अधिकृत (पुं) ॥2.8.6.2॥
मूलम्
स्थायुकोऽधिकृतो ग्रामे गोपो ग्रामेषु भूरिषु ॥2.8.7.1॥
शब्दाः
एकग्रामाधिकारी. (1) - स्थायुक (पुं)
बहुग्रामाधिकृतः. (1) - गोप (पुं) ॥2.8.7.1॥
मूलम्
भौरिकः कनकाध्यक्षो रूप्याध्यक्षस्तु नैष्किकः ॥2.8.7.2॥
शब्दाः
सुवर्णाधिकृतः. (2) - भौरिक (पुं), कनकाध्यक्ष (पुं)
रूप्याधिकृतः. (2) - रूप्याध्यक्ष (पुं), नैष्किक (पुं) ॥2.8.7.2॥
मूलम्
अन्तःपुरे त्वधिकृतः स्यादन्तर्वंशिको जनः ॥2.8.8.1॥
शब्दाः
अन्तःपुराधिकृतः. (1) - अन्तर्वंशिक (पुं) ॥2.8.8.1॥
मूलम्
सौविदल्लाः कञ्चुकिनः स्थापत्याः सौविदाश्च ते ॥2.8.8.2॥
शब्दाः
अन्तःपुरस्य रक्षाधिकारी. (4) - सौविदल्ल (पुं), कञ्चुकिन् (पुं), स्थापत्य (पुं), सौविद (पुं) ॥2.8.8.2॥
मूलम्
शण्ढो वर्षवरस्तुल्यौ सेवकार्थ्यनुजीविनः ॥2.8.9.1॥
शब्दाः
अन्तःपुरचारिणनपुंसकाः. (2) - शण्ढ (पुं), वर्षवर (पुं)
सेवकः. (3) - सेवक (पुं), अर्थिन् (पुं), अनुजीविन् (पुं) ॥2.8.9.1॥
मूलम्
विषयानन्तरो राजा शत्रुर्मित्रमतः परम् ॥2.8.9.2॥
शब्दाः
स्वदेशाव्यवहितदेशराजा. (1) - शत्रु (पुं)
शत्रुराज्याव्यवहितराजा. (1) - मित्र (नपुं) ॥2.8.9.2॥
मूलम्
उदासीनः परतरः पार्ष्णिग्राहस्तु पृष्ठतः ॥2.8.10.1॥
शब्दाः
शत्रुमित्राभ्यां परतरः राजा. (1) - उदासीन (पुं)
पृष्ठतो वर्तमानः राजा. (1) - पार्ष्णिग्राह (पुं) ॥2.8.10.1॥
मूलम्
रिपौ वैरिसपत्नारिद्विषद्द्वेषणदुर्हृदः ॥2.8.10.2॥
शब्दाः
शत्रुः. (7) - रिपु (पुं), वैरिन् (पुं), सपत्न (पुं), अरि (पुं), द्विषत् (पुं), द्वेषण (पुं), दुर्हृद् (पुं) ॥2.8.10.2॥
मूलम्
द्विड्विपक्षाहितामित्रदस्युशात्रवशत्रवः ॥2.8.11.1॥
शब्दाः
शत्रुः. (7) - द्विष् (पुं), विपक्ष (पुं), अहित (पुं), अमित्र (नपुं), दस्यु (पुं), शात्रव (पुं), शत्रु (पुं) ॥2.8.11.1॥
मूलम्
अभिघातिपरारातिप्रत्यर्थिपरिपन्थिनः ॥2.8.11.2॥
शब्दाः
शत्रुः. (5) - अभिघातिन् (पुं), पर (पुं), अराति (पुं), प्रत्यर्थिन् (पुं), परिपन्थिन् (पुं) ॥2.8.11.2॥
मूलम्
वयस्यः स्निग्धः सवया अथ मित्रं सखा सुहृत् ॥2.8.12.1॥
शब्दाः
तुल्यवयस्कः. (3) - वयस्य (पुं), स्निग्ध (पुं), सवयस् (पुं)
मित्रम्. (3) - मित्र (पुं), सखि (पुं), सुहृद् (पुं) ॥2.8.12.1॥
मूलम्
सख्यं साप्तपदीनं स्यादनुरोधोऽनुवर्तनम् ॥2.8.12.2॥
शब्दाः
सख्यधर्मः. (2) - सख्य (नपुं), साप्तपदीन (नपुं)
अनुसरणम्. (2) - अनुरोध (पुं), अनुवर्तन (नपुं) ॥2.8.12.2॥
मूलम्
यथार्हवर्णः प्रणिधिरपसर्पश्चरः स्पशः ॥2.8.13.1॥
शब्दाः
चारपुरुषः. (5) - यथार्हवर्ण (पुं), प्रणिधि (पुं), अपसर्प (पुं), चर (पुं), स्पश (पुं) ॥2.8.13.1॥
मूलम्
चारश्च गूढपुरुषश्चाप्तप्रत्ययितौ समौ ॥2.8.13.2॥
शब्दाः
चारपुरुषः. (2) - चार (पुं), गूढपुरुष (पुं)
विश्वासाधारः. (2) - आप्त (पुं), प्रत्ययित (वि) ॥2.8.13.2॥
मूलम्
सांवत्सरो ज्यौतिषिको दैवज्ञगणकावपि ॥2.8.14.1॥
शब्दाः
ज्यौतिषिकः. (4) - सांवत्सर (पुं), ज्यौतिषिक (पुं), दैवज्ञ (पुं), गणक (पुं) ॥2.8.14.1॥
मूलम्
स्युर्मौहूर्तिकमौहूर्तज्ञानिकार्तान्तिका अपि ॥2.8.14.2॥
शब्दाः
ज्यौतिषिकः. (4) - मौहूर्तिक (पुं), मौहूर्त (पुं), ज्ञानिन् (पुं), कार्तान्तिक (पुं) ॥2.8.14.2॥
मूलम्
तान्त्रिको ज्ञातसिद्धान्तः सत्री गृहपतिः समौ ॥2.8.15.1॥
शब्दाः
तत्वार्थज्ञाता. (2) - तान्त्रिक (पुं), ज्ञातसिद्धान्त (पुं)
सदान्नादिदानकर्तुः गृहस्थः. (2) - सत्रिन् (पुं), गृहपति (पुं) ॥2.8.15.1॥
मूलम्
लिपिकारोऽक्षरचरणोऽक्षरचुञ्चुश्च लेखके ॥2.8.15.2॥
शब्दाः
लेखकः. (4) - लिपिकार (पुं), अक्षरचण (पुं), अक्षरचुञ्चु (पुं), लेखक (पुं) ॥2.8.15.2॥
मूलम्
लिखिताक्षरविन्यासे लिपिर्लिबिरुभे स्त्रियौ ॥2.8.16.1॥
शब्दाः
लिपिः. (2) - लिपि (स्त्री), लिबि (स्त्री) ॥2.8.16.1॥
मूलम्
स्यात्सन्देशहरो दूतो दूत्यं तद्भावकर्मणी ॥2.8.16.2॥
शब्दाः
दूतः. (2) - सन्देशहर (पुं), दूत (पुं)
दूतकर्मः. (1) - दूत्य (नपुं) ॥2.8.16.2॥
मूलम्
अध्वनीनोऽध्वगोऽध्वन्यः पान्थः पथिक इत्यपि ॥2.8.17.1॥
शब्दाः
पान्थः. (5) - अध्वनीन (पुं), अध्वग (पुं), अध्वन्य (पुं), पान्थ (पुं), पथिक (पुं) ॥2.8.17.1॥
मूलम्
स्वाम्यमात्यसुहृत्कोशराष्ट्रदुर्गबलानि च ॥2.8.17.2॥
शब्दाः
राजा. (1) - स्वामिन् (पुं)
मन्त्री. (1) - अमात्य (पुं)
मित्रम्. (1) - सुहृद् (पुं)
भण्डारम्. (1) - कोश (पुं)
स्वभूमिः. (1) - राष्ट्र (नपुं)
पर्वतादयः. (1) - दुर्ग (नपुं)
सेना. (1) - बल (पुं) ॥2.8.17.2॥
मूलम्
राज्याङ्गानि प्रकृतयः पौराणां श्रेणयोऽपि च ॥2.8.18.1॥
शब्दाः
राज्याङ्गाः. (2) - राज्याङ्ग (नपुं), प्रकृति (स्त्री) ॥2.8.18.1॥
मूलम्
सन्धिर्ना विग्रहो यानमासनं द्वैधमाश्रयः ॥2.8.18.2॥
शब्दाः
राज्यगुणः. (6) - सन्धि (पुं), विग्रह (पुं), यान (नपुं), आसन (नपुं), द्वैध (नपुं), आश्रय (पुं) ॥2.8.18.2॥
मूलम्
षड्गुणा: शक्तयस्तिस्रः प्रभावोत्साहमन्त्रजाः ॥2.8.19.1॥
शब्दाः
राजशक्तिः. (3) - प्रभाव (पुं), उत्साह (पुं), मन्त्रजा (स्त्री) ॥2.8.19.1॥
मूलम्
क्षयः स्थानं च वृद्धिश्च त्रिवर्गो नीतिवेदिनाम् ॥2.8.19.2॥
शब्दाः
अष्टवर्गाणां क्षयः. (1) - क्षय (पुं)
अष्टवर्गाणां स्थितिः. (1) - स्थान (नपुं)
अष्टवर्गाणां वृद्धिः. (1) - वृद्धि (स्त्री) ॥2.8.19.2॥
मूलम्
स प्रतापः प्रभावश्च यत्तेजः कोशदण्डजम् ॥2.8.20.1॥
शब्दाः
कोशदण्डजतेजः. (2) - प्रताप (पुं), प्रभाव (पुं) ॥2.8.20.1॥
मूलम्
भेदो दण्डः साम दानमित्युपायचतुष्टयम् ॥2.8.20.2॥
शब्दाः
