वाचनम्
सर्वाष् टीकाः
Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy - Intro
Book II : Ayodhya Kanda - Book Of Ayodhya
Rama tries to send Lakshmana back to Ayodhya, apprehending trouble for Kousalya and others in the hands of Kaikeyi. Lakshmana however refuses to return to Ayodhya, pleasing his inability to survive in the absence of Rama. Rama thereafter agrees again for Lakshmana’s stay in the forest with him.
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भागसूचना
- श्रीरामका राजाको उपालम्भ देते हुए कैकेयीसे कौसल्या आदिके अनिष्टकी आशङ्का बताकर लक्ष्मणको अयोध्या लौटानेके लिये प्रयत्न करना, लक्ष्मणका श्रीरामके बिना अपना जीवन असम्भव बताकर वहाँ जानेसे इनकार करना, फिर श्रीरामका उन्हें वनवासकी अनुमति देना
विश्वास-प्रस्तुतिः
स तं वृक्षं समासाद्य सन्ध्यामन्वास्य पश्चिमाम् ।
रामो रमयतां श्रेष्ठ इति होवाच लक्ष्मणम् ॥ १ ॥
सर्वाष् टीकाः
मूलम्
स तं वृक्षं समासाद्य सन्ध्यामन्वास्य पश्चिमाम् ।
रामो रमयतां श्रेष्ठ इति होवाच लक्ष्मणम् ॥ १ ॥
मूलम् - VR
स तम् वृक्षम् समासाद्य संध्याम् अन्वास्य पश्चिमाम् । रामः रमयताम् श्रेष्ठैति ह उवाच लक्ष्मणम् ॥ २-५३-१
अनुवाद (हिन्दी)
उस वृक्षके नीचे पहुँचकर आनन्द प्रदान करनेवालोंमें श्रेष्ठ श्रीरामने सायंकालकी संध्योपासना करके लक्ष्मणसे इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥
अनुवाद (कन्नड)
आ वृक्षद कॆळगॆ तलुपि आनन्दप्रदान माडुववरल्लि श्रेष्ठ श्रीरामनु सायं सन्ध्यावन्दनॆ माडि लक्ष्मणनल्लि ई प्रकार हेळिदनु.॥1॥
Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy
पदच्छेदः
1. raamaH = Rama; shreshhTaH = the foremost; ramayataam = of these affording happiness to others; samasaadya = reached; tam vR^ikshham = the aforesaid tree; anvaasya = worshipped; pashchimaam = the western; sandhyaam = twilight; uvaacha ha = and spoke; iti = thus; lakshhmaNam = to Lakshmana:
अनुवादः
Rama, the foremost of those affording happiness to others, reached the aforesaid tree, worshipped the western twilight and spoke to Lakshmana as follows:
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विश्वास-प्रस्तुतिः
अद्येयं प्रथमा रात्रिर्याता जनपदाद् बहिः ।
या सुमन्त्रेण रहिता तां नोत्कण्ठितुमर्हसि ॥ २ ॥
सर्वाष् टीकाः
मूलम्
अद्येयं प्रथमा रात्रिर्याता जनपदाद् बहिः ।
या सुमन्त्रेण रहिता तां नोत्कण्ठितुमर्हसि ॥ २ ॥
अद्येयं प्रथमा रात्रिर्याता जनपदाद्बिहिः ।
या सुमन्त्रेण रहिता तां नोत्कण्ठितुमर्हसि ॥
मूलम् - VR
अद्य इयम् प्रथमा रात्रिर् याता जन पदात् बहिः । या सुमन्त्रेण रहिता ताम् न उत्कण्ठितुम् अर्हसि ॥ २-५३-२
अनुवाद (हिन्दी)
‘सुमित्रानन्दन! आज हमें अपने जनपदसे बाहर यह पहली रात प्राप्त हुई है; जिसमें सुमन्त्र हमारे साथ नहीं हैं । इस रातको पाकर तुम्हें नगरकी सुख-सुविधाओंके लिये उत्कण्ठित नहीं होना चाहिये ॥ २ ॥
अनुवाद (कन्नड)
सुमित्रानन्दन! इन्दु नमगॆ नम्म देशदिन्द हॊरगॆ इदु प्रथम रात्रि प्राप्तवागिदॆ. ईग सुमन्त्रनु नम्म जॊतॆगिल्ल. इन्दिन रात्रियल्लि नीनु नगरद सुख-सौलभ्यगळिगागि उत्कण्ठितनागबारदु.॥2॥
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पदच्छेदः
2. iyam = “This; raatriH = night; yaa = which; yaatraa = has got past (us); apya = today; bahiH = outside; janapadaat = the inhabited territory; prathamaa = is the first one; rahitaa = without; sumantreNa = Sumantra. naarahasi = You ought not; utkaN^Thitum = repent; taam = over it.”
अनुवादः
“This might which has got past us today outside the inhabited territory is the first night which has passed without Sumantra. You ought not repent over it.”
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विश्वास-प्रस्तुतिः
जागर्तव्यमतन्द्रिभ्यामद्यप्रभृति रात्रिषु ।
योगक्षेमौ हि सीताया वर्तेते लक्ष्मणावयोः ॥ ३ ॥
सर्वाष् टीकाः
मूलम्
जागर्तव्यमतन्द्रिभ्यामद्यप्रभृति रात्रिषु ।
योगक्षेमौ हि सीताया वर्तेते लक्ष्मणावयोः ॥ ३ ॥
मूलम् - VR
जागर्तव्यम् अतन्द्रिभ्याम् अद्य प्रभृति रात्रिषु । योग क्षेमः हि सीताया वर्तते लक्ष्मण आवयोह् ॥ २-५३-३
अनुवाद (हिन्दी)
‘लक्ष्मण! आजसे हम दोनों भाइयोंको आलस्य छोड़कर रातमें जागना होगा; क्योंकि सीताके योगक्षेम हम दोनोंके ही अधीन हैं ॥ ३ ॥
अनुवाद (कन्नड)
लक्ष्मण! इन्दिनिन्द नाविब्बरू आलस्यवन्नु बिट्टु रात्रियल्लि ऎच्चरवागिरबेकागुवुदु, एकॆन्दरॆ सीतॆय योगक्षेमवु नम्मिब्बर हॊणॆयागिदॆ.॥3॥
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पदच्छेदः
3. lakshhmaNaH = “Oh; Lakshmana! atandribhyaam = Remaining free from lassitude; jaagartavyam = (we must both) keep awake; raatrishhu = during nights; adya prabhR^iti = from today. yoga kshhemou = The gain and security; siitaayaaH = of Sita; vartate hi = indeed depend; aavayoH = on us two.”
अनुवादः
“Remaining free from lassitude, we must both keep awake during nights, from today Lakshmana! The safety and welfare of Sita indeed depend on us two.”
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विश्वास-प्रस्तुतिः
रात्रिं कथञ्चिदेवेमां सौमित्रे वर्तयामहे ।
अपवर्तामहे भूमावास्तीर्य स्वयमर्जितैः ॥ ४ ॥
सर्वाष् टीकाः
मूलम्
रात्रिं कथञ्चिदेवेमां सौमित्रे वर्तयामहे ।
अपवर्तामहे भूमावास्तीर्य स्वयमर्जितैः ॥ ४ ॥
रात्रिं कथञ्चिदेवेमां सौमित्रे वर्तयामहे ।
अपावर्तामहे भूमावास्तीर्य स्वयमर्जितैः ॥
मूलम् - VR
रात्रिम् कथंचित् एव इमाम् सौमित्रे वर्तयामहे । उपावर्तामहे भूमाव् आस्तीर्य स्वयम् आर्जितैः ॥ २-५३-४
अनुवाद (हिन्दी)
‘सुमित्रानन्दन! यह रात हमलोग किसी तरह बितायँगे और स्वयं संग्रह करके लाये हुए तिनकों और पत्तोंकी शय्या बनाकर उसे भूमिपर बिछाकर उसपर किसी तरह सो लेंगे’ ॥ ४ ॥
अनुवाद (कन्नड)
सुमित्रानन्दन! ई रात्रियन्नु नावु हेगो कळॆयुवॆवु हागू स्वतः सङ्ग्रहिसि तन्दिरुव हुल्लु मत्तु ऎलॆगळ शय्यॆयन्नु माडि नॆलदल्लि अदन्नु हासि हेगो मलगुवॆवु.॥4॥
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पदच्छेदः
4. vartayaamahe = “Let us pass; imaam raatrim = this night; kathamchideva = any how; soumitre = Lakshmana! upaavartaamahe = Let us lie down; bhuumou = on the ground;aastiirya = covering it; aarjitaiH = (by things ) procured; svayam = by our own(hands).”
अनुवादः
“Let us pass this night anyhow, Lakshmana! Let us lie down on the ground, covering it by straw, leaves and so on, procured by our own hands.”
