लुप्त-पृष्ठानि

८०१

श्रीमद्र हस्य त्रयसारे उक्तिनिष्ठॆ. इवल् उक्तियावदु?-आनुकूल्य साद्य ळिल् वैशद्य मिल्लादार् अवनैयॊळिय पोक्क निर वधि कारमुम्, अपेक्षित्ताल् रक्षिक्कु मॆच्चर विश्वासवु, मुडै यवरायण्णु, शरण्य नरिय पूर्ण प्रपत्तिगर मान आचारॆपदिष्ट वाक्यत्तालॆ दादिमार् तॊन्न पाशुर उक्तिनिष्ठॆय स्वरूपवु. इवल् - ई प्रपत्ति प्रबेधगळाद उक्तिनिष्ठॆ आचार निष्ठॆगळल्लि उक्तियावदु-उक्तिनिष्ठॆ ऎम्बुवदु यावुदु ? अनुकूल्य स ाद्यळिल् - आनुकूल्यस, प्राति कूल वरन, गोप्तत्व वरणवे मॊदलाद अब्दगळल्लि, वैशद्यमिल्ला दार्- निश्चयवाद, विशदवाद ज्ञानविल्लद मन्दराद अधिकारिगळु, अवनैयॊळिय - आ लोकशरण्यनन्नु बिट्टु, पोक्कत्तु - बेरॆ गतियिल्लदिरुव ऎन्दरॆ अनन्य गतिकवाद, निन्निरवधिकारमुं - स्थितियुळ्ळ अधिकारवन्नू ऎन्दरॆ आकिञ्चनत्ववन्नू, अपेक्षित्ताल् रक्षिक्कु मॆब्रर विश्वास मुं अपेक्षिसिदरॆ सश्वरनु रक्षिसिबिडुवनु ऎन्नुव महाविश्वास वन्नू, उड्डॆय वराय क्कॊण्डु – हॊन्दिदवरागि, इल्लि शरणा गतिगॆ यावयावुवु अुगळु ऎम्बुव विशदवाद ज्ञानविल्लदिद्दरू समुदायदल्लि, ई सत्व लोकशरण्यवन्नु बिट्टरॆ तनगॆ बेरॆ गतियिल्ल वॆम्ब आकिञ्चन्मत्ववू, प्रार्थिसिदरॆ आ शरण्यनु रक्षिसिये रक्षिसुव नॆम्ब परिपूर्णवाद महाविश्वासवू ई मन्दाधिकारिगळिगू आवश्यक वॆम्ब भाववु. हीगॆ आकि०चिन्यत्ववन्न महाविश्वासवन्नू हॊन्दिद वरागि, शरण्यनरिय - सत्वरिगू रक्षकनाद सत्येश्वरनु तिळियुव हागॆ, पूर प्रपत्तिगर्भमान - सम्पूर्ण प्रपत्तियन्नु ऒळगॊं डिरुव, आचारॊपदिष्टवा ताले - आचाररिन्द उपदेशिस ल्पट्ट वाक्यवाद द्वयमदिन्द, दादिनार् तॊन्न - दादिगळु हेळिकॊट्ट, पाशुर - श्लोकवन्नु, चॊल्लि - हेळि, सार्वभौ मनॆ - चक्रवर्तियन्नु, शरणं पुकुं - रक्षकनागि हॊन्दुव

