०३२ रावण-बन्धनम्

[द्वात्रिंशः सर्गः]

सर्वाष् टीकाः
भागसूचना
  1. अर्जुनकी भुजाओंसे नर्मदाके प्रवाहका अवरुद्ध होना, रावणके पुष्पोपहारका बह जाना, फिर रावण आदि निशाचरोंका अर्जुनके साथ युद्ध तथा अर्जुनका रावणको कैद करके अपने नगरमें ले जाना
विश्वास-प्रस्तुतिः

नर्मदापुलिने यत्र राक्षसेन्द्रः स दारुणः ।
पुष्पोपहारं कुरुते तस्माद् देशाददूरतः ॥ १ ॥
अर्जुनो जयतां श्रेष्ठो माहिष्मत्याः पतिः प्रभुः ।
क्रीडते सह नारीभिर्नर्मदातोयमाश्रितः ॥ २ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

नर्मदापुलिने यत्र राक्षसेन्द्रः स दारुणः ।
पुष्पोपहारं कुरुते तस्माद् देशाददूरतः ॥ १ ॥
अर्जुनो जयतां श्रेष्ठो माहिष्मत्याः पतिः प्रभुः ।
क्रीडते सह नारीभिर्नर्मदातोयमाश्रितः ॥ २ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘नर्मदाजीके तटपर जहाँ क्रूर राक्षसराज रावण महादेवजीको फूलोंका उपहार अर्पित कर रहा था, उस स्थानसे थोड़ी दूरपर विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ माहिष्मतीपुरीका शक्तिशाली राजा अर्जुन अपनी स्त्रियोंके साथ नर्मदाके जलमें उतरकर क्रीडा कर रहा था ॥ १-२ ॥

अनुवाद (कन्नड)

क्रूरियाद राक्षसेन्द्र रावणनु नर्मदॆय तीरदल्लि ईश्वरनिगॆ पुष्पोहार अर्पिसिद स्वल्प दूरदल्ले विजयिगळल्लि श्रेष्ठ माहिष्मती पुरिय ऒडॆय शक्तिशाली राजा अर्जुननु तन्न पत्नियरॊन्दिगॆ नर्मदॆयल्लि जलक्रीडॆयाडुत्तिद्दनु.॥1-2॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तासां मध्यगतो राजा रराज च तदार्जुनः ।
करेणूनां सहस्रस्य मध्यस्थ इव कुञ्जरः ॥ ३ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

तासां मध्यगतो राजा रराज च तदार्जुनः ।
करेणूनां सहस्रस्य मध्यस्थ इव कुञ्जरः ॥ ३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘उन सुन्दरियोंके बीचमें विराजमान राजा अर्जुन सहस्रों हथिनियोंके मध्यभागमें स्थित हुए गजराजके समान शोभा पाता था ॥ ३ ॥

अनुवाद (कन्नड)

आ सुरसुन्दरियर नडुवॆ विराजमान राजा अर्जुननु साविरारु हॆण्णानॆगळ मध्यदल्लि स्थितनाद गजराजनन्तॆ शोभिसुत्तिद्दनु.॥3॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

जिज्ञासुः स तु बाहूनां सहस्रस्योत्तमं बलम् ।
रुरोध नर्मदावेगं बाहुभिर्बहुभिर्वृतः ॥ ४ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

जिज्ञासुः स तु बाहूनां सहस्रस्योत्तमं बलम् ।
रुरोध नर्मदावेगं बाहुभिर्बहुभिर्वृतः ॥ ४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘अर्जुनके हजार भुजाएँ थीं । उनके उत्तम बलको जाँचनेके लिये उसने उन बहुसंख्यक भुजाओंद्वारा नर्मदाके वेगको रोक दिया ॥ ४ ॥

अनुवाद (कन्नड)

तनगिरुव साविर तोळुगळ बलवॆष्टॆम्बुदन्नु तिळियलु तन्न बहुसङ्ख्यक भुजगळिन्द नर्मदॆय प्रवाहवन्नु अड्डगट्टिदनु.॥4॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

कार्तवीर्यभुजासक्तं तज्जलं प्राप्य निर्मलम् ।
कूलोपहारं कुर्वाणं प्रतिस्रोतः प्रधावति ॥ ५ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

कार्तवीर्यभुजासक्तं तज्जलं प्राप्य निर्मलम् ।
कूलोपहारं कुर्वाणं प्रतिस्रोतः प्रधावति ॥ ५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘कृतवीर्य-पुत्र अर्जुनकी भुजाओंद्वारा रोका हुआ नर्मदाका वह निर्मल जल तटपर पूजा करते हुए रावणके पासतक पहुँच गया और उसी ओर उलटी गतिसे बहने लगा ॥ ५ ॥

अनुवाद (कन्नड)

कार्तवीर्यार्जुनन भुजगळिन्द तडॆद नर्मदॆय निर्मल जलवु तीरदल्लि पूजिसुत्तिद्द रावणन बळिगॆ होगि हिन्दॆ-मुन्दॆ हरियतॊडगितु.॥5॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

समीननक्रमकरः सपुष्पकुशसंस्तरः ।
स नर्मदाम्भसो वेगः प्रावृट्काल इवाबभौ ॥ ६ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

समीननक्रमकरः सपुष्पकुशसंस्तरः ।
स नर्मदाम्भसो वेगः प्रावृट्काल इवाबभौ ॥ ६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘नर्मदाके जलका वह वेग मत्स्य, नक्र, मगर, फूल और कुशास्तरणके साथ बढ़ने लगा । उसमें वर्षाकालके समान बाढ़ आ गयी ॥ ६ ॥

अनुवाद (कन्नड)

नर्मदॆय जलद आ वेगवु मत्स्य, मॊसळॆ, हूवु, कुशास्तरणगळॊन्दिगॆ, मळॆगालद महापूरदन्तॆ हॆच्चतॊडगितु.॥6॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

स वेगः कार्तवीर्येण सम्प्रेषित इवाम्भसः ।
पुष्पोपहारं सकलं रावणस्य जहार ह ॥ ७ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

स वेगः कार्तवीर्येण सम्प्रेषित इवाम्भसः ।
पुष्पोपहारं सकलं रावणस्य जहार ह ॥ ७ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘जलका वह वेग, जिसे मानो कार्तवीर्य अर्जुनने ही भेजा हो, रावणके समस्त पुष्पोपहारको बहा ले गया ॥ ७ ॥

अनुवाद (कन्नड)

कार्तवीर्यानने कळिसिदनो ऎम्बन्तॆ आ जल प्रवाहवु रावणन समस्त पुष्पोहार कॊच्चिकॊण्डु होयितु.॥7॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

रावणोऽर्धसमाप्तं तमुत्सृज्य नियमं तदा ।
नर्मदां पश्यते कान्तां प्रतिकूलां यथा प्रियाम् ॥ ८ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

रावणोऽर्धसमाप्तं तमुत्सृज्य नियमं तदा ।
नर्मदां पश्यते कान्तां प्रतिकूलां यथा प्रियाम् ॥ ८ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘रावणका वह पूजन-सम्बन्धी नियम अभी आधा ही समाप्त हुआ था, उसी दशामें उसे छोड़कर वह प्रतिकूल हुई कमनीय कान्तिवाली प्रेयसीकी भाँति नर्मदाकी ओर देखने लगा ॥ ८ ॥

अनुवाद (कन्नड)

रावणन आ पूजॆ अर्ध मुगिदित्तु अष्टे. आ स्थितियल्लि अदन्नु बिट्टु अवनु कोपिसिकॊण्ड कमनीय कान्तियुळ्ळ प्रेयसियन्नु नोडिदन्तॆ नर्मदॆयन्नु नोडतॊडगिदनु.॥8॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

पश्चिमेन तु तं दृष्ट्वा सागरोद‍्गारसन्निभम् ।
वर्धन्तमम्भसो वेगं पूर्वामाशां प्रविश्य तु ॥ ९ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

पश्चिमेन तु तं दृष्ट्वा सागरोद‍्गारसन्निभम् ।
वर्धन्तमम्भसो वेगं पूर्वामाशां प्रविश्य तु ॥ ९ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘पश्चिमसे आते और पूर्व दिशामें प्रवेश करके बढ़ते हुए जलके उस वेगको उसने देखा । वह ऐसा जान पड़ता था, मानो समुद्रमें ज्वार आ गया हो ॥ ९ ॥

अनुवाद (कन्नड)

पश्चिमदिन्द बन्दु पूर्वक्कॆ हरियुव नीरिन प्रवाहवन्नु नोडिदनु. अदु समुद्रक्कॆ भरत बन्दन्तॆ अनिसुत्तित्तु.॥9॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ततोऽनुद्‍भ्रान्तशकुनां स्वभावे परमे स्थिताम् ।
निर्विकाराङ्गनाभासामपश्यद् रावणो नदीम् ॥ १० ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

ततोऽनुद्‍भ्रान्तशकुनां स्वभावे परमे स्थिताम् ।
निर्विकाराङ्गनाभासामपश्यद् रावणो नदीम् ॥ १० ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘उसके तटवर्ती वृक्षोंपर रहनेवाले पक्षियोंमें कोई घबराहट नहीं थी । वह नदी अपनी परम उत्तम स्वाभाविक स्थितिमें स्थित थी—उसका जल पहले ही जैसा स्वच्छ एवं निर्मल दिखायी देता था । उसमें वर्षाकालिक बाढ़के समय जो मलिनता आदि विकार होते थे, उनका उस समय सर्वथा अभाव था । रावणने उस नदीको विकारशून्य हृदयवाली नारीके समान देखा ॥

