०२७ सीतायाः वनगमननिश्चयः

वाचनम्
सर्वाष् टीकाः
Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy - Intro

Book II : Ayodhya Kanda - Book Of Ayodhya

In this chapter Seetha asks Rama to take her to the forest.

स्रोतः: valmikiramayan.net

भागसूचना
  1. सीताकी श्रीरामसे अपनेको भी साथ ले चलनेके लिये प्रार्थना
विश्वास-प्रस्तुतिः

एवमुक्ता तु वैदेही प्रियार्हा प्रियवादिनी ।
प्रणयादेव सङ्क्रुद्धा भर्तारमिदमब्रवीत् ॥ १ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

एवमुक्ता तु वैदेही प्रियार्हा प्रियवादिनी ।
प्रणयादेव सङ्क्रुद्धा भर्तारमिदमब्रवीत् ॥ १ ॥

मूलम् - VR

एवम् उक्ता तु वैदेही प्रिय अर्हा प्रिय वादिनी । प्रणयात् एव सम्क्रुद्धा भर्तारम् इदम् अब्रवीत् ॥ २-२७-१

अनुवाद (हिन्दी)

श्रीरामके ऐसा कहनेपर प्रियवादिनी विदेहकुमारी सीताजी, जो सब प्रकारसे अपने स्वामीका प्यार पाने योग्य थीं, प्रेमसे ही कुछ कुपित होकर पतिसे इस प्रकार बोलीं— ॥ १ ॥

अनुवाद (कन्नड)

श्रीरामनु हीगॆ हेळिदाग विदेहकुमारि, ऎल्ल रीतियिन्दलू तन्न पतिय प्रेमवन्नु पडॆयलु योग्यळाद सीतॆयु प्रणयकोपदिन्द ई प्रकार नुडिदळु.॥1॥

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

1. vaidehi = Sita; priya vaadinii = who speaks kindly; priyaarhaa = deserves kind utterances; evam = thus; uktaa = spoken; samkruddhaa = became angry; praNayaadeva = only because of love; abraviit = spoke; idam = these words; bhartaaram = to husband.

अनुवादः

Sita, who speaks kindly and deserves kind utterances, after hearing Rama’s words, became angry out of love alone and spoke thus to her husband.

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

किमिदं भाषसे राम वाक्यं लघुतया ध्रुवम् ।
त्वया यदपहास्यं मे श्रुत्वा नरवरोत्तम ॥ २ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

किमिदं भाषसे राम वाक्यं लघुतया ध्रुवम् ।
त्वया यदपहास्यं मे श्रुत्वा नरवरोत्तम ॥ २ ॥

मूलम् - VR

किमिदम् भाषसे राम वाक्यम् लघुतया ध्रुवम् । त्वया यदपहास्यम् मे श्रुत्वा नरवरात्मज ॥ २-२७-२

अनुवाद (हिन्दी)

‘नरश्रेष्ठ श्रीराम! आप मुझे ओछी समझकर यह क्या कह रहे हैं? आपकी ये बातें सुनकर मुझे बहुत हँसी आती है ॥ २ ॥

अनुवाद (कन्नड)

नरश्रेष्ठ श्रीरामा! नीवु नन्नन्नु इष्टॊन्दु हगुरवागि तिळिदु एनु मातनाडुत्तिरुविरि? निम्म ई मातन्नु केळि ननगॆ नगु बरुत्ता इदॆ.॥2॥

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

2. raama = Oh; Rama; naravaraatmaja = the prince! kim vaakyam = what words; idam = these; bhaashaase = you are speaking? yat = which words; laghutayaa = as they are light; dhruvam = certainly; apahaasyam = are to be laughed at; tvayaa = by you; me = and to me; shrutvaa = after hearing.

अनुवादः

Oh, Rama the prince! What words these are you speaking? These light words certainly are to be laughed at by you and to me after hearning.

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

वीराणां राजपुत्राणां शस्त्रास्त्रविदुषां नृप ।
अनर्हमयशस्यं च न श्रोतव्यं त्वयेरितम् ॥ ३ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

वीराणां राजपुत्राणां शस्त्रास्त्रविदुषां नृप ।
अनर्हमयशस्यं च न श्रोतव्यं त्वयेरितम् ॥ ३ ॥


वीराणां राजपुत्राणां शस्त्रास्त्रविदुषां नृप ।
अनर्हमयशस्यं च न श्रोतव्यं त्वयोदितम् ॥

मूलम् - VR

आर्य पुत्र पिता माता भ्राता पुत्रः तथा स्नुषा । स्वानि पुण्यानि भुन्जानाः स्वम् स्वम् भाग्यम् उपासते ॥ २-२७-३

अनुवाद (हिन्दी)

‘नरेश्वर! आपने जो कुछ कहा है, वह अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता वीर राजकुमारोंके योग्य नहीं है । वह अपयशका टीका लगानेवाला होनेके कारण सुनने योग्य भी नहीं है ॥ ३ ॥

अनुवाद (कन्नड)

नरेश्वर! नीवु हेळिदुदु अस्त्र-शस्त्रगळन्नु तिळिद वीर राजकुमाररिगॆ योग्यवल्ल. अदु अनर्ह वादुदरिन्द केळलु योग्यवादुदल्ल.॥3॥

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पदच्छेदः

3. aarya putra = oh; noble prince! pitaa = father; maataa = mother; bhraataa = brother; putraH = son; tathaa = and snushhaa = daughter in law; upaasate = accomplish; svamsvam = their own; bhaagyam = good fortune; bhuJNaanaaH = as benefitted; svaani = by their own; puNyaani = pious deals.

अनुवादः

“Oh, noble prince! Father, mother, brother, son and daughter-in-law accomplish their own good fortune, as benefitted by their own pious deeds.”