उपायाः. (4) - भेद (पुं), दण्ड (पुं), सामन् (नपुं), दान (नपुं) ॥2.8.20.2॥
मूलम्
साहसं तु दमो दण्डः साम सान्त्वमथो समौ ॥2.8.21.1॥
शब्दाः
दण्डः. (3) - साहस (नपुं), दम (पुं), दण्ड (पुं)
सामः. (2) - सामन् (नपुं), सान्त्व (नपुं) ॥2.8.21.1॥
मूलम्
भेदोपजापावुपधा धर्माद्यैर्यत्परीक्षणम् ॥2.8.21.2॥
शब्दाः
भेदः. (2) - भेद (पुं), उपजाप (पुं)
धर्माद्यैः परीक्षणम्. (1) - उपधा (स्त्री) ॥2.8.21.2॥
मूलम्
पञ्च त्रिष्वषडक्षीणो यस्तृतीयाद्यगोचरः ॥2.8.22.1॥
शब्दाः
द्वाभ्यामेव कृत मन्त्रः. (1) - अषडक्षीण (वि) ॥2.8.22.1॥
मूलम्
विविक्तविजनच्छन्ननिःशलाकास्तथा रहः ॥2.8.22.2॥
शब्दाः
विजनः. (5) - विविक्त (वि), विजन (वि), छन्न (वि), निःशलाक (वि), रहस् (नपुं) ॥2.8.22.2॥
मूलम्
रहश्चोपांशु चालिङ्गे रहस्यं तद्भवे त्रिषु ॥2.8.23.1॥
शब्दाः
विजनः. (2) - रहस् (अव्य), उपांशु (अव्य)
रहस्यम्. (1) - रहस्य (वि) ॥2.8.23.1॥
मूलम्
समौ विस्रम्भविश्वासौ भ्रेषो भ्रंशो यथोचितात् ॥2.8.23.2॥
शब्दाः
विश्वासः. (2) - विस्रम्भ (पुं), विश्वास (पुं)
भ्रंशः. (1) - भ्रेष (पुं) ॥2.8.23.2॥
मूलम्
अभ्रेषन्यायकल्पास्तु देशरूपं समञ्जसम् ॥2.8.24.1॥
शब्दाः
नीतिः. (5) - अभ्रेष (पुं), न्याय (पुं), कल्प (पुं), देशरूप (नपुं), समञ्जस (नपुं) ॥2.8.24.1॥
मूलम्
युक्तमौपयिकं लभ्यं भजमानाभिनीतवत् ॥2.8.24.2॥
शब्दाः
न्यायादनपेतद्रव्यम्. (5) - युक्त (वि), औपयिक (वि), लभ्य (वि), भजमान (वि), अभिनीत (वि) ॥2.8.24.2॥
मूलम्
न्याय्यं च त्रिषु षट्संप्रधारणा तु समर्थनम् ॥2.8.25.1॥
शब्दाः
न्यायादनपेतद्रव्यम्. (1) - न्याय्य (वि)
युक्तायुक्तपरीक्षणम्. (2) - सम्प्रधारणा (स्त्री), समर्थन (नपुं) ॥2.8.25.1॥
मूलम्
अववादस्तु निर्देशो निदेशः शासनं च सः ॥2.8.25.2॥
शब्दाः
आज्ञा. (4) - अववाद (पुं), निर्देश (पुं), निदेश (पुं), शासन (नपुं) ॥2.8.25.2॥
मूलम्
शिष्टिश्चाज्ञा च संस्था तु मर्यादा धारणा स्थितिः ॥2.8.26.1॥
शब्दाः
आज्ञा. (2) - शिष्टि (स्त्री), आज्ञा (स्त्री)
मर्यादा. (4) - संस्था (स्त्री), मर्यादा (स्त्री), धारणा (स्त्री), स्थिति (स्त्री) ॥2.8.26.1॥
मूलम्
आगोऽपराधो मन्तुश्च समे तूद्दानबन्धने ॥2.8.26.2॥
शब्दाः
अपराधः. (3) - आगस् (नपुं), अपराध (पुं), मन्तु (पुं)
बन्धनम्. (2) - उद्दान (नपुं), बन्धन (नपुं) ॥2.8.26.2॥
मूलम्
द्विपाद्यो द्विगुणो दण्डो भागधेयः करो बलिः ॥2.8.27.1॥
शब्दाः
द्विगुणदण्डः. (1) - द्विपाद्य (पुं)
बलिः. (3) - भागधेय (पुं), कर (पुं), बलि (पुं) ॥2.8.27.1॥
मूलम्
घट्टादिदेयं शुल्कोऽस्त्री प्राभृतं तु प्रदेशनम् ॥2.8.27.2॥
शब्दाः
शुल्कः. (1) - शुल्क (पुं-नपुं)
देवताभ्यो दीयमानः. (2) - प्राभृत (नपुं), प्रदेशन (नपुं) ॥2.8.27.2॥
मूलम्
उपायनमुपग्राह्यमुपहारस्तथोपदा ॥2.8.28.1॥
शब्दाः
उपहारः. (4) - उपायन (नपुं), उपग्राह्य (नपुं), उपहार (पुं), उपदा (स्त्री) ॥2.8.28.1॥
मूलम्
यौतकादि तु यद्देयं सुदायो हरणं च तत् ॥2.8.28.2॥
शब्दाः
अवश्यं दीयमानद्रव्यम्. (2) - सुदाय (पुं), हरण (नपुं) ॥2.8.28.2॥
मूलम्
तत्कालस्तु तदात्वं स्यादुत्तरः काल आयतिः ॥2.8.29.1॥
शब्दाः
वर्तमानकालः. (2) - तत्काल (पुं), तदात्व (नपुं) ॥2.8.29.1॥
मूलम्
सांदृष्टिकं फलं सद्य उदर्कः फलमुत्तरम् ॥2.8.29.2॥
शब्दाः
सद्योजायमानफलम्. (1) - सान्दृष्टिक (नपुं)
भाविनः फलम्. (1) - उदर्क (पुं) ॥2.8.29.2॥
मूलम्
अदृष्टं वह्नितोयादि दृष्टं स्वपरचक्रजम् ॥2.8.30.1॥
शब्दाः
अग्न्यादिकृतभयम्. (1) - अदृष्ट (नपुं)
स्वपरसैन्याद्भयम्. (1) - दृष्ट (नपुं) ॥2.8.30.1॥
मूलम्
महीभुजामहिभयं स्वपक्षप्रभवं भयम् ॥2.8.30.2॥
शब्दाः
स्वपक्षप्रभवभयम्. (1) - अहिभय (नपुं) ॥2.8.30.2॥
मूलम्
प्रक्रिया त्वधिकारः स्याच्चामरं तु प्रकीर्णकम् ॥2.8.31.1॥
शब्दाः
राज्ञां छत्रचामरादिव्यापारः. (2) - प्रक्रिया (स्त्री), अधिकार (पुं)
चामरम्. (2) - चामर (नपुं), प्रकीर्णक (नपुं) ॥2.8.31.1॥
मूलम्
नृपासनं यत्तद्भद्रासनं सिंहासनं तु तत् ॥2.8.31.2॥
शब्दाः
राजासनम्. (2) - नृपासन (नपुं), भद्रासन (नपुं)
सुवर्णकृतराजासनम्. (1) - सिंहासन (नपुं) ॥2.8.31.2॥
मूलम्
हैमं छत्रं त्वातपत्रं राज्ञस्तु नृपलक्ष्म तत् ॥2.8.32.1॥
शब्दाः
छत्रम्. (2) - छत्र (नपुं), आतपत्र (नपुं)
नृपच्छत्रम्. (1) - नृपलक्ष्म (नपुं) ॥2.8.32.1॥
मूलम्
भद्रकुम्भः पूर्णकुम्भो भृङ्गारः कनकालुका ॥2.8.32.2॥
शब्दाः
पूर्णघटम्. (2) - भद्रकुम्भ (पुं), पूर्णकुम्भ (पुं)
सुवर्णजलपात्रम्. (2) - भृङ्गार (पुं), कनकालुका (स्त्री) ॥2.8.32.2॥
मूलम्
निवेशः शिबिरं षण्ढे सज्जनं तूपरक्षणम् ॥2.8.33.1॥
शब्दाः
सैन्यवासस्थानम्. (2) - निवेश (पुं), शिबिर (नपुं)
सैन्यरक्षणप्रहरिकादिः. (2) - सज्जन (नपुं), उपरक्षण (नपुं) ॥2.8.33.1॥
मूलम्
हस्त्यश्वरथपादातं सेनाङ्गं स्याच्चतुष्टयम् ॥2.8.33.2॥
शब्दाः
हस्त्यश्वरथपादातसेना. (1) - सेनाङ्ग (नपुं) ॥2.8.33.2॥
मूलम्
दन्ती दन्तावलो हस्ती द्विरदोऽनेकपो द्विपः ॥2.8.34.1॥
शब्दाः
हस्तिः. (6) - दन्तिन् (पुं), दन्तावल (पुं), हस्तिन् (पुं), द्विरद (पुं), अनेकप (पुं), द्विप (पुं) ॥2.8.34.1॥
मूलम्
मतङ्गजो गजो नागः कुञ्जरो वारणः करी ॥2.8.34.2॥
शब्दाः
हस्तिः. (6) - मतङ्गज (पुं), गज (पुं), नाग (पुं), कुञ्जर (पुं), वारण (पुं), करिन् (पुं) ॥2.8.34.2॥
मूलम्
इभः स्तम्बेरमः पद्मी यूथनाथस्तु यूथपः ॥2.8.35.1॥
शब्दाः
हस्तिः. (3) - इभ (पुं), स्तम्बेरम (पुं), पद्मिन् (पुं)