अनुवाद (कन्नड)

आदरॆ नदिय तीरदल्लिद्द वृक्षगळ मेलॆ इद्द पक्षिगळु कॊञ्चवू गाबरिगॊळ्ळदॆ शान्तवागिद्दवु. नदिय स्वभावदल्लियू याव व्यत्यास काणुत्तिरलिल्ल. मळॆगालदल्लि उण्टागुव कॆसर नीरिनन्तॆ इरदॆ स्वच्छ निर्मलवागि काणुत्तित्तु. विकारशून्यळाद स्त्रीयन्तॆ इद्द आ महानदियन्नु रावणनु नोडिदनु.॥10॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

सव्येतरकराङ्गुल्या ह्यशब्दास्यो दशाननः ।
वेगप्रभवमन्वेष्टुं सोऽदिशच्छुकसारणौ ॥ ११ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

सव्येतरकराङ्गुल्या ह्यशब्दास्यो दशाननः ।
वेगप्रभवमन्वेष्टुं सोऽदिशच्छुकसारणौ ॥ ११ ॥


सव्यतेरकराङ्गुल्या ह्यशब्दास्यो दशाननः ।
वेगप्रभवमन्वेष्टुं सोऽदिशच्छुकसारणौ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘उसके मुखसे एक शब्द भी नहीं निकला । उसने मौनव्रतकी रक्षाके लिये बिना बोले ही दाहिने हाथकी अङ्गुलीसे संकेतमात्र करके बाढ़के कारणका पता लगानेके निमित्त शुक और सारणको आदेश दिया ॥ ११ ॥

अनुवाद (कन्नड)

मौनव्रतियागिद्द रावणनु बलगैय्य बॆरळिन सङ्केतदिन्द नॆरॆय कारणवेनॆन्दु तिळियलु शुक-सारणरिगॆ आदेशिसिदनु.॥11॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तौ तु रावणसन्दिष्टौ भ्रातरौ शुकसारणौ ।
व्योमान्तरगतौ वीरौ प्रस्थितौ पश्चिमामुखौ ॥ १२ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

तौ तु रावणसन्दिष्टौ भ्रातरौ शुकसारणौ ।
व्योमान्तरगतौ वीरौ प्रस्थितौ पश्चिमामुखौ ॥ १२ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘रावणका आदेश पाकर दोनों वीर भ्राता शुक और सारण आकाशमार्गसे पश्चिम दिशाकी ओर प्रस्थित हुए ॥ १२ ॥

अनुवाद (कन्नड)

रावणन आदेश पडॆद शुक-सारणरु आकाश मार्गदिन्द पश्चिमद कडॆगॆ तॆरळिदरु.॥12॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अर्धयोजनमात्रं तु गत्वा तौ रजनीचरौ ।
पश्येतां पुरुषं तोये क्रीडन्तं सहयोषितम् ॥ १३ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

अर्धयोजनमात्रं तु गत्वा तौ रजनीचरौ ।
पश्येतां पुरुषं तोये क्रीडन्तं सहयोषितम् ॥ १३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘केवल आधा योजन जानेपर ही उन दोनों निशाचरोंने एक पुरुषको स्त्रियोंके साथ जलमें क्रीडा करते देखा ॥ १३ ॥

अनुवाद (कन्नड)

केवल अर्ध योजनॆयल्लि अवरु ओर्व पुरुषनु पत्नियरॊन्दिगॆ जलक्रीडॆ माडुत्तिरुवुदन्नु नोडिदरु.॥13॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

बृहत्सालप्रतीकाशं तोयव्याकुलमूर्धजम् ।
मदरक्तान्तनयनं मदव्याकुलचेतसम् ॥ १४ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

बृहत्सालप्रतीकाशं तोयव्याकुलमूर्धजम् ।
मदरक्तान्तनयनं मदव्याकुलचेतसम् ॥ १४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘उसका शरीर विशाल सालवृक्षके समान ऊँचा था । उसके केश जलसे ओतप्रोत हो रहे थे । नेत्रप्रान्तमें मदकी लाली दिखायी दे रही थी और चित्त भी मदसे व्याकुल जान पड़ता था ॥ १४ ॥

अनुवाद (कन्नड)

अवन शरीरवु सालवृक्षदन्तॆ ऎत्तरवागित्तु, अवन कूदलु नीरिनिन्द ऒद्दॆयागित्तु. कण्णुगळु मददिन्द कॆम्पागिद्दु, चित्तवू मददिन्द व्याकुलवादन्तित्तु.॥14॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

नदीं बाहुसहस्रेण रुन्धन्तमरिमर्दनम् ।
गिरिं पादसहस्रेण रुन्धन्तमिव मेदिनीम् ॥ १५ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

नदीं बाहुसहस्रेण रुन्धन्तमरिमर्दनम् ।
गिरिं पादसहस्रेण रुन्धन्तमिव मेदिनीम् ॥ १५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘वह शत्रुमर्दन वीर अपनी सहस्र भुजाओंसे नदीके वेगको रोककर सहस्रों चरणोंसे पृथ्वीको थामे रखनेवाले पर्वतके समान शोभा पाता था ॥ १५ ॥

अनुवाद (कन्नड)

आ शत्रुमर्दन वीरनु तन्न साविर भुजगळिन्द नदिय वेगवन्नु तडॆहिडिदु, साविर चरणगळिन्द पृथिवियन्नु मॆट्टिनिन्त पर्वतदन्तॆ शोभिसुत्तिद्दनु.॥15॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

बालानां वरनारीणां सहस्रेण समावृतम् ।
समदानां करेणूनां सहस्रेणेव कुञ्जरम् ॥ १६ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

बालानां वरनारीणां सहस्रेण समावृतम् ।
समदानां करेणूनां सहस्रेणेव कुञ्जरम् ॥ १६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘नयी अवस्थाकी सहस्रों सुन्दरियाँ उसे घेरे हुए ऐसी जान पड़ती थीं, मानो सहस्रों मदमत्त हथिनियोंने किसी गजराजको घेर रखा हो ॥ १६ ॥

अनुवाद (कन्नड)

नवयौवन साविरारु सुन्दरियरु अवनन्नु सुत्तुवरॆदु, साविरारु मदमत्त हॆण्णु आनॆगळु गजराजनन्नु सुत्तुवरॆदु निन्तन्तॆ काणुत्तित्तु.॥16॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तमद्भुततरं दृष्ट्वा राक्षसौ शुकसारणौ ।
सन्निवृत्तावुपागम्य रावणं तमथोचतुः ॥ १७ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

तमद्भुततरं दृष्ट्वा राक्षसौ शुकसारणौ ।
सन्निवृत्तावुपागम्य रावणं तमथोचतुः ॥ १७ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘उस परम अद्भुत दृश्यको देखकर राक्षस शुक और सारण लौट आये और रावणके पास जाकर बोले— ॥ १७ ॥

अनुवाद (कन्नड)

आ परमाद्भुत दृश्यवन्नु नोडि राक्षसराद शुक-सारणरु मरळि रावणन बळिगॆ बन्दु हेळिदरु.॥17॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

बृहत्सालप्रतीकाशः कोऽप्यसौ राक्षसेश्वर ।
नर्मदां रोधवद् रुद्‍ध्वा क्रीडापयति योषितः ॥ १८ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

बृहत्सालप्रतीकाशः कोऽप्यसौ राक्षसेश्वर ।
नर्मदां रोधवद् रुद्‍ध्वा क्रीडापयति योषितः ॥ १८ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘राक्षसराज! यहाँसे थोड़ी ही दूरपर कोई सालवृक्षके समान विशालकाय पुरुष है, जो बाँधकी तरह नर्मदाके जलको रोककर स्त्रियोंके साथ क्रीडा कर रहा है ॥ १८ ॥

अनुवाद (कन्नड)

राक्षसराजने! इल्लिन्द स्वल्प दूरदल्लि यारो ताळॆ मरदन्तॆ विशालकाय पुरुषनु बाहुगळ अणॆकट्टिनन्तॆ नर्मदॆय नीरन्नु तडॆदु स्त्रीयरॊडनॆ क्रीडिसुत्तिरुवनु.॥18॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तेन बाहुसहस्रेण सन्निरुद्धजला नदी ।
सागरोद‍्गारसङ्काशानुद्गारान् सृजते मुहुः ॥ १९ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

तेन बाहुसहस्रेण सन्निरुद्धजला नदी ।
सागरोद‍्गारसङ्काशानुद्गारान् सृजते मुहुः ॥ १९ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘उसकी सहस्र भुजाओंसे नदीका जल रुक गया है । इसीलिये यह बारम्बार समुद्रके ज्वारकी भाँति जलके उद‍्गारकी सृष्टि कर रही है’ ॥ १९ ॥

अनुवाद (कन्नड)

अवन साविर भुजगळिन्द नदिय नीरु अड्डगट्टिरुवनु. अदरिन्द हीगॆ समुद्रद भर्तियन्तॆ नीरु उक्कुत्तिदॆ.॥19॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