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विश्वास-प्रस्तुतिः
स तु संविश्य मेदिन्यां महार्हशयनोचितः ।
इमाः सौमित्रये रामो व्याजहार कथाः शुभाः ॥ ५ ॥
सर्वाष् टीकाः
मूलम्
स तु संविश्य मेदिन्यां महार्हशयनोचितः ।
इमाः सौमित्रये रामो व्याजहार कथाः शुभाः ॥ ५ ॥
मूलम् - VR
स तु सम्विश्य मेदिन्याम् महा अर्ह शयन उचितः । इमाः सौमित्रये रामः व्याजहार कथाः शुभाः ॥ २-५३-५
अनुवाद (हिन्दी)
जो बहुमूल्य शय्यापर सोनेके योग्य थे, वे श्रीराम भूमिपर ही बैठकर सुमित्राकुमार लक्ष्मणसे ये शुभ बातें कहने लगे—* ॥ ५ ॥
\* श्लोक ६ से लेकर २६ तक श्रीरामचन्द्रजीने जो बातें कही हैं, वे लक्ष्मणकी परीक्षाके लिये तथा उन्हें अयोध्या लौटानेके लिये कही गयी हैं; वास्तवमें उनकी ऐसी मान्यता नहीं थी । यही बात यहाँ सभी व्याख्याकारोंने स्वीकार की है ।
अनुवाद (कन्नड)
बहुमूल्य शय्यॆयल्लि मलगलु योग्यनागिद्द श्रीरामनु भूमियल्लि कुळितुकॊण्डु सुमित्रा कुमार लक्ष्मणनल्लि ई शुभ मातन्नु हेळतॊडगिदनु.॥5॥*
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पदच्छेदः
5. samvishya = Streching himself; madinyaam = on the ground; saH = Rama; mahaarha shayanochitaH = who was accustomed to a luxurious coach; vyaajahaara = uttered; imaaH = these; shubhaaH = suitable; kathaaH = words; soumitraye = to Lakshmana:
अनुवादः
Streching himself on the bare ground, Rama, who was accustomed to a luxurious coach, uttered the following suitable words to Lakshmana:
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विश्वास-प्रस्तुतिः
ध्रुवमद्य महाराजो दुःखं स्वपिति लक्ष्मण ।
कृतकामा तु कैकेयी तुष्टा भवितुमर्हति ॥ ६ ॥
सर्वाष् टीकाः
मूलम्
ध्रुवमद्य महाराजो दुःखं स्वपिति लक्ष्मण ।
कृतकामा तु कैकेयी तुष्टा भवितुमर्हति ॥ ६ ॥
मूलम् - VR
ध्रुवम् अद्य महा राजो दुह्खम् स्वपिति लक्ष्मण । कृत कामा तु कैकेयी तुष्टा भवितुम् अर्हति ॥ २-५३-६
अनुवाद (हिन्दी)
‘लक्ष्मण! आज महाराज निश्चय ही बड़े दुःखसे सो रहे होंगे; परंतु कैकेयी सफलमनोरथ होनेके कारण बहुत संतुष्ट होगी ॥ ६ ॥
अनुवाद (कन्नड)
लक्ष्मण! इन्दु महाराजरु निश्चयवागियू तुम्बा दुःखदिन्द मलगिरबहुदु; आदरॆ कैकेयियु सफल मनोरथळाद कारण बहळ सन्तुष्टळागिरबहुदु.॥6॥
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पदच्छेदः
6. dhruvam = “assuredly; mahaaraajaH = the emperor; svapiti = is sleeping; duHkham = badly; adya = to-night; kaikeyiitu = while Kaikeyi; kR^takaamaa = having realized her ambitions; arhati = ought; bhavitum = to feel; tushhTaa = satisfied.”
अनुवादः
“Assuredly the emperor is sleeping badly tonight, while Kaikeyi, having realized her ambitions, ought to feel satisfied.”
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विश्वास-प्रस्तुतिः
सा हि देवी महाराजं कैकेयी राज्यकारणात् ।
अपि न च्यावयेत् प्राणान् दृष्ट्वा भरतमागतम् ॥ ७ ॥
सर्वाष् टीकाः
मूलम्
सा हि देवी महाराजं कैकेयी राज्यकारणात् ।
अपि न च्यावयेत् प्राणान् दृष्ट्वा भरतमागतम् ॥ ७ ॥
मूलम् - VR
सा हि देवी महा राजम् कैकेयी राज्य कारणात् । अपि न च्यावयेत् प्राणान् दृष्ट्वा भरतम् आगतम् ॥ २-५३-७
अनुवाद (हिन्दी)
‘कहीं ऐसा न हो कि रानी कैकेयी भरतको आया देख राज्यके लिये महाराजको प्राणोंसे भी वियुक्त कर दे ॥ ७ ॥
अनुवाद (कन्नड)
राणी कैकेयियु भरतनु बन्दिरुवुदन्नु नोडि राज्यक्कागि महाराजरन्नु प्राणगळिन्दलू कूड विमुक्तिकॊडदॆ इरलि.॥7॥
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पदच्छेदः
7. dR^ishhTvaa = “seeing; bharatam = Bharata; aagatam = returned; saa = that; devii = queen; kaikeyii = Kaikeyi; na chyaavayedapi = (I am afraid) may not expel; praaNaan = the lives; mahaaraajam = of the emperor; raajya kaaraNaat = hi indeed for the sake of kingdom.”
अनुवादः
“Seeing Bharata returned, queen Kaikeyi, I am afraid, may not expel the lives of the emperor for the sake of kingdom.”
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विश्वास-प्रस्तुतिः
अनाथश्च हि वृद्धश्च मया चैव विना कृतः ।
किं करिष्यति कामात्मा कैकेय्या वशमागतः ॥ ८ ॥
सर्वाष् टीकाः
मूलम्
अनाथश्च हि वृद्धश्च मया चैव विना कृतः ।
किं करिष्यति कामात्मा कैकेय्या वशमागतः ॥ ८ ॥
मूलम् - VR
अनाथः चैव वृद्धः च मया चैव विनाकृतः । किम् करिष्यति काम आत्मा कैकेय्या वशम् आगतः ॥ २-५३-८
अनुवाद (हिन्दी)
‘महाराजका कोई रक्षक न होनेके कारण वे इस समय अनाथ हैं, बूढ़े हैं और उन्हें मेरे वियोगका सामना करना पड़ा है । उनकी कामना मनमें ही रह गयी तथा वे कैकेयीके वशमें पड़ गये हैं; ऐसी दशामें वे बेचारे अपनी रक्षाके लिये क्या करेंगे? ॥ ८ ॥
अनुवाद (कन्नड)
महाराजरिगॆ यारू रक्षकरु इल्लदिरुव कारण अवरु ईग अनाथरागिद्दारॆ, मुदुकरागिद्दारॆ मत्तु अवरिगॆ नन्न वियोगवन्नु ऎदुरिसबेकायितु. अवर कामनॆ मनस्सिनल्ले उळिदु, अवरु कैकेयिय वशरागिद्दारॆ; इन्तह स्थितियल्लि बडपायि अवरु तन्न रक्षणॆगागि एनु माडुत्तिरुवरो.॥8॥
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पदच्छेदः
8. vR^iddhascha = “aged; anaathashcha = (and therefore) helpless; mayaarinaacha = deprived of my presence; kim karishhyati = what will he do; kR^itaH = dominated as he is; kaamaatmaa = by his passion (for Kaikeyi); aagataH = and who has fallen; kaikeyiivasham = into clutches of Kaikeyi.”
अनुवादः
“Aged and (therefore) helpless, deprived of my presence, what will he do, dominated as he is by his passion for Kaikeyi and who has fallen into the clutches of Kaikeyi.”
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विश्वास-प्रस्तुतिः
इदं व्यसनमालोक्य राज्ञश्च मतिविभ्रमम् ।
काम एवार्थधर्माभ्यां गरीयानिति मे मतिः ॥ ९ ॥
सर्वाष् टीकाः
मूलम्
इदं व्यसनमालोक्य राज्ञश्च मतिविभ्रमम् ।
काम एवार्थधर्माभ्यां गरीयानिति मे मतिः ॥ ९ ॥
मूलम् - VR
इदम् व्यसनम् आलोक्य राज्ञः च मति विभ्रमम् । कामएव अर्ध धर्माभ्याम् गरीयान् इति मे मतिः ॥ २-५३-९
अनुवाद (हिन्दी)
‘अपने ऊपर आये हुए इस संकटको और राजाकी मतिभ्रान्तिको देखकर मुझे ऐसा मालूम होता है कि अर्थ और धर्मकी अपेक्षा कामका ही गौरव अधिक है ॥ ९ ॥
अनुवाद (कन्नड)
नम्म मेलॆ बन्दॆरगिद ई सङ्कट मत्तु राजर मतिभ्रान्तियन्नु नोडिदरॆ अर्थ मत्तु धर्मक्किन्तलू कामवे हॆच्चु गौरवशालियागिदॆ ऎन्दु ननगॆ अनिसुत्तदॆ.॥9॥
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पदच्छेदः
9. aalokya = “reflecting on; idam = this; vyasanam = misfortune; raaG^yaH = of the king; mativibhramamcha = and his mental derangement; me = my; matiH = belief; iti = (is) that; kaama eva = passion alone; gariiyaan = is stronger; artha dharmaabhyaam = than earthly gain and religious merit.”