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

आर्यपुत्र पिता माता भ्राता पुत्रस्तथा स्नुषा ।
स्वानि पुण्यानि भुञ्जानाः स्वं स्वं भाग्यमुपासते ॥ ४ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

आर्यपुत्र पिता माता भ्राता पुत्रस्तथा स्नुषा ।
स्वानि पुण्यानि भुञ्जानाः स्वं स्वं भाग्यमुपासते ॥ ४ ॥

मूलम् - VR

भर्तुर् भाग्यम् तु भार्या एका प्राप्नोति पुरुष ऋषभ । अतः चैव अहम् आदिष्टा वने वस्तव्यम् इति अपि ॥ २-२७-४

अनुवाद (हिन्दी)

‘आर्यपुत्र! पिता, माता, भाई, पुत्र और पुत्रवधू—ये सब पुण्यादि कर्मोंका फल भोगते हुए अपने-अपने भाग्य (शुभाशुभ कर्म) के अनुसार जीवन-निर्वाह करते हैं ॥ ४ ॥

अनुवाद (कन्नड)

आर्यपुत्र! तन्दॆ, तायि, सहोदररु, पुत्ररु, सॊसॆयरु इवरॆल्लरू पुण्यद कर्मगळन्नु अनुभविसुत्ता शुभाशुभ कर्मक्कनुसार जीवन निर्वाह माडुत्तारॆ.॥4॥

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

4. purushharshhabha = oh; best of men! bhaaryaa = wife; ekaa = for one; praapnoti = gets; bhartR^ibhaagyamtu = fortune of the husband; atashcha = for that reason; ahamapi = I am also; aadishhTaa eva = ordered; vastavyamiti = to dwell; vane = in the forest.

अनुवादः

“Oh, Rama the best of men! Wife for one gets fortune of the husband. For that reason, I am also destined to dwell in the forest.”

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

भर्तुर्भाग्यं तु नार्येका प्राप्नोति पुरुषर्षभ ।
अतश्चैवाहमादिष्टा वने वस्तव्यमित्यपि ॥ ५ ॥+++(5)+++

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

भर्तुर्भाग्यं तु नार्येका प्राप्नोति पुरुषर्षभ ।
अतश्चैवाहमादिष्टा वने वस्तव्यमित्यपि ॥ ५ ॥


भर्तुर्भाग्यं तु नार्यॆका प्राप्नोति पुरुषर्षभ ।
अतश्चैवाहमादिष्टा वने वस्तव्यमित्यपि ॥

मूलम् - VR

न पिता न आत्मजो न आत्मा न माता न सखी जनः । इह प्रेत्य च नारीणाम् पतिर् एको गतिः सदा ॥ २-२७-५

अनुवाद (हिन्दी)

‘पुरुषप्रवर! केवल पत्नी ही अपने पतिके भाग्यका अनुसरण करती है, अतः आपके साथ ही मुझे भी वनमें रहनेकी आज्ञा मिल गयी है ॥ ५ ॥

अनुवाद (कन्नड)

पुरुषप्रवर! केवल पत्निये तन्न पतिय भाग्यवन्नु अनुसरिसुवळु. आद्दरिन्द निम्मॊन्दिगॆ ननगू कूड वनवासद आज्ञॆ दॊरॆतन्तायितु.॥5॥

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पदच्छेदः

5. pitaa = father; na = not recomrese; mna = not; aatmajaH = son; na = not; aatmaa = the self; aa = not; maataa = mother; na = not; sakhiijanaH = female companions; naariiNaam = to women; patiH = husband; ekaH = for one; sadaa = forever; gatiH = is recourse; iha = in this world; pretyacha = or after death.

अनुवादः

" To a woman, father or son or self or mother or female companion are not the recourse. Husband alone is forever the best recourse either in this world or after her death".

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

न पिता नात्मजो वात्मा न माता न सखीजनः ।
इह प्रेत्य च नारीणां पतिरेको गतिः सदा ॥ ६ ॥+++(5)+++

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

न पिता नात्मजो वात्मा न माता न सखीजनः ।
इह प्रेत्य च नारीणां पतिरेको गतिः सदा ॥ ६ ॥

मूलम् - VR

यदि त्वम् प्रस्थितः दुर्गम् वनम् अद्य एव राघव । अग्रतः ते गमिष्यामि मृद्नन्ती कुश कण्टकान् ॥ २-२७-६

अनुवाद (हिन्दी)

‘नारियोंके लिये इस लोक और परलोकमें एकमात्र पति ही सदा आश्रय देनेवाला है । पिता, पुत्र, माता, सखियाँ तथा अपना यह शरीर भी उसका सच्चा सहायक नहीं है ॥

अनुवाद (कन्नड)

नारियरिगॆ ई लोक मत्तु परलोकदल्लि एकमात्र पतिये सदा आश्रय कॊडुववनु. पिता, पुत्र, मातॆ, सखियरु हागू तन्न ई शरीरवू कूड निज सहायकवल्ल.॥6॥

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पदच्छेदः

6. raaghava = Oh; Rama! adyaiva = now itself; tvam prasthitaH yadi = if you set forth; vanam = to the forest; durgam = which is difficult to be travelled; gamishhyaami = I shall proceed; te agrataH = before you; mR^idnantii = by trampling down; dusha kaNdakaan = grass with long pointed stalks and thorns.

अनुवादः

“Oh, Rama! If you set forth now itself to the forest, which is difficult to be travelled, I shall come before you, by trampling down thorns and grass with long pointed stalks.”

