०१७ हनुमता राक्षस्यावृतसीतादर्शनम्

वाचनम्
सर्वाष् टीकाः
Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy - Intro

Book V : Sundara Kanda - Book Of Beauty

In this chapter Hanuma sees Seetha surrounded by ogresses.

स्रोतः: valmikiramayan.net

भागसूचना
  1. भयंकर राक्षसियोंसे घिरी हुई सीताके दर्शनसे हनुमान् जी का प्रसन्न होना
विश्वास-प्रस्तुतिः

ततः कुमुदखण्डाभो
निर्मलं निर्मलोदयः ।
प्रजगाम नभश् चन्द्रो
हंसो नीलमिवोदकम् ॥ १ ॥+++(5)+++

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

ततः कुमुदखण्डाभो निर्मलं निर्मलोदयः ।
प्रजगाम नभश्चन्द्रो हंसो नीलमिवोदकम् ॥ १ ॥


ततः कुमुदषण्डाभो निर्मलो निर्मलं स्वयम् ।
प्रजगाम नभश्चन्द्रो हंसो नीलमिवोदकम् ॥

मूलम् - VR

ततः कुमुदषण्डाभो निर्मलम् निर्मलोदयः । प्रजगाम नभश्चन्द्रो हंसो नीलमिवोदकम् ॥ ५-१७- १

अनुवाद (हिन्दी)

तदनन्तर वह दिन बीतनेके पश्चात् कुमुदसमूहके समान श्वेत वर्णवाले तथा निर्मलरूपसे उदित हुए चन्द्रदेव स्वच्छ आकाशमें कुछ ऊपरको चढ़ आये । उस समय ऐसा जान पड़ता था, मानो कोई हंस किसी नील जलराशिमें तैर रहा हो ॥ १ ॥

अनुवाद (कन्नड)

आग निर्मलवर्णद सरॊवरवन्नु हंसवु प्रवेशिसुवन्तॆ कन्नॆदिलॆगळ कान्तियन्तॆ कान्तियुक्तनाद निर्मलनाद चन्द्रनु निर्मलवू, नीलवू आद पश्चिमाकाशादल्लि प्रवेशिसिदनु.॥1॥

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

1. tataH = Thereafter; chandraH = the moon; nirmala udayaH = with a peaceful rise; kumuda shhanDaabhaH = with radiance equaling that of a group of lotuses; prajagaama = obtained;nirmalam nabhaH = clear sky; iva = like; hamsaH = a swan; niilam udakam = blue water;

अनुवादः

Thereafter the moon with a peaceful rise, with radiance equaling that of a group of lotuses, obtained the clear sky like a swan obtaining blue water.

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

साचिव्यम् इव कुर्वन् स
प्रभया निर्मलप्रभः ।
चन्द्रमा रश्मिभिः शीतैः
सिषेवे पवनात्मजम् ॥ २ ॥+++(5)+++

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

साचिव्यमिव कुर्वन् स प्रभया निर्मलप्रभः ।
चन्द्रमा रश्मिभिः शीतैः सिषेवे पवनात्मजम् ॥ २ ॥

मूलम् - VR

साचिव्यमिव कुर्वन् स प्रभया निर्मलप्रभः । चन्द्रमा रश्मभिः शीतैः सिषेवे पवनात्मजम् ॥ ५-१७-२

अनुवाद (हिन्दी)

निर्मल कान्तिवाले चन्द्रमा अपनी प्रभासे सीताजीके दर्शन आदिमें पवनकुमार हनुमान् जी की सहायता-सी करते हुए अपनी शीतल किरणोंद्वारा उनकी सेवा करने लगे ॥ २ ॥

अनुवाद (कन्नड)

निर्मलवाद प्रभॆयिन्द कूडिद्द चन्द्रनु तन्न प्रभॆयिन्द सहायवॆसगुत्तिरुवनो ऎम्बन्तॆ शीतलवाद किरणगळिन्द हनुमन्तनन्नु सेविसुत्तिद्दनु.॥2॥

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

2. saH chandramaaH = that moon; nirmala prabhaH = with a peaceful glow; sishheve = served; pavanaatmajam = Hanuma; shiitaiH rashmibhiH = with cool rays; kurvan iva = as though performing; saachivyam = help; prabhaayaa = with radiance.

अनुवादः

That moon with a peaceful glow served Hanuma with cool rays as though performing help with radiance.

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

स ददर्श ततः सीतां
पूर्णचन्द्रनिभाननाम् ।
शोकभारैर् इव न्यस्तां
भारैर् नावम् इवाम्भसि ॥ ३ ॥+++(5)+++

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

स ददर्श ततः सीतां पूर्णचन्द्रनिभाननाम् ।
शोकभारैरिव न्यस्तां भारैर्नावमिवाम्भसि ॥ ३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

उस समय उन्होंने पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाली सीताको देखा, जो जलमें अधिक बोझके कारण दबी हुई नौकाकी भाँति शोकके भारी भारसे मानो झुक गयी थीं ॥ ३ ॥

अनुवाद (कन्नड)

हॆच्चु भारदिन्द नीरिनल्लि मुळुगि होगुत्तिरुव नावॆयन्तॆ शोकभारदिन्द कुग्गिहोगिद्द चन्द्रमुखियाद सीतादेवियन्नु हनुमन्तनु नोडिदनु.॥3॥

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

3. tataH = Thereafter; saH = Hanuma; dadarsha = saw; siitaam = Seetha; puurNa chandra nibhhananaam = with face like a full moon; nyastaam = put down; * shookabhaaraiH* = by the weight of grief; naavamiva = like a ship; nyastaam = sinking down; ambhasi = in water; bhaaraiH = due to weight;

अनुवादः

Thereafter Hanuma saw Seetha with a face like a full moon, put down by the weight of grief, like a ship sinking down in water due to weight.

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

दिदृक्षमाणो वैदेहीं
हनूमान् मारुतात्मजः ।
स ददर्शाविदूरस्था
राक्षसीर् घोरदर्शनाः ॥ ४ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

दिदृक्षमाणो वैदेहीं हनूमान् मारुतात्मजः ।
स ददर्शाविदूरस्था राक्षसीर्घोरदर्शनाः ॥ ४ ॥


दिदृक्षमाणो वैदेहीं हनुमान् पवनात्मजः ।
स ददर्शाविदूरस्था राक्षसीर्घोरदर्शनाः ॥

अनुवाद (हिन्दी)

वायुपुत्र हनुमान् जी ने जब विदेहकुमारी सीताको देखनेके लिये अपनी दृष्टि दौड़ायी, तब उन्हें उनके पास ही बैठी हुई भयानक दृष्टिवाली बहुत-सी राक्षसियाँ दिखायी दीं ॥ ४ ॥

अनुवाद (कन्नड)

वैदेहियन्नु नोडलु बयसिद्द वायुपुत्रनाद हनुमन्तनु अवळ समीपदल्लिये इद्द भयङ्करवागि काणुत्तिद्द राक्षसियरन्नु नोडिदनु.॥4॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

एकाक्षीम् एककर्णां च
कर्ण-प्रावरणां तथा ।
अकर्णां शङ्कुकर्णां च
मस्तकोच्छ्वास-नासिकाम् ॥ ५ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

एकाक्षीमेककर्णां च कर्णप्रावरणां तथा ।
अकर्णां शङ्कुकर्णां च मस्तकोच्छ्वासनासिकाम् ॥ ५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

