अपराध परिहाराधिकारः. १८ स्वच्छ स्वादु सदानदात सुभगां दै वादयं देहभ नालिन्य प्रश्नमाय माधवदया मन्दाकिनीं निन्नति। अवतारिकॆ. हिन्दिन अधिकारक्कू इदक्कू सण्णति हेगॆन्दरॆ :- हिन्दॆ आज्ञा कैज्ञरगळन्नु आवश्यकवागि शास्त्रीय नियमनानुसार नडॆस बेकॆन्दू, अनु ज्ञाकैरगळु ऐच्छिकवॆन्दू, अवुगळल्लि साध्यवाद वन्नु नडॆसुवदु प्रपन्ननादवनिगॆ स्वरूपवॆन्दू, हागॆ अनुज्ञा कैय्य रगळन्नु नडॆस,वाग अवुगळन्नू कूड शास्त्रीय नियमनानुसार नडॆसबेकॆन्दू हेळल्पट्टितु. शास्त्रगळल्लि हेळिरुव नियमनानुसार विधिनिषेधवाक्यगळन्नु नडॆसदॆ होदरॆ अपराध प्राप्तवागुत्तदॆ. हागॆ प्रपन्ननिगॆ अपराध प्राप्तवादरॆ आतनिगुण्टागुव प्रत्यवाय वेनु ? इन्तह अपराधगळु अबुद्धि पूरकवागियागलि बुद्धि पूरैक नागलि उण्टागबहुदु. बुद्धिक अपराधगळु ऒन्दु विपत्तु मूलकवागियू सम्भविसबहुदु. अन्तह कारणविल्लदॆयू सम्भविसब हुदु. इवुगळिगॆ एनादरू प्रायश्चित्तद आवश्यकवुण्टे? प्रपदनद म हिमॆयिन्दले इवुगळिगॆ निवृत्ति युण्टे? ई अपराधगळिन्द ई प्रपन्न नमोक्षप्राप्तिगॆ विघ्नवुण्टॆ : इत्यादि शङ्कागळिगॆ ई अधिकारदल्लि स________________
१९८९ श्रीमद हस्य त्रयसारे यद्य वन सावसार विषय सोतः प्रसूतैः पुनः पव कळयन्नि जतनुं प्राच्य संस्थॆ प्रते ॥४० माधानवन्नु हेळुववरागि, प्रथमतः ई श्लोकदिन्द, सुकृत परिपा कदिन्द भरन्यासवन्नु अनुष्ठिसि सश्वर दयॆयॆम्ब मन्दाकिनियल्लि अवगाहनॆयन्नु माडि सापराधगळन्नू कळॆदुकॊण्डु परिशुद्धनाद ई ज्ञा- याद प्रसन्ननु अज्ञानियाद गजवु स्नानमाडिद नन्तर मण्णन्नु सॊण्डलिनिन्द तलॆय मेलॆ हाकिकॊण्ड हागॆ, ऎन्दिगू अप राधरूप कळवन्नु बुद्दिपूर्वकवागि हॊन्दुवदिल्लवॆन्दू, हागॆ ऒन्दु वेळॆ अपराधवन्नु बुद्धिपूर्वकवागि सम्पादिसिकॊण्डरू, अन्थावनु प्राज्ञराद भागवतर गोष्ठिगॆ अनर्हनागुवनॆन्दु हेळु त्तारॆ; इष्टु मात्रवे विना आ कृपापियषसागरनु “नत्य जेयं कथञ्चन” ऎन्दु वाग्दानमाडिद बळिक मोक्षप्राप्तिगेनू सन्देह विल्लवॆन्दु भाविसतक्कद्दु. सरेश्वरन चरणसन्निधियल्लि माडिद भर न्यासवु ऎन्दिगू वितथवागदु. ऒन्दु वेळॆ बुद्धिप्रापराधव प्राप्तवादरू पुनः प्रायश्चित्तदिन्द अदू कूड परिहारवन्नु हॊन्दुत्तदॆ ऎम्ब भाववु. आदुदरिन्दले ई अधिकारक्कॆ आपराध परिहाराधिकारवॆम्ब हॆसरु. अर्थ- अयं - हीगॆ भरन्यासवन्न नुष्ठिसि कृतकृत्यनाद ई देहब्बत् बद्ध शरीरियाद ई जीवात्मनु, दैवात् - यादृ च्छिक सुकृत परिपाकद दॆशॆयिन्द, मालिन्य प्रशवाय - (दयापर वागि) करवश्यनाद तनगॆ उण्टाद पुण्यपापगळु तॊलगुवदक्कागि, तन्न देहद कॊळॆयु होगुवदक्कागि (मन्दाकिनी नदिय परवागि स्वच्छ स्वादुसदावदात सुभगां, (दयापरवागि स्वच्छ - बहळ निरलवाद, स्वादु रुचियाद, सदावदात - बॆळ्ळगाद (कॆट्टवर गळिल्लद) आदुदरिन्दले, सुभगं - स्नानपानगळिगॆ बहु भोग्यवाद अथवा मनोहरवाद, माधव दयानन्दाकिनीं, माध 1 व - लक्ष्मीपतिय, दया कृपॆऎम्ब, मन्दाकिनीं मन्दाकिनी नदियन्नु, निन्दति - हॊन्दुवनु, ऎवंयद्यपि - हीगॆ________________
अपराध परिहाराधिकार इद्दरू कूड, अस् - ई प्रपन्ननु, असारविषयस्रोतः प्रसूतैः, असार - अल्पास्थिरगळादुदरिन्द सारविल्लदिरुव, विषय- शब्दादि विषयगळ ऎन्दरॆ अवुगळनुभवगळ, प्रसूतैः
स्वतः - प्रवाहगळिन्द हुट्टिद, अथवा विषय शब्दादि विषयगळल्लिन, सोतः - अनुभव प्रवाहगळिन्द प्रसूतैः - उत्पन्नगळाद पजरेव - कॆसरुगळिन्दले ऎन्दरॆ पापगळिन्दले, निजतनुं - तन्न शरीरवन्नु, कळर्य-मालिन्यवन्नु हॊन्दिसुववनागि, प्राज्ञॆ-महाज्ञानिगळाद भागवतोत्तमरुगळॊन्दिगॆ, न संस्थॆ ते- सेरिरलु अनर्हनागुत्तानॆ, ऎन्दरॆ भागवतरुगळु ईतनन्नु परिग्रहिसुवुदिल्लवॆम्ब भाववु. तात्पर-हिन्दॆ पुरुषार्थकाष्ठाधिकारद कॊनॆय श्लोकदल्लि प्रपन्नरु तम्म अमोघवाद वाक्किनिन्द सश्वेश्वरनन्नु कुरितु तुच्छ वाद याव पुरुषार्थवन्नू याचिसुवुदिल्लवॆन्दू, मोक्षवन्नु आतने दयपालिसुवनॆन्दु वाग्दानवागिरुवुदरिन्द अदन्नू याचिसु वुदिल्लवॆन्दू, प्रपन्नरिगॆ मुख्यवागि बेकादुदु भागवतर प्रसन्न तॆयु, अदन्नु सश्वरने तन्न कृपा प्रभावदिन्दले उण्टुमाडुव नॆन्दू हेळल्पट्टितु. सश्वरन अन्तह कृपाप्रभावरूपवाद प्रीति यन्नु यावजीववू ई प्रपन्ननु हॊन्दिरबेकादरॆ शास्त्रीय निय मनामसार प्रवृत्तियु अत्यावश्यकवु. हागॆ नडॆयदिद्दरॆ अपराध गळिगॆ गुरियागुवनु. प्रसन्ननागि तन्न सत्वभरवन्नू स्वामियल्लिट्टिरुववनु आतनिगॆ प्रियनागि वरिसुवने विना अपराधगळन्नु बुद्दिपूरकवागि माडि तद्वारा भगवदप्रीतिगॆ ऎन्दिगू गुरियागलारनु. एतक्कॆन्दरॆ शरणा गतियन्नु माडिद ऒडनॆये प्रसन्ननु तन्नवनादनु, “योमद कः समेप्रियः” ऎन्दु हेळिरुव मेरॆगॆ आतनु तुम्बा प्रियना दवनादनु. अन्थावनिन्द सत्येश्वरनु ऎन्दिगू अपराधगळन्नु माडिसलारनु, “ददामि बुद्धियोगन्तं” ऎन्दु हेळिरुव मेरॆगॆ सश्वेश्वरने तन्न कृपप्रभावदिन्द विवेकवन्नु कॊट्टिरुवद रिन्द बुद्धि पूरकवागि महापातकगळन्नागलि फलाकाङ्क्षॆयिन्द पुण्य करगळन्नागलि ऎसगुवदिल्लवु. ई अभिप्रायवन्नु ई श्लोकद________________
१४९१ श्रीमद्रहस्य त्रयसारे पूर्वार्धदिन्द तिळिसुत्तारॆ. अधिकारान्त्यद कॊने श्लोकदल्लि ई अभिप्रायवन्ने “ दीपूर्वोत्तर पानामजननात्” ऎम्बु वदरिन्द व्यक्तपडिसुत्तारॆ. ऒन्दु वेळॆ अन्थावनू कूड बुद्दि पूर्वकवागि अपराधमाडिदरॆ अदरिन्द नावु ऊहिसतक्कद्देनॆं दरॆ :-(१) आतनिगॆ प्रपत्र गळ लोपदिन्द शरणागतिये सिद्धिसलिल्ल वॆन्दागलि हेळबहुदु. (२) अथवा, आतन प्रारब करवु तुम्बा प्रब लवादुदॆन्दागलि तिळियबहुदु. हीगॆ शरणागतियन्ननुष्ठिसिदनन्तरवू इन्तह प्रारब्ध कर्म प्राबल्यदिन्द विवेकशून्यतॆयन्नु हॊन्दि, बुद्धिपूर्वकवागि पुण्यपापगळु प्राप्तवादरॆ, अन्थावनु प्रपन्न गो ष्टिगॆ अनर्हनागुवनॆन्दु इष्टु मात्र ई श्लोकद उत्तरार्धदिन्द तिळि सुत्तारॆ. अन्तह बुद्धिपूापराधक्कू कूड पुनश्चरणागति रूप प्रायश्चित्तवुण्टॆन्दू, हागॆ पुनश्चरणागतियन्नु माडदे होदरॆ आतनन्नु आतन देहावसानदॊळगेनॆ अल्पशिक्षॆगॆ गुरि माडि, तन्न कृपा प्रभाव मूलक रक्षिसि, आतनिगॆ मोक्षप्राप्तियन्नित्तु, तन्न अमोघ वाद वाग्दानवन्नु कापाडिकॊळ्ळुवनु. आदुदरिन्द इदॆल्ला माधव दयॆय प्रभाववॆन्दु हेळुवुदक्कॆ प्रारम्भिसि, विश्वेश्वरन दयॆयादुदरिन्द इहलोकद नदिगळन्नॆल्ला त्यजिसि देवगङ्गॆयाद मन्दाकिनिगॆ होलिसिरुत्तारॆ ई चेतननादरो देहब्ब, प्रकृतिरूप शरीरवन्नु धरिसिरु वनु. आदुदरिन्द ज्ञानतिरोहितनागि, ई भगवत्रपारूप मन्दा किनिय प्रभववन्नरियदॆ तटस्थनागिरुववनु. ई कृपारूप मन्दा किनियल्लि अवगाहिसिदरॆ सत्वविध पापगळू तॊलगि परिशुद्धनागुव नॆन्दु तिळियनु. प्रसन्न नादरो हागल्लव. भगवन्तन मत्तु आचारर कृपाकटाक्षदिन्द “मन्दाकिनीं विन्दति” ऎन्दु हेळि रुवहागॆ इदर प्रभाववन्नरितु, “सरितां श्रेष्टा सत्व पापविना शिनी” ऎन्दु समस्त पापगळन्नु होगलाडिसुव ई कृपारू विश्रेष्ठ वाद नदियन्नु हॊन्दि अवगाहिसबेकादरॆ यादृच्छिक सुकृतवू अदरिन्दुण्टागुव आदिगुरुविन कटाक्षवीक्षणादिगळू बेकु. आ दु व रिन्दले इल्लि दैवात् ऎम्ब प्रयोगव ई दै वात् ऎम्बुवदरिन्द ईतनु माडिद अल्प सुकृतक्कॆ परवशनागि सर्वॆश्वरनु परमकृपया________________
(OF) अपराधपरिहाराधिकार १४९२ अनुग्रहिसिद कटाक्षवीक्षण, सात्विक सम्भाषण, गुरूपसदन, उपा यानुष्ठान मुन्ताद परमोपकारवॆल्ला सङ्ग्रहिसल्पट्टितु. « ఈ मन्दाकिनिये ऎन्थाद्दॆन्दरॆ- अनन्न चरणाम्भोजप्रसू तायाः भवदः” (भाग. ९, ९, १५) अनन्तनाद सद्देश्वरन पाद कमलदिन्द हुट्टिदवळादुदरिन्दले संसाररूपवाद सत्वपापगळन्नू अदरिन्दुण्टागुव दुःखगळन्नू कत्तरिसुवन्थावळु, हीगिरुवाग आतन कृपामन्दाकिनिगॆ अन्तह शक्तियुण्टॆन्दु हेळतक्कद्देनिदॆ ऎम्ब भाववु तोरुवहागॆ कृपामन्दाकिनीम् ऎन्दु रूपकमाडि हेळि रुत्तारॆ आगलि, ई कृपॆगॆ इन्तह अत्यद्भुतवाद शक्ति इरलु कारण वेनॆन्दरॆ, ई तनु माधवनादुदरिन्द, श्रीय ःपतियादुदरिन्द ऎन्दु तिळिसुवदक्कागि, माधवकृपा मन्दाकिनीम् ऎन्दु प्रयोगिसिरु त्तारॆ. “ अनुग्रहमयळागि “नित्य मज्ञातनिग्रहळादवळ” धव ऎन्दरॆ पतियादुदरिन्दले, अन्थावळ सहवास ईतनिगॆ इरुव दरिन्दले,, भगवन्तनिगॆ इन्तह निरतिशयवाद यशस्सु. “अप्प मेयं हि तत्तेजः यस्यसा जनकात्मजा” ऎन्दु श्रीरामन तेजस्सु निरुपमवागि उत्करवन्नु हॊन्दलु सीतासम्बन्धवॆन्दु हेळल्पट्टिरुत्तदॆ. आदुदरिन्द नम्माळ्वारवरु माधवनॆत वल्लरेल्, ऎम्ब (१०. ५. ७) पाशुरदल्लि द्वयानुसन्धान माडुव कालदल्लि यावागलू नारायणशब्दक्कॆ श्रीमच्छब्दवन्नु सेरिसिये हेळतक्कद्दु, हागॆ माधव श्रियःपति ऎन्दु हेळिदरेनॆ पापगळॆल्ला तॊलगि प्राप्य प्राप्तियुण्टॆन्दुपदेशिसुत्तारॆ. आ कृपारूपमन्दाकिनियल्लि अवगाहनॆयु एतक्कॆन्दरॆ, निम्मल वाद नदियल्लि मै तॊळॆदरॆ मालिन्यवु हेगॆ तॊलगुत्तदॆयो, देव गङ्गॆयल्लि अवगाहनॆ माडिदरॆ सत्व पापवू हेगॆ तॊलगुत्तदो, तद्वत इल्लियू मालिन्य प्रशमनाय प्रारेतर सर्वपापगळू तॊलगु वदक्कागि, मन्दाकिनीं विन्दति ई कृपारूप नदि यल्लि अवगाहि सुत्तानॆ. आ कृप मन्दाकिनियु ऎन्थाद्दॆन्दरॆ हेळुत्तारॆ. स्वच्छ स्वादु सदवदात सुभगां, मन्दाकिनियु निलवागियू बहुशुभ्रवागि यावागलू बॆळ्ळगू इद्दु मण्णु मल मुन्तादुवुगळॊन्दू इल्लद निलवाद स्वादूदकवुळ्ळदॆ, हागॆये कृपानदियू कूड स्वच्छ________________
श्रीमद्रहस्यत्रयसारे वादुदु, आ कृपॆगॆ हेयगुण सम्बन्धवे इल्लदुदरिन्द स्वच्छवादुदु, मोक्षवन्नित्तु तन्नन्ननुभविसुव मत्तु तन्न कै करप सामाज्य नुभववुळ्ळ भोग्यतॆयुळ्ळदादुदरिन्द स्वादुत्ववू उण्टु; निश्लेष वागि पापक्षयवन्नुण्टुमाडुवदरिन्द सदा पदात ऎन्दु हेळल ट्टितु; बुद्धि पूरैकवागि पापमाडिदरू, अदन्नू कूड प्रायश्चित्त मुखेनवागलि अथवा अल्प दण्डनॆयिन्दलागलि होगलाडिसि मोक्ष वन्नु ई कृपॆयु कॊडुवदरिन्द सदावदातत्ववु सिद्धिसितु ऎम्ब भाववु. सम्पूर्णवागि पापक्षय माडुवदरिन्दलागलि, अथवा अनादिकालदिन्दिरुवदरिन्दलागलि, इल्लि सदा ऎम्ब प्रयोगवु. हीगॆ मोक्ष प्राप्तिगॆ विरोधवन्नॆल्ला परिहरिसुवदरिन्द सुभगा मनो ई हरवादुदु. यद वं-इन्तह कृपामन्दाकिनियल्लि अवगाहिसि, प्रारब कर विना इतर पापगळन्नॆल्ला निशेषवागि कळॆदुकॊण्डु गुरुमुखेन प्रदनानुष्ठान माडिद सुकृतियाद प्रपन्ननु महा परिशुद्ध स्वरूपवुळ्ळवनागुवदरिन्द अन्थावनु पुनः अपराधगळन्नुण्टु माडुव असारवाद ऐहिक विषयगळल्लि भोग्यभाववन्नु सुतरां त्यजिसबेकु. तन्न परिशुद्ध स्वरूपवन्नु ऐहिक सुखानुभवगळिन्द मालिन्यवन्नु हॊन्दुवहागॆ माडकूडदु. माधवदया मन्दा किनियल्लि मिन्दुदरिन्द हिन्दॆ तन्न शरीरक्कॆ अण्टिद्द समस्त कॆसरू तॊळॆयल्पट्टु परिशुद्धनादवनु, पुनः अन्तह कॆसरिनल्ले स्नान माड बहुदे ? कॆसराद शरीरवन्नु परिशुद्धवाद नीरुळ्ळ कृपा मन्द किनियल्लि तॊळदिद्दायितु. मुन्दक्कॆ आ शरीरवन्नु परिशुद्धवागिट्टु कॊळ्ळदॆ पुनः कॆसरु नीरिनल्लि प्राज्ञनादवनु तॊळॆयुवनो? ऎन्दिगू तॊळॆयलारनु. ज्ञानशून्यतॆयुळ्ळ गज, महिष, सूकर गळु बेकादरॆ, अवुगळ मालीकनु परिशुद्ध नीरिनल्लि तॊळॆद नन्तरवू निजतनुं तम्म शरीरगळन्नु, हरेव कळङ्कयन्ति, कॆसरु गुण्डिगळल्लि हॊरळाडि कॆसरुमाडिकॊळ्ळबहुदु. गजवु स्नानमाडिद नन्तर सॊण्डलिनिन्द मण्णन्नु तॆगॆदु तलॆय मेलॆ हाकिकॊळ्ळुत्तदॆ. हन्दि मत्तु कोणनु कॆसरिनल्लि हॊरळाडुत्तवॆ. विवेकियादवन माधवदयॆ ऎम्ब निलोदकदल्लि सापराधगळन्नू कळॆदु कॊण्ड नन्तर, पुनः ऐहिक भोगासक्तनागि ई प्रकृति ऎम्ब हाळुगुण्डियल्लि ई________________
अपराध परिहाराधिकार प्रपन्नस्य बुद्धि पूत्तर पापानाम् असम्भावितत्वं ४९. इप्पडि भगवच्छेषतैक स्वभाव नागैयालॆ शास्त्रनियत बिद्दु हॊरळि, देहवन्नु कॆसरुमाडिकॊळ्ळकूडदु. हागल्लदॆ असार वाद विषय सुखानुभवगळ प्रवाहगळिन्द उण्टाद पङ्कदिन्द तन्न शरीरवन्नु कॆसरुमाडिकॊण्डरॆ, अन्थावरु प्राज्ञॆर संशिष्यते, कृपामन्दाकिनियल्लि स्नानमाडि परिशुद्धरागिरुव प्राज्ञराद भागवतोत्तमरिन्द हत्तिर सेरिसल्पडुवदिल्लवु. स्वच्छवाद नीरिनल्लि स्नानमाडि मडियुट्टवरु कॆसरिनल्लि बिद्दु बन्दवनन्नु तम्मॊन्दिगॆ सेरिसिकॊळ्ळलु हेगॆ सम्मति सरो, हागॆये ऐहिकवॆल्ला तृणवॆन्दु भाविसि अवुगळल्लि मनस्सिडदॆ माधव कृपा मन्दाकिनियल्लि अवगाहिसि परिशुद्धराद भागवतोत्तमरु पुनः ऐहिकदल्ले बिद्दु नरळुत्तिरुववरन्नु हत्तिर सेरिसरु ऎम्ब भाववु. इदेतक्कॆन्दरॆ, अन्थावरु प्रियोपि न प्रियोमॆस् मदाज्ञा व्यतिवर्तनात्, ऒन्दु कालदल्लि प्रियनागिद्दरू ईग नन्न आज्ञॆयन्नु अतिक्रमिसुवद रिन्द आतनु ननगीग प्रियनल्लवॆन्दू, “मद्दपि नमेप्रियः नन्न भक्तनादरू अन्थादनु ननगॆ प्रियनल्लवु ऎन्दु हेळिरुव हागॆ, ईग सश्वरनिगॆ प्रियरल्लवादुदरिन्द परमैकागळाद परम भागवतरिगू कूड प्रियनागुवदिल्लवु. आदरॆ भागवतोत्तमरिगॆ, इन्थावनु ईतन देहावसानदव रॆगू दोषिये हेगॆ ऎन्दरॆ, निजतनुं कळर्य ऎन्दु हेळि रुवदरिन्द ऎल्लियवरिगॆ ईतनु ऐहिकद भोगगळिगॆ सिलुकि अपराध गळन्नु सम्पादिसिकॊळ्ळुत्ता देहवन्नु कॆसरुमाडिकॊळ्ळुवनो अदु वरॆगू ईतनु अवरनु. आदरॆ पुनः प्रायश्चित्तरूप शरणागति यन्नु यावाग अनुष्ठिसिदनो आग निजतनुविन पब्रवु तॊलगि परि शुद्धनागुवदरिन्द सश्वेश्वरनिगॆ इष्टनादवनागुवनु; आग भागवतो तमरिगू कूड उपादेयने आगुवनु ऎम्बुवदन्नू कूड ऊहिसबहुदु.________________
१४९५ श्रीमद्र हस्यत्रयसारे क तत्त रै त करसनान इव्वधिकारिक्कु प्पिन्सना पल् बुद्दि पूरैकमानव पराध वरुगै, प्रन कैक निक्कु विरुद्ध मागैयाले प्रायेण सम्भावितमनु. प्रपन्ननिगॆ बुद्धि पूरकवाद उत्तराफ सम्बन्धवु असम्भावितवादुदु इप्पडि - हीगॆ ऎन्दरॆ, मेलॆ शास्त्रीय नियमनाधिकारदल्लि हेळिद हागॆ, इदु “शास्त्र नियत” ऎम्बुवदरॊन्दिगॆ अन्वयिस तक्कद्दु, तत्तरगळु शास्त्र नियतवागिरतक्कद्दु ऎम्बुवदु इप्पडि ऎम्बुवदर विवरणवु; भगवच्छेषतैकस्वभाव नागैयालॆ - तानु भगवन्तनिगेने मुख्यवागि शेषभूतनादवनादुदरिन्द, शास्त्र नियत तत्तक रसनान शास्त्रविधिगळिगनुसारवागियॆ आयाया आज्ञानुज्ञा कैगळे मुख्य प्रयोजनवागिल्ल, इवृधिकारिक्कु - ई कृतकृत्यनाद प्रपन्ननिगॆ, पिन्नु - प्रपत्युत्तर कालदल्लि, अनापल् - आपत्कालवल्लदिरुवाग, बुद्दि पूरक मान अपराध वरुगै - बुद्धिपूर्वकवागि अपराधगळु प्राप्तवागु वदु, प्रन कैक निष्ठॆक्कु - प्रपत्तियिन्दुण्टाद कै रवे मुख्यवाद निष्ठॆयागिरुवदक्कॆ विरुद्ध मागैयाले - विरुद्ध वागुवदरिन्द प्रायण बहुशः, सम्भावितननु - सम्भविस तक्कद्दल्लवु. प्रायेण असम्भावितवॆन्दु हेळिदुदरिन्द, कॆलवु सन्दर्भगळल्लि बुद्धि पूराघवु कृतकृत्यनाद प्रसन्ननिगॆ सम्भविस बहुदॆम्बभिप्रायवु सूचितवायितु. अन्तह सन्दर्भदल्लि हेगॆ ऎम्ब प्रश्नॆयु उण्टागबहुदु. अदक्कॆ परिहारवन्न मुन्दॆ उप पादिसुत्तारॆ. ई साङ्ग भरन्यासवन्नु अनुष्ठिसिद अधिकारियु, तानु सत्व श्वरनिगॆ “दास भूतास्सतस्सत्वहात्मानः परमात्मनः” ऎन्दु हेळिरुवहागॆ, स्वभावतः दासभूतन, किङ्करनु ऎम्ब ज्ञानवुळ्ळवनु. आदुदरिन्द तानु शास्त्र नियमनानु सारक्कॆरगळन्नॆसगुवदे तनगॆ मुख्य स्वरूपवॆन्दु चॆन्नागि तिळदवनु ऎन्दिगादरू अवुगळन्नु उल्लं________________
अपराधपरिहाराधिकार १४९६ घिसि, बुद्धिपूरकवागि अपराधगळन्नु माडुवनो? ईतनिगॆ भगवा वत कैगळन्नॆसगुवदे मुख्य निष्ठॆयु ; अन्थावनु तन्न स्वरू पक्कॆ विरुद्दवाद कॆलसगळन्नु माडि, भगवदाज्ञॆगॆ विरोधवागि नडॆदु, हीगॆ बुद्धि पूरैकवाद अपराधगळिगॆ गुरियादानो ? हागॆ आगुवदु सुतराम् असम्भावितवु ऎम्ब भाववु. इल्लि अना पल् बुद्धि पूर कमान अपराधं वरुगै ऎन्दु हेळिदुद रिन्द, आपत्तिनल्लि बुद्धि पूरकवागियागलि, अबुद्धिपूरकवागलि अव राधवु दोषवागुवदिल्लवॆम्ब भाववु इदु हेगॆन्दरॆ :- सीतॆयु अशोकवनदल्लि सिक्कि राक्षसस्त्रीयरिन्द बाधिसल्पडुत्तिद्दुदन्नु कण्डु आञ्जनेयनु तन्न बॆन्निन मेलॆ कूतुकॊण्डरॆ श्रीरामनल्लिगॆ ऒडनॆ करॆदुकॊण्डु होगुवनॆन्दु हेळलु, आकॆयु बुद्धि पूरैकवागि पर पुरुषन अङ्गस्परवु निन्दनीयवॆन्दु तिळिदु हेळुत्ताळॆ :– भ भक्ति पुरस्कृत रामादन वानर । न “शामि शरीरन्तु पुंसो नानर पुङ्गव !! (00. Do. 22.60) पतिव्रतॆगॆ भरविनल्लि अनन्य भक्तियु मुख्यवु, आदुदरिन्द श्रीराम नल्लदॆ परपुरुषन शरीरवन्नु ऎन्दिगू बुद्धिपूरैकवागि मुट्टलारॆनु. सतिगॆ अदु अधर्मनॆम्बभिप्रायदिन्द हेळिदळु. आदरॆ परपुरुष नाद रावणन अङ्गसंस्कृरवायितल्ला ऎन्दरॆ अदू कूड भाविगॆ एनु आपत्तु ऒदगितो ऎम्ब भयदिन्द भक्ति भक्तिम्पुरस्कृत्य लक्षणवन्नु सहायार्थवागि कळुहिसिद वेळॆयल्लि रावणनु नन्नन्न पहरिसिदुदरिन्द बलात्कारदिन्द अबुद्दिपूर्वकवागि उण्टाद पर पुरुषाङ्गस्परवॆन्दु हेळुत्ताळॆ :- यदहं गात्रसंस्सं रावणस्य बलाद ता । अनीशा किङ्करिष्यामि विनाथा विवशासती ॥ (05. 2o. 22.20) तानु असमर्थळु, प्रतिक्रियॆगॆ योग्यतॆयिल्लदवळु, नाथनु हत्तिर विल्लदवळु, अन्थावळु एनु माडबल्लॆनु ऎन्दु हेळिकॊण्डिरुत्ताळॆ. हागॆयॆ आपत्कालदल्लि बुद्धि पूरकवागि अदर माडिदरू अपराध वागुवदिल्लवु. बुद्धि पूरैकवागि सुळ्ळु हेळुवदु अपराधवादरू कळ्ळरु बन्दु ई मार्गदल्लि दिब्बणदवरॆ गाडिगळु होयिते ऎन्दु________________
