००७ मन्थरामन्त्रणम्

वाचनम्
सर्वाष् टीकाः
Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy - Intro

Book II : Ayodhya Kanda - Book Of Ayodhya

Manthara feels very sad after hearing about anointment of Rama for the princely kingdom. She tells Kaikeyi about the coronation of Rama. Kaikeyi becomes delighted and gives Manthara one of her jewels.

स्रोतः: valmikiramayan.net

भागसूचना
  1. श्रीरामके अभिषेकका समाचार पाकर खिन्न हुई मन्थराका कैकेयीको उभाड़ना, परंतु प्रसन्न हुई कैकेयीका उसे पुरस्काररूपमें आभूषण देना और वर माँगनेके लिये प्रेरित करना
विश्वास-प्रस्तुतिः

ज्ञातिदासी यतो जाता कैकेय्या तु सहोषिता ।
प्रासादं चन्द्रसङ्काशमारुरोह यदृच्छया ॥ १ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

ज्ञातिदासी यतो जाता कैकेय्या तु सहोषिता ।
प्रासादं चन्द्रसङ्काशमारुरोह यदृच्छया ॥ १ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

रानी कैकेयीके पास एक दासी थी, जो उसके मायकेसे आयी हुई थी । वह सदा कैकेयीके ही साथ रहा करती थी । उसका जन्म कहाँ हुआ था? उसके देश और माता-पिता कौन थे? इसका पता किसीको नहीं था । अभिषेकसे एक दिन पहले वह स्वेच्छासे ही कैकेयीके चन्द्रमाके समान कान्तिमान् महलकी छतपर जा चढ़ी ॥ १ ॥

अनुवाद (कन्नड)

महाराणि कैकॆय बळि ओर्व दासियिद्दळु, आकॆयन्नु अवळु तवरुमनॆयिन्द तन्दिद्दळु. आकॆयु सदा कैकॆयिय जॊतॆगे इरुत्तिद्दळु. आकॆ ऎल्लि हुट्टिदळु? आकॆय तन्दॆ-तायि यारु? इदु यारिगू तिळिदिरलिल्ल. पट्टाभिषेकद हिन्दिन दिन अवळु स्वेच्छॆयिन्द चन्द्रनन्तॆ कान्तियुळ्ळ अरमनॆय बिसिलु माळिगॆयन्नु हत्तिदळु.॥1॥

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

1. GYaatidaasi = housemaid of relatives (Manthara); yataH jaataa = since her birth; ushhitaa = residing; kaikeyyaa saha = with Kaikeyi; yadR^ichchhayaa = by chance; aaruroha = ascended; praasaadam = the balcony of palace; chandrasa~Nkaasham = which resembled the full moon.

अनुवादः

Manthara, a housemaid who was residing with Kaikeyi since her birth, accidentally ascended the balcony of Kaikeyi’s white palace, which resembled the full moon.

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

सिक्तराजपथां कृत्स्नां प्रकीर्णकमलोत्पलाम् ।
अयोध्यां मन्थरा तस्मात् प्रासादादन्ववैक्षत ॥ २ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

सिक्तराजपथां कृत्स्नां प्रकीर्णकमलोत्पलाम् ।
अयोध्यां मन्थरा तस्मात् प्रासादादन्ववैक्षत ॥ २ ॥


सिक्तराजपथां कृत्स्नां प्रकीर्णकुमलोत्पलाम् ।
अयोध्यां मन्थरा तस्मात्प्रा सादादन्ववैक्षत ॥

मूलम् - VR

सिक्तराजपथां कृत्स्नां प्रकीर्णकुसुमोत्कराम् । अयोध्यां मन्थरा तस्मात्प्रासादादन्ववैक्षत ॥ २-७-२

अनुवाद (हिन्दी)

उस दासीका नाम था—मन्थरा । उसने उस महलकी छतसे देखा—अयोध्याकी सड़कोंपर छिड़काव किया गया है और सारी पुरीमें यत्र-तत्र खिले हुए कमल और उत्पल बिखेरे गये हैं ॥ २ ॥

अनुवाद (कन्नड)

मन्थरॆ ऎम्ब आ दासियु आ भवनद माळिगॆयिन्द नोडिदळु - अयोध्यॆय राजबीदिगळु पन्नीरिनिन्द सिम्पडिसलागित्तु. नगरद ऎल्लॆडॆ अरळिद कमल मत्तु उत्पल पुष्पगळन्नु चॆल्लिद्दरु.॥2॥

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

2. mantharaa = Manthara; praasaadaat = from that balcony; anvavaikshata = saw; tasmaat = that; kR^itsnaam = entire; ayodhyaam = Ayodhya; siktaraajapathaam = the principal roads being sprinkled with water; prakiirNakusumotkaraam = and stewn with heaps of flowers.

अनुवादः

Manthara, from that balcony, saw the entire city of Ayodhya, with all its principal roads being sprinkled with water and strewn with heaps of flowers.

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

पताकाभिर्वरार्हाभिर्ध्वजैश्च समलङ्कृताम् ।
सिक्तां चन्दनतोयैश्च शिरःस्नातजनैर्युताम् ॥ ३ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

पताकाभिर्वरार्हाभिर्ध्वजैश्च समलङ्कृताम् ।
सिक्तां चन्दनतोयैश्च शिरःस्नातजनैर्युताम् ॥ ३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

सब ओर बहुमूल्य पताकाएँ फहरा रही हैं । ध्वजाओंसे इस पुरीकी अपूर्व शोभा हो रही है । राजमार्गोंपर चन्दनमिश्रित जलका छिड़काव किया गया है तथा अयोध्यापुरीके सब लोग उबटन लगाकर सिरके ऊपरसे स्नान किये हुए हैं ॥ ३ ॥

अनुवाद (कन्नड)

ऎल्लॆडॆ सुन्दर पताकॆगळु हाराडुत्तिद्दवु. ध्वजगळिन्द आ पुरिय शोभॆ अपूर्ववागित्तु. राजबीदिगळल्लि सुगन्धित नीरन्नु चिमुकिसलागित्तु. अयोध्यॆय ऎल्ल जनरु अभ्यङ्ग स्नातरागि अलङ्कृतरागि ओडाडुत्तिद्दरु.॥3॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

माल्यमोदकहस्तैश्च द्विजेन्द्रैरभिनादिताम् ।
शुक्लदेवगृहद्वारां सर्ववादित्रनादिताम् ॥ ४ ॥
सम्प्रहृष्टजनाकीर्णां ब्रह्मघोषनिनादिताम् ।
प्रहृष्टवरहस्त्यश्वां सम्प्रणर्दितगोवृषाम् ॥ ५ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

माल्यमोदकहस्तैश्च द्विजेन्द्रैरभिनादिताम् ।
शुक्लदेवगृहद्वारां सर्ववादित्रनादिताम् ॥ ४ ॥
सम्प्रहृष्टजनाकीर्णां ब्रह्मघोषनिनादिताम् ।
प्रहृष्टवरहस्त्यश्वां सम्प्रणर्दितगोवृषाम् ॥ ५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

श्रीरामके दिये हुए माल्य और मोदक हाथमें लिये श्रेष्ठ ब्राह्मण हर्षनाद कर रहे हैं, देवमन्दिरोंके दरवाजे चूने और चन्दन आदिसे लीपकर सफेद एवं सुन्दर बनाये गये हैं, सब प्रकारके बाजोंकी मनोहर ध्वनि हो रही है, अत्यन्त हर्षमें भरे हुए मनुष्योंसे सारा नगर परिपूर्ण है और चारों ओर वेदपाठकोंकी ध्वनि गूँज रही है, श्रेष्ठ हाथी और घोड़े हर्षसे उत्फुल्ल दिखायी देते हैं तथा गाय-बैल प्रसन्न होकर रँभा रहे हैं ॥ ४-५ ॥

अनुवाद (कन्नड)