उनमेंसे किसीके एक आँख थी तो दूसरीके एक कान । किसी-किसीके कान इतने बड़े थे कि वह उन्हें चादरकी भाँति ओढ़े हुए थीं । किसीके कान ही नहीं थे और किसीके कान ऐसे दिखायी देते थे मानो खूँटे गड़े हुए हों । किसी-किसीकी साँस लेनेवाली नाक उसके मस्तकपर थी ॥ ५ ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अतिकायोत्तमाङ्गीं च
तनुदीर्घशिरोधराम् ।
ध्वस्तकेशीं तथाकेशीं
केशकम्बलधारिणीम् ॥ ६ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

अतिकायोत्तमाङ्गीं च तनुदीर्घशिरोधराम् ।
ध्वस्तकेशीं तथाकेशीं केशकम्बलधारिणीम् ॥ ६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

किसीका शरीर बहुत बड़ा था और किसीका बहुत उत्तम । किसीकी गर्दन पतली और बड़ी थी । किसीके केश उड़ गये थे और किसी-किसीके माथेपर केश उगे ही नहीं थे । कोई-कोई राक्षसी अपने शरीरके केशोंका ही कम्बल धारण किये हुए थी ॥ ६ ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

लम्बकर्णललाटां च लम्बोदरपयोधराम् ।
लम्बोष्ठीं चिबुकोष्ठीं च लम्बास्यां लम्बजानुकाम् ॥ ७ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

लम्बकर्णललाटां च
लम्बोदरपयोधराम् ।
लम्बोष्ठीं चिबुकोष्ठीं च
लम्बास्यां लम्बजानुकाम् ॥ ७ ॥


लम्बकर्णललाटां च लम्बोदर पयोधराम् ।
लम्बोष्ठीं चुबुकोष्ठीं च लम्बास्यां लम्बजानुकाम् ॥

अनुवाद (हिन्दी)

किसीके कान और ललाट बड़े-बड़े थे तो किसीके पेट और स्तन लंबे थे । किसीके ओठ बड़े होनेके कारण लटक रहे थे तो किसीके ठोड़ीमें ही सटे हुए थे । किसीका मुँह बड़ा था और किसीके घुटने ॥ ७ ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ह्रस्वां दीर्घां च कुब्जां च विकटां वामनां तथा ।
करालां भुग्नवक्त्रां च पिङ्गाक्षीं विकृताननाम् ॥ ८ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

ह्रस्वां दीर्घां च कुब्जां च विकटां वामनां तथा ।
करालां भुग्नवक्त्रां च पिङ्गाक्षीं विकृताननाम् ॥ ८ ॥


ह्रस्वां दीर्घां तथा कुब्जां विकटां वामनां तथा ।
करालां भुग्नवक्त्रां च पिङ्गाक्षीं विकृताननाम् ॥

अनुवाद (हिन्दी)

कोई नाटी, कोई लंबी, कोई कुबड़ी, कोई टेढ़ी-मेढ़ी, कोई बवनी, कोई विकराल, कोई टेढ़े मुँहवाली, कोई पीली आँखवाली और कोई विकट मुँहवाली थीं ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

विकृताः पिङ्गलाः कालीः
क्रोधनाः कलहप्रियाः ।
कालाय-समहाशूल-
कूट-मुद‍्गर-धारिणीः ॥ ९ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

विकृताः पिङ्गलाः कालीः क्रोधनाः कलहप्रियाः ।
कालायसमहाशूलकूटमुद‍्गरधारिणीः ॥ ९ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

कितनी ही राक्षसियाँ बिगड़े शरीरवाली, काली, पीली, क्रोध करनेवाली और कलह पसंद करनेवाली थीं । उन सबने काले लोहेके बने हुए बड़े-बड़े शूल, कूट और मुद‍्गर धारण कर रखे थे ॥ ९ ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

वराहमृगशार्दूलमहिषाजशिवामुखाः ।
गजोष्ट्रहयपादाश्च निखातशिरसोऽपराः ॥ १० ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

वराहमृगशार्दूलमहिषाजशिवामुखाः ।
गजोष्ट्रहयपादाश्च निखातशिरसोऽपराः ॥ १० ॥


वराहमृगशार्दूलमहिषाजशिवामुखीः ।
गजोष्ट्रहयपादीश्च निखातशिरसोपराः ॥

अनुवाद (हिन्दी)

कितनी ही राक्षसियोंके मुख सूअर, मृग, सिंह, भैंस, बकरी और सियारिनोंके समान थे । किन्हींके पैर हाथियोंके समान, किन्हींके ऊँटोंके समान और किन्हींके घोड़ोंके समान थे । किन्हीं-किन्हींके सिर कबन्धकी भाँति छातीमें स्थित थे; अतः गड्ढेके समान दिखायी देते थे । (अथवा किन्हीं-किन्हींके सिरमें गड्ढे थे) ॥ १० ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

एकहस्तैकपादाश्च खरकर्ण्यश्वकर्णिकाः ।
गोकर्णीर्हस्तिकर्णीश्च हरिकर्णीस्तथापराः ॥ ११ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

एकहस्तैकपादाश्च खरकर्ण्यश्वकर्णिकाः ।
गोकर्णीर्हस्तिकर्णीश्च हरिकर्णीस्तथापराः ॥ ११ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

किन्हींके एक हाथ थे तो किन्हींके एक पैर । किन्हींके कान गदहोंके समान थे तो किन्हींके घोड़ोंके समान । किन्हीं-किन्हींके कान गौओं, हाथियों और सिंहोंके समान दृष्टिगोचर होते थे ॥ ११ ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अतिनासाश्च काश्चिच्च तिर्यङ्नासा अनासिकाः ।
गजसन्निभनासाश्च ललाटोच्छ्वासनासिकाः ॥ १२ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

अतिनासाश्च काश्चिच्च तिर्यङ्नासा अनासिकाः ।
गजसन्निभनासाश्च ललाटोच्छ्वासनासिकाः ॥ १२ ॥


अनासा अतिनासाश्च तिर्यङ्नासा विनासिकाः ।
गजसन्निभनासाश्च ललाटोच्छ्वासनासिकाः ॥

अनुवाद (हिन्दी)

किन्हींकी नासिकाएँ बहुत बड़ी थीं और किन्हींकी तिरछी । किन्हीं-किन्हींके नाक ही नहीं थी । कोई-कोई हाथीकी सूँड़के समान नाकवाली थीं और किन्हीं-किन्हींकी नासिकाएँ ललाटमें ही थीं, जिनसे वे साँस लिया करती थीं ॥ १२ ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

हस्तिपादा महापादा गोपादाः पादचूलिकाः ।
अतिमात्रशिरोग्रीवा अतिमात्रकुचोदरीः ॥ १३ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

हस्तिपादा महापादा गोपादाः पादचूलिकाः ।
अतिमात्रशिरोग्रीवा अतिमात्रकुचोदरीः ॥ १३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

किन्हींके पैर हाथियोंके समान थे और किन्हींके गौओंके समान । कोई बड़े-बड़े पैर धारण करती थीं और कितनी ही ऐसी थीं जिनके पैरोंमें चोटीके समान केश उगे हुए थे । बहुत-सी राक्षसियाँ बेहद लंबे सिर और गर्दनवाली थीं और कितनोंके पेट तथा स्तन बहुत बड़े-बड़े थे ॥ १३ ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अतिमात्रास्यनेत्राश्च दीर्घजिह्वाननास्तथा ।
अजामुखीर्हस्तिमुखीर्गोमुखीः सूकरीमुखीः ॥ १४ ॥
हयोष्ट्रखरवक्त्राश्च राक्षसीर्घोरदर्शनाः ।