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

यदि त्वं प्रस्थितो दुर्गं वनमद्यैव राघव ।
अग्रतस्ते गमिष्यामि मृद्नन्ती कुशकण्टकान् ॥ ७ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

यदि त्वं प्रस्थितो दुर्गं वनमद्यैव राघव ।
अग्रतस्ते गमिष्यामि मृद्नन्ती कुशकण्टकान् ॥ ७ ॥

मूलम् - VR

ईर्ष्या रोषौ बहिष् कृत्य भुक्त शेषम् इव उदकम् । नय माम् वीर विश्रब्धः पापम् मयि न विद्यते ॥ २-२७-७

अनुवाद (हिन्दी)

‘रघुनन्दन! यदि आप आज ही दुर्गम वनकी ओर प्रस्थान कर रहे हैं तो मैं रास्तेके कुश और काँटोंको कुचलती हुई आपके आगे-आगे चलूँगी ॥ ७ ॥

अनुवाद (कन्नड)

रघुनन्दन! नीवु इन्दे दुर्गम वनक्कॆ होगुवुदादरॆ नानु दारिय हुल्लु-मुळ्ळुगळन्नु तुळियुत्ता निम्म मुन्दॆ-मुन्दॆ नडॆयुत्ता होगुवॆनु.॥7॥

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पदच्छेदः

7. vira = Oh; brave ma! bahishhkR^itya = by abandoning; iirshhyaaroshhau = impatience and anger; udakam iva = as water; bhukta seshham = left over after driniking; visrabdhaH = having faith; naya = take; maam = me; navidyate = there is no; paapam = sin; muyi = in me.

अनुवादः

“Oh, brave man! By abandoning, as water left over after drinking, the impatience and anger and having faith, take me. There is no sin in me.”

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

ईर्ष्यां रोषं बहिष्कृत्य भुक्तशेषमिवोदकम् ।
नय मां वीर विस्रब्धः पापं मयि न विद्यते ॥ ८ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

ईर्ष्यां रोषं बहिष्कृत्य भुक्तशेषमिवोदकम् ।
नय मां वीर विस्रब्धः पापं मयि न विद्यते ॥ ८ ॥


ईर्ष्या रोषम्बहिष्कृत्य भुक्तशेषमिवोदकम् ।
नय मां वीर विस्रब्धः पापं मयि न विद्यते ॥

मूलम् - VR

प्रासाद अग्रैः विमानैः वा वैहायस गतेन वा । सर्व अवस्था गता भर्तुः पादच् चाया विशिष्यते ॥ २-२७-८

अनुवाद (हिन्दी)

‘अतः वीर! आप ईर्ष्या१ और रोषको२ दूर करके पीनेसे३ बचे हुए जलकी भाँति मुझे निःशङ्क होकर साथ ले चलिये । मुझमें ऐसा कोई पाप—अपराध नहीं है, जिसके कारण आप मुझे यहाँ त्याग दें ॥ ८ ॥

१. स्त्री होकर यह वनमें जानेका साहस कैसे करती है? इस विचारसे ईर्ष्या होती है ।
२. यह मेरी बात नहीं मान रही है, यह सोचकर रोष प्रकट होता है । इन दोनोंका त्याग अपेक्षित है ।
३. जैसे किसी जलहीन बीहड़ पथमें लोग अपने पीनेसे बचे हुए पानीको साथ ले चलते हैं, उसी प्रकार मुझे भी आप साथ ले चलें—यह सीताका अनुरोध है ।

अनुवाद (कन्नड)

आद्दरिन्द वीर! ईर्षा1 मत्तु रोष2वन्नु दूरगॊळिसि कुडिदु उळिद नीरन्नु जॊतॆगॆ तॆगॆदुकॊण्डु होगुवन्तॆ3 नन्नन्नु निःशङ्करागि जॊतॆगॆ करॆदुकॊण्डु होगिरि. नीवु नन्नन्नु इल्लि त्यजिसि होगुवन्तह यावुदे पाप अथवा अपराध नन्नल्लि इल्ल.॥8॥

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पदच्छेदः

8. paadachchhayaa = protection under the feet; bhartuH = of husband; vishishhyate = is better than; praasaadaagraiH = top of a lofty building; vimaanairvaa = or aerial cars; vaihaayasagatena vaa = or moving through the sky; sarvavasthagataa = or attaining all types of positions.

अनुवादः

“Protection under the feet of the husband is better than being on top of a lofty building or in aerial cars or in moving through the sky or in attaining all types of positions.”

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

प्रासादाग्रे विमानैर्वा वैहायसगतेन वा ।
सर्वावस्थागता भर्तुः पादच्छाया विशिष्यते ॥ ९ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

प्रासादाग्रे विमानैर्वा वैहायसगतेन वा ।
सर्वावस्थागता भर्तुः पादच्छाया विशिष्यते ॥ ९ ॥

मूलम् - VR

अनुशिष्टा अस्मि मात्रा च पित्रा च विविध आश्रयम् । न अस्मि सम्प्रति वक्तव्या वर्तितव्यम् यथा मया ॥ २-२७-९

अनुवाद (हिन्दी)

‘ऊँचे-ऊँचे महलोंमें रहना, विमानोंपर चढ़कर घूमना अथवा अणिमा आदि सिद्धियोंके द्वारा आकाशमें विचरना—इन सबकी अपेक्षा स्त्रीके लिये सभी अवस्थाओंमें पतिके चरणोंकी छायामें रहना विशेष महत्त्व रखता है ॥ ९ ॥

अनुवाद (कन्नड)

ऎत्तरवाद भवनदल्लि वासिसुवुदु, विमानगळन्नु हत्ति तिरुगुवुदु, अथवा अणिमादि सिद्धिगळिन्द आकाशदल्लि सञ्चरिसुवुदु इवॆल्लक्किन्त महत्व स्त्रीयळिगॆ ऎल्ल स्थितिगळल्लि पतिय चरणछायॆयल्लि वासिसुवुदे आगिदॆ.॥9॥

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पदच्छेदः

9. anushishhTaa = I was taught; vividhaashrayam = of different subjects; maatraacha = by mother; pitraacha = and by father; naasmi = I need not; vaktavyaa = be told; samprati = now; yathaa = how; vartitarvyam = to deal in any way with any one.

अनुवादः

“My mother and father taught me of different matters long ago. I need not be told now, how to deal in any way with anyone.”