अनुवादः
“Reflecting on this misfortune of the king and his mental derangement, I deem that passion alone is greater than early gain and religious merit.”
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विश्वास-प्रस्तुतिः
को ह्यविद्वानपि पुमान् प्रमदायाः कृते त्यजेत् ।
छन्दानुवर्तिनं पुत्रं तातो मामिव लक्ष्मण ॥ १० ॥
सर्वाष् टीकाः
मूलम्
को ह्यविद्वानपि पुमान् प्रमदायाः कृते त्यजेत् ।
छन्दानुवर्तिनं पुत्रं तातो मामिव लक्ष्मण ॥ १० ॥
को ह्यविद्वानपि पुमान्प्रवदायाः कृते त्यजेत् ।
छन्दानुवर्तिनं पुत्रं तातो मामिव लक्ष्मण ॥
मूलम् - VR
को हि अविद्वान् अपि पुमान् प्रमदायाः कृते त्यजेत् । चन्द अनुवर्तिनम् पुत्रम् तातः माम् इव लक्ष्मण ॥ २-५३-१०
अनुवाद (हिन्दी)
‘लक्ष्मण! पिताजीने जिस तरह मुझे त्याग दिया है, उस प्रकार अत्यन्त अज्ञ होनेपर भी कौन ऐसा पुरुष होगा, जो एक स्त्रीके लिये अपने आज्ञाकारी पुत्रका परित्याग कर दे? ॥ १० ॥
अनुवाद (कन्नड)
लक्ष्मण! तन्दॆयवरु नन्नन्नु त्यजिसिदन्तॆ, अत्यन्त अज्ञानियागिद्दरू ऒन्दु स्त्रीगागि तन्न आज्ञाकारी पुत्रनन्नु परित्याग माडुव पुरुष यारु ताने इरबल्लनु.॥10॥
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पदच्छेदः
10. kaH pumaan = “what man; avidyaanapi = however deluded; tataH = (what) father; pramadaayaaH kR^ite = on account of a woman; chandaamvartinam = at his own will and pleasure; tyajet = abandon; putram = a son; maamiva = like myself?”
अनुवादः
“what man however deluded, what father on account of a woman, at his own will and pleasure, abandon a son like myself?
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विश्वास-प्रस्तुतिः
सुखी बत सुभार्यश्च भरतः केकयीसुतः ।
मुदितान् कोसलानेको यो भोक्ष्यत्यधिराजवत् ॥ ११ ॥
सर्वाष् टीकाः
मूलम्
सुखी बत सुभार्यश्च भरतः केकयीसुतः ।
मुदितान् कोसलानेको यो भोक्ष्यत्यधिराजवत् ॥ ११ ॥
मूलम् - VR
सुखी बत सभार्यः च भरतः केकयी सुतः । मुदितान् कोसलान् एको यो भोक्ष्यति अधिराजवत् ॥ २-५३-११
अनुवाद (हिन्दी)
‘कैकेयीकुमार भरत ही सुखी और सौभाग्यवती स्त्रीके पति हैं, जो अकेले ही हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे भरे हुए कोसलदेशका सम्राट्की भाँति पालन करेंगे ॥ ११ ॥
अनुवाद (कन्नड)
कैकेयिकुमार भरतनू कूड सुखी मत्तु सौभाग्यवति स्त्रीय पतियागिद्दानॆ. अवनु ऒब्बने हृष्ट-पुष्ट मनुष्यरिन्द तुम्बिद कोसल देशवन्नु साम्राटनन्तॆ आळुवनु.॥11॥
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पदच्छेदः
11. bataH = “Alas; kaikeyiisutaH = Kaikeyi’s son; bharataH = Bharata; ekaH = alone; sukhii = is happy; sa bhaaryaH = along with his wife; yaH = who; adhiraajavat = like an overlord; bhokshhyati = will enjoy; muditaan = the prosperous; kosalaan = kingdom of Kosala.”
अनुवादः
“Alas, Kaikeyi’s son Bharata (alone) is happy along with his wife. Like an overlord, he is going to enjoy the prosperous kingdom of Kosala.”
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विश्वास-प्रस्तुतिः
स हि राज्यस्य सर्वस्य सुखमेकं भविष्यति ।
ताते तु वयसातीते मयि चारण्यमाश्रिते ॥ १२ ॥
सर्वाष् टीकाः
मूलम्
स हि राज्यस्य सर्वस्य सुखमेकं भविष्यति ।
ताते तु वयसातीते मयि चारण्यमाश्रिते ॥ १२ ॥
मूलम् - VR
स हि सर्वस्य राज्यस्य मुखम् एकम् भविष्यति । ताते च वयसा अतीते मयि च अरण्यम् आश्रिते ॥ २-५३-१२
अनुवाद (हिन्दी)
‘पिताजी अत्यन्त वृद्ध हो गये हैं और मैं वनमें चला आया हूँ, ऐसी दशामें केवल भरत ही समस्त राज्यके श्रेष्ठ सुखका उपभोग करेंगे ॥ १२ ॥
अनुवाद (कन्नड)
तन्दॆयवरु अत्यन्त वृद्धरागिद्दारॆ मत्तु नानु काडिगॆ बन्दिद्देनॆ. इन्तह स्थितियल्लि केवल भरतने समस्त राज्यद श्रेष्ठ सुखवन्नु अनुभविसुवनु.॥12॥
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पदच्छेदः
12. taate = “father; vayasaa atiite = is superannuated. Mayicha = I; aasthite = am staying; areNyam = in the forest. saH = Bharata; bhavishhyanti = will become; ekam = the prime; mukham = head; sarvasya = for the entire; raajyasya = kingdom.”
अनुवादः
“Father is superannuated. I am staying in the forest. Bharata will become the prime head for the entire kingdom.”
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विश्वास-प्रस्तुतिः
अर्थधर्मौ परित्यज्य यः काममनुवर्तते ।
एवमापद्यते क्षिप्रं राजा दशरथो यथा ॥ १३ ॥
सर्वाष् टीकाः
मूलम्
अर्थधर्मौ परित्यज्य यः काममनुवर्तते ।
एवमापद्यते क्षिप्रं राजा दशरथो यथा ॥ १३ ॥
मूलम् - VR
अर्थ धर्मौ परित्यज्य यः कामम् अनुवर्तते । एवम् आपद्यते क्षिप्रम् राजा दशरथो यथा ॥ २-५३-१३
अनुवाद (हिन्दी)
‘सच है, जो अर्थ और धर्मका परित्याग करके केवल कामका अनुसरण करता है, वह उसी प्रकार शीघ्र ही आपत्तिमें पड़ जाता है, जैसे इस समय महाराज दशरथ पड़े हैं ॥ १३ ॥
अनुवाद (कन्नड)
अर्थ मत्तु धर्मद परित्याग माडि केवल कामवन्नु अनुसरिसुववनु शीघ्रवागि ईग महाराजरु बिद्द हागॆये आपत्तिनल्लि बीळुत्तानॆ; इदु सत्यवागिदॆ.॥13॥
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पदच्छेदः
13. yaH = “he who; anuvartate = persues; kaamam = sensuous pleasures; parityajya = neglecting; artha dharmou = his real interests and discipline; kshhipram = soon; aapadyate = comes to distress; evam = in the same way; raaja dasharatho yathaa = as king Dasaratha has.”
अनुवादः
“He who pursues sensuous pleasures neglecting his real interests and discipline soon comes to distress; in the same way as king Dasaratha has.”