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

अतिमात्रास्यनेत्राश्च दीर्घजिह्वाननास्तथा ।
अजामुखीर्हस्तिमुखीर्गोमुखीः सूकरीमुखीः ॥ १४ ॥
हयोष्ट्रखरवक्त्राश्च राक्षसीर्घोरदर्शनाः ।


अतिमात्रास्यनेत्राश्च दीर्घजिह्वानखास्तथा ।
अजामुखीर्हस्तिमुखीर्गोमुखीः सूकरीमुखीः ॥ हयोष्ट्रखरवकाश्च राक्षसीर्घोरदर्शनाः ।

अनुवाद (हिन्दी)

किन्हींके मुँह और नेत्र सीमासे अधिक बड़े थे, किन्हीं-किन्हींके मुखोंमें बड़ी-बड़ी जिह्वाएँ थीं और कितनी ही ऐसी राक्षसियाँ थीं, जो बकरी, हाथी, गाय, सूअर, घोड़े, ऊँट और गदहोंके समान मुँह धारण करती थीं । इसीलिये वे देखनेमें बड़ी भयंकर थीं ॥ १४ १/२ ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

शूलमुद‍्गरहस्ताश्च
क्रोधनाः कलहप्रियाः ॥ १५ ॥
कराला धूम्रकेशिन्यो
राक्षसीर्विकृताननाः ।
पिबन्ति सततं पानं
सुरा-मांस-सदा-प्रियाः ॥ १६ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

शूलमुद‍्गरहस्ताश्च क्रोधनाः कलहप्रियाः ॥ १५ ॥
कराला धूम्रकेशिन्यो राक्षसीर्विकृताननाः ।
पिबन्ति सततं पानं सुरामांससदाप्रियाः ॥ १६ ॥


कराला धूम्रकेशीश्च राक्षसीर्विकृताननाः । पिबन्तीः सततं पानं सदा मांससुराप्रियाः ।

अनुवाद (हिन्दी)

किन्हींके हाथमें शूल थे तो किन्हींके मुद‍्गर । कोई क्रोधी स्वभावकी थीं तो कोई कलहसे प्रेम रखती थीं । धुएँ-जैसे केश और विकृत मुखवाली कितनी ही विकराल राक्षसियाँ सदा मद्यपान किया करती थीं । मदिरा और मांस उन्हें सदा प्रिय थे ॥ १५-१६ ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

मांसशोणित-दिग्धाङ्गीर्
मांसशोणितभोजनाः ।
ता ददर्श कपिश्रेष्ठो
रोम-हर्षण-दर्शनाः ॥ १७ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

मांसशोणितदिग्धाङ्गीर्मांसशोणितभोजनाः ।
ता ददर्श कपिश्रेष्ठो रोमहर्षणदर्शनाः ॥ १७ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

कितनी ही अपने अंगोंमें रक्त और मांसका लेप लगाये रहती थीं । रक्त और मांस ही उनके भोजन थे । उन्हें देखते ही रोंगटे खड़े हो जाते थे । कपिश्रेष्ठ हनुमान् जी ने उन सबको देखा ॥ १७ ॥

अनुवाद (कन्नड)

आ राक्षसियर देहरचनॆये बहळ विचित्रवागित्तु. अवरल्लि कॆलवु राक्षसियरिगॆ ऒन्दे कण्णु ऒन्दे किविगळिद्दवु. कॆलवरिगॆ तलॆगळन्ने मुच्चिकॊण्डिरुवन्तह विशालवाद किविगळिद्दवु. कॆलवरिगॆ मूगुगळु मेल्मुखवागिद्दवु. कॆलवु राक्षसियरिगॆ अतिदप्पवाद तलॆगळिद्दवु. कॆलवरिगॆ तॆळ्ळगागियू मत्तु उद्दवागियू कुत्तिगॆगळिद्दवु. कॆलवरिगॆ तलॆगळल्लि स्वल्प कूदलुगळिद्दु, कॆलवरिगॆ कूदले इरलिल्ल. कॆलवरिगॆ उण्णॆयन्तॆ कूदलिद्दवु. कॆलवरिगॆ जोलाडुत्तिरुव किविगळु मत्तु हणॆगळिद्दवु. कॆलवरिगॆ जोतुबिद्दिरुव हॊट्टॆगळू, स्तनगळू इद्दवु. कॆलवर तुटिगळु जोतुबिद्दिद्दवु. कॆलवरिगॆ गल्लदल्ले सेरिहोद तुटिगळिद्दवु. कॆलवर मुखगळु जोतुबिद्दिद्दुवु. कॆलवरिगॆ दीर्घवाद मण्डिगळिद्दवु. कॆलवरिगॆ सॊण्टद मेलु भागवू गिड्डागियू कॆळभागवु उद्दवागियू इत्तु. अल्लि कॆलवु गूनुबॆन्निन राक्षसियरिद्दरु. स्थूलवाद मॊणकालुगळुळ्ळवरिद्दरु. कुळ्ळियरिद्दरु. उब्बिद हल्लुगळुळ्ळवरिद्दरु. तग्गाद मुखगळुळ्ळरिद्दरु. कन्दु-हळदि बण्णद कण्णुगळुळ्ळवरिद्दरु. कॆलवर मुखगळु विकारवागिद्दवु. आकारवू विकारवागिद्दितु. अल्लि पिङ्गल वर्णद, कृष्ण वर्णद राक्षसियरिद्दरु. कोपिष्ठॆयराद राक्षसियरिद्दरु. जगळगण्टियरिद्दरु. अवरल्लि कॆलवरु कालदण्डगळन्नु, कॆलवरु कब्बिणद आयुधगळन्नु, कॆलवरु शूलायुधगळन्नु, कॆलवरु पाश-मुद्गरगळन्नु हिडिदिद्दरु. अवरल्लि कॆलवरिगॆ हन्दि, सिंह, ऎम्मॆ, आडु, गुळ्ळॆनरि, इवे मुन्ताद प्राणिगळ मुखगळिद्दवु. आनॆ, ऒण्टॆ, कुदुरॆगळ कालुगळन्तह कालुगळन्नु कॆलवरु हॊन्दिद्दरु. कॆलवु राक्षसियर किविगळु कत्तॆ, कुदुरॆ, हसु, आनॆ, कपि, इवुगळ किविगळन्तिद्दवु. कॆलवु राक्षसियरिगॆ नीळवाद मूगुगळिद्दवु. कॆलवरिगॆ अड्डवाद मूगुगळिद्दवु. कॆलवरिगॆ मूगे इरलिल्ल. कॆलवरिगॆ आनॆय मूगु, कॆलवरिगॆ हणॆयल्लि मूगिद्दितु. कॆलवु राक्षसियरिगॆ आनॆयन्तॆ कालुगळिद्दवु. कॆलवरिगॆ दॊड्डदाद हॆज्जॆगळिद्दवु. कॆलवरिगॆ हसुविनन्तॆ पादगळिद्दवु. कॆलवरिगॆ कालिनल्लि शिखारूपवाद कूदलुगळिद्दवु. कॆलवरिगॆ अळतॆगॆ मीरिद तलॆ-कुत्तिगॆगळिद्दवु. कॆलवरिगॆ मितिमीरिद स्तनगळू, हॊट्टॆगळू, मुख, नासिकगळिद्दवु. कॆलवरिगॆ उद्दवाद नालिगॆगळु, नीळवाद मुखगळिद्दवु. कॆलवरु आडु, आनॆ, हसु, हन्दि, कुदुरॆ, ऒण्टॆ, कत्तॆ, इवे मुन्ताद प्राणिगळ मुखगळन्नु हॊन्दिद्दरु. कॆलवरु शूल-मुद्गरगळन्नु हिडिदिद्दरु. कॆलवरु महा कोपिष्ठॆयरागिद्दरु. जगळगण्टिगळागिद्दरु. कॆलवरु करालवाद मत्तु धूम्र वर्णद केशवुळ्ळवरागिद्दरु. अवरॆल्लरू सदा मधुपान माडुत्तिद्दरु. अवरिगॆ मांसवन्नु तिन्नुवुदरल्लि, सुरापानदल्लि विशेषवाद आसक्तियिद्दितु. ई कारणदिन्द अवर शरीरगळु रक्त-मांसगळिन्द नॆनॆदुहोगिद्दवु. अवरु विकारवाद मुखगळन्नु हॊन्दि भयङ्करवागि काणुत्तिद्दरु. नोडुववरिगॆ रॊमाञ्चनवन्नुण्टुमाडुत्तिद्दरु. अन्तह अनेक राक्षसियरु शिंशुपा वृक्षवन्नु सुत्तुवरिदु कुळितिरुवुदन्नु कपिश्रेष्ठनाद हनुमन्तनु नोडिदनु.॥5-17॥