१४९३ श्री मद्रहस्यत्रयसारे आपत बुद्धि पूरा घानां सामादीकानाञ्च अश्लेष विषयत्नं प्रारब्द कर विशेषवशत्तालॆ देशकालावा वैगुण हेतु कमागवुम्, प्रामादिकवागवु, सुषुप्ता द्यवस्थॆगळि लुं वरुम्, आपराध लेशङ्गळुळ्ळ आश्लेष विषय मां कळिन्नु पों केळिदरॆ, होगलिल्लवॆन्दु सुळ्ळु हेळुवदु, अपराधवागुवदिल्लवु हीगॆ आपत्तिनल्लि प्राप्तवाद बुद्धि पूरकवाद अधरवू, अबुदि पूरकवाद समस्त अधरगळू अपराधगळागुवदिल्लवु ऎम्बुवदन्नु मुन्दिन वाक्यदिन्द उपपादिसुत्तारॆ. आपत्तिनल्लि बुद्धि पूरकमाडिद, मत्तु अबुद्धि पूरैक माडिद सापराधगळू लेपिसुवदिल्लवु प्रारब्ध कविशेषवशत्ताले - प्रारब्धकर विशेषक्कॆ सिक्किदुद रिन्द, देशवैगुण्य, कालगुण्य, अवस्थाव्यगुण्य, हेतुक मागवु - कारण मूलकवागि बन्द बुद्धि पूरैकवाद अप राधवू, इल्लि वैगुण्यवॆन्दरॆ शास्त्रान ग णवागि नडॆयुवुदक्कॆ साध्य विल्लदॆ विपरीतवागि नडॆयुवुविकॆयु, प्रामादिक नागवुदु प्रमाददिन्दलागलि ऎन्दरॆ अबुदि पूरकवागलि माडिद आ प रा धवु, हागॆये, सुषुप्ता द्यवस्थॆगळिलुवु वरु - निद्रॆ मॊदलाद अवस्थॆगळल्लि बरुव अपराधगळु, इल्लि आदिसद दिन्द स्वप्न मरावस्थॆगळू हेळल्पट्टवु. हीगॆ अपराधलेशं गळुळ्ळ वै उण्टागुव अल्पवाद अपराधगळू कूड, आश्लेष विषयवाय . ई प्रपन्ननिगॆ लेपिसदिरुवगळागिकॊण्डु, कळिन्नु पोव - नाशवागि होगुववु. आपत्कालवल्लदिरुवाग बुद्धिपूकवाद अपराधवु सामान्यवागि प्रपन्ननिगॆ सम्भविस लारदॆन्दु प्रथमवाक्यदिन्द हेळिदरु. अन्तह अपराधवल्लदुदु ऎरडु तॆरनागिरबहुदु. (१) आपत्कालदल्लि बुद्दिपूर कमाडुव अप________________
अपराधपरिहाराधिकार १४९८ राधवू (२) आपत्कालवल्लदे इरुवाग अबुद्धिपूरैक अपराधवू ; इवॆरडू प्रपन्ननिगॆ लेपिसुवदिल्लवॆन्दु हेळुत्तारॆ. प्रारब्धवॆन्दु प्रारम्भिसि, हेळुकनागवु ऎम्बुवदरिन्द मॊदलनॆय विध अप राधवू, प्रामादिकवागुवु ऎम्बुवदरिन्द ऎरडनॆय विधाप राधवू हेळल्पट्टतु; सुषुप्ता द्यवस्थॆगळिलुम् ऎन्दु हेळुव अपराधवू ऎरडनॆय विधदल्ले अन्तर तवु. आपद्दॆशॆयल्लि बुद्दि पूराघवु देशवैगुण्य, कालवैगुण्य अवस्थावैगुण्यदिन्द प्राप्त वागबहुदु. शास्त्रनियमनानुसार नडॆयदिरुवदे वैगुण्यवु. देश वैगुण्य हेगॆन्दरॆ, मरुप्रदेशदल्लि प्रारब्धकर विशेषदिन्द सिलुकि स्नान सन्ध्यावन्दनादिगळिगॆ अनुकूलविल्लदे होगोणवु, अब्राह्मण्य देशदल्लि सिलुकि, शास्त्रानुगुणवागि पितृ श्राद्धवन्नु नॆरवेरिसुवदरल्लि लोपवू कालवैगुण्यक्कॆ निदर्शनगळु– सायङ्काल आरु घण्टॆगॆ रैलु हॊरडुवदरिन्द रैलिनल्लि सन्ध्यावन्दनादिगळु अनुचितवादुद रिन्द तत्ववागि सूरासमयक्कॆ मुञ्चॆये सन्ध्यावन्दनॆयन्न नुष्ठिसोणवु, द्वादशियल्लि पितृश्राद्ध प्राप्तवादुदरिन्द द्वादशि कट्टळॆयन्नतिक्रमिसोणवु, दुर्भिक्ष कालवादुदरिन्द पञ्चमहा यज्ञगळिगॆ लोपवू, इवे मॊदलादवुगळु. अवस्था वैगुण्यक्कॆ निदर्शनगळु :-व्याधिपीडितनागि नित्यनै मित्तिक कम्मगळिगॆ लोपवु. हागॆये सुषुप्तवस्थॆयल्लि भागवतरु हत्तिर बन्दरू प्रत्युत्ता नादिगळिल्लदॆ कालुचाचिकॊण्डु मलगिरुवदु. स्वप्नावस्थॆयल्लि भाग वतापचार माडुवदु, ऒन्दु प्राणियन्नु कॊल्लुवदु इत्यादि. मूरावस्थॆयल्लि ऒब्ब चेतनन मेलॆ बीळुवुदु, आतन कैयन्नु कच्चुवुदु इत्यादि. इन्तह देश, काल, अवस्थावैगुण्यक्कॆल्ला कार इवु प्रारब्धकविशेषवादुदरिन्द, प्रारब्द कर विशेषवशत्तालॆ ऎम्ब प्रयोगवु ई ऎल्ला अपराधगळॆल्ला सरेश्वरन कृपा प्रभावदिन्द निशेषवागि कळॆदुहोगुवदरिन्द अपराध लेश तुळ्ळवॆ ऎन्दु प्रयोगिसिरुत्तारॆ. इल्लि अश्लेष विषयवाय् ऎन्दु एतक्कॆ प्रयोगिसिरुत्तारॆन्दरॆ :- “ तद्यथा पुष्करपलाश आपॊ न शिष्यने, एवमेवं विदिसापं कर न शिष्यते” तावरे ऎलॆगॆ नीरु हेगॆ आण्ट वदिल्लवो हागॆये ब्रह्मवित्तिगॆ प्रामादिक रूप पापवु अण्टुवदिल्लवॆन्दु, न शिष्यते ऎन्दु श्रुतियल्लि हेळिरुव________________
OVER श्रीमद्रहस्य त्रयसारे बुद्धि पूरा घनां प्रायश्चित्तेन निवृत्ति बुद्धि पूरक पापारम्भकपापयुक्कु अञ्जि अवैयुं कळियवेणु मॆनु प्रपत्ति पण्णादॆ पाम्बोडॊरु कॊरैयिलॆ पयिना पोलॆ प्रकृतियॊडेकूड विरुक्किर विवनुक्कु आत्म दरिन्दलू हागॆये ब्रह्मसूत्रदल्लि “ तदधिगवु उत्तरपूरा घ योरशेषविनाश् तद्व पदेशात्” (ब्र. सू४२.१३) उत्तराफ् विषयदल्लि अश्लेषशब्दवे प्रयोगिसल्पट्टिरुत्तदॆ. अश्लेषवॆन्दरॆ पापपुण्यरूप कर्मगळन्नु माडिदरू अवुगळ फलोत्पत्तिगॆ विरुद्ध वाद सामर्थ्यवन्नु हॊन्दिरुविकॆयु, नीरु गॊब्बरविरुव स्थळदल्लि भत्तवन्नु बित्तिदरॆ फलरूपवाद भत्तद पैरु उण्टागलेबेकु, आदरॆ हीगिद्दरू सर्वॆश्वर सङ्कल्पदिन्द पैरु बॆळॆयदिरोण हेगो हागॆये कर्मवु पापरूप फलप्रदवादरू सर्वॆश्वर सङ्कल्पदिन्द अन्तह फलोत्पत्ति इल्लदे होगबहुदु. अदक्कॆ अश्लेष ऎम्ब हॆसरु, हिन्दॆ अनापत्तिनल्लि बुद्धि पूराघवु, साधारणवागि कृत कृत नाद स्वनिष्ठॆयन्नु तिळिद देवभागवत कैरगळन्नॆसगि भगवति यन्नु सम्पादिसिकॊळ्ळबेकॆन्दिरुव प्रपन्ननिगॆ सम्भविसलारदॆन्दु हेळ ल्पट्टितु. ऒन्दु वेळॆ सम्भविसिदुदादरॆ अन्तह अपराध परिहार हेगॆ ऎम्बुवदन्नु मुन्दिन “बुद्धि पूर क” वॆम्बुव वाक्यदिन्दुप देशिसुत्तारॆ. बुद्धि पूर पापगळ निवृत्तियु बुद्धि पूरक पापारम्भः बुद्धिपूरकवागि पापगळन्नु प्रप त्युत्तर कालदल्लू माडुवहाग माडुव, पापङ्गळु क्कु - प्रारब्धक्कॆ सम्बन्धिसिद पापगळिगॆ, अञ्जि - भयपट्टु, अवैयुव कळिय वेणुवॆनु अवुगळू कूड नशिसिहोगबेकॆन्दु, प्रपत्ति पण्णादॆ - प्रपत्तियन्नु माडदॆ, पाम्बोडु - ऒन्दु सत्पदॊन्दिगॆ ऒरु कॊरैयिलॆ - ऒन्दु गृहदल्लि, पयि नार पोलॆ - वासमाडु वरहागॆ, प्रकृतियॊडे कूड विरुक्किरविवनुक्कु - ईगेहपति________________
(90) अपराधपरिहाराधिकार LIBRA १५०० गुणपूर्तियिल्ला मैयालॆ मन्न धैय्यरान ऋषिगळुक्कु प्रॊलॆ बुद्दिपूर कमागवु शिलनिष्ठा विवरीतज्ञळ् वन्हालुम्, निसर्गसुहृत्तान श्रियःपतिरक्षणोन्मुखनाय निक्कियाले, अन्नि परीतानुष्ठानङ्गळ् मिनॊळि मात्र मानिनिरुम वैयनिक्कॆ, अक्कालत्तिल् पिरन्न स्वनिष्ठावै परीत्यवागि विळ वैक्कडुग अनुसन्धित्तु यथोचितवाग लज्ञानुताप४ सिरन्नु, मित्र, याद मत्तु तन्नन्नु वञ्चिसि नाशमाडुव ई एकादशेयगळॊं दिगॆ कूडिद शरीरदॊन्दिगिरुव ई चेतननिगॆ, आत्मगुण पूर्तियिल्ला मैयालॆ - विवेक मॊदलाद आत्मगुणगळ समृद्धि इल्लदिरुवदरिन्द, मन्दरान - अल्पवाद चित्रस्थॆर्यवुळ्ळ, ऎन्दरॆ इन्द्रियगळिगॆ वशवाद मनस्सुळ्ळ, ऋषिगळिक्कु प्रोलॆ - सौभरि विश्वामित्रादि ऋषिगळ हागॆ, बुद्दिपूर्वकवागुवुम - बुद्धि पूरैकवागि, शिलनिष्ठाविपरीतज्ञळ् कॆलवु स्वनिष्ठॆगॆ विरुद्धवादवुगळु, वनालुम् - प्राप्तवादरू, निसर सुहृतान - सहज नाद, श्रियःपतियु, रक्षणोन्मुखनाय् - रक्षिसबेकॆन्दु उद्युक्त नागि, निक्कियालॆ-निल्लुवदरिन्द, अद्विपरीतानुष्ठानगळु, मिन्नॊळि मात्र माय - विद्युत्तिन हागॆ अल्प कालीनवागि, निनिरु म यक्कॆ - स्थिरवागि निल्लदे इरुवुदरिन्द, अक्कालत्तिल् पूत्व काघवन्नु माडिद कालदल्लि, पिरन्न उण्टाद, स्वनिष्ठा वैपरीत्यवागिरबळवै-स्वनिष्ठॆगॆ विरुद्धवाद न्यूनतॆयन्नु, कडुग अनुसन्नित्तु - शीघ्रवागि अनुसन्धानमाडि, ऎन्दरॆ आलोचिसि, यथोचितवाग - अदक्कनुगुणवाद, लज्ञानुतापळ् - नाचि कॆय मत्तु दुःखवू, सिरन्नु - उण्टागि, इदक्कॆ “प्रायश्चित्तान लम्बनम् उण्णा ऎन्दरॆ प्रायश्चित्तद अनुष्ठानवु प्राप्तवाग बहुदु” ऎम्बुवदरॊन्दिगॆ अन्वयिसतक्कद्दु. अन्तह प्रायश्चित्ता नुष्ठानक्कॆ मूरु प्रमाणगळन्नु दाहरिसुत्तारॆ. आ बुद्धि ई मेलिन वाक्याभिप्रायवेनॆन्दरॆ :- प्रारब्धकदल्लू प्रप त्युत्तर कालदल्लि बुद्धि पूरकवागि पापारम्भक पापगळू उण्टु,________________
१५०१ श्रीमद्रहस्य त्रयसारे इवुगळू सह नष्टवागबेकॆन्दु शरणागति माडुव कालदल्लि स सिदरॆ, शरणागतवत्सलनु अन्तह प्रपन्नन मनोरथवन्नु पूरि माडि बुद्धि पूराघवु प्रपत्युत्तर कालदल्लि सम्भविसदहागॆ कृपॆगॆयुवनु हागॆ उद्देशिसि प्रपदनानु ष्ठान माडदिद्दरॆ बुद्धि राघगळु सम्भ विसबहुदु. हागॆ सम्भविसलु कारणवेनॆन्दरॆ ईतनु ऒन्दु मनॆयल्लि हाविनॊन्दिगॆ वासमाडुत्तिद्दरॆ ऎष्टु जागरूकनागिद्दरू यावु दादरू, ऒन्दु दिन अदु ईतनन्नु कच्चि विषव्यापनॆयुण्टु माडि हेगॆ नाशमाडुत्तदॆ, हागॆये, मदसिद ई दशेन्द्रियङ्गळिन्द कूडिद मनस्सुळ्ळ ई शरीरदल्लि वासमाडुवदरिन्द, अवुगळिन्द दष्ट नागि चित्तभ्रमॆयुण्टागि कॆट्टु होगि बुद्धि पूराणिगळन्नु कदाचित् माडबहुदु. ई इन्द्रियगळ हावळियन्नु शुकमहर्षियु बहु स्वारस्यवागि वर्णिसि(१) “ बस्सपत्नय इवगेहपतिं लुन” )अनेक हॆण्डरु ऒब्ब गृहस्थनिगॆ इद्दरॆ अवरॆल्ला सेरि हेगॆ यजमाननन्नु हाळु माडुवरो, हागॆ ई इन्द्रिय गळू मनसू सह ई आत्मनन्नु पापगळन्नु माडुवहागॆ प्रेरिसु इवॆ ऎन्दु हेळिरुत्तारॆ. (भाग “पापं प्रज्ञां नाशयति क्रियमाणम्पुनः पुनः 1 नन्न प्रज्ञः पापमेव पुनरारभते नरः” ऎम्ब श्लोकवू इल्लि अनुसन्धेयवु. इल्लि नष्ट प्रज्ञ ऎन्दु हेळिरु वदु आत्मगुण पूर्ति इल्लदॆ ऎम्बुव अभिप्रायवन्नु सूचिसुत्तदॆ. हागॆ नष्ट प्रज्ञ नागुवदु कवश्यनागि प्रकृति सम्बन्धविरुवदरिन्द प्राप्तवागुत्तदॆ. इन्द्रियगळ हावळि तप्पिसिकॊळ्ळुवदक्कॆ चित्र विरबेकु. भोग्यवस्तुगळ मध्यदल्लिद्दरू अवुगळिन्द मनस्सु चञ्चल नागकूडदु. हीगिरुवदु तुम्बा कष्टतरवाददु. महर्षिगळ कूड अन्तह सन्निवेशदल्लि रम्भा ऊश्वशि मॊदलाद अप्पर स्त्रीयरु गळ वञ्चनॆगॆ वशरागि ऐहिक भोगासक्तरागिरुत्तारॆ. सौभरि विश्वा मित्र वृत्तान्तगळु इदक्कॆ निदर्शनवु. ई अभिप्रायवन्नु तिळिसुवद क्कागि मनधैररान ऋषिगळुक्कु पोले ऎम्ब प्रयोगवु, लक्ष णन कोपोपशमनक्कागि सुग्रीवनिन्द कळुहिसल्पट्ट तारॆयु लक्ष इनं कुरितु हागॆये हेळिरुत्ताळॆ :-________________
अपराध परिहाराधिकारः “महर्षयोध्यान तपोभिकामाः कामाभिकामा प्रतिबद्ध मोहाः” महर्षिगळु ध्यानवेनु तपस्सेनु, इवुगळल्लि अभिरुचियुळ्ळवरु. इन्थावरू कूड भोग्यवस्तुगळ सन्निधियल्लि ऐहिक कामगळल्लि सक्तरादवरागि, विषयसुखगळल्लि बन्धिसल्पट्ट मोह वुळ्ळवरागुवरॆन्दु हेळल्पट्टिरुत्तदॆ. हीगिरुवल्लि इन्नु साधारण राद प्रसन्नर विषयदल्लि हेळतक्कद्देनु ऎम्ब भाववु. हीगॆ बुद्धि पूराघवु प्राप्तवादरॆ अन्थावनिगॆ मोक्ष उण्टो इल्लवो ऎम्ब सन्देहक्कॆ समाधान हेळुववरागि, ई प्रपन्ननु अनुष्ठिसिद शरणागतिय माहात्मियिन्द मोक्षक्कॆनू सन्देहविल्ल ऎम्ब भाव वन्नु मनस्सिनल्लिट्टु “निसर सुहृत्तान श्रियःपतिरक्षणोन्मुख नाय” ऎन्दु प्रयोगिसिरुत्तारॆ. नित्य हृद्रोपि ऎन्दु हिन्दॆ हेळिरुव हागॆ सत्येश्वरनु सर्वस्य शरणं सुहृत् ऎम्ब श्रुत्यनु सार परमसुहृत्तु. ई भावदिन्द बन्द शरणागतनादवनन्नु “मित्र भावेन सम्प्राप्तं नत्यजेयं कथञ्चन” ऎन्दिगू कै बिडॆनु ऎन्दु हेळिरुत्तानादुदरिन्द, मोक्षक्कॆ ऎन्दिगू च्युति यिल्लवु. आतनिगॆ “आश्रित संरक्षणमेव परमधर्मं” ऎन्दु हेळिरुवदरिन्द आत नु यावागलू आश्रित रक्षणोन्मुखनु. यावाग आतनु आश्रितनादनो आतनु तनगॆ समाननादनु; एतक्कॆन्दरॆ आतनु नमगॆ परमसुहृत्, विभीषणनु यावाग आश्रयिसि बिट्टनो, यावाग सुग्रीवनु श्रीरामनन्नु कुरितु “तस्मा प्रं सहास्माभिस्तु भवतु राघव विभीष महा प्राज्ञखित्वञ्चाभ्युपैतुनः ॥” नम्मॊन्दिगॆ समाननागलु ई महाप्राज्ञनाद विभीषणनु योग्यनॆं ब श्रीरामाभिप्रायवन्नु अनुमोदिसिदनो, आग ऒडनॆये ऒन्दु क्षण विळम्बवू इल्लदॆ “विभीष नाशु जगम सङ्गमं, शरण्य निगॆ शरणागतन सङ्गमवे, स्नेहवे लाभकरवाद विशेषवादुदरिन्द श्रीरामनु आतनिगॆ परमसुहृत्तादनु. अदू अल्लदॆ, आतन श्रियः पतियागि अनुग्रहमयळाद लक्ष्मियॊन्दिगॆ इरुवदरिन्द प्रसन्न नन्नु हेगादरू माडि रक्षिसबेकॆन्दे रक्षणोन्मुखनागिरुवदरिन्द इन्तह बुद्धि पूरैकवाद विपरीतानुष्ठानगळु विद्युत काशदहागॆ________________
श्रीमद्र हस्य त्रयसारे (१) “अपायसम्प्लवे सद्यः प्रायश्चित्तं समाचरेत् । प्रायश्चिरिय सात्र यतुनशरणं व्रजेत् : उपायानाम् उपायत्व स्वीकारे तदेव हि” क्षणिकवे विना बहळ कालविरुवदिल्लवु. सश्वेश्वरन कृपॆयिन्द इव निगॆ ऒडनॆ लज्जॆयू अनुतापगळू हुट्टि, अदक्कागि प्रायश्चित्त वन्नु कैकॊण्डु प्रायश्चित्तरूप शरणागतियन्नु अनुष्ठिसि, पाप विमुक्तनागि रक्षिसल्पडुवनु ऎम्ब तात्सरवु. ई अभिप्रायगळन्नु सप्रमाणवागि उपदेशिसुत्तारॆ :- · 1 (१) अपाय सम्प्लवे ऎम्ब वाक्यवु प्रपन्ननन्नु कुरितु हेळुत्तदॆ. अपाय सम्पवे - पापगळु प्राप्तवादरॆ, सद्यः – ऒडनॆ, प्रायश्चित्तंसमाचरेत् प्रायश्चित्तवन्नु अनुष्ठिस तक्कद्दु. पुनः शरणं प्रजेत् - पुनः शरणु हॊन्दुवदु, यत्- यावुदो, सा - अदु, इयं प्रायश्चित्ति - ई मेलॆ हेळिद प्रायश्चित्तवॆम्बुवदु. उपायानां - करयोग मॊदलादवु गळन्नु, उपायन स्वीकारेपि. उपायभावदिन्द अवलम्बिसिद सन्दर्भदल्लू कूड, एतदेवहि इदुवे प्रायश्चित्तवु ऎन्दरॆ पुनश्चरणागतिये प्रायश्चित्तवु. ई पुनश्चरणागतियेनु हिन्दिन शरणागतियु ई बुद्धिपूराघदिन्द नाशवागि होदुदरिन्दलो, अथवा प्रायश्चित्तरूपदिन्दलो ऎम्ब सन्देहदल्लि ई प्रमाणवु मॊदलिन शरणागतियु नष्टवागलिल्लवॆन्दू, ई पुनस्करणागतियु प्रायश्चित्त रूपवादुदॆन्दू, स्पष्टवागि तिळिसुत्तदॆ. * आ पाय सङ्घवे सद्य- पुनश्च शरणं प्रजेत्” ऎन्दु प्रमाणवाक्य विद्दुदादरॆ मॊदलिन प्रपदनवु नष्टवायितॆन्दू अदक्कागि पुनर णागति माडबेकॆन्दू ऊहिसबहुदागित्तु. आदरॆ अपायसम्प्ल सद्यः प्रायश्चित्तं समाचरेत् ऎन्दु प्रायश्चित्तवन्नु विधिसि, आ प्रायश्चित्तक्कागि प्रायश्चित्त रूप शरणागतियन्नु माडतक्क (१) लक्ष्मीतन्त्र. १७-९१९२________________
अपराधपरिहाराधिकार (२) “ अज्ञानादथवा ज्ञानादपराधेषु सतृपि । प्रायश्चि त्रं क्षमस्वति प्रार नैव केवलं ” द्दॆन्दु विधिसिरुवदरिन्द ई ऎरडनॆयरूप शरणागतियु प्रायश्चित्त रूपवादुदॆन्दु तिळियतक्कद्दु. हागॆये भरसमर्पणॆगॆ बदलागि इन्नॊन्दुपायवाद अण्ण प्रपत्तियन्नु अवलम्बिसिदवनिगू इदे प्रायश्चित्त रूप शरणागति ऎन्दु प्रमाणवु हेळुत्तदॆ. (२) “अज्ञा नादथवाज्ञानात्-अज्ञानदिन्दलागलि, बुद्धिपूरकवागलि, अपरा देषु सपि- अपराधगळु इद्दरू कूड, क्षमस्वति-क्षमिसैय्या, ऎन्दु, प्रार्थनैकैव केवलं - प्रार्थिसुवदु ऒन्दु मात्रवे, प्रायश्चिं प्रायश्चित्तवु”. इदरल्लि प्रायश्चित्तवु याव रूपवादुदु ऎन्दरॆ हेळल्पडुत्तदॆ :- अपराधवन्नु क्षमिसैया ऎन्दु हेळि अदक्कागि शरणागतियन्नु माडतक्कद्दॆन्दु हेळल्पट्टितु. इदर अनुसन्धानवे श्रीभाष्यकाररु “मनोवाक्का सान शेषतः क्षमस्त” ऎम्ब वाक्यदिन्द प्रार्थिसिरुवदु. इल्लि “ अज्ञानात् ” ऎन्दिरुवदरिन्द अज्ञानदिन्द माडिद पराधक्कॆ प्राय श्चित्तवु आवश्यकवे ऎन्दरॆ आवश्यकविल्लदिद्दरू प्रायश्चित्त शरणागति माडुवदरिन्द दोषवेनू इल्लवु. अपराधगळु कॆलवु बुद्धिपूर्वक वागियू कॆलवु अबुद्दिपूर्वकवागियू नडॆदिरबहुदु. ई विषय गळल्लि विवाद बेकिल्लव, प्रायश्चित्त रूप शरणागतियन्ननुष्टिसुवदु युक्तवु ऎम्ब तात्सरवु. (३) इदु रावणनिगॆ सीतॆयु माडुव उपदेशवु. लोक मातॆयादुदरिन्द परमवात्सल्यदिन्द हेळुव अमोघवाक्कागिरु तदॆ. सः - आ सत्यसल्पनाद श्रीरामनु, शरणागतवत्सलः - शरणागतरल्लि तुम्बा वात्सल्यवुळ्ळवनु. महापराधियागिद्दरू मन्निसुवनॆ ऎम्ब सन्देहवु बेड, धर्मज्ञः - शरणागत धम्म वन्नु चॆन्नागि तिळिदवनु, दोषो यपि तस्यस्यात् ऎन्दु (२) मङ्गि नित्यं.________________
श्रीमद हस्यप्रयसारे (३) “विदितस्सहि धर्वज्ञश्यरणागत वत्सलः। तेन मैत्री भवतु ते यदि जीवितुमिच्छ॥ हेळतक्कवनु. इदु विदितःहि इदु लोकप्रसिद्धवाद विषयवु शरणागतवत्सलनॆम्ब प्रसिद्दिगॆ निन्न अनुजने साक्षियागुवनु ऎम्ब भाववु. नन्नन्तह राजनु आतनिगॆ ऎरगुवदु धरवो ऎन्दु योचिस बेड, तेन मैश्री भवतु ते - आतनॊन्दिगॆ सख्यवन्नु बॆळॆसु, निनगॆ यदि जीवितुमिच्छसि - चन्नागि बदुकबेकॆम्बपेक्षॆयु इद्दुदादरॆ, हागॆ माडु, एनं शरणागतवत्सलं - इन्तह शरणागतवत्सल नन्नु, आतनु अन्तह सत्यसल्पनॆन्दु मनस्सिगॆ चन्नागि हिडियुवद क्कागि शरणागतवत्सलनॆम्बुवदन्नु ऎरडुसल हेळिरुत्ताळॆन्दू भाविस बहुदु ; इन्नॊन्दभिप्रायवु मुन्दॆ विवरिस्पडुत्तदॆ. आतनु