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विश्वास-प्रस्तुतिः
मन्ये दशरथान्ताय मम प्रव्राजनाय च ।
कैकेयी सौम्य सम्प्राप्ता राज्याय भरतस्य च ॥ १४ ॥
सर्वाष् टीकाः
मूलम्
मन्ये दशरथान्ताय मम प्रव्राजनाय च ।
कैकेयी सौम्य सम्प्राप्ता राज्याय भरतस्य च ॥ १४ ॥
मूलम् - VR
मन्ये दशरथ अन्ताय मम प्रव्राजनाय च । कैकेयी सौम्य सम्प्राप्ता राज्याय भरतस्य च ॥ २-५३-१४
अनुवाद (हिन्दी)
‘सौम्य! मैं समझता हूँ कि महाराज दशरथके प्राणोंका अन्त करने, मुझे देशनिकाला देने और भरतको राज्य दिलानेके लिये ही कैकेयी इस राजभवनमें आयी थी ॥ १४ ॥
अनुवाद (कन्नड)
सौम्य! महाराजर प्राणगळन्नु कॊनॆगॊळिसलु, नन्नन्नु काडिगॆ अट्टलु मत्तु भरतनिगॆ राज्यवन्नु कॊडिसलॆन्दे कैकेयियु ई राजभवनक्कॆ बन्दिरुवळु ऎन्दु नानु तिळियुत्तेनॆ.॥14॥
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पदच्छेदः
14. soumya = “Oh;good brother; manye = I think; kaikeyii- = that Kaikeyi; sampraaptaa = came (into our house); dasharathaantaaya = to bring about an end to Dasaratha; mama pravraajanaayacha = to send me into exile; raajyaayacha = (and to secure) kingship; bharatasya = for Bharata.”
अनुवादः
“It seems that Kaikeyi came into our house, oh good brother, to bring about an end to Dasaratha, to send me into exile and to secure kingship for Bharata.”
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विश्वास-प्रस्तुतिः
अपीदानीं तु कैकेयी सौभाग्यमदमोहिता ।
कौसल्यां च सुमित्रां च सा प्रबाधेत मत्कृते ॥ १५ ॥
सर्वाष् टीकाः
मूलम्
अपीदानीं तु कैकेयी सौभाग्यमदमोहिता ।
कौसल्यां च सुमित्रां च सा प्रबाधेत मत्कृते ॥ १५ ॥
मूलम् - VR
अपि इदानीम् न कैकेयी सौभाग्य मद मोहिता । कौसल्याम् च सुमित्राम् च सम्प्रबाधेत मत् कृते ॥ २-५३-१५
अनुवाद (हिन्दी)
‘इस समय भी सौभाग्यके मदसे मोहित हुई कैकेयी मेरे कारण कौसल्या और सुमित्राको कष्ट पहुँचा सकती है ॥ १५ ॥
अनुवाद (कन्नड)
ईगलू सौभाग्यद मददिन्द मोहितळाद कैकेयियु नन्न कारणदिन्द कौसल्या मत्तु सुमित्रॆयरिगॆ कष्टकॊडुत्ता इरबहुदु.॥15॥
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पदच्छेदः
15. soubhaagya mada mohitaa = “blinded by pride of good fortune; kaikeyii = will Kaikeyi; api idaaniim = even now; na samprabaadheta = not persecute; kausalyaamcha = and Sumitra; matkR^ite = because of their relationship with me.”
अनुवादः
“Blinded by pride of good fortune, Kaikeyi may even now persecute Kausalya and Sumitra because of their relationship with me.”
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विश्वास-प्रस्तुतिः
मातास्मत्कारणाद् देवी सुमित्रा दुःखमावसेत् ।
अयोध्यामित एव त्वं काले प्रविश लक्ष्मण ॥ १६ ॥
सर्वाष् टीकाः
मूलम्
मातास्मत्कारणाद् देवी सुमित्रा दुःखमावसेत् ।
अयोध्यामित एव त्वं काले प्रविश लक्ष्मण ॥ १६ ॥
मूलम् - VR
मा स्म मत् कारणात् देवी सुमित्रा दुह्खम् आवसेत् । अयोध्याम् इतएव त्वम् काले प्रविश लक्ष्मण ॥ २-५३-१६
अनुवाद (हिन्दी)
‘हमलोगोंके कारण तुम्हारी माता सुमित्रादेवीको बड़े दुःखके साथ वहाँ रहना पड़ेगा; अतः लक्ष्मण! तुम यहींसे कल प्रातःकाल अयोध्याको लौट जाओ ॥ १६ ॥
अनुवाद (कन्नड)
नम्मिन्दागि निन्न तायि सुमित्रादेविगॆ बहळ दुःखदिन्द अल्लि इरबेकादीतु ; आद्दरिन्द लक्ष्मण! नीनु इल्लिन्द नाळॆ बॆळिग्गॆये अयोध्यॆगॆ मरळि होगु.॥16॥
Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy
पदच्छेदः
16. devii = “queen; sumitraa = Sumitra; maa aavaset sma = will she not dwell; duHkham = with hardship; matkaaraNaat = because of her affinity to me? tvam = You; pravisha = enter; ayodhyaam = Ayodhya; ita eva = from this very place; kaalye = next morning; lakshhmaNa = oh; Lakshmana!”
अनुवादः
“Queen Sumitra is likely to suffer hardship because of her affinity to us. From this very place, you proceed to Ayodhya next morning, oh, Lakshmana!”
स्रोतः: valmikiramayan.net
विश्वास-प्रस्तुतिः
अहम् एको गमिष्यामि
सीतया सह दण्डकान् ।
अनाथाया हि नाथस् त्वं
कौसल्याया भविष्यसि ॥ १७ ॥
सर्वाष् टीकाः
मूलम्
अहमेको गमिष्यामि सीतया सह दण्डकान् ।
अनाथाया हि नाथस्त्वं कौसल्याया भविष्यसि ॥ १७ ॥
अहमेको गमिष्यामि सीतया सह दण्डकान् ।
अनाथाय हि नाथस्त्वं कौसल्याया भविष्यसि ॥
मूलम् - VR
अहम् एको गमिष्यामि सीतया सह दण्डकान् । अनाथाया हि नाथः त्वम् कौसल्याया भविष्यसि ॥ २-५३-१७
अनुवाद (हिन्दी)
‘मैं अकेला ही सीताके साथ दण्डकवनको जाऊँगा । तुम वहाँ मेरी असहाय माता कौसल्याके सहायक हो जाओगे ॥ १७ ॥
अनुवाद (कन्नड)
नानॊब्बने सीतॆयॊन्दिगॆ दण्डकारण्यक्कॆ होगुवॆनु. नीनु अल्लि नन्न असहायकळाद तायि कौसल्यॆय सहायकनागुवॆ.॥17॥
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पदच्छेदः
17. aham = “I; ekaH = alone; gamishhyaami = will go; siitayaa saha = along with Sita; daNdakaan = to Dandaka forest. tvam = You; bhavishhyasi = become; naathaH = protector; kausalyaa = to Kausalya; anaathaayaaH = the supportless.”
अनुवादः
“I shall proceed to Dandaka forest alone with Sita, while you will be the protector for Kausalya, who has no defender.”
स्रोतः: valmikiramayan.net
विश्वास-प्रस्तुतिः
क्षुद्रकर्मा हि कैकेयी
द्वेषाद् अन्यायम् आचरेत् ।
परिदद्याद्+धि धर्मज्ञ
गरं ते मम मातरम् ॥ १८ ॥
सर्वाष् टीकाः
मूलम्
क्षुद्रकर्मा हि कैकेयी द्वेषादन्यायमाचरेत् ।
परिदद्याद्धि धर्मज्ञ गरं ते मम मातरम् ॥ १८ ॥
मूलम् - VR
क्षुद्र कर्मा हि कैकेयी द्वेषात् अन्याय्यम् आचरेत् । परिदद्या हि धर्मज्ञे भरते मम मातरम् ॥ २-५३-१८
अनुवाद (हिन्दी)
‘धर्मज्ञ लक्ष्मण! कैकेयीके कर्म बड़े खोटे हैं । वह द्वेषवश अन्याय भी कर सकती है । तुम्हारी और मेरी माताको जहर भी दे सकती है ॥ १८ ॥
अनुवाद (कन्नड)
धर्मज्ञ लक्ष्मण! कैकेयिय कर्म बहळ क्षुद्रवागिदॆ. अवळु द्वेषवश अन्यायवन्नु माडबल्लळु. निन्न मत्तु नन्न तायन्दिरिगॆ विषवन्नू कूड कॊडबहुदु.॥18॥
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पदच्छेदः
18. kaikeyii = “Kaikeyi; kshhudra karmaa = of base deeds; aacharet = may resort to; anyaayyam = unjustified means; dveshhyam = to be disliked. paridadyaHhi = Give(for protection); mama = my; maataram = mother; bharate = to Bharata; dharmaG^ye = oh; virtuous prince!”
अनुवादः
“Kaikeyi of base deeds may resort to unjustified means to be disliked. Give (for protection) my mother to Bharata, oh virtuous Prince!”