इत्येवं भाषमाणौ तौ निशम्य शुकसारणौ ।
रावणोऽर्जुन इत्युक्त्वा स ययौ युद्धलालसः ॥ २० ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

इत्येवं भाषमाणौ तौ निशम्य शुकसारणौ ।
रावणोऽर्जुन इत्युक्त्वा स ययौ युद्धलालसः ॥ २० ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘इस प्रकार कहते हुए शुक और सारणकी बातें सुनकर रावण बोल उठा—‘वही अर्जुन है’ ऐसा कहकर वह युद्धकी लालसासे उसी ओर चल दिया ॥ २० ॥

अनुवाद (कन्नड)

हीगॆ हेळिद शुक-सारणर मातन्नु केळि रावणनु - अर्जुन अल्ले इद्दानॆये? ऎन्दु हेळि युद्धद इच्छॆयिन्द आ कडॆगॆ हॊरटनु.॥20॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अर्जुनाभिमुखे तस्मिन् रावणे राक्षसाधिपे ।
चण्डः प्रवाति पवनः सनादः सरजस्तथा ॥ २१ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

अर्जुनाभिमुखे तस्मिन् रावणे राक्षसाधिपे ।
चण्डः प्रवाति पवनः सनादः सरजस्तथा ॥ २१ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘राक्षसराज रावण जब अर्जुनकी ओर चला, तब धूल और भारी कोलाहलके साथ वायु प्रचण्ड वेगसे चलने लगी ॥ २१ ॥

अनुवाद (कन्नड)

राक्षसराज रावणनु अर्जुनन कडॆगॆ नडॆदाग धूळु ऎद्दु, भारी कोलाहलदॊन्दिगॆ प्रचण्ड वायु बीसतॊडगितु.॥21॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

सकृदेव कृतो रावः सरक्तपृषतो घनैः ।
महोदरमहापार्श्वधूम्राक्षशुकसारणैः ॥ २२ ॥
संवृतो राक्षसेन्द्रस्तु तत्रागाद् यत्र चार्जुनः ।

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

सकृदेव कृतो रावः सरक्तपृषतो घनैः ।
महोदरमहापार्श्वधूम्राक्षशुकसारणैः ॥ २२ ॥
संवृतो राक्षसेन्द्रस्तु तत्रागाद् यत्र चार्जुनः ।


सकृदेव कृतो रावः सरक्तपृशतो घनैः ।
महोदर महापार्श्व धूम्राक्ष शुकसारणैः ॥
संवृतो राक्षसेन्द्रस्तु तत्रागाद्यत्रचार्जुनः ।

अनुवाद (हिन्दी)

‘बादलोंने रक्तबिन्दुओंकी वर्षा करके एक बार ही बड़े जोरसे गर्जना की । इधर राक्षसराज रावण महोदर, महापार्श्व, धूम्राक्ष, शुक और सारणको साथ ले उस स्थानकी ओर चला, जहाँ अर्जुन क्रीडा कर रहा था ॥ २२ १/२ ॥

अनुवाद (कन्नड)

मोडगळु रक्तद मळॆ सुरिसि, जोरागि गर्जिसतॊडगिदवु. राक्षसराज रावणनु महोदर, महापार्श्व, धूम्राक्ष, शुक-सारणरॊन्दिगॆ अर्जुननु क्रीडिसुत्तिद्दल्लिगॆ हॊरटनु.॥22½॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अदीर्घेणैव कालेन स तदा राक्षसो बली ॥ २३ ॥
तं नर्मदाह्रदं भीममाजगामाञ्जनप्रभः ।

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

अदीर्घेणैव कालेन स तदा राक्षसो बली ॥ २३ ॥
तं नर्मदाह्रदं भीममाजगामाञ्जनप्रभः ।

अनुवाद (हिन्दी)

‘काजल या कोयलेके समान काला वह बलवान् राक्षस थोड़ी ही देरमें नर्मदाके उस भयंकर जलाशयके पास जा पहुँचा ॥ २३ १/२ ॥

अनुवाद (कन्नड)

काडिगॆ, इद्दिलिनन्तॆ कप्पाद आ बलिष्ठ रावणनु स्वल्प समयदल्ले नर्मदॆय आ भयङ्कर जलराशिय बळिगॆ होदनु.॥23½॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

स तत्र स्त्रीपरिवृतं वासिताभिरिव द्विपम् ॥ २४ ॥
नरेन्द्रं पश्यते राजा राक्षसानां तदार्जुनम् ।

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

स तत्र स्त्रीपरिवृतं वासिताभिरिव द्विपम् ॥ २४ ॥
नरेन्द्रं पश्यते राजा राक्षसानां तदार्जुनम् ।

अनुवाद (हिन्दी)

‘वहाँ पहुँचकर राक्षसोंके राजा रावणने मैथुनकी इच्छावाली हथिनियोंसे घिरे हुए गजराजके समान सुन्दरी स्त्रियोंसे परिवेष्टित महाराज अर्जुनको देखा ॥ २४ १/२ ॥

अनुवाद (कन्नड)

अल्लिगॆ होगि मैथुनद इच्छॆयुळ्ळ हॆण्णानॆगळिन्द सुत्तुवरॆद गजराजनन्तॆ, सुन्दरी पत्नीयरिन्द परिवृतनाद महाराजा अर्जुननन्नु रावणनु नोडिदनु.॥24½॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

स रोषाद् रक्तनयनो राक्षसेन्द्रो बलोद्धतः ॥ २५ ॥
इत्येवमर्जुनामात्यानाह गम्भीरया गिरा ।

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

स रोषाद् रक्तनयनो राक्षसेन्द्रो बलोद्धतः ॥ २५ ॥
इत्येवमर्जुनामात्यानाह गम्भीरया गिरा ।

अनुवाद (हिन्दी)

‘उसे देखते ही रावणके नेत्र रोषसे लाल हो गये । अपने बलके घमंडसे उद्दण्ड हुए राक्षसराजने अर्जुनके मन्त्रियोंसे गम्भीर वाणीमें इस प्रकार कहा— ॥ २५ १/२ ॥

अनुवाद (कन्नड)

अवनन्नु नोडुत्तले क्रोधदिन्द रावणन कण्णुगळु कॆम्पादवु. बलोन्मत्तनाद राक्षसराजनु अर्जुनन मन्त्रिगळल्लि गम्भीरवाणियिन्द इन्तॆन्दनु.॥25½॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अमात्याः क्षिप्रमाख्यात हैहयस्य नृपस्य वै ॥ २६ ॥
युद्धार्थं समनुप्राप्तो रावणो नाम नामतः ।

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

अमात्याः क्षिप्रमाख्यात हैहयस्य नृपस्य वै ॥ २६ ॥
युद्धार्थं समनुप्राप्तो रावणो नाम नामतः ।

अनुवाद (हिन्दी)

‘मन्त्रियो! तुम हैहयराजसे जल्दी जाकर कहो कि रावण तुमसे युद्ध करनेके लिये आया है’ ॥ २६ १/२ ॥

अनुवाद (कन्नड)

मन्त्रिगळे! नीवु हैरुय राजनल्लि बेगनॆ होगि - रावणनु निन्नॊन्दिगॆ युद्धक्कागि बन्दिरुवनु ऎन्दु तिळिसिरि.॥26½॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

रावणस्य वचः श्रुत्वा मन्त्रिणोऽथार्जुनस्य ते ॥ २७ ॥
उत्तस्थुः सायुधास्तं च रावणं वाक्यमब्रुवन् ।

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

रावणस्य वचः श्रुत्वा मन्त्रिणोऽथार्जुनस्य ते ॥ २७ ॥
उत्तस्थुः सायुधास्तं च रावणं वाक्यमब्रुवन् ।

अनुवाद (हिन्दी)

‘रावणकी बात सुनकर अर्जुनके वे मन्त्री हथियार लेकर खड़े हो गये और रावणसे इस प्रकार बोले— ॥ २७ १/२ ॥

अनुवाद (कन्नड)

रावणन मातन्नु केळि अर्जुनन आ मन्त्रिगळु आयुधगळन्नु धरिसि निन्तु रावणनल्लि हीगॆ हेळिदरु.॥27½॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

युद्धस्य कालो विज्ञातः साधु भो साधु रावण ॥ २८ ॥
यः क्षीबं स्त्रीगतं चैव योद्धुमुत्सहसे नृपम् ।

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

युद्धस्य कालो विज्ञातः साधु भो साधु रावण ॥ २८ ॥
यः क्षीबं स्त्रीगतं चैव योद्धुमुत्सहसे नृपम् ।

अनुवाद (हिन्दी)

‘वाह रे रावण! वाह! तुम्हें युद्धके अवसरका अच्छा ज्ञान है । हमारे महाराज जब मदमत्त होकर स्त्रियोंके बीचमें क्रीडा कर रहे हैं, ऐसे समयमें तुम उनके साथ युद्ध करनेके लिये उत्साहित हो रहे हो ॥ २८ १/२ ॥

अनुवाद (कन्नड)

भले, भले रावण! निनगॆ युद्धद सन्दर्भ चॆन्नागि तिळिदिदॆ. नम्म महाराजरु मदमत्तरागि पत्नियरॊन्दिगॆ क्रीडिसुत्तिरुवाग नीनु अवरॊडनॆ युद्ध माडलु उत्साहितनागिरुवॆयल्ल.॥28½॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