श्रीरामनिगॆ अर्पिसलु मालॆगळन्नु मत्तु मोदकगळन्नु कैगळल्लॆत्तिकॊण्ड श्रेष्ठ ब्राह्मणरु हर्षनाद माडुत्ता इद्दारॆ. देवालयगळ महाद्वारगळन्नु चन्दनादिगळिन्द सुन्दरवागि अलङ्करिसिद्दरु. ऎल्ल प्रकारद वाद्यगळ मधुर ध्वनि ऎल्लॆडॆ मॊळगुत्तित्तु. अत्यन्त हर्षितराद जनरिन्द नगरवॆल्ल तुम्बिहोगित्तु. ऎल्लॆडॆ वेदपाठिगळ मन्त्र ध्वनिगळु प्रतिध्वनिसुत्तिद्दवु. श्रेष्ठ गज, अश्वगळु हर्षदिन्द मॆरॆयुत्तिद्दवु. हसुगळु मत्तु करुगळु आनन्ददिन्द ‘अम्बा’ ऎन्दु कूगुत्तिद्दवु.॥4-5॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

हृष्टप्रमुदितैः पौरैरुच्छ्रितध्वजमालिनीम् ।
अयोध्यां मन्थरा दृष्ट्वा परं विस्मयमागता ॥ ६ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

हृष्टप्रमुदितैः पौरैरुच्छ्रितध्वजमालिनीम् ।
अयोध्यां मन्थरा दृष्ट्वा परं विस्मयमागता ॥ ६ ॥


प्रहृष्टमुदितैः पौरैरुच्छ्रितध्वजमालिनीम् ।
अयोध्यां मन्थरा दृष्ट्वापरं विस्मयमागता ॥

अनुवाद (हिन्दी)

सारे नगरनिवासी हर्षजनित रोमाञ्चसे युक्त और आनन्दमग्न हैं तथा नगरमें सब ओर श्रेणीबद्ध ऊँचे-ऊँचे ध्वज फहरा रहे हैं । अयोध्याकी ऐसी शोभाको देखकर मन्थराको बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ ६ ॥

अनुवाद (कन्नड)

ऎल्ल नगर निवासिगळु हर्षदिन्द रोमाञ्चनगॊण्डु आनन्दमग्नरागिद्दारॆ. नगरद ऎल्लॆडॆ ऎत्तरवाद ध्वजगळु हाराडुत्तिद्दवु. अयोध्येय इन्तह शोभॆयन्नु नोडि मन्थरॆगॆ आश्चर्यवायितु.॥6॥

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

3;4;5;6Mantharaa = Manthara; anvavaikshataa = saw; tasmaat praasaadaat = from that balcony; ayodhyaam = the city of Ayodhya; varaarHaabhiH = which was an excellent one; samalaN^kR^itaam = decorated by; pataakaabhiH = flags; dhvajaishcha = and by buntings; vR^itaam = consisting of; chaMda pathaiH cha api = well laid out pathways; vR^itaam = consisting of; shiraH snaata janaiH = people who had head bath; abhinaaditaam = and resounding with; dvijendraiH = brahmins; maalya modaka hastaiH = with flowers and sweets in their hands; shukla deva gR^iha dvaaraam = (consisting of) temples with white doorways; sarva vaaditra nisvanaam = resonating with sounds from various musical instruments; saMprahR^ishhTa janaakiirNaam = filled with happy people; brahmaghoshha abhinaaditaam = resonating with Vedic chants; prahR^ishhTa vara hastyashvaam = with overjoyed elephants and horses; saMpraNardita govR^ishhaam = with roaring bulls and cows; prahR^ishhTamuditaiH = with greatly overjoyed; pauraiH = citizens; uchchhrita dhvaja maaliniim = and decked with rows of tall flags .

अनुवादः

Manthara further saw from that balcony the city decorated with the best of flags and banners. The roads were cleared for uninterrupted traffic. All the people took head-bath. Brahmans with flowers and sweets in their hands were chanting Mantras. The gateways of temples were white washed. There were sounds of all musical instruments. The city was filled with rejoicing people and resounding chant of Vedas. The elephants and horses were also merry. The bulls were making roaring noise. The highly delighted citizens hoisted rows of flags on their housetops.

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

सा हर्षोत्फुल्लनयनां पाण्डुरक्षौमवासिनीम् ।
अविदूरे स्थितां दृष्ट्वा धात्रीं पप्रच्छ मन्थरा ॥ ७ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

सा हर्षोत्फुल्लनयनां पाण्डुरक्षौमवासिनीम् ।
अविदूरे स्थितां दृष्ट्वा धात्रीं पप्रच्छ मन्थरा ॥ ७ ॥

मूलम् - VR

प्रहर्षोत्फुल्लनयनां पाण्डुरक्षौमवासिनीम् । अविदूरे स्थितां दृष्ट्वा धात्रीं पप्रच्छ मन्थरा ॥ २-७-७

अनुवाद (हिन्दी)

उसने पासके ही कोठेपर रामकी धायको खड़ी देखा, उसके नेत्र प्रसन्नतासे खिले हुए थे और शरीरपर पीले रंगकी रेशमी साड़ी शोभा पा रही थी । उसे देखकर मन्थराने उससे पूछा— ॥ ७ ॥

अनुवाद (कन्नड)

अल्ले बळिय महडियल्लि रामन दासियन्नु नोडिदळु. अवळ कण्णुगळु प्रसन्नतॆयिन्द अरळित्तु. शरीरदल्लि बिळिय रेष्मॆय सीरॆयन्नु उट्टिद्दळु. आकॆयन्नु नोडि मन्थरॆ केळिदळु.॥7॥

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

7. mantharaa = Manthara; dR^ishhTvaa = seeing; dhaatriim = a house maid; praharshhotphullanayanaam = with bright delighted eyes; paaNDurakshaumavaasiniim = wearing white silk clothes; sthitaam = staying; aviduure = nearby; paprachchha = and asked(as follows):

अनुवादः

Manthara asked a house maid with bright pleasing eyes and wearing white silk clothes standing nearby, as follows: -

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

उत्तमेनाभिसंयुक्ता हर्षेणार्थपरा सती ।
राममाता धनं किं नु जनेभ्यः सम्प्रयच्छति ॥ ८ ॥
अतिमात्रं प्रहर्षः किं जनस्यास्य च शंस मे ।
कारयिष्यति किं वापि सम्प्रहृष्टो महीपतिः ॥ ९ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

उत्तमेनाभिसंयुक्ता हर्षेणार्थपरा सती ।
राममाता धनं किं नु जनेभ्यः सम्प्रयच्छति ॥ ८ ॥
अतिमात्रं प्रहर्षः किं जनस्यास्य च शंस मे ।
कारयिष्यति किं वापि सम्प्रहृष्टो महीपतिः ॥ ९ ॥

मूलम् - VR

उत्तमेनाभिसंयुक्ता हर्षेणार्थपरा सती । राममाता धनं किं नु जनेभ्यः संप्रयच्छति । २-७-८ अतिमात्रप्रहर्षोऽयं किं जनस्य च शंस मे । कारयिष्यति किं वापि संप्रहृष्टो महीपतिः ॥ २-७-९

अनुवाद (हिन्दी)

‘धाय! आज श्रीरामचन्द्रजीकी माता अपने किसी अभीष्ट मनोरथके साधनमें तत्पर हो अत्यन्त हर्षमें भरकर लोगोंको धन क्यों बाँट रही हैं? आज यहाँके सभी मनुष्योंको इतनी अधिक प्रसन्नता क्यों है? इसका कारण मुझे बताओ! आज महाराज दशरथ अत्यन्त प्रसन्न होकर कौन-सा कर्म करायेंगे’ ॥ ८-९ ॥

अनुवाद (कन्नड)

धात्रि! इन्दु श्रीरामचन्द्रन मातॆयु यावुदो अभीष्ट मनोरथद साधनॆयल्लि तत्परळागि अत्यन्त हर्षदिन्द जनरिगॆ धनवन्नु एकॆ हञ्चुत्तिद्दाळॆ? इन्दु इल्लिय ऎल्ल जनरु इष्टु प्रसन्नरागिरुवरु एकॆ? इदर कारणवन्नु ननगॆ तिळिसु. इन्दु दशरथ महाराज अत्यन्त प्रसन्नरागि याव कार्यवन्नु माडुवरु.॥8-9॥

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

8. kim nu saMprayachchhati = why Kausalya is giving away; dhanam = money; janebhyaH = to people; uttamena = most; harsheNa abhisamyukta = delightfully; arthaparaasatii = (though) she is badly lured of money.