यूथमुख्यहस्तिः. (2) - यूथनाथ (पुं), यूथप (पुं) ॥2.8.35.1॥
मूलम्
मदोत्कटो मदकलः कलभः करिशावकः ॥2.8.35.2॥
शब्दाः
अन्तर्मदहस्तिः. (2) - मदोत्कट (पुं), मदकल (पुं)
करिपोतः. (2) - कलभ (पुं), करिशावक (पुं) ॥2.8.35.2॥
मूलम्
प्रभिन्नो गर्जितो मत्तः समावुद्वान्तनिर्मदौ ॥2.8.36.1॥
शब्दाः
मत्तगजः. (3) - प्रभिन्न (पुं), गर्जित (पुं), मत्त (पुं)
गतमतगजः. (2) - उद्वान्त (पुं), निर्मद (पुं) ॥2.8.36.1॥
मूलम्
हास्तिकं गजता वृन्दे करिणी धेनुका वशा ॥2.8.36.2॥
शब्दाः
हस्तिवृन्दम्. (2) - हास्तिक (नपुं), गजता (स्त्री)
हस्तिनी. (3) - करिणी (स्त्री), धेनुका (स्त्री), वशा (स्त्री) ॥2.8.36.2॥
मूलम्
गण्डः कटो मदो दानं वमथुः करशीकरः ॥2.8.37.1॥
शब्दाः
गजगण्डः. (2) - गण्ड (पुं), कट (पुं)
मदजलम्. (2) - मद (पुं), दान (नपुं)
शुण्डानिर्गतजलम्. (2) - वमथु (पुं), करशीकर (पुं) ॥2.8.37.1॥
मूलम्
कुम्भौ तु पिण्डौ शिरसस्तयोर्मध्ये विदुः पुमान् ॥2.8.37.2॥
शब्दाः
गजमस्तकौ. (3) - कुम्भ (पुं), पिण्ड (पुं), शिरस् (नपुं)
गजमस्तकमध्यभागः. (1) - विदु (पुं) ॥2.8.37.2॥
मूलम्
अवग्रहो ललाटं स्यादीषिका त्वक्षिकूटकम् ॥2.8.38.1॥
शब्दाः
गजललाटम्. (1) - अवग्रह (पुं)
गजनेत्रगोलकम्. (1) - ईषिका (स्त्री) ॥2.8.38.1॥
मूलम्
अपाङ्गदेशो निर्याणं कर्णमूलं तु चूलिका ॥2.8.38.2॥
शब्दाः
गजापाङ्गदेशः. (1) - निर्याण (नपुं)
गजकर्णमूलम्. (1) - चूलिका (स्त्री) ॥2.8.38.2॥
मूलम्
अधः कुम्भस्य वाहित्थं प्रतिमानमधोऽस्य यत् ॥2.8.39.1॥
शब्दाः
गजकुम्भाधोभागः. (1) - वाहित्थ (नपुं)
वाहित्थाधोभागदन्तमध्यम्. (1) - प्रतिमान (नपुं) ॥2.8.39.1॥
मूलम्
आसनं स्कन्धदेशः स्यात्पद्मकं बिन्दुजालकम् ॥2.8.39.2॥
शब्दाः
गजस्कन्धदेशः. (2) - आसन (नपुं), स्कन्धदेश (पुं)
गजमुखादिस्थबिन्दुसमूहः. (2) - पद्मक (नपुं), बिन्दुजालक (नपुं) ॥2.8.39.2॥
मूलम्
पार्श्वभागः पक्षभागो दन्तभागस्तु योऽग्रतः ॥2.8.40.1॥
शब्दाः
गजपार्श्वभागः. (2) - पार्श्वभाग (पुं), पक्षभाग (पुं)
अग्रभागः. (1) - दन्तभाग (पुं) ॥2.8.40.1॥
मूलम्
द्वौ पूर्वपश्चाज्जङ्घादिदेशौ गात्रावरे क्रमात् ॥2.8.40.2॥
शब्दाः
गजजङ्घापूर्वभागः. (1) - गात्र (नपुं)
गजजङ्घापरोभागः. (1) - आवर (नपुं) ॥2.8.40.2॥
मूलम्
तोत्रं वेणुकमालानं बन्धस्तम्भेऽथ शृङ्खले ॥2.8.41.1॥
शब्दाः
गजतोदनदण्डः. (2) - तोत्र (नपुं), वेणुक (नपुं)
गजबन्धनस्तम्भः. (2) - आलान (नपुं), बन्धस्तम्भ (पुं)
गजशृङ्खला. (1) - शृङ्खल (वि) ॥2.8.41.1॥
मूलम्
अन्दुको निगडोऽस्त्री स्यादङ्कुशोऽस्त्री सृणिः स्त्रियाम् ॥2.8.41.2॥
शब्दाः
गजशृङ्खला. (2) - अन्दुक (पुं), निगड (पुं-नपुं)
गजाङ्कुशः. (2) - अङ्कुश (पुं-नपुं), सृणि (स्त्री) ॥2.8.41.2॥
मूलम्
दूष्या कक्ष्या वरत्रा स्यात्कल्पना सज्जना समे ॥2.8.42.1॥
शब्दाः
गजमध्यबन्धनचर्मरज्जुः. (3) - दूष्या (स्त्री), कक्ष्या (स्त्री), वरत्रा (स्त्री)
गजसज्जीकरणम्. (2) - कल्पना (स्त्री), सज्जना (स्त्री) ॥2.8.42.1॥
मूलम्
प्रवेण्यास्तरणं वर्णः परिस्तोमः कुथो द्वयोः ॥2.8.42.2॥
शब्दाः
गजपृष्टवर्ती चित्रकम्बलः. (5) - प्रवेणि (स्त्री), आस्तरण (नपुं), वर्ण (पुं), परिस्तोम (पुं), कुथ (स्त्री-पुं) ॥2.8.42.2॥
मूलम्
वीतं त्वसारं हस्त्यश्वं वारी तु गजबन्धनी ॥2.8.43.1॥
शब्दाः
निर्बलहस्त्यश्वसमूहः. (1) - वीत (नपुं)
गजबन्धनशाला. (2) - वारी (स्त्री), गजबन्धनी (स्त्री) ॥2.8.43.1॥
मूलम्
घोटके वीतितुरगतुरङ्गाश्वतुरङ्गमाः ॥2.8.43.2॥
शब्दाः
अश्वः. (6) - घोटक (पुं), वीति (पुं), तुरग (पुं), तुरङ्ग (पुं), अश्व (पुं), तुरङ्गम (पुं) ॥2.8.43.2॥
मूलम्
वाजिवाहार्वगन्धर्वहयसैन्धवसप्तयः ॥2.8.44.1॥
शब्दाः
अश्वः. (7) - वाजिन् (पुं), वाह (पुं), अर्वन् (पुं), गन्धर्व (पुं), हय (पुं), सैन्धव (पुं), सप्ति (पुं) ॥2.8.44.1॥
मूलम्
आजानेयाः कुलीनाः स्युर्विनीताः साधुवाहिनः ॥2.8.44.2॥
शब्दाः
कुलीनाश्वः. (2) - आजानेय (पुं), कुलीन (पुं)
सम्यग्गतिमान् वाजिः. (2) - विनीत (पुं), साधुवाहिन् (पुं) ॥2.8.44.2॥
मूलम्
वनायुजाः पारसीकाः काम्बोजाः बाह्लिका हयाः ॥2.8.45.1॥
शब्दाः
वनायुदेशवाजिः. (1) - वनायुज (पुं)
पारसीदेशवाजिः. (1) - पारसीक (पुं)
काम्बोजदेशवाजिः. (1) - काम्बोज (पुं)
बाल्हिकदेशवाजिः. (1) - बाह्लिक (पुं) ॥2.8.45.1॥
मूलम्
ययुरश्वोऽश्वमेधीयो जवनस्तु जवाधिकः ॥2.8.45.2॥
शब्दाः
अश्वमेधीयवाजिः. (2) - ययु (पुं), अश्वमेधीय (पुं)
अधिकवेगवाजिः. (2) - जवन (पुं), जवाधिक (पुं) ॥2.8.45.2॥
मूलम्
पृष्ठ्यः स्थौरी सितः कर्को रथ्यो वोढा रथस्य यः ॥2.8.46.1॥
शब्दाः
भारवाह्यश्वः. (2) - पृष्ठ्य (पुं), स्थौरिन् (पुं)
शुक्लाश्वः. (2) - सित (पुं), कर्क (पुं)
रथवाहकाश्वः. (1) - रथ्य (पुं) ॥2.8.46.1॥
मूलम्
बालः किशोरो वाम्यश्वा वडवा वाडवं गणे ॥2.8.46.2॥
शब्दाः
अश्वबालः. (2) - बाल (पुं), किशोर (पुं)
अश्वा. (3) - वामी (स्त्री), अश्वा (स्त्री), वडवा (स्त्री)
अश्वसमूहः. (1) - वाडव (नपुं) ॥2.8.46.2॥
मूलम्
त्रिष्वाश्वीनं यदश्वेन दिनेनैकेन गम्यते ॥2.8.47.1॥
शब्दाः
अश्वेन दिनैकाक्रमणदेशः. (1) - आश्वीन (वि) ॥2.8.47.1॥
मूलम्
कश्यं तु मध्यमश्वानां हेषा ह्रेषा च निस्वनः ॥2.8.47.2॥
शब्दाः
अश्वमध्यम्. (1) - कश्य (नपुं)
अश्वशब्दः. (2) - हेषा (स्त्री), ह्रेषा (स्त्री) ॥2.8.47.2॥
मूलम्
निगालस्तु गलोद्देशो वृन्दे त्वश्वीयमश्ववत् ॥2.8.48.1॥
शब्दाः
अश्वगलसमीपभागः. (2) - निगाल (पुं), गलोद्देश (पुं)