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

4;5;6;7;8. maarutaatmajaH = Hanuma; didR^ikshamaaNaH = wanting to see; vaidehiim = Seetha; dadarsha = saw; viduurasthaa = nearby; raakshasiiH = ogresses; ghora darshanaaH = with horrible appearance; ekaakshiim = (ogress) with one eye; ekakarNaam cha = and (another) with a single ear; tathaa = and also; karNapraavaraNaam = one with ears as covering body; saN^ku karNaam = with conch shell like ears; mastakochchvaasa naasikaam = one with fattened nose up to head; tanu diirgha shirodharaam = one with a lean and long neck; dhvastakesiim = one with disheveled hair; tathaa = and also; akeshiim = one without hair; keshakambala dhaariNiim = one with hair like a blanket; lamba karNa lalaataam cha = one with hanging stomach and breasts; lamboshhThiim = one with hanging face; chubukoshhThiim = one with lips at chin; lambaasyaam = one with hanging face; lambajaanukaam = with hanging knees; hrasvaam = one who is short; diirghaam = one who is tall; tathaa = and also; kubjaam = hunch backed one; vikaTaam = one who is distorted; vaamanaam = one is dwarf; tathaa = and also; karaalaam = one with high teeth; bhugna vaktraam cha = and one with crooked mouth; * piN^gaakshiim* = one with green eyes; vikR^itaananaam = one with a horrible face.

अनुवादः

Hanuma wanting to see Seetha saw nearby ogresses with horrible appearance - one with one eye; one with a single ear and also one with ears as covering; one with conch shell like ears; one with fattened nose up to head; one with lean and long neck; one with disheveled hair and also one without hair; one with blanket like hair; one with hanging stomach and breasts; one with hanging face; one with lips at chin; one with hanging face; one with hanging knees; one who is short; one who is tall and also hunch backed one; one who is distorted; a dwarf one and also one with high teeth and one with crooked mouth, one with green eyes and one with a horrible face.

स्रोतः: valmikiramayan.net

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

9;10;11;12;13;14;15;15; 17. kapi shhresThaH = Hanuma; dadrsha = saw; vikR^itaaH = horrible ones; piN^galaaaH = dark complexioned ones; krodhanaaH = angry ones;kalaha priyaaH = those who like quarrels; kaalaayasamahaa shuula kuuTa mudgara dhaariniiH = ones wearing big darts; mallets and clubs of iron;varaaha mR^iga shaarduula mahishhaa shivaa mukhiiH = with faces like those of pigs; deer;tigers;buffaloes;goats;she-foxes; gajoshhTra hayapaadiiH = with feet like those of elephants; camels;horses;nikaata shirasaH = with heads sunk into bodies;aparaaH = some others; eka hastaika paadaashcha = with a single hand and those with single foot; khara karNyasva karNikaa = those with donkey ears and horse ears;gokarNiiH = those with cow ears; hasti karNiiH = those with elephant ears; hari karNiiH = those with monkey ears; aparaaH = and some others; anaasaaH = without nose; ati naasaashcha = with big nose; tiryajN^aasaaH = those with horizontal nose; vinaasikaaH = those with crooked nose; gajasannibha naasaashcha = those with elephant-like nose; lalaaTocchvaasa naasikaaH = nose fixed in forehead; hasti paadaaH = with feet like those of elephant; mahaapaadaaH = those with big feet; gopaadaaH = those with cow like feet; paada chuuLikaaH = those with hair on their feet; atimaatra shirogriivaaH = those with big heads and necks; atimaatrakuchodariiH = those with big nipples and big stomach; atimaatraasyanetrashcha = those with big mouths and eyes; diirghajihvaa nakhaaH = with long tongues and nails; tathaa = and also;ajaamukhiiH = those with face like that of a she-goat; hastimukhiiH = those with elephant like face; gomukhiiH = those with face like that of a cow;suukarii mukhiiH = those with face of a she-pig; hayoshhTrakharavaktraashcha = with faces like those of horses; camels; donkeys; ghoradarshanaaH = those with horrible appearance; raakshasiiH = ogresses; shuula mudgara hastaashcha = carrying pikes and clubs in their hand; krodhanaaH = angry ones; kalaha priyaaH = those who like quarrels; karaaLaaH = those with high teeth; dhuumra kesiishcha = with hair color like that of smoke; vikR^itaanaaH = with horrible faces; satatam = always; pibantiiH = drinking; paanam = liquor; sadaa = always; maamsasuraa priyaaH = desiring meat and liquor; maamsa shoNitadigdhaaN^gii = with body smeared by meat and blood; maamsa shoNita bhojanaaH = with meat and blood as food; romaharshhaNa darsanaaH = whose appearance made hair to stand up; upaasinnaaH = sitting; parivaarya = around; vanapatim = a great tree; skandhavantam = with huge trunk;

अनुवादः

Hanuma saw horrible ogresses, dark complexioned ones, angry ones, those who like quarrels, ones wearing big darts, mallets and clubs of iron, with faces like those of pigs, deer, tigers, buffaloes, goats, she-foxes, with feet like those of elephants, camels, horses, with heads sunk into bodies, with single hand and single foot, those ears like that of donkeys and horses, those with cow ears, those with elephant ears, those with monkey ears, and some others without nose, those with horizontal nose, those with crooked nose, those with elephant-like nose, toes with nose fixed in forehead, with feet like those of elephant, those with big feet, those with cow like feet, those with hair on their feet, those with big heads and necks, those with big nipples and big stomach, those with big eyes and mouths, with long tongues and nails, and also the a face like that of a she-goat, those with elephant like face, those with face like that of a cow, those with face of a she-pig, those with faces like those of horses, camels, donkeys, those with horrible appearance, ogresses carrying pikes and clubs in their hand, angry ones, those who like quarrels, those with high teeth, with hair color like that of smoke, with horrible faces, always drinking liquor, always desiring meat and liquor, with body smeared by meat and blood, with meat and blood as food, whose appearance made hair to stand up, sitting around a great tree with huge trunk.