अनुवादः

“Why is Kausalya giving away money to people so delightfully today in charity, eventhough she is badly lured of money?”

स्रोतः: valmikiramayan.net

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पदच्छेदः

9. kim = why; ayam = this; atimaatra praharshaH = great rejoicing; janasya = of people ?; mahiipatiH = (Is) king Dasaratha; samprahR^ishhTa = duly pleased; kimvaapi kaarayishyati vaa = getting done any act? shamsa = tell; me = me.

अनुवादः

“Why are people so happy today? Is the king duly pleased with something, doing any great act? Tell me.”

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

विदीर्यमाणा हर्षेण धात्री तु परया मुदा ।
आचचक्षेऽथ कुब्जायै भूयसीं राघवे श्रियम् ॥ १० ॥
श्वः पुष्येण जितक्रोधं यौवराज्येन चानघम् ।
राजा दशरथो राममभिषेक्ता हि राघवम् ॥ ११ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

विदीर्यमाणा हर्षेण धात्री तु परया मुदा ।
आचचक्षेऽथ कुब्जायै भूयसीं राघवे श्रियम् ॥ १० ॥
श्वः पुष्येण जितक्रोधं यौवराज्येन चानघम् ।
राजा दशरथो राममभिषेक्ता हि राघवम् ॥ ११ ॥

मूलम् - VR

विदीर्यमाणा हर्षेण धात्री तु परया मुदा । आचचक्षेऽथ कुब्जायै भूयसीं राघवश्रियम् ॥ २-७-१० श्वः पुष्येण जितक्रोधं यौवराज्येन राघवम् । राजा दशरथो राममभिषेचयितानघम् ॥ २-७-११

अनुवाद (हिन्दी)

श्रीरामकी धाय तो हर्षसे फूली नहीं समाती थी, उसने कुब्जाके पूछनेपर बड़े आनन्दके साथ उसे बताया—‘कुब्जे! रघुनाथजीको बहुत बड़ी सम्पत्ति प्राप्त होनेवाली है । कल महाराज दशरथ पुष्यनक्षत्रके योगमें क्रोधको जीतनेवाले, पापरहित, रघुकुलनन्दन श्रीरामको युवराजके पदपर अभिषिक्त करेंगे’ ॥ १०-११ ॥

अनुवाद (कन्नड)

श्रीरामन दासियु हर्षातिरेकदिन्द कुब्जा मन्थरॆयु केळिदाग बहळ आनन्ददिन्द तिळिसिदळु- कुब्जे! रघुनाथनिगॆ बहळ दॊड्ड सम्पत्तु प्राप्तवागुवुदिदॆ. नाळॆ दशरथ महाराजरु पुष्य नक्षत्रद शुभयोगदल्लि क्रोधवन्नु गॆद्दिरुव, पापरहित, रघुकुलनन्दन श्रीरामनिगॆ युवराज पट्टाभिषेक माडुवरु.॥10-11॥

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

10. dhaatrii tu = that house maid; vidiiryamaaNaa = bursting; harsheNa = with joy; atha = thereafter; aachachakshe = told; kubjaayai = the hunch backed Manthara; paramayaa mudaa = with great gladness; bhuuyasiim raghavashriyam = about the great honor to be conferred on Rama.

अनुवादः

That housemaid, bursting with joy, told Manthara in a great gladdening tone about the great honor to be conferred upon Rama.

स्रोतः: valmikiramayan.net

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

11. svaH = tommorow; pushyeNa = on the day of Pushyami star; raajaa dasarathaH = king Dasaratha; abhishechayitaa = is going to anoint; anagham = faultless; raamam = Rama; raaghavam = who was born in Raghu clan; yauvaraajyena = for the princely kingdom.

अनुवादः

“Tomorrow on the day of Pushyami star, king Dasaratha is going to anoint the fault-less Rama for the princely kingdom.”

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

धात्र्यास्तु वचनं श्रुत्वा कुब्जा क्षिप्रममर्षितः ।
कैलासशिखराकारात् प्रासादादवरोहत ॥ १२ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

धात्र्यास्तु वचनं श्रुत्वा कुब्जा क्षिप्रममर्षितः ।
कैलासशिखराकारात् प्रासादादवरोहत ॥ १२ ॥

मूलम् - VR

धात्र्यास्तु वचनं श्रुत्वा कुब्जा क्षिप्रममर्षिता । कैलासशिखराकारात्प्रासादादवरोहत ॥ २-७-१२

अनुवाद (हिन्दी)

धायका यह वचन सुनकर कुब्जा मन-ही-मन कुढ़ गयी और उस कैलास-शिखरकी भाँति उज्ज्वल एवं गगनचुम्बी प्रासादसे तुरंत ही नीचे उतर गयी ॥ १२ ॥

अनुवाद (कन्नड)

दासिय आ मातन्नु केळि मन्थरॆयु मनस्सिनल्ले कुदियतॊडगिदळु. कूडले आ कैलास शिखरदन्तॆ उज्वल, गगनचुम्बी सौधदिन्द कॆळगॆ इळिदळु.॥12॥

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

12. shrutvaa = after hearing; vachanam = words; dhaatryaa = of the maid; kubjaa = the hunch backed Manthara; kshipram = quickly; amarshhitaa = with anger; avarohata = stepped down; praasaadaat = from roof of the palace.

अनुवादः

After hearing the words of that maid, Manthara quickly with wrath walked down from the roof of the palace, which was in the shape of mount Kailasa.

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

सा दह्यमाना क्रोधेन मन्थरा पापदर्शिनी ।
शयानामेव कैकेयीमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १३ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

सा दह्यमाना क्रोधेन मन्थरा पापदर्शिनी ।
शयानामेव कैकेयीमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १३ ॥

मूलम् - VR

सा दह्यमाना कोपेन मनथरा पापदर्शिनी । शयनामेत्य कैकेयीमिदं वचन मब्रवीत् ॥ २-७-१३

अनुवाद (हिन्दी)

मन्थराको इसमें कैकेयीका अनिष्ट दिखायी देता था, वह क्रोधसे जल रही थी । उसने महलमें लेटी हुई कैकेयीके पास जाकर इस प्रकार कहा— ॥ १३ ॥

अनुवाद (कन्नड)

मन्थरॆगॆ इदरल्लि कैकॆय अनिष्ट काणुत्तित्तु. आकॆ सिट्टिनिन्द उरिदॆद्दळु. अवळु अन्तःपुरदल्लि मलगिरुव कैकॆय बळिगॆ बन्दु ई प्रकार हेळिदळु.॥13॥

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

13. saa = that; mantharaa = Manthara; paapa darshinii = who has sinful thought; dahyamaanaa = burning; kopena = with anger; etya = approached; kaikeyiim = Kaikeyi; shayaanaam = who was lying on bed; abraviit = and spoke; idam = these; vachanam = words.

अनुवादः

Manthara of sinful thought; burning with anger, approached Kaikeyi who was lying on a bed and spoke these words:

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

उत्तिष्ठ मूढे किं शेषे भयं त्वामभिवर्तते ।
उपप्लुतमघौघेन नात्मानमवबुध्यसे ॥ १४ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

उत्तिष्ठ मूढे किं शेषे भयं त्वामभिवर्तते ।
उपप्लुतमघौघेन नात्मानमवबुध्यसे ॥ १४ ॥

मूलम् - VR

उत्तिष्ठ मूढे किं शेषे भयं त्वामभिवर्तते । उपप्लुतमघौघेन किमात्मानं न बुध्यसे ॥ २-७-१४

अनुवाद (हिन्दी)

‘मूर्खे! उठ । क्या सो रही है? तुझपर बड़ा भारी भय आ रहा है । अरी! तेरे ऊपर विपत्तिका पहाड़ टूट पड़ा है, फिर भी तुझे अपनी इस दुरवस्थाका बोध नहीं होता?’ ॥ १४ ॥

अनुवाद (कन्नड)

मूर्खळे! एळु, एकॆ मलगिरुवॆ? निन्न मेलॆ भारी भय आवरिसिदॆ. ऎलॆगॆ! निन्न मेलॆ विपत्तिन बॆट्टवे कुसिदु बिद्दिदॆ. हीगिद्दरू निनगॆ ई दुरवस्थॆयु तिळियले इल्लवल्ल.॥14॥

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

14. muuDhe = O; fool! uttishTha = get up; kim = why; sheshhe = sleeping? bhayam = dreadful situation; abhivartate = is befalling; tvaa = you; upaplutam = are submerged by; aghaughena = flood of troubles; kim = why (are you); na budhyase = not knowing; aatmaanam = yourself?