स्त्रीसमक्षगतं यत् त्वं योद्धुमुत्सहसे नृप ॥ २९ ॥
वासितामध्यगं मत्तं शार्दूल इव कुञ्जरम् ।

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

स्त्रीसमक्षगतं यत् त्वं योद्धुमुत्सहसे नृप ॥ २९ ॥
वासितामध्यगं मत्तं शार्दूल इव कुञ्जरम् ।


स्त्रीसमक्षगतं युत्त्वं योद्धु मुत्सहसे नृप ॥
वासितामध्यगं मत्तं शार्दूल इव कुञ्जरम् ।

अनुवाद (हिन्दी)

‘जैसे कोई व्याघ्र कामवासनासे वासित हथिनियोंके बीचमें खड़े हुए गजराजसे जूझना चाहता हो, उसी प्रकार तुम स्त्रियोंके समक्ष क्रीडा-विलासमें तत्पर हुए राजा अर्जुनके साथ युद्ध करनेका हौसला दिखा रहे हो ॥ २९ १/२ ॥

अनुवाद (कन्नड)

समागमवन्नु बयसिद हॆण्णानॆगळिन्द सुत्तुवरि यल्पट्ट सलगनॊडनॆ काळग माडलु इच्छिसुव सिंहदन्तॆ, नीनु स्त्रीयरॊडनॆ नम्म राजरु इरुवाग युद्ध माडलुइच्छिसुत्तिरुवॆयल्ल.॥29½॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

क्षमस्वाद्य दशग्रीव उष्यतां रजनी त्वया ।
युद्धे श्रद्धा तु यद्यस्ति श्वस्तात समरेऽर्जुनम् ॥ ३० ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

क्षमस्वाद्य दशग्रीव उष्यतां रजनी त्वया ।
युद्धे श्रद्धा तु यद्यस्ति श्वस्तात समरेऽर्जुनम् ॥ ३० ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘तात! दशग्रीव! यदि तुम्हारे हृदयमें युद्धके लिये उत्साह है, तो रातभर क्षमा करो और आजकी रातमें यहीं ठहरो । फिर कल सबेरे तुम राजा अर्जुनको समराङ्गणमें उपस्थित देखोगे ॥ ३० ॥

अनुवाद (कन्नड)

अय्या दशग्रीवने! निन्न मनस्सिनल्लि युद्धद उत्साहविद्दरॆ ई रात्रि कळॆयुववरॆगॆ क्षमिसु. इन्दिन रात्रॆ इल्ले इद्दु, बॆळगागुत्तले राजा अर्जुननन्नु युद्ध सन्नद्धनादुदन्नु नोडुवॆयन्तॆ.॥30॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

यदि वापि त्वरा तुभ्यं युद्धतृष्णासमावृता ।
निपात्यास्मान् रणे युद्धमर्जुनेनोपयास्यसि ॥ ३१ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

यदि वापि त्वरा तुभ्यं युद्धतृष्णासमावृता ।
निपात्यास्मान् रणे युद्धमर्जुनेनोपयास्यसि ॥ ३१ ॥


यदि वापि त्वरा तुभ्यं युद्धतृष्णा समावृत ।
निपात्यास्मान्रणे युद्धमर्जुनेनोपयास्यसि ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘युद्धकी तृष्णासे घिरे हुए राक्षसराज! यदि तुम्हें जूझनेके लिये बड़ी जल्दी लगी हो तो पहले रणभूमिमें हम सबको मार गिराओ । उसके बाद महाराज अर्जुनके साथ युद्ध करने पाओगे’ ॥ ३१ ॥

अनुवाद (कन्नड)

युद्धद तृष्णॆयिन्द समावृतनाद राक्षसराजने! निनगॆ युद्धक्कागि बहळ अवसरविद्दरॆ, मॊदलु नम्मॊडनॆ युद्ध माडि, अनन्तर महाराजा अर्जुननॊडनॆ युद्ध माडबहुदु.॥31॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ततस्तै रावणामात्यैरमात्यास्ते नृपस्य तु ।
सूदिताश्चापि ते युद्धे भक्षिताश्च बुभुक्षितैः ॥ ३२ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

ततस्तै रावणामात्यैरमात्यास्ते नृपस्य तु ।
सूदिताश्चापि ते युद्धे भक्षिताश्च बुभुक्षितैः ॥ ३२ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘यह सुनकर रावणके भूखे मन्त्री युद्धस्थलमें अर्जुनके अमात्योंको मार-मारकर खाने लगे ॥ ३२ ॥

अनुवाद (कन्नड)

इदन्नु केळि रावणन हसिद मन्त्रिगळु युद्धदल्लि अर्जुनन अमात्यरन्नु कॊन्दु तिन्नतॊडगिदरु.॥32॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ततो हलहलाशब्दो नर्मदातीरगो बभौ ।
अर्जुनस्यानुयात्राणां रावणस्य च मन्त्रिणाम् ॥ ३३ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

ततो हलहलाशब्दो नर्मदातीरगो बभौ ।
अर्जुनस्यानुयात्राणां रावणस्य च मन्त्रिणाम् ॥ ३३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘इससे अर्जुनके अनुयायियों तथा रावणके मन्त्रियोंका नर्मदाके तटपर बड़ा कोलाहल होने लगा ॥ ३३ ॥

अनुवाद (कन्नड)

इदरिन्द अर्जुनन अनुयायिगळु हागू रावणन मन्त्रिगळ भारी कोलाहल आ नर्मदा तीरदल्लि उण्टायितु.॥33॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

इषुभिस्तोमरैः प्रासैस्त्रिशूलैर्वज्रकर्षणैः ।
सरावणानर्दयन्तः समन्तात् समभिद्रुताः ॥ ३४ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

इषुभिस्तोमरैः प्रासैस्त्रिशूलैर्वज्रकर्षणैः ।
सरावणानर्दयन्तः समन्तात् समभिद्रुताः ॥ ३४ ॥


इषुभिस्तोमरैः प्रासैस्त्रिशूलॆೖर्वज्रकर्षणैः ।
सरावणानर्दयन्तः समन्तात्समभिद्रुताः ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘अर्जुनके योद्धा बाणों, तोमरों, भालों, त्रिशूलों और वज्रकर्षण नामक शस्त्रोंद्वारा चारों ओरसे धावा करके रावणसहित समस्त राक्षसोंको घायल करने लगे ॥ ३४ ॥

अनुवाद (कन्नड)

अर्जुनन योधरु बाण, तोमर, भल्लॆ, त्रिशूल, वज्रकर्षण ऎम्ब शस्त्रगळिन्द नाल्कु कडॆगळिन्द आक्रमिसि रावणसहित समस्त राक्षसरन्नु गायगॊळिसिदरु.॥34॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

हैहयाधिपयोधानां वेग आसीत् सुदारुणः ।
सनक्रमीनमकरसमुद्रस्येव निःस्वनः ॥ ३५ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

हैहयाधिपयोधानां वेग आसीत् सुदारुणः ।
सनक्रमीनमकरसमुद्रस्येव निःस्वनः ॥ ३५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘हैहयराजके योद्धाओंका वेग नाकों, मत्स्यों और मगरोंसहित समुद्रकी भीषण गर्जनाके समान अत्यन्त भयंकर जान पड़ता था ॥ ३५ ॥

अनुवाद (कन्नड)

हैहय राजन योधर वेगवु, मीनु मॊसळॆगळ सहित समुद्रद भीषण गर्जनॆयन्तॆ अत्यन्त भयङ्करवागि अनिसुत्तित्तु.॥35॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

रावणस्य तु तेऽमात्याः प्रहस्तशुकसारणाः ।
कार्तवीर्यबलं क्रुद्धा निहन्ति स्म स्वतेजसा ॥ ३६ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

रावणस्य तु तेऽमात्याः प्रहस्तशुकसारणाः ।
कार्तवीर्यबलं क्रुद्धा निहन्ति स्म स्वतेजसा ॥ ३६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘रावणके वे मन्त्री प्रहस्त, शुक और सारण आदि कुपित हो अपने बल-पराक्रमसे कार्तवीर्य अर्जुनकी सेनाका संहार करने लगे ॥ ३६ ॥

अनुवाद (कन्नड)

रावणन मन्त्रिगळाद प्रहस्त, शुक - सारण मुन्तादवरु कुपितरागि तम्म बलपराक्रमदिन्द कार्तवीर्यार्जुनन सैन्यवन्नु संहरिसतॊडगिदरु.॥36॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अर्जुनाय तु तत्कर्म रावणस्य समन्त्रिणः ।
क्रीडमानाय कथितं पुरुषैर्भयविह्वलैः ॥ ३७ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

अर्जुनाय तु तत्कर्म रावणस्य समन्त्रिणः ।
क्रीडमानाय कथितं पुरुषैर्भयविह्वलैः ॥ ३७ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘तब अर्जुनके सेवकोंने भयसे विह्वल होकर क्रीडामें लगे हुए अर्जुनसे मन्त्रीसहित रावणके उस क्रूर कर्मका समाचार सुनाया ॥ ३७ ॥

अनुवाद (कन्नड)