स्रोतः: valmikiramayan.net
विश्वास-प्रस्तुतिः
नूनं जात्यन्तरे तात स्त्रियः पुत्रैर्वियोजिताः ।
जनन्या मम सौमित्रे तदद्यैतदुपस्थितम् ॥ १९ ॥
सर्वाष् टीकाः
मूलम्
नूनं जात्यन्तरे तात स्त्रियः पुत्रैर्वियोजिताः ।
जनन्या मम सौमित्रे तदद्यैतदुपस्थितम् ॥ १९ ॥
मूलम् - VR
नूनम् जाति अन्तरे कस्मिंस् स्त्रियः पुत्रैः वियोजिताः । जनन्या मम सौमित्रे तत् अपि एतत् उपस्थितम् ॥ २-५३-१९
अनुवाद (हिन्दी)
‘तात सुमित्राकुमार! निश्चय ही पूर्वजन्ममें मेरी माताने कुछ स्त्रियोंका उनके पुत्रोंसे वियोग कराया होगा, उसी पापका यह पुत्र-बिछोहरूप फल आज उन्हें प्राप्त हुआ है ॥ १९ ॥
अनुवाद (कन्नड)
अय्या, सुमित्राकुमार! निश्चयवागिये हिन्दिन जन्मदल्लि नन्न तायियु कॆलवु स्त्रीयर पुत्ररन्नु अगलिसिरबहुदु. आ पापद फलवागिये ई पुत्रवियोग ऎम्ब दुःखवु आकॆगॆ प्राप्तवागिदॆ.॥19॥
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पदच्छेदः
19. kasmin jaatyantare = “In some other birth; soumitre = Oh; Lakshmana; striyaH = women; viyojitaaH = must have been deprived; putraiH = of their sons; mama jananyaa = by my mother. Tasmaat = For that reason; etat = this upasthitam = has arisen; nuunam = certainly.”
अनुवादः
“In some other (past) birth, women must have been deprived of their sons by my mother (Kausalya), oh, Lakshmana! For that reason this has arisen certainly.”
स्रोतः: valmikiramayan.net
विश्वास-प्रस्तुतिः
मया हि चिरपुष्टेन दुःखसंवर्धितेन च ।
विप्रयुज्यत कौसल्या फलकाले धिगस्तु माम् ॥ २० ॥
सर्वाष् टीकाः
मूलम्
मया हि चिरपुष्टेन दुःखसंवर्धितेन च ।
विप्रयुज्यत कौसल्या फलकाले धिगस्तु माम् ॥ २० ॥
मूलम् - VR
मया हि चिर पुष्टेन दुह्ख सम्वर्धितेन च । विप्रायुज्यत कौसल्या फल काले धिग् अस्तु माम् ॥ २-५३-२०
अनुवाद (हिन्दी)
‘मेरी माताने चिरकालतक मेरा पालन-पोषण किया और स्वयं दुःख सहकर मुझे बड़ा किया । अब जब पुत्रसे प्राप्त होनेवाले सुखरूपी फलके भोगनेका अवसर आया, तब मैंने माता कौसल्याको अपनेसे बिलग कर दिया । मुझे धिक्कार है! ॥ २० ॥
अनुवाद (कन्नड)
नन्न तायियु चिरकाल नन्नन्नु पालिसि-पोषिसिरुवळु मत्तु स्वतः दुःखवन्नु सहिसिकॊण्डु नन्नन्नु बॆळॆसिरुवळु. ईग पुत्रनिन्द सिगबहुदाद सुखवन्नु अनुभविसुव सन्दर्भ बन्दाग नानु तायियिन्द बेरॆयादॆ. ननगॆ धिक्कारविरलि.॥20॥
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पदच्छेदः
20. phala kale = “At a time when benefit is to be obtained; mayaa = by me; kausalyaa = Kausalya; vipraayujyata = has been deprived of my company by me; chirapushhTena = who was nurtured up with great pains; astu = Let it be; dhik = woe; maam = to me.”
अनुवादः
“At a time when Kausalya should have obtained benefits for her labors repaid by me, she has been deprived of my company by me, who was nurtured by her for a long time and brought up with great pains. Woe to me.”
स्रोतः: valmikiramayan.net
विश्वास-प्रस्तुतिः
मा स्म सीमन्तिनी काचिज्जनयेत् पुत्रमीदृशम् ।
सौमित्रे योऽहमम्बाया दद्मि शोकमनन्तकम् ॥ २१ ॥
सर्वाष् टीकाः
मूलम्
मा स्म सीमन्तिनी काचिज्जनयेत् पुत्रमीदृशम् ।
सौमित्रे योऽहमम्बाया दद्मि शोकमनन्तकम् ॥ २१ ॥
मूलम् - VR
मा स्म सीमन्तिनी काचिज् जनयेत् पुत्रम् ईदृशम् । सौमित्रे यो अहम् अम्बाया दद्मि शोकम् अनन्तकम् ॥ २-५३-२१
अनुवाद (हिन्दी)
‘सुमित्रानन्दन! कोई भी सौभाग्यवती स्त्री कभी ऐसे पुत्रको जन्म न दे, जैसा मैं हूँ; क्योंकि मैं अपनी माताको अनन्त शोक दे रहा हूँ ॥ २१ ॥
अनुवाद (कन्नड)
सुमित्रानन्दन! यावुदे सौभाग्यवती स्त्रीयु ऎन्दू नन्नन्तह पुत्रनिगॆ जन्म नीडदिरलि ; एकॆन्दरॆ नानु नन्न तायिगॆ अनन्तशोकवन्नु कॊडुत्ता इद्देनॆ.॥21॥
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पदच्छेदः
21. maasma kaachit siimantinii = “Let no woman ever; janayet = give birth; iidR^isham = to such; putram = a son; yaH = as; aham = myself; dadmii = who has given; ananthakam = endless; shokam = sorrow; ambaayaaH = to my mother; soumitre = oh; Lakshmana!”
अनुवादः
“Let no woman ever give birth to such a son as myself, who have caused perpetual grief to my mother, oh, Lakshmana!”
स्रोतः: valmikiramayan.net
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन्ये प्रीतिविशिष्टा सा मत्तो लक्ष्मण सारिका ।
यत्तस्याः श्रूयते वाक्यं शुक पादमरेर्दश ॥ २२ ॥
सर्वाष् टीकाः
मूलम्
मन्ये प्रीतिविशिष्टा सा मत्तो लक्ष्मण सारिका ।
यत्तस्याः श्रूयते वाक्यं शुक पादमरेर्दश ॥ २२ ॥
मूलम् - VR
मन्ये प्रीति विशिष्टा सा मत्तः लक्ष्मण सारिका । यस्याः तत् श्रूयते वाक्यम् शुक पादम् अरेर् दश ॥ २-५३-२२
अनुवाद (हिन्दी)
‘लक्ष्मण! मैं तो ऐसा मानता हूँ कि माता कौसल्यामें मुझसे अधिक प्रेम उनकी पाली हुई वह सारिका ही करती है; क्योंकि उसके मुखसे माँको सदा यह बात सुनायी देती है कि ‘ऐ तोते! तू शत्रुके पैरको काट खा’ (अर्थात् हमें पालनेवाली माता कौसल्याके शत्रुके पाँवको चोंच मार दे । वह पक्षिणी होकर माताका इतना ध्यान रखती है और मैं उनका पुत्र होकर भी उनके लिये कुछ नहीं कर पाता) ॥ २२ ॥
अनुवाद (कन्नड)
लक्ष्मण! तायि कौसल्यॆगॆ ननगिन्त हॆच्चु प्रेम अवळु साकिद सारिका पक्षिय मेलिदॆ ; एकॆन्दरॆ, अदर मुखदिन्द ‘ऎलै गिळिये! नीनु शत्रुविन कालन्नु कुटुकु’ ऎम्ब मातन्नु तायियु सदा केळुत्तिद्दळु. (अर्थात् नम्मन्नु साकिद तायि कौसल्यॆय शत्रुविन कालिगॆ कच्चु. आ पक्षियागिद्दरू तायिय कुरितु इष्टु गमनकॊडुत्तिरुवाग नानु पुत्रनागियू आकॆय कुरितु एनू माडदादॆ.॥22॥
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पदच्छेदः
22. manye = “I think; saa shaarikaa = that myna (which is kept as a pet by mother Kausalya); priitivishishhTaa = is more affectionate; mattaH = than I; yasyaaH = (since)her; shruuyate = are heard; tat vaakyam = the words; dasha = “Bite ; shuka = oh; parrot; paadam = the foot; areH = of the enemy’; lakshhmaNa = oh; Lakshmana!”
अनुवादः
“Oh, Lakshmana! I think that myna (which is kept as a pet by mother Kausalya) is more affectionate than I, since her are heard the words, “Bite, oh parrot, the foot of the enemy.”