“मित्र भावेन सम्प्राप्तं नत्यजेयं कथञ्चन” । दोषो यद्यपि तस्य स्याच्छता मे तदगर्हितं” ऎन्दु हेळुव सत्य सङ्कल्पनादुदरिन्द तेनमैत्रि भवतु ते ऎन्दु कृपया उपदेशिसिरुत्ताळॆ ; इन्थावनन्नु तं- नीनु, प्रसाद यस्य - निन्नन्नु अनुग्रहिसुवहागॆ प्रसन्ननागि माडिकॊ ; प्रय तोभूत्वा आ शरणागतियिन्द सत्वपापगळन्नू कळॆदुकॊण्डु मुन्दक्कॆ प्रतिकूलनागदॆ, परिशुद्धनागि, अ - इन्तह श्रीराम निगॆ माञ्च - नन्नन्नू कूड निरातयितु मर्हसि - हिन्तिरुगि समर्पिसलु योग्यनागु ऎन्दरॆ नन्नन्नु समर्पिसुवदु युक्त वादुदु ऎम्ब भाववु. रावणनु प्रपन्ननल्लवल्ला, इदु बुद्धि वॊरॊ राघ विषय हेगॆ आदीतॆन्दु प्रश्निसबहुदु, इल्लि मॊदलु “शरणागत वत्सलः तेन मैत्री भवतुते” ऎम्बुवदरिन्द तन्न उजीवनार्थवागि शरणागतियु उपदेशिसल्पट्टितु. आगलू सीतॆ यन्नु कळुहिसिकॊडदॆ अशोकवनदल्लिट्टिदुदरिन्द बुद्धिवूराघवु इन्नू हिम्बालिसिरुवदरिन्द अदक्कॆ प्रायश्चित्त रूपदल्लि “प्रसाद (३) रामा, सुन्दर २१-२०२१________________
अपराधपरिहाराधिकार प्रसादयस्व त्वं चैनं शरणागत वत्सलम् । माञ्चा प्रयतो भूत्वा निरातयितु मरसि ॥” అల్ य त्वं चैनं शरणागतवत्सलं माञ्चा प्रयतो भूतानि क्यातयितुमर्हसि” ऎम्बुवदरिन्द प्रायश्चित्तरूप पुन शरणागतियु विधिसल्पट्टिरुवुदरिन्द शरणागत वत्सल पदवु ऎरडु सल प्रयोगिसल्पट्टरुत्तदॆ. ऒब्बनु द्रव्यवन्नु अपहरिसिदरॆ, मॊदलु रक्षिसु ऎन्दु बेडि, कद्द पदार्थवन्नु तन्दु समर्पिसि अदर प्राय श्चित्तक्कागि पुनः नमस्करिसुवनु. मॊदलु शरणागतियन्नु माडिद रेनॆ सीतॆयन्नु परिग्रहिसु ऎन्दु बेडलु अधिकार उण्टादीतु आदुदरिन्द रक्षणारूप शरणागतिय प्रायश्चित्त रूप शरणागतियू ऎरडू आवश्यकवु. ई श्लोकवु अत्यन्त मातृवात्सल्यदिन्द लोक मातॆयु आचारस्थानदल्लि निन्तु जीवात्मनिगॆ हेळुव हितोपदेश वॆन्दू भाविसबहुदु. सत्येश्वरनु शरणागतवत्सलनु शरणागत धरवन्नु चॆन्नागि तिळिद सत्यसम्मिलनु. आतनल्लि मैत्रि महाविश्वा सवु उण्टागि यदि जीवतुमिच्छसि निनगॆ आजीवनवन्नु माडि कॊळ्ळबेकॆम्ब इष्टविद्दरॆ, शरणागतियन्नु माडु, हागॆ माडदिद्दरॆ पुनःपुनः जन्मवॆत्तुवदु निनगॆ मरणसमानवॆम्ब भाववु. आदुद रिन्द नीनु अन्तह शरणागतवत्सलनन्नु प्रसन्ननागिमाडिकॊण्डु माञ्च . “ अहं मे” ऎन्दु हेळि आत्मापहारचौर माडिद जीवात्म नन्नू अथवा अहं, माम् इत्यादि प्रत्यभिज्ञॆयिन्द तोरुव जीवात्मनन्नु, अथवा “ मां” विदेहराजतनया न्यायेन लालि प्यते” ऎन्दु हेळिरुव हागॆ नन्न हागॆ बन्धक्कॆ सिक्किरुव जीवात्म नन्नु, आ अपराधवन्नु कळॆदुकॊळ्ळुवदक्कॊस्कर निरातयितु मर्हसि, आतन स्वत्तन्नु आतनिगॆ हिन्तिरुगि समर्पिसुवदु युक्तवु ऎम्ब स्वारस्यार्थवू तोरिबरुत्तदॆ. ई सन्दर्भदल्लि, (१) “ अस्वमिति भावोत्रयुंसामुपजायते । अहं ममेति भावोयत् प्रायवाभिजायते” (१) वि. पु. ५.३०१५,________________
१५०७ श्रीमद्र हस्यत्रयसारे इत्यादिगळिल् सॊल्लुगिर पडिये यथाधिकार प्रायश्चित्तान लम्बननुण्णा, प्रायश्चित्ताकरणी अल्प शिक्षयारक्षणं प्रारब्ध कर्मविशेषवशत्तालॆ कठिन प्रकृतियाय क्षमॆ कॊळ्ळुगैयुं कै तप्पि न पोदु (१) “स्वपुरुषमभिवीक्ष मत्तु “ अन्यथासन्तनात्मानं योन्य थाप्रतिपद्यते । किन्तेन नकृतम्पापं चोरेणातापहारिणा” ऎम्ब श्लोकगळु इल्लि अनुसन्धेयवु इत्यादिगळिल् - इन्तह प्रमाणगळल्लि, शूल्लुगिर पडिये- हेळिरुव रीतियल्लि, यथाधिकारन - भक्ति मार्ग प्रपदन मार्ग गळन्नु अवलम्बिसिद शक्तराद अशक्तराद अधिकारिगळिगॆ, प्रायश्चित्ता वलम्बननुण्णा - प्रायश्चित्तानुष्ठानवु श्रियःपतियनुग्रह दिन्दले प्राप्तवागबहुदु, हागॆ प्रायश्चित्तावलम्बनविल्लदिद्दरॆ अल्प शिक्षॆ माडि रक्षणवु. प्रारब्ध कर्म विशेषवु प्रबलवादुदरिन्द प्रायश्चित्त माडिकॊ ळ्ळदॆ होदरू मोक्षप्राप्तिगॆ च्युतियिल्लवु. सर्वॆश्वरनु अन्थाव नन्नु देहावसानद ऒळगॆ अल्प दण्डनॆगॆ गुरिमाडि रक्षिसुवनु ऎन्दु हेळुत्तारॆ. ई अधिकार कॊनॆय श्लोकदल्लि हेळिरुव जातेपि तन्निष्टते ऎम्बुव भागवु उपपादिसल्पट्टितु. ईग कौटिल्य सति शिक्षयानघर्य क्रोडी करोति प्रभुः ऎम्ब वाक्यवु उपपादिसल्पडुत्तदॆ. प्रारब्ध कर्म विशेषवशत्तालॆ - प्रारब्ध कर्म विशेषक्कॆ ऒळपट्टिरुवदरिन्द, कठिन प्रकृतियाय - क्षमिसु ऎन्दु बेडलु बेकाद सात्विकन मृदु स्वभावविल्लदॆ कठिनवाद राजसतामसस्वभाव उळ्ळवनागि, क्षमै कॊळ्ळुगॆयुव कै तप्पिन________________
(on) अपराधपरिहाराधिकार १५०८ पाशहस्तं वदति यमः कॆल तस्य करमूले । हरिहर मधु सूदन प्रर्पा प्रभुरहमन्य नृणां न वैष्णव नां” (२) “कमलनयन वासुदेव विषधरणि धराच्युत शङ्ख चक्रपाणे । भव शरणमितीरयन्ति ये वैत्य जभट दूरत रेण तान पार्पा
पोदु - क्षमिसु ऎम्ब प्रार्थनायुक्तवाद प्रायश्चित्त रूप शरणा गत्यनुष्ठानवु तप्पिद सन्दर्भदल्लि, मुन्दॆ नरक प्राप्ति एनॊन्दू इल्लदॆ ई देहदल्लि अल्प दण्डिस यन्नु कॊट्टु सत्येश्वरनु रक्षिसुवनु ऎन्दु हेळुत्तारॆ. ई अभिप्राय समर गागि कॆलवु प्रमाणगळन्नु समगागि प्रदर्शिसुत्तारॆ :- यमः - यमनु, प्राश हस्तं - पाशवन्नु धरिसि रुव स्वपुरुषं तन्न ट न्नु, अभिवीक्ष कण्डु, तस्य कर्ण मूले - आतन किवियल्लि गुट्टागि, वदतिकिल - हेळुत्तानॆयष्टॆ ; एनन्नु गुट्टागि हेळुत्तानॆम्बुवदु उत्तरार्धदल्लि हेळल्पडुत्तदॆ :- “ओ भटनॆ, मधुसूदन प्रपन्ना९ - मधु ऎम्ब राक्षसनन्नु कॊन्द श्री महाविष्णुविनल्लि शरणागतराद प्रपन्नरन्नु, परिहर - बिट्टु बिडु ऎन्दरॆ अवर तण्टॆगॆ होगबेड, अन्य नृणां - इतर जनरिगॆ, आहं प्रभुः - नानु स्वामियु, न वैष्ण नानां - अन्तह वैष्णव रिगॆ नानु प्रभुवल्लवु” ऎम्बदागि यमनु हेळिदनु ऎम्ब तात्सरवु प्रपन्नरिगॆ यमन बाधॆयु इल्लवु ऎम्बुवदक्कॆ ई प्रमाणवु. (२) कमल नयन - पुण्डरीकाक्षने, वासु देवने वासु देव शब्दक्कॆ व्यत्पत्ति हेगॆन्दरॆ :- “ सत्व त्रास् तिवैयतः” ऎन्दु हेळिरुव हागॆ ई तनु ईतनल्लू वासवागिरुवदरिन्द वासुदेवनु, वन्नु व्यापिसुव विष्णुवे, समस्तं च वसत्य ऎल्लॆल्लियू, ऎल्लवू हे विष्ण - ओ सत्व “यस्माद्विष्टम्भितं सन्तस्य शक्ता महात्मनः । तस्मात् प्रोच्यते विष्णु शेरा तोः प्रवेश नात १) वामन पुराण ९४. ३१ (9) 2. 3) 2. 2, 22.________________
१५०९ श्रीमद्र हस्यत्रयसारे (३) “देवं शार्ङ्गधरं विष्णुं ये यणम् । न तेषां यम सालोक्यं न च ते ऎन्नु वैष्णव नामनादि पुराण मान श्रुतियिल् शूल्लुगिरपडिये प्रसन्नाः परा नरकसः, पाशुरङ्गळुकु मूल यम विषयगमन ऎम्ब विष्णु धम्म श्लोकवु इल्लि अनुसन्धेयवु ; धरणीधर - वराहाव तारियागि भूमियन्नु तन्न कोरॆदाडॆयिन्द धरिसिदवने, अच्युत नाशरहितने, अथवाशरणागतनन्नु कैबिडुवदिल्लवॆम्ब सत्यसदिन्द जारदिरुववने, शङ्खचक्रगळन्नु कैयल्लुळ्ळवने, शरणम्भव-रक्षक नाग अथवा सिद्योपायनागु, इति-ऎम्बदागि, ये - यारु, ईर य-हेळुत्तारॆ, इदरिन्द उक्तिनिष्ठारूप शरणागतियु हेळल्प ट्टितु अपार्पा - पापगळिल्लदिरुव, र्ता - अन्थावरन्नु, दूर तरेण - तुम्बा दूरदल्ले, भट . ओ दूतने, त्यज - बिट्टु बिडु. अवर हत्तिर होगबेड. इदरिन्द नरकपतनादि यमशिक्षॆयु शरणॆ गतियन्ननुष्टिसिदवरिगिल्लवॆम्ब भाववु.
(३) देवं लीलासक्तनाद, शार्ङ्गधरं- शार्ङ्गवॆम्ब धनस्सन्नु धरिसिद, विष्णुं - श्री महाविष्णुवन्नु, ये - यारु परायणं - उपायोपेयवागि, प्रपन्नाः - शरणागति मूलक आश्रयिसुत्तारॆ, तेषाम् अन्थावरिगॆ, यमसालोक्यं - मलोकवासवु, न. इल्लवु, ते - अवरुगळु, न च नरकसः- नरकवासिगळू अल्लवु, ऎन्नु - ऎम्बुदागि वैष्णव, वामन मॊदलाद पुराणगळल्लिरुव पाशुरळु क्कु - मेलॆ उदाहरिसिद श्लोकगळिगॆ मूलमान - मूलाधारवाद, श्रुतियिल् - श्रुतियल्लि, कॊल्लु गिरपडिये हेळिरुव हागॆ, यम विषयगमन मक्कॆ - यमलोकवन्नु कुरितु होगुवदिल्लदॆ, वेलिट्टु पाय वेण्डु मदु - कुन्तायुध धरिसि छेदिसतक्कद्दु, मुळ्ळिट्टु पार्ट् न्नु कळि युम् - मुळ्ळन्नु चुच्चुवदरिन्दहोगबहुदु, ऎरकणिक्किलॆ- ऎम्ब लोकदगादॆगनुसारवागि, कार्ण- ऒन्दु कण्णिल्लदवनु, खंर्ज- (३) नाम, पु. ९४, ४३________________
अपराधपरिहाराधिकार मन्रिक्कॆ, वेलिट्टु प्पाय वेण्डुमदु मुच्चिट्टु पायुन्नु कळियुमॆर कणक्किले कार्ण खंर्ज ऎन्नु मुदलाग वोदुगिर विष्णु उपशमुखत्ताले शिकैयरक्कु विरुगगळ्ळि मुन्निट्टु सर्वॆश्वर, क्षमा प्रेमदया वात्सल्य जिळाले तणिन्न प्रतापयुडैयनाय, मिगवु दणि वेणु म अपराधत्तु कु सेव्यनान सारभौम नडैयाळ क्यारर्, अन्तःपुर परिजन, कूनर्, कुरळ, कुमारर गल् विषयल् अपराधळुक्कीडागवु, अन्तरङ्गत्यादि मॊदलाद ऒन्दु कालिल्लद कुण्टनु, ऎन्नुमुदलाग - ऎम्बुवदे ओदुगिर - श्रुतियल्लि हेळिरुव, इष्टु उपशमुखत्तालॆ - इन्तह दुःखगळ मूलकवागि, शिक्षॆयरन्नु विरुगग - हॊत्त लॆवॆल्ला तीरुव मार्गगळन्नु, मुन्निट्टु पुरस्करिसि, सरेश्वरनु क्षमाप्रेमदया वात्सल्यगळिन्द, तणिन प्रतापयु यनाय्- शान्तवाद प्रतापवुळ्ळवनागि, प्रतापव्यावुदॆन्दरॆ, हॆच्च अपराधगळिगॆ अदक्कॆ सरियाद हॆच्चदण्डनॆ माडबेकॆम्ब प्रतापवु मिगवु दण्डिक्क अपराधत्तु क्कु - हॆच्चागि शिक्षिसबेकाद अप राधक्कॆ सरेश्वरनु अल्पदण्डनॆयन्नु कॊट्ट आश्रितनन्नु रक्षिसिबिडु वनु ऎम्बुवदक्कॆ ऒन्दु लौकिक दृष्टान्तवन्नु कॊडुत्तारॆ. सेवॆ नान . सेविसलु योग्यनाद, सार भौमन - चक्रवर्तिय, अडै याळक्कारर् - छत्रचामारादिगळन्नु हिडियुव आळुगळू, अन्त- पुर परिजनं - अन्तःपुरद पट्ट महिषिगळिगॆ दासी जनरु, कून- गूनुळ्ळ कुब्बरु, कुरुळर् , वामनरु, कुळ्ळरु, कुमारगळ् - स्वतपुत्ररुगळु, विषयल् - इवरुगळ विषयदल्लि, अपराध ळुक्कीडागवु म् अवरुगळु माडिद अपराधगळिगॆ अनुगुण वागियू, अन्तरङ्गत्यादि तारतम्यत्तु क्कीडागवुम्-विश्वासव मॊदलादवुगळल्लिन तरतम भेदक्कनुगुणवागि, आदिशब्ददिन्द देहानु बन्धित्ववु हेळल्पट्टितु. सम्बन्धानृशंस्यादिगळालॆ प्रीतिनडक्क चॆट् दे - अवरुगळ विषयदल्लि प्रीतियिरुवदरिन्दले, अवरुगळु, तप्पिनत्तुक्कु - माडिद अपराधक्कागि, क्षमैकॊळ्ळुगैक्यागवु .________________
श्रीमद्र हस्य त्रयसारे तारतम्यत्तु क्रीडागवुन, सम्बन्धानृशंसादिगळालॆ प्रीतिन डच् देयवगळ तप्पिनत्तुक्कु क्षमै कॊळुगैक्काग वुम, मेलॆक्कुव शिक्षॆयागैक्कागवु, मुखं कॊडा देयिरुत्तल्, तम्मयिट्ट डिल्, तळुविल्, वाशलिलॆ तगॆ विल् शिरुदुनाळ सेवॆम्मॆ, निलडुदल्, कॆयु मा पोलॆ, काकासुरन्यायत्तालॆ ऒरुकण्णळिवाले इन्साश्रितरॆ रक्षित्तु विडु, क्षमिसिदहागॆ आगुवदक्कागियू, मेलैक्कु शिक्षॆयागैयाक्कु वु - मुन्दॆ हागॆ अपराधगळन्नु माडदिरुवदक्कागि स्वल्प शिक्षॆ यागिरुवदक्कागियू, मुखद कॊडादेयिरुत्तल् - मुख रन्नु कॊडदे इरुवदागलि, शम्मटॆयिडिल् - चाटियिन्द हॊडिसि यागलि, तळ्ळु नित्तल् - कुत्तिगॆगॆ कै हाकि दब्बिसियागलि, वाशलिलॆ तगैवित्तल् - बागिलन्नु हाकिसियॆयागलि, शिरुदुनाळ् सेवॆय्य निलक्किविडुवल्-कॆलवु दिनगळु अवरु तनिगॆ सेवॆ माडद हागॆ तप्पिसि यागलि, कैयु मालॆ - माडुवहागॆ, काकासुर न्याय ताले - काकासुरनन्नु श्रीरामनु दण्डिसिद तॆरदि, ओरुकण्णिळि वालॆ - ऒन्दु कण्णन्नु नाशमाडिद हागॆ ऎन्दु ऒन्दु अर्थवु, यावुदादरू ऒन्दु लघुशिक्षॆय मूलक ऎन्दु इन्नॊन्दर व, इद्दा श्रितरै - ई भरन्यासमाडि सश्वेश्वरनन्नु आश्रयिसिदवरन्नु रक्षित्तु निडुम् - रक्षिसिबिडुवनु. इदक्कॆ करपदवु सर्वॆश्वर्र ऎन्दु हिन्दॆ इरुत्तदॆ ई वाक्य तात्सरवेनॆन्दरॆ, आ पतालव्यावुदू इल्ल. दिरुव समयदल्लि बुद्धि पूरैकपराध माडि, प्रारब्धकद प्राबल्य दिन्द प्रायश्चित्त माडिकॊळ्ळदॆ मैमरॆतिद्दनादरॆ, आगलू कूड ई त निगॆ मुक्तिय विषयदल्लि एनू तॊन्दरॆ इरुवदिल्लवु ऎन्दु उपदेशिसु वदक्कागि इन्साश्रितरॆ रक्षित्तु निडुम, सत्वश्वरनु रक्षिसि बिडु वनु ऎन्दु हेळिदरु, पुनर्जन्मविल्लवो अन्थावनिगॆ ऎन्दरॆ पुन र्जन्मवू इल्लवु. वैकुण्ठ लोकवल्लदॆ इतर यम लोकादिगळु कूड इल्लवॆन्दु तिळिसुरदक्कागि वैष्णव, वामन पुराणगळन्नु उदाहरिसि________________
अपराधपरिहाराधिकार रुत्तारॆ. ई पुराण वचनगळु कल्पितवल्लवु, श्रुतिय उपब्रह्मण ऎन्दु हेळिरुत्तारॆ. आ श्रुतिवाक्यगळु यावुवॆन्दरॆ, “नखलु भागवता यवविषयं गच्छन्ति, इहै वै षां केचिदु पप्लवा भवन्ति काणा भवन्ति, खञ्जा भवन्ति अविधेय भारा (पुत्रा) भवन्ति” इत्यादिगळु, “ भागवतरु यमलोकवन्नु कुरितु ऎन्दिगू होगुवदिल्लवष्टे, ई लोकदल्लेने केशगळन्नु हॊन्दुवरु, हेगॆन्दरॆ :- ऒन्दु कण्णिल्लदवरागि आगुवरु, कुण्टरागि आगुवरु, विधेयरल्लद भारापुत्ररुळ्ळवरागुवरु” ऎम्बुवदु ई श्रुतिवाक्यगळ भिप्रायवु. नरकादि इतर लोकगळ प्राप्तियिल्लदिद्दरू ई बुद्धि पूराघगळिगॆ शिक्षॆयुण्टॆम्बुवदु ई मेलिन श्रुतिवाक्यगळिन्दले सिद्धवु. इदैव ऎन्दु श्रुतिवाक्यदल्लि एवकारविरुवदरिन्द ई लोक दल्ले ई जन्मवॆत्तिरुवागले मरणक्कॆ मुञ्चितवागि ई उपकेशगळु प्राप्तवागुत्तवॆन्दु कण्ठक्तवागि हेळुवदक्कागिये इल्लि अव धारणविरुत्तदॆ. पुनर्जन्मवु ई शरणागतनिगिल्लवॆम्बुवरु इदरिन्द तोरिबरुत्तदॆ. ई श्रुत्य भिप्रायवन्ने स्वामियवरु “कार्ण खंर्ज ऎन्नु मुदलाग वोदुगिर निण्णु उपकेशमुख तालॆ” ऎम्बुवदरिन्द व्यक्तपडिसिरुत्तारॆ. इन्तह अल्प दण्डनॆगळु हेगॆ तोरिबरुत्तवॆम्बुवदक्कॆ ऒन्दु लोकोक्तियन्नु पयोगिसिरु तारॆ :- वेलिट्टु पायवेण्डुमदु मुट्ट पायन्नु कळि युम.” सश्वरन कृपॆयिद्दुदादरॆ निशितायुधदिन्द परिहरिस तक्कद्दु मुळ्ळिनिन्द परिहारवागुत्तदॆ ऎम्ब तात्परवु. शरणागत नल्लदिद्दरॆ कूरदण्डनॆ विधिसुव सन्दर्भदल्लि, शरणागतनागि तन्नन नादुदरिन्द अल्पदण्डनॆ कॊट्टु रक्षिसुवनु. हीगॆ ऎरडु विधवाद न्याय तीरु, ऎल्लरन्नू समवागि नोडुव साम्यवॆम्ब गुणवुळ सश्वेश्वरनिगॆ युक्तवो ? ऎन्दरॆ भक्तरु तन्न वरागि गुणिगळादुदरिन्द अन्तह गुणिगळ विषयदल्लि तोरिद दयॆयु निन्दितवल्लवु. इन्तह नटनॆयु युक्तवादुदॆ ऎन्दु तोरडिसुवदक्कागि ऒन्दु लोक दृष्टान्तवन्नू ऒन्दु शास्त्र दृष्टान्तवन्नू उदाहरिसुत्तारॆ. एनॆन्द बहु जनगळिन्द उपचरिसल्पडुव ऒब्ब चक्रवर्तियु इद्दानॆन्दु ऊहि सोण. आदुदरिन्दले सेवनान चक्रवर्ति ऎन्दु प्रयोगिसिरु________________
१५१३ श्रीमद्रहस्यत्रयसारे त्तारॆ. आतन कैकॆळगॆ आतनिगॆ नानाविध कैरगळन्नु माडुव आळुगळु आतन पट्ट महिषिगॆ उपचरिसुव दासि जनवू, इन्नू कुब्बरु नाम नरु राजकुमाररु मॊदलादवरॆल्ला इरुत्तारॆ. इवरुगळु बुद्दिवू र्वकवागि अपराधगळन्नु माडिदुदादरॆ, अवरुगळु तनगॆ प्रीतिपात्र रादुदरिन्द अवरन्नु दण्डिसलु राजनिगॆ मनस्सिल्लदॆ क्षमिसबिडबेकॆम्ब इष्टवू इरुत्तदॆ. आदरॆ यावुदॊन्दु दण्डनॆयू इल्लदॆ बिट्टु बिट्टरॆ पुनःपुनः आपराधगळन्नु माडबहुदु. आदुदरिन्द अवरल्लि तनगिरुव विश्वासानुगुणवागि क्षमिसिदहागू इरबेकु, शिक्षिसिद हागू इरबेकु. अदक्कागि आ चक्रवरियु लघुदण्डनॆयन्नु विधिसुवनु. हीगॆ आतनु गुरुदण्डनॆयन्नु विधिसुव स्थळदल्लि लघु दण्डनॆयन्नु विधिसुवदु न्यायवो ऎन्दरॆ सम्बन्धानृशंस्यादि प्रयुक्तवाद प्रीतिय काव्यवादुदरिन्द एनॊन्दु विरुद्धवादुदल्ल वॆम्ब भाववु. आ लघुदण्डनॆगळु ऎन्थाद्दॆन्दरॆ :- मुखवन्नॆत्ति नोडदॆयू, मुखकॊट्टु मातनाडदॆ इरवदू, चाटियिन्द हॊडॆयुवदू, कोपदिन्द कत्तु हिडिदु दब्बिसिबिडुवदू, बागिलिन आचॆगॆ इडुवदू, कॆलवु दिनगळु आतनु माडुत्तिद्द उपचारदिन्द तप्पिसिबिडुवदू, इवे मॊदलाद अल्पदण्डनॆगळन्नु विधिसि अनन्तर मॊदलु इद्द स्थितियल्लि इट्टु कापाडुवनु. अदर हागॆये प्रप इनु बुद्धिपूापराध माडिदुदादरॆ, सत्येश्वरन कूड हागॆये मेलॆ हेळिद रीतियल्लि ई जन्मदल्ले लघुदण्डनॆयन्नु विधिसि देहा वसानानन्तर मुक्तियन्नित्तु रक्षिसुवनु. हागादरॆ हागॆ स श्वरनु लघुदण्डनॆयन्नु कॊट्ट शास्त्रदृष्टान्तवु इतिहासगळल्लेना दरू उण्टो ऎन्दरॆ काकासुरवृत्तान्त उण्टॆन्दु तिळिसुत्तारॆ. सीतॆय तॊडॆयल्लि श्रीरामनु तलॆयन्निट्टु निद्रॆ माडुत्तिरुवागले इन्द्र पुत्रनाद काकासुरनु बन्दु सीतॆय स्तनवन्नु चुच्चि बहु व्यथॆयन्नुण्टुमाडिदुदन्नु श्रीरामनु कण्डु, बहु कोपगॊण्ड ऒन्दु दरवन्न भिमन्त्रिसि ब्रह्मास्त्रवागि बिडलु, अस्त्रवु ई काकनन्नु अट्टिसिकॊण्डु होगलु, आग आ काकनु “चण्डाळ पक्षिणां काकः, ऎन्दिरुवदरिन्द गृहाङ्गणकॆ कूड आतनन्नु सेरिसदॆ, ऎल्लरिन्दलू परित्यक्तनादनु. आग बन्दु “ तमेव शरणङ्गतः” आ श्रीराम नन्न शरण हॊन्दिदनु. ई अपराधवु महत्तागिद्दरू,________________