८०२

अधिकारिविभागाधिकार e ८०२ चॆल्लि सारभौम शरणं पुकु मुग्धरान सामन्य कुमाररळ्ळॆ प्रोले यॆन्नुडैय रक्षॆ युनक्कॆ भरमाक वेरिट्टुकॊळ्ळवेणु मॆनॆ. पदवाक्यादि वृत्ता नङ्गळरि मुग्धरान - तिळिवळिकॆ सालद, सामन्य कुमाररलैप्पोलॆ - आ चक्रवर्तिगॆ अधीनराद, हत्तिर प्रदेशद राजकुमाररुगळ हागॆ, ऎन्नुडैय रक्षॆयुनक्कॆभरमाक - नन्न रक्षणॆयु निनगे सेरि दुदु हेगागबेको हागॆ, एरिट्टकॊळ्ळवेणुं - नीने स्वतः वहिसतक्कद्दु, ऎण्णॆ- ऎन्दु हेळोणवु. उक्तिनिष्ठॆगॆ मूरु मुख्यवॆन्दु ई मेलिन वाक्यदिन्दुपदेशिसि दरु. एनॆन्दरॆ–ऎल्ला प्रसङ्गगळ विशदवाद ज्ञानविल्लदिद्दरू, आ सश्वेश्वरनन्नु बिट्टरॆ तनगॆ बेरे गतियिल्लवॆम्ब आकिञ्चन्यभाववू मत्तु आतनन्नु नम्बिबिट्टरॆ रक्षिसिये रक्षिसुवनु, ई विषयदल्लि ईषदपि सन्देहविल्लवॆम्ब महा विश्वासवू, इवुगळिन्द युक्तनागिरबेकु ; मत्तु आचारनन्नु अवलम्बिसि, आतनु उपदेशिसिद द्वयमन्त्रदिन्द सेरिद “तवाहं” “तवास्मि” इत्यादि अर्थगर्भितवाद वाक्यगळन्नु उच्चरिसुवदे उक्तिनिष्ठॆयु, यावाग अर्थगर्भित वाक्रोच्चारण वायितो, आग उक्ति निष्ठॆयू कूड ज्ञानरूपवॆम्बुवदरल्लेनू सन्देहविल्लवॆम्ब भाववु. मुन्दॆ परिकरविभागाधिकारदल्लि स्वतन्त्र प्रपत्तिगॆ ऐदु अब्बगळू, ऒन्दु अबि’ यू आवश्यकवॆन्दु हेळल्पडु इदॆ. हीगिरुवल्लि आ अब्बगळॆल्ला इल्लि बेडवो, अन्तह ज्ञानवू बेडवो ऎन्दरॆ, अ०तह विशद ज्ञान बेकागिल्लवु. आकिञ्चन्यभाववू, महाविश्वासवू इदु आचार मुखेन अनुष्ठिसिदरॆ साकॆन्दु हेळिरु तारॆ. पूर्ण ज्ञानशून्यरादवरिगू कूड शरण्यनॆन्दु “सस्य शर णं सुहृत्” ऎम्ब श्रुतिय, इदं शरणमज्ञानां,” (बाल मूकजडा०धाश्च” इत्यादि प्रमाणगळू उद्योषिसुत्तवॆ. आदु दरिन्द मन्दाधिकारिगळिगू कूड सर्वेश्वरनु शरण्यनागुवदरल्लि अभ्यन्तरविल्लवु. आदरॆ आचारनु मात्र आवश्यकवु. अवरु उपदेशि सुव उक्तियादरो, परिपूर्ण शरणागतिरूपवादुदरिन्द फलकारि