अनुवादः

“O, fool! Get up. Why are you sleeping? A dreadful situation is befalling you. A flood of troubles submerges you. Why are you not knowing this yourself?”

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

अनिष्टे सुभगाकारे सौभाग्येन विकत्थसे ।
चलं हि तव सौभाग्यं नद्याः स्रोत इवोष्णगे ॥ १५ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

अनिष्टे सुभगाकारे सौभाग्येन विकत्थसे ।
चलं हि तव सौभाग्यं नद्याः स्रोत इवोष्णगे ॥ १५ ॥


अनिष्टे सुभगाकारे सौभाग्येन विकत्थसे ।
चलं हि तव सौभाग्यं नद्याःस्रोत इवोष्मगे ॥

मूलम् - VR

अनिष्टे सुभगाकारे सौभग्येन विकत्थसे । चलं हि तव सौभाग्यं नद्याः स्रोत इवोष्णगे ॥२-७-१५

अनुवाद (हिन्दी)

‘तेरे प्रियतम तेरे सामने ऐसा आकार बनाये आते हैं मानो सारा सौभाग्य तुझे ही अर्पित कर देते हों, परंतु पीठ-पीछे वे तेरा अनिष्ट करते हैं । तू उन्हें अपनेमें अनुरक्त जानकर सौभाग्यकी डींग हाँका करती है, परंतु जैसे ग्रीष्म ऋतुमें नदीका प्रवाह सूखता चला जाता है, उसी प्रकार तेरा वह सौभाग्य अब अस्थिर हो गया है—तेरे हाथसे चला जाना चाहता है!’ ॥ १५ ॥

अनुवाद (कन्नड)

निन्न प्रियतमनु निन्न मुन्दॆ बन्दु निनगॆ ऎल्ल सौभाग्य अर्पिसुत्तानॆ, आदरॆ बॆन्न हिन्दॆ अवनु निन्न अनिष्ट माडुवन्तॆ इदॆ, इदु नीनु अवनन्नु तन्नल्लि अनुरक्तनॆन्दु तिळिदु सौभाग्यद हिरिमॆयन्नु हॊगळिकॊळ्ळुत्तिरुवॆ. आदरॆ ग्रीष्म ऋतुविनल्लि नदिय प्रवाह ऒणगि होगुवन्तॆ निन्न आ सौभाग्य ईग अस्थिरवागिदॆ - निन्न कैयिन्द जारि होगुत्ता इदॆ.॥15॥

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

15. subhakaagaare = you; who appear to be beloved to your husband! anishhTe = (but) who is not liked by your husband! vikatthase = (you) boast; saubhaagyena = of fortune; tava = your; saubhaagyam = fortune; chalam hi = is unsteady; srotaH iva = like a stream; nadeyaaH = of river; ushhNage = in summer.

अनुवादः

“Oh, Kaikeyi ! You appear to be a beloved wife for your husband, but in reality he does not like you. You boast of your fortune. Like the flow of a stream in summer; your fortune is unsteady”.

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

एवमुक्ता तु कैकेयी रुष्टया परुषं वचः ।
कुब्जया पापदर्शिन्या विषादमगमत् परम् ॥ १६ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

एवमुक्ता तु कैकेयी रुष्टया परुषं वचः ।
कुब्जया पापदर्शिन्या विषादमगमत् परम् ॥ १६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

इष्टमें भी अनिष्टका दर्शन करानेवाली रोषभरी कुब्जाके इस प्रकार कठोर वचन कहनेपर कैकेयीके मनमें बड़ा दुःख हुआ ॥ १६ ॥

अनुवाद (कन्नड)

इष्टदल्लियू अनिष्टवन्नु नोडुव रोष तुम्बिद कुब्जॆयु ई रीतिय कठोर मातन्नु हेळिदाग कैकॆयिय मनस्सिनल्लि बहळ दुःखवायितु.॥16॥

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

16. kaikeyii = Kaikeyi; agamat = got; param = too much; vishhaadam = sadness; uktaa = after being spoken; parushham = of hard; vachaH = words; evam = thus; rushhTayaa = with anger; kubjayaa = by Manthara; paapadarshinayaa = of sinful thoughts

अनुवादः

Kaikeyi was very much worried after hearing hard words spoken with anger by Manthara of sinful thoughts.

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

कैकेयी त्वब्रवीत् कुब्जां कच्चित् क्षेमं न मन्थरे ।
विषण्णवदनां हि त्वां लक्षये भृशदुःखिताम् ॥ १७ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

कैकेयी त्वब्रवीत् कुब्जां कच्चित् क्षेमं न मन्थरे ।
विषण्णवदनां हि त्वां लक्षये भृशदुःखिताम् ॥ १७ ॥

मूलम् - VR

कैकेयि त्वब्रवीत्कुभां कच्चित्क्षेमं न मनथरे । विषण्णवदनां हि त्वां लक्षये भृ शदुःखिताम् ॥ २-७-१७

अनुवाद (हिन्दी)

उस समय केकयराजकुमारीने कुब्जासे पूछा—‘मन्थरे! कोई अमङ्गलकी बात तो नहीं हो गयी; क्योंकि तेरे मुखपर विषाद छा रहा है और तू मुझे बहुत दुःखी दिखायी देती है’ ॥ १७ ॥

अनुवाद (कन्नड)

आग कैकॆयियु कुब्जॆयल्लि केळिदळु - मन्थरे! यावुदे अमङ्गलद मातु नडॆयलिल्लवल्ल; एकॆन्दरॆ निन्न मुखदल्लि विषाद आवरिसिदॆ हागू नीनु बहळ दुःखियागि काणुत्तिरुवॆ.॥17॥

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

17. kaikeyii tu = Kaikeyi; abraviit = spoke; kubjaam = to the hunch backed; manthare = O; Manthara ! kshhemam na kachchit = (you are feeling) not safe or what ? lakshaye hi = I am seeing; tvaam = you; bhR^ishaduHkhitaam = being very sorrowful; vishhaNNavadanaam = with a worried face.

अनुवादः

Kaikeyi asked the hunch-backed Manthara as follows; “O, Manthara! Are you not safe? You appear to be very sorrowful with your worried face”.

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

मन्थरा तु वचः श्रुत्वा कैकेय्या मधुराक्षरम् ।
उवाच क्रोधसंयुक्ता वाक्यं वाक्यविशारदा ॥ १८ ॥
सा विषण्णतरा भूत्वा कुब्जा तस्यां हितैषिणी ।
विषादयन्ती प्रोवाच भेदयन्ती च राघवम् ॥ १९ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

मन्थरा तु वचः श्रुत्वा कैकेय्या मधुराक्षरम् ।
उवाच क्रोधसंयुक्ता वाक्यं वाक्यविशारदा ॥ १८ ॥
सा विषण्णतरा भूत्वा कुब्जा तस्यां हितैषिणी ।
विषादयन्ती प्रोवाच भेदयन्ती च राघवम् ॥ १९ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

मन्थरा बातचीत करनेमें बड़ी कुशल थी, वह कैकेयीके मीठे वचन सुनकर और भी खिन्न हो गयी, उसके प्रति अपनी हितैषिता प्रकट करती हुई कुपित हो उठी और कैकेयीके मनमें श्रीरामके प्रति भेदभाव और विषाद उत्पन्न करती हुई इस प्रकार बोली— ॥

अनुवाद (कन्नड)

मन्थरॆयु मातिनल्लि बहळ कुशलियागिद्दळु. अवळु कैकॆयिय मधुरवचन केळियू खिन्नळादळु. आकॆय कुरितु तन्न हितैषितॆयन्नु प्रकटिसुत्ता कुपितळादळु हागू कैकॆय मनस्सिनल्लि श्रीरामन कुरितु भेदभाव मत्तु विषादवन्नुण्टुमाडुत्ता ई प्रकार हेळिदळु.॥18-19॥

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

18. srutvaa = after hearing; kaikeyyaaH vachaH = Kaikeyi’s words; madhuraaksharam = with sweet words; mantharaa tu = Manthara; vaakyavishaaradaa = who was an expert in talking; uvaacha = spoke; vaakyam = these words; krodhasamyuktaaH = with anger.