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

अनुशिष्टास्मि मात्रा च पित्रा च विविधाश्रयम् ।
नास्मि सम्प्रति वक्तव्या वर्तितव्यं यथा मया ॥ १० ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

अनुशिष्टास्मि मात्रा च पित्रा च विविधाश्रयम् ।
नास्मि सम्प्रति वक्तव्या वर्तितव्यं यथा मया ॥ १० ॥

मूलम् - VR

अहम् दुर्गम् गमिष्यामि वनम् पुरुषवर्जितम् । नानामृगगणाकीर्णम् शार्दूलवृकसेवितम् ॥ २-२७-१०

अनुवाद (हिन्दी)

‘मुझे किसके साथ कैसा बर्ताव करना चाहिये, इस विषयमें मेरी माता और पिताने मुझे अनेक प्रकारसे शिक्षा दी है । इस समय इसके विषयमें मुझे कोई उपदेश देनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ १० ॥

अनुवाद (कन्नड)

यारॊन्दिगॆ हेगॆ वर्तिसबेकॆम्ब विषयदल्लि नन्न तायि मत्तु तन्दॆयवरु ननगॆ अनेक प्रकारदिन्द शिक्षण कॊट्टिरुवरु. ईग ई विषयवागि यावुदे उपदेशद आवश्यकतॆ इल्ल.॥10॥

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पदच्छेदः

10. aham = I; gamishhyaami = can go; vanam = to forest; durgam = which is inaccessible; purushhavarjitam = which is devoid of people; naanaa mR^igagaNaakiirNam = filled with various types of animals; shaarduula vR^ika sevitam = inhabited by tigers and jackals.

अनुवादः

" I can come to forest which is inaccessible, which is devoid of people, filled with various types of animals and inhaited by tigers and jackals."

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

अहं दुर्गं गमिष्यामि वनं पुरुषवर्जितम् ।
नानामृगगणाकीर्णं शार्दूलगणसेवितम् ॥ ११ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

अहं दुर्गं गमिष्यामि वनं पुरुषवर्जितम् ।
नानामृगगणाकीर्णं शार्दूलगणसेवितम् ॥ ११ ॥

मूलम् - VR

सुखम् वने निवत्स्यामि यथा एव भवने पितुः । अचिन्तयन्ती त्रीम्ल् लोकामः चिन्तयन्ती पति व्रतम् ॥ २-२७-११

अनुवाद (हिन्दी)

‘अतः नाना प्रकारके वन्य पशुओंसे व्याप्त तथा सिंहों और व्याघ्रोंसे सेवित उस निर्जन एवं दुर्गम वनमें मैं अवश्य चलूँगी ॥ ११ ॥

अनुवाद (कन्नड)

आद्दरिन्द नाना प्रकारद काडुप्राणिगळिन्द तुम्बिद, सिंह, हुलि मॊदलाद हिंस्र पशुगळिरुव आ निर्जन, दुर्गम वनदल्लि अवश्यवागि निम्मॊन्दिगॆ नडॆयुवॆनु.॥11॥

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पदच्छेदः

11. achintayantii = Not thinking; triin lokaan = of there worlds; chintayantii = thinking pativratam = of loyalty to husband; nivatsyaami = I shall dwell; vane = in the forest; sukham = happily; yathaiva = as though it is; pituH = father’s; bhavane = house.

अनुवादः

“Not thinking of three world, thinking of loyalty to husband, I shall dwell in the forest happily as though staying in our father’s house”.

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

सुखं वने निवत्स्यामि यथैव भवने पितुः ।
अचिन्तयन्ती त्रील्ँ लोकांश्चिन्तयन्ती पतिव्रतम् ॥ १२ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

सुखं वने निवत्स्यामि यथैव भवने पितुः ।
अचिन्तयन्ती त्रील्ँ लोकांश्चिन्तयन्ती पतिव्रतम् ॥ १२ ॥


सुखं वने निवत्स्यामि यथैव भवने पितुः ।
अचिन्त्ययन्ती त्रीन्ल्लोकांश्चिन्तयन्ती पतिव्रतम् ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘मैं तो जैसे अपने पिताके घरमें रहती थी, उसी प्रकार उस वनमें भी सुखपूर्वक निवास करूँगी । वहाँ तीनों लोकोंके ऐश्वर्यको भी कुछ न समझती हुई मैं सदा पतिव्रत-धर्मका चिन्तन करती हुई आपकी सेवामें लगी रहूँगी ॥ १२ ॥

अनुवाद (कन्नड)

नानु तन्दॆय मनॆयल्लि इरुवन्तॆये वनदल्लियू सुखवागि वासिसुवॆनु. अल्लि मूरु लोकद ऐश्वर्यवन्नु तुच्छवॆन्दु तिळियुत्ता नानु सदा पतिव्रताधर्मवन्नु चिन्तिसुत्ता निम्म सेवॆयल्लि तॊडगिरुवॆनु.॥12॥

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पदच्छेदः

12. viiva = Oh; brave man! shushruushhamaaNaa = doing service; te = to you; nityam = ragularly; niyataa = having discipline; brahmachaariNii = observing chastity; ramsye = I would like to stay; tvayaasaha = with you; vaneshhu = in the forests; madhugandhishhu = which smell like honey.

अनुवादः

“Oh, brave man! performing service to you regularly, having the necessary discipline, observing chastity, I would like to stay with you in the forests which smell like honey.”