आग अर्जुनन सेवकरु भयदिन्द विह्वलरागि क्रीडॆयल्लि तॊडगिद्द अर्जुननल्लि मन्त्रिगळ सहित रावणन आ क्रूरकर्मद समाचार तिळिसिदरु.॥37॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

श्रुत्वा न भेतव्यमिति स्त्रीजनं स तदार्जुनः ।
उत्ततार जलात् तस्माद् गङ्गातोयादिवाञ्जनः ॥ ३८ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

श्रुत्वा न भेतव्यमिति स्त्रीजनं स तदार्जुनः ।
उत्ततार जलात् तस्माद् गङ्गातोयादिवाञ्जनः ॥ ३८ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘सुनकर अर्जुनने अपनी स्त्रियोंसे कहा—‘तुम सब लोग डरना मत ।’ फिर उन सबके साथ वह नर्मदाके जलसे उसी तरह बाहर निकला, जैसे कोई दिग्गज (हथिनियोंके साथ) गङ्गाजीके जलसे बाहर निकला हो ॥ ३८ ॥

अनुवाद (कन्नड)

केळि अर्जुननु तन्न पत्नियल्लि- नीवॆल्लरू हॆदरबेडि ऎन्दु हेळिदनु. मत्तॆ अवरॆल्लरॊन्दिगॆ दिग्गजवु हॆण्णानॆगळॊन्दिगॆ गङ्गॆयिन्द हॊरगॆ बरुवन्तॆ, नर्मदा जलदिन्द हॊरबन्दनु.॥38॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

क्रोधदूषितनेत्रस्तु स तदार्जुनपावकः ।
प्रजज्वाल महाघोरो युगान्त इव पावकः ॥ ३९ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

क्रोधदूषितनेत्रस्तु स तदार्जुनपावकः ।
प्रजज्वाल महाघोरो युगान्त इव पावकः ॥ ३९ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘उसके नेत्र रोषसे रक्तवर्णके हो गये । वह अर्जुनरूपी अनल प्रलयकालके महाभयंकर पावककी भाँति प्रज्वलित हो उठा ॥ ३९ ॥

अनुवाद (कन्नड)

अवन कण्णुगळु रोषदिन्द कॆम्पागि आ अर्जुननु प्रळयकालद महाभयङ्कर पावकदन्तॆ प्रज्वलितनादनु.॥39॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

स तूर्णतरमादाय वरहेमाङ्गदो गदाम् ।
अभिदुद्राव रक्षांसि तमांसीव दिवाकरः ॥ ४० ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

स तूर्णतरमादाय वरहेमाङ्गदो गदाम् ।
अभिदुद्राव रक्षांसि तमांसीव दिवाकरः ॥ ४० ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘सुन्दर सोनेका बाजूबंद धारण करनेवाले वीर अर्जुनने तुरंत ही गदा उठा ली और उन राक्षसोंपर आक्रमण किया, मानो सूर्यदेव अन्धकार-समूहपर टूट पड़े हों ॥ ४० ॥

अनुवाद (कन्नड)

सुन्दर स्वर्ण अङ्गदगळन्नु धरिसुव वीर अर्जुननु कूडले गदॆयन्नॆत्तिकॊण्डु आ राक्षसरन्नु सूर्यनु अन्धकारद मेलॆ आक्रमिसुवन्तॆ आक्रमिसिदनु.॥40॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

बाहुविक्षेपकरणां समुद्यम्य महागदाम् ।
गारुडं वेगमास्थाय आपपातैव सोऽर्जुनः ॥ ४१ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

बाहुविक्षेपकरणां समुद्यम्य महागदाम् ।
गारुडं वेगमास्थाय आपपातैव सोऽर्जुनः ॥ ४१ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘जो भुजाओंद्वारा घुमायी जाती थी उस विशाल गदाको ऊपर उठाकर गरुड़के समान तीव्र वेगका आश्रय ले राजा अर्जुन तत्काल ही उन निशाचरोंपर टूट पड़ा ॥ ४१ ॥

अनुवाद (कन्नड)

भुजगळिन्द तिरुहुत्तिरुव आ विशाल गदॆयन्नॆत्ति गरुडन वेगदन्तॆ राजा अर्जुननु निशाचरर मेलॆरगिदनु.॥41॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तस्य मार्गं समारुद्ध्य विन्ध्योऽर्कस्येव पर्वतः ।
स्थितो विन्ध्य इवाकम्प्यः प्रहस्तो मुसलायुधः ॥ ४२ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

तस्य मार्गं समारुद्ध्य विन्ध्योऽर्कस्येव पर्वतः ।
स्थितो विन्ध्य इवाकम्प्यः प्रहस्तो मुसलायुधः ॥ ४२ ॥


तस्य मार्गं समारुद्ध्य विन्ध्यॊऽर्कस्येव पर्वतः ।
स्थितो विन्ध्य इवाकम्प्यः प्रहस्तो मुसलायुधः ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘उस समय मूसलधारी प्रहस्त, जो विन्ध्यगिरिके समान अविचल था, उसका मार्ग रोककर खड़ा हो गया । ठीक उसी तरह, जैसे पूर्वकालमें विन्ध्याचलने सूर्यदेवका मार्ग रोक लिया था ॥ ४२ ॥

अनुवाद (कन्नड)

आग मुसलधारी प्रहस्तनु हिन्दॆ विन्ध्याचलवु सूर्यपथवन्नु तडॆदन्तॆ, विन्ध्यगिरियन्तॆ अविचलनागि अर्जुननन्नु तडॆदु निन्तनु.॥42॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ततोऽस्य मुसलं घोरं लोहबद्धं मदोद्धतः ।
प्रहस्तः प्रेषयन् क्रुद्धो ररास च यथान्तकः ॥ ४३ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

ततोऽस्य मुसलं घोरं लोहबद्धं मदोद्धतः ।
प्रहस्तः प्रेषयन् क्रुद्धो ररास च यथान्तकः ॥ ४३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘मदसे उद्दण्ड हुए प्रहस्तने कुपित हो अर्जुनपर लोहेसे मढ़ा हुआ एक भयंकर मूसल चलाया और कालके समान भीषण गर्जना की ॥ ४३ ॥

अनुवाद (कन्नड)

मदोन्मत्तनाद प्रहस्तनु कुपितनागि अर्जुनन मेलॆ लोहमय ऒन्दु भयङ्कर मुसलायुधवन्नु प्रयोगिसि भीषण गर्जनॆ माडिदनु.॥43॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तस्याग्रे मुसलस्याग्निरशोकापीडसन्निभः ।
प्रहस्तकरमुक्तस्य बभूव प्रदहन्निव ॥ ४४ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

तस्याग्रे मुसलस्याग्निरशोकापीडसन्निभः ।
प्रहस्तकरमुक्तस्य बभूव प्रदहन्निव ॥ ४४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘प्रहस्तके हाथसे छूटे हुए उस मूसलके अग्रभागमें अशोक-पुष्पके समान लाल रंगकी आग प्रकट हो गयी, जो जलाती हुई-सी जान पड़ती थी ॥ ४४ ॥

अनुवाद (कन्नड)

प्रहस्तनु प्रयोगिसिद आ मुसलद तुदियिन्द अनेक पुष्पगळन्तॆ कॆम्पाद बॆङ्कियु प्रकटवागि उरियतॊडगितु.॥44॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

आधावमानं मुसलं कार्तवीर्यस्तदार्जुनः ।
निपुणं वञ्चयामास गदया गतविक्लवः ॥ ४५ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

आधावमानं मुसलं कार्तवीर्यस्तदार्जुनः ।
निपुणं वञ्चयामास गदया गतविक्लवः ॥ ४५ ॥


अधावमानं मुसलं कार्तवीर्यस्तदार्जुनः ।
निपुणं वञ्चयामास गदया गतविक्लवः ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘किंतु कार्तवीर्य अर्जुनको इससे तनिक भी भय नहीं हुआ । उसने अपनी ओर वेगपूर्वक आते हुए उस मूसलको गदा मारकर पूर्णतः विफल कर दिया ॥ ४५ ॥

अनुवाद (कन्नड)

आदरॆ कार्तवीर्यार्जुननु कॊञ्चवू भयपडदॆ, तन्न कडॆगॆ वेगवागि बरुत्तिद्द मुसलायुधवन्नु गदॆयिन्द हॊडॆदु विफलवागिसिदनु.॥45॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ततस्तमभिदुद्राव सगदो हैहयाधिपः ।
भ्रामयाणो गदां गुर्वीं पञ्चबाहुशतोच्छ्रयाम् ॥ ४६ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

ततस्तमभिदुद्राव सगदो हैहयाधिपः ।
भ्रामयाणो गदां गुर्वीं पञ्चबाहुशतोच्छ्रयाम् ॥ ४६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘तत्पश्चात् गदाधारी हैहयराज, जिसे पाँच सौ भुजाओंसे उठाकर चलाया जाता था, उस भारी गदाको घुमाता हुआ प्रहस्तकी ओर दौड़ा ॥ ४६ ॥

अनुवाद (कन्नड)

बळिक गदाधारी हैहयराजनु ऐदुनूरु भुजगळिन्द ऎत्ति प्रयोगिसुव आ भारी गदॆयन्नु तिरुगिसुत्ता प्रहस्तन कडॆगॆ ओडिदनु.॥46॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ततो हतोऽतिवेगेन प्रहस्तो गदया तदा ।
निपपात स्थितः शैलो वज्रिवज्रहतो यथा ॥ ४७ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