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

स्कन्धवन्तम् उपासीनाः
परिवार्य वनस्पतिम् ।
तस्याधस् ताच्च तां देवीं
राजपुत्रीम् अनिन्दिताम् ॥ १८ ॥
लक्षयामास लक्ष्मीवान्
हनूमाञ् जनकात्मजाम् ।
निष्प्रभां शोकसन्तप्तां
मल-सङ्कुल-मूर्धजाम् ॥ १९ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

स्कन्धवन्तमुपासीनाः परिवार्य वनस्पतिम् ।
तस्याधस्ताच्च तां देवीं राजपुत्रीमनिन्दिताम् ॥ १८ ॥
लक्षयामास लक्ष्मीवान् हनूमाञ्जनकात्मजाम् ।
निष्प्रभां शोकसन्तप्तां मलसङ्कुलमूर्धजाम् ॥ १९ ॥


स्कन्दवन्तमुपासीनाः परिवार्य वनस्पतिम् ।
तस्याधस्ताच्च तां देवीं राजपुत्रीमनिन्दिताम् ॥ लक्षयामास लक्ष्मीवान् हनुमान् जनकात्मजाम् ।
निष्प्रभां शोकसन्तप्तां मलसङ्कुलमूर्धजाम् ॥

मूलम् - VR

तस्याधस्ताच्च ताम् देवीम् राजपुत्रीमनिन्दिताम् ॥ ५-१७-१८ लक्षयामास लक्ष्मीवान् हनुमान् जन्कात्मजाम् । निष्प्रभाम् षोकसन्तप्ताम् मलसम्कुलमूर्धजाम् ॥ ५-१७-१९ क्षीणपुण्याम् च्युताम् भूमौ ताराम् निपतितामिव ।

अनुवाद (हिन्दी)

वे उत्तम शाखावाले उस अशोकवृक्षको चारों ओरसे घेरकर उससे थोड़ी दूरपर बैठी थीं और सती साध्वी राजकुमारी सीता देवी उसी वृक्षके नीचे उसकी जड़से सटी हुई बैठी थीं । उस समय शोभाशाली हनुमान् जी ने जनककिशोरी जानकीजीकी ओर विशेषरूपसे लक्ष्य किया । उनकी कान्ति फीकी पड़ गयी थी । वे शोकसे संतप्त थीं और उनके केशोंमें मैल जम गयी थी ॥ १८-१९ ॥

अनुवाद (कन्नड)

आ जानकियन्नु दर्शिसिद मारुतियु महदानन्दभरितनागि दिव्यतेजदिन्द विराजमाननादनु. शोकसन्तप्तळाद आकॆयु कान्तिहीनळागिद्दु, मलिनवाद तलॆगूदलुगळिन्द कूडिद्दळु.॥19॥

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पदच्छेदः

18. hanumaan = Hanuma; lakshmiivaan = the glorious one; lakshayaamaasa = saw; taam deviim = that Seetha; raajaputriim = the princess;janakaatmajaam = daughter of Janaka; aninditaam = unblemished one; tasya adhastaat = below that tree

अनुवादः

Hanuma the glorious one saw that Seetha, the princess, daughter of Janaka, unblemished one below that tree.

स्रोतः: valmikiramayan.net

अनुवाद (कन्नड)

आ राक्षसस्त्रीयरु दॊड्डरॆम्बॆगळुळ्ळ वृक्षद सुत्तलू कुळितुकॊण्डिद्दरु. आ मरद कॆळगॆ कुळितिरुव पूज्यळाद जनकराजन सुतॆयाद जानकियन्नु हनुमन्तनु नोडिदनु.॥18॥

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पदच्छेदः

19. nishhprabhaam = lack lustre one; shokasamtaptaam = being tormented by grief; malasamkulamuurdhajaam = with hair covered by dirt; kshhiNa puNyaam = with merits exhausted; taaraamiva = like a star; chyutaam = fallen from heavens; bhuumau nipatitaam = that fell on ground.

अनुवादः

She was lack luster being tormented by grief, with hair covered by dirt, with merits exhausted, like star fallen from heavens onto ground.

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

क्षीणपुण्यां च्युतां भूमौ
तारां निपतितामिव ।
चारित्र-व्यपदेशाढ्यां
भर्तृ-दर्शन-दुर्गताम् ॥ २० ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

क्षीणपुण्यां च्युतां भूमौ तारां निपतितामिव ।
चारित्रव्यपदेशाढ्यां भर्तृदर्शनदुर्गताम् ॥ २० ॥


क्षीणपुण्यां च्युतां भूमौ तारां निपतितामिव ।
चारित्र्यव्यपदेशाढ्यां भर्तृदर्शनदुर्गताम् ॥

मूलम् - VR

चारित्रव्यपदेशाड्यां भर्तृदर्शनदुर्गताम् ॥ ५-१७-२० भूषणैरुत्तमोर्हीनाम् भर्तृवात्सल्यभूषणाम् ।

अनुवाद (हिन्दी)

जैसे पुण्य क्षीण हो जानेपर कोई तारा स्वर्गसे टूटकर पृथ्वीपर गिर पड़ा हो, उसी तरह वे भी कान्तिहीन दिखायी देती थीं । वे आदर्श चरित्र (पातिव्रत्य)-से सम्पन्न तथा इसके लिये सुविख्यात थीं । उन्हें पतिके दर्शनके लिये लाले पड़े थे ॥ २० ॥

अनुवाद (कन्नड)

आ समयदल्लि सीतादेवियु-पुण्य क्षीणिसिदाग धरॆगॆ उरुळिद नक्षत्रदन्तॆ काणुत्तिद्दळु. पतिव्रता धर्मवन्नु पालिसुत्तिरुव उत्तम शीलसम्पन्नॆयागिद्दरू पतिदर्शन भाग्यविल्लदे आकॆयु बहळवागि कङ्गॆट्टिद्दळु.॥20॥

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पदच्छेदः

20. chaaritravyapadeshaadyaam = rich with fame of character; bhartR^idarshana durgataam = poor due to not seeing husband; hiinaam = lacking; uttamaiH bhuushhanaiH = excellent ornaments; bhartR^ivaatsalya bhuushhaNaam = with husband’s love as ornament.

अनुवादः

She was rich with fame of lofty character, poor due to not seeing husband, lacking excellent ornaments, with husband’s love as ornament.