अपराध परिहाराधिकार (११४ “सतं निपतितं भूं शरण्यश्यरणागतम् । वधार्हमसि काकुत्सः कृपया पठ्यपालयत् (रा. सुं, ३८, ३४, ३५) आतनु यावाग भूमियल्लि दण्डवत्पणाम माडि बिद्दनो, आग आ कृपामहोदधियाद श्रीरामनु आतनन्नु मन्निसि रक्षिसिदनु. हेगॆ रक्षिसिदनॆन्दरॆ अल्प दण्डनॆयन्नु कॊट्टु कापाडिदनु. “दत्वा स दक्षिणं नेत्रं प्राणेभ्य- परिरक्षितः” आ ब्रह्मास्त्रक्कॆ आ काकन बलकण्णन्नु आहुतिकॊट्टु रक्षिसल्पट्टनॆम्ब वृत्तान्तविरुत्तदॆ. इन्तह लघुदण्डनॆयु युक्तवादुदे ऎम्बुवदन्नु ऒन्दु लोक दृष्टान्तद मूलकवागियू ऒन्दु शास्त्रदृष्टान्तमूलकवागियू स्थापिसिरुत्तारॆ. आदुदरिन्द प्रपन्ननिगॆ बुद्धिपूरा घदिन्द मोक्ष प्राप्तिगॆ विघातविल्लवु. देहावसानदल्ले मोक्षप्राप्तियुण्टु. आदरॆ जीवमान कालदल्ले लघुदण्डनॆयन्ननुभविसलेबेकु. आदरॆ मनः पूरैकवाद शोकदिन्द कूडिद प्रायश्चित्तरूप शरणागतियन्ननु ष्टिसुवदरिन्द ई लघुदण्डनॆयन्नू कूड कळॆदुकॊळ्ळबहुदु ऎन्दू, हागॆ प्रायश्चित्तरूप शरणागतियन्ननुष्ठिसदिद्दरॆ, ई लघुदण्ड नॆयु तप्पिद्दल्लवॆन्दू, ईग उपदेशिसल्पट्टितु. आदरॆ श्रुतियल्लि “ आनन्दं ब्रह्मणो विर्द्या न बिभेति कुतन” (तै आ, ९) ऎन्दु याव भयवू इल्लवॆन्दु हेळिरुवदरिन्द अबुद्धि पूरैक बुद्धि पूरैक पापगळ भयवू इल्लवॆम्ब भाव तोरिबरुत्तदल्ला? हागॆये * अहन्त्वा सर् पापेभो मोक्षयिष्यामि” ऎम्बल्लि सत्व पापेभ्यतॆ ऎम्बुवदरिन्द बुद्धि पूराघदिन्दलू बिडिसुवॆनु ऎन्दु हेळिदन्तागुवुदिल्लवे ? विष्णु पुराणदल्लि यमनु तन्न भटनिगॆ हेळुव सन्दरदल्लि, “ हृदियदि भगवाननादि रास्तॆ हरिरसि शङ्खगदा धरो व्ययात्मातद घमघ निघात कर भिन्नं भवति कथं सति चान्धकार वरे” यावन हृदयदल्लि अनादियादशङ्ख चक्रादि दिव्यायुधगळन्नु धरिसिद भगवन्तनु इद्दानो, अन्ता वन ऎल्ला पापगळु, पापविनाशकरनाद सद्देश्वरनिन्द नाशगॊळिसल्प डुत्तवॆ. सूरनिरुवाग अन्धकारवु हेगिरलारदो हागॆ याव पापगळू इरलारवु” ऎन्दु हेळल्पट्टिरुत्तदॆ. आदुदरिन्द बुद्दि पूराघवु ताने हेगॆ इद्दीतु ? हागॆये नम्माळ्वारवर (७.१०८)________________
श्रीमद्रहस्यत्रयसारे बुद्धि पूरा स्यापि क्षमा विषयत्व मित्यभि युक्तः तात्सर इप्पडि मृदु प्रकृतिगळ क्षमैकॊळ्ळ हण्णु वित्तल्, कठिन
- अनि मत्तॊ निर्ल शरणेय नकलिरु मॊय गैर्यिनाय् ” ऎम्ब पाशुरदल्लि गजेन्द्र शरणागति माहात्मयन्नु तिळिसुव सन्दर्भदल्लि, “तीविनैयुळ्ळर्ति शाद्वल्लवे” ऎम्बल्लियू पापगळ सम्बन्धवे इरुवदिल्लवॆम्बप्राय तोरिबरुवदरिन्द बुद्धि पूराघद भयवू प्रपन्ननिगिरुवदिल्लवॆम्बभिप्रायवन्नु कॆलवु व्याख्यातृगळु व्यक्तपडिसुत्तारॆ. ऒब्ब व्याख्यातृवु “ प्रामादिकत्तु क्क निक्के बुद्धि पूर्व कमाग प्पज्ञॆ नदुक्कुव आञ्जनेण्डादपडियायि रुक्कु “ तेजस्तिविरळुक्कु सहाव स्थानमुण्डो ? ” अर्व (सर्वॆश्वर्र) वन्नु हृदयत्तिलॆ नित्यवासं पण्ण, तीवि ऒदु निड मुहो” ऎन्दु केळिरुत्तारॆ. न्य इन्तह पूरैपक्षक्कॆ समाधानवन्नु “इप्पडि” ऎम्ब मुन्दिन वाक्यदिन्द हेळुववरागि ई नम्माळ्वारवर व्याख्यातृगळ अभिप्राय वेनॆम्बुवदन्नु तिळिसुत्तारॆ. बुद्धिपूर्वाघवन्नू क्षमिसिबिडुवनु ऎम्बुवदन्नु ऎल्लरू ऒप्पतक्कद्दु. अल्प दण्डनॆ मूलक रक्षिसुवदू क्षमागुण माहात्मवे विना बेरॆयल्लव ऎन्दु भाविसतक्कद्दु. बुद्धि पूर्वाघ सन्दर्भदल्लू क्षमॆय उण्टु, रक्षणॆयू उण्टॆन्दु तिळि सुत्तारॆ. आदरॆ प्रायश्चित्तविल्लद सन्दर्भदल्लि अल्प दण्डनॆयमूलक क्षमिसि रक्षिसुत्तारॆन्दुपदेशिसुत्तारॆ बुद्धि पूर्वाघवू ईश्व रक्षमा विषयवॆम्बुव दे अभियुक्तरुक्तिय तात्सरवु. इप्पडि - हीगॆ, हिन्दॆ बुद्धिपूर्वाघद विषयदल्लि हेळिद हागॆ ऎम्बर्थवु, मृदुप्रकृतिग - सत्वगुणाविष्टरादवरन्नु, क्षमॆ कॊळ्ळु हण्णु दल् - क्षमिसबेकॆन्दु प्रार्थिसुव हागॆ माडि पुनः हॆण्णुदल् प्रायश्चित्त शरणागतियन्ननुष्टिसुव हागॆ माडियागलि, अथवा________________
(२२) अपराधपरिहाराधिकार प्रकृतिगळुक्कु शिक्षा रूपमान दण्डविशेषं हण्णु दल् कॆळगिरविडनुम् पूर प्रपत्ति फलमान कमैर्यि प्रकार भेदनन्नु शिक्षकनान शेषि पक्कलिले कृतज्ञतॆ नडक्काग बुद्धि पूत राघयुं क्षमिक्कु मॆनु शिलर् तॊन्ना गळ्. कठिन प्रकृतिगळुक्कु - स्वल्प राजस तामस स्वभाववुळ्ळवरादुदरिन्द प्रायश्चित्तवन्नु माडिकॊळ्ळदवरिगॆ, शिक्षा रूपमान दण्डविशे मम हण्णुदल् - खञ्जा भवन्ति, काणा भवन्ति, अविधेयभारा पुत्रा भवन्ति, इन्तह दण्डविशेषवन्नु शिक्षॆयागि विधिसियागलि, इवु गळेनू अन्तह दण्डवल्लवु. आदरू अल्प शिक्षॆयिल्लदॆ रक्षिसकूडदॆम्ब बागि, हॆच्चाद अपराधविद्दरू क्षमॆयिन्द सहिसिकॊण्डु अल्पदण्डनॆ यादुदरिन्द इल्लि दण्ड विशेषवॆम्ब प्रयोगव ; शॆयगिरविड मु- हीगॆल्ला माडुवदु, पूर्व प्रपत्ति फलमान-मॊदलु आ नुष्ठिसिद प्रपदनद फलरूपवाद, क्षमैर्यि प्रकारभेदवॆन्नु सत्येश्वरन क्षमॆयतारतम्य भावगळागुवदरिन्द, शिक्षकनान मार्ग तप्पिदर दण्डिसुव, शेषि पक्कलिले - शेषियन्नु कुरितु, कृतज्ञतॆ नद काग-कृतज्ञताभाववु यावागलू इरुवदक्कागि, बुद्धि पूरै कवागि माडिद उत्तराघवन्नू कूड, क्षमिक्कुम् - सत्वश्वरनु रक्षिसुवनॆन्दु, शिलर् ई नम्माळ्वार् सूक्तिगळ व्याख्यातृगळाद कॆल वरु, शूस्टार् गळ्-हेळिदरु. बुद्धि पूरापराधवन्नु प्रप नन्तर माडिदरॆ, मृदु प्रकृति यागि शोकिसि प्रायश्चित्तवन्नु माडिकॊण्डरॆ अदन्नू क्षमिसि श्रीय पतियु रक्षिसुवनु. हागल्लदॆ करिण प्रकृतियागि प्रायश्चित्त माडिकॊळ्ळ दिद्दरॆ आतनु प्रपन्ननागि शरणागतियन्ननुष्ठिसिरुवदरिन्द, आतनल्लि ममतॆयन्नॆ तोरि आतन अपराधगळिगॆ सरियाद कूरदण्डनॆगळन्नु विधिसदॆ क्षमिसि, अल्प दण्डनॆ मूलक रक्षिसिबिडुवनु, अन्तू इन्तह बुद्दिपूराघविद्दरू प्रपन्ननिगॆ कृपा सागरनु मोक्ष प्राप्तियन्नु ऎन्दिगू तप्पिसुवदिल्लव ई आभिप्रायवन्ने ई मेलिन पूत्व पक्ष वाक्यगळु बोधिसुत्तवे एना बुद्धि पूराघक्कॆ प्रायश्चित्तविल्लद________________
श्रीमद्रहस्यत्रयसारे
- प्रपत्तॆ- निष्पलत्व शज्ञा निरासक प्रारब्ध कम्मल् पापांशमेलॆ बुद्धि पूरोत्तराघं न बिभेति सन्दर्भदल्लि अल्पदण्डनॆयिल्लवॆन्दु बोधिसुवदिल्लवु. कुतश्चन सरकेश भयवू इल्लवागुत्तदॆ” ऎन्दु हेळिदुदरिन्द परब्रह्मपासनदिन्द परब्रह्मप्राप्तिगॆ विरोधवाद सत्वक्षेश भयवू तॊलगुत्तवॆ ऎम्बरवु. हागॆये “ सत्व पापेभो मोक्ष फ्यामि” ऎम्बुवदर मुख्याभिप्रायवु, सत्व पापनिवृत्ति मूलक वागि निस्सन्देहवागि मोक्षप्राप्तियन्नुण्टुमाडुवॆनु ऎम्बुवदु बुद्धिवूत्तराघद निवृत्तिय कूड उण्टे उण्टु. प्रायश्चित्त माडिकॊण्डरॆ तक्ष्मणवे उण्टु. माडिकॊळ्ळदिद्दरॆ अल्प शिक्षानुभव दिन्द निवृत्तियु. ऎल्लवू क्षमाफलवे. हीगॆ अल्प दण्डनॆयिन्द निवृत्ति ऎन्दु हेळदॆ बुद्धि पूराघवू सम्बन्धिसुवदे इल्ल ऎन्दरॆ, मनःपूत्विकवागि इतरर मनॆयल्लि कद्दु प्रपन्ननु द्रव्यार्जनॆयन्नु माडबहुदु, प्रपदन माडिरुवदरिन्द भयविल्लॆन्दु हेळिदन्तागु तदॆ. अनन्तर इतरर मनॆय द्रव्यवन्नु कदियबेकॆम्बुवनु शीघ्र दल्लि शरणागतियन्नु माडिबिट्टु कदियबेकु; एकॆन्दरॆ आ पापवु आग सम्भविसुवदिल्लव; इन्तह परिहासक्कॆल्ला कारणवागुत्तदॆ. ई विषयवन्नु श्रीमदाचाररवरु मुन्दॆ चरमश्लोकदल्लि “इष्ट नक्कॆ बुद्धि पूत राघुम् ईश्वरनु क्कु भोग्य माम् ऎन्नुविवक्षितवागिल्, प्रपन्ननुक्किदुवे यथाशक्ति सम्पाद्यनाम” ऎन्दु तिळिसिरुत्तारॆ. शिलर् कनार्गल् ऎम्बु वदरिन्द हीगॆल्ला परिहासक्कॆ ऒळगागबेकागुवदरिन्द कॆलवरल्लि प्राय हागॆये विना, तम्मभिप्राय हागल्लवॆम्ब भाववू तोरि बरुत्तदॆ. आदरॆ भरन्यासानन्तर माडुव बुद्धिपूापराधक्कॆ प्राय श्चित्तविल्लद सन्दर्भदल्लि दण्डनॆयुण्टु ऎन्दु ऒप्पिकॊण्डरॆ, ई बुद्दि पूरापराधवु ऒन्दु वेळॆ प्रबलवादुदादरॆ, मोक्षप्राप्तिगॆ विघात उण्टागलारदॆ ? ऎन्दरॆ, “ प्रारब्धकरल्ल ” ऎन्दु प्रारम्भिसिद________________
अपराधपरिहाराधिकार १५१८ पायश्चिम् पण्णाद पोदु सफलमानालु, हण्णिन प्रपत्ति मोक्षं कॊडादॊळियुनोवॆनुशवॊण्णादु मुन्दिन वाक्यदिन्द मोक्षप्राप्तिगॆ ऎन्दिगू सन्देहविल्लवॆन्दु पदे शिसुत्तारॆ :– बुद्धि पूर्वाघदल्लि प्रपत्तियु ऎन्दिगू निष्पल वागुवदिल्लवु प्रारब्ध कर्मल् - प्रारब्धकरदल्लिन, पापांशलॆ - सुकृतभागवल्लदॆ, पापभाग दहागॆ, बुद्दि पूर्वोत्तराघं - बुद्धि पूत्विकवागि माडिद उत्तरापराधवु, प्रायश्चित्त सण्णाद दु-प्रायश्चित्तवन्नु पुनश्चरणागति मूलक माडिकॊळ्ळदिद्दरॆ, सफल मानालुम् - अदर फलवन्नुण्टुमाडिदरू ऎन्दरॆ सत्येश्वरनु क्षमापूरैक अल्प शिक्षा प्राप्तियन्नु 1टु माडिदरू ऎम्बरवु, हण्णि नप्रपत्ति - ई मोक्षार्थियु पूत्वदल्लि अनुष्ठिसिद प्रपत्तियु, मोक्षं कॊडादॊळियुनो ऎल्लियादरू मोक्षप्राप्ति, यन्नुण्टुमाडदॆ इद्दितो, ऎन्नु शङ्किक वॊण्णादु - ऎन्दु संशय बेकिल्लवु. यावाग शरणागतियन्ननुष्ठिसिदनो आग सत्य सज्जल्पनाद शरणनु देहावसानदल्लि मोक्षवन्नु कॊडुवदागि अभयवन्नित्तिरुवनु. इदक्कॆ ऎन्दिगू च्युतियिल्लवॆम्बरवु, “रामो द्विरा भि भाषते” श्रीरामनु ऎन्दिगू ऎरडु विधवागि माताडुव दिल्लवु. आडिद मातिगॆ विरोधविल्लवु. माडुत्तेनॆन्दु हेळिद वाक्य वन्नु हेगादरू माडि नडॆसिकॊडुवनु. इदक्कॆ निदर्शनवागि, अब्बि न तेरिथ न जिथराक्षसेन्द्रं नैवास्यजज्जिद यदा च बलाबलन्त्वं निस्संशयस्सपदि तस्य पदेभ्यषिञ्चः तस्यानुजं कथमिदं हि विभीषणं च॥ (अतिमानुषस्तव) ओ श्रीरामने नीनु अब्बिन्नतेरथ - समुद्रवन्नु इन्नू दाटलू इल्लवु, अदक्कॆ प्रयत्नवू इल्लवु, न जिगूथ राक्षसेन्द्रं - रावण________________
१५१९ श्रीमद्र हस्कृतयसारे नन्नु कॊल्ललिल्लवु, नैवास्य जज्जिह यदा च बलाबलन्त्वम् इन्नू शत्रुविन बलाबलगळ विचारवन्नु माडलिल्लव एषणवन्नु अभिषेक नडॆयबेकल्लवे ऎम्ब कॊन्द नन्तर बेगने निस्संशयप्प पदि तन्न पदे अभ्रषिञ्चः तस्मानुजम् आ स्थानदल्लि निस्संशयवागि, बेगनॆ आ रावणन तम्म नाद माडिरुत्तीये, अनन्तर इदु हेगादरू आतङ्कवुळ्ळवनागि, रावणादि सत्व राक्षसरन्नू पुनः विभीषणनिगॆ पट्टाभिषेकवन्नु नडॆसि,
- अभिषिच्य च लङ्कायां राक्षसेन्द्रं निभीषणं ! कृत कृत्यस्तद रामो विज्वरः प्रमुमोदह शरणागतन कोरिकॆयन्नु इन्नू नडिसलिल्लवे ऎम्ब परितापदिन्द बिडुगडॆयन्नु हॊन्दिदवनागि, तानु ईगल्लवे कृतकृत्यनादॆनु ऎन्दु तुम्बा आनन्दवन्नु हॊन्दिदनु ऎन्दु महर्षियु वरिसि तारॆ. आदुदरिन्द सत्यसनु तानाडिद मातन्नु ऎन्दिगू नड सदे इरनु, आदुदरिन्दले शणवॊण्णादु - ऎन्दुपदेशि सिरुत्तारॆ. हागॆये श्री पामभक्तराद श्रीभरताळ्वारवरु तमगॆ इर वागिरुव लोकापवादवन्नु परिहरिसुवदक्कागि अयोध्यॆगॆ बन्दु पट्टाभिषिक्तरागबेकॆन्दु बहुविधवागि याचिसिदरू, हागॆ माडलि ल्लवे ऎम्ब परितापपीडितरागि हेळुत्तारॆ :- *मां निवर्त शिरसा याचतो तुं योस् चित्रकूट मुसागत यस्य वचनं नकृतं मया " (रा, यु, १२४, १९) तलॆ बागि बेडिदवन मातन्नु नडॆसलिल्लवॆ, आदुदरिन्द “ तन्तु मे भातरं द्रष्टुं भरतं त्वरते मनः” “आदुदरिन्द मॊदलु आ भरतनन्नु होगि नोडबेकॆम्ब मनस्सु नन्नन्नु तरॆगॊळिसुत्तदॆ. ऎन्दु हेळि, ऒडनॆ अयोध्यॆगॆ होगि आतन कोरिकॆयन्नु नडिसि कॊट्टिरुत्तारॆ. हीगॆ भक्ताभीष्ट्यवन्नु यावाग नडॆसिकॊडुवॆनो ऎम्ब त्वरॆयुळ्ळवनु सत्येश्वरनादुदरिन्द शरणागतियन्ननुष्टिसि प्रपन्ननादवनिगॆ मोक्षप्राप्ति विषयदल्लि शब्बवॊण्णादु ऎन्दु हेळिरुत्तारॆ.________________
अपराध परिहाराधिकार पॆरुज्जायं वृत्त मरळुक्कु स्वलादि विशेषज्ञळाले वाट्टित्तु क्कु कालतारतम्य मुळ्ळ मात्रम् ; इट्टु मिवर् ई मेलिन वाक्यदल्लि प्रारब्धकल् पापांशवु अदर फल वन्नु कॊडुत्तदॆ ऎन्दु हेळल्पट्टिरुवदरिन्द पुण्यांशवु फलदायक वल्लवॆन्दु तोरिबरुत्तदॆ. हागॆये बुद्धि पूर क पुण्यांशवू कूड फलदायकवल्लवॆम्बुवदन्नू ग्रहिसबहुदु. इदु एतक्कॆन्दरॆ प्रसन्न नादवनिगॆ वैराग्यविरुवदरिन्द नश्वरवाद तुच्छवाद सुखभोग गळल्लि अभिलाषॆयिल्लवु. मॊदलु एनो दुराशॆयिन्द राजनन्न नु वरिसि ऒन्दु ग्रामवन्नु पडॆयबेकॆन्दु आतनन्नु आश्रयिसिदरू, आ आश्रयवु मुन्दॆ फलकॊडुव कालदल्लि आ ग्रामवु तनगॆ बेकिल्ल वॆन्दु हेळि आ काम्यफलदिन्द हेगॆ तप्पिसिकॊळ्ळबहुदो हागॆ ऎम्ब भाववु. इदु उपासन विद्यानिष्कनिगू शरणागतिनिष्ठनिगू साधा रणवाद विषयवु. प्रारब्धकद पापांशवु हागल्लवु ; करद फलवु ननगॆ बेडवॆन्दरू बिडतक्कद्दल्लवु. अदर फलवन्ननुभविसले बेकु. इदु हेगो, हागॆये बुद्दिपूराघवू कूड प्राय श्चितविल्लद दॆशॆयल्लि अदर फलवन्नु कॊडदे इरदु ऎन्दु हेळल्प ट्टितु. इन्तह पापगळ फलानुभववन्नु माडलेबेकॆन्दु हेळ ल्पट्टितु प्रारब्धकद पापांशवू, प्रायश्चित्तविल्लद बुद्धि पूरकवाद उत्तराघवू, इवॆरडर फलवन्नु प्रपन्ननू अनुभवि सिये तीरबेकु, आदरॆ मॊदलु प्रपत्तियन्नु अनुष्टिसुव कालदल्लि प्रारब करद द पापांशवू कळॆयबेकॆन्दु प्रार्थिसिदरॆ अदू निवा रणवागुत्तित्तु ऎन्दु तिळियतक्कद्दु. ई ऎरडु विधवाद पापफलानु भवगळु ई जन्मदल्ले देहावसानद ऒळगे विना पुनर्जन्मविल्लव, देहावसानवाद ऒडनॆये मोक्षप्राप्तियु ऎम्बुवदु तात्सरवु. मुख ई अभिप्रायवन्नॆ मुन्दिन वाक्यगळिन्दलू सदृष्टानवागि समरनॆ माडुत्तारॆ :- पॆरायं वृत्त हिङ्गन्नु इट्ट मरळुक्कु - मरगळिगॆ, मरगळिगॆ, स्थलादि विशेषङ्गळालॆ भूमिय________________
श्री मद्रहस्य त्रयसारे गळि संसार नुडैय निश्लेषनिवृत्ति सिरक्कु विळम्बा विळम्ब गुणवे मॊदलाद विशेषगळिन्द. इल्लि आदिशब्ददिन्द कालविशेषवू हेळल्पट्टितु, नाट्टित्तुक्कु बाडि होगुवदक्कॆ, कालतारतम्य मुळ्ळ मात्रम् - हॆच्चु काल, कम्मिकाल उळ्ळ व्यत्यास मात्रवे मरगळ बेरिगॆ हिङ्गन्नु तगलिसिदरॆ अवु बाडिहोगुवदेनो सिद्धवु. कॆलवु देशकालगळ व्यत्यासदिन्द सावकाशवागियू, कॆलवु शीघ्र वागियू, बाडिहोगुत्तवॆ. हेगॆन्दरॆ नीरिन वसति हॆच्चाद प्रदेश वादरॆ सावकाशवागि बाडुत्तवॆ, नीरिन वसति इल्लदिद्दरॆ बेग बाडि होगुत्तवॆ. हागॆये मळॆगालवागिद्दरॆ सावकाशवागि बाडुत्तवॆ. अन्तू बाडुवदेनो निश्चयवु. हागॆये इट्टु म् - इल्लियू ऎन्दरॆ ई सन्दर्भदल्ल, इवर्गळ - ई प्रायश्चित्त माडिकॊळ्ळद बुद्धि पूरकवागि अपराधमाडिदवरु, संसार नुडैय निष * निवृत्तिसिरक्कॆक्कु संसारद सम्पूर्ण निवृत्ति हॊन्दुवदक्कॆ, विळम्बा विळम्ब वैषम्यने उळ्ळदु - ऒन्दु सन्दर्भदल्लि हॆच्चु काल विळम्बवू इन्नॊन्दु सन्दर्भदल्लि कालएळविल्लदॆयू हीगॆ व्यत्यासविरोणवु. मरद बेरिन भागक्कॆ हिङ्गिन सम्बन्ध उण्टा दरॆ मरवु ऒणगिहोगुवदु हेगॆ सिद्धवो, हागॆये ई प्रपदनव न्ननुष्ठिसिदवनिगॆ ई प्राकृतदेहव नशिसिहोगि मोक्षर्पाप्ति ऎम्बु वदु सिद्धवु ऎम्ब भाववु. आदरॆ ई प्रपन्नन प्रारब्ध पाप विशेषक्कनु गुणवागियू बुद्धिपूर्वकवागि माडिद उत्तराघक्कनुगुणवागियू एळम्बवागि मोक्षप्राप्तियुण्टागुत्तदॆ. इन्तह प्रतिबन्धकगळ ल्लदिद्दरॆ विळम्बविल्लदॆये मोक्ष प्राप्तियु सम्भविसुत्तदॆ. हेगॆन्दरॆ– बेरिगॆ हिङ्गन्निट्ट मरवे ऒळ्ळॆ जलसमृद्धियिरुव प्रदेशदल्लिद्दरॆया गलि, अथवा मळॆ हॊय्दरॆयागलि, स्वल्प कालानन्तरवे बाडिहो गुत्तवॆ. हागल्लदॆ जलसमृद्धियिल्लद प्रदेशदल्लागलि अथवा बिसिलु कालदल्लागलि अदे हिङ्गन्निट्ट मरवु इन्तह प्रतिबन्धकगळिल्लद सन्दर्भदल्लि बेगनॆ बाडिहोगुत्तदॆ. हागॆये प्रसन्नन विषय दल्लू प्रतिबन्धकगळिद्दरॆ विळम्बिसियू, हागॆ प्रतिबन्धकगळिल्लदिद्दरॆ विळम्बविल्लदॆयू देहावसान उण्टागि मोक्षप्राप्ति ऎम्ब भाववु.________________
अपराध परिहाराधिकार १५२२ वैषम्य मेयुळ्ळदु. इद्देहानन्तरं मोक्षम् पॆरनेणु नॆनपेक्षितालुम् अनियतास्सुक्कळाय विळम्बाक्षमरायि- आदरॆ आयुस्सु नियतवागिरुवाग प्रतिबन्धकगळिन्द आयुवृद्धि युण्टॆ ऎन्दरॆ, अदक्कॆ समाधानवन्नु मुन्दिन “इदेहानन्तरं” ऎम्ब वाक्यदिन्द तिळिसुत्तारॆ. अदू अल्लदॆ ईतनु शरणागतियन्ननु सुवाग “एतद्देहावसाने मां त्वत्पादं प्राप्य” ऎन्दु हेळिरुवहागॆ गोप्तत्ववरणविरुवदरिन्द आयुर्वृद्धि मूलक विळम्बताने सरियो ऎम्ब आक्षेपवू उण्टादीतु. इदक्कू सह मुन्दिन वाक्यदल्लि समाधान दॊरॆयुत्तदॆ, नियतायुस्सुगळेनो ऎल्लरू हौदु, जन्मकालदल्ले ग्रहगळ गतिगळिगनुसारवागि प्रतियॊब निगू नियतवादुदे. इदन्नु आयुष्कामेष्ट्रादिगळिन्द वृद्धि माडिकॊळ्ळबहुदॆन्दु शास्त्रवु हेळुत्तदॆ. हागॆ माडिकॊण्डरॆ अनि यतायुस्सुळ्ळवरागुत्तारॆ. हागॆये बुद्धि पूरैकवाद उत्त राघवु प्राप्तवादरू स्वामिसदिन्द पापफलानुभवक्कागि आयुर्वृद्धि युण्टागबहुदु, एकॆन्दरॆ, देहावसानदल्ले मोक्ष वन्नु कॊडबेकागिरुवदरिन्दलू, आतनिगॆ पुनर्जन्मविल्लदिरुवदरिन्दलू बुद्दिपूराघक्कॆ सरियाद शिक्षॆयन्नु अनुभविसबेकागिरुवद रिन्दलू, आयुस्सु वृद्धियागुत्तदॆ ऎम्ब भाववु. स्वामिसल्प दिन्द आयुर्वृद्धियुण्टागुववरन्नु मुन्दिन वाक्यदल्लि अनि यतास्सुक्कळा ऎन्दु हेळिरुत्तारॆ. हिन्दॆ विळम्बावि इम्बमेवुळ्ळदु ऎन्दु हेळिदुदन्ने विशदीकरिसुत्तारॆ. इद्दे हानरं मोक्षम पॆरनेण मॆनुपेक्षित्तालु - देहाव सानदल्लि मोक्षवन्नु हॊन्दबेकॆन्दु अपेक्षिसिदरू कूड विळम्बु * मरायिरुप्पार् न्नु - देहावसानद विळम्बवन्नु सहिसदवरिगॆ, अनियतायुस्सुक्कळाय् - इष्टे आयुस्सॆम्ब नियति, इल्लदिरुव रागि ऎन्दरॆ हागॆ सश्वरनिन्द सल्पिसल्पट्टवरागि, आयुवृद्धि यालॆ विळम्बं वरुम- स्वामिसल्पदिन्दले आयुस्सु वृद्धि यागि विळम्ब उण्टागुवदु, ऎन्दरॆ बुद्धि पूरैकवाद अपराधक्कागि________________