ततो हतोऽतिवेगेन प्रहस्तो गदया तदा ।
निपपात स्थितः शैलो वज्रिवज्रहतो यथा ॥ ४७ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘उस गदासे अत्यन्त वेगपूर्वक आहत होकर प्रहस्त तत्काल पृथ्वीपर गिर पड़ा, मानो कोई पर्वत वज्रधारी इन्द्रके वज्रका आघात पाकर ढह गया हो ॥

अनुवाद (कन्नड)

आ गदॆयिन्द वेगवागि आहतनाद प्रहस्तनु वज्रधारी इन्द्रन वज्राघातदिन्द पर्वतवु कुसियुवन्तॆ कूडले नॆलक्कॆ बिद्दुबिट्टनु.॥47॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

प्रहस्तं पतितं दृष्ट्वा मारीचशुकसारणाः ।
समहोदरधूम्राक्षा अपसृष्टा रणाजिरात् ॥ ४८ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

प्रहस्तं पतितं दृष्ट्वा मारीचशुकसारणाः ।
समहोदरधूम्राक्षा अपसृष्टा रणाजिरात् ॥ ४८ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘प्रहस्तको धराशायी हुआ देख मारीच, शुक, सारण, महोदर और धूम्राक्ष समराङ्गणसे भाग खड़े हुए ॥

अनुवाद (कन्नड)

प्रहस्तनु धराशायियादुदन्नु नोडि मारीच, शुक-सारण, महोदर, धूम्राक्ष इवरु समराङ्गणदिन्द ओडिहोदरु.॥48॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अपक्रान्तेष्वमात्येषु प्रहस्ते च निपातिते ।
रावणोऽभ्यद्रवत् तूर्णमर्जुनं नृपसत्तमम् ॥ ४९ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

अपक्रान्तेष्वमात्येषु प्रहस्ते च निपातिते ।
रावणोऽभ्यद्रवत् तूर्णमर्जुनं नृपसत्तमम् ॥ ४९ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘प्रहस्तके गिरने और अमात्योंके भाग जानेपर रावणने नृपश्रेष्ठ अर्जुनपर तत्काल धावा किया ॥ ४९ ॥

अनुवाद (कन्नड)

प्रहस्तनु बिद्दु, अमात्यरु ओडिहोदाग रावणनु नृपश्रेष्ठ अर्जुनन मेलॆ आक्रमण माडिदनु.॥49॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

सहस्रबाहोस्तद् युद्धं विंशद‍्बाहोश्च दारुणम् ।
नृपराक्षसयोस्तत्र आरब्धं रोमहर्षणम् ॥ ५० ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

सहस्रबाहोस्तद् युद्धं विंशद‍्बाहोश्च दारुणम् ।
नृपराक्षसयोस्तत्र आरब्धं रोमहर्षणम् ॥ ५० ॥


सहस्रबाहोस्तद्युद्धं विंशद्भाहोश्च दारुणम् ।
नृपराक्षसयोस्तत्र आरब्धं रोमहर्षणम् ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘फिर तो हजार भुजाओंवाले नरनाथ और बीस भुजाओंवाले निशाचरनाथमें वहाँ भयंकर युद्ध आरम्भ हो गया, जो रोंगटे खड़े कर देनेवाला था ॥ ५० ॥

अनुवाद (कन्नड)

मत्तॆ साविर भुजवुळ्ळ नरनाथ मत्तु इप्पत्तु तोळुगळुळ्ळ निशाचरनाथरल्लि अल्लि रोमाञ्चकर भयङ्कर युद्ध प्रारम्भवायितु.॥50॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

सागराविव सङ्क्षुब्धौ चलमूलाविवाचलौ ।
तेजोयुक्ताविवादित्यौ प्रदहन्ताविवानलौ ॥ ५१ ॥
बलोद्धतौ यथा नागौ वासितार्थे यथा वृषौ ।
मेघाविव विनर्दन्तौ सिंहाविव बलोत्कटौ ॥ ५२ ॥
रुद्रकालाविव क्रुद्धौ तौ तदा राक्षसार्जुनौ ।
परस्परं गदां गृह्य ताडयामासतुर्भृशम् ॥ ५३ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

सागराविव सङ्क्षुब्धौ चलमूलाविवाचलौ ।
तेजोयुक्ताविवादित्यौ प्रदहन्ताविवानलौ ॥ ५१ ॥
बलोद्धतौ यथा नागौ वासितार्थे यथा वृषौ ।
मेघाविव विनर्दन्तौ सिंहाविव बलोत्कटौ ॥ ५२ ॥
रुद्रकालाविव क्रुद्धौ तौ तदा राक्षसार्जुनौ ।
परस्परं गदां गृह्य ताडयामासतुर्भृशम् ॥ ५३ ॥


सागराविव सङ्क्षुब्धौ चलमूला विवाचलौ ।
तेजोयुक्ता विवादित्यौ प्रदहन्ताविवानलौ ॥ बलोद्धतौ यथा नागौ वासितार्थे यथा वृषौ ।
मेघाविव विनर्दन्तौ सिंहाविव बलोत्तटौ ॥ रुद्रकालाविव क्रुद्धौ तौ तदा राक्षसार्जुनौ ।
परस्परं गदां गृह्य ताडयामासतुर्भृशम् ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘विक्षुब्ध हुए दो समुद्रों, जिनकी जड़ हिल रही हों ऐसे दो पर्वतों, दो तेजस्वी आदित्यों, दो दाहक अग्नियों, बलसे उन्मत्त हुए दो गजराजों, कामवासनावाली गायके लिये लड़नेवाले दो साँड़ों, जोर-जोरसे गर्जनेवाले दो मेघों, उत्कट बलशाली दो सिंहों तथा क्रोधसे भरे हुए रुद्र और कालदेवके समान वे रावण और अर्जुन गदा लेकर एक-दूसरेपर गहरी चोटें करने लगे ॥ ५१—५३ ॥

अनुवाद (कन्नड)

विक्षुब्धवाद ऎरडु समुद्रगळन्तॆ, बुड अल्लाडुव ऎरडु पर्वतगळन्तॆ, ऎरडु तेजस्वी आदित्यरन्तॆ, ऎरडु उरियुव अग्निगळन्तॆ, बलोन्मत्तवाद ऎरडु गजराजरन्तॆ, अलॆ बन्द हसुविगागि कादाडुव ऎरडु गूळिगळन्तॆ, जोरागि गर्जिसुव ऎरडु मेघगळन्तॆ, बलशालि ऎरडु सिंहगळन्तॆ, क्रोधगॊण्ड रुद्र मत्तु कालनन्तॆ रावण हागू अर्जुनरु गदॆयन्नॆत्तिकॊण्डु परस्पर हॊडॆदाडतॊडगिदरु.॥51-53॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

वज्रप्रहारानचला यथा घोरान् विषेहिरे ।
गदाप्रहारांस्तौ तत्र सेहाते नरराक्षसौ ॥ ५४ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

वज्रप्रहारानचला यथा घोरान् विषेहिरे ।
गदाप्रहारांस्तौ तत्र सेहाते नरराक्षसौ ॥ ५४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘जैसे पूर्वकालमें पर्वतोंने वज्रके भयंकर आघात सहे थे, उसी प्रकार वे अर्जुन और रावण वहाँ गदाओंके प्रहार सहन करते थे ॥ ५४ ॥

अनुवाद (कन्नड)

हिन्दॆ पर्वतगळु भयङ्कर वज्राघातवन्नु सहिसिदन्तॆ आ अर्जुन, रावणरु गदॆगळ प्रहारगळन्नु सहिसुत्तिद्दरु.॥54॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

यथाशनिरवेभ्यस्तु जायतेऽथ प्रतिश्रुतिः ।
तथा तयोर्गदापोथैर्दिशः सर्वाः प्रतिश्रुताः ॥ ५५ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

यथाशनिरवेभ्यस्तु जायतेऽथ प्रतिश्रुतिः ।
तथा तयोर्गदापोथैर्दिशः सर्वाः प्रतिश्रुताः ॥ ५५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘जैसे बिजलीकी कड़कसे सम्पूर्ण दिशाएँ प्रतिध्वनित हो उठती हैं, उसी प्रकार उन दोनों वीरोंकी गदाओंके आघातोंसे सभी दिशाएँ गूँजने लगीं ॥ ५५ ॥

अनुवाद (कन्नड)

सिडिलिन शब्दवु ऎल्ल दिक्कुगळन्नु प्रतिध्वनिसु वन्तॆ आ वीररिब्बर गदाघातदिन्द ऎल्ल दिक्कुगळु प्रतिध्वनिसतॊडगिदवु.॥55॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अर्जुनस्य गदा सा तु पात्यमानाऽहितोरसि ।
काञ्चनाभं नभश्चक्रे विद्युत्सौदामनी यथा ॥ ५६ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