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

भूषणैर् उत्तमैर् हीनां
भर्तृवात्सल्य-भूषिताम् ।
राक्षसाधिपसंरुद्धां
बन्धुभिश् च विनाकृताम् ॥ २१ ॥+++(5)+++

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

भूषणैरुत्तमैर्हीनां भर्तृवात्सल्यभूषिताम् ।
राक्षसाधिपसंरुद्धां बन्धुभिश्च विनाकृताम् ॥ २१ ॥


भूषणैरुत्तमैर्हीनां भर्तृवात्सल्यभूषणाम् ।
राक्षसाधिपसंरुद्धां बन्धुभिश्च विनाकृताम् ॥

मूलम् - VR

राक्षसाधिपसम्रुद्धाम् बन्धुभिश्च विना कृताम् ॥ ५-१७-२१ वियूथाम् सिम्हसम्रुद्धाम् बद्धाम् गजवधूमिव ।

अनुवाद (हिन्दी)

वे उत्तम भूषणोंसे रहित थीं तो भी पतिके वात्सल्यसे विभूषित थीं (पतिका स्नेह ही उनके लिये शृंगार था) । राक्षसराज रावणने उन्हें बंदिनी बना रखा था । वे स्वजनोंसे बिछुड़ गयी थीं ॥ २१ ॥

अनुवाद (कन्नड)

अवळु उत्तमवाद आभरणगळन्नु तॊट्टिरलिल्ल. आदरू पतिप्रेमवॆम्ब आभरणदिन्द अलङ्कृतळागिद्दळु. राक्षसाधिपनाद रावणनु अवळन्निल्लि बन्धिसिट्टिद्दनु. अल्लि अवळिगॆ बन्धुगळु यारु सनिहदल्लि इरलिल्ल.॥21॥

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पदच्छेदः

21. raakshaadhipa saMruddhaam = Being held captive by Ravana; kR^itaam = made; bandhubhiH vinaa cha = without relatives; gajavadhuumiva = like a she-elephant; * viyuudhaam* = without herd; siMha saMruddhaam baddhaam = being detained by a lion; .

अनुवादः

Being held captive by Ravana, without any relatives, She was like a she-elephant without herd, being detained by a lion.

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

वियूथां सिंह-संरुद्धां
बद्धां गज-वधूम् इव ।
चन्द्ररेखां पयोदान्ते
शारदाभ्रैर् इवावृताम् ॥ २२ ॥+++(5)+++

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

वियूथां सिंहसंरुद्धां बद्धां गजवधूमिव ।
चन्द्ररेखां पयोदान्ते शारदाभ्रैरिवावृताम् ॥ २२ ॥

मूलम् - VR

चन्द्ररेखाम् पयोदान्ते शारदाब्रैरिवावृताम् ॥ ५-१७-२२ क्लिष्टरूपामसंस्पर्शादयुक्तामिव वल्लकीम् ।

अनुवाद (हिन्दी)

जैसे कोई हथिनी अपने यूथसे अलग हो गयी हो, यूथपतिके स्नेहसे बँधी हो और उसे किसी सिंहने रोक लिया हो । रावणकी कैदमें पड़ी हुई सीताकी भी वैसी ही दशा थी । वे वर्षाकाल बीत जानेपर शरद्-ऋतुके श्वेत बादलोंसे घिरी हुई चन्द्ररेखाके समान प्रतीत होती थीं ॥ २२ ॥

अनुवाद (कन्नड)

आनॆगळ समूहदिन्द बेर्पट्टु सिंहदिन्द तडॆयल्पट्ट हॆण्णानॆयन्तॆ भयभीतळागिद्दळु. शरत्कालदल्लि मोडगळिन्द आवृतनाद बिदिगॆय चन्द्ररेखॆयन्तॆ काणुत्तिद्दळु.॥22॥

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पदच्छेदः

22. chandrarekhaamiva = like moon; aavR^itaam = being covered; shaaradaabhraiH = by clouds; payodaante = at the end of rainy season; klishhta rupaam = With an appearance lacking lustre; asamsparshaat = due to lack of contact (with husband); valaakiimiva = like Veena; aayuktaam = which was unplucked.

अनुवादः

She was like moon being covered by clouds at the end of rainy season with an appearance lacking lustre due to lack of contact with husband, was like an unplucked Veena.

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

क्लिष्ट-रूपाम् असंस्पर्शाद्
अयुक्तामिव वल्लकीम् ।
स तां भर्तृहिते युक्ताम्
अयुक्तां रक्षसां वशे ॥ २३ ॥
अशोक-वनिका-मध्ये
शोक-सागरम् आप्लुताम् ।
ताभिः परिवृतां तत्र
सग्रहाम् इव रोहिणीम् ॥ २४ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

क्लिष्टरूपामसंस्पर्शादयुक्तामिव वल्लकीम् ।
स तां भर्तृहिते युक्तामयुक्तां रक्षसां वशे ॥ २३ ॥
अशोकवनिकामध्ये शोकसागरमाप्लुताम् ।
ताभिः परिवृतां तत्र सग्रहामिव रोहिणीम् ॥ २४ ॥


क्लिष्टरूपामसंस्पर्शादयुक्तामिव वल्लकीम् ।
सीतां भर्तृवशे युक्तामयुक्तां राक्षसीवशे ॥ अशोकवनिकामध्ये शोकसागरमाप्लुताम् ।
ताभिः परिवृतां तत्र सग्रहामिव रोहिणीम् ॥

मूलम् - VR

स ताम् भर्तवशे युक्तामयुक्ताम् राक्षसीवशे ॥ ५-१७-२३ अशोकवनिकामध्ये शोकसागरमाप्लुताम् । ताभिः परिवृताम् तत्र सग्रहामिव रोहिणीम् ॥ ५-१७-२४ ददर्श हनुमान् देवीम् लतामकुसुमामिव ।

अनुवाद (हिन्दी)

जैसे वीणा अपने स्वामीकी अंगुलियोंके स्पर्शसे वञ्चित हो वादन आदिकी क्रियासे रहित अयोग्य अवस्थामें मूक पड़ी रहती है, उसी प्रकार सीता पतिके सम्पर्कसे दूर होनेके कारण महान् क्लेशमें पड़कर ऐसी अवस्थाको पहुँच गयी थीं, जो उनके योग्य नहीं थी । पतिके हितमें तत्पर रहनेवाली सीता राक्षसोंके अधीन रहनेके योग्य नहीं थीं; फिर भी वैसी दशामें पड़ी थीं । अशोकवाटिकामें रहकर भी वे शोकके सागरमें डूबी हुई थीं । क्रूर ग्रहसे आक्रान्त हुई रोहिणीकी भाँति वे वहाँ उन राक्षसियोंसे घिरी हुई थीं । हनुमान् जी ने उन्हें देखा । वे पुष्पहीन लताकी भाँति श्रीहीन हो रही थीं ॥ २३-२४ ॥

अनुवाद (कन्नड)

अशोकवनद मध्यदल्लिद्दरू इवळु शोकसागरदल्लि मुळुगिद्दाळॆ. क्रूर ग्रहगळिन्द पीडितवाद रोहिणी नक्षत्रदन्तॆ क्रूर राक्षसियरिन्द परिवृतळागिद्दाळॆ.॥24॥

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पदच्छेदः

23. siitaam = (Hanuma saw)Seetha; bhartR^ivashe yuktaam = being suited to be with her husband; raakshasiivashe = in the custody of ogresses; ashokavanikaa madhye = in the middle of Ashoka garden;aaplutaam = being immersed; shoka saagaraam = in an ocean of grief.