अनुवादः

After hearing Kaikeyi’s sweet words, Manthara who was an expert in talking, spoke with anger.

स्रोतः: valmikiramayan.net

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

19. saa = that; kubjaa = Manthara; tasyaaH hitaishhiNii = wishing Kaikeyi’s welfare; vishhaadayantii = making her sorrowful; bheda yantii cha = and to create hostility; raaghavam = with Rama; provaacha = said (as follows).

अनुवादः

That Manthara, who was full of cunning, feigning to be seeking Kaikeyi’s welfare, appeared more worried, and making Kaikeyi sorrowful, spoke the following, to create hostility between Rama and Kaikeyi.

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

अक्षयं सुमहद् देवि प्रवृत्तं त्वद्विनाशनम् ।
रामं दशरथो राजा यौवराज्येऽभिषेक्ष्यति ॥ २० ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

अक्षयं सुमहद् देवि प्रवृत्तं त्वद्विनाशनम् ।
रामं दशरथो राजा यौवराज्येऽभिषेक्ष्यति ॥ २० ॥


अक्षय्यं सुमहद्देवि प्रवृत्तं त्वद्विनाशनम् ।
रामं दशरथो राजा यौवराज्येऽभिषेक्ष्यति ॥

मूलम् - VR

अक्षय्यं सुमहद्देवि प्रवृत्तं द्वद्विनाशनम् । रामं दशरथो राजा यौवराज्येऽभिषेक्ष्यति ॥ २-७-२०

अनुवाद (हिन्दी)

‘देवि! तुम्हारे सौभाग्यके महान् विनाशका कार्य आरम्भ हो गया है, जिसका कोई प्रतीकार नहीं है । कल महाराज दशरथ श्रीरामको युवराजके पदपर अभिषिक्त कर देंगे ॥ २० ॥

अनुवाद (कन्नड)

देविये! निन्न सौभाग्यद महाविनाशद कार्य आरम्भवागिदॆ. अदर यावुदे प्रतीकार इल्ल. नाळॆ दशरथ महाराजरु श्रीरामनिगॆ युवराज पट्टाभिषेक माडिबिडुवरु.॥20॥

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

20. devi = Oh; Queen! akshhayyam = an unending; sumahat = great; tvadvinaashanam = ruin to you; pravR^ittam = has encircled; raajaa = king; dasharathaH = Dasaratha; abhishhekshyati = is anointing; raamam = Rama; yauvaraajye = for princely kingdom.

अनुवादः

“Oh, queen! An unending great ruin has encircled you. King Dasaratha is going to anoint Rama for the princely kingdom”.

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

सास्म्यगाधे भये मग्ना दुःखशोकसमन्विता ।
दह्यमानानलेनेव त्वद्धितार्थमिहागता ॥ २१ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

सास्म्यगाधे भये मग्ना दुःखशोकसमन्विता ।
दह्यमानानलेनेव त्वद्धितार्थमिहागता ॥ २१ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘यह समाचार पाकर मैं दुःख और शोकसे व्याकुल हो अगाध भयके समुद्रमें डूब गयी हूँ, चिन्ताकी आगसे मानो जली जा रही हूँ और तुम्हारे हितकी बात बतानेके लिये यहाँ आयी हूँ’ ॥ २१ ॥

अनुवाद (कन्नड)

ई समाचार पडॆदु नानु दुःख-शोकदिन्द व्याकुलळागि आळवाद भयसमुद्रदल्लि मुळुगिहोदॆ. चिन्ताग्नियिन्द सुडुत्तिरुवन्तिदॆ हागू निन्न हितद मातन्नु तिळिसलिक्कागि इल्लिगॆ बन्दिरुवॆनु.॥21॥

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

21. saa asmi = that myself; magnaa = is immersed; agaadhe = in bottomless pit; bhaye = of fear; duHkha shoka samanvitaa = with pain and sorrow; dahyamaanena = (I am) burning; analena = as if by fire; aagataa = came; iha = here; tvaddhitaartham = for your sake.

अनुवादः

“I am immersed in a bottomless pit of fear. I am in distress and my mind is burning as if by fire. I hastened here to seek you out.”

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

तव दुःखेन कैकेयि मम दुःखं महद् भवेत् ।
त्वद‍्वृद्धौ मम वृद्धिश्च भवेदिह न संशयः ॥ २२ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

तव दुःखेन कैकेयि मम दुःखं महद् भवेत् ।
त्वद‍्वृद्धौ मम वृद्धिश्च भवेदिह न संशयः ॥ २२ ॥


तव दुःखेन कैकेयि मम दुःखम्महद् भवेत् ।
त्वद्वद्धौ मम वृद्धिश्च भवेदिह न संशयः ॥

मूलम् - VR

तव दुःखेन कैकेयि मम दुःखं महद्भवेत् । त्वद्वृद्धौ मम वृद्धिश्च भवेदत्र न संशयः ॥ २-७-२२

अनुवाद (हिन्दी)

‘केकयनन्दिनि! यदि तुमपर कोई दुःख आया तो उससे मुझे भी बड़े भारी दुःखमें पड़ना होगा । तुम्हारी उन्नतिमें ही मेरी भी उन्नति है, इसमें संशय नहीं है ॥ २२ ॥

अनुवाद (कन्नड)

केकयनन्दिनि! निन्न मेलॆ यावुदादरू दुःख बन्दरॆ ननगू तुम्बा दुःखवन्नु अनुभविसबेकादीतु. निन्न उन्नतियल्ले नन्न उन्नति इदॆ, इदरल्लि संशयवे इल्ल.॥22॥

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पदच्छेदः

22. kaikeyi = O; Kaikeyi; tava duHkena = by your grief; mahat = great; duHkham = grief; bhavena = happens; mama = to me; tvadvR^iddhau = your prosperity; bhavet = becomes; vR^iddhishcha = prosperity; mama = to me; na = no ; saMshayaH = doubt; atra = about this.

अनुवादः

“Kaikeyi! If Rama becomes king, his son will become king after him. Thus, Bharata’s name itself will be removed from the royal clan.”

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

नराधिपकुले जाता महिषी त्वं महीपतेः ।
उग्रत्वं राजधर्माणां कथं देवि न बुध्यसे ॥ २३ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

नराधिपकुले जाता महिषी त्वं महीपतेः ।
उग्रत्वं राजधर्माणां कथं देवि न बुध्यसे ॥ २३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘देवि! तुम राजाओंके कुलमें उत्पन्न हुई हो और एक महाराजकी महारानी हो, फिर भी राजधर्मोंकी उग्रताको कैसे नहीं समझ रही हो? ॥ २३ ॥

अनुवाद (कन्नड)

देवि! नीनु क्षत्रिय कुलदल्लि हुट्टि, ओर्व चक्रवर्ति महाराजन महाराणियागिरुवॆ. हीगिद्दरू राजधर्मगळ उग्रतॆयन्नु एकॆ तिळिदु कॊळ्ळुत्तिल्ल.॥23॥

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

23. devi = Oh; queen! jaataa = having born; naraadhipakule = in royal family; mahishhii = being wife; mahiipate = of a king; katham = why; na buddhyase = not knowing; ugratvam = cruelty; raajadharmaaNaam = in kingly duties.

अनुवादः

“Oh, Kaikeyi! Having born in a royal family and being an emperor’s wife, how is it that you are not knowing about the cruelty in kingly duties?”