अर्जुनस्य गदा सा तु पात्यमानाऽहितोरसि ।
काञ्चनाभं नभश्चक्रे विद्युत्सौदामनी यथा ॥ ५६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘जैसे बिजली चमककर आकाशको सुनहरे रंगसे युक्त कर देती है, उसी प्रकार रावणकी छातीपर गिरायी जाती हुई अर्जुनकी गदा उसके वक्षःस्थलको सुवर्णकी-सी प्रभासे पूर्ण कर देती थी ॥ ५६ ॥

अनुवाद (कन्नड)

आकाशदल्लि मिञ्चु चिन्नद बण्णदिन्द प्रकाशिसुवन्तॆ रावणन ऎदॆगॆ हॊडॆद अर्जुनन गदॆयिन्द अवन वक्षःस्थळवु सुवर्ण प्रभॆयन्नु चिम्मुत्तित्तु.॥56॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तथैव रावणेनापि पात्यमाना मुहुर्मुहुः ।
अर्जुनोरसि निर्भाति गदोल्केव महागिरौ ॥ ५७ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

तथैव रावणेनापि पात्यमाना मुहुर्मुहुः ।
अर्जुनोरसि निर्भाति गदोल्केव महागिरौ ॥ ५७ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘उसी प्रकार रावणके द्वारा भी अर्जुनकी छातीपर बारम्बार गिरायी जाती हुई गदा किसी महान् पर्वतपर गिरनेवाली उल्काके समान प्रकाशित हो उठती थी ॥ ५७ ॥

अनुवाद (कन्नड)

हागॆये रावणनु अर्जुनन ऎदॆगॆ पदॆ-पदॆ हॊडॆद गदॆयु महा पर्वतद मेलॆ बीळुव उल्कॆयन्तॆ प्रकाशितवागुत्तित्तु.॥57॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

नार्जुनः खेदमायाति न राक्षसगणेश्वरः ।
सममासीत् तयोर्युद्धं यथा पूर्वं बलीन्द्रयोः ॥ ५८ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

नार्जुनः खेदमायाति न राक्षसगणेश्वरः ।
सममासीत् तयोर्युद्धं यथा पूर्वं बलीन्द्रयोः ॥ ५८ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘उस समय न तो अर्जुन थकता था और न राक्षसगणोंका राजा रावण ही । पूर्वकालमें परस्पर जूझनेवाले इन्द्र और बलिकी भाँति उन दोनोंका युद्ध एक समान जान पड़ता था ॥ ५८ ॥

अनुवाद (कन्नड)

आग अवरिब्बरू बळलदॆ हिन्दॆ परस्पर कादाडुत्तिद्द इन्द्र मत्तु बलियन्तॆ अवरिब्बर युद्ध ऒन्दे रीतियागि काणुत्तित्तु.॥58॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

शृङ्गैरिव वृषायुध्यन् दन्ताग्रैरिव कुञ्जरौ ।
परस्परं विनिघ्नन्तौ नरराक्षससत्तमौ ॥ ५९ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

शृङ्गैरिव वृषायुध्यन् दन्ताग्रैरिव कुञ्जरौ ।
परस्परं विनिघ्नन्तौ नरराक्षससत्तमौ ॥ ५९ ॥


शृङ्गैरिव वृषायध्यन् दन्ताग्रैरिव कुञ्जरौ ।
परस्परं विनिघ्नन्तौ नरराक्षससत्तमौ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘जैसे साँड़ अपने सींगोंसे और हाथी अपने दाँतोंके अग्रभागसे परस्पर प्रहार करते हैं, उसी प्रकार वे नरेश और निशाचरराज एक-दूसरेपर गदाओंसे चोट करते थे ॥ ५९ ॥

अनुवाद (कन्नड)

गूळियु कॊम्बिनिन्द हागू आनॆयु दन्तदिन्द परस्पर प्रहरिसुवन्तॆ आ नरेश मत्तु निशाचर ऒब्बरु मत्तॊब्बरन्नु गदॆयिन्द हॊडॆयुत्तिद्दरु.॥59॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ततोऽर्जुनेन क्रुद्धेन सर्वप्राणेन सा गदा ।
स्तनयोरन्तरे मुक्ता रावणस्य महोरसि ॥ ६० ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

ततोऽर्जुनेन क्रुद्धेन सर्वप्राणेन सा गदा ।
स्तनयोरन्तरे मुक्ता रावणस्य महोरसि ॥ ६० ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘इसी बीचमें अर्जुनने कुपित होकर रावणके विशाल वक्षःस्थलपर दोनों स्तनोंके बीचमें अपनी पूरी शक्तिसे गदाका प्रहार किया ॥ ६० ॥

अनुवाद (कन्नड)

अष्टरल्लि अर्जुननु कुपितनागि रावणन विशाल वक्षःस्थळद नडुवॆ पूर्ण शक्तियिन्द गदाघात माडिदनु.॥60॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

वरदानकृतत्राणे सा गदा रावणोरसि ।
दुर्बलेव यथावेगं द्विधाभूतापतत् क्षितौ ॥ ६१ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

वरदानकृतत्राणे सा गदा रावणोरसि ।
दुर्बलेव यथावेगं द्विधाभूतापतत् क्षितौ ॥ ६१ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘परंतु रावण तो वरके प्रभावसे सुरक्षित था, अतः रावणकी छातीपर वेगपूर्वक चोट करके भी वह गदा किसी दुर्बल गदाकी भाँति उसके वक्षकी टक्करसे दो टूक होकर पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ ६१ ॥

अनुवाद (कन्नड)

आदरॆ रावणनु वरप्रभावदिन्द सुरक्षितनागिद्दनु. आद्दरिन्द रावणन ऎदॆगॆ वेगवागि प्रयोगिसिद आ गदॆयु दुर्बल गदॆयन्तॆ ऎरडु तुण्डागि नॆलक्कॆ बिद्दु होयितु.॥61॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

स त्वर्जुनप्रयुक्तेन गदाघातेन रावणः ।
अपासर्पद् धनुर्मात्रं निषसाद च निष्टनन् ॥ ६२ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

स त्वर्जुनप्रयुक्तेन गदाघातेन रावणः ।
अपासर्पद् धनुर्मात्रं निषसाद च निष्टनन् ॥ ६२ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘तथापि अर्जुनकी चलायी हुई गदाके आघातसे पीड़ित हो रावण एक धनुष पीछे हट गया और आर्तनाद करता हुआ बैठ गया ॥ ६२ ॥

अनुवाद (कन्नड)

आदरू अर्जुननु प्रयोगिसिद गदाघातदिन्द पीडितनाद रावणनु बिल्लन्तरक्कॆ हिन्दॆ सरिदु आर्तनाद माडुत्ता कुळितुबिट्टनु.॥62॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

स विह्वलं तदालक्ष्य दशग्रीवं ततोऽर्जुनः ।
सहसोत्पत्य जग्राह गरुत्मानिव पन्नगम् ॥ ६३ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

स विह्वलं तदालक्ष्य दशग्रीवं ततोऽर्जुनः ।
सहसोत्पत्य जग्राह गरुत्मानिव पन्नगम् ॥ ६३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘दशग्रीवको व्याकुल देख अर्जुनने सहसा उछलकर उसे पकड़ लिया, मानो गरुड़ने झपट्टा मारकर किसी सर्पको धर दबाया हो ॥ ६३ ॥

अनुवाद (कन्नड)

दशग्रीवनु व्याकुलनादुदन्नु नोडि अर्जुननु कूडले हारि, गरुडनु यावुदादरू सर्पद मेलॆ ऎरगुवन्तॆ अवनन्नु हिडिदुकॊण्डनु.॥63॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

स तु बाहुसहस्रेण बलाद् गृह्य दशाननम् ।
बबन्ध बलवान् राजा बलिं नारायणो यथा ॥ ६४ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

स तु बाहुसहस्रेण बलाद् गृह्य दशाननम् ।
बबन्ध बलवान् राजा बलिं नारायणो यथा ॥ ६४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘जैसे पूर्वकालमें भगवान् नारायणने बलिको बाँधा था, उसी तरह बलवान् राजा अर्जुनने दशाननको बलपूर्वक पकड़कर अपने हजार हाथोंके द्वारा उसे मजबूत रस्सोंसे बाँध दिया ॥ ६४ ॥

अनुवाद (कन्नड)

हिन्दॆ भगवान् नारायणनु बलियन्नु बन्धिसि दन्तॆ बलवन्त राजा अर्जुननु दशानननन्नु बलवागि हिडिदु तन्न साविर कैगळिन्द गट्टियाद हग्गगळिन्द बन्धिसिदनु.॥64॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

बध्यमाने दशग्रीवे सिद्धचारणदेवताः ।
साध्वीति वादिनः पुष्पैः किरन्त्यर्जुनमूर्धनि ॥ ६५ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

बध्यमाने दशग्रीवे सिद्धचारणदेवताः ।
साध्वीति वादिनः पुष्पैः किरन्त्यर्जुनमूर्धनि ॥ ६५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘दशग्रीवके बाँधे जानेपर सिद्ध, चारण और देवता ‘शाबाश! शाबाश!’ कहते हुए अर्जुनके सिरपर फूलोंकी वर्षा करने लगे ॥ ६५ ॥

अनुवाद (कन्नड)

दशग्रीवनु बन्धितनादाग सिद्धरु, चारणरु, देवतॆगळु भले! भले! ऎन्दु हेळुत्ता अर्जुनन तलॆय मेलॆ हूविन मळॆ सुरिसिदरु.॥65॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