अनुवादः

Hanuma saw Seetha being suited to be with her husband, in the custody of ogresses, in the middle of Ashoka garden being immersed in an ocean of grief

स्रोतः: valmikiramayan.net

अनुवाद (कन्नड)

अभ्यञ्जनादि संस्कारगळिल्लदॆ अवळ शरीरवु मलिनवागिद्दितु. अवळु वादकनिल्लद वीणॆयन्तिद्दळु. पतियाद श्रीरामन वशदल्लिरबेकाद सीतॆयु इन्दु राक्षसियर मध्यदल्लिरुवुदु योग्यवागि काणुवुदिल्ल. ॥23॥

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पदच्छेदः

24. hanumman = Hanuma; dadarsha = saw; deviim = Seetha; tatra = there; parivR^itaam = surrounded; taabhiH = by those ogresses; sagrahaamiva rohiNiim = like Rohini with planets; lathaamiva = like a creeper; akusumaam = without flowers.

अनुवादः

Hanuma saw Seetha there surrounded by those ogresses, like Rohini with planets, like a creeper without flowers.

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

ददर्श हनुमांस् तत्र
लताम् अकुसुमाम् इव ।
सा मलेन च दिग्धाङ्गी
वपुषा चाप्यलङ्कृता ।
मृणाली पङ्क-दिग्धेव
विभाति च न भाति च ॥ २५ ॥+++(5)+++

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

ददर्श हनुमांस्तत्र लतामकुसुमामिव ।
सा मलेन च दिग्धाङ्गी वपुषा चाप्यलङ्कृता ।
मृणाली पङ्कदिग्धेव विभाति च न भाति च ॥ २५ ॥


ददर्श हनुमान् देवीं लतामकुसुमामिव ।
सा मलेन च दिग्धाङ्गी वपुषा चाप्यलङ्कृता ॥ मृणाली पङ्कदिग्धेव विभाति न विभाति च ।

अनुवाद (हिन्दी)

उनके सारे अंगोंमें मैल जम गयी थी । केवल शरीर-सौन्दर्य ही उनका अलंकार था । वे कीचड़से लिपटी हुई कमलनालकी भाँति शोभा और अशोभा दोनोंसे युक्त हो रही थीं ॥ २५ ॥

अनुवाद (कन्नड)

अवळु कुसुमगळिल्लद लतॆयन्तॆ निस्तेजवागिद्दळु. अङ्गाङ्गळु धूळिनिन्द आवरिसल्पट्टिद्दवु. अलङ्कारगळिल्लदिद्दरू शरीरदिन्द दिव्यकान्तियु हॊरसूसुत्तिद्दितु. कॆसरिनिन्द बळियल्पट्ट कमलद बळ्ळियन्तॆ अप्रकाशळागियू इद्द सीतादेवियन्नु हनुमन्तनु नोडिदनु.॥25॥

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पदच्छेदः

25. igdhaaN^gii = With body smeared; malena = with dirt; vapusshaa chaapi alaMkR^itaa = being graced by her body; saa = that Seetha; vibhaati = shone; * na vibhaati cha* = and also not shining;mR^iNaaliiva = like a lotus-fibre; paN^ka digdhaaH = covered with dirt.

अनुवादः

With body smeared with dirt, being graced by Her body, that Seetha shone and also did not shine, like a lotus-fibre covered with dirt.

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

मलिनेन तु वस्त्रेण
परिक्लिष्टेन भामिनीम् ।
संवृतां मृग-शावाक्षीं
ददर्श हनुमान् कपिः ॥ २६ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

मलिनेन तु वस्त्रेण परिक्लिष्टेन भामिनीम् ।
संवृतां मृगशावाक्षीं ददर्श हनुमान् कपिः ॥ २६ ॥


मलिनेन च वस्त्रेण परिक्लिष्टेन भामिनीम् ।

अनुवाद (हिन्दी)

मैले और पुराने वस्त्रसे ढकी हुई मृगशावकनयनी भामिनी सीताको कपिवर हनुमान् ने उस अवस्थामें देखा ॥ २६ ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तां देवीं दीन-वदनाम्
अदीनां भर्तृ-तेजसा ।
रक्षितां स्वेन शीलेन
सीताम् असितलोचनाम् ॥ २७ ॥+++(5)+++

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

तां देवीं दीनवदनामदीनां भर्तृतेजसा ।
रक्षितां स्वेन शीलेन सीतामसितलोचनाम् ॥ २७ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

यद्यपि देवी सीताके मुखपर दीनता छा रही थी तथापि अपने पतिके तेजका स्मरण हो आनेसे उनके हृदयसे वह दैन्य दूर हो जाता था । कजरारे नेत्रोंवाली सीता अपने शीलसे ही सुरक्षित थीं ॥ २७ ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तां दृष्ट्वा हनुमान् सीतां
मृगशावनिभेक्षणाम् ।
मृगकन्यामिव त्रस्तां
वीक्षमाणां समन्ततः ॥ २८ ॥
दहन्तीम् इव निःश्वासैर्
वृक्षान् पल्लव-धारिणः ।
सङ्घातम् इव शोकानां
दुःखस्योर्मिम् इवोत्थिताम् ॥ २९ ॥
तां क्षमां सुविभक्ताङ्गीं
विनाभरण-शोभिनीम् ।
प्रहर्षम् अतुलं लेभे
मारुतिः प्रेक्ष्य मैथिलीम् ॥ ३० ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

तां दृष्ट्वा हनुमान् सीतां मृगशावनिभेक्षणाम् ।
मृगकन्यामिव त्रस्तां वीक्षमाणां समन्ततः ॥ २८ ॥
दहन्तीमिव निःश्वासैर्वृक्षान् पल्लवधारिणः ।
सङ्घातमिव शोकानां दुःखस्योर्मिमिवोत्थिताम् ॥ २९ ॥
तां क्षमां सुविभक्ताङ्गीं विनाभरणशोभिनीम् ।
प्रहर्षमतुलं लेभे मारुतिः प्रेक्ष्य मैथिलीम् ॥ ३० ॥

अनुवाद (हिन्दी)

उनके नेत्र मृगछौनोंके समान चञ्चल थे । वे डरी हुई मृगकन्याकी भाँति सब ओर सशंक दृष्टिसे देख रही थीं । अपने उच्छ्वासोंसे पल्लवधारी वृक्षोंको दग्ध-सी करती जान पड़ती थीं । शोकोंकी मूर्तिमती प्रतिमा-सी दिखायी देती थीं और दुःखकी उठी हुई तरंग-सी प्रतीत होती थीं । उनके सभी अंगोंका विभाग सुन्दर था । यद्यपि वे विरह-शोकसे दुर्बल हो गयी थीं तथापि आभूषणोंके बिना ही शोभा पाती थीं । इस अवस्थामें मिथिलेशकुमारी सीताको देखकर पवनपुत्र हनुमान् को उनका पता लग जानेके कारण अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ ॥ २८—३० ॥

अनुवाद (कन्नड)

दुःखवॆम्ब सागरदल्लि मेलुक्किबरुव अलॆयोपादियल्लि काणुत्तिद्दळु. चॆन्नाद अवयव सौष्ठवतॆयिन्द आभरणगळिल्लदिद्दरू शोभिसुत्तिरुव क्षमामूर्तियाद आ सीतामातॆयन्नु नोडि मारुतियु हॆच्चिन आनन्दतुन्दिलनादनु.॥30॥

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पदच्छेदः

26; 27. hanumaan kapiH = the monkey Hanuma;darasha = saw; taam deviim seethaam = that Seetha; bhaaminiim = with great beauty;asitalochanaam = with black eye;samvR^itaam = covered; vastreNa = by a cloth; pariklishhTena = which was creased; malinena = dirty; mR^iga shaabaakshiim = with eyes of a deer; diinavadanaam = with a pitiful face; adiinaam = not depressed; bhartR^i tejasaa = due to the brilliance of husband; rakshitaam = protected; * svena shiilena* = by her own character.