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

शुश्रूषमाणा ते नित्यं नियता ब्रह्मचारिणी ।
सह रंस्ये त्वया वीर वनेषु मधुगन्धिषु ॥ १३ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

शुश्रूषमाणा ते नित्यं नियता ब्रह्मचारिणी ।
सह रंस्ये त्वया वीर वनेषु मधुगन्धिषु ॥ १३ ॥


शुश्रूषमाणा ते नित्यं नियता ब्रह्मचारिणी ।
सह रंस्ये त्वया वीर वनेषु मधुगन्धीषु0 ॥

मूलम् - VR

त्वम् हि कर्तुम् वने शक्तः राम सम्परिपालनम् । अन्यस्य पै जनस्य इह किम् पुनर् मम मानद ॥ २-२७-१३

अनुवाद (हिन्दी)

‘वीर! नियमपूर्वक रहकर ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करूँगी और सदा आपकी सेवामें तत्पर रहकर आपहीके साथ मीठी-मीठी सुगन्धसे भरे हुए वनोंमें विचरूँगी ॥ १३ ॥

अनुवाद (कन्नड)

वीरने! नियमपूर्वक इद्दु ब्रह्मचर्य व्रतवन्नु पालिसुवॆनु. सदाकाल निम्म सेवॆयल्लि तत्परळागिद्दु, निम्मॊन्दिगॆ मधुर सुगन्ध तुम्बिद वनगळल्लि सञ्चरिसुवॆनु.॥13॥

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पदच्छेदः

13. raama = Oh; Rama; maanada = the giver of honour! iha = here; vane = in the forest; tvam = you; shaktaH hi = are indeed capable; kartum = to undertake; samparipaalanapi = protection also; anyasya janasya = of other people; kimpunaH = why to tell; mama = about me?

अनुवादः

“Oh, Rama, the bestower of honour! Here in the forest, you are indeed capable of protecting other people also. Why to tell about my protection?”

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

त्वं हि कर्तुं वने शक्तो राम सम्परिपालनम् ।
अन्यस्यापि जनस्येह किं पुनर्मम मानद ॥ १४ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

त्वं हि कर्तुं वने शक्तो राम सम्परिपालनम् ।
अन्यस्यापि जनस्येह किं पुनर्मम मानद ॥ १४ ॥

मूलम् - VR

सह त्वया गमिश्यामि वसमद्य न संशयः । नाहम् शक्या महाभाग निवर्तयितु मुद्यता ॥ २-२७१४

अनुवाद (हिन्दी)

‘दूसरोंको मान देनेवाले श्रीराम! आप तो वनमें रहकर दूसरे लोगोंकी भी रक्षा कर सकते हैं, फिर मेरी रक्षा करना आपके लिये कौन बड़ी बात है? ॥ १४ ॥

अनुवाद (कन्नड)

बेरॆयवरिगॆ मानवन्नु कॊडुव श्रीरामा! नीवादरो काडिनल्लि इरुत्ता इतररन्नू रक्षिसबल्लिरि, हागिरुवाग नन्नन्नु रक्षिसुवुदु याव दॊड्ड मातु.॥14॥

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पदच्छेदः

14. adya = today; gamishhyaami = I will go; vanam = to forest; tvayaasaha = along with you; na = No; samshayaH = doubt; mahaabhaaga = oh; the illustrious! aham = I; udyataa = ready(to go to forest) na shakyaa = cannot; nivartayitum = be prevented.

अनुवादः

“Today no doubt, I will come to forest along with you. Oh, the illustrious! I, with this intention, cannot be prevented to do so.”

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

साहं त्वया गमिष्यामि वनमद्य न संशयः ।
नाहं शक्या महाभाग निवर्तयितुमुद्यता ॥ १५ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

साहं त्वया गमिष्यामि वनमद्य न संशयः ।
नाहं शक्या महाभाग निवर्तयितुमुद्यता ॥ १५ ॥

मूलम् - VR

फल मूल अशना नित्यम् भविष्यामि न संशयः । न ते दुह्खम् करिष्यामि निवसन्ती सह त्वया ॥ २-२७-१५

अनुवाद (हिन्दी)

‘महाभाग! अतः मैं आपके साथ आज अवश्य वनमें चलूँगी । इसमें संशय नहीं है । मैं हर तरह चलनेको तैयार हूँ । मुझे किसी तरह भी रोका नहीं जा सकता ॥ १५ ॥

अनुवाद (कन्नड)

महाभाग! आद्दरिन्द नानु निम्मॊन्दिगॆ अवश्यवागि वनक्कॆ बरुवॆनु. इदरल्लि संशयवे इल्ल. नानु ऎल्ल परिस्थितिगळिगू हॊन्दिकॊळ्ळलु सिद्धळागिद्देनॆ. नन्नन्नु याव रीतियिन्दलू तडॆयबारदु.॥15॥

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

15. nityam = always; bhavishhyaami = I will become; phalamulaashanaa = the eater of fruits and roots; na = no; samshayaH = doubt; nivasantii = residing; tvayaasaha = along with you; na karishhyaami = I will not create; duHkham = unpleasantness; te = to you.

अनुवादः

I shall live only on roots and fruits always, no doubt. Living along with you, I shall not create any unpleasantness to you.

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

फलमूलाशना नित्यं भविष्यामि न संशयः ।
न ते दुःखं करिष्यामि निवसन्ती त्वया सदा ॥ १६ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

फलमूलाशना नित्यं भविष्यामि न संशयः ।
न ते दुःखं करिष्यामि निवसन्ती त्वया सदा ॥ १६ ॥

मूलम् - VR

इच्चामि सरितः शैलान् पल्वलानि वनानि च । द्रष्टुम् सर्वत्र निर्भीता त्वया नाथेन धीमता ॥ २-२७-१६

अनुवाद (हिन्दी)

‘वहाँ चलकर मैं आपको कोई कष्ट नहीं दूँगी, सदा आपके साथ रहूँगी और प्रतिदिन फल-मूल खाकर ही निर्वाह करूँगी । मेरे इस कथनमें किसी प्रकारके संदेहके लिये स्थान नहीं है ॥ १६ ॥

अनुवाद (कन्नड)

अल्लिगॆ बन्दु निमगॆ यावुदे कष्टकॊडलारॆ. सदा निम्मॊन्दिगॆ इद्दु, प्रतिदिन फल-मूलगळन्नु तिन्दु निर्वाह माडुवॆनु. नन्न ई मातिनल्लि यावुदे सन्देहविल्ल.॥16॥

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

16. tvayaa = with you; dhiimataa = the learned; naathena = and the lord; nirbhiitaa = without fear; sarvatra = everywhere; ichchhaami = I wish; drashhTum = to see; saritaH = rivers; shailaan = mountains; palvalaani = small lakes; vanaanicha = and grooves.