स्रोतः: valmikiramayan.net
विश्वास-प्रस्तुतिः
शोचन्त्याश्चाल्पभाग्याया न किञ्चिदुपकुर्वता ।
पुत्रेण किमपुत्राया मया कार्यमरिन्दम ॥ २३ ॥
सर्वाष् टीकाः
मूलम्
शोचन्त्याश्चाल्पभाग्याया न किञ्चिदुपकुर्वता ।
पुत्रेण किमपुत्राया मया कार्यमरिन्दम ॥ २३ ॥
मूलम् - VR
शोचन्त्याः च अल्प भाग्याया न किंचित् उपकुर्वता । पुर्त्रेण किम् अपुत्राया मया कार्यम् अरिम् दम ॥ २-५३-२३
अनुवाद (हिन्दी)
‘शत्रुदमन! जो मेरे लिये शोकमग्न रहती है, मन्दभागिनी-सी हो रही है और पुत्रका कोई फल न पानेके कारण निपूती-सी हो गयी है, उस मेरी माताको कुछ भी उपकार न करनेवाले मुझ-जैसे पुत्रसे क्या प्रयोजन है? ॥ २३ ॥
अनुवाद (कन्नड)
शत्रुदवन! नन्न तायियु ननगागि शोकमग्नळागिरुत्ता, मन्दभाग्यळन्तॆ आगिरुवळु मत्तु पुत्र सुखद यावुदे फलवन्नु पडॆयदॆ पुत्ररहितळन्तॆ आगिरुवळु. आ नन्न तायिगॆ याव उपकारवन्नु माडद नन्नन्तह पुत्रनिन्द एनु प्रयोजन.॥23॥
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पदच्छेदः
23. kim = “what; kaaryam = can be done; mayaa = by me; putreNa = her son; nopakurvataa = who cannot go to her aid; kamchit = even a little(to her); shochantyaaH = who is weeping; alpa bhaagyaayaaH = who is unfortunate; aputraayaaH = and who has no son; arindama = oh; conqueror of foes!”
अनुवादः
“What can be done by me, her son, who cannot go to her aid even a little to her, my mother, who is weeping, who is unfortunate and who has no son, oh conqueror of foes?”
स्रोतः: valmikiramayan.net
विश्वास-प्रस्तुतिः
अल्पभाग्या हि मे माता कौसल्या रहिता मया ।
शेते परमदुःखार्ता पतिता शोकसागरे ॥ २४ ॥
सर्वाष् टीकाः
मूलम्
अल्पभाग्या हि मे माता कौसल्या रहिता मया ।
शेते परमदुःखार्ता पतिता शोकसागरे ॥ २४ ॥
मूलम् - VR
अल्प भाग्या हि मे माता कौसल्या रहिता मया । शेते परम दुह्ख आर्ता पतिता शोक सागरे ॥ २-५३-२४
अनुवाद (हिन्दी)
‘मुझसे बिछुड़ जानेके कारण माता कौसल्या वास्तवमें मन्दभागिनी हो गयी है और शोकके समुद्रमें पड़कर अत्यन्त दुःखसे आतुर हो उसीमें शयन करती है ॥
अनुवाद (कन्नड)
नन्निन्द अगलिद कारण मातॆ कौसल्यॆयु वास्तववागि मन्दभाग्यळागिरुवळु हागू शोकसमुद्रदल्लि बिद्दु अत्यन्त दुःखदिन्द आतुरळागि अदरल्ले मलगिरुत्ताळॆ.॥24॥
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पदच्छेदः
24. kausalyaa = “Kausalya; me maataa = my mother; alpabhaagyaa hi = of poor luck indeed; rahitaa = bereft; mayaa = of me; parama duhkhaartaaH = is stricken with great melancholy; shate = and lies; patitaa = fallen; shoka saagare = in a sea of grief.”
अनुवादः
“Kausalya my mother of poor luck indeed, bereft of me, is stricken with great melancholy and lies plunged in a sea of grief”
स्रोतः: valmikiramayan.net
विश्वास-प्रस्तुतिः
एको ह्यहमयोध्यां च पृथिवीं चापि लक्ष्मण ।
तरेयमिषुभिः क्रुद्धो ननु वीर्यमकारणम् ॥ २५ ॥
सर्वाष् टीकाः
मूलम्
एको ह्यहमयोध्यां च पृथिवीं चापि लक्ष्मण ।
तरेयमिषुभिः क्रुद्धो ननु वीर्यमकारणम् ॥ २५ ॥
मूलम् - VR
एको हि अहम् अयोध्याम् च पृथिवीम् च अपि लक्ष्मण । तरेयम् इषुभिः क्रुद्धो ननु वीर्यम् अकारणम् ॥ २-५३-२५
अनुवाद (हिन्दी)
‘लक्ष्मण! यदि मैं कुपित हो जाऊँ तो अपने बाणोंद्वारा अकेला ही अयोध्यापुरी तथा समस्त भूमण्डलको निष्कण्टक बनाकर अपने अधिकारमें कर लूँ; परंतु पारलौकिक हित-साधनमें बल-पराक्रम कारण नहीं होता है (इसीलिये मैं ऐसा नहीं कर रहा हूँ ।) ॥ २५ ॥
अनुवाद (कन्नड)
लक्ष्मण! नानु कुपितनादरॆ नन्न बाणगळिन्द ऒब्बने अयोध्यॆयन्नु मत्तु समस्त भूमण्डलवन्नु निष्कण्टकवागिसि नन्न अधिकारवन्नु पडॆयबल्लॆनु; आदरॆ पारलौकिक हितसाधनॆयल्लि बल-पराक्रम कारणवागुवुदिल्ल (अदक्कागि नानु हागॆ माडलारॆ).॥25॥
Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy
पदच्छेदः
25. kruddhaH = “Enraged; aham = I; tareyam = can subdue; ishhubhiH = with my arrows; ekaH = single-handed; ayodhyaamcha = not only Ayodhya; pR^ithiviimchaapi = but also earth; lakshhmaNa = oh Lakshmana! viiryam = Valor; akaaraNam nam = is not the cause; not at all”
अनुवादः
“Enraged, I can subdue with my arrows single handed not only Ayodhya but also the earth. But it is not a question of valor here.”
स्रोतः: valmikiramayan.net
विश्वास-प्रस्तुतिः
अधर्मभयभीतश्च परलोकस्य चानघ ।
तेन लक्ष्मण नाद्याहमात्मानमभिषेचये ॥ २६ ॥
सर्वाष् टीकाः
मूलम्
अधर्मभयभीतश्च परलोकस्य चानघ ।
तेन लक्ष्मण नाद्याहमात्मानमभिषेचये ॥ २६ ॥
मूलम् - VR
अधर्म भय भीतः च पर लोकस्य च अनघ । तेन लक्ष्मण न अद्य अहम् आत्मानम् अभिषेचये ॥ २-५३-२६
अनुवाद (हिन्दी)
‘निष्पाप लक्ष्मण! मैं अधर्म और परलोकके डरसे डरता हूँ; इसीलिये आज अयोध्याके राज्यपर अपना अभिषेक नहीं कराता हूँ’ ॥ २६ ॥
अनुवाद (कन्नड)
निष्पाप लक्ष्मण! नानु अधर्म मत्तु पर लोकक्कागि हॆदरुत्तेनॆ; अदक्कागि इन्दु अयोध्यॆय राज्यदल्लि पट्टाभिषेक माडिकॊळ्ळुवुदिल्ल.॥26॥
Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy
पदच्छेदः
26. anagha = “Oh; the sinless Lakshmana! aham = I; adharma bhaya bhiitashcha = am terribly concerned of doing wrong; paralokasyacha = and(of ruining my prospects) in the other world. tena = For that reason; aatmaanam = I do not allow myself; naabhishhechaye = to be crowned”
अनुवादः
“Oh, the sinless Lakshmana! I am terribly concerned of doing wrong and of ruining my prospects in the other world. Hence, I do not allow myself to be crowned.”
स्रोतः: valmikiramayan.net
विश्वास-प्रस्तुतिः
एतदन्यच्च करुणं विलप्य विजने बहु ।
अश्रुपूर्णमुखो दीनो निशि तूष्णीमुपाविशत् ॥ २७ ॥
सर्वाष् टीकाः
मूलम्
एतदन्यच्च करुणं विलप्य विजने बहु ।
अश्रुपूर्णमुखो दीनो निशि तूष्णीमुपाविशत् ॥ २७ ॥
मूलम् - VR
एतत् अन्यच् च करुणम् विलप्य विजने बहु । अश्रु पूर्ण मुखो रामः निशि तूष्णीम् उपाविशत् ॥ २-५३-२७
अनुवाद (हिन्दी)
यह तथा और भी बहुत-सी बातें कहकर श्रीरामने उस निर्जन वनमें करुणाजनक विलाप किया । तत्पश्चात् वे उस रातमें चुपचाप बैठ गये । उस समय उनके मुखपर आँसुओंकी धारा बह रही थी और दीनता छा रही थी ॥
अनुवाद (कन्नड)
हीगॆ अनेक मातुगळन्नु हेळि श्रीरामनु आ निर्जन वनदल्लि करुणाजनक विलापमाडिदनु. अनन्तर अवनु सुम्मनॆ कुळितुबिट्टनु. आग अवन मुखदल्लि कण्णीरिन धारॆ हरियुत्तित्तु मत्तु दीनतॆ आवरिसित्तु.॥27॥
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पदच्छेदः
27. raamaH = Rama; nishi = during the night; vijane = in the lonely forest; vilapya = wailed; karuNam = piteously; etat = thus; anyashcha = and in other ways; upaavishat = sat; tushhN^iim = quite; ashrupuurNa mukhaH = his face full of tears.