अनुवादः

The monkey Hanuma saw that Seetha with great beauty with black eyes, covered by a cloth which was creased and dirty, with eyes of a deer, with a pitiful face, not depressed due to the brilliance of her husband, protected by her own character.

स्रोतः: valmikiramayan.net

अनुवाद (कन्नड)

चिगुरॊडॆद वृक्षगळन्नु तन्न बिसि-बिसियाद निट्टुसिरिनिन्द सुट्टुबिडुवळो ऎम्बन्तॆ काणुत्तिद्दळु. अवळु शोक समूहवे मूर्तिमत्तागि बन्दिरुवुदो ऎम्बन्तॆ काणुत्तिद्दळु.॥29॥

अनुवाद (कन्नड)

हॆच्चु दिनगळु उपयोगिसिद्द कारण उट्टिद्द वसनवु मलिनवागित्तु. जिङ्कॆय मरिय कण्णुगळन्तॆ चञ्चलवाद कण्णुगळिन्द शोभिसुत्तिद्द जानकियन्नु वानरोत्तमनु नोडिदनु. ऒम्मॆ अवळ मुखदल्लि दैन्यभाववु मूडिदरॆ, मत्तॊम्मॆ श्रीरामन तेजस्सन्नु स्मरिसि दॊडनॆये आ दैन्यभाववु अळिसिहोगुत्तित्तु. शीलवन्नु अत्यन्त जागरूकतॆयिन्द रक्षिसिकॊळ्ळुत्तिद्द, कप्पाद कण्णुगळुळ्ळ जानकियु जिङ्कॆय कण्णुगळन्तॆ चञ्चलवाद कण्णुगळिन्द भयगॊण्ड हुल्लॆयन्तॆ अत्तलित्त नोडुत्तिद्दळु.॥26-28॥

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

28; 29. hanumaan = Hanuma; siitaam dR^ishhTvaa = on seeing Seetha (became very happy); mR^iga shaaba nibhekshaNaam = with eyes of a fawn; trastaam mR^iga kanyaamiva = fearful like a she-deer; viikshamaNaam = seeing; vR^ikshaan = trees; pallava dhaariNaH = with young shoots; dahantiimiva = as though being burnt; niHshvaasaiH = by sighs; shokaanaam samghaatamiva = like a bundle of grief; uurmimiva = like a wave; duHkhasya = of sorrow; uthitaam = risen up.

अनुवादः

Hanuma became happy on seeing Seetha with eyes of a fawn, fearful like a she-deer, seeing trees with young shoots, as though being burnt by sighs, like a bundle of grief, with a wave of sorrow risen up.

स्रोतः: valmikiramayan.net

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

30. maarutiH = The son of wind-god Hanuma;prekshya = on seeing; taam maithiliim = that Seetha; kshamaam = like the goddess Earth; suvibhaktaaN^giim = with well divided body parts; vinaabharaNa shobhiniim = shining even without ornaments; lebhe = obtained; atulam praharshaam = great joy.

अनुवादः

Hanuma the son of wind god on seeing Seetha that Seetha like the goddess earth, with well divided body parts shining eve without ornaments, obtained great joy.

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

हर्ष-जानि च सोऽश्रूणि
तां दृष्ट्वा मदिरेक्षणाम् ।
मुमोच हनुमांस् तत्र
नमश् चक्रे च राघवम् ॥ ३१ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

हर्षजानि च सोऽश्रूणि तां दृष्ट्वा मदिरेक्षणाम् ।
मुमोच हनुमांस्तत्र नमश्चक्रे च राघवम् ॥ ३१ ॥

मूलम् - VR

हर्षजानि च सोऽश्रूणि ताम् दृष्ट्वा मदिरेक्षणाम् । मुमुचे हनुमांस्तत्र नमश्चक्रे च राघवम् ॥ ५-१७-३१

अनुवाद (हिन्दी)

मनोहर नेत्रवाली सीताको वहाँ देखकर हनुमान् जी हर्षके आँसू बहाने लगे । उन्होंने मन-ही-मन श्रीरघुनाथजीको नमस्कार किया ॥ ३१ ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

नमस्कृत्वाथ रामाय
लक्ष्मणाय च वीर्यवान् ।
सीता-दर्शन-संहृष्टो
हनुमान् संवृतो ऽभवत् ॥ ३२ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

नमस्कृत्वाथ रामाय लक्ष्मणाय च वीर्यवान् ।
सीतादर्शनसंहृष्टो हनुमान् संवृतोऽभवत् ॥ ३२ ॥


नमस्कृत्वा च रामाय लक्ष्मणाय च वीर्यवान् ।
सीतादर्शनसंहृष्टो हनुमान् संवृतोभवत् ॥

मूलम् - VR

नमस्कृत्वा रामाय लक्ष्मणाय च वीर्यवान् । सीतादर्शनसम्हृष्टो हनुमान् सम्वृतोऽभवत् ॥ ५-१७-३२

अनुवाद (हिन्दी)

सीताके दर्शनसे उल्लसित हो श्रीराम और लक्ष्मणको नमस्कार करके पराक्रमी हनुमान् वहीं छिपे रहे ॥ ३२ ॥

अनुवाद (कन्नड)

अन्दवाद कण्णुगळुळ्ळ आ सीतादेवियन्नु नोडिदागले हनुमन्तन नेत्रगळिन्द आनन्दाश्रुगळु हरिदवु. बळिक महापराक्रमियाद आञ्जनेयनु मनस्सिनल्ले राघवनिगू, लक्ष्मणनिगू नमस्करिसि सीतादर्शनदिन्द संहृष्टनागि आ शिंशुपा वृक्षदल्ले उडुगिदनु.॥31-32॥

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

31. hanumaan = Hanuma; dR^ishTvaa = on seeing; taam = her;tatra = there; madirekshaNaam = with intoxicating eyes ; mumuche = shed; harshajaani ashruuNi = tears of joy;namashchakre cha = and also paid obeisance; raaghavam = to Sri Rama.

अनुवादः

Hanuma on seeing Seetha there with intoxicating eyes shed tears of joy and also paid obeisance to Sri Rama.

स्रोतः: valmikiramayan.net

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

32. siita darshana samHR^isTaa = Being joyful on seeing Seetha; hanumaan = Hanuma; viiryavaan = the mighty one; namaskR^itvaa = paid obeisance; raamaaya = to Sri Rama; lakshmaNaaya cha = and to Lakshmana;samvR^itaH abhavat = became covered (with leaves)

अनुवादः

Being joyful on seeing Seetha, Hanuma the mighty one paid obeisance to Sri Rama and to Lakshmana and became covered with leaves.

स्रोतः: valmikiramayan.net

समाप्तिः

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे सप्तदशः सर्गः ॥ १७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें सत्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १७ ॥

अनुवाद (समाप्तिः) (कन्नड)

महर्षिवाल्मीकि विरचित आदिकाव्यवाद श्रीमद्रामायणद सुन्दरकाण्डदल्लि हदिनेळनॆय सर्गवु मुगियितु.