अश्ववृन्दम्. (2) - आश्वीय (नपुं), आश्व (नपुं) ॥2.8.48.1॥
मूलम्
आस्कन्दितं धौरितकं रेचितम्वल्गितं प्लुतम् ॥2.8.48.2॥
शब्दाः
अश्वगतिविशेषः. (5) - आस्कन्दित (नपुं), धौरितक (नपुं), रेचित (नपुं), वल्गित (नपुं), प्लुत (नपुं) ॥2.8.48.2॥
मूलम्
गतयोऽमूः पञ्च धारा घोणा तु प्रोथमस्त्रियाम् ॥2.8.49.1॥
शब्दाः
आस्कन्दितादि पञ्चगतयः. (1) - धारा (स्त्री)
अश्वनासिका. (2) - घोणा (स्त्री), प्रोथ (पुं-नपुं) ॥2.8.49.1॥
मूलम्
कविका तु खलीनोऽस्त्री शफं क्लीबे खुरः पुमान् ॥2.8.49.2॥
शब्दाः
खलीनः. (2) - कविका (स्त्री), खलीन (पुं-नपुं)
मृगपादः. (2) - शफ (नपुं), खुर (पुं) ॥2.8.49.2॥
मूलम्
पुच्छोऽस्त्री लूमलाङ्गूले वालहस्तश्च वालधिः ॥2.8.50.1॥
शब्दाः
मृगपुच्छः. (3) - पुच्छ (पुं-नपुं), लूमन् (नपुं), लाङ्गूल (नपुं)
केशवल्लाङ्गूलम्. (2) - वालहस्त (पुं), वालधि (पुं) ॥2.8.50.1॥
मूलम्
त्रिषूपावृत्तलुठितौ परावृत्ते मुहुर्भुवि ॥2.8.50.2॥
शब्दाः
श्रान्त्या भूमौ लुठिताश्वः. (2) - उपावृत्त (वि), लुठित (वि) ॥2.8.50.2॥
मूलम्
याने चक्रिणि युद्धार्थे शताङ्गः स्यन्दनो रथः ॥2.8.51.1॥
शब्दाः
रथः. (3) - शताङ्ग (पुं), स्यन्दन (पुं), रथ (पुं) ॥2.8.51.1॥
मूलम्
असौ पुष्परथश्चक्रयानं न समराय यत् ॥2.8.51.2॥
शब्दाः
क्रीडारथः. (1) - पुष्यरथ (पुं) ॥2.8.51.2॥
मूलम्
कर्णीरथः प्रवहणं डयनं च समं त्रयम् ॥2.8.52.1॥
शब्दाः
पुरुषस्कन्धवाह्ययानम्. (3) - कर्णीरथ (पुं), प्रवहण (नपुं), डयन (नपुं) ॥2.8.52.1॥
मूलम्
क्लीबेऽनः शकटोऽस्त्री स्याद्गन्त्री कम्बलिवाह्यकम् ॥2.8.52.2॥
शब्दाः
शकटम्. (2) - अनस् (नपुं), शकट (पुं-नपुं)
शकटिका. (2) - गन्त्री (स्त्री), कम्बलिवाह्यक (नपुं) ॥2.8.52.2॥
मूलम्
शिबिका याप्ययानं स्याद्दोला प्रेङ्खादिका स्त्रियाम् ॥2.8.53.1॥
शब्दाः
पालकी. (2) - शिबिका (स्त्री), याप्ययान (नपुं)
दोला. (2) - दोला (स्त्री), प्रेङ्खा (स्त्री) ॥2.8.53.1॥
मूलम्
उभौ तु द्वैपवैयाघ्रौ द्वीपिचर्मावृते रथे ॥2.8.53.2॥
शब्दाः
व्याघ्रचर्मवेष्टितरथः. (2) - द्वैप (वि), वैयाघ्र (वि) ॥2.8.53.2॥
मूलम्
पाण्डुकम्बलसंवीतः स्यन्दनः पाण्डुकम्बली ॥2.8.54.1॥
शब्दाः
शुक्लकम्बलवेष्टितरथः. (1) - पाण्डुकम्बलिन् (वि) ॥2.8.54.1॥
मूलम्
रथे काम्बलवास्त्राद्याः कम्बलादिभिरावृते ॥2.8.54.2॥
शब्दाः
कम्बलाद्यावृतरथः. (1) - काम्बल (पुं) ॥2.8.54.2॥
मूलम्
त्रिषु द्वैपादयो रथ्या रथकट्या रथव्रजे ॥2.8.55.1॥
शब्दाः
रथसमूहः. (3) - रथ्या (स्त्री), रथकट्या (स्त्री), रथव्रज (पुं) ॥2.8.55.1॥
मूलम्
धूः स्त्री क्लीबे यानमुखं स्याद्रथाङ्गमपस्करः ॥2.8.55.2॥
शब्दाः
रथादीनां मुखभागः. (2) - धू (स्त्री), यानमुख (नपुं)
रथावयवमात्रम्. (2) - रथाङ्ग (नपुं), अपस्कर (पुं) ॥2.8.55.2॥
मूलम्
चक्रं रथाङ्गं तस्यान्ते नेमिः स्त्री स्यात्प्रधिः पुमान् ॥2.8.56.1॥
शब्दाः
चक्रम्. (2) - चक्र (नपुं), रथाङ्ग (नपुं)
चक्रान्तभागः. (2) - नेमि (स्त्री), प्रधि (पुं) ॥2.8.56.1॥
मूलम्
पिण्डिका नाभिरक्षाग्रकीलके तु द्वयोरणिः ॥2.8.56.2॥
शब्दाः
रथचक्रमध्यमण्डलाकारः. (2) - पिण्डिका (स्त्री), नाभि (पुं)
चक्रधारणकीलकम्. (2) - अक्षाग्रकीलक (पुं), अणि (स्त्री-पुं) ॥2.8.56.2॥
मूलम्
रथगुप्तिर्वरूथो ना कूबरस्तु युगन्धरः ॥2.8.57.1॥
शब्दाः
शस्त्राघादरक्षनार्थलोहादिमयावरणम्. (2) - रथगुप्ति (स्त्री), वरूथ (पुं)
युगकाष्ठबन्धनस्थानम्. (2) - कूबर (पुं), युगन्धर (पुं) ॥2.8.57.1॥
मूलम्
अनुकर्षो दार्वधःस्थं प्रासङ्गो ना युगाद्युगः ॥2.8.57.2॥
शब्दाः
रथस्याधस्थदारुः. (1) - अनुकर्ष (पुं)
अन्यवृषयुग्मम्. (1) - प्रासङ्ग (पुं) ॥2.8.57.2॥
मूलम्
सर्वं स्याद्वाहनं यानं युग्यं पत्रं च धोरणम् ॥2.8.58.1॥
शब्दाः
वाहनम्. (5) - वाहन (नपुं), यान (नपुं), युग्य (नपुं), पत्र (नपुं), धोरण (नपुं) ॥2.8.58.1॥
मूलम्
परम्परावाहनं यत्तद्वैनीतकमस्त्रियाम् ॥2.8.58.2॥
शब्दाः
परम्परावाहनम्. (1) - वैनीतक (पुं-नपुं) ॥2.8.58.2॥
मूलम्
आधोरणा हस्तिपका हस्त्यारोहा निषादिनः ॥2.8.59.1॥
शब्दाः
हस्तिपकः. (4) - आधोरण (पुं), हस्तिपक (पुं), हस्त्यारोह (पुं), निषादिन् (पुं) ॥2.8.59.1॥
मूलम्
नियन्ता प्राजिता यन्ता सूतः क्षत्ता च सारथिः ॥2.8.59.2॥
शब्दाः
सारथिः. (6) - नियन्तृ (पुं), प्राजितृ (पुं), यन्तृ (पुं), सूत (पुं), क्षन्त्रृ (पुं), सारथि (पुं) ॥2.8.59.2॥
मूलम्
सव्येष्ठदक्षिणस्थौ च संज्ञा रथकुटुम्बिनः ॥2.8.60.1॥
शब्दाः
सारथिः. (2) - सव्येष्ठ (पुं), दक्षिणस्थ (पुं) ॥2.8.60.1॥
मूलम्
रथिनः स्यन्दनारोहा अश्वारोहास्तु सादिनः ॥2.8.60.2॥
शब्दाः
रथारूढयोद्धा. (2) - रथिन् (पुं), स्यन्दनारोह (पुं)
अश्वारोहः. (2) - अश्वारोह (पुं), सादिन् (पुं) ॥2.8.60.2॥
मूलम्
भटा योधाश्च योद्धारः सेना रक्षास्तु सैनिकाः ॥2.8.61.1॥
शब्दाः
योद्धा. (3) - भट (पुं), योध (पुं), योद्धृ (पुं)
सेनारक्षकः. (2) - सेनारक्ष (पुं), सैनिक (पुं) ॥2.8.61.1॥
मूलम्
सेनायां समवेता ये सैन्यास्ते सैनिकाश्च ते ॥2.8.61.2॥
शब्दाः
सेनायां समवेतः. (2) - सैन्य (पुं), सैनिक (पुं) ॥2.8.61.2॥
मूलम्
बलिनो ये सहस्रेण साहस्रास्ते सहस्रिणः ॥2.8.62.1॥
शब्दाः
सहस्रभटनेता. (2) - साहस्र (पुं), सहस्रिन् (पुं) ॥2.8.62.1॥
मूलम्
परिधिस्थः परिचरः सेनानीर्वाहिनीपतिः ॥2.8.62.2॥
शब्दाः
सेनानियन्तः. (2) - परिधिस्थ (पुं), परिचर (पुं)
सैन्याधिपतिः. (2) - सेनानी (पुं), वाहिनीपति (पुं) ॥2.8.62.2॥
मूलम्
कञ्चुको वारबाणोऽस्त्री यत्तु मध्ये सकञ्चुकाः ॥2.8.63.1॥