व्याघ्रो मृगमिवादाय मृगराडिव कुञ्जरम् ।
ररास हैहयो राजा हर्षादम्बुदवन्मुहुः ॥ ६६ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

व्याघ्रो मृगमिवादाय मृगराडिव कुञ्जरम् ।
ररास हैहयो राजा हर्षादम्बुदवन्मुहुः ॥ ६६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘जैसे व्याघ्र किसी हिरणको दबोच लेता है अथवा सिंह हाथीको धर दबाता है, उसी प्रकार रावणको अपने वशमें करके हैहयराज अर्जुन हर्षातिरेकसे मेघके समान बारम्बार गर्जना करने लगा ॥ ६६ ॥

अनुवाद (कन्नड)

हुलियु जिङ्कॆयन्नु, सिंहवु आनॆयन्नु हिडियुवन्तॆये रावणनन्नु तन्न वशपडिसिकॊडु हैहयराजनु हर्षातिरेकदिन्द मेघदन्तॆ पुनः पुनः गर्जिसतॊडगिदनु.॥66॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

प्रहस्तस्तु समाश्वस्तो दृष्ट्वा बद्धं दशाननम् ।
सहसा राक्षसः क्रुद्धो ह्यभिदुद्राव हैहयम् ॥ ६७ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

प्रहस्तस्तु समाश्वस्तो दृष्ट्वा बद्धं दशाननम् ।
सहसा राक्षसः क्रुद्धो ह्यभिदुद्राव हैहयम् ॥ ६७ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘इसके बाद प्रहस्तने होश सँभाला । दशमुख रावणको बँधा हुआ देख वह राक्षस सहसा कुपित हो हैहयराजकी ओर दौड़ा ॥ ६७ ॥

अनुवाद (कन्नड)

बळिक प्रहस्तनु ऎच्चरगॊण्डु, दशमुख रावणनु बन्धितनादुदन्नु नोडि राक्षसनु कुपितनागि हैहयन कडॆगॆ ओडिदनु.॥67॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

नक्तञ्चराणां वेगस्तु तेषामापततां बभौ ।
उद्भूत आतपापाये पयोदानामिवाम्बुधौ ॥ ६८ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

नक्तञ्चराणां वेगस्तु तेषामापततां बभौ ।
उद्भूत आतपापाये पयोदानामिवाम्बुधौ ॥ ६८ ॥


नक्तञ्चराणां वेगस्तु शेषामापततां बभौ ।
उद्भूत आतपापाये पयोदानामिवाम्बुधौ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘जैसे वर्षाकाल आनेपर समुद्रमें बादलोंका वेग बढ़ जाता है, उसी प्रकार वहाँ आक्रमण करते हुए उन निशाचरोंका वेग बढ़ा हुआ प्रतीत होता था ॥ ६८ ॥

अनुवाद (कन्नड)

मळॆगाल बन्दाग समुद्रदल्लि उब्बर बरुवन्तॆ अल्लि आक्रमिसुत्तिरुव आ निशाचरर वेग हॆच्चिदन्तॆ अनिसुत्तित्तु.॥68॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

मुञ्चमुञ्चेति भाषन्तस्तिष्ठतिष्ठेति चासकृत् ।
मुसलानि च शूलानि सोत्ससर्ज तदा रणे ॥ ६९ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

मुञ्चमुञ्चेति भाषन्तस्तिष्ठतिष्ठेति चासकृत् ।
मुसलानि च शूलानि सोत्ससर्ज तदा रणे ॥ ६९ ॥


मुञ्च मञ्चेति भाषं तस्तिष्ठ तिष्ठेति चासकृत् ।
मुसलानि च शूलानि सोत्ससर्ज तदा रणे ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘छोड़ो, छोड़ो, ठहरो, ठहरो’ ऐसा बारम्बार कहते हुए राक्षस अर्जुनकी ओर दौड़े । उस समय प्रहस्तने रणभूमिमें अर्जुनपर मूसल और शूलके प्रहार किये ॥ ६९ ॥

अनुवाद (कन्नड)

बिडु, बिडु, निल्लु, ऎन्दु पदे-पदे हेळुत्ता राक्षसरु अर्जुनन कडॆगॆ ओडिदरु. आग प्रहस्तरु रणभूमियल्लि अर्जुनन मेलॆ मुसल, शूलगळिन्द प्रहरिसिदनु.॥69॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अप्राप्तान्येव तान्याशु असम्भ्रान्तस्तदार्जुनः ।
आयुधान्यमरारीणां जग्राहारिनिषूदनः ॥ ७० ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

अप्राप्तान्येव तान्याशु असम्भ्रान्तस्तदार्जुनः ।
आयुधान्यमरारीणां जग्राहारिनिषूदनः ॥ ७० ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘परंतु अर्जुनको उस समय घबराहट नहीं हुई । उस शत्रुसूदन वीरने प्रहस्त आदि देवद्रोही निशाचरोंके छोड़े हुए उन अस्त्रोंको अपने शरीरतक आनेसे पहले ही पकड़ लिया ॥ ७० ॥

अनुवाद (कन्नड)

आदरॆ अर्जुननु आग गाबरिगॊळ्ळलिल्ल. आ शत्रुसूदन वीरनु प्रहस्तादि देवद्रोहि निशाचररु बिट्टिरुव अस्त्रगळु तन्न बळि बरुव मॊदले हिडिदुकॊण्डनु.॥70॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ततस्तैरेव रक्षांसि दुर्धरैः प्रवरायुधैः ।
भित्त्वा विद्रावयामास वायुरम्बुधरानिव ॥ ७१ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

ततस्तैरेव रक्षांसि दुर्धरैः प्रवरायुधैः ।
भित्त्वा विद्रावयामास वायुरम्बुधरानिव ॥ ७१ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘फिर उन्हीं दुर्धर एवं श्रेष्ठ आयुधोंसे उन सब राक्षसोंको घायल करके उसी तरह भगा दिया, जैसे हवा बादलोंको छिन्न-भिन्न करके उड़ा ले जाती है ॥ ७१ ॥

अनुवाद (कन्नड)

मत्तॆ अदे दुर्धर श्रेष्ठ आयुधगळिन्द आ ऎल्ल राक्षसरन्नु गायगॊळिसि गाळियु मोडगळन्नु छिन्न-भिन्न माडि हारिसिबिडुवन्तॆ ओडिसिबिट्टनु.॥71॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

राक्षसांस्त्रासयामास कार्तवीर्यार्जुनस्तदा ।
रावणं गृह्य नगरं प्रविवेश सुहृद‍्वृतः ॥ ७२ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

राक्षसांस्त्रासयामास कार्तवीर्यार्जुनस्तदा ।
रावणं गृह्य नगरं प्रविवेश सुहृद‍्वृतः ॥ ७२ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘उस समय कार्तवीर्य अर्जुनने समस्त राक्षसोंको भयभीत कर दिया और रावणको लेकर वह अपने सुहृदोंके साथ नगरमें आया ॥ ७२ ॥

अनुवाद (कन्नड)

आग कार्तवीर्यार्जुननु समस्त राक्षसरन्नु भयगॊळिसि, रावणनन्नु करॆदुकॊण्डु अवनु तन्न सुहृदरॊन्दिगॆ नगरक्कॆ होदनु.॥72॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

स कीर्यमाणः कुसुमाक्षतोत्करै-
र्द्विजैः सपौरैः पुरुहूतसन्निभः ।
ततोऽर्जुनः स्वां प्रविवेश तां पुरीं
बलिं निगृह्येव सहस्रलोचनः ॥ ७३ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

स कीर्यमाणः कुसुमाक्षतोत्करै-
र्द्विजैः सपौरैः पुरुहूतसन्निभः ।
ततोऽर्जुनः स्वां प्रविवेश तां पुरीं
बलिं निगृह्येव सहस्रलोचनः ॥ ७३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘नगरके निकट आनेपर ब्राह्मणों और पुरवासियोंने अपने इन्द्रतुल्य तेजस्वी नरेशपर फूलों और अक्षतोंकी वर्षा की और सहस्र नेत्रधारी इन्द्र जैसे बलिको बंदी बनाकर ले गये थे, उसी प्रकार उस राजा अर्जुनने बँधे हुए रावणको साथ लेकर अपनी पुरीमें प्रवेश किया’ ॥ ७३ ॥

अनुवाद (कन्नड)

नगरक्कॆ बन्दाग ब्राह्मणरु, प्रजाजनरु तम्म इन्द्रतुल्य तेजस्वी राजन मेलॆ हूवू, अक्षतॆगळन्नु चॆल्लिदरु. सहस्राक्ष इन्द्रनु बलियन्नु बन्दियागिसिकॊण्डु होदन्तॆये राजा अर्जुननु बन्धिसिद रावणनन्नु जॊतॆगॆ तॆगॆदुकॊण्डु पुरियन्नु प्रवेशिसिदनु.॥73॥

समाप्तिः

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे द्वात्रिंशः सर्गः ॥ ३२ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें बत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३२ ॥

अनुवाद (समाप्तिः) (कन्नड)

श्रीवाल्मीकि विरचित आर्षरामायण आदिकाव्यद उत्तर काण्डदल्लि मूवत्तॆरडनॆय सर्ग पूर्णवायितु. ॥32॥