श्रीमद हस्य त्रयसारे रु स्टार् कार्युद्दियाले विळम्बवु वरव ; निय फलित्तु निडुम्. तायुस्सुक्कळुकु उळ्ळ वायुस्सुक्कुळ्ळ उळ्ळ वायुस्सुक्कु (१) भनेयं शरणं व” ऎन्न पिन्नु मुक्तान राक्षसिगळुडैय अल्पशिक्षॆयन्ननुभविसुवदक्कागि आयुर्वृद्धियू अदरिन्द विळम्बवू उण्टागुत्तवॆम्ब भाववु. विळम्ब बेडवॆन्दिरुववरिगॆ कूड शिक्षारूपवष्टे, नियतायुस्सुक्कळुक्कु - क्रिप्तवाद आयु सुळ्ळवरागिरलॆन्दु स्वामिसल्पविरुववरिगॆ नियतायुस्सुक्कु * पवाद आयुस्सिनल्लिये, फलित्तु विडम् , अल्प दण्डनॆयाद खञ्जत्व, काणत्वादिरूपफलगळुण्टागि बिडुववु. शरणागतियन्ननु ष्टिसुव कालदल्ले ई प्रपन्ननु देहावसानानन्तरवे मोक्षवण्टाग बेकॆन्दु प्रार्थिसिद्दरू कूड आयुवृद्धि विळम्बवु न्यायवो ऎम्बाक्षेप बन्दीतागि अन्तह सन्दर्भदल्लू ईतनिगॆ विळम्बवु इष्ट वल्लदुदरिन्द अदण्डनॆगागि आयुर्वृद्धियन्नुण्टुमाडुवनु. इन्नु कॆलवरिगॆ क्लिप्तवाद आयुस्सिनल्लिये ई अल्पदण्डनॆयन्ननु भविसुवहागॆ माडुवनु. ई ऎरडु सन्दर्भदल्लि मोक्षक्कॆ च्यु यिल्लवॆम्ब भाववु. इतिहास आदरॆ बुद्धिपूराघवु शरणागतिय माहात्मयिन्द एनॊन्दू दण्डनॆयिल्लदॆ क्षमिसल्पट्ट हागॆ तोरुव ऒन्दुण्टल्ला ऎन्दु श्रीमद्रामायणदिन्द ऒन्दु दृष्टान्तवन्नु उदाहरिसि, आ सन्दर्भदल्लि कूड अदण्डनारूप प्राणभय वित्तॆन्दु उपपादिसुत्तारॆ. इतिहासवु यावुदॆन्दरॆ हेळुत्तारॆ. (१) वः - राक्षस स्त्रीगळाद त्रिजटॆ मॊदलादवराद निमगॆ, शरणं - कक्षकळु, भवेयं - आगुवॆनु, ऎन्दु सीतावाक्यवु 66
ततस्सामती बाला भरुत्विजय हब्बिता । अवॊचद्यदि तत्तथ्यं भवेयं शरणं हिवः” ऎम्बुवदु पूराश्लोकवु; ततः - आ त्रिजटॆयु स्वप्न वृत्तान्तवन्नु हेळिद नन्तर, भर्तु - तन्न पतियाद श्रीरामन, विजयह (१) रा. सुं, ५८९१________________
(92) अपराध परिहाराधिकार- बुद्धि पूर्वापचार४, (२) “मर्षॆयामह दुर्बला,” 1 तम् । विजय सूचकवारॆयिन्द हर्षगॊण्डवळाद, मत्तु बालॆयाद, पतिगॆ विजयसूचक वृत्तान्तदिन्द बालॆयादुदरिन्दलू, स्त्रीमती - लज्जायुक्तळागि, तत्-आ त्रिजटा स्वप्न वृत्तान्तवु, तथ्यं यदि-निश्च यवादुदादरॆ, वः - निमगॆ, शरणं - रक्षकळु, भवयं - आगुवॆ नॆन्दु सीतॆयु हेळिदळु ऎम्बुवदु ई श्लोक तात्परवु, ऎन ऎन्न सिस्टु म् ऎन्दु हेळिदनन्तरवू कूड, उण्डान - उण्टाद राक्षस स्त्रीयर, बुद्धिपूर्वापचार बुद्धिपूापराधगळु, इदक्कॆ क्षमाविषयवायित्तियो ऎम्बुवदरॊन्दिगॆ अन्व यवु. (२) “मर्षयामह दुर्बला” - बलहीनळादुदरिन्द सहिसिकॊण्डिरुत्तेनॆन्दू, ई सन्दर्भ यावुदॆन्दरॆ :- “भाग्य वैषम्य योगेन पुरादुश्चरिते न च । मता ते सत्वं स्वकृतं ह्यु पभुज्यते । प्राप्तव्यं तु दशायोगात्म तदिति निश्चि दासीनां रावणस्याहम् अक्ष यामीहदुला” इदु सीतॆगॆ तॊन्दरॆ कॊट्ट राक्षस स्त्रीयरुगळन्नु शिक्षिसलु अनुज्ञॆयं बेडिद आञ्जनेयनिगॆ हेळुव सीतावाक्यवु. आ रावण रल्लि एनॊन्दू अपराधविल्लवु. स्वामि आज्ञानुसार वरिसुवरल्लि एनु अपराधवु तनगॆ उण्टागिद्द ई दुर्दॆशॆयादरो भाग्य वैषम्य योगदिन्दलो, हिन्दॆ माडिद दुश्चरितदिन्दलो, उण्टागिर बहुदु. तानु माडिद कल्मवन्नु अनुभविसलेबेकष्टॆ. अन्तह अनु भविसुव काल ईग ऒदगिरुत्तदॆ ऎन्दु निश्चयिसिरुवॆनु. आदुदरिन्द ई रावण दासियर दासियर तर्जनॆ मॊदलादवन्नु सहिसबेकागि बन्तु एकॆन्दरॆ नानु दुला, अन्तह हिन्दिन कल्मफल प्राप्तवागदहागॆ. एनॊन्दू प्रतिक्रियॆयन्नु माडिकॊळ्ळदॆ अशक्तळागिरुत्तेनॆ.” ऎन्दु हेळि सीतॆयु आञ्जनेयन शिक्षा पेक्षॆयन्नु निरोधिसिदळु. (३) सीतॆयु इन्नू आञ्जनेयनिगॆ हेळुत्ताळॆ :- पापानां वा शुभ (3) डा. यु. ११६-४० दासीय________________
१५२५ श्रीमद्र हस्यत्रयसारे (३) “पापानां वा शुभानां वा वधार्हाणांष्णव व” ऎङ्गिर पडिये पिराटक्कु क्षमा विषयमायि लियोनॆ नां वा” आ राक्षस स्त्रीयरु निन्न भिप्राय प्रकार पापिगळु, नन्न बि प्रायप्रकार अवरु शुभरु, स्वाम्याज्ञॆ प्रकार वरिसिदुदरिन्द निरोषिगळु, हेगे आगलि, अवरु नीनु हेळिद हागॆ “दण्ड्या दण्ड नीयानादण्ड्याः” ऎम्ब धरशास्रोक्ति प्रकार दण्डिसलु योग्य नादवनन्नु दण्डिसलेबेकु, दण्डिसदॆ बिडतक्कद्दल्लवु ऎन्दु, वधार्ह रागिद्दरू कूड, “ दुस्कोपि शरणागतो रक्षणीयः” “ शरणा गतनादवनु दुष्टनागिद्दरू रक्षिसलु योग्यनॆम्ब’’ विशेष शास्त्रविरु वदरिन्द अन्थावरिगॆ आरोण - पूनादवनिन्द, करुणं कार - करुणियन्नु तोरिसुवदे युक्तवु ; शुभकार माडिदवरिगॆ अवर करवे अवरन्नु रक्षिसुवहागॆ नम्मन्नु बलात्करिसुत्तदॆ. पापमाडि दवरन्नु ताने नावु रक्षिसबेकादुदु ऎम्ब स्वारस्यार्थवु. हे स्थन म - ओ वानरने, निनगॆ युक्तायुक्त चेष्टा व्यवस्थॆयिल्लदुदरिन्द नीनु प्लवण्ण मने सरि ऎम्ब भाववु. आदरॆ दोषिगळन्नू रक्षिसिबिड बहुदो ऎन्नुत्तीयो : नकश्चिन्नापराध्यति - हागॆ अपराध माड दिरुवरु यारादरू ई लोकदल्लिरुत्तारो ? हागॆ पापकरविल्ल दिद्दरॆ नित्यविभूतिगॆ होगुत्तिद्दरे विना ई लोकक्कॆ बरुवरो. यावाग इल्लिगॆ बन्दरो अवरु अपराधिगळ सरि ऎम्ब भाववु. आदु दरिन्द अञ्जनेयनाद नीनु ताने निरपराधियो ? नन्न उद्दिश्यवागि नीनु मार्गतप्पि नडॆदिल्लवो ? ब्रह्मचारियागि रावणन अन्तः पुर स्त्रीयरुगळ अवयवगळन्नॆल्ला अवलोकिसिदॆयल्ला, हागॆ माड बहुदो ऎम्ब भाववु ” ऎच्चरपडिय - ऎन्दु ई ऎरडु प्रमाणगळल्लि हेळिरुव हागॆ, पिराटक्कु श्री सीतादेविगॆ, क्षमा विषय मायियो ऎन्निल् - मेलॆ हेळल्पट्ट राक्षस स्त्रीयरुगळ बुद्धिपूापचारगळु मन्निसलु योग्यवादव आग लिल्लवो ऎन्दु आक्षेपिसिदरॆ ; मॊदलु ई राक्षसस्त्रीयरुगळिगागि त्रिज टॆयु सीतॆय पाददल्लि शरणागतियन्नु माडिदळु; ई शरणागत्यनु________________
अपराध परिहाराधिकार निल्, आडलु अवर्गळुन्नु तिरुवडि नलियप्पुगिरा नॆर नॆ इर भयवन्नु, नलिवुक्कु निलक्कु ण्णानपडियाले वाळाले योङ्गि विडुमालॆ दण्डलेशनु क्षमै युं सिद्ध म्. स्नानवादनन्तरवू रावणवधॆयवरिविगू रावणनिगॆ दासिगळादुद रिन्द आतन इष्टानुसारवागि सीतॆय सन्निधियल्लि बुद्धि पूरा वन्नु माडिरुत्तारॆ. आदरू अनुग्रहमयळाद सीतॆयु अन्था वरन्नू कूड मन्निसिबिट्टिद्दरिन्द, बुद्दिपूरा घवू शरणागति माहा कैयिन्द प्रपन्ननिगॆ सम्बन्धिसुवदिल्लवॆन्दु तोरुत्तदॆयल्ला ऎन्दा क्षेपवन्नु तन्दरॆ, अदक्कॆ मुन्दिन वाक्य शेषदिन्द समाधान हेळु तारॆ. अडलु-आ सन्दर्भदल्ल, अवळुक्कु - आ राक्षस स्त्रीयरुगळिगॆ, तिरुवडि-आञ्जनेयनु (तिरुवडि ऎन्दरॆ पादसेवकनु ऎम्बरवु. पॆरिय तिरुवडि ऎन्दरॆ गरुर्त्मारवरिगॆ हॆसरु, चिन्न तिरुवडि अथवा शिरिय तिरुवडि ऎन्दरॆ आञ्जनेयनिगॆ हॆसरु) नलियपुगुगिर्रा - चित्रवधॆयन्नु माडुवनु, ऎर भयव विळ्ळॆन्नु - ऎन्नुव भयवन्नु हुट्टिसि, नलिवुक्कु विलक्कुज्ञान पडियाले - आ वधॆगॆ सीतॆय क्षमागुणदिन्द बिडुगडॆ उण्टादुद रिन्द, नाळालॆ ॐगि - कत्तियन्नु झळपिसि, निडुमापोलॆ - अनन्तर क्षमिसि बिडुवहागॆ ऎन्दरॆ कत्तियिन्द कडिदुबिडुत्तेनॆ नोडु ऎन्दु कत्तियन्नु बीसि, अनन्तर ई सलवेनो बिट्टिरुत्तेनॆ, इन्नॊन्दु सल हीगॆये माडिदुदादरॆ ऎरडागि कत्तरिसिबिडुवॆनॆन्दु कत्तियन्नु हिन्तॆगॆदहागॆ, दण्णलेशमु - प्राणहोदहागॆ भय वन्नुण्टुमाडिदुदरिन्द दण्डलेशवू, क्षमॆयुम् - सीतादेवियु तोरिसिद क्षमॆयू सह, सिद्दम् - इल्लि सुव्यक्तवु. आदरॆ कॆलवु दॊड्डवरू बुद्धि पूराघद लेपनवु प्रपन्ननिगॆ लेपिसुवदिल्लवॆन्दु अभिप्रायपट्टरल्ला, अदेकॆ हागॆ अभिप्राय पट्टरु ? अवरुगळिगॆ प्रमाणवाक्यगळेनू इल्लवो ? हागॆ यावुदू इल्लवादरू हागेकॆ हेळिदरु? अवु सरियाद अभिप्राय गळल्लवादरू हागॆ हेळलु कारणवेनॆन्दरॆ, मुन्दिन वाक्यदिन्द “आगैयाल्” ऎन्दु प्रारम्भिसि, शरण्यन कल्याणगुणगळ प्रभावक्कॆ________________
श्रीमद्रहस्यत्रयसारे लेपि आगैयाल् प्रपन्ननुक्कु बुद्दि पूर्वोत्तराघ यादॆन्नु विश्लेषित्तु चॊल्लुवदॊरु प्रमाण मनॆयिरुक्क, इवनुक्कु पिन्नु बुद्धिपूर्वापराध पिरि नालुव क्षमै कॊळ्ळवेनुम्, क्षमैकॊळ्ळाविडलु ं शिक्षा रूपमान ऎन्नुम्, विळम्बाक्ष मरुक्कु परम फल वारादॆनु, प्रारब्ब सुकृत विशेषादि कै रत्तुक्कु विच्छेद सजचण्ण ४ दण्ड विशेषवि तुक्कु विळम्ब शाले वरु मिष्टु कट्टु बिद्दो, इल्लवे शरणागति प्रभावक्कॆ मोहितरागियो, हागॆ हेळिरुत्तारॆन्दु तिळिसुत्तारॆ :-आगैयाल् सिद्द प्रायश्चित्तविल्लद बुद्धिपूरकवाद उत्तराघक्कॆ अल्पदण्डनॆयू, क्षमॆयू वादुदरिन्द, प्रपन्ननुक्कु - शरणागतियन्ननुष्ठिसिदवनिगॆ बुद्दि पूरोत्तराघं - प्रपदनानन्तर माडुव बुद्धि पूरैकवाद अप रा धवु, लेपियादु - सम्बन्धिसुवदिल्लवु, ऎन्नु - ऎम्बुदागि, - विशेषित्तु चॆल्लुवदु - विश्लेषिसि हेळुवन्था व्यक्तवागि हेळु वन्था ऒरु प्रमाण मन्रिक्कॆ इरुक्क - ऒन्दु प्रमाणवादरू इल्लदॆ इद्दरू (१) इवनुक्कु - ई प्रपन्ननिगॆ, ऒन्सु - शरणागति अनु ष्ठिसिद नन्तरवू, बुद्धि पूत्ववाद अपराधवु, पिरिन्हालुम् - उण्टा दरू, क्षमैकॊळ्ळवेण्डावॆनुम् - क्षमिसु ऎन्दु बेडुव अव श्यकतॆ इल्लवॆन्दू ऎन्दरॆ प्रायश्चित्त माडिकॊळ्ळुवावश्यकतॆयिल्ल वॆन्दू, (२) हागॆ क्षमैकॊळ्ळाविडलु - सश्वेश्वरन क्षमॆयन्नु बेडदिद्दरू कूड, ऎन्दरॆ प्रायश्चित्तवन्ननुष्ठिसदे इद्दरू, शिक्षा रूपमान दण्डलेश मिल्फ् ऎन्नु - शिक्षारूपवाद अल्पदं नॆयू इल्लवॆन्दू, (३) विळम्बाक्षरुक्कु - सावकाशवन्नु तडॆयद वरिगॆ, परम फलत्तुक्कु - सत्कृष्ट फलवाद भगवन्तन प्राप्ति अवन कै र प्राप्ति, इवुगळिगॆ विळम्बवु, वारादॆनुम् - बरुव दिल्लवॆन्दू, (४) प्रारब्ध सुकृत विशेषज्ञळाले - प्रारब्धकद सुकृत विशेषगळिन्द, वरु-उण्टागुव, इष्टु रुक्कु - इल्लिन कैरगळिगॆ विच्छेद सचळ् – च्युति न्यूनतॆगळु नारादॆनुम् - बरुवदिल्लवॆन्दू, शूल्लुगिर पक्ष ळ - हेळुव 4 1________________
अपराथपरिहाराधिकार नारादॆनुम, तॊल्लुगिरपक्षळ् शरण्यनुडैय गुणङ्ग टै युव, शरणागतिनुडैय प्रभावयुव गॊल्लुगैक्काग नत्रनै. बुद्धि पूर्वोत्तराघा शेषो बाधकवाह इप्पडि यल्लाद पोदु प्रपन्नरान पूर्वगळुडैय भिन्नाभिप्रायगळु, शरण्यनुडैय - सर्वलोक रक्षकन, गुणळ्ळ युम् - कृपौधारवे मॊदलाद कल्याणगुणगळन्नू शरणागतिय प्रभाववन्नू, शोल्लुगैक्कागवनै . हेळुवदक्कागि ई महनी यरु हेळिद माते विना आ नाल्कु अभिप्रायगळु सरियादवल्लवु ऎम्ब भाववु. ई नाल्कु अभिप्रायगळु यावुवॆन्दरॆ :- १. बुद्धिपूरोत्तराघक्कॆ प्रायश्चित्तवु बेकिल्ला, स्वामियु अदन्नु मन्निसुवनु. २. वदिल्लवु. 2. मूलक अदक्कागि प्रायश्चित्त माडदिद्दरू सर्वॆश्वरनु शिक्षिसु अदरिन्द फलप्राप्तिगेनू आयुर्वृद्धियुण्टागुवदर विळम्बवागुवदिल्लवु. ४. प्रारब्ध कर्मद सुकृत विशेषदिन्दुण्टागुव कैङ्कय्यक्कॆ च्युति अथवा न्यूनतॆयुण्टागुवदिल्लवु ई अभिप्रायगळु सरियादवल्लवु, आदरू ई अभिप्रायगळु एनु सूचिसुत्तवॆ ऎन्दरॆ, सर्व शरण्यन कृपौदार मॊदलाद कल्याण गुणगळ माहात्म यन्नू शरणागतिय प्रभाववन्नू सूचिसुत्तवे विना बेरॆ इन्नेनू इल्लवु. इवुगळिगॆ इरुव माहात्मय न्नु मनस्सिनल्लिट्टु हागॆ हेळि बिट्ट रॆम्ब भाववु. बुद्धि पूर्वोत्तराघवु लेपिसदु ऎन्दु हेळुवद रिन्दुण्टागुव बाधकगळु. बुद्दिपूर्वोत्तरापराधगळ विषयदल्लि प्रायश्चित्तवन्ननस दिद्द पक्षदल्लि अपराध उण्टु ऎन्दु ऒप्पिकॊळ्ळबेकॆन्दु समर्धनमा________________
CHIT श्रीमद्रहस्यत्रयसारे अनुष्ठान परम्परैक्कुम, प्रसन्न रॆन्दे प्रायश्चित्तं विधिक्किर शास्त्रत्तु कुम्, मोक्ष परुगैक्कु कालक्कुरित्तु प्रपत्ति हण्णादे अनुवृत्त बुद्धिपूर्वाहराधरुवाय विळं बाक्समरुमाम्, इरुप्पारु विळम्बव कॊल्लुकिर प्रवा णण्णळुक्कु, शेरादु. डिदुदु हागिरलि; करुणासागरनादुदरिन्द प्रसन्न नल्लि आतनिगि रुव प्रीत्यतिशयदिन्द अन्तह अपराधगळन्नू कूड मन्निसिबिडुवनु ऎन्दु ऒप्पिकॊण्डरॆ बाधकवेनु ? हागॆ मन्निसिबिडुवनॆम्बुवदक्कॆ प्रमाणरूपदल्लि विशे षोक्तियिल्लदिद्दरॆ सामान्यवागि “एनमेवं विदि कर न शिष्यते” “सर्व पापेभो मोक्षयिष्कामि” इत्यादि प्रमाणगळल्लि समस्त पापगळ नाशवू तोरिबरुवदरिन्द, ई बुद्धिपूर्वोत्तराघगळु लेपिसुवदिल्लवॆन्दु हेळुवदरिन्द बाध कवेनु ऎम्बुवदक्कॆ उत्तरवन्नु मुन्दॆ अनुग्रहिसुत्तारॆ. इप्पडि यल्लाद पोदु - प्रायश्चित्तविल्लद बुद्धिपूर्वो राघद विषयदल्लि अल्प दण्डनॆयुण्टु ऎन्दु अङ्गीकरिसदे होदरॆ, प्रपन्नरान पूर्वरुगळुडैय अनुष्ठान परम्परैक्कुम - प्रपन्नराद हिन्दिन महनीयरुगळ क्रमागतवागि बन्द अनुष्ठान गळिगू, प्रपन्न रै प २ - प्रपन्न रन्ने मुख्यवागि कुरितु, प्राय श्चितं विधिक्किर शास्त्र तुक्कुम् - प्रायश्चित्तवन्नु विधिसिरुव शास्त्रक्कू, मोक्षं सॆरुगैक्कु कालुरित्तु प्रपति पट्टादॆ - मोक्षवन्नु पडॆयुवुदक्कॆ इन्तह कालवॆन्दुद्देशिसि प्रपत्तियन्ननु ष्टिसदे, अनुवृत्त बुद्धिपूर्वा पराधरुमाय अनुसरिसि बन्द बुद्दिपूर्वकवाद अपराधवन्नुळ्ळवरागियू निळम्बा क्षमरु माम्. मोक्षप्राप्तिगॆ विळम्बवन्नु सहिसदवरागियू, यिरुप्पा र् कु - इरुववरिगॆ, विळम्बं कॊल्लुगिर - अदक्कागि अल्प दण्डनॆ यन्नु हॊन्दलु बेकाद आयुर्वृद्धि मूलक उण्टागुव विळम्ब वन्नु हेळुव प्रमाणळुकु प्रमाणगळिगॆ साक्षाद्विरुद्धवाद अभि प्रायवागुत्तदॆम्ब भाववु, बुद्धिपूर्वोत्तराघवन
कूड________________
अपराधपरिहाराधिकार १५३० सर्वॆश्वरनु, तन्नल्लि शरणागतिमाडि प्रपन्ननॆनिसिदवनल्लिरुव प्रीत्यति शयदिन्द सम्पूर्णवागि क्षमिसि बिडुवनु ऎन्दु हेळिदरॆ मूरु विधवाद विरोधगळु प्राप्तवागुत्तवॆ ऎन्दु हेळिरुत्तारॆ :- 0. १. अनेक प्रपन्नरु तमगॆ प्राप्तवाद बुद्दि पूर्वॊ राघ कागि प्रायश्चित्तवन्न नुष्ठिसिरुत्तारॆ :- इन्तह क्रमागतवागि बन्द अनुष्ठानगळिगॆ विरुद्धवादुदागुत्तदॆ. भागवतोत्तमरुगळु तमगॆ प्राप्तवाद परस्परापचारगळिगागि दण्डवत्र माणगळ मूलक प्राय श्चित्त माडिकॊण्डिरुत्तारॆ : सुग्रीवनु माडिद प्रतिज्ञॆयन्नु मरॆतु भगवदपराधवन्नु माडिदुदरिन्द महाभागवतनाद आञ्जनेयनिन्द “कृतापराधस्य हिते नान्यं पश्याम्यहं क्षमम् । अन्तरेणाञ्जलिं बय्या लक्ष्मणस्य प्रसादनात् ऎम्बदागि भगवदपराधक्कॆ महाभागवतन क्षमापणिये प्रायश्चित्त ऎन्दु उपदेशिसल्पट्टवनागि, “यदि किञ्चिदति क्रान्तं विश्वा साणयेन वा । श्रेष्ठस्य क्षमितव्यं मे न कश्चिन्ना पराध्यति” ऎन्दु महाभागवतनाद लक्ष्मणन क्षमापणॆयन्नु बेडिदनु. इदन्नु कण्डु लक्ष्मणनु, सुग्रीवनन्नु कुरितु तुम्बा निष्ठुरोक्तिगळन्नु प्रयोगिसिदुदरिन्द, तनगॆ भागवतापचारवु सङ्घटिसितॆन्दु भीतनागि “यज्ञ शोकाभि भूतस्य श्रुत्वा रामस्य भाषि तम् । मया त्वं परुषाणु कच्च त्वं क्षन्तुमर्हसि । श्रीरामनु बहु दुःखाक्रान्तनागि आडिद मातुगळु तुम्बा नन्न मनवन्नु नोयिसिदुदरिन्द नानु निन्नन्नु कुरितु याव निष्टु क्ति गळन्नु हेळिदॆनो, अवॆल्लवन्नू नीनु दयविट्टु क्षमिसतक्कद्दॆन्दु सुग्रीवनन्नु कुरितु प्राक्टिसिदनु. इल्लि इब्बरू प्रपन्नरॆ. इदरिन्द बुद्धि पूरकवाद अपराधगळु इब्बरिगू उण्टादवु. (१३३०नॆय पुट नोडि) भागवत शिखामणियाद अम्बरीषनिगॆ माडिद अपराधक्कागि दुरासऋषिगॆ सश्वरनु “तमेव शरणङ्गच्छ” आ अम्बरीषनन्ने शरणहॊन्दु ऎन्दु उपदेशिसिद हागॆ, इल्लियू कूड इब्बरू परस्पर क्षमापणॆयन्नु माडिकॊण्डिरुत्तारॆ. हीगॆये इतर प्रपन्नरू कूड अनुष्टिसिरुत्तारॆन्दू अन्तह अनुष्ठानक्कॆ आ अभिप्रायवु विरोधवा________________
श्री मद्र हस्यत्रयसारे (१) “ सर्वपापेभो मोक्षयिष्यामि” ऎन्नु सामा नैन चॊल्ल चॆय् देयु, गुत्तदॆ ऎम्ब तात्परवु. मेलॆ पूरै पक्षदल्लि हेळल्पट्ट प्रमाणग ळॆल्ला सामान्य वचनगळागिरुवदरिन्द प्रामादिकवागि प्राप्तवागुव अपराधक्कॆ मात्रवे अन्वयिसुत्तदॆन्दु ऊहिसबेकु. एकॆन्दरॆ बुद्धिवू राघक्कॆ बेरे विशेष वचनविरुवदरिन्द अदर प्रकार अनुवरिसतक्कद्दु. आदुदरिन्दले पूत्व प्रपन्नर अनुष्ठानवु ई विशेषवन्ननुसरिसिरुवन्थाद्दॆम्ब भाववु. (२) ई बुद्धिपूरो राघक्कॆ प्रायश्चित्त उण्टॆन्दु हेळुव विशेषविधियाद शास्त्र प्रमाणक्कू विरोधवादुदागुत्तदॆ. आ शास्त्र प्रमाणवु यावुदॆन्दरॆ :- CC
- अपाय संस्कृवे सद्यः प्रायश्चित्तं समाचरेत् । प्रायश्चिरिय सात्र यतुन- शरणं प्रजेत्” इदन्नु इवरे हिन्दॆ उदाहरिसिरुत्तारॆ. इदु प्रपन्नन बुद्धिपू राघक्कॆ प्रायश्चित्तवॆम्बुवदरल्लि सन्देहविल्लवु. यतुनः शरणं व्रजेत् ऎम्बुवदरिन्दले सुव्यक्तवु. (३) मोक्षप्राप्तिगॆ विळम्ब बेडवॆन्नुववरिगॆ शिक्षॆगागि विळम्ब वन्नु विधिसुव शास्त्रक्कू विरुद्धवागुत्तदॆ.