शब्दाः
चोलकादिसन्नाहः. (2) - कञ्चुक (पुं), वारबाण (पुं-नपुं) ॥2.8.63.1॥
मूलम्
बध्नन्ति तत्सारसनमधिकाङ्गोऽथ शीर्षकम् ॥2.8.63.2॥
शब्दाः
दार्ढ्यार्थं कञ्चुकोपरि बद्धः. (2) - सारसन (नपुं), अधिकाङ्ग (पुं)
शिरस्त्राणः. (1) - शीर्षक (नपुं) ॥2.8.63.2॥
मूलम्
शीर्षण्यं च शिरस्त्रेऽथ तनुत्रं वर्म दंशनम् ॥2.8.64.1॥
शब्दाः
शिरस्त्राणः. (2) - शीर्षण्य (नपुं), शिरस्त्र (नपुं)
सन्नाहः. (3) - तनुत्र (नपुं), वर्मन् (नपुं), दंशन (नपुं) ॥2.8.64.1॥
मूलम्
उरश्छदः कङ्कटको जागरः कवचोऽस्त्रियाम् ॥2.8.64.2॥
शब्दाः
सन्नाहः. (4) - उरःछद (पुं), कङ्कटक (पुं), जगर (पुं), कवच (पुं-नपुं) ॥2.8.64.2॥
मूलम्
आमुक्तः प्रतिमुक्तश्च पिनद्धश्चापिनद्धवत् ॥2.8.65.1॥
शब्दाः
परिहितकवचः. (4) - आमुक्त (वि), प्रतिमुक्त (वि), पिनद्ध (वि), अपिनद्ध (वि) ॥2.8.65.1॥
मूलम्
संनद्धो वर्मितः सज्जो दंशितो व्युढकङ्कटः ॥2.8.65.2॥
शब्दाः
धृतकवचः. (5) - संनद्ध (वि), वर्मित (वि), सज्ज (वि), दंशित (वि), व्यूढकङ्कट (वि) ॥2.8.65.2॥
मूलम्
त्रिष्वामुक्तादयो वर्मभृतां कावचिकं गणे ॥2.8.66.1॥
शब्दाः
धृतकवचगणः. (1) - कावचिक (नपुं) ॥2.8.66.1॥
मूलम्
पदातिपत्तिपदगपादातिकपदाजयः ॥2.8.66.2॥
शब्दाः
पदातिः. (5) - पदाति (पुं), पत्ति (पुं), पदग (पुं), पादातिक (पुं), पदाजि (पुं) ॥2.8.66.2॥
मूलम्
पद्गश्च पदिकश्चाथ पादातं पत्तिसंहतिः ॥2.8.67.1॥
शब्दाः
पदातिः. (2) - पद्ग (पुं), पदिक (पुं)
पदातिसमूहः. (2) - पादात (पुं), पत्तिसंहति (स्त्री) ॥2.8.67.1॥
मूलम्
शस्त्राजीवे काण्डपृष्ठायुधीयायुधिकाः समाः ॥2.8.67.2॥
शब्दाः
आयुधजीविः. (4) - शस्त्राजीव (पुं), काण्डपृष्ठ (पुं), आयुधीय (पुं), आयुधिक (पुं) ॥2.8.67.2॥
मूलम्
कृतहस्तः सुप्रयोगविशिखः कृतपुङ्खवत् ॥2.8.68.1॥
शब्दाः
सम्यक्कृतशराभ्यासः. (3) - कृतहस्त (पुं), सुप्रयोगविशिख (पुं), कृतपुङ्ख (पुं) ॥2.8.68.1॥
मूलम्
अपराद्धपृषत्कोऽसौ लक्ष्याद्यश्च्युतसायकः ॥2.8.68.2॥
शब्दाः
लक्ष्यश्चुतसायकः. (1) - अपराद्धपृषत्क (पुं) ॥2.8.68.2॥
मूलम्
धन्वी धनुष्मान्धानुष्को निषङ्ग्यस्त्री धनुर्धरः ॥2.8.69.1॥
शब्दाः
धनुर्धरः. (6) - धन्विन् (पुं), धनुष्मत् (पुं), धानुष्क (पुं), निषङ्गिन् (पुं), अस्त्रिन् (पुं), धनुर्धर (पुं) ॥2.8.69.1॥
मूलम्
स्यात्काण्डवांस्तु काण्डीरः शाक्तीकः शक्तिहेतिकः ॥2.8.69.2॥
शब्दाः
बाणधारिः. (2) - काण्डवत् (पुं), काण्डीर (पुं)
शक्त्यायुधधारिः. (2) - शाक्तीक (पुं), शक्तिहेतिक (पुं) ॥2.8.69.2॥
मूलम्
याष्टीकपारश्वधिकौ यष्टिपर्श्वधहेतिकौ ॥2.8.70.1॥
शब्दाः
यष्टिहेतिकः. (1) - याष्टीक (पुं)
पर्श्वधहेतिकः. (1) - पारश्वधिक (पुं) ॥2.8.70.1॥
मूलम्
नैस्त्रिंशिकोऽसिहेतिः स्यात्समौ प्रासिककौन्तिकौ ॥2.8.70.2॥
शब्दाः
खड्गधारिः. (2) - नैस्त्रिंशिक (पुं), असिहेति (पुं)
प्रासायुधिः. (1) - प्रासिक (पुं)
कुन्तायुधिः. (1) - कौन्तिक (पुं) ॥2.8.70.2॥
मूलम्
चर्मी फलकपाणिः स्यात्पताकी वैजयन्तिकः ॥2.8.71.1॥
शब्दाः
फलकधारकः. (2) - चर्मिन् (पुं), फलकपाणि (पुं)
ध्वजधारिः. (2) - पताकिन् (पुं), वैजयन्तिक (पुं) ॥2.8.71.1॥
मूलम्
अनुप्लवः सहायश्चानुचरोऽभिचरः समाः ॥2.8.71.2॥
शब्दाः
सहायकः. (4) - अनुप्लव (पुं), सहाय (पुं), अनुचर (पुं), अभिचर (पुं) ॥2.8.71.2॥
मूलम्
पुरोगाग्रेसरप्रष्ठाग्रतः सरपुरः सराः ॥2.8.72.1॥
शब्दाः
अग्रेसरः. (5) - पुरोग (पुं), अग्रेसर (पुं), प्रष्ठ (पुं), अग्रतःसर (पुं), पुरःसर (पुं) ॥2.8.72.1॥
मूलम्
पुरोगमः पुरोगामी मन्दगामी तु मन्थरः ॥2.8.72.2॥
शब्दाः
अग्रेसरः. (2) - पुरोगम (पुं), पुरोगामिन् (पुं)
शनैर्गमनशीलः. (2) - मन्दगामिन् (पुं), मन्थर (पुं) ॥2.8.72.2॥
मूलम्
जङ्घालोऽतिजवस्तुल्यौ जङ्घाकरिकजाङ्घिकौ ॥2.8.73.1॥
शब्दाः
अतिवेगगमनशीलः. (2) - जङ्घाल (पुं), अतिजव (पुं)
जङ्घाजीविः. (2) - जङ्घाकरिक (पुं), जाङ्घिक (पुं) ॥2.8.73.1॥
मूलम्
तरस्वी त्वरितो वेगी प्रजवी जवनो जवः ॥2.8.73.2॥
शब्दाः
त्वरितवन्मात्रः. (6) - तरस्विन् (पुं), त्वरित (पुं), वेगिन् (पुं), प्रजविन् (पुं), जवन (पुं), जव (पुं) ॥2.8.73.2॥
मूलम्
जय्यो यः शक्यते जेतुं जेयो जेतव्यमात्रके ॥2.8.74.1॥
शब्दाः
जेतुं शक्यः. (1) - जय्य (पुं)
जेतुं योग्यः. (1) - जेय (पुं) ॥2.8.74.1॥
मूलम्
जैत्रस्तु जेता यो गच्छत्यलं विद्विषतः प्रति ॥2.8.74.2॥
शब्दाः
जेता. (2) - जैत्र (पुं), जेतृ (पुं) ॥2.8.74.2॥
मूलम्
सोऽभ्यमित्रोऽभ्यमित्रीयोऽप्यभ्यमित्रीण इत्यपि ॥2.8.75.1॥
शब्दाः
ससामर्थ्यम् शत्रूणां सम्मुखं गतः. (3) - अभ्यमित्र्य (पुं), अभ्यमित्रीय (पुं), अभ्यमित्रीण (पुं) ॥2.8.75.1॥
मूलम्
ऊर्जस्वलः स्यादूर्जस्वी य ऊर्जातिशयान्वितः ॥2.8.75.2॥
शब्दाः
बलातिशयवान्. (3) - ऊर्जस्वल (पुं), ऊर्जस्विन् (पुं), ऊर्जातिशयान्वित (पुं) ॥2.8.75.2॥
मूलम्
स्वादुरस्वानुरसिलो रथिरो रथिको रथी ॥2.8.76.1॥
शब्दाः
विपुलोरः. (2) - उरस्वत् (पुं), उरसिल (पुं)
रथस्वामिः. (3) - रथिर (पुं), रथिक (पुं), रथिन् (पुं) ॥2.8.76.1॥
मूलम्
कामङ्गाम्यनुकामीनो ह्यत्यन्तीनस्तथा भृशम् ॥2.8.76.2॥
शब्दाः
यथेष्टं गमनशिलः. (2) - कामङ्गामिन् (पुं), अनुकामीन (पुं)
अतिगमनशीलः. (1) - अत्यन्तीन (पुं) ॥2.8.76.2॥
मूलम्
शूरो वीरश्च विक्रान्तो जेता जिष्णुश्च जित्वरः ॥2.8.77.1॥
शब्दाः
शूरः. (3) - शूर (पुं), वीर (पुं), विक्रान्त (पुं)
जयशीलः. (3) - जेतृ (पुं), जिष्णु (पुं), जित्वर (पुं) ॥2.8.77.1॥
मूलम्