अनुवादः

" With you the learned and the lord, I shall not have fear anywhere. I wish to see rivers, mountains, small lakes and grooves."

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

अग्रतस्ते गमिष्यामि भोक्ष्ये भुक्तवति त्वयि ।
इच्छामि परतः शैलान् पल्वलानि सरांसि च ॥ १७ ॥
द्रष्टुं सर्वत्र निर्भीता त्वया नाथेन धीमता ।

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

अग्रतस्ते गमिष्यामि भोक्ष्ये भुक्तवति त्वयि ।
इच्छामि परतः शैलान् पल्वलानि सरांसि च ॥ १७ ॥
द्रष्टुं सर्वत्र निर्भीता त्वया नाथेन धीमता ।

मूलम् - VR

हंस कारण्डव आकीर्णाः पद्मिनीः साधु पुष्पिताः । इच्चेयम् सुखिनी द्रष्टुम् त्वया वीरेण सम्गता ॥ २-२७-१७

अनुवाद (हिन्दी)

‘आपके आगे-आगे चलूँगी और आपके भोजन कर लेनेपर जो कुछ बचेगा, उसे ही खाकर रहूँगी । प्रभो! मेरी बड़ी इच्छा है कि मैं आप बुद्धिमान् प्राणनाथके साथ निर्भय हो वनमें सर्वत्र घूमकर पर्वतों, छोटे-छोटे तालाबों और सरोवरोंको देखूँ ॥ १७ १/२ ॥

अनुवाद (कन्नड)

निमगिन्त मुन्दॆ-मुन्दॆ नडॆयुत्ता, नीवु भोजन माडिद बळिक अळिदुळिदुदन्नु नानु तिन्दुकॊण्डु इरुवॆनु. प्रभो! नानु बुद्धिवन्तराद प्राणनाथनॊन्दिगॆ निर्भयळागि वनदल्लि ऎल्लॆडॆ सुत्ताडुत्ता, पर्वतगळन्नु, सण्ण-सण्ण सरोवरगळन्नु नोडबेकॆन्दु इच्छिसुत्तेनॆ.॥17½॥

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

17. sangataa = coming together; tvayaa = with you; viireNa = the courageous man; sukhinii = being comfortable; ichchheyam = I desire; drashhTum = to see; padminiiH = lotus-ponds; hamsakaaraNdavaakiirNaa = filled with swans; water-fowls; saadhu = excellent; pushhpitaa = in bloom.

अनुवादः

I shall be comfortable, by coming together with you, the courageous man. I desire to see lotus- ponds filled with swans, water-fowls and excellently flowered.

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

हंसकारण्डवाकीर्णाः
पद्मिनीः साधुपुष्पिताः ॥ १८ ॥
इच्छेयं सुखिनी द्रष्टुं
त्वया वीरेण सङ्गता ।

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

हंसकारण्डवाकीर्णाः पद्मिनीः साधुपुष्पिताः ॥ १८ ॥
इच्छेयं सुखिनी द्रष्टुं त्वया वीरेण सङ्गता ।

मूलम् - VR

अभिषेकम् करिष्यामि तासु नित्यम् यतव्रता । सह त्वया विशाल अक्ष रंस्ये परम नन्दिनी ॥ २-२७-१८

अनुवाद (हिन्दी)

‘आप मेरे वीर स्वामी हैं । मैं आपके साथ रहकर सुखपूर्वक उन सुन्दर सरोवरोंकी शोभा देखना चाहती हूँ, जो श्रेष्ठ कमलपुष्पोंसे सुशोभित हैं तथा जिनमें हंस और कारण्डव आदि पक्षी भरे रहते हैं ॥ १८ १/२ ॥

अनुवाद (कन्नड)

नीवु नन्न वीर स्वामिगळागिरुविरि. नानु निम्मॊन्दिगॆ इद्दु श्रेष्ठ कमल पुष्पगळिन्द सुशोभित हागू हंस, कारण्डव पक्षिगळिन्द तुम्बिद सुन्दर सरोवरगळन्नु नोडलु बयसुवॆनु.॥18½॥

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

18. vishaalaakshha = Oh; the large eyed lord! yatavrataa = remaining dedicated; karishhyaami = I shall take; abhishhekam = bath; nityam = regularly; taasu = in those lakes; paramanandinii = with full of joy; ramsye = I shall sport; tvayaasaha = with you.

अनुवादः

“Oh, the large eyed lord! Remaining dedicated to you, I shall take bath regularly in those lakes and with full of joy, I shall sport with you.”

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

अभिषेकं करिष्यामि तासु नित्यमनुव्रता ॥ १९ ॥
सह त्वया विशालाक्ष रंस्ये परमनन्दिनी ।

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

अभिषेकं करिष्यामि तासु नित्यमनुव्रता ॥ १९ ॥
सह त्वया विशालाक्ष रंस्ये परमनन्दिनी ।

मूलम् - VR

एवम् वर्ष सहस्राणाम् शतम् वा अहम् त्वया सह । व्यतिक्रमम् न वेत्स्यामि स्वर्गोऽपि हि न मे मतः ॥ २-२७-१९

अनुवाद (हिन्दी)

‘विशाल नेत्रोंवाले आर्यपुत्र! आपके चरणोंमें अनुरक्त रहकर मैं प्रतिदिन उन सरोवरोंमें स्नान करूँगी और आपके साथ वहाँ सब ओर विचरूँगी, इससे मुझे परम आनन्दका अनुभव होगा ॥ १९ १/२ ॥

अनुवाद (कन्नड)

विशालनेत्रवुळ्ळ आर्यपुत्र! निम्म चरणगळल्लि अनुरक्तळागिद्दु नानु प्रतिदिन आ सरोवरगळल्लि स्नान माडुवॆनु हागू निम्मॊन्दिगॆ अल्लि ऎल्लॆडॆ सञ्चरिसुवॆनु. इदरिन्द नानु परमानन्दवन्नु अनुभविसुवॆनु.॥19½॥

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

19. aham = I; tvayaasaha = along with you; evam = thus; shatamvaapi = spending also hundred; varshhasahasraaNaam = thousand years; ravetsyaami = shall not find; vyatikramam = deviation me = to me; svaro.api = heaven also; namataH hi = indeed is not desired.