८९१

शीनव्रहस्य त्रय सारे पिरन्न प्रीत्यतिशयवु” परमभक्ति. इद(१) “मुनिये नानु क नि”रडिये सज चवर अनुभविल्लदु धरिक वॊण्णाद अभि निवेशयुन्हाक्कॆ, मरुक्क वॊण्णाद तिरुवाकैयिट्टु हळ्ळि कॊप्पडुगैयाले इदनु कडग प्राप्ति कॊडुक्कु द य" पट्टर्व - तुम्बा श्रम पट्टवन्नु, तुम्बा दणिदिरुवदरिन्द दाह दिन्द पीडितनादवनु ऎम्बभिप्रायवु. तटाक कण्णाग् पोलॆ- ऒन्दु तटाकवन्नु अकस्मात्‌ कण्डगॆ, पिन्द प्रीतिशयं-हुट्टिदॆ अतिशयवाद प्रीतिय, परमभक्ति ऎन्दॆनिसुत्तदॆ. इल्लि परमभक्तिय प्रीतिय ऎन्दु हेळल्पट्टिरुत्तदॆ; परभक्ति, भक्तिगळु प्रीतिविशे पवॆन्दु मात्र हेळिरुत्तदॆ. आ परमभक्तियु ऎन्थादॊम्बुवदन्नु मुन्दिन वाक्यदिन्द व्यक्त पडिसुत्तारॆ. इदु- ई परमुक्तियु, “मुनियनान्नु कनिरडिये - मुनिये नानु कने ऎम्बु नम्माळ्वार् पाशारदल्लि हेळिरुव हागॆ, सङ्कोचमर- कालसङ्कोचविल्लदॆ हागॆ, हिन्दॆ परज्ञानदल्लि उण्टागद साक्षात्कारवु तत्कालनियत ऎन्दु ऎन्दरॆ आ कालदल्लि मात्रवे ऎन्दु कालसङ्कोचवु हेळल्पट्टितु, हागॆ अल्लदॆ यावा ग उण्टागबेकॆरबभिलाषॆयुळ्ळदु. ई परमभक्तियादुदरिन्द सचिवरु ऎन्दु हेळल्पट्टितु; अनुभविल्लदु धरिक्कॆ वॊ `नाड सत्तीश्वरनन्नु अनुभविसिदुदल्लदॆ, ऎन्दरॆ कैज्ञर परन्तवाद भोगरूप साक्षात्कारवु सदा उण्टागदॆ, धरिक्क वॊण्णाद - इरलु साध्यविल्लद, अभिनिवेश उण्णाकि - तीव्रापेक्षॆयन्नुण्टुमाडि, मरुकवॊण्णाद अतिक्रमिसलसाध्यवाद तिरुवानैयिट्टु - लक्ष्मि विषयवाद शपथवन्नु माडि, पच्चित्तु - बेरॆ विधवागि होगुव दक्कॆ मार्गविल्लद हागॆ निब्बन्धपडिसि, कॊप्पडुगैयाले – आत ध्वनियिन्द कूगिकॊळ्ळुवदरिन्द, इवनुक्कु - ई भक्तियोगनिष्ठनिगॆ, कडुग - शीघ्रवागि प्राप्तिय्य कॊडुक्कु०पडि - परब्रह्मप्राप्ति यन्नु कॊडुव हागॆ, सत्येश्वरनुक्कु रातिकय युस्टारॆ सम्मेश्वरनिगॆ हॆच्चु दत्तुरॆयन्नुण्टुमाडि, इवन्य ई भक्तियोग नि नन्नु अनावत्तु आतनिगॆ हॆच्चाद दाहविद्दुदन्नु शमनमाडि दाह

८९२

उपायविभागाधिकार वपडि सश्वेश्वरनुन्नु रातिकययुस्टा, इव अनादत्तु नीडु परप्पण्णु न. यावदॆन्दरॆ परिपूर ब्रह्मानुभवापेक्षॆयु, वीडुपॆरप्पणु म मोक्षवन्नु हॊन्दुवहागॆ माडुत्तदॆ, परब्रह्मवन्नु सदा साक्षात्करि सुत्ता नित्य कैर्यवन्नॆसगुव भोगवन्नु हॊन्दुवहागॆ माडुत्त दॆम्ब भाववु. (१) “मुनिये नानु कने” ऎम्बुवदु नम्माळ्वा र वर कॊने तिरुवाय्‌ मॊळॆयु. ई हत्तु पाशुरगळल्लि अळ्वारवरु वक्रनिरुव स्थितियन्नु परान मूलक साक्षात्करिसि, अदु तप्पि होद ऒडनॆये तोरिबन्द संसारबन्धवन्नू कण्डु, आ मुक्तन स्थितियन्नु हॊन्दिये तीरबेकॆम्ब परशुभक्तिरूपवाद अभिनिवेशवु प्राप्तवागिरलागि, आग इदक्कॆल्ला कारणभूतनाद सश्वेश्वरने विक गेश्वरारूढनागि बन्दु तन्न श्रीपादकमलगळन्नु तम्म तलॆयल्लिट्टु अनुग्रहिसलु अति त्वरॆयुळ्ळवनागिरुव हागॆ अनुसन्धान माडि, अद रिन्द तन्न परिपूर्ण साक्षात्कारवन्नु तोरिद भगवन्तन, बहुभोग्य वाद दिव्यमळविग्रह, पत्नियागि अनुग्रहमयळाव लक्ष्मिय महिमॆ, आश्रितरक्षकत्व, परिपूर्ण भोगप्रदत्व मुन्तादवुगळन्नु कॊण्डाडि, अनुभविसि, अन्तह सश्वरन सन्निधियल्लि तम्म अत्तॆयन्नू तम्म अभिनिवेशवन्नू अरिकॆमा, लक्ष्मियमेलू, अवरमेलू आणि यन्निट्टु, अवरिगॆ इन्नेनू मार्गवे इल्लदहागॆ - निन्धिसि, सर्वप्रकार रक्षकनाद नीनु ननगॆ पूर्णानुभववन्न नुग्रहिसबेकॆन्दु, दीनस्वरदिन्द कूगिकॊळ्ळलु, आग परिपूर्ण ब्रह्मानुभववन्नु सर् श्वरनु दयपालिसिदुदरिन्द, तावु अनाप्रफलरादरॆन्दु हेळि आ महा प्रबन्धवन्नु मुगिसिरुत्तारॆ. मुनिये नानु कने मुक्कण्णप्पा, ऎपॊल्ला 1 कनिवाय तामरैतरुमाणिक्य मे र्यका तनिये नारुयिरे यॆनॆ मिशैयाय वन्निट्टु 1 इनिर्ना पोकलोट्टेनॊनुम मायक्किये लॆन्नैये ॥ १०.१०१ ऎम्बुवदु पूरा पाशुरवु. “सत्यसङ्कल्पने, चतुरु ख रुद्रा