- अपायानिरतश्यश्वनां चैव शरणं गतः । तनकृत्याखिलं पापं मामापोति नरश्यनै- ऎम्बुवदु विळम्ब सूचक प्रमाणवु. इदरर्थवेनॆन्दरॆ :- नन्नन्ने शरण हॊन्दिद्दरू, हागॆ शरण हॊन्दिदनन्तरवू बारिबारिगू अप राधगळन्नु माडिदुदादरॆ, अन्तह मनुष्यनु अदक्कागि प्रायश्चित्त माडिकॊळ्ळदिद्दरॆ, आ सत्वपापवन्नू अनुभविसुवुदरिन्द क्षीणवागुव हागॆ माडि ऎन्दरॆ नाशगॊळिसि, कालविळम्बदिन्द नन्नन्नु सेरुवनु ऎम्बदागि लक्ष्मिवाक्यवु. इदरिन्द उत्तराघगळिगागि शिक्षॆयन्ननु भविसुवदक्कागि आयुर्वृद्धियुण्टागुवदरिन्द विळम्बवु प्राप्तवाग इदॆम्ब भाववु ई वाक्यदिन्द लक्ष्मिगू सह नारायणन हागॆ बुद्धि पूत्तराघगळन्नु होगलाडिसुव शक्तियुण्टॆन्दू प्राय________________
(२४) अपराधपरिहाराधिकारः (२) “प्रायश्चिरियं सात्र यतुनश्चरणं प्रजेत्” ऎन्नु विशेषियाले बुद्धि पूरा मत्तु क्कु प्रपत्र नन्तरं प्रायश्चित्त माग प्राप्त मायि शित्र शरणागतियन्नु लक्ष्मिय सान्निध्यदल्लि माडबहुदॆन्दू, तोरि बरुत्तदॆ. माञ्च ऎन्दु चकारविरुवदरिन्द सरेश्वरन हागॆये सक्षेश्वरियाद तनगू उण्टॆन्दू तोरिबरुत्तदॆ तुम्बा विळम्ब दिन्द नन्नन्नु हॊन्दुवनु; ऎन्दरॆ बुद्धि पूराघद फलवन्ननुभविसु वदक्कागि, आयुर्वृद्धियिन्द विळम्ब उण्टागुत्तदॆम्ब भाववु. ई मूरु कारणगळिन्दलू बुद्धि पूराघवू कूड प्रपन्ननिगॆ लेपि सुवदिल्लवॆम्बभिप्रायवु समञ्जसवादुदल्लवु ऎम्ब तात्सरवु. आदरॆ “सर्वपापेभो मोक्षयिष्यामि” ऎम्बुव प्रमाण दल्लि सत्व शब्दवन्नु पयोगिसिरुवदरिन्द, इदरल्लि उत्तराघगळु सेर अल्लवे ? हागॆ सेरिदरॆ प्रामादिक पापगळु मात्रवे परिहृतवु ऎन्दु हेगॆ हेळलागुत्तदॆ? बुद्धिपूराघवु सेरलिल्लवे ऎन्दु प्रश्निसबहुदु यॆन्दु योचिसि, अदक्कॆ समाधानवन्नु हेळुत्तारॆ. “ सत्व पापेभो मोक्षयिष्यामि समस्त पापगळिन्द बिडुगडॆ माडुत्तॆनॆन्दु सश्वरनु, सामानेन कॊल्लचॆय देयु- ऎन्दु सामान्यवागि हेळिद्दरू, “प्रायश्चित्तिरियं सातॆयत्तुन शरणं व्रजेत् ऎन्नु” “पुनः शरणागतियन्ननुष्टिसुवदु यावु दुण्टो अदे ई प्रायश्चित्तवॆन्दु, विशेषिकॆयाले - अदन्ने विश्लेषिसि हेळिरुवदरिन्द बुद्धि पूरैकवाद उत्तरामक्कॆ, प्रप नन्तरं - मॊदलु माडिद प्रपत्तियादनन्तर, प्रायश्चित्तवाग प्राप्त मायि प्रायश्चित्तवागि पुनश्चरणागति माडबेकॆन्दु स्थापितवायितु. “सर्व पापेभो मोक्षयिस्वामि” ऎम्बु वदु सामान्य वाक्यव, इदरल्लि सर्व शब्दवु ऎल्ला विध पापगळन्नु बोधिसिद, अदरल्लि ऒन्दु पापगळिगॆ बेरे विशेष विधि इदु दादरॆ, आ विशेष विधियु आ विशेष विध पापक्कॆ मात्र अन्वयिसि (१) गी, १८६६. (२) लक्ष्मीतन्त्र १७-९१ من________________
श्रीमद्र कस्य त्रयसारे पुनश्चरणागति वाक्यस्य अधिकारि विशेषविषयत्व मितिवादस्य निरास पुनशरणागतियॆ विधिक्किर वचन यडियिले बुदि हि कॊण्डु, मिक्क ऎल्ला विध पापगळिगू सामान्य वचनवु अन्वयिस इदॆन्दु तिळियतक्कद्दु, आदुदरिन्द सपापेभ्यः ऎम्बुवद सामान्य वचनवु, इदु विश्लेषिसि हेळुवन्था पादगळिगॆ मात्र अन्न यिसुवदिल्लवु. अदु विना मिक्कॆल्ला विध पापगळिगू सामान्य वच नवु अन्वयिसुत्तदॆन्दु तिळियतक्कद्दु. इदक्कॆ निदर्शनवागि “ न ० स्यात् ” प्राणिहिंसॆ माडकूडदॆम्ब सामान्य विधियुण्टु, स्वर्ग कामियु “ पशु मालभेत” भागपशुवन्नु कॊन्दु यज्ञ माड तक्कद्दॆम्ब विशेषविधियिदॆ. आ सामान्य वचनवाद “न हिंस्यात्” ऎम्बुवदु. ई य पशुवधॆ सम्बन्धदल्लि अन्वयिसुवदिल्लव हागॆये ई सन्दर्भदल्लि ऎन्दु भाविसतक्कद्दु इदू अल्लदॆ स पापेभो मोक्षयिस्वामि ऎन्दु हेळिरुवदरिन्द प्रपन्ननिगॆ सत्व पाप विमोचनॆयिन्द मोक्षप्राप्तियॆन्दु हेळिरुवदरिन्द बुद्दि पूराघयुक्तनू कूड अदण्डनॆयिन्द शिक्षिसल्पट्टु सत्व पाप विमोचनॆयिन्दले ईतनिगू कूड मोक्षवागुवदरिन्द, ई ऎरडु वाक्यगळिगू एनॊन्दू विरोधविल्लवु. आदुदरिन्द प्रपन्नद बुद्दिपूद्रू राघक्कॆ प्रायश्चित्त वण्टॆन्दु ई मेलिन वाक्यदिन्द स्थापिसि हेळिदरु. मुन्दॆ ई अभिप्रायक्कॆ कॆलवु पूव्रपक्षगळु बन्दीतॆन्दु भाविसि समाधान हेळुत्तारॆ. ई प्रायश्चित्तवन्नु विधिसुव विशेष वाक्यवु, प्रथम प्रपदन कालदल्लि बुद्धि पूराघवू सेरिद समस्त विध पापगळु तॊलगबेकॆन्दु प्रार्थिसिदवरिगॆ अन्वयिसुवदिल्लवॆन्दू, हागॆ बुद्दिपूरै राघ नाशव सङ्कल्पदल्लि सेरदॆ इरुववरिगॆ मात्र अन्वयिसुत्तदॆन्दू हागॆ हेळिदरॆने ऎरडु प्रमाणगळिगू सारक्य उण्टागुत्तदॆ ऎन्दू हेळुवॆवु ऎन्दरॆ हागल्लवॆन्दु “पुन शरणागतियॆ” ऎन्दु प्रारम्भिसुव मुन्दिन वाक्यदिन्द तिळिसुत्तारॆ________________
अपराधपरिहाराधिकारः पूत्त रामत्तु कुम् परिहारवाग प्रपत्ति पण्णादर् निष यित्तले नियमित्तालोवॆन्न वॊण्णादु ; बुद्दि सरोत्त राघुम् पं पण्ण लानॆनु विशेषित्तु कण्ठोक्ति हण्णु मदूर वचनमुट्टागलिरे इप्पडि नियमिक लावदु. ई पुनररणागतियु बेरॆ अधिकारियन्नु कुरितद्दु ऎम्ब वादद निरासवु. पुनश्चरणागतियॆ – पुनः शरणागतियन्नु, विधिक्किर - माड बेकॆन्दु आज्ञापिसुव, वचन वाक्यवन्नु, अडियिले मॊदलु, बुद्धि पूर्वोत्तरा घत्तु कुम् बुद्दिपूरॊत्त राघक्कू, परिहारवाग - परिहारवागुवदक्कागि, प्रपति पण्णा दार् - प्रपत्तियन्न नुष्ठिसदे इरुववरिगॆ, नियमित्तालो - अन्न यिसिदरो ऎन्दरॆ अन्वयिसबिडुत्तेवॆ, ऎन्न वॊण्णादु - ऎन्दु हेळ लागुवदिल्लवु. मॊदलु प्रपत्तियन्ननुष्टिसुव समयदल्लि बुद्धि पूरोत्तराघवू नमगॆ लेपिसबेडवॆन्दु प्रासि शरणागति माडि दवरिगॆ *प्रायश्चिरियं सात्रयतुनशरणं व्रजेत् ” ऎम्ब पुनश्चरणागति विषयवाद वाक्यवु अन्वयिसुवदिल्लवु, हागॆ शरणागतियन्नु माडदे इद्दवरिगॆ अन्वयिसुत्तदॆ ऎन्दु एकॆ अभि प्रायपडकूडदु ? ऎन्दु प्रश्निसिदरॆ अदु सरियाद अभिप्रायवल्ल वॆन्दु तिळिसुत्तारॆ. अदु हेगॆ सरियल्लवॆन्दु “बुद्धिपूर्वोत्त राघुम्” ऎम्ब वाक्यशेषदिन्द उपदेशिसुत्तारॆ :- बुद्धि पूर्वोत्तराघतोयुव प बुद्दिपूरकवाद उत्तराप राधगळन्नू कुरितु ऎन्दरॆ बुदि पूत्त राघगळू ननगॆ लेपिस कूडदॆन्दु, प्रपत्ति पण्णलाम् प्रपत्तियन्न नुष्ठिसबहुदॆन्दु, विशेषिसि विशेष विधियागि, कण्ठोक्ति हण्णु मदॊरुवचनं शास्त्रवु तानॆ हेळुव ऒन्दु प्रत्यक्षविधिरूप वाक्यवु, उण्डाग अरे - उण्टागिद्दरल्लवे ऎन्दरॆ इद्दरल्लवे, इप्पडिनियमिक्क उवदु - ईग अभिप्राय पट्ट हागॆ अन्वयिसबहुदु. हीगॆ स________________
श्रीमद्रहस्य त्रयसारे बुद्धि पूरा घश्लेष पुनः प्रपत्ति वचन वैयर्थम् इप्रप बुद्धिपूर मत्तु कुम् परिहार नॆनरि दरॆ प्रपदन कालदल्लि बुद्धिवॊराघद कापणॆयन्नू सेरिसि माडुव ऒन्दु प्रपदन क्रमवू, अदु इल्लदे इरुव ऒन्दु प्रपदन क्रमवू इरुत्तदॆन्दु ऒप्पबेकागुत्तदॆ. आन्तह ऎरडु विधान ज्ञानवू इल्लव. हागॆ बुद्धिवू राघद अश्लेषॆयन्नुण्टु माडुव क्रमवु इद्दु दादरॆ विवेकविरुववरॆल्लरू अन्तह क्रमवन्नॆ अवलम्बिसुत्तिद्दरे विना इन्नॊन्दु अष्टु राज्यवल्लद क्रमवन्नु ऎन्दिगू अवलम्बिसुत्तिरलिल्लवु आग पुनश्चरणागति वाक्यक्कॆ वैयर्थ वुण्टायितु. ई अभिप्रायवन्नु स्वामियवरे मुन्दिन वाक्यदिन्द उपपादिसुत्तारॆ. हीगॆ बुद्दिपूराघ कापणॆयन्नू सेरिसि प्रथम प्रपदनदल्ले माडबहुदॆन्दु कण्ठोक्तवाद शास्त्र प्रमाण बेरेयिल्लवु. हागॆ इद्दिद्दरू ई प्रायश्चित्त वाक्यक्कॆ वैयर्थव तप्पलिल्लवु. हागॆ ऒन्दु वेळॆ कण्ठक्कॆ प्रमाणविद्दुदादरॆ बुद्दि पूराघवु लेपिसुवुदिल्लवादुदरिन्द अन्तह प्रपन्ननु स्वच्चा विहार माडबहुदु; लगामुयिल्लद कुदुरॆय हागॆ नडॆयबहुदॆन्दु एर्प डुत्तदॆ. इन्तह आभासगळिगॆ कारणवागुवदरिन्दले अन्तह कङ्क नाद प्रमाणवु ऎन्दिगू इरलारदॆन्दु भाविसिये, “ कण्ठोक्ति हण्णु मदॊरुवचन”विल्लवॆन्दु हेळिरुत्तारॆ. बुद्धि पूत्त राघलेपविल्लवॆन्दरॆ पुनः प्रशस्ति वचनक्कॆ वैयर्थवु इप्रपत्ति - ई मॊदलु सल सहृदनुहेयवाद प्रपत्ति, बुद्दिपूराघक्कू कूड, परिहारवनरिनाल् - परिहार उण्टु माडुत्तदॆन्दु तिळिदिद्द पक्षदल्लि, इच्चॆ टैविडुवारैयुव ई लघु वाद उपायदिन्दुण्टागुव सामर्थ्य वन्नु बिडुववरु, किडैया मैयाले - याले - यारू इल्लदुदरिन्द, पुनः प प वचन :- प्रपत्ति व– ㄓ________________
अपराधपरिहाराधिकारः नाल् इच्चॆट्टि निडु वारैयुव किडैयामैयाले पुनः प्रपत्तिवचन निषयमान. विशेष वचनेन सामान्य वचनहासः, नतु सामान्य वचनेन विशेष वचनबाध सामान्य वचनळपत्नि विशेषवचन बाधिक्क *प्रायश्चिरियं सात्रयन्नु नश्चरणं व्रजेत्” ऎम्ब पुनः प्रपत्तियन्नु हेळिरुव वाक्यवु, निर्विषयमाम् - यावुदकू अन्वयिसुवुदिल्लवादुदरिन्द व्यर्थवादुदागुत्तदॆ. कॆलवरु अभि प्रायपडुव हागॆ मॊदलु माडिद प्रपत्तियिन्दले बुद्दिपूरा घव कळॆदुहोगुत्तदॆन्दु तिळिदवरादरॆ, ऎल्लरू ई विषय तमगॆ तिळियदिद्दरू, गुरुगळिगॆ ई विषयवु वेद्यवागिरबेकॆन्दु ऒप्पि कॊळ्ळबेकागिरुवदरिन्द अवर मूलकवागियादरू तिळिदु, यारॊ बृरू इन्तह सामथ्यवुळ्ळ उपायवन्नु त्यजिसलाररु. आग ऎल्ला प्रपन्नरू हागॆये अनुष्ठिसुवरादुदरिन्द बुद्धिपू राघवु प्राप्तवागुव सम्भववे इल्लवागुत्तदॆ. आग प्रायश्चित्त वचनवु यारिगॆ अन्वयिसबेकु ? यारिगू सम्बन्धिसदे इरुवद रिन्द निरर्थकवादुवागुत्तदॆम्ब भाववु. विशेष वचनदिन्द सामान्य वचनक्कॆ सङ्कोचवु सामान्य वचनदिन्द विशेष वचनक्कॆ बाधॆयिल्लवु सामान्य वचनाळ वैपत्ति - सामान्य वचनद व्याप्तियन्नु मनस्सिनल्लिट्टु, विशेष वाक्यवन्नु, बाधिक्क वॊण्णादु - बाधिसु वदु युक्तवल्लवु अथवा साध्यवल्लवु. न्यायशास्त्र निपुणरु विशेष वाक्यक्कॆ सार्थकतॆयन्नुण्टुमाडि, विशेष वचनक्कॆ ऎल्लि अन्व यवो, अल्लि मात्र बिट्टु मिक्कॆल्ला कडॆयल्लू सामान्य वचनक्कॆ गौरववन्नु कॊडुत्तारॆ. हागॆ ऒप्पिकॊळ्ळदॆ सामान्य वाक्यवु विशेष वाक्यवन्नु हॊडॆदुहाकुत्तदॆन्दरॆ विशेष वाक्यक्कॆ गतियेनु ? इदे मॊदलाद अनेक न्यायविरोधगळुण्टागुत्तवॆ. आदुदरिन्द________________
श्रीमद्रहस्यत्रयसारे वॊण्णादु. इप्पडि विशेष वचन बाधिक्किल् उपासन निष मुक्कु बुद्धि पूत्त रामत्तु कुं दोष मिया. सर्वपापेभो मोक्षयिष्यामि ऎम्बल्लि सत्व शब्दवु याव पाप गळिगॆ विशेषविधियिन्द बेरॆ क्रमवु हेळल्पट्टिरुत्तदो, अन्तह पापगळन्नु मात्र बिट्टु, मिक्कॆल्ला पापगळन्नू बोधिसुत्तदॆ ऎन्दु तिळियतक्कद्दु. प्रारब्धांश पापक्कू, मत्तु बुद्दिपू राघक्कू बेरे प्रायश्चित्त विधिगळिरुवदरिन्द इवॆरडन्नु मात बिट्टु मिक्कॆल्ला पापगळु ऎन्दु तिळियतक्कद्दॆम्ब भाववु. आगलि, इल्लि बुद्दिपूराघवू कळॆयलि ऎन्दु सल्पिसि प्रथम प्रपत्ति माडुवदरिन्द प्रायश्चित्ति विधिगॆ गतिये इल्लवायितु. ऎन्दु मेलॆ हेळल्पट्टि तल्ला, नीवू कूड प्रथम प्रपत्तियल्ले पापा रम्भक प्रारब्ध कल्मद पापगळ निवृत्यर्थवागि प्रपदन माडबहुदु ऎम्बुवदु मात्र हेगॆ ऒप्पुविरि ? ऎन्दु केळिदरॆ, इदरिन्द न प्रारब्धकानुभव वाक्यवेनू निरर्थकवादुदागुवदिल्लवॆन्दु हेळु वॆवु. एकॆन्दरॆ, अनेकरिगॆ प्रारब्ब कर पापगळन्नू हीगॆ कळॆयबहु दॆम्ब विषयवु तिळिदिरुवदिल्लवु. आदुदरिन्द इदन्नु ऒप्पबहुदु. आदरॆ बुद्दिपूराघद नाशक्कागियू मॊदले प्रपदन माडि बिट्टरॆ, बुद्धि पूरै राघवे आ मेलॆ इरलारदादुदरिन्द, प्राय श्चित्त विधिगॆ वैयर्थवॆम्ब भाववु. आदरॆ ई सन्दर्भदल्लि सामान्य वचनवाद “सर्वपापेभो मोक्षयिस्वामि” ऎम्बुवदरिन्द विशेष विधियाद “प्रायश्चित्ति रियं सत्र यत्सुनारणं प्रजेत्” ऎम्बुवदु बाधिसल्पडु इदॆन्दु हेळिदरॆ, प्राप्तवागुव बाधकगळन्नु मुन्दॆ “इप्पडि ऎम्बुव वाक्यदिन्द तिळिसुत्तारॆ. इप्पडि - ई प्रकारवागि ऎन्दरॆ - ई सामान्य वचनदिन्द विशेष वचनवन्नु बाधिसबहुदॆन्दु हेळुव सन्दर्भदल्लि, विशेषवचनभादिक्कल् - सामान्य वचनद स पापशब्दवु, बुद्धिपूापराध प्रायश्चित्त वाक्यवन्नु बाधिसिदरॆ, उपासन निष्ठनुक्कुम् भक्ति मार्गवन्नवलम्बिसिद योगिय विषयदल्लू कूड, बुद्धिपूर्वोत्तराघत्तु कुम् , बुद्धि________________
अपराध परिहाराधिकार- वाद उत्तराघवु प्राप्तवादरू दोषमिल्फ्याम् - दोष विल्लवॆन्दागुत्तदॆम्ब भाववु. भक्तिनिष्ठन विषयदल्लि बुद्धिपू राघवु श्लेषिसुत्तदॆन्दू, प्रपन्ननिगॆ ई जन्मदल्ले अल्पदण्डनॆयिन्द क्षयिसुत्तदॆ ऎन्दू हेळुव अभिप्रायक्कॆ विरोधवागुत्तदॆ ऎम्ब भाववु, भक्तिनिष्ठन विषयदल्लू “ऎवं विदिकापङ्करन शिष्यते” (छां, ४.१४.३) ऎम्ब श्रुतियिरुवदरिन्द हीगॆ उपासकनल्लि पाप करवु अण्टुवुदिल्लवॆन्दरॆ समस्त पापकरवू अण्टुवदिल्लवॆन्दु हेळि रुव सामान्य वचनदिन्द बुद्धिपूरोत्तराघवू अण्टुवदिल्लवॆन्दु अभिप्रायपडबेकागुत्तदॆ. हागॆये इन्नॊन्दु श्रुतिय हेळुत्तदॆ– * तद्यरेषिकातूल मग् प्रोतं प्रदॊये शैवग् हास्य सर्वॆ पास्नानः प्रदूय” (छा, ५. २४. ३) मुञ्जि हुलिनल्लि रुव तूलवु अग्नियल्लि हाकल्पट्टरॆ ऒडने हेगॆ उरिदु होगुत्तदो हागॆये स पापगळू ई ब्रह्मविद्यानिष्ट : गॆ दग्धवागि होगुत्तवॆ. ऎन्दु सत्व शब्दवे साक्षात्तागि उपयोगिसिरुवदरिन्द बुद्धि पूत्त राघवू कूड ई सामान्य वाक्यदिन्द नाशवागबेकागि बरुत्तदॆ ऎम्ब. भाववु. ई श्रुतियन्नॆ श्री पराशररु श्लोकरूपदल्लि हेळिरु तारॆ. (वि. पु. ६. ७. ७४) “यथाग्नि रुद्द शिखः कक्षं दहति सानलः । तथा चित्र स्थितो विष्णु द्योगिनां सर्व कितं” इल्लियू सत्व किल्पिषवॆम्ब प्रयोगविरुत्तदॆ. हागॆये श्रीमद्भाग वतदल्ल, “स्वपाद मूलं भजतः प्रियस्य त्यक्तान्य भावस्य हरिः परेशः : विकर्मयज्योतृ तितङ्कथं चिद्दु नोति सर्व हृदि सन्निविष्टः” (भाग ११. ५. ४३) सरेश्वरन चरणकमलदल्लि शरणागतियन्नु माडि अन्यदेवता सम्बन्धविल्लदवनिगॆ, सत्व दुरित हरनाद मत्तू श्रेष्ठराद ब्रह्मरुद्रेन्द्रादिगळिगू स्वामियाद सश्वरनु, आतन हृदयगुहॆयल्ले इरुववनागि आतनिगॆ निया मकनागि आ प्रपन्ननिगॆ उण्टागुव उत्तराघगळॆल्लवन्नू नाशमाडु तानॆ. इल्लियू धुनोति सर्व ऎम्बुवदरिन्द बुद्धिपू राघगळू कूड सेरुवदिल्लवॆम्बभिप्रायवु तोरबहुदु. आदरॆ कथं चिद्दु नोति ऎन्दु हेळिरुवदरिन्द आतनु अनुताप मत्तु मुन्दॆ माडुवदिल्लवॆम्ब, अभिसन्धिकूडि प्रायश्चित माडि इन्नु.________________
श्री मद्र हस्कृतयसार कॊण्डरॆ आतन पापवन्नु क्षमिसि, अथवा हागॆ प्रायश्चित्त माडि कॊळ्ळदिद्दरॆ, अल्प दण्डनॆयन्नु कॊट्टु, अन्तू कथञ्चित् - हेगादरू माडि देहावसानदल्लि समस्तोत्रराघगळन्नू नाशमाडि मुक्ति यवनु ऎम्बुवदीग सरियाद अभिप्रायवु. शङ्कर भाष्यदल्लि कूड “वर्तमान शरीराम्भक पाल्म वर्जं” ऎम्बुवदरिन्द ई सत्व शब्दगळु प्रारब्ध करक्कॆ अन्वयिसुव दिल्लवॆन्दु हेळिरुवाग, बुद्धिपूाघक्कॆ सम्बन्धिसुवुदिल्लवॆन्दु हेळलु अभ्यन्तरवेनु ? इदरिन्द सत्व पापेभ्यः ऎम्बुवुदक्कॆ नम्म सिद्दा स्वारवु सत्व समञ्जसवॆन्दु भाविसतक्कद्दु. “सर्वपात्मानः” ऎम्ब सामान्य वाक्यवु,
- अपि चेत्सातकं किञ्चिगी कुरात् मादतः । योगमेव हि कुर्खतनान्यंयोग समाचरेश् ऎम्ब विशेष वाक्यदिन्द बाधिसल्पडुत्त दॆ. आदरॆ, “ नाविरतो दुश्चरितान्ना शान्तो ना समाहितः । ना शास्त्र मानसो वासि प्रज्ञा नेनैन मापुयात्” (कठ, १.२.२४) ऎन्दरॆ दुरा पारगळिन्द हिन्तिरगदवनु ई विधवागि ऒळ्ळॆ ज्ञान मात्रदिन्दले परब्रह्मवन्नु हॊन्दलारनु. नाशास्त्र हागॆये बाहेन्द्रिय निग्रहविल्लदवनू हॊन्दलारनु. ना समा हितः - नानाविध व्यापारगळल्लिट्ट मनस्सिनिन्द समाहित चितनल्ल दवनू हॊन्दलारनु. हागॆये ना शान्तमानसो वासि, मन सन्नु निग्रहिसि शान्ततॆयन्नु हॊन्ददवनू कूड ज्ञानमात्र दिन्दले परब्रह्मवन्नु हॊन्दलारनु” ऎन्दिरुवदरिन्द, हीगॆ बुद्दि पूराघवु प्राप्त वादरॆ परब्रह्म प्राप्तियु इल्लवॆन्दु तोरिरु इदॆयल्ला; हागादरॆ यमवश्यतॆ नरकप्राप्तिगळु भक्तनिगॆ उण्टो प्रपत्र नुष्टिसिदवनिगेनो इवुगळिल्लवॆन्दु हिन्दॆ स्थापिसल्पट्टितु. भक्ति निष्ठनिगॆ हेगॆ ? ऎन्दरॆ, ई इब्बरिगू अवुगळिल्लवॆन्दु मुन्दिन वाक्यदिन्द तिळिसुत्तार. इब्बुद्धि पूर्वोत्तराभिलुव ई बुद्धि पूर्वकवाद उत्तराघवु प्राप्तवागुव सन्दर्भदल्लि, परमै कान्तिगळाद, इवर् गळिरुव कुम् - भक्तिनिष्ठरू भरन्यासनिक्करिब्बरिगू, यमनश्य________________
(98) अपराधपरिहाराधिकारः १५४० इब्बुद्धि पूर्वोत्तरामुलुम् परमै कान्तिगळान इव गळिरुवरु यमवश्यतादिगळिल्लि ऎन्नुमिडम् “र्य र्क कुले जाता यत्र कुत्र निवासिनः । वासुदेवरता नित्यं यम लोकं नयान्ति ते” इत्यादि वचन बलत्ताले सिद्दम्, ऒरुपापं ताने जाति 3 तादिगळ् . यमनिगॆ वशनागिरुविकॆ ऎन्दरॆ यमनु करॆदुकॊण्डु होगि शिक्षिसोणवे मॊदलादवु, आदिशब्ददिन्द नरक प्राप्ति मॊद लादवु हेळल्पट्टवु, इल्लॆ ऎन्नुमिडम् - इल्लवॆन्नुव सन्दर्भ दल्लि, “र्यक्र - यावुदादरू ऒन्दु, कुले - कुलदल्लि जाताः-हुट्टिदवरे आगलि, यत्र कुत्र निवासिनः - यावुदादरू ऒन्दु स्थळदल्लि वासमाडिदवरे आगलि, नित्यं वासुदेव रताः - यावागलू वासुदेवनल्लि आसक्तियुळ्ळवरागि आतनन्नु ध्यानिसु वन्था ते - अवरु, यमलोकं - यमलोकवन्नु कुरितु, नयान्ति - होगुवदिल्लवु, इत्यादि - इवे मॊदलाद, वचनबल तालॆ - प्रमाणवचन बलदिन्द, सिद्धम - स्थापितवाददु. प्रबल बुद्धिवत्तराघ प्राप्तवादरॆ, योगिगॆ यमवश्यतॆ नरकप्राप्ति उण्टो ऎन्दरॆ इल्लवॆन्दु प्रमाणपूर्वकवागि स्थापिसिदरु. हिन्दॆ ये भरन्यासवन्ननुष्ठिसिदवनिगॆ यमवश्यतादिगळु इल्लवॆन्दु स्थापिसि द्दरु. अदन्नु ज्ञापक कॊडुवदक्कागियू मत्तु ई भक्त प्रपन्न रिब्बरू नित्यं वासुदेवरतरादुदरिन्द हिन्दॆ उदाहरिसिद श्री वामन वैष्णव पुराण वचनगळू कूड इब्बरिगू आन्वयिसबहुदा दुदरिन्दलू इल्लि इवगळिरुवरुक्कुम् ऎम्ब प्रयोगवु. ई भक्त प्रवन्नरिब्बरू उत्कृष्ट कुलदल्लि हुट्टिदवरे आगलि, निकृष्ट कुल दल्लि हुट्टिदवरे आगलि, ऒळ्ळे दिव्यदेशवासिगळे आगलि कुग्राम वासिगळे आगलि श्रीवासुदेवनल्लि सक्तवाद मनस्सुळ्ळवरादरॆ अव रिगॆ बुद्धि पूराघ प्राप्तवादरू यमलोकप्राप्तियिल्लवॆन्दु ई प्रमाणवु बोधिसुत्तदॆ. आगलि, प्रबलवाद बुद्धिपूरैक अपराधवन्नु इतररु माडिदरॆ________________