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

धर्मवादी शठो भर्ता श्लक्ष्णवादी च दारुणः ।
शुद्धभावेन जानीषे तेनैवमतिसन्धिता ॥ २४ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

धर्मवादी शठो भर्ता श्लक्ष्णवादी च दारुणः ।
शुद्धभावेन जानीषे तेनैवमतिसन्धिता ॥ २४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘तुम्हारे स्वामी धर्मकी बातें तो बहुत करते हैं, परंतु हैं बड़े शठ । मुँहसे चिकनी-चुपड़ी बातें करते हैं, परंतु हृदयके बड़े क्रूर हैं । तुम समझती हो कि वे सारी बातें शुद्ध भावसे ही कहते हैं, इसीलिये आज उनके द्वारा तुम बेतरह ठगी गयी ॥ २४ ॥

अनुवाद (कन्नड)

निन्न स्वामि धर्मद मातु तुम्बा आडुत्तानॆ, आदरॆ अवनु बहळ शठनागिद्दानॆ. बायियल्लि जेनिनन्तॆ मातनाडुवनु, आदरॆ हृदयदल्लि बहळ क्रूरनागिद्दानॆ. अवरु ऎल्ल मातुगळन्नु शुद्ध भावदिन्दले आडुत्तिद्दारॆ ऎन्दु नीनु तिळियुत्तिरुवॆ. अदरिन्द इन्दु अवनिन्द नीनु मोस होदॆ.॥24॥

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

24. bhartaa = your husband; dharma vaadii = talks of righteousness; shaThaH = but does harm secretly; shlakshhNa vaadii = talks sweetly; daaruNaH cha = but is a cruel man; shuddhabhaave = O; the clean minded! najaaniishhe = you are not able to know; atisandhitaa = that you are cheated; tena = by him; evam = thus.

अनुवादः

“Your husband talks about righteousness, but does harm secretly. He says sweet words but behaves cruelly. Because of your clean thinking; you are not able to know that he is cheating you thus.”

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

उपस्थितः प्रयुञ्जानस्त्वयि सान्त्वमनर्थकम् ।
अर्थेनैवाद्य ते भर्ता कौसल्यां योजयिष्यति ॥ २५ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

उपस्थितः प्रयुञ्जानस्त्वयि सान्त्वमनर्थकम् ।
अर्थेनैवाद्य ते भर्ता कौसल्यां योजयिष्यति ॥ २५ ॥

मूलम् - VR

उपस्थितं पयुञ्जानस्त्वयि सान्त्वमनर्थकम् । अर्थेनैवाद्य ते भर्ता कौसल्यां योजयिष्यति ॥ २-७-२५

अनुवाद (हिन्दी)

‘तुम्हारे पति तुम्हें व्यर्थ सान्त्वना देनेके लिये यहाँ उपस्थित होते हैं, वे ही अब रानी कौसल्याको अर्थसे सम्पन्न करने जा रहे हैं ॥ २५ ॥

अनुवाद (कन्नड)

निन्न पतियु निनगॆ व्यर्थ सान्त्वन नीडलु इल्लिगॆ बरुवनु. अवने ईग राणि कौसल्यॆयन्नु अर्थदिन्द सम्पन्ननागिसलु हॊरटिरुवनु.॥25॥

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

25. te bhartaa = your husband; upasthitaH = approaches you; prayuJNjaanaH = employs; anarthakam = useless; saantvam = good words; tvayi = in your instance; adya = today; yojayishhyati = he bestows; arthena = benefit to; kausalyameva = only Kausalya.

अनुवादः

“Your husband approaches you and talks good words, which are useless. But he passes on benefit today to Kausalya only.”

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

अपवाह्य तु दुष्टात्मा भरतं तव बन्धुषु ।
काल्ये स्थापयिता रामं राज्ये निहतकण्टके ॥ २६ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

अपवाह्य तु दुष्टात्मा भरतं तव बन्धुषु ।
काल्ये स्थापयिता रामं राज्ये निहतकण्टके ॥ २६ ॥


अपवाह्य स दुष्टात्मा भरतं तव बन्धुषु ।
काल्ये स्थापयिता रामं राज्ये निहतकण्टके ॥

मूलम् - VR

अपवाह्य स दुष्टात्मा भरतं तव बन्धुषु । काल्यं स्थापयिता रामं राज्ये निहतकण्टके ॥ २-७-२६

अनुवाद (हिन्दी)

‘उनका हृदय इतना दूषित है कि भरतको तो उन्होंने तुम्हारे मायके भेज दिया और कल सबेरे ही अवधके निष्कण्टक राज्यपर वे श्रीरामका अभिषेक करेंगे ॥ २६ ॥

अनुवाद (कन्नड)

अवनु भरतनन्नु निन्न तवरु मनॆगॆ कळिसिकॊट्टनु मत्तु नाळॆ बॆळिग्गॆये अयोध्यॆय निष्कण्टक राज्यदल्लि श्रीरामनिगॆ पट्टाभिषेक माडुवनु.॥26॥

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

26. dushhTaatmaa = the evil minded; saH = he; apavaahya = sent; bharatam = Bharata; tava bandhushhu = to his relatives; kalye = at dawn; sthaapayitaa = is going to install; ramam = Rama; raajye = in kingdom; nihatakaNTake = without hindrance.

अनुवादः

“The evil minded Dasaratha sent Bharata to the house of his relatives and at dawn, is going to install Rama on the throne without hindrance.”

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

शत्रुः पतिप्रवादेन मात्रेव हितकाम्यया ।
आशीविष+++(=सर्प)+++ इवाङ्गेन बाले परिधृतस्त्वया ॥ २७ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

शत्रुः पतिप्रवादेन मात्रेव हितकाम्यया ।
आशीविष इवाङ्गेन बाले परिधृतस्त्वया ॥ २७ ॥

मूलम् - VR

शत्रुः पतिप्रवादेन मात्रेव हितकाम्यया । आशीविष इवाङ्केन बाले परिधृतस्त्वया ॥ २-७-२७

अनुवाद (हिन्दी)

‘बाले! जैसे माता हितकी कामनासे पुत्रका पोषण करती है, उसी प्रकार ‘पति’ कहलानेवाले जिस व्यक्तिका तुमने पोषण किया है, वह वास्तवमें शत्रु निकला । जैसे कोई अज्ञानवश सर्पको अपनी गोदमें लेकर उसका लालन करे, उसी प्रकार तुमने उन सर्पवत् बर्ताव करनेवाले महाराजको अपने अङ्कमें स्थान दिया है ॥ २७ ॥

अनुवाद (कन्नड)

बाले! तायियु हितद कामनॆयिन्द पुत्रनन्नु पोषिसुवन्तॆ, ‘पति’ ऎन्दु हेळुव याव व्यक्तियन्नु नीनु पोषिसिदॆयो अवने शत्रु आदनु. यारादरू अज्ञानदिन्द हावन्नु तॊडॆयल्लॆत्तिकॊण्डु लालनॆ माडुवन्तॆये नीनु आ सर्पदन्तॆ वर्तिसुव महाराजनिगॆ तॊडॆयल्लि स्थान नीडिदॆ.॥27॥

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

27. baale = O; childish one! maatreva = like mother; hitakaamyayaa = being wished well being; tvayaa = by you; aashiivishhaH ankeneva = like a poisonous serpent in your bosom; shatruH = enemy; paridhR^itaH = being worn; patipravaadena = with husband’s name.

अनुवादः

“O, childish one! Like a mother, you wish for his well being. But he is an enemy, and is called husband for a namesake. He is like a poisonous serpent in your bosom.”