अनुवादः
Rama during the night in that lonely forest, wailed piteously thus and in so many other ways and sat quite, his face full of tears.
स्रोतः: valmikiramayan.net
विश्वास-प्रस्तुतिः
विलापोपरतं रामं गतार्चिषमिवानलम् ।
समुद्रमिव निर्वेगमाश्वासयत लक्ष्मणः ॥ २८ ॥
सर्वाष् टीकाः
मूलम्
विलापोपरतं रामं गतार्चिषमिवानलम् ।
समुद्रमिव निर्वेगमाश्वासयत लक्ष्मणः ॥ २८ ॥
विलपोपरतं रामं गतार्चिषमिवानलम् ।
समुद्रमिव निर्वेगमाश्वासयत लक्ष्मणः ॥
मूलम् - VR
विलप्य उपरतम् रामम् गत अर्चिषम् इव अनलम् । समुद्रम् इव निर्वेगम् आश्वासयत लक्ष्मणः ॥ २-५३-२८
अनुवाद (हिन्दी)
विलापसे निवृत्त होनेपर श्रीराम ज्वालारहित अग्नि और वेगशून्य समुद्रके समान शान्त प्रतीत होते थे । उस समय लक्ष्मणने उन्हें आश्वासन देते हुए कहा— ॥ २८ ॥
अनुवाद (कन्नड)
विलापदिन्द निवृत्तनागि श्रीरामनु ज्वालारहित अग्नियन्तॆ, तॆरॆगळिल्लद समुद्रदन्तॆ शान्तवागि काणुत्तिद्दनु. आग लक्ष्मणनु अवनिगॆ आश्वासनॆ कॊडुत्ता हेळिदनु.॥28॥
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पदच्छेदः
28. kajShmaNaH = Lakshmana; aashvaasayata = consoled; raamam = Rama (as follows); uparatam = when the latter had ceased lamenting; analam iva = like a fire; gataarchiSam = whose flames had gone out; samudramiva = and as a sea;nirvegam = without a violent motion.
अनुवादः
Lakshmana consoled Rama as follows when the later had ceased lamenting like a fire whose flames had gone out and as a sea without a violent motion.
स्रोतः: valmikiramayan.net
विश्वास-प्रस्तुतिः
ध्रुवमद्य पुरी राम अयोध्याऽऽयुधिनां वर ।
निष्प्रभा त्वयि निष्क्रान्ते गतचन्द्रेव शर्वरी ॥ २९ ॥
सर्वाष् टीकाः
मूलम्
ध्रुवमद्य पुरी राम अयोध्याऽऽयुधिनां वर ।
निष्प्रभा त्वयि निष्क्रान्ते गतचन्द्रेव शर्वरी ॥ २९ ॥
मूलम् - VR
ध्रुवम् अद्य पुरी रामायोध्या युधिनाम् वर । निष्प्रभा त्वयि निष्क्रान्ते गत चन्द्रा इव शर्वरी ॥ २-५३-२९
अनुवाद (हिन्दी)
‘अस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ श्रीराम! आपके निकल आनेसे निश्चय ही आज अयोध्यापुरी चन्द्रहीन रात्रिके समान निस्तेज हो गयी ॥ २९ ॥
अनुवाद (कन्नड)
असधारिगळल्लि श्रेष्ठ श्रीरामा! नीनु हॊरटुबन्दद्दरिन्द निश्चयवागि इन्दु अयोध्यॆयु चन्द्रनिल्लद रात्रियन्तॆ निस्तेजवागिदॆ.॥29॥
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पदच्छेदः
29. ayodhyaa purii = “the city of Ayodhya; adya = now; tvayi = you; nishhkraante = have come away from it; dhruvam = has certainly; nishhprabhaa = been divested of its splendor; sharvariiva = and resembles a night; gatachandraa = without the moon; raajan = Oh; king; vara = the jewel; aayudhinaam = among armed warriors!”
अनुवादः
“The city of Ayodhya, now that you have come away from it, has certainly been divested of its splendor and resembles a night without the moon, Oh, Rama the jewel among armed warriors!”
स्रोतः: valmikiramayan.net
विश्वास-प्रस्तुतिः
नैतदौपयिकं राम यदिदं परितप्यसे ।
विषादयसि सीतां च मां चैव पुरुषर्षभ ॥ ३० ॥
सर्वाष् टीकाः
मूलम्
नैतदौपयिकं राम यदिदं परितप्यसे ।
विषादयसि सीतां च मां चैव पुरुषर्षभ ॥ ३० ॥
मूलम् - VR
न एतत् औपयिकम् राम यद् इदम् परितप्यसे । विषादयसि सीताम् च माम् चैव पुरुष ऋषभ ॥ २-५३-३०
अनुवाद (हिन्दी)
‘पुरुषोत्तम श्रीराम! आप जो इस तरह संतप्त हो रहे हैं, यह आपके लिये कदापि उचित नहीं है । आप ऐसा करके सीताको और मुझको भी खेदमें डाल रहे हैं ॥ ३० ॥
अनुवाद (कन्नड)
पुरुषोत्तम श्रीरामा! नीनु ई रीति सन्तप्तनागुवुदु निनगॆ ऎन्दिगू उचितवल्ल. नीनु हीगॆ माडि सीतॆगॆ मत्तु ननगू कूड खेदवन्नु कॊडुत्तिरुवॆ.॥30॥
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पदच्छेदः
30. etat = “this; na = is not; oupayikam = proper; raama = oh Rama; yat paritapyate = that you should grieve; idam = in the manner. vishhaadayasi = You cause distress; siitamcha = to Sita; maamchaiva = and me too; purushharshhabha = oh jewel among men!”
अनुवादः
“It is not proper, oh Rama, that you should grieve in this way. You cause distress to Sita and me too, oh jewel among men!”
स्रोतः: valmikiramayan.net
विश्वास-प्रस्तुतिः
न च सीता त्वया हीना न चाहमपि राघव ।
मुहूर्तमपि जीवावो जलान्मत्स्याविवोद्धृतौ ॥ ३१ ॥
सर्वाष् टीकाः
मूलम्
न च सीता त्वया हीना न चाहमपि राघव ।
मुहूर्तमपि जीवावो जलान्मत्स्याविवोद्धृतौ ॥ ३१ ॥
न च सीता त्वया हीना च चाहमपि राघव ।
मुहूर्तमपि जीवावो जलान्मत्स्याविवोद्धृतौ ॥
मूलम् - VR
न च सीता त्वया हीना न च अहम् अपि राघव । मुहूर्तम् अपि जीवावो जलान् मत्स्याव् इव उद्धृतौ ॥ २-५३-३१
अनुवाद (हिन्दी)
‘रघुनन्दन! आपके बिना सीता और मैं दोनों दो घड़ी भी जीवित नहीं रह सकते । ठीक उसी तरह, जैसे जलसे निकाले हुए मत्स्य नहीं जीते हैं ॥ ३१ ॥
अनुवाद (कन्नड)
रघुनन्दन! नीनिल्लदॆ सीतॆ मत्तु नानु ऒन्दु मुहूर्तकालवू बदुकिरलारॆवु. नीरिनिन्द हॊरगॆ तॆगॆद मीनिनन्तॆ नम्म स्थितियागुवुदु.॥31॥
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पदच्छेदः
31. raaghava = “Oh; Rama! hiinaa = Bereft; tvayaa = of you; siitaa = Sita; na = will not survive. ahamapi = I also; na jiivaavaH = We shall not survive; muhuurtamapi = even for a moment; matsyaaviva = like fishes; uddhR^iton = pulled out of water.”
अनुवादः
“Oh, Rama! Bereft of you , neither Sita nor I will not survive even for a moment, like fish pulled out of water.”