१५४१ श्रीमद्र हस्यत्रयसारे गुणाद्यधिकार भेदत्तारॆ गुरु लघु फल भेदवा यिरुक्कु मॆनुमिडं सर्व सम्प्रति पन्नं. इव्वरं राजपुत्रा यमवश्यतॆ नरक प्राप्तियू, भक्तरू प्रपन्नरू माडिदरॆ अन्तह प्राप्तियिल्लवु, अल्प शिक्षॆ मात्रवे ऎन्दरॆ हीगॆल्लादरू उण्टो? स शास्त्रावाद, ऎल्लरन्नू समभावदिन्द नोडुव, सत्येश्वर गॆ इदु सरियो ऎम्बाक्षेप उण्टागबहुदु. अदक्कागि मुन्दिन ऎरडु वाक्य गळिन्द समाधानवन्नु हेळुत्तारॆ. ऒरुपापं ताने - ऒन्दु पापवॆ, जाति गुणाद्यधिकार भेदत्तालॆ - ब्राह्मण, क्षत्रियादि जातियेनु, ज्ञानि, अज्ञानि, पण्डित, अपण्डितादि गुण भेदगळेनु, प्रपन्ननेनु, अप्रसन्ननेनु, इवे मॊदलाद अधिकार भेददिन्द, गुरु लघु फलभेदवायिरुक्कु - हॆच्चशिक्षॆ अल्पशिक्षॆयुळ्ळ फलभेदवन्नु हॊन्दिरुत्तदॆ, ऎन्नुमिडं - ऎन्दु हेळुव सद र्भवु, सत्व सम्प्रतिवन्नं - ऎल्लरू अङ्गीकरिसतक्कद्दॆ. हीगॆ ऒन्दे पापक्कॆ अधिकारभेददिन्द अल्पशिक्षॆयन्नू हॆच्चु शिक्षॆयन्नू सत्व श्वरनु विधिसुवनु ऎम्ब विषयवन्नु सरू ऒप्पतक्कद्दे ऎन्दरॆ शास्त्र सम्मतवाददु मत्तु लोकसम्मतवादुदु ऎम्ब भाववु इल्लि आदि पददिन्द गृहस्थादि आश्रम भेदवू, बुद्धि पूर कत्र, प्रामादि कादिगळू ग्रहिसल्पट्टवु. सत्वशास्तानाद सत्येश्वरनु अवरवर करानुसार शिक्षॆगळन्नु विधिसुवनु. तन्नन्नु शरणु हॊन्दिदरॆ आतन ऎल्ला पापगळन्नु होगलाडिसुवनु. आदरॆ सत्वरन्नू समनागि काणबेकादवनु, हीगॆ शरणागतरन्नु मात्र शिक्षिसदिरुवदू, शरणागत रल्लदवरन्नु शिक्षिसुवदू याव न्यायवॆन्दु केळुवदु हेगॆ असमञ्ज सवो, हागॆये इल्लियू कूड आक्षेपवु युक्तवल्लवु. ऎल्ला पाप गळ नाशवन्नू हॊन्दि कापाडल्पट्टवनु, बुद्धिपूर्वकवाद अपराध वन्नु सम्पादिसिकॊण्डरॆ, अल्प शिक्षॆयिन्द आतनु मुन्दॆ हागॆ पुनरप राधवन्नु माडदॆ हागॆ माडि क्षमिसि कृपया कापाडुवदेनू अस मञ्जसवल्लवॆम्ब भाववु. ऒन्दु पापने लघु गुरुदण्डनॆगळन्नु शास्त्रवे विधिसिरुत्तदॆ. ब्राह्मणनिगॆ ब्रह्महत्यादि पापगळिगॆ १२ वर्ष________________
अपराधपरिहाराधिकारः १५४२ पराधादिगळिल्लोलॆ लोकवय्यादॆयालुम् उपपन्न. न प्रागैमृद्धि पूर्वाघ न चात्यन्त म(नि) नुग्रहः । लघुर्दण्ड प्रवस्य राजपुत्रापराधवत् ॥१५॥ प्रायश्चित्तवू इतररिगॆ नाल्करष्ट काल प्रायश्चित्तवू विधिसल्पट्टिरु तदॆ. “विदुषोति क्रमेदण्ड भूयं” ऎम्ब विध्यनुसार पण्डितन अपराधक्कॆ हॆच्चु दण्डनॆयू, इतररिगॆ अल्प दण्डनॆयू, अज्ञनाद बालनिगू ज्ञानशून्यनाद हुच्चनिगू दण्डशून्यतॆय हेळल्पट्टिरुत्तदॆ. हीगॆ अधिकार भेददिन्द शिक्षॆयल्लि गुरुलघुभाव गळु सत्व सम्मतवादवु. लोकन्यायदल्लू इन्तह व्यत्यासवु समञ्जसवादुदे ऎन्दु हेळुत्तारॆ. इवरं - ई अभिप्रायवु, राजपुत्रनु माडुव अपराधद हागॆ, लोकमादयालुं लोकद नडॆवळिकॆयिन्दलू, उपपन्नं - युक्तवादुदे, कुमारनु ऎन्दिगू अपराधगळन्नु माडदे इरुववनु ईग अप राध माडिरुत्तानॆ. आदुदरिन्द साधारण मनुष्यनिगॆ विधिसुव दण्डनॆ गिन्तलू आतनिगॆ आल्प दण्डनॆयु विधिसल्पडुत्तदॆ ऎम्ब भाववु, जवा ननु हागॆये लञ्च तॆगॆदुकॊण्डरॆ अल्पदण्डनॆयू अमलदारनु लञ्च तॆगॆदुकॊण्डरॆ हॆच्चु दण्डनॆयू विधिसुवदुण्टु, साधारण दवर मनॆयल्लि कद्दरॆ अल्प दण्डनॆयू राजन अरमनॆयल्लि कद्दरॆ हॆच्चु दण्डनॆयू उण्टु. हीगॆ लोकदल्लू ऒन्दे विध अपराधक्कॆ अधिकारानुगुणवागि गुरुलघुदण्डनॆगळु. 1 राज मेलॆ स्थापिसिद अर्थवन्ने ऒन्दु कारिकॆ मूलक सङ्ग्रहिसि हेळु त्तारॆ :- बुद्धि पूरा पेसति . प्रायश्चित्तविल्लद बुद्धि पूरैक वाद अपराधवु प्राप्तवादरॆ, नप्राश्वत् - प्रसदन अनुष्ठानविल्ल दाग हेगो हागल्लवु. प्रपदनक्कॆ मुञ्चॆ बुद्धिपूरकवागि अपराध माडिदुदक्कॆ नरकप्राप्ति मॊदलादवुगळु भगवन्तन निग्रहदिन्द हेगॆ प्राप्तवागुत्तिद्दवो, हागॆ प्रदनानुष्ठानानन्तर उण्टाद बुद्धि पूरैकापराधक्किल्लवु. हागादरॆ सम्पूर्णवागि मन्निसिबिडुवनो ऎन्दरॆ हागू अल्लवु. पूर्वदन्तॆ पूराशिक्षॆयू इल्लवु, पूरा________________
CHER श्रीमद हस्यत्रयसारे आगैयालॆ, अधिकारानुरूपवाग लघु फलमुं नारा काग पुनः प्रपदनं विधिक्कपडुगिरदु. अधिकारि विशेषेपि प्रायश्चित्तस्य आवश्य कत्वं शिष्टतया व्यपदेशरान समर्थरुक्कु लोक सङ्ग्रहत्तु ऎन्दु मुन्दॆ हेळुत्तारॆ. इल्लदॆये इल्लवु, अल्पशिक्षॆयुण्टु न जात्यन्त मनुग्रहः - भगवन्तन सम्पूर्णवाद अनुग्रहवू इल्लवु. राजपु त्रापराधवत् - राजपुत्रनु माडुव अपराधक्कॆ हेगॆ लघुवाद दण्डवो हागॆये, प्रपन्न .. भरन्यासवन्नु माडि दवनिगू ऎन्दरॆ माडिदुदरिन्दले, लघुर्दण्डः - अल्पशिक्षॆयु, ऎन्दरॆ प्रायश्चित्तविल्लदिरुव बुद्धिपूरो राघ प्राप्तवाद सन्दर्भ दल्लि, प्रपन्ननिगॆ अल्पशिक्षॆयु ऎन्दु निगमिसल्पट्टितु. राजनू हागॆये इतररिगॆ विधिसुवष्टु कूरदण्डनॆयु तन्न पुत्रनिगॆ अवश्यक विल्लवादुदरिन्द अष्टु कूरदण्डनॆयन्नु विधिसुवदिल्लवु. पूरा मन्निसिबिट्टरॆ प्रजॆगळल्लि तन्न गौरववु उळियुवुदिल्लवादुदरिन्द अल्पशिक्षॆयु आवश्यकवॆन्दु तिळिदु हागॆये विधिसुवनु. बुद्धि पूरो राघक्कागि परितापपट्टु प्रायश्चित्त रूपदल्लि शरणागति माडिदरॆ, आ लघुदण्डनॆयू इल्लवॆन्दुपदेशिसुत्तारॆ- - आगैयाल्– आ कारणदिन्द, ऎन्दरॆ प्रपन्नन विषयदल्लि बुद्धिपूरैकवाद अप राधक्कॆ अल्पशिक्षॆ मात्र विधिसिरुवदरिन्द, अधिकारानु रूपमाग - तानु प्रदनानुष्ठान माडिद अधिकारक्कॆ तक्क लघ फलमुं वारामैक्काग - आ लघुदण्डनॆय कूड बारदिरुवदक्कागि, पुनः प्रपदनं विधिक्कि पडुगिरदु - प्राय श्चित्तरूपवाद पुनः प्रप तियु “अपाय सञ्ज्ञॆ” ऎम्ब वाक्यदिन्द विधिसल्पट्टिरुत्तदॆ. भक्तिमार्गनिष्ठनिगू बुद्धि पूरा घक्कॆ प्रायश्चित्तद आवश्यकतॆयु हिन्दिन वाक्यदल्लि असमर्थनाद प्रपन्ननाद भरन्यासवन्नु माडिदवनिगॆ बुद्धि पूराघवु प्राप्तवादरॆ, प्रायश्चित्तक्कागि पुन________________
अपराधपरिहाराधिकार १५४४ कागवुम्, प्रसिद्ध निमित्तळिल् यथाशक्ति प्रसिद्ध प्राय शि, मुचित व. अदु तविरुगैयुव र्मुन्म आज्ञाति शरणागति माडुवदरिन्द इदू कूड मन्निसल्पट्टु देहावसानदल्लि मोक्षवु, प्रायश्चित्त माडिकॊळ्ळदिद्दरॆ, लघदण्डनॆयन्नु विधिसि, आतनन्नु मन्निसि ई देहावसानदल्लि मोक्षवॆन्दु हेळल्पट्टितु. प्रसङ्गात् शक्तनागि प्रसन्ननाद भक्तिनिष्ठनिगॆ हेगॆन्दु तिळिसुत्तारॆ. शिष्ट तया-कर ज्ञान भक्तियोग निष्ठरॆन्दु, व्यपदेश्वरान- प्रसिद्धरॆन्दु हेळिसिकॊळ्ळुव, समररुक्कु - उपासनारूप उपा यक्कॆ समराद प्रसन्नरिगॆ, इल्लि समर : यारु ऎम्बुवदू हेगॆ समररॆम्बुवदू हेळल्पडलिल्लवु. हिन्दॆयॆल्ला भन्यास निष्ठन विषय हेळिदुदरिन्द ई वाक्यवू अवरिगेने अन्वयिसुत्त दॆन्दु भाविसिदरॆ, प्रायश्चित्तक्कॆ बेकाद द्रव्य मॊदलाद उपपत्ति युळ्ळवरॆन्दु अम्म हेळबहुदु. हागल्लदॆ भरन्यासनिष्टरॆल्ला आ किञ्चिन्य वुळ्ळवरागि अशक्तरु. भक्ति योगनिष्ठरु आ किञ्चिन्यविल्लद सम रादुदरिन्द अवरन्नुद्देशिसि हेळल्पट्टितॆन्दु भाविसबहुदु. अथवा ई मेलिन ऎरडु विध अधिकारगळन्नू कुरितु हेळल्पट्टितॆन्दु हेळि दरू एनॊन्दू बाधकविल्लवु, भरन्यासनिष्ठरु असमर्थराद प्रप नरु, समर्थराद प्रपन्नरु उपासनानिष्टरु, लोकसङ्ग्रहत्तु क्यागुवुम् - पापगळु कळॆयुवदक्कागि मात्रवल्लदॆ लोकद जनरु अनुसरिसि नडॆयुवदक्कागियू कूड, प्रसिद्द निमित्तण्णळिल्- प्रसिद्धवाद कारणगळिन्द बुद्धिवू राघवु प्राप्तवादरॆ, यथा शक्ति - तन्न शक्तनुसारवागि, प्रसिद्ध प्रायश्चित्तम् - शास्त्रदल्लि प्रसिद्धवाद प्रायश्चित्तानुष्ठानवु, अथवा प्रसिद्धवागि ऎल्लरू तिळि युवन्तॆ प्रायश्चित्त माडिकॊळ्ळुवदु, उचितव - योग्यवु. ई भक्तियोगनिष्ठनु तन्न उपासनादिगळिन्द महाशिष्टनॆन्दु प्रसिद्दनु. अन्तवनिगॆ बुद्धि पूरोत्तराघवु प्रसिद्धवागिये प्राप्तवादरॆ, अन्थावन्नु पापपरिहारक्कॆ मात्रवे अल्लदॆ लोकसङ्ग्रहार्थ वागियू प्रसिद्धवागिये प्रायश्चित्तवन्नु अनुष्ठिसतक्कद्दु आवश्य________________
१५४५ श्रीमद्रहस्यत्रयसारे लङ्घन माम्, सैरन्धि कैक्कु सेवॆ तप्पि नपोदु तादात्विक मान परिमळादिगळ्ळॆयु मिळन्नु भयानुभव मुमुण्डा मा कवु. एकॆन्दरॆ :- आतनु शिष्टतया श्रेष्ठनादुदरिन्द, “यद दा चरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरोजनः”(गी ऎन्दु हेळिरुवदरिन्द, इन्तह श्रेष्ठराद महनीयरॆ? बुद्धिपूरोत्तराघक्कागि प्राय श्चित्तवन्नाचरिसिरुवदरिन्द नावू हागॆ माडतक्कद्दॆन्दु तोरलि ऎम्ब वदक्कागि कूड अनुष्ठिसतक्कद्दॆम्ब भाववु. आदुदरिन्द भक्ति मार्ग निष्ठनु बुद्धिपूरो राघक्कॆ ऎरडु कारणगळिन्द प्रायश्चित्तवन्नु माडिकॊळ्ळतक्कद्दु. (१) पाप निवृत्यर्थवागियू, (२) लोकसङ्ग्र हार्थवागियू प्रायश्चित्तवु आवश्यकवु. हागॆ प्रायश्चित्तवन्नु माडिकॊळ्ळदिद्दरॆ, प्रत्यवाय उण्टॆन्दु मुन्दिन वाक्यदिन्द तिळिसु त्तारॆ
- अदु तविरुगैयुम् - बुद्दिपूरो राघक्कॆ इन्तह प्रायश्चित्तवन्नु त्यजिसुवदु, र्मुखिन्न - हिन्दॆ प्रतिपादिसिद हागॆ, ऎन्दरॆ आज्ञा कैरत्यागवु हेगॆ भगवन्नि ग्रहक्कॆ कारणवागु इदो, हागॆ, आज्ञातिलङ्घनाम् - भगवन्तन आज्ञॆयन्नु मीरिद हागागुत्तदॆ, ऎन्दरॆ भगवन्निग्रहक्कॆ पात्रनागुत्तानॆम्ब भाववु. इदु सत्व प्रपन्नरिगू अन्वयिसुव सामान्य वाक्यवागि भाविसबहुदु. सद्वारक प्रपत्तिनिष्ठने आगलि, अद्वारक प्रपत्ति निष्कने आगलि बुद्धिपूरकवाद अपराधगळिगॆ प्रायश्चित्तवन्नु माडि कॊळ्ळले बेकु. हागॆ माडिकॊळ्ळदे होदरॆ अप्रपन्नन हागल्लदॆ प्रपन्ननिगॆ ऎरडु विधवागि अनर्थक्कॆ कारणवादुदागुत्तदॆ. हीगॆम्बुवदन्नु मुन्दिन वाक्यदिन्द सदृष्टान्तवागि तिळिसुत्तारॆ :- सैरिन्थ् ऎन्दरॆ राजन पट्ट महिषि मॊदलादवरुगळिगॆ अलङ्कार माडुववळु, इन्थावळिगॆ यावुदो ऒन्दु बुद्दिपूर्व कापराधद मूलक सेवॆ तप्पिन पोदु ई अलङ्कार रूपक्कॆ तप्पिहोदाग तादात्विकमान - अदरॊन्दिगॆ आगलेउण्टागुत्तिद्द, परिमळादि गळ्ळियु - सुगन्धद्रव्य मॊदलादवुगळ भोगवन्नू कूड, इन्नु - परित्यजिसि, ऎन्दरॆ कळॆदुकॊण्डु, भयानुभववु -________________
अपराध परिहाराधिकार पोलॆ आज्ञातिलङ्घनम् इरॆन्दु पडिय नर्थ. बुद्दि पूर्वोत्तराघ शमनार्थञ्च प्रथम प्रपदन मितिवादस्यनिरासः १५४६ स्वच्छामात्रत्ताले बुद्धिपूर्वोत्तराघयुम् प राजनु इन्नेनु शिक्षॆयन्नु विधिसुवनो ऎम्ब भयप्राप्तियू, उण्डामालॆ - उण्टागुव हागॆ इन्तह, आज्ञातिलङ्घनम्- प्रायश्चित्त माडिकॊळ्ळबेकॆन्दिरुव आज्ञॆयन्नु मीरिद, इरण्डु पडि- ऎरडु विधवागि, अनरम् - हानियन्नुण्टुमाडुत्तदॆ. ई राज्य यरन्न लङ्करिसुव स्त्रीगॆ हेगॆ (१) कैय्य तप्पिदुदरिन्द जीवनोपा यवु तप्पिहोयितो, (२) राजनु एनु दण्डनॆ विधिसुवनो ऎम्ब भयदिन्दुण्टाद असुखवो, हेगॆ ऎरडु विध अनर उण्टायितो हागॆये प्रसन्नरिगू हीगॆ बुद्धिवॊत्तराघक्कॆ सत्येश्वरन आज्ञा रूप प्रायश्चित्तवन्नु माडिकॊळ्ळदिद्दरॆ, ऎरडु विध अनर उण्टु : (१) भगवद्भागवत कैरवु तप्पि होगुवदू (२) एनु शिक्षिसिबिड्त वनो ऎम्ब निग्रहरूप भयवू, आदुदरिन्द प्रायश्चित्तावलम्बन दिन्द ई ऎरडु विध अनर्थगळू तप्पुत्तवॆम्ब भाववु, प्रथम प्रपदनवे बुद्धि पूरो राघद शमनारवॆम्ब नादद निरासवु प्रथम प्रपदनकालदल्ले बुद्धि पूत्त राघद अन्वेषक्कागियू एकॆ प्रपदनवन्ननुष्टिसकूडदु ऎन्दु हिन्दॆये चक्कॆ नडॆदु हागॆ शास्त्र प्रमाणविल्लवादुदरिन्द हागॆ अनुष्ठिसुवदु सरियिल्लवॆन्दू, इन्नू अदरिन्दुण्टागुव दोषगळू उण्टॆन्दू, उपपादिसल्पट्टवु. ईग बुद्दिपूराघक्कॆ प्रायश्चित्तवु आवश्यकवॆन्दू हागॆ प्राय श्चित्तवन्ननुष्ठिसदिद्दरॆ ऎरडु विध अनर्थप्राप्तियॆन्दू हेळिदनन्तर बुद्धिवू राघ ऎन्दुण्टागुव अनर्थगळन्नु तप्पिसिकॊळ्ळुवद कागि प्रमाणबलविल्लदिद्दरू, नावे एकॆ स्वतन्त्रिसि स्वच्छा मात्र दिन्दले अनुष्ठिसकूडदु ऎम्ब प्रश्नॆगॆ उत्तरवन्नु हेळुत्तारॆ :-________________
१५४ श्रीमद्रहस्यत्रयसारे अडियिले प्रहदनं पण्णिनालो वॆन्निल् ? इदु उपासन युव बुद्धि पूर्वॊ राघुक्कुम् परिहारवाग पणि नालो, अण्ण प्रपत्तियु अदुक्कुर पण्णि नालो नॆक्कर प्रतिबन्दियाले निरम्. ఒ स्वच्छामात्र ताले - प्रमाणवाक्यविल्लदिद्दरू, नावे स्वतं त्रिसि नम्म इच्छा मात्रदिन्दले, बुद्धिपूराघवन्नू, पत्र - कुरितु, अडियिले - प्रथमदल्लि प्रपदनं पण्णिनालॊवॆन्निल्- इदन्नु सेरिसि प्रपदनवन्ननुष्ठिसिदरॆ ? ऎन्दरॆ, ई वादवु आयु कवादुदॆन्दु तोरिसुवदक्कागि अन्तह चोद्यगळन्नु उदाहरिसि निरसन माडुत्तारॆ. इदु - ई चोद्यवु, उपासनयुम् उपासनवन्नू कूड, बुद्धि पूत राघक्कू कूड, परिहारवाग पनालो परिहारवागि एकॆ माडकूडदु? आ उपासनक्कॆ सेरिद अण्ण प्रपत्तियुम् - अङ्गवाद शरणागतियन्नू कूड, अदुक्कु च्र - अदरॊन्दिगॆ सेरिसि, ऎन्दरॆ बुद्धिपूराघ निवृत्तिगागि ऎम्बरवु, हण्णिनालो - एकॆ माडकूडदु ? ऎर प्रतिबन्धि यालेऎम्बुव प्रतिचोद्यगळिन्द, निरम् - निरसनमाडल्पट्टितु. ई सन्दर्भगळल्लि शास्त्रवू शास्त्रज्ञर अनुष्ठानगळिगू नम्म वादवु समञ्जसवागिरबेकु, हागल्लदॆ शास्त्रक्कू, शास्त्रज्ञर अनुष्ठानक्कू, विरोधवागि स्वमति विजृम्भणॆयिन्दुण्टाद युक्तिवाद दिन्द स्वतन्त्रिसि तन्निष्टानुसारवाद अनुष्ठानवु लोकगरितवादुदु. आदुदरिन्द तन्निष्टानुसार, प्रथम प्रदन माडुवागले बुद्धिपू रो राघ निवृत्तिगू प्रपदन माडि बिट्टरो ? ऎन्दरॆ, अन्तह अनष्ठानक्कॆ शास्त्रबलवू इल्लवु, हागॆये, महनीयर अनुष्ठा नवू इल्लवु ऎन्दु हेळुवदक्कागि अन्तह चोद्यवन्न तावु माडि असमञ्जसवॆन्दु तोर्पडिसुत्तारॆ. हेगॆन्दरॆ भक्ति निष्ठनू कूड बुद्धि पूराम प्राप्तियिल्लदिरुवदक्कागियू कूड उपासनवन्ने एकॆ अनुष्ठिसकूडदु ? अथवा अण्ण प्रपत्ति माडुवागले ई बुद्दिपू तराघ निवृत्तियन्नु सेरिसि एकॆ अनुष्ठिसकूडदु ऎन्दू कूड केळ________________
अपराधपरिहाराधिकारः इरुवरुक्कुम् इप्पडियागट्टु न भाष्यादिविरुद्ध वाग्य याले अपसिद्दानम्, उपस्ति प्रकृतिगळान ब्रह्मनिष्कर बहुदु. इवु हेगॆ शास्त्रविरुद्धवो मत्तु शास्त्रज्ञर अनुष्ठानक्कू विरोधवो, हागॆये मॊदलिन चोद्यवू सह ऎम्ब भाववु. भक्ति निष्कनु बुद्धि पूराघद फलवन्नु अनुभविसिये तीरबेकु. इदु प्रारब्ध पापानुगणवागि प्राप्तवागुत्तदॆ. आदरॆ अन्तह पापवु प्रतिपदोक्त प्रायश्चित्तिनिधि ऎन्दरॆ ई पापक्कॆ ई प्रायश्चित्तवु ऎन्दु विधिसिरुव रीत्या, प्रायश्चित्त माडिकॊण्डरॆ निवृत्तिये विना तन्न इष्टानुसार नडॆयुवदरिन्द निवृत्तियु सिद्धिसुवदिल्लवॆम्ब भाववु ई हीगॆ शास्त्रविरुद्धवॆन्दू शास्त्रज्ञरनुष्ठानक्कू विरोधवॆन्दू मुन्दॆ प्रदर्शिसल्पडुत्तदॆ. हिन्दॆ चोद्यक्कॆ प्रतिचोद्यदिन्द सरि यल्लवॆन्दु हेळिदरु. मुन्दॆ ई ऎरडु अभिप्रायगळन्नू अनु मोदिसिदरो ऎन्दरॆ श्री भाष्यादिगळुपदेशक्कॆ विरुद्धवागुत्तदॆन्दु तिळिसुत्तारॆ. इद्विरवरुक्कुम् - ई इब्बर विषयदल्लू, भरन्यास निष्ठ भक्तियोगनिष्ठरिब्बर विषयदल्लू, इप्पडियागट्टु मॆनै - हीगॆये आगलि ऎन्दु हेळुवदु, भाष्यादि विरुद्ध मागैयाले श्री भाष्यवे मॊदलादवुगळिगॆ विरोधवादुदरिन्द, अपसिद्धानवु. श्री भाष्यदल्लि इन्तह स्वच्छा प्रवृत्ति कूडदॆन्दु ऎल्लि हेळिरुत्तदॆ ऎन्दरॆ, “ अनाविष्टु नैयाक्” (ब्र. सू. ३४.४९) ऎम्ब सूत्र दल्लि हागॆ उपपादिसल्पट्टिरुत्तदॆ. ई सूत्रद विषय वाक्यवाद “तस्माह्मणः पाण्डित्यं निश्चिद बालैन तिष्यास्त्” ऎन्दरॆ वैराग्यवु आवश्यकवादुदरिन्द ब्राह्मणनु पाण्डित्यवन्नु सम्पादिसि कॊण्डु बालभावदिन्दिरतक्कद्दु,” ऎम्बुवदरिन्द बालन हागॆ स्वच्छा वृत्तियन्नु स्वीकरिसबहुदु ऎम्बरवे अथवा आ पाण्डित्य माहात्मयिन्द बालन हागॆ डम्भादिगळिल्लदॆ इरतक्कद्दे ऎम्ब सन्देहदल्लि, सूत्रवु हेळुवदेनॆन्दरॆ :- अनाविष्टुर्त्व - बालन हागॆ स्व माहात्मयल्लि अभिमानविल्लदवनागिरतक्कद्दु, ऎन्दु हेळ________________
१५४९ श्रीमद्रहस्यत्रयसारे ळुडैय अनुष्ठानत्तुक्कुं विरुद्ध, ल्पट्टितु, इच्छानुसार प्रवृत्तियु हेळल्पडलिल्लवु. एकॆन्दरॆ, अन्व यात् - पाण्डित्य माहात्मयल्लि अभिमानविल्लदिरुविकॆयु ब्रह्म विद्यॆगॆ सहकारि ऎन्दु सम्बन्धिसि हेळिरुवदरिन्द, ब्रह्मविद्यानिष्ठ निगॆ स्वच्छा प्रवृत्तियु मुख्यवागि निषेधिसल्पट्टिरुत्तदॆ. आदुदरिन्द “ स्वछा मात्रत्तालॆ : बुद्धि पूरोत्तराघयुम् पत्र अडियिले प्रपदनवु श्री भाष्यादिगळिगॆ विरुद्धवादुदु स्वच्चा प्रवृत्तियु “नाविरतोदुरितात् ” ऎम्ब श्रुतियल्लू निषेधिस ल्पट्टिरुत्तदॆ. (१५३९नॆय पुट नोडि) “ आहार शुद्ध सत्वशुद्धिः” ऎम्ब श्रुतियल्लू स्वच्छा प्रवृत्ति कूडदॆम्बुवदु तोरिबरुत्तदॆ. श्री भाष्यादि ऎम्बल्लि आदिपददिन्दश्रुति मॊदलाद इतर प्रमाण गळॆल्ला ऊहिसल्पट्टवु. इदू अल्लदॆ श्री भाष्यकाररवरु “ तदधि गम उत्तरपूरा घयो रश्लेष विनाश तत्व पदेशात् ” (ब्र. सू, ४. १. १३) ( ब्रह्मविद्यॆयु प्राप्तवाद ऒडनॆये अदक्कॆ मुन्दॆ माडिद पापगळ नाशवू, तदनन्तर माडुव पापगळ अश्ली पवू उण्टागुत्तवॆ, एकॆन्दरॆ हागॆ श्रुतियल्लि हेळिरुवदरिन्द” ऎम्ब सूत्रद भाष्यदल्लि “तदिदमश्लेष वचनम्प्रामादिक विषयं मनव्यं” ऎन्दु हेळिरुवदरिन्द प्रामादिकवाद उत्तराघद अश्ली षवे विना बुद्धि पूरोत्तराघ विषयवल्लवु ऎम्बुवदु स्पष्टवु. ब्रह्मवित्तादवनु निषेधशास्त्रक्कॆ वश्यनागदॆ स्टेच्छॆयिन्द मनस्सु बन्दन्तॆ इरबहुदल्ला, एकॆन्दरॆ उत्तराघद आश्लेषविल्लवल्ला ऎन्दरॆ हागल्लवु. अदक्कागिये बुद्धिपूराघद अश्लेषवू उण्टा गुवदिल्लवॆन्दु श्री भाष्यकाररु हेळिरुत्तारॆ. आदुदरिन्द इन्तह स्वच्छावत्तियु सरियल्लवॆम्ब भाववु
मुन्दॆ शास्त्रज्ञरू शास्त्रप्रवरकरू आद ब्रह्मनिष्ठर आचर णॆगू, अन्तह स्वच्छा प्रवृत्तियु विरोधवादुदॆन्दु तिळिसुत्तारॆ उषस्ति प्रकृतिगळान – उषिये मॊदलाद ब्रह्मनिष्ठरुगळु पैय - ब्रह्मविद्या निष्ठरादवरु अथवा परब्रह्मपासनानिष्टर अनुष्ठानक्कू सह विरुद्धवादुदु. इल्लि प्रकृति शब्ददिन्द विदुरादि________________