१०७८

साण्ण प्रपदनाधिकार तदयं तव पाद पद्मयो १०७८ रहमव महा समर्सितः” ऎ रुक्कु तात्पर मॆन्नॆन्निल्? देहे य मनःप्राण धीभो नन्य साधनः 1 नित्यो व्यापी प्रतिक्षेत्रं आत्माभिन्न कृतस्सुखी । ऎन्दु हेळिरुव हागॆ, अन्तह सरियाद तत्वज्ञानवन्नरितवनागियो, अथवा देहवे आत्मावो, इन्द्रियवे आत्मावो, मनस्से आत्मावो, प्राणवे आत्मावो, बुद्धिये आत्मावो अथवा इवॆक्कॆल्ला बेरॆ यागि आत्मवो, यावुदो ऒन्दु मेलिन श्लोकदल्लिन हागॆ यथा र्थवागिरुवदु आगिरुवॆनु. हागॆये गुणतो ना - गुणगळ मूल कवागियू, यथा तथा विधः-यावुदो कॆलवु बगॆय गुणगळुळ्ळ वनागि, असानि - आगिरुवॆनु, ऎन्दरॆ नन्नन्नु कॆलवरु श्रुतिवाक्यक्कॆ कट्टु बिद्दु अणुवॆन्दू अजडवॆन्दू हेळुवरु, नैयायिकनु विभु वॆन्दू काष्ठ प्रायनॆन्दू हेळुवनु ; शास्त्ररीत्या कॆलवरु कतृ भोक्तादिगळुण्टॆन्दु हेळुवरु, इन्नु कॆलवराद साङ्ख्यरु कत्र त भोक्तत्यादिगळिल्लवॆन्दु हेळुवरु. आदरॆ नन्न यथार्थ गुण गळु यावुवो अवुगळन्नुळ्ळवनागिये इरुवॆनु. नन्न यथार्थ स्वरूपवेनु यथार्थ गुणगळावुवु ऎम्बुवदन्नु नीने बल्लॆ. आदु दरिद तदयं - अन्तह यथावत्ताद ई स्वरूप गुणगळुळ्ळ, अहं - अहं ऎन्दु तोरुव नानु, तव पादपद्मयोः - निन्न ऎरडु पादकमलगळल्लू, मया निन्न निर्हेतुक कृपामूलकवागि अनुग्रहिसल्पट्ट करण कळेबर ज्ञान विवेकादिगळुळ्ळ नन्निन्द, अदैव - इदुवरिविगू अनेक भ्रमगळ मूलक निन्नॊन्दिगॆ विवाद माडुत्तिदुदु तप्पि होगि, निनगॆ शेषभूतनॆम्ब भाववु नॆलगॊण्डिरुव ई सुसमयदल्ले, अथवा सौगतनु ज्ञानवु क्षणिकवॆन्दरू, आ ऒन्दु क्षणदल्ले समर्पितः – दासभूतास्सतस्सर्वॆ ह्यात्मानः परमात्मनः । अतो हनसि ते दास इति मत्ता नमाम्यहम् । ऎन्दु ईश्वरसंहितॆयल्लि रुद्रनु हेळिरुव हागू, “स्वत्व मात्मनि