सांयुगीनो रणे साधुः शस्त्राजीवादयस्त्रिषु ॥2.8.77.2॥
शब्दाः
युद्धकुशलः. (1) - सांयुगीन (पुं) ॥2.8.77.2॥
मूलम्
ध्वजिनी वाहिनी सेना पृतनानीकिनी चमूः ॥2.8.78.1॥
शब्दाः
सेना. (6) - ध्वजिनी (स्त्री), वाहिनी (स्त्री), सेना (स्त्री), पृतना (स्त्री), अनीकिनी (स्त्री), चमू (स्त्री) ॥2.8.78.1॥
मूलम्
वरूथिनी बलं सैन्यं चक्रं चानीकमस्त्रियाम् ॥2.8.78.2॥
शब्दाः
सेना. (5) - वरूथिनी (स्त्री), बल (पुं), सैन्य (पुं), चक्र (पुं), अनीक (पुं-नपुं) ॥2.8.78.2॥
मूलम्
व्यूहस्तु बलविन्यासो भेदादण्डादयो युधि ॥2.8.79.1॥
शब्दाः
सैन्यव्यूहः. (2) - व्यूह (पुं), बलविन्यास (पुं) ॥2.8.79.1॥
मूलम्
प्रत्यासारो व्यूहपार्ष्णिः सैन्यपृष्ठे प्रतिग्रहः ॥2.8.79.2॥
शब्दाः
व्यूहपृष्टभागः. (2) - प्रत्यासार (पुं), व्यूहपार्ष्णि (पुं)
सैन्यपृष्टानीकः. (1) - प्रतिग्रह (पुं) ॥2.8.79.2॥
मूलम्
एकेभैकरथा त्र्यश्वा पत्तिः पञ्चपदातिका ॥2.8.80.1॥
शब्दाः
पत्तिसेना. (1) - पत्ति (पुं) ॥2.8.80.1॥
मूलम्
सेनामुखं गुल्मगणौ वाहिनी पृतना चमूः ॥2.8.81.1॥
शब्दाः
सेनामुखनामकसेना. (1) - सेनामुख (नपुं)
गुल्मसेना. (1) - गुल्म (पुं)
गणसेना. (1) - गण (पुं)
वाहिनीसेना. (1) - वाहिनी (स्त्री)
पृतनासेना. (1) - पृतना (स्त्री)
चमूसेना. (1) - चमू (स्त्री) ॥2.8.81.1॥
मूलम्
अनीकिनी दशानीकिन्यक्षौहिण्यथ सम्पदि ॥2.8.81.2॥
शब्दाः
अनीकिनीसेना. (1) - अनीकिनी (स्त्री)
अक्षौहिणीसेना. (1) - अक्षौहिणी (स्त्री)
धनसमृद्धिः. (1) - सम्पद् (स्त्री) ॥2.8.81.2॥
मूलम्
सम्पत्तिः श्रीश्च लक्ष्मीश्च विपत्त्यां विपदापदौ ॥2.8.82.1॥
शब्दाः
धनसमृद्धिः. (3) - सम्पत्ति (स्त्री), श्री (स्त्री), लक्ष्मी (स्त्री)
आपत्. (3) - विपत्ति (स्त्री), विपद् (स्त्री), आपद् (स्त्री) ॥2.8.82.1॥
मूलम्
आयुधं तु प्रहरणं शस्त्रमस्त्रमथास्त्रियौ ॥2.8.82.2॥
शब्दाः
आयुधम्. (2) - आयुध (नपुं), प्रहरण (नपुं)
शस्त्रायुधम्. (1) - शस्त्र (पुं-नपुं)
अस्त्रायुधम्. (1) - अस्त्र (पुं-नपुं) ॥2.8.82.2॥
मूलम्
धनुश्चापौ धन्वशरासनकोदण्डकार्मुकम् ॥2.8.83.1॥
शब्दाः
धनुः. (6) - धनुस् (पुं-नपुं), चाप (पुं-नपुं), धन्वन् (नपुं), शरासन (नपुं), कोदण्ड (नपुं), कार्मुक (नपुं) ॥2.8.83.1॥
मूलम्
इष्वासोऽप्यथ कर्णस्य कालपृष्ठं शरासनम् ॥2.8.83.2॥
शब्दाः
धनुः. (1) - इष्वास (पुं)
कर्णधनुः. (1) - कालपृष्ठ (नपुं) ॥2.8.83.2॥
मूलम्
कपिध्वजस्य गाण्डीवगाण्डिवौ पुन्नपुंसकौ ॥2.8.84.1॥
शब्दाः
अर्जुनधनुः. (2) - गाण्डीव (पुं-नपुं), गाण्डिव (पुं-नपुं) ॥2.8.84.1॥
मूलम्
कोटिरस्याटनी गोधातले ज्याघातवारणे ॥2.8.84.2॥
शब्दाः
धनुषः अन्त्यभागः. (2) - कोटि (स्त्री), अटनी (स्त्री)
ज्याघातवारणः. (2) - गोधा (स्त्री), तल (नपुं) ॥2.8.84.2॥
मूलम्
लस्तकस्तु धनुर्मध्यं मोर्वी ज्या शिञ्जिनी गुणः ॥2.8.85.1॥
शब्दाः
धनुर्मध्यम्. (2) - लस्तक (पुं), धनुर्मध्य (नपुं)
ज्या. (4) - मोर्वी (स्त्री), ज्या (स्त्री), शिञ्जिनी (स्त्री), गुण (पुं) ॥2.8.85.1॥
मूलम्
स्यात्प्रत्यालीढमालीढमित्यादि स्थानपञ्चकम् ॥2.8.85.2॥
शब्दाः
धन्विनां स्थानभेदः. (2) - प्रत्यालीढ (नपुं), आलीढ (नपुं) ॥2.8.85.2॥
मूलम्
लक्षं लक्ष्यं शरव्यं च शराभ्यास उपासनम् ॥2.8.86.1॥
शब्दाः
लक्ष्यम्. (3) - लक्ष (नपुं), लक्ष्य (नपुं), शरव्य (नपुं)
शरक्षेपाभ्यासः. (2) - शराभ्यास (पुं), उपासन (नपुं) ॥2.8.86.1॥
मूलम्
पृषत्कबाणविशिखा अजिह्मगखगाशुगाः ॥2.8.86.2॥
शब्दाः
बाणः. (6) - पृषत्क (पुं), बाण (पुं), विशिख (पुं), अजिह्मग (पुं), खग (पुं), आशुग (पुं) ॥2.8.86.2॥
मूलम्
कलम्बमार्गणशराः पत्री रोप इषुर्द्वयोः ॥2.8.87.1॥
शब्दाः
बाणः. (6) - कलम्ब (पुं), मार्गण (पुं), शर (पुं), पत्रिन् (पुं), रोप (पुं), इषु (स्त्री-पुं) ॥2.8.87.1॥
मूलम्
प्रक्ष्वेडनास्तु नाराचाः पक्षो वाजस्त्रिषूत्तरे ॥2.8.87.2॥
शब्दाः
सर्वलोहमयशरः. (2) - प्रक्ष्वेडन (पुं), नाराच (पुं)
शरपक्षः. (2) - पक्ष (पुं), वाज (पुं) ॥2.8.87.2॥
मूलम्
निरस्तः प्रहिते बाणे विषाक्ते दिग्धलिप्तकौ ॥2.8.88.1॥
शब्दाः
प्रक्षिप्तबाणः. (1) - निरस्त (वि)
विषसम्बद्धबाणः. (2) - दिग्ध (वि), लिप्तक (वि) ॥2.8.88.1॥
मूलम्
तूणोपासङ्गतूणीरनिषङ्गा इषुधिर्द्वयोः ॥2.8.88.2॥
शब्दाः
शराधारः. (5) - तूण (पुं), उपासङ्ग (पुं), तूणीर (पुं), निषङ्ग (पुं), इषुधि (स्त्री-पुं) ॥2.8.88.2॥
+++(शराधारः. (1) - तूणी (स्त्री)
खड्गः. (5) - खड्ग (पुं), निस्त्रिंश (पुं), चन्द्रहास (पुं), असि (पुं), रिष्टि (पुं) ॥2.8.89.1॥)+++
तूण्यां खड्गे तु निस्त्रिंशचन्द्रहासासिरिष्टयः ॥2.8.89.1॥
मूलम्
कौक्षेयको मण्डलाग्रः करवालः कृपाणवत् ॥2.8.89.2॥
शब्दाः
खड्गः. (4) - कौक्षेयक (पुं), मण्डलाग्र (पुं), करवाल (पुं), कृपाण (पुं) ॥2.8.89.2॥
+++(खड्गाद्यायुधमुष्टिः. (1) - त्सरु (पुं)
खड्गमुष्टिनिबन्धनम्. (1) - मेखला (स्त्री) ॥2.8.90.1॥)+++
त्सरुः खड्गादिमुष्टौ स्यान्मेखला तन्निबन्धनम् ॥2.8.90.1॥
+++(फलकः. (3) - फलक (पुं-नपुं), फल (नपुं), चर्मन् (नपुं)
फलकमुष्टिः. (1) - सङ्ग्राह (पुं) ॥2.8.90.2॥)+++
फलकोऽस्त्री फलं चर्म संग्राहो मुष्टिरस्य यः ॥2.8.90.2॥
+++(मुद्गरः. (3) - द्रुघण (पुं), मुद्गर (पुं), घन (पुं)
ह्रस्वखड्गः. (2) - ईली (स्त्री), करवालिका (स्त्री) ॥2.8.91.1॥)+++
द्रुघणो मुद्गरघनौ स्यादीली करवालिका ॥2.8.91.1॥
+++(अश्मक्षेपसाधनम्. (2) - भिन्दिपाल (पुं), सृग (पुं)