अनुवादः

Thus spending even a hundred thousand years in your company I shall never find any deviation/ Heaven also will not be acceptable to me otherwise.

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

एवं वर्षसहस्राणि शतं वापि त्वया सह ॥ २० ॥
व्यतिक्रमं न वेत्स्यामि स्वर्गोऽपि हि न मे मतः ।

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

एवं वर्षसहस्राणि शतं वापि त्वया सह ॥ २० ॥
व्यतिक्रमं न वेत्स्यामि स्वर्गोऽपि हि न मे मतः ।


एवं वर्षसहस्राणिं शतं वापि त्वया सह ॥
व्यतिक्रमं न वेत्स्यामि स्वर्गोपि हि न मे मतः ।

मूलम् - VR

स्वर्गे अपि च विना वासो भविता यदि राघव । त्वया मम नर व्याघ्र न अहम् तम् अपि रोचये ॥ २-२७-२०

अनुवाद (हिन्दी)

‘इस तरह सैकड़ों या हजारों वर्षोंतक भी यदि आपके साथ रहनेका सौभाग्य मिले तो मुझे कभी कष्टका अनुभव नहीं होगा । यदि आप साथ न हों तो मुझे स्वर्गलोककी प्राप्ति भी अभीष्ट नहीं है ॥ २० १/२ ॥

अनुवाद (कन्नड)

हीगॆ साविरारु वर्षगळवरॆविगू निम्मॊडनॆ इरुव सौभाग्य दॊरकिदरू ननगॆ ऎन्दू कष्टद अनुभव आगलारदु. नीवु जॊतॆयल्लि इल्लदिद्दरॆ स्वर्गलोकद प्राप्तियू सुख कॊडलारदु.॥20½॥

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

20. naravyaaghra = Oh; lion among men! raaghava = oh; secion of Raghu! mama = to me; tvayaa vinaa = without you; svarge.api = even in heaven; bhavitaayadi = is to become; vaasaH = residence; aham = I; na rochaye = do not like tamapi = that too.

अनुवादः

Oh, Lion among men and seion of Raghu! Even if in heaven there is residence for me without you, I do not like it.

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

स्वर्गेऽपि च विना वासो भविता यदि राघव ।
त्वया विना नरव्याघ्र नाहं तदपि रोचये ॥ २१ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

स्वर्गेऽपि च विना वासो भविता यदि राघव ।
त्वया विना नरव्याघ्र नाहं तदपि रोचये ॥ २१ ॥

मूलम् - VR

अहम् गमिष्यामि वनम् सुदुर्गमम् । मृग आयुतम् वानर वारणैः युतम् । वने निवत्स्यामि यथा पितुर् गृहे । तव एव पादाव् उपगृह्य सम्मता ॥ २-२७-२१

अनुवाद (हिन्दी)

‘पुरुषसिंह रघुनन्दन! आपके बिना यदि मुझे स्वर्गलोकका निवास भी मिल रहा हो तो वह मेरे लिये रुचिकर नहीं हो सकता—मैं उसे लेना नहीं चाहूँगी ॥ २१ ॥

अनुवाद (कन्नड)

पुरुषसिंह रघुनन्दन! नीविल्लदॆ ननगॆ स्वर्गलोकद वास सिगुवुदिद्दरू अदु ननगॆ रुचिसदु. अदन्नु नानु बयसलारॆ.॥21॥

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

21. aham = I; gamishhyaami = can go; vanam = to forest; sundargamam = which is very much inaccessible; mR^igaayutam = mingled with animals; vaanaravaarNaiH = occupied by monkeys and elephants; upagR^ihya = clinging; tava paadaaveva = your feet alone; samyataa = with restraint; nivatsyaami = I shall dwell; vane = in the forest; gR^iheyathaa = as thought in the house; pituH = of father.

अनुवादः

I shall proceed to the forest, which is very much inaccessible and occupied by monkeys, elephants as well as other animals. Clining to your feet alone, I shall dwell in the forest as though in father’s home.

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

अहं गमिष्यामि वनं सुदुर्गमं
मृगायुतं वानरवारणैश्च ।
वने निवत्स्यामि यथा पितुर्गृहे
तवैव पादाव् उपगृह्य सम्मता ॥ २२ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

अहं गमिष्यामि वनं सुदुर्गमं
मृगायुतं वानरवारणैश्च ।
वने निवत्स्यामि यथा पितुर्गृहे
तवैव पादावुपगृह्य सम्मता ॥ २२ ॥


अहं गमिष्यामि वनं सुदुर्गमं
मृगायुतंवानरवारणैश्च ।
वने निवत्स्यामि यथा पितुर्गृहे
तवैवपादवुपगृह्य सम्मता ॥

मूलम् - VR

अनन्य भावाम् अनुरक्त चेतसम् । त्वया वियुक्ताम् मरणाय निश्चिताम् । नयस्व माम् साधु कुरुष्व याचनाम् । न ते मया अतः गुरुता भविष्यति ॥ २-२७-२२

अनुवाद (हिन्दी)