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

यथा हि कुर्याच्छत्रुर्वा सर्पो वा प्रत्युपेक्षितः ।
राज्ञा दशरथेनाद्य सपुत्रा त्वं तथा कृता ॥ २८ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

यथा हि कुर्याच्छत्रुर्वा सर्पो वा प्रत्युपेक्षितः ।
राज्ञा दशरथेनाद्य सपुत्रा त्वं तथा कृता ॥ २८ ॥

मूलम् - VR

यथा हि कुर्यात्सर्पो वा शत्रुर्वा प्रत्युपेक्षितः । राज्ञा दशरथेनाद्य सपुत्रा त्वं तथा कृता ॥ २-७-२८

अनुवाद (हिन्दी)

‘उपेक्षित शत्रु अथवा सर्प जैसा बर्ताव कर सकता है, राजा दशरथने आज पुत्रसहित तुझ कैकेयीके प्रति वैसा ही बर्ताव किया है ॥ २८ ॥

अनुवाद (कन्नड)

उपेक्षित शत्रु अथवा सर्पवु वर्तिसुवन्तॆये राजा दशरथनु इन्दु पुत्रसहित कैकेयियाद निन्न कुरितु वर्तिसुत्तिरुवनु.॥28॥

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

28. tvam = you; saputraa = along with your son; kR^itaa = have been done; raaJNaa dasarathena = by king Dasaratha; adya = today;yathaa tathaa kurvaat = as does; pratyupekshitaH = neglected; sarpo vaa = serpent or; shatruruvaa = an enemy

अनुवादः

“King Dasaratha has acted towards you and your son today in the same way as an enemy or a serpent would behave if ignored.”

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

पापेनानृतसान्त्वेन बाले नित्यं सुखोचिता ।
रामं स्थापयता राज्ये सानुबन्धा हता ह्यसि ॥ २९ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

पापेनानृतसान्त्वेन बाले नित्यं सुखोचिता ।
रामं स्थापयता राज्ये सानुबन्धा हता ह्यसि ॥ २९ ॥

मूलम् - VR

पापेनानृतसान्त्वेन बाले नित्यं सुखोचिते । रामं स्थापयता राज्ये सानुबन्धा हता ह्यसि ॥ २-७-२९

अनुवाद (हिन्दी)

‘बाले! तुम सदा सुख भोगनेके योग्य हो, परंतु मनमें पाप (दुर्भावना) रखकर ऊपरसे झूठी सान्त्वना देनेवाले महाराजने अपने राज्यपर श्रीरामको स्थापित करनेका विचार करके आज सगे-सम्बन्धियोंसहित तुमको मानो मौतके मुखमें डाल दिया है ॥ २९ ॥

अनुवाद (कन्नड)

बालॆ! नीनु सदा सुख भोगिसलु योग्यळागिरुवॆ, आदरॆ मनस्सिनल्लि दुर्भावनॆ इट्टुकॊण्डु मेल्मेलॆ सान्त्वन कॊडुव महाराजनु तन्न राज्यदल्लि श्रीरामनन्नु स्थापिसुव विचारमाडि इन्दु सम्बन्धिगळ सहित निन्नन्नु मृत्यु मुखदल्लि तळ्ळिदन्तॆ इदॆ.॥29॥

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

29. baale = O; childish one! nityasukhochite = you; who are ever deserving of ease; anR^ita saantvena = with his untruthful sweet words; sthaapayitaa = by installing; raamam = Rama; raajye = in kingdom; saanubandhaa = you along with your child; asihi hataa = are being hit; paapena = by the sinful king.

अनुवादः

“O, stupid one! With his untruthful sweet words to you, who are ever deserving of ease, the evil minded king is installing Rama on the throne and is thus ruining you along with your son.”

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

सा प्राप्तकालं कैकेयि क्षिप्रं कुरु हितं तव ।
त्रायस्व पुत्रमात्मानं मां च विस्मयदर्शने ॥ ३० ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

सा प्राप्तकालं कैकेयि क्षिप्रं कुरु हितं तव ।
त्रायस्व पुत्रमात्मानं मां च विस्मयदर्शने ॥ ३० ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘केकयराजकुमारी! तुम दुःखजनक बात सुनकर भी मेरी ओर इस तरह देख रही हो, मानो तुम्हें प्रसन्नता हुई हो और मेरी बातोंसे तुम्हें विस्मय हो रहा हो, परंतु यह विस्मय छोड़ो और जिसे करनेका समय आ गया है, अपने उस हितकर कार्यको शीघ्र करो तथा ऐसा करके अपनी, अपने पुत्रकी और मेरी भी रक्षा करो’ ॥ ३० ॥

अनुवाद (कन्नड)

केकय राजकुमारिये! दुःखजनक मातन्नु केळियू नीनु सन्तोषगॊण्डवळन्तॆ नन्न कडॆगॆ नोडुत्तिरुवॆ. नन्न मातुगळिन्द विस्मयहॊन्दिरुवन्तॆ इदॆ, आदरॆ ई विस्मयवन्नु बिट्टु तन्न हितद कार्यवन्नु बेगने माडुव समय ईग बन्दिदॆ. हीगॆ माडि निन्न, निन्न पुत्रन मत्तु नन्न रक्षणॆयन्नु माडु.॥30॥

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

30. kaikeyi = O; Kaikeyi! vismaya darshane = you; with amazing beauty! saa = that you; kuru = do; hitam = required action; praaptakaalam = appropriate to the time; kshipram = immediately; traayasva = save; aatmaanam = yourself; putram = your son; maam cha = and me.

अनुवादः

“O, Kaikeyi, of amazing beauty! You have to take timely action immediately, so as to save yourself, your son and me too.”

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

मन्थराया वचः श्रुत्वा शयनात् सा शुभानना ।
उत्तस्थौ हर्षसम्पूर्णा चन्द्रलेखेव शारदी ॥ ३१ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

मन्थराया वचः श्रुत्वा शयनात् सा शुभानना ।
उत्तस्थौ हर्षसम्पूर्णा चन्द्रलेखेव शारदी ॥ ३१ ॥

मूलम् - VR

मन्थराया वचः श्रुत्वा शयनात्स शुभानना । उत्तस्थौ हर्षसंपूर्णा चन्द्रलेखेव शारदी ॥ २-७-३१

अनुवाद (हिन्दी)

मन्थराकी यह बात सुनकर सुन्दर मुखवाली कैकेयी सहसा शय्यासे उठ बैठी । उसका हृदय हर्षसे भर गया । वह शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमण्डलकी भाँति उद्दीप्त हो उठी ॥ ३१ ॥

अनुवाद (कन्नड)

मन्थरॆय मातन्नु केळि सुन्दर मुखवुळ्ळ कैकॆयियु ऒम्मॆलॆ ऎद्दु कुळितळु. आकॆय हृदय हर्षदिन्द तुम्बिहोगित्तु. अवळु शरत् पूर्णिमॆय चन्द्रनन्तॆ प्रकाशिसुत्तिद्दळु.॥31॥

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

31. shayanaa = lying in bed; saa = that; shubhaananaa = beautiful faced Kaikeyi; shrutvaa = hearing; mantharaayaaH = Manthara’s; vachaH = words; harshhasampuurNaa = full of delight; uttasthau = rose(from the coach); chandralekheva = as crescent moon; shaaradii = in autumn.

अनुवादः

Hearing Manthara’s words, that Kaikeyi of charming countenance who was lying in bed, rose from her coach full of delight like unto the crescent moon in autumn.

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

अतीव सा तु सन्तुष्टा कैकेयी विस्मयान्विता ।
दिव्यमाभरणं तस्यै कुब्जायै प्रददौ शुभम् ॥ ३२ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

अतीव सा तु सन्तुष्टा कैकेयी विस्मयान्विता ।
दिव्यमाभरणं तस्यै कुब्जायै प्रददौ शुभम् ॥ ३२ ॥

मूलम् - VR

अतीव सा तु संहृष्टाअ कैकेयी विस्मयान्विता । एकमाभरणं तस्यै कुब्जायै प्रददौ शुभम् ॥ २-७-३२

अनुवाद (हिन्दी)

कैकेयी मन-ही-मन अत्यन्त संतुष्ट हुई । विस्मयविमुग्ध हो मुसकराते हुए उसने कुब्जाको पुरस्कारके रूपमें एक बहुत सुन्दर दिव्य आभूषण प्रदान किया ॥ ३२ ॥

अनुवाद (कन्नड)

कैकॆयु मनस्सिनल्ले सन्तोषगॊण्डु विस्मय मुग्धळागि मुगुळ्नगुत्ता कुब्जॆगॆ उडुगॊरॆयागि ऒन्दु बहळ सुन्दर ऒडवॆयन्नु कॊट्टळु.॥32॥

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

32. saa kaikeyii = that Kaikeyi; atiiva = much; santushhTaa = delighted; vismayaanvitaa = with surprise; dadau = gave; ekam = one; shubham = graceful; aabharaNam = jewel; tasyai = to that; kubjaayai = hunch backed Manthara.