लोहाङ्गी. (2) - परिघ (पुं), परिघातन (पुं) ॥2.8.91.2॥)+++
भिन्दिपालः सृगस्तुल्यौ परिघः परिघातिनः ॥2.8.91.2॥
मूलम्
द्वयोः कुठारः स्वधितिः परशुश्च परश्वधः ॥2.8.92.1॥
शब्दाः
कुठारः. (4) - कुठार (स्त्री-पुं), स्वधिति (स्त्री-पुं), परशु (स्त्री-पुं), परश्वध (पुं) ॥2.8.92.1॥
मूलम्
स्याच्छ्स्त्री चासिपुत्री च छुरिका चासिधेनुका ॥2.8.92.2॥
शब्दाः
छुरिका. (4) - शस्त्री (स्त्री), असिपुत्री (स्त्री), छुरिका (स्त्री), असिधेनुका (स्त्री) ॥2.8.92.2॥
+++(बाणाग्रायुधविशेषः. (2) - शल्य (पुं-नपुं), शङ्कु (पुं)
तोमरः. (2) - सर्वला (स्त्री), तोमर (पुं-नपुं) ॥2.8.93.1॥)+++
वा पुंसि शल्यं शङ्कुर्ना सर्वला तोमरोऽस्त्रियाम् ॥2.8.93.1॥
+++(कुन्तः. (2) - प्रास (पुं), कुन्त (पुं)
खड्गादिप्रान्तभागः. (4) - कोण (पुं), पाली (स्त्री), अश्रि (स्त्री), कोटि (स्त्री) ॥2.8.93.2॥)+++
प्रासस्तु कुन्तः कोणस्तु स्त्रियः पाल्यश्रिकोटयः ॥2.8.93.2॥
मूलम्
सर्वाभिसारः सर्वौघः सर्वसन्नहनार्थकः ॥2.8.94.1॥
शब्दाः
चतुरङ्गसैन्यसन्नाहः. (3) - सर्वाभिसार (पुं), सर्वौघ (पुं), सर्वसन्नहन (नपुं) ॥2.8.94.1॥
मूलम्
लोहाभिसारोऽस्त्रभृतां राज्ञां नीराजनाविधिः ॥2.8.94.2॥
शब्दाः
प्रस्तानात्प्राग् शस्त्रवाहनादिपूजा. (1) - लोहाभिहार (पुं) ॥2.8.94.2॥
मूलम्
यत्सेनयाभिगमनमरौ तदभिषेणनम् ॥2.8.95.1॥
शब्दाः
शत्रौ ससैन्यगमनम्. (1) - अभिषेणन (नपुं) ॥2.8.95.1॥
मूलम्
यात्रा व्रज्याभिनिर्वाणं प्रस्थानं गमनं गमः ॥2.8.95.2॥
शब्दाः
प्रयाणम्. (6) - यात्रा (स्त्री), व्रज्या (स्त्री), अभिनिर्याण (नपुं), प्रस्थान (नपुं), गमन (नपुं), गम (पुं) ॥2.8.95.2॥
+++(सैन्यस्य सर्वतो व्याप्तिः. (2) - आसार (पुं), प्रसरण (नपुं)
प्रस्थितसैन्यः. (2) - प्रचक्र (नपुं), चलित (नपुं) ॥2.8.96.1॥)+++
स्यादासारः प्रसरणं प्रचक्रं चलितार्थकम् ॥2.8.96.1॥
मूलम्
अहितान्प्रत्यभीतस्य रणे यानमभिक्रमः ॥2.8.96.2॥
शब्दाः
निर्भीकयायिः. (1) - अभिक्रम (पुं) ॥2.8.96.2॥
+++(प्रातर्जागरणकारिः. (2) - वैतालिक (पुं), बोधकर (पुं)
घण्टिकावादयः. (2) - चाक्रिक (पुं), घाण्टिक (पुं) ॥2.8.97.1॥)+++
वैतालिका बोधकराश्चाक्रिका घाण्टिकार्थकाः ॥2.8.97.1॥
+++(वंशपरम्पराशंसकाः. (2) - मागध (पुं), मगध (पुं)
राजादिस्तुतिपाठकः. (2) - वन्दिन् (पुं), स्तुतिपाठक (पुं) ॥2.8.97.2॥)+++
स्युर्मागधास्तु मगधा बन्दिनः स्तुतिपाठकाः ॥2.8.97.2॥
मूलम्
संशप्तकास्तु समयात्संग्रामादनिवर्तिनः ॥2.8.98.1॥
शब्दाः
शपतवशात्सङ्ग्रामादपरावर्तिः. (1) - संशप्तक (पुं) ॥2.8.98.1॥
मूलम्
रेणुर्द्वयोः स्त्रियां धूलिः पांसुर्ना न द्वयो रजः ॥2.8.98.2॥
शब्दाः
रजः. (4) - रेणु (स्त्री-पुं), धूलि (स्त्री), पांसु (पुं), रजस् (नपुं) ॥2.8.98.2॥
+++(पिष्टस्य रजः. (2) - चूर्ण (नपुं), क्षोद (पुं)
अतिसङ्कुलसैन्याः. (2) - समुत्पिञ्ज (पुं), पिञ्जल (पुं) ॥2.8.99.1॥)+++
चूर्णे क्षोदः समुत्पिञ्जपिञ्जलौ भृशमाकुले ॥2.8.99.1॥
मूलम्
पताका वैजयन्ती स्यात्केतनं ध्वजमस्त्रियाम् ॥2.8.99.2॥
शब्दाः
पताका. (4) - पताका (स्त्री), वैजयन्ती (स्त्री), केतन (नपुं), ध्वज (पुं-नपुं) ॥2.8.99.2॥
मूलम्
सा वीराशंसनं युद्धभूमिर्यातिभयप्रदा ॥2.8.100.1॥
शब्दाः
भयङ्करयुद्धभूमिः. (1) - वीराशंसन (नपुं) ॥2.8.100.1॥
मूलम्
अहंपूर्वमहंपूर्वमित्यहंपूर्विका स्त्रियाम् ॥2.8.100.2॥
शब्दाः
अहम्पूर्वमहम्पूर्वमिति. (1) - अहम्पूर्विका (स्त्री) ॥2.8.100.2॥
मूलम्
आहोपुरुषिका दर्पाद्या स्यात्संभावनात्मनि ॥2.8.101.1॥
शब्दाः
आत्मनि शक्त्याविष्कारः. (1) - आहोपुरुषिका (स्त्री) ॥2.8.101.1॥
मूलम्
अहमहमिका तु सा स्यात्परस्परं यो भवत्यहङ्कारः ॥2.8.101.2॥
शब्दाः
परस्पराहङ्कारः. (1) - अहमहमिका (स्त्री) ॥2.8.101.2॥
मूलम्
द्रविणं तरः सहोबलशौर्याणि स्थाम शुष्मं च ॥2.8.102.1॥
शब्दाः
सामर्थ्यम्. (7) - द्रविण (नपुं), तरस् (नपुं), सहस् (नपुं), बल (नपुं), शौर्य (नपुं), स्थामन् (नपुं), शुष्म (नपुं) ॥2.8.102.1॥
+++(सामर्थ्यम्. (3) - शक्ति (स्त्री), पराक्रम (पुं), प्राण (पुं)
अतिपराक्रमः. (2) - विक्रम (पुं), अतिशक्तिता (स्त्री) ॥2.8.102.2॥)+++
शक्तिः पराक्रमः प्राणो विक्रमस्त्वतिशक्तिता ॥2.8.102.2॥
मूलम्
वीरपानं तु यत्पानं वृत्ते भाविनि वारणे ॥2.8.103.1॥
शब्दाः
युद्धारम्भे अन्ते वा पानकर्मः. (1) - वीरपाण (नपुं) ॥2.8.103.1॥
मूलम्
युद्धमायोधनं जन्यं प्रधनं प्रविदारणम् ॥2.8.103.2॥
शब्दाः
युद्धम्. (5) - युद्ध (नपुं), आयोधन (नपुं), जन्य (पुं), प्रधन (नपुं), प्रविदारण (नपुं) ॥2.8.103.2॥
मूलम्
मृधमास्कन्दनं संख्यं समीकं सांपरायिकम् ॥2.8.104.1॥
शब्दाः
युद्धम्. (5) - मृध (नपुं), आस्कन्दन (नपुं), सङ्ख्य (नपुं), समीक (नपुं), साम्परायिक (नपुं) ॥2.8.104.1॥
मूलम्
अस्त्रियां समरानीकरणाः कलहविग्रहौ ॥2.8.104.2॥
शब्दाः
युद्धम्. (5) - समर (पुं), अनीक (पुं), रण (पुं), कलह (पुं), विग्रह (पुं) ॥2.8.104.2॥
मूलम्
सम्प्रहाराभिसम्पात कलिसंस्फोट संयुगाः ॥2.8.105.1॥
शब्दाः
युद्धम्. (5) - सम्प्रहार (पुं), अभिसम्पात (पुं), कलि (पुं), संस्फोट (पुं), संयुग (पुं) ॥2.8.105.1॥
मूलम्
अभ्यामर्द समाघात संग्रामाभ्यागमाहवाः ॥2.8.105.2॥
शब्दाः
युद्धम्. (5) - अभ्यामर्द (पुं), समाघात (पुं), सङ्ग्राम (पुं), अभ्यागम (पुं), आहव (पुं) ॥2.8.105.2॥
मूलम्
समुदायः स्त्रियः संयत्समित्याजिसमिद्युधः ॥2.8.106.1॥
शब्दाः
युद्धम्. (6) - समुदाय (पुं), संयत् (स्त्री), समिति (स्त्री), आजि (स्त्री), समित् (स्त्री), युध् (स्त्री) ॥2.8.106.1॥