स्रोतः: valmikiramayan.net
विश्वास-प्रस्तुतिः
नहि तातं न शत्रुघ्नं न सुमित्रां परन्तप ।
द्रष्टुमिच्छेयमद्याहं स्वर्गं चापि त्वया विना ॥ ३२ ॥
सर्वाष् टीकाः
मूलम्
नहि तातं न शत्रुघ्नं न सुमित्रां परन्तप ।
द्रष्टुमिच्छेयमद्याहं स्वर्गं चापि त्वया विना ॥ ३२ ॥
मूलम् - VR
न हि तातम् न शत्रुघ्नम् न सुमित्राम् परम् तप । द्रष्टुम् इच्चेयम् अद्य अहम् स्वर्गम् वा अपि त्वया विना ॥ २-५३-३२
अनुवाद (हिन्दी)
‘शत्रुओंको ताप देनेवाले रघुवीर! आपके बिना आज मैं न तो पिताजीको, न भाई शत्रुघ्नको, न माता सुमित्राको और न स्वर्गलोकको ही देखना चाहता हूँ’ ॥
अनुवाद (कन्नड)
परन्तप रघुवीरने! निन्नन्नु बिट्टु नानु इन्दु तन्दॆयन्नागली, शत्रुघ्ननन्नागली, तायि सुमित्रॆयन्नागली, स्वर्गवन्नागली नोडलु बयसुवुदिल्ल.॥32॥
Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy
पदच्छेदः
32. paramtapa = “Oh; Rama causing pain to the foes! Tvayaa vinaa = without you; aham = I; na hi ichchheyam = do not wish; drashhTum = to see either; taatam = our father; na = nor; shatrughnam = Satrughna; sumitraam = Sumitra; svargamvaapi = nor even heaven.”
अनुवादः
“Oh, Rama causing pain to the foes! Without you, I do not wish to see either our father or Satrughna or Sumitra or even the heaven.”
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विश्वास-प्रस्तुतिः
ततस्तत्र समासीनौ नातिदूरे निरीक्ष्य ताम् ।
न्यग्रोधे सुकृतां शय्यां भेजाते धर्मवत्सलौ ॥३३ ॥
सर्वाष् टीकाः
मूलम्
ततस्तत्र समासीनौ नातिदूरे निरीक्ष्य ताम् ।
न्यग्रोधे सुकृतां शय्यां भेजाते धर्मवत्सलौ ॥३३ ॥
मूलम् - VR
ततस्तत्र सुखासीने नातिदूरे निरीक्ष्य ताम् । न्यग्रोधे सुकृताम् शय्याम् भेजाते धर्मवत्सलौ ॥ २-५३-३३
अनुवाद (हिन्दी)
तदनन्तर वहाँ बैठे हुए धर्मवत्सल सीता और श्रीरामने थोड़ी ही दूरपर वटवृक्षके नीचे लक्ष्मणद्वारा सुन्दर ढंगसे निर्मित हुई शय्या देखकर उसीका आश्रय लिया (अर्थात् वे दोनों वहाँ जाकर सो गये ।) ॥ ३३ ॥
अनुवाद (कन्नड)
अनन्तर अल्लि कुळितिद्द धर्म वत्सल सीतॆ मत्तु श्रीरामनु स्वल्प दूरदल्ले वटवृक्षद कॆळगॆ लक्ष्मणनु सिद्धपडिसिद सुन्दर शय्यॆयन्नु नोडि अदन्नु आश्रयिसि मलगिबिट्टरु.॥33॥
Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy
पदच्छेदः
33. tataH = then; dharmavatsalou = Rama and Lakshmana; the lovers of piety; sukhasiinou = sitting comfortably; tatra = there; niriikshhya = (and) seeing; taam shayyaam = that bed; sukR^itaam = well arranged; nyagrodha = under a banyan tree; bhejate = sought (for the bed).”
अनुवादः
Then Rama and Lakshmana the lovers of piety, sitting comfortably there and on seeing a bed well- prepared under a banyan tree, sought for the bed.
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विश्वास-प्रस्तुतिः
स लक्ष्मणस्योत्तमपुष्कलं वचो
निशम्य चैवं वनवासमादरात् ।
समाः समस्ता विदधे परन्तपः
प्रपद्य धर्मं सुचिराय राघवः ॥ ३४ ॥
सर्वाष् टीकाः
मूलम्
स लक्ष्मणस्योत्तमपुष्कलं वचो
निशम्य चैवं वनवासमादरात् ।
समाः समस्ता विदधे परन्तपः
प्रपद्य धर्मं सुचिराय राघवः ॥ ३४ ॥
मूलम् - VR
स लक्ष्मणस्य उत्तम पुष्कलम् वचो । निशम्य च एवम् वन वासम् आदरात् । समाः समस्ता विदधे परम् तपः । प्रपद्य धर्मम् सुचिराय राघवः ॥ २-५३-३४
अनुवाद (हिन्दी)
शत्रुओंको संताप देनेवाले रघुनाथजीने इस प्रकार वनवासके प्रति आदरपूर्वक कहे हुए लक्ष्मणके अत्यन्त उत्तम वचनोंको सुनकर स्वयं भी दीर्घकालके लिये वनवासरूप धर्मको स्वीकार करके सम्पूर्ण वर्षोंतक लक्ष्मणको अपने साथ वनमें रहनेकी अनुमति दे दी ॥
अनुवाद (कन्नड)
परन्तप रघुनाथनु हीगॆ वनवासद कुरितु आदरदिन्द हेळिरुव लक्ष्मणन मातन्नु केळि अवनु दीर्घकालदवरॆगॆ वनवासरूपी धर्मवन्नु स्वीकरिसि सम्पूर्ण वर्षगळवरॆगॆ लक्ष्मणनिगॆ तन्नॊन्दिगॆ इरुवन्तॆ अनुमति कॊट्टनु.॥34॥
Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy
पदच्छेदः
34. saH raaghavaH = that Rama; paramtapaH = the terminator of foes; aadaraat = attentively; nishamya = hearing; lakshhmaNasya = Lakshmana’s; vachaH = words; uttama pushhkalam = which were excellent and holistic; prapadya = and adopting; suchiraaya = for a fairly long period; dharmam = the course of conduct prescribed for hermits; vidadhe = resolved; samastaaH = (to stand) all; samaaH = the years; vanavaasam = in exile(with Lakshmana).
अनुवादः
Attentively hearing Lakshmana’s words which were excellent and wholistic and adopting for a fairly long period the course of conduct prescribed for hermits, Rama resolved to spend all the fourteen years in exile with Lakshmana.
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विश्वास-प्रस्तुतिः
ततस्तु तस्मिन् विजने महाबलौ
महावने राघववंशवर्धनौ ।
न तौ भयं सम्भ्रममभ्युपेयतु-
र्यथैव सिंहौ गिरिसानुगोचरौ ॥ ३५ ॥
सर्वाष् टीकाः
मूलम्
ततस्तु तस्मिन् विजने महाबलौ
महावने राघववंशवर्धनौ ।
न तौ भयं सम्भ्रममभ्युपेयतु-
र्यथैव सिंहौ गिरिसानुगोचरौ ॥ ३५ ॥
मूलम् - VR
ततस्तु तस्मिन् विजने वने तदा । महाबलौ राघववंशवर्धनौ । न तौ भयम् सम्भ्रममभ्युपेयतु । र्यथैव सिम्हौ गिरिसानुगोचरौ ॥ २-५३-३५
अनुवाद (हिन्दी)
तदनन्तर उस महान् निर्जन वनमें रघुवंशकी वृद्धि करनेवाले वे दोनों महाबली वीर पर्वतशिखरपर विचरनेवाले दो सिंहोंके समान कभी भय और उद्वेगको नहीं प्राप्त हुए ॥
अनुवाद (कन्नड)
अनन्तर आ महानिर्जन वनदल्लि रघुवंशवन्नु वृद्धिगॊळिसुव आ इब्बरू महाबलशालिगळाद वीररु पर्वत शिखरदल्लि सञ्चरिसुव ऎरडु सिंहगळन्तॆ ऎन्दू भय मत्तु उद्वेगवन्नु हॊन्दलिल्ल.॥35॥
Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy
पदच्छेदः
35. tataH tadaa = thence forward; tasmin vane = in that forest; vijane = which was lonely; tou = those; mahaabalou raaghava vamsha vardhanon = (two) powerful offspring of the Raghu race; na abhyupeyatuH = did not admit; bhayam = fear; sambhramam = or agitation; simhou yathaiva = like unto two lions; girisaanu gocharon = dwelling on the slopes of a mountain.
अनुवादः
Thence forward, those two powerful offspring of the Raghu race (Rama and Lakshmana) never admitted fear or agitation (while dwelling) in that vast and lonely forest any more than a couple of lions on the slopes of a mountain.
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समाप्तिः
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्रिपञ्चाशः सर्गः ॥ ५३ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें तिरपनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५३ ॥
अनुवाद (समाप्तिः) (कन्नड)
श्रीवाल्मीकि विरचित आर्षरामायण आदिकाव्यद अयोध्याकाण्डदल्लि ऐवत्तमूरनॆय सर्ग पूर्णवायितु.॥53॥