अनुवादः

That Kaikeyi in the midst of her astonishment and joy gave a graceful jewel to the hunch-backed Manthara.

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

दत्त्वा त्वाभरणं तस्यै कुब्जायै प्रमदोत्तमा ।
कैकेयी मन्थरां हृष्टा पुनरेवाब्रवीदिदम् ॥ ३३ ॥
इदं तु मन्थरे मह्यमाख्यातं परमं प्रियम् ।
एतन्मे प्रियमाख्यातं किं वा भूयः करोमि ते ॥ ३४ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

दत्त्वा त्वाभरणं तस्यै कुब्जायै प्रमदोत्तमा ।
कैकेयी मन्थरां हृष्टा पुनरेवाब्रवीदिदम् ॥ ३३ ॥
इदं तु मन्थरे मह्यमाख्यातं परमं प्रियम् ।
एतन्मे प्रियमाख्यातं किं वा भूयः करोमि ते ॥ ३४ ॥


दत्त्वा त्वाभरणं तस्यै कुब्जायै प्रमदोत्तमा ।
कैकेयी मन्थरां हृष्ट्वा पुनरेवाब्रवीदिदम् ॥ इदं तु मन्थरे मह्यमाख्यातं परमं प्रियम् ।
एतन्मे प्रियमाख्यातं किं वा भूयः करोमि ते ॥

अनुवाद (हिन्दी)

कुब्जाको वह आभूषण देकर हर्षसे भरी हुई रमणीशिरोमणि कैकेयीने पुनः मन्थरासे इस प्रकार कहा—‘मन्थरे! यह तूने मुझे बड़ा ही प्रिय समाचार सुनाया । तूने मेरे लिये जो यह प्रिय संवाद सुनाया, इसके लिये मैं तेरा और कौन-सा उपकार करूँ ॥ ३३-३४ ॥

अनुवाद (कन्नड)

कुब्जॆगॆ आ ऒडवॆयन्नु कॊट्टु हर्षगॊण्डु रमणि श्रेष्ठ कैकॆयियु पुनः मन्थरॆयल्लि हीगॆ हेळिदळु - मन्थरे! नीनु बहळ प्रियवाद समाचारवन्नु ननगॆ तिळिसिदॆ. नीनु ननगागि तिळिसिद ई प्रिय समाचारक्कागि नानु निनगॆ इन्नेनु उपकार माडली.॥33-34॥

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

33. kaikeyi = Kaikeyi; pramadottamaa = the best among women; datvaa = gave; aabharaNam = a jewel; tasyai kubjaayai = to that hunch backed one; dR^istvaa = saw; mantharaam = Manthara; abraviit = spoke; idam = these words; punaH eva = again.

अनुवादः

Kaikeyi, the best among women, gave a jewel to Manthara and spoke to her as follows:

स्रोतः: valmikiramayan.net

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

34. manthare = O; Manthara! aakhyaasi = you informed; idam = this; paramam = much; priyam = delightful news; mahyam = to me; kim vaa = what; bhuuyaH = additional (favour); karomi = can I do; te = for you; aakhyaatuH = who informed; etat = such; priyam = good (news); me = to me.

अनुवादः

“Oh, Manthara! You informed much gladdening news to me. What else can I do for you, who informed such a good news?”

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

रामे वा भरते वाहं विशेषं नोपलक्षये ।
तस्मात् तुष्टास्मि यद् राजा रामं राज्येऽभिषेक्ष्यति ॥ ३५ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

रामे वा भरते वाहं विशेषं नोपलक्षये ।
तस्मात् तुष्टास्मि यद् राजा रामं राज्येऽभिषेक्ष्यति ॥ ३५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘मैं भी राम और भरतमें कोई भेद नहीं समझती । अतः यह जानकर कि राजा श्रीरामका अभिषेक करनेवाले हैं, मुझे बड़ी खुशी हुई है ॥ ३५ ॥

अनुवाद (कन्नड)

नानू कूड राम मत्तु भरतरल्लि याव भेदवन्नू तिळियुवुदिल्ल. आद्दरिन्द इदन्नु तिळिदुकॊण्डे महाराजरु श्रीरामनिगॆ पट्टाभिषेक माडुववरिद्दारॆ. इदरिन्द ननगॆ तुम्बा सन्तोषवायितु.॥35॥

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

35. aham = I; na upalakshaye = do not see; visheshham = difference; raamevaa = in either Rama; bharatevaa = or Bharata; tasmaat = that is why; tushhTaasmi = I am happy; yat = for; raajaa = king; abhishekshyati = anointing; ramam = Rama; raajye = in kingdom.

अनुवादः

“I do not see any difference between Rama and Bharata. That is why, I am happy that Rama is being anointed for crown by the king.”

स्रोतः: valmikiramayan.net

विश्वास-प्रस्तुतिः

न मे परं किञ्चिदितो वरं पुनः
प्रियं प्रियार्हे सुवचं वचोऽमृतम् ।
तथा ह्यवोचस्त्वमतः प्रियोत्तरं
वरं परं ते प्रददामि तं वृणु ॥ ३६ ॥

सर्वाष् टीकाः
मूलम्

न मे परं किञ्चिदितो वरं पुनः
प्रियं प्रियार्हे सुवचं वचोऽमृतम् ।
तथा ह्यवोचस्त्वमतः प्रियोत्तरं
वरं परं ते प्रददामि तं वृणु ॥ ३६ ॥

मूलम् - VR

न मे परम् किञ्चि दितस्त्वयापि न । प्रियं प्रियार्हे सुवचम् वचो परम् । तथा ह्यवोचस्त्वमतः प्रियोत्तरं । वरं वरं ते प्रददामि तं वृणु ॥ २-७-३६

अनुवाद (हिन्दी)

‘मन्थरे! तू मुझसे प्रिय वस्तु पानेके योग्य है । मेरे लिये श्रीरामके अभिषेक सम्बन्धी इस समाचारसे बढ़कर दूसरा कोई प्रिय एवं अमृतके समान मधुर वचन नहीं कहा जा सकता । ऐसी परम प्रिय बात तुमने कही है; अतः अब यह प्रिय संवाद सुनानेके बाद तू कोई श्रेष्ठ वर माँग ले, मैं उसे अवश्य दूँगी’ ॥ ३६ ॥

अनुवाद (कन्नड)

मन्थरे! नीनु नन्निन्द प्रियवस्तुवन्नु पडॆयलु योग्यळागिरुवॆ. ननगागि श्रीराम पट्टाभिषेकद समाचारक्किन्त बेरॆ यावुदे प्रिय हागू अमृतदन्तह मधुर मातु इल्लवॆन्दे हेळबहुदु. अन्तह प्रियवाद मातन्नु नीनु हेळिरुवॆ; आद्दरिन्द ईग नीनु ई प्रिय समाचार हेळिदुदक्कॆ यावुदादरू श्रेष्ठवाद वरवन्नु बेडिको नानु अवश्यवागि कॊडुवॆनु.॥36॥

Murali Krishnamurthy Kopalle Murthy

पदच्छेदः

36. priyaarhe = O; Manthara; who are eligible to be delighted! na kinchit = No other; param = greater; itaH = than this; me = to me; na suvacham = cannot be told easily; param = greater; priyam = lovely; vachaH = words; tvayaapi = by you also; tvam = you; avochaH hi = informed; tathaa = thus; priyottaram = the best of loving news; ataH = for this reason; pradadaami = I shall give; param = good; varam = boon; te = to you; vR^iNu = ask for; tam = it.

अनुवादः

“O, Manthara! You do merit every favor. I have no other pleasant news than this. Hence, you cannot ever again inform a better loving news than this. I shall give you a good boon. Ask for it!”

स्रोतः: valmikiramayan.net

समाप्तिः

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें सातवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ७ ॥

अनुवाद (समाप्तिः) (कन्नड)

वाल्मीकि विरचित आर्ष रामायण आदिकाव्यद अयोध्याकाण्डदल्लि एळनॆय सर्ग पूर्णवायितु. ॥7॥