+++(बाहुयुद्धम्. (2) - नियुद्ध (नपुं), बाहुयुद्ध (नपुं)
रणव्याकुलता. (2) - तुमुल (नपुं), रणसङ्कुल (नपुं) ॥2.8.106.2॥)+++
नियुद्धं बाहुयुद्धेऽथ तुमुलं रणसङ्कुले ॥2.8.106.2॥
+++(योधानां सिंहनादः. (2) - क्ष्वेडा (स्त्री), सिंहनाद (पुं)
हस्तिसङ्घः. (2) - घटना (स्त्री), घटा (स्त्री) ॥2.8.107.1॥)+++
क्ष्वेडा तु सिंहनादः स्यात्करिणां घटना घटा ॥2.8.107.1॥
+++(स्पर्धया योधनामाह्वानम्. (2) - क्रन्दन (नपुं), योधसंराव (पुं)
हस्तिगर्जनम्. (2) - बृंहित (नपुं), करिगर्जित (नपुं) ॥2.8.107.2॥)+++
क्रन्दनं योधसंरावो बृंहितं करिगर्जितम् ॥2.8.107.2॥
+++(धनुषः शब्दः. (1) - विस्फार (पुं)
युद्धपटहः. (2) - पटह (पुं), आडम्बर (पुं) ॥2.8.108.1॥)+++
विस्फारो धनुषः स्वानः पताहाडम्बरो समौ ॥2.8.108.1॥
+++(बलात्कारः. (3) - प्रसभ (नपुं), बलात्कार (पुं), हठ (पुं)
युद्धमर्यादायाश्चलनम्. (2) - स्खलित (नपुं), छल (नपुं) ॥2.8.108.2॥)+++
प्रसभं तु बलात्कारो हठोऽथ स्खलितं छलम् ॥2.8.108.2॥
मूलम्
अजन्यं क्लीबमुत्पात उपसर्गः समं त्रयम् ॥2.8.109.1॥
शब्दाः
शुभाशुभसूचकः. (3) - अजन्य (नपुं), उत्पात (पुं), उपसर्ग (पुं) ॥2.8.109.1॥
+++(मूर्च्छा. (3) - मूर्छा (स्त्री), कश्मल (नपुं), मोह (पुं)
परचक्र पीडनम्. (2) - अवमर्द (पुं), पीडन (नपुं) ॥2.8.109.2॥)+++
मूर्छा तु कश्मलं मोहोऽप्यवमर्दस्तु पीडनम् ॥2.8.109.2॥
+++(छलादाक्रमणम्. (2) - अभ्यवस्कन्दन (नपुं), अभ्यासादन (नपुं)
विजयः. (2) - विजय (पुं), जय (पुं) ॥2.8.110.1॥)+++
अभ्यवस्कन्दनं त्वभ्यासादनं विजयो जयः ॥2.8.110.1॥
मूलम्
वैरशुद्धिः प्रतीकारो वैरनिर्यातनं च सा ॥2.8.110.2॥
शब्दाः
वैरशोधनम्. (3) - वैरशुद्धि (स्त्री), प्रतीकार (पुं), वैरनिर्यातन (नपुं) ॥2.8.110.2॥
मूलम्
प्रद्रावोद्द्रावसंद्रावसंदावा विद्रवो द्रवः ॥2.8.111.1॥
शब्दाः
पलायनम्. (6) - प्रद्राव (पुं), उद्द्राव (पुं), सन्द्राव (पुं), सन्दाव (पुं), विद्रव (पुं), द्रव (पुं) ॥2.8.111.1॥
+++(पलायनम्. (2) - अपक्रम (पुं), अपयान (नपुं)
पराजयः. (2) - भङ्ग (पुं), पराजय (पुं) ॥2.8.111.2॥)+++
अपक्रमोऽपयानं च रणे भङ्गः पराजयः ॥2.8.111.2॥
+++(निर्जितः. (2) - पराजित (वि), पराभूत (वि)
निलीनः. (2) - नष्ट (वि), तिरोहित (वि) ॥2.8.112.1॥)+++
पराजितपराभूतौ त्रिषु नष्टतिरोहितौ ॥2.8.112.1॥
मूलम्
प्रमापणं निबर्हणं निकारणं विशारणम् ॥2.8.112.2॥
शब्दाः
मारणम्. (4) - प्रमापण (नपुं), निबर्हण (नपुं), निकारण (नपुं), विशारण (नपुं) ॥2.8.112.2॥
मूलम्
प्रवासनं परासनं निषूदनं निहिंसनम् ॥2.8.113.1॥
शब्दाः
मारणम्. (4) - प्रवासन (नपुं), परासन (नपुं), निषूदन (नपुं), निहिंसन (नपुं) ॥2.8.113.1॥
मूलम्
निर्वासनं संज्ञपनं निर्ग्रन्थनमपासनम् ॥2.8.113.2॥
शब्दाः
मारणम्. (4) - निर्वासन (नपुं), संज्ञपन (नपुं), निर्ग्रन्थन (नपुं), अपासन (नपुं) ॥2.8.113.2॥
मूलम्
निस्तर्हणं निहननं क्षणनं परिवर्जनम् ॥2.8.114.1॥
शब्दाः
मारणम्. (4) - निस्तर्हण (नपुं), निहनन (नपुं), क्षणन (नपुं), परिवर्जन (नपुं) ॥2.8.114.1॥
मूलम्
निर्वापणं विशसनं मारणं प्रतिघातनम् ॥2.8.114.2॥
शब्दाः
मारणम्. (4) - निर्वापण (नपुं), विशसन (नपुं), मारण (नपुं), प्रतिघातन (नपुं) ॥2.8.114.2॥
मूलम्
उद्वासनप्रमथनक्रथनोज्जासनानि च ॥2.8.115.1॥
शब्दाः
मारणम्. (4) - उद्वासन (नपुं), प्रमथन (नपुं), क्रथन (नपुं), उज्जासन (नपुं) ॥2.8.115.1॥
मूलम्
आलम्भपिञ्जविशरघातोन्माथवधा अपि ॥2.8.115.2॥
शब्दाः
मारणम्. (6) - आलम्भ (पुं), पिञ्ज (पुं), विशर (पुं), घात (पुं), उन्माथ (पुं), वध (पुं) ॥2.8.115.2॥
मूलम्
स्यात्पञ्चता कालधर्मो दिष्टान्तः प्रलयोऽत्ययः ॥2.8.116.1॥
शब्दाः
मरणम्. (5) - पञ्चता (स्त्री), कालधर्म (पुं), दिष्टान्त (पुं), प्रलय (पुं), अत्यय (पुं) ॥2.8.116.1॥
मूलम्
अन्तो नाशो द्वयोर्मृत्युर्मरणं निधनोऽस्त्रियाम् ॥2.8.116.2॥
शब्दाः
मरणम्. (5) - अन्त (पुं), नाश (पुं), मृत्यु (स्त्री-पुं), मरण (नपुं), निधन (पुं-नपुं) ॥2.8.116.2॥
मूलम्
परासुप्राप्तपञ्चत्वपरेतप्रेतसंस्थिताः ॥2.8.117.1॥
शब्दाः
मृतः. (5) - परासु (वि), प्राप्तपञ्चत्व (वि), परेत (वि), प्रेत (वि), संस्थित (वि) ॥2.8.117.1॥
+++(मृतः. (2) - मृत (वि), प्रमीत (वि)
चिता. (3) - चिता (स्त्री), चित्या (स्त्री), चिति (स्त्री) ॥2.8.117.2॥)+++
मृतप्रमीतौ त्रिष्वेते चिता चित्या चितिः स्त्रियाम् ॥2.8.117.2॥
मूलम्
कबन्धोऽस्त्री क्रियायुक्तमपमूर्धकलेवरम् ॥2.8.118.1॥
शब्दाः
छिन्नशिरसः शरीरम्. (1) - कबन्ध (पुं-नपुं) ॥2.8.118.1॥
+++(प्रेतभूमिः. (2) - श्मशान (नपुं), पितृवन (नपुं)
मृतशरीरम्. (2) - कुणप (नपुं), शव (पुं-नपुं) ॥2.8.118.2॥)+++
श्मशानं स्यात्पितृवनं कुणपः शवमस्त्रियाम् ॥2.8.118.2॥
+++(बन्दिशाला. (3) - प्रग्रह (पुं), उपग्रह (पुं), वन्दी (स्त्री)
बन्धनगृहम्. (2) - कारा (स्त्री), बन्धनालय (पुं) ॥2.8.119.1॥)+++
प्रग्रहोपग्रहौ बन्द्यां कारा स्यात्बन्धनालये ॥2.8.119.1॥
+++(पञ्चवायवः. (2) - असु (पुं-बहु), प्राण (पुं)
जीवनम्. (2) - जीव (पुं), असुधारण (नपुं) ॥2.8.119.2॥)+++
पूंसि भूम्न्यसवः प्राणाश्चैवं जीवोऽसुधारणम् ॥2.8.119.2॥
+++(जीवावच्छिन्नकालः. (2) - आयुस् (नपुं), जीवितकाल (पुं)
मृतसञ्जीवनौषधः. (2) - जीवातु (पुं), जीवनौषध (नपुं) ॥2.8.120.1॥)+++
आयुर्जीवितकालो ना जीवतुर्जीवनौषधम् ॥2.8.120.1॥