‘प्राणनाथ! अतः उस अत्यन्त दुर्गम वनमें, जहाँ सहस्रों मृग, वानर और हाथी निवास करते हैं, मैं अवश्य चलूँगी और आपके ही चरणोंकी सेवामें रहकर आपके अनुकूल चलती हुई उस वनमें उसी तरह सुखसे रहूँगी, जैसे पिताके घरमें रहा करती थी ॥ २२ ॥

अनुवाद (कन्नड)

प्राणनाथ! आद्दरिन्द साविरारु मृग, वानर, आनॆगळु वासिसुव अत्यन्त दुर्गमवाद वनक्कॆ अवश्यवागि बरुवॆनु हागू तम्म चरणगळ सेवॆयल्लि तत्परवागिद्दु, निमगॆ अनुकूलळागि नडॆयुत्ता आ वनदल्लि तन्दॆय मनॆयल्लि इरुवन्तॆ सुखवागि इरुवॆनु.॥22॥

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

22. ananya bhaavaam = without anyother thought; anurakta chetanam = my mind attached to you; viyuktaam = if separated; tvayaa = from you; nischitaam = having decided; maraNaaya = to die; nayasva = usher; maam = me; kurushhva = grant; saadhu = well; yaachanaam = my prayer; ataH = due to this; na bhavishhyati = there will be no; gurutaa = burden; te = to you; maya = by me.

अनुवादः

“Therefore, grant well my prayer and usher me- me without any other thought, whose mind is fondly attached to you and who am determined to die if separated from you. Due to this, there will be no burden to you from me.”

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

अनन्यभावामनुरक्तचेतसं
त्वया वियुक्तां मरणाय निश्चिताम् ।
नयस्व मां साधु कुरुष्व याचनां
नातो मया ते गुरुता भविष्यति ॥ २३ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

अनन्यभावामनुरक्तचेतसं
त्वया वियुक्तां मरणाय निश्चिताम् ।
नयस्व मां साधु कुरुष्व याचनां
नातो मया ते गुरुता भविष्यति ॥ २३ ॥

मूलम् - VR

तथा ब्रुवाणाम् अपि धर्म वत्सलो । न च स्म सीताम् नृ वरः निनीषति । उवाच च एनाम् बहु सम्निवर्तने । वने निवासस्य च दुह्खिताम् प्रति ॥ २-२७-२३

अनुवाद (हिन्दी)

‘मेरे हृदयका सम्पूर्ण प्रेम एकमात्र आपको ही अर्पित है, आपके सिवा और कहीं मेरा मन नहीं जाता, यदि आपसे वियोग हुआ तो निश्चय ही मेरी मृत्यु हो जायगी । इसलिये आप मेरी याचना सफल करें, मुझे साथ ले चलें, यही अच्छा होगा; मेरे रहनेसे आपपर कोई भार नहीं पड़ेगा’ ॥ २३ ॥

अनुवाद (कन्नड)

नन्न हृदयद पूर्णप्रेम एकमात्र निमगे अर्पितवागिदॆ. नीविल्लदॆ बेरॆ ऎल्लिगू नन्न मनस्सु होगुवुदिल्ल. निम्मिन्द वियोगवादरॆ निश्चयवागि नन्न मृत्यु आगुवुदु. इदक्कागि नीवु नन्न प्रार्थनॆयन्नु सफलगॊळिसिरि. नन्नन्नु जॊतॆगॆ करॆदुकॊण्डु होगिरि, इदे चॆन्नागिरुवुदु. नानु इरुवुदरिन्द निम्म मेलॆ यावुदे भार बीळलारदु.॥23॥

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

23. nR^ivaraH = Rama the best of men; dharmavatsalaH = who is fond of righteousness; na niniishhitisma = was not inclined to take; siitaam = Sita; bruvaaNaamapi = who was even though speaking; tathaa = thus; samnivartane = to hold her back; uvaacha cha = he talked also; habu = highly; enaam = to her; duHkhitaam prati = about afflictions; nivaasasya = fo dwelling; vane = in a forest.

अनुवादः

sita along with him eventhought she was speaking as a foresaid. To hold her back from coming to forest, he also started talking highly of the various afflictions she might have to face in a forest.

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

तथा ब्रुवाणामपि धर्मवत्सलां
न च स्म सीतां नृवरो निनीषति ।
उवाच चैनां बहु सन्निवर्तने
वने निवासस्य च दुःखितां प्रति ॥ २४ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

तथा ब्रुवाणामपि धर्मवत्सलां
न च स्म सीतां नृवरो निनीषति ।
उवाच चैनां बहु सन्निवर्तने
वने निवासस्य च दुःखितां प्रति ॥ २४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

धर्ममें अनुरक्त रहनेवाली सीताके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर भी नरश्रेष्ठ श्रीरामको उन्हें साथ ले जानेकी इच्छा नहीं हुई । वे उन्हें वनवासके विचारसे निवृत्त करनेके लिये वहाँके कष्टोंका अनेक प्रकारसे विस्तारपूर्वक वर्णन करने लगे ॥ २४ ॥

अनुवाद (कन्नड)

धर्मदल्लि अनुरक्तळाद सीतॆयु ई प्रकार प्रार्थिसिदरू नरश्रेष्ठ श्रीरामनिगॆ आकॆयन्नु जॊतॆगॆ करॆदुकॊण्डु होगलु इच्छॆ उण्टागलिल्ल. अवनु आकॆयन्नु वनवासद विचारदिन्द निवृत्तगॊळिसलु अल्लिय कष्टगळन्नु अनेक विधदिन्द विस्तारवागि वर्णिसतॊडगिदनु.॥24॥

समाप्तिः

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्तविंशः सर्गः ॥ २७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें सत्ताईसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २७ ॥

अनुवाद (समाप्तिः) (कन्नड)

श्रीवाल्मीकि विरचित आर्षरामायण आदिकाव्यद अयोध्याकाण्डदल्लि इप्पत्तेळनॆय सर्ग पूर्णवायितु ॥27॥