अपराधपरिहाराधिकार १५५० गळ अनुष्ठानवू बोधिसल्पट्टितु. छान्दोग्य प्रथम प्रपाठक हत्तनॆय खण्डदल्लिरुव उषस्ति वृतानवेनॆन्दरॆ :- उषस्तियु चक्र रॆम्बुवर कुमाररु, ब्रह्मवित्तुगळल्लि परमाग्रेसररु, राजन माव औगनाद इब्बन ग्रामदल्लि वसिसुत्तिद्दरु. आग अल्लि प्रबल दुर्भिक्षवु प्राप्तवादाग इवरिगॆ आहार सिक्कदे बहुकाल उपवासविरुववरागि कडॆगॆ प्राणसंशयवन्नु हॊन्दिदवरागि, आ इब्बनु आनॆगळिगागि बेयि सिद हुरुळियल्लि मिक्क अंशवन्नु तिन्नुत्तिरलु, आतनन्नु कुरितु ई उषस्तियु स्वल्प हुरुळियन्नु प्रार्थिसलु, आग इभ्यनु “उत्कृष्टे भोनविद्यते” “ ई उच्छिष्ट हुरुळियल्लदॆ बेरॆ नन्नल्लिल्लवु” ऎन्त प्रत्युत्तरवन्नीयलु ; “ एतेषां मेदेहि” “आ उच्छिष्ट दल्ले स्वल्प ननगॆ कॊडु” ऎन्दु हेळि, आ इभ्यनिन्द कॊडल्पट्ट हुरुळियन्नु परिग्रहिसि, स्वल्पवे तिन्दु, अनुपानक्कागि स्वल्प नीरु बेके ऎन्दु इभ्यनिन्द प्रार्थिसल्पट्टरु. आग उषस्तियु “ उळ्ळि हैं मे पीतङ्ग्यात्” नीरन्नु कुडिदरॆ उच्छिष्ट परिग्रह माडि दन्तागुवदु ऎन्दु हेळि नीरन्नु निराकरिसलु ; अदक्का इभ्यनु नक्कु, हुरुळि उच्छिष्टवल्लवो, नीरु मात्र उच्छिष्टवो ऎन्दु अप हास्य माडलु ; अदन्नु केळि उषस्तियु, हुरुळियन्नु तिन्नदिद्दरॆ प्राणवु उळियुत्तिरलिल्लवु, ईग स्टेच्छॆयिन्द उदक पानमाडिदरॆ उच्छिष्टवागुवदु. अन्तह निषिद्धाहारवन्नु परिग्रहिसतक्कद्दल्लवॆन्दु आतनिगॆ समाधान हेळि, मिक्क हुरुळियन्नु यव्वनस्थळागि इन्नू उपवास माडलु शक्तियुळ्ळ तम्म धरपत्निय कैगॆ कॊट्टरु. अल्लिन्द दम्पतिगळिब्बरू राजनु माडुव यज्ञदल्लि धनारनॆगागि आतन राजधानियन्नु कुरितु तॆरळिदरु. मार्गदल्लि मारने दिनवू ई उषस्तिगॆ प्राणसंशयावस्थॆ पुनः प्राप्तवागलु, हॆण्डतियु शरगि नल्लि कट्टिद्द आ उच्छिष्टवू तम्म उच्छिष्टवू आद अदे हुरळियन्ने सेविसि राजधानियन्नु सारि, हसिवु नीरडिकॆ इल्लदवरागि, यज्ञ सहायकरागि राजनिन्द कॊडल्पट्ट द्रव्यवन्नु स्वीकरिसिदरु ऎन्दु छान्दोग्यवु बोधिसुत्तदॆ. इवरनुष्ठानप्रकार,
- प्राणसंशय मापन्नू योन्नम यतस्ततः । लिप्यतेन सपन पद्म पत्र मिवाम्भस ॥”________________
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- LIBR ME
- श्रीमद्रहस्यत्रयसारे आगैयाले विशेषवचन विल्लामैयाले (१) * कृतेषा “प्राण उळियुत्तो इल्लवो ऎम्ब संशयवुळ्ळवनु याव कारण दिन्द दुष्टान्नवन्नु तिन्नुवनो, आ कारणदिन्द, आतनु आ निषिद्दा हार सेवनॆयिन्दुण्टाद पापदिन्द लिप्तनागुवदिल्लवु” ऎन्दु हेळि रुव हागॆ आपत्कालद बुद्धि पूत्त राघवु प्रपन्ननिगॆ लेपिसुव दल्लवु. अवरु उदकपानवन्नु परित्याग माडिदुदरिन्द, आपत्काल वल्लद बुद्धिपूराघक्कॆ प्रपन्ननु अञ्जतक्कद्दॆम्बुवदु एर ट्टितु. तावु ब्रह्मनिष्ठरादुदरिन्द तम्म स्वच्छा प्रवृत्तियिन्दुण्टाद पापवू कूड लेपिसुत्तिरलिल्लवु ऎन्दु तिळिदवरागिद्दरॆ, उदक पान वन्नु निषेधिसुत्तिरलिल्लवॆम्बुवदु तात्परवु. हागॆये महा भागवत नाद विदुरनू कूड तानु महाज्ञानियागि धृतराष्ट्रनिगॆ उपदेशि सुवहागॆ बुद्धियोगवु स्वामिदत्तवागिद्दरू, धृतराष्ट्रनिन्द प्रार्थि सल्पट्टरू कूड (१) “शूद्रयोनावहं जातोनातोन्य द्दक्कु मुहे? तानु शूद्रयोनियल्लि जनिसिदुदरिन्द ब्रह्मविद्यॆ यन्नु क्षत्रियरिगॆ उपदेशिसुवदु शास्त्रविरुद्धवादुदरिन्द, हीगॆ बुद्धि प्रापराधवन्नु माडुवदु युक्तवल्लवॆन्दु भाविसि अवरिगॆ उप देशवु सनत्सुजातरमूलक प्राप्तवागुव हागॆ माडिदरु. हीगॆ बुद्धि पूत्तराघक्कॆ पूरानुष्ठितवाद प्रायश्चित्त विद्द पक्षदल्लि इय्यनु कॊट्ट जलपानवन्नु उषस्तियरू, धृतराष्ट्रनिगागि उपदेशवन्नू विदुरनू, अज्ज करिसुत्तिद्दरु ऎम्ब भाववु. हीगॆ महनीयर अनु स्नानक्कू विरोधवागुवदरिन्द, स्टेच्छा मात्रदिन्द बुद्धिपू राघक्कागि मॊदले प्रपदनवन्नागलि उपासनवन्नागलि अधि कारानुगुणवागि माडबहुदॆम्ब वादवु निरस्तवॆम्ब तात्परवु. मुन्दॆ इन्नॊन्दु न्यायद मूलकवागियू अन्तह स्वच्छानु स्नानवु युक्तवल्लवॆन्दु तोरिसुत्तारॆ. आगैयाले - हीगॆ बुद्धि पूत्तराघक्कू प्रायश्चित्तरूपवागि उपायानुष्ठानवु, सिद्धा नक्कू महनीयरनुष्ठानक्कू विरोधवादुदरिन्द, विशेषवचन (१) भारत, उद्यो,४१५________________
अपराधपरिहाराधिकार १५५२ पेनुतापोवै” इत्यादिगळिल् कणक्किले निमित्त उदित्ता लल्लदुनैमित्तिकम् प्राप्त मर न्यायम् बुद्धिपू त राघुल् बाधितवागदु. मिल्लामैयाले - अन्तह अनुष्ठानक्कॆ विशेष विधिरूप प्रमाण वचनविल्लदुदरिन्द, “ कृतेपापे - पापवु माडल्पट्टरेने, अनु तापोवै - अनुतापवु प्राप्तवागुत्तदॆ, माडिद पापक्कागि अन्तह अनुताप उण्टादवनिगेने प्रायश्चित्तवु ऎम्ब भाववु.” इत्यादिगळिल् कणक्किले - इत्यादिगळ अभिप्रायानुसार, निमि तम् उदित्तालल्लदु - निमित्तवॆन्दरॆ कारणवु, निमित्तवु उण्टा गदॆ, नैमित्तिक प्राप्तनन्नु - निमित्तद कारूपवाद नैमित्ति कक्कॆ अधिकार उण्टाग वदिल्लवु, ऎच्चर न्यायम् - ऎम्ब न्यायवु, बुद्धि पूत राघद विषयदल्ल, बाधित मागदु - बाधिसल्पडु वदिल्लवु ऎन्दरॆ बुद्दिपूराघद विषयदल्लू ई न्यायवु सरिहोगुत्तदॆ ऎम्ब भाववु. बुद्धि पूत्त राघवु उण्टादरेने आग पश्चात्ताप उण्टागुत्तदॆ. आदुदरिन्दले इदु अनुताप अनु सरिसि बन्द तापवु, अथवा पश्चात् - अनन्तर उण्टाद तापवॆन्दु हेळल्पडुत्तदॆ. ई पश्चात्तापवु प्रायश्चित्ताधिकारक्कॆ विशेषणवु. ई अभिप्रायवु विष्णु पुराणदल्लि “ कृतेषा पॆनुतापोवै यस्य, पुंसः प्रजायते । प्रायश्चिन्तु तक- हरि संस्मरणं परं” ऎम्ब श्लोकदल्लि हेळल्पट्टिरुत्तदॆ. याव मनुष्यनिगॆ पापमाडि दुदक्कॆ पश्चात्ताप उण्टागुत्तदो अन्थावनिगॆ प्रायश्चित्तवु सकृत् हरिस्मरणवे प्रशस्तवाद प्रायश्चित्तवॆम्बुवदु ई श्लोकाभि प्रायवु. साधारणवागि ऎल्ला सन्दर्भदल्लू पापमाडिदनन्तर अनुताप उण्टादरेने प्रायश्चित्तक्कॆ अधिकारवु. हीगॆ अधि कारवे इल्लदिरुवाग प्रायश्चित्तवु ऎन्थाद्दु ऎम्बाक्षेपवु. आदुद (१) वि. पु. २.६,४०________________
72212 श्रीमदहस्य त्रयसारे प्रपत्तॆ- प्रारब्ध पापनिव कत्वं, तारा बुद्धि पूराणोत्पत्यभावश्च. आनपिन्नु आगामि बुद्धि पूरै पापत्तुक्कञ्जि नानागिल्, रिन्द बुद्धिपूत्तराघ उण्टाद नन्तरवे प्रायश्चित्तक्कॆ अधि कार उण्टागुवदरिन्द बुद्धि पूत्त राघ उण्टागुवदक्कॆ मुञ्चॆ अधिकारवे उण्टागुवदिल्लवु. हीगिरुवल्लि बुद्धि पूरोत्तरा क्यागियू उपायानुष्ठानवु असमञ्जसवॆम्ब भाववु. हीगॆ निमित्तवे इल्लदिरुवाग नैमित्तिक कारणवे इरुवदिल्ल. ई न्याय वू बुद्दि पूत्तराघद विषयदल्लि विहितवादुदे. ऒन्दु वेळॆ शास्त्रदल्लि हीगॆ बुद्धि पूत्तराघवु प्राप्तवागुवदक्कॆ मुञ्चॆये उपायानुष्ठानदल्लि इदन्नू सेरिसि माडबहुदॆम्ब विशेषवचनविद्दुदादरॆ, ई न्यायक्कॆ अवकाशविल्लदे इत्तु. अन्तह विशेषवचनविल्लदुदरिन्दले बुद्धि पूत राष्ट्रक्कू ई न्यायवु सल्लतक्कद्दागिरुत्तदॆ ऎम्बभिप्रायवु आदरॆ बुद्धिवू राघदिन्द अनिष्टवु प्राप्तवागदे इरुव हागॆ माडलु एनू उपायविल्लवो ऎन्दरॆ उपाय उण्टॆन्दु उप देशिसुवरागि अदु यावुदु ऎम्बुवदन्नु तिळिसुत्तारॆ :- प्रदन वन्नु प्रारब्धद पापांश निवृत्तिगू माडबहुदु. हागॆ माडलु शास्त्र प्रमाणवू उण्टु. हागॆ प्रदनानुष्ठान माडुवदरिन्द बुद्धिपूराघक्कॆ कारणभूतवाद प्रारब्ध पापवु नशिसिहो गुवदरिन्द, बुद्धि पूरोत्तराघवु प्राप्तवागुवदिल्लवॆन्दु मुन्दिन मूरु वाक्यगळिन्द सप्रमाणवागि तिळिसुत्तारॆ. प्रपदनक्कॆ प्रारब्ध पाप निवर कत्ववू, तन्मूलक बुद्धि पूत्तराघोत्पत्य भाववू, उण्टु आनपिस्टु - हीगादनन्तर, हेगाद नन्तरवॆन्दरॆ बुद्धिपू तराघवू अनुतापवू उण्टाद अधिकारिगेने नैमित्तिकवाद प्राय________________
अपराधपरिहाराधिकार १५५४ अदुक्कु कारण मान प्रारब्ध पापत्तुन्नु प्रपदन रूप प्रायश्चित्तम् पण्ण प्राप्तम; “साध्य भक्तिस्तु सायन्त्रि प्रा रब्ध स्यापि भूयसी” ऎनार्गळिरे श्चित्तानुष्ठानवॆन्दु स्थापितवाद नन्तर आगामि-मुन्दॆ प्राप्तवागुव, बुद्धि पूपावत्तु क्कञ्जिनानागिल् बुद्धि पूत्तरापराधक्कॆ भयपट्टवनादरॆ, अदक्कॆ कारणवाद, प्रारब्ध पापक्कॆ प्रपदनरूप वाद प्रायश्चित्तवु, सण्ण प्राप्तं - माडुवदु युक्तवु. हागॆ माडबहुदॆन्दु ऎल्लि हेळिदॆ ऎन्दरॆ प्रमाणगळन्नु दाहरिसुत्तारॆ :- सा - अन्तह प्रसिद्ध माहात्म युळ्ळ, साध्यभक्तिस्तु - साध्यवाद उपासनारूप भकु पायवु यावुदरिन्दलो अदु ऎम्बुवदरिन्द प्रपत्तियु हेळल्पट्टितु. सााध्याभक्तिर्ययासा - यावुदरिन्द भक्तियु साधिसल्पट्टितो, ऎम्बव्युत्पत्तिय मूलक भक्तु पायक्कू प्रपत्तियु बेकागिरुवरिन्द प्रपत्तिय माहात्मियु हॆच्चु ऎम्ब भाववु, आददरिन्द साध्यभक्तिस्तु ऎन्दरॆ प्रपत्तियादरो, प्रारब्ध स्यापि - प्रारब्ध कक्कू कूड, भूयसी अधिकवाद, हन्रि - नाश कवु ; इदरिन्द भक्त पायवु प्रारब्धनाशकवल्लदुदरिन्द अदक्किन्तलू हॆच्चु माहायुळ्ळद्दॆन्दु हेळल्पट्टितु’’ ऎनार्गळिरे - हीगॆ आ प्रपत्तिय माहात्मियन्नु बोधिसिरुत्तारष्टे, श्रीर्मा, शॆट्ट लूरुनरसिंहाचाररवरु साध्यभक्ति ऎन्दरॆ प्रपत्ति ऎन्दू, अदक्कॆ प्रमाणवागि, “साधनं भगवता प् स एनेति स्थिरामतिः । साध्यभक्ति तथासैव प्रपरि गि?यते” S ऎम्ब वचनवन्नु उदाहरिसिरुत्तारॆ. आदुदरिन्द साध्यभक्तियु बहु वीहिये विना करधारय ऎल्लवु, मत्तु आ बहुहि अरवु साधि सल्पट्ट भक्तिये फलवागि उळ्ळद्दु ऎम्बरवू अल्लवु. यावुदरिन्द उपासनवु साधिसल्पट्टितो, अदु ऎम्बरवन्ने हेळतक्कद्दॆम्ब भाववु. हीगॆ प्रारब्दपापवु नाशवागुवहागॆ सल्पिसि भरन्यास माडबहुदो ऎम्ब क्षेपणॆगॆ प्रमाणविरुवदरिन्द माडबहुदॆन्दु________________
१५५५ श्रीमद्र हस्य सत्रयारे (१) “जन्मान्तर कृतम्पापं व्याधि रूपेण बाधते । तच्छान्ति रौषधॆर्दा न्य र्जपहोमार्चनादिभिः” इत्यादिगळिलु, दानजपादिगळिलु मुळ्ळड प्रारब्ध पाप उपादिसिद हेळिदरु. हीगॆ इदु ऒन्दु ऒळ्ळॆ उपायविरुवाग, इच्चॆ विडुवारु किडैयादु ऎन्दु तावे मेलॆ हागॆ, ई मार्गवन्नू यारू बिडुवदिल्लवु, ऎल्लरू अदन्ने अव लम्बिसि नडिसुवदरिन्द बुद्धिवू राघ प्रायश्चित्त वचनवाद “ अपाय सङ्घवे सद्यः” ऎम्बुवदक्कॆ वैयर्थ उण्टागुवदिल्लवे? ऎन्दरॆ वैयर्थवेनू इल्लवॆन्दु तोरिसुवदक्कागिये इल्लि “आगामि बुद्धिपूर पापत्तुक्कञ्जि नानागिल्ल” ऎन्दु प्रयो गिसिरुत्तारॆ. हागॆ ऎल्लरू भयपडुवदिल्लवॆन्दू, हागॆ भय पडदे इरुववरिगॆ आ “ अपाय सम्पने” ऎम्ब वचनवु अन्वयिसुत्तदॆम्ब भाववु. दृप्त प्रपन्ननु प्रारब्द फलानुभववन्नु अङ्गीकरिसिर ववनु, देहावसानदवरिविगू उपभोगादिगळन्नु तिरस्करिसदे इर ववनु, ज्ञानविवेकादिगळिन्द उत्तराघभयविल्लदिरुववनु, इन्थाव निगॆ ऒन्दु वेळॆ ई आगामि बुद्धि पूराघवु प्राप्तवादरॆ, अन्थाव निगॆ ई पुनश्चरणागति विधियु अन्वयिसुत्तदॆ ऎम्ब भाववु तोरि बरुत्तदॆ. मेलॆ भूयसी ऎम्ब शब्दक्कॆ इतर प्रायश्चित्त विधिगळि गिन्तलू बलवत्तरवादुदॆम्बरवन्नू हेळबहुदु. आदरॆ प्रबलवाद गुरूपायवाद भक्ति मार्गदिन्दलू नाश हॊन्दद प्रारब्ध पापवु ई सुलभवाद प्रपत्तु पायदिन्द हेगॆ नाश्यवु ऎम्बाक्षेपक्कॆ मुन्दॆ समाधानवन्नु हेळुत्तार :- जन्मान्तर कृतम्पापं - बेरॆ जन्मदल्लि ऎन्दरॆ हिन्दिन जन्म गळल्लि माडल्पट्ट पापवु, व्याधिरूपदिन्द, बाधते - ई चेतन नन्नु बाधिसुत्तदॆ. तच्छान्तिः - पूजन्मगळल्लि माडि ईग प्रार - रूपवागिरुव पापफलद शान्तियु, औषधॆ - औषधिगळिन्दलू, (१) विहश्वर संहितॆ.________________
(92) अपराधपरिहाराधिकारः १५५६ नाशं कॊल्लप्पट्टदिरे, आगैयाल् पापारम्भक पापत्तु कञ्जि प्रपत्ति पण्णि नानागिल् अन्नोदु बुद्धि पूरैक पापम् उदियादु. (१) दासस्सखा वाहन वासनं ध्वजः” इत्यादि शान्तियु दानैत - सत्पात्रदल्लि दानमाडुवदरिन्दलू, जपदिन्दलू होम गळिन्दलू, अर्चनादिभिः – देवतात्मनॆ भागवतारनॆ तीर यात्रॆ मॊदलादवुगळिन्दलू, उण्टागुत्तदॆ” इत्यादिगळिलु - ऎम्बिवे मॊदलाद प्रमाणगळल्लू, दानजपादिगळिलु मुट्टड - दान जप मॊदलादवुगळिन्दलू कूड पापनाशवु, शॆल्ल पट्टदिरे - हेळल्प ट्टिरुत्तॆयष्टे. इल्लि दानजपादिगळिलु ऎन्दु औषधियन्नु बिट्टु हेळिरुवदक्कॆ कारणवेनॆन्दरॆ :-प्रारब्ध पाप फलरूप व्याधिय साक्षात्तागि औषधदिन्दुण्टागुत्तदॆ. दानजपादिगळिन्द लादरो प्रारब्ध पापनिवृत्तिद्वारा शान्तियु, हीगॆ अल्प माहा युळ्ळ दान जप होमादिगळु अप्रपन्नन विषयदल्ले शक्तियुळ्ळवु गळादरॆ, प्रबल माहात्रॆयुळ्ळ प्रपत्तियु प्रपन्नन विषयदल्लि प्रारब्ध पापनाशकम्बुवदु कै मुतिक न्यायसिद्धवॆम्ब भाववु आगैयाल् - आदुदरिन्द ऎन्दरॆ, प्रारब्ध पापकक्कू नाशवुण्टॆन्द ऒप्पबेकादुदरिन्द, पापारम्भक पापुञ्जि - बुद्धिपू राघवन्नुण्टुमाडुव प्रारब्धपाठक्कॆ भयपट्टु, प्रपत्ति पण्णिना नागिल् - पारब्ध पापवू नाशवागलॆन्दु प्रासि भरन्यासवन्नु अनुष्ठिसिदवनादरॆ, अप्पोदु - आग बुद्धि पूरैक पापम् उदि यादु - बुद्धिवॊत्तराघवु उण्टागुवदिल्लवु. बुद्दिपूराघद तॊन्दरॆ इल्लदे इरबेकादरॆ, अदक्कॆ कारणवाद प्रारब्ध पापवु नाशवागुव हागॆ माडिकॊळ्ळबेकु ; अदक्कागि मोक्षार्थ भरन्यासदॊन्दिगॆ प्रारब्ध पापवू तॊलगुव हागॆ अपेक्षिसतक्कद्दॆन्दु स्थापिसल्पट्टितु. आदरॆ प्रपन्ननु इन्तह माहात्मयुळ्ळ प्रपदनवन्न नष्ठिसि सश्वेश्वरन निरतिशय प्रीतिगॆ अर्हनागिरुत्तानॆ. आदुदरिन्द “विष्यः प्रसादवाकाङ्क्ष नैष्णर्वा परितोषये तथास्वाराधनेनापि न प्रीतो भगर्वा हरिः ।________________
श्रीमद्रहस्यत्रयसारे गळिरडिये अत्यन्त भगवदररुं सात्विकापराधलेश मुम् प्रत्यवाय करन नुमिडं शाण्डली वृत्तान्तगळिगॆ प्रसिद्ध. यथा तुष्यति देवेशो महाभागवतार्चनात् । तथा न तुष्यति हरिधिवार्चनाद” ऎन्दरॆ 4 विष्णुविन प्रसन्नतॆयन्न पेक्षिसुववनु, अवन सम्बन्धिगळाद भागवतरन्नु सन्तोषगॊळिसतक्कद्दु, तन्न आराधनॆयिन्दलू कूड भगर्वा श्री हरियु अष्टु सन्तोषपडुवदिल्लवु महाभागवतर अम्मनॆयल्लि सत्वदेवतॆगळिगू नियामकनाद सत्येश्वरनु हेगॆ सन्तोषपडुवनो, हागॆये तन्न स्वन्त अम्मनॆयिन्दलू कूड सन्तोषपडुवदिल्लवु.” ऎन्दु हेळिरुव हागॆ प्रसन्ननिगॆ सत्वश्वरनु तुम्बा अन्तरङ्ग प्रियनादुदरिन्द, आतनिगॆ तानागिये बुद्धिपू इराघवु लेपिसद हागॆ एतक्कॆ माडकूडदु ? लोकदल्लू कूड तुम्बा बेकादवरु तप्पु माडिदरू मन्निसिबिडुवदुण्टष्टॆ हागॆये प्रसन्नन बुद्धि पूत्तराघवन्नू स्वामियु एकॆ मन्निसि बिड कूडदु ? ऎन्दरॆ बुद्धि पूत राघवु महाभागवतनाद प्रप नन स्वरूपक्कॆ सरियादुदल्लवादुदरिन्द अन्तह अपराधक्कॆ अल्प दण्डनॆ कूड इल्लदॆ सत्येश्वरनु मन्निसलाररु, आदुदरिन्द बुद्दि पूत्तराघवु प्रत्यवायकवॆन्दू, अन्तह अपराधवु तुम्बा अल्पवागिद्दरू श्रीहरिगॆ अत्यन्त प्रियनाद गरन्तनिगॆ प्राप्तवाद दुरॆकॆय वृत्तान्तवन्नु ज्ञापक कॊडुत्तारॆ :- “दासः स श्वरनाद निनगॆ शेषभूतनॆन्दु तिळिदु विविध कैरगळन्नॆसगुवनु, सखा - समानचित्तवृत्तियुळ्ळवनु, वाहनं - निनगॆ वाहननागु ववनु, आसनं - कुळितुकॊळ्ळुवुदक्कॆ आसनवागुववनु, ध्वजः - तेरिगॆ ध्वजवु, इत्यादिगळिर पडिये - हीगॆल्ला हॊगळल्पट्टिरुव हागॆ, अत्यन्त भगवदररु म - सश्वरनिगॆ अत्यन्त प्रिय रागिरुववरिगू कूड, ऎन्दरॆ गरुर्ता मॊदलादवरुगळिगॆ सात्विका पराधलेशमुम .. भागवतनिगॆ माडिद अपराधवू कूड,________________
अपराधपरिहाराधिकार १५५८ प्रत्यवायकरनन्नु मिडम अनरवन्नुण्टुमाडुत्तदॆ ऎम्बु वदु, शाण्डिली वृत्तान्तादिगळिले - शाण्डिली वृत्तान्त मॊदला दवुगळल्लि प्रसिद्धवु. बुद्धि पूरकवाद अपराधवु ऎष्टु अल्पवागि द्दरू अदक्कनुगुणवाद दण्डनॆयु सश्वेश्वरनिगॆ अत्यन्त बेकादव राद नित्यसूरिगळ विषयदल्लि तप्पिद्दल्लवु ऎम्बुवदक्कॆ शाण्डिली वृत्तान्तवन्नु ज्ञापिसुत्तारॆ. गरुन्तनु सश्वेश्वरनिगॆ दासनागि, सखनागि वाहनवागि, आसनवागि, ध्वजवागि, हीगॆ नानाविध कै निरतनागि सश्वेश्वरनिगॆ अत्यन्त बेकादवनु; इन्थावनू कूड बुद्धि पूापराधक्कागि तुम्बा केशवन्ननुभविसिरुवनॆम्बुवदु शाण्डिली वृतान्तदल्लि प्रसिद्धवॆन्दु हेळुत्तारॆ शाण्डिलि ऎम्बुवळु म हा प्रसिद्धळा भागवशोत्तमळु वृषभगिरियल्लिरुवळागि मध्याह्न कालदल्लि बन्द भागवतरुगळन्नु तुम्बा आदरिसुत्तिद्दळु. हीगिरुवल्लि गालव ऋषियु विश्वामित्ररिन्द उपदेश हॊन्दि, अदक्कॆ गुरुदक्षिणॆ बेडवॆन्दु हेळिदरू केळदे निर्बन्धिसिददरिन्द ऒन्दु किवि मात्र कप्पागिरुव चन्द्रन हागॆ बॆळ्ळगिरुव ८०० कुदुरॆगळन्नु तन्दु कॊड तक्कद्दॆन्दु आज्ञापिसिदरु. इन्तह असाध्यवाद गुरुदक्षिणॆयन्नु बेडिदरल्ला ऎन्दु चिन्तिसि, तन्न सखनाद गरुत्मन्तनॊन्दिगॆ ई ऋषभगिरिगॆ अश्वगळन्नु हुडुकुत्ता बन्दरु. गरुन्तनु यन्नु नोडि, ईकॆयु इन्तह हीन स्थळदल्लि इरलु अनरळु, ईकॆ यन्नु सश्वेश्वरनल्लिगॆ करॆदुकॊण्डु होगलु योग्यळु ऎन्दु मनस्सि नल्लि भाविसिदनु. ऒडनॆ गरुन्तनु तन्न शरीरदल्लिद्द गरिगळॆल्ला बिदु होगि मांसपिण्डदन्तादनु. गालवनु ईतनन्नु कण्डु निनगॆ इन्तह दुस्थिति प्राप्तवागलु कारणवेनॆन्दु केळलु, वैनतेयनु नडॆद वृत्तान्तवन्नु तिळिसलागि, आग गालवरु शाण्डलियन्नु कुरितु प्रसन्न भागतक्कदॆन्दु प्रश्निसलु; आग आकॆयु प्रसन्नळागि आतन शरीरवू रॆक्कॆ गळू मॊदलिन हागॆ दृढवागलि ऎन्दु वरवन्नित्तनन्तर, आकॆय अनु ज्ञॆयन्नु हॊन्दि इब्बरू हॊरटुहोदरॆम्बी वृत्तान्तवु भारतदल्लि (उद्योगपर ११३ने अध्याय) बरुत्तदॆ. आदुदरिन्द महाभाग वतनिगॆ उण्टागुव बुद्धिवू रापराधलेशवू कूड अनिष्ट फलप्रद ना दुदॆम्बुवदन्नु ई वृत्तान्तदिन्द तिळियबहुदॆन्दु पदेशिसिरु________________
श्रीमद्र हस्य त्रयसारे सत्येश्वर नै पोलॆ सूरिगळु अवतरिाल् करवश्य त्तारॆ. इल्लि “दाससखवाहन” वॆम्बुवदरिन्द नित्यसूरिगळल्लि सेरि सश्वेश्वरनिगॆ अन्तरङ्ग प्रियनागि सदा कैरदल्ले निरतनागि माहात्म, हॊन्दिरुववनिगू कूड बुद्धिपूापराधक्कॆ अल्प दण्डवु तप्पिद्दल्लवॆन्दरॆ, साधारण प्रपन्नर विषयदल्लि अन्तह अप राधक्कॆ शिक्षॆयु तप्पिद्दल्लवॆन्दु हेळतक्कद्देनिदॆ ऎम्ब भाववु. आ श्लोक यावुदॆन्दरॆ :- दासस्सखा वाहन मासनं ध्वजो यवितानं व्यजनम् उपस्थितं तेन पुरो गरुत्मत मयः । इदम्फि सम्मर्दणां कशोभिना । ई श्लोकदल्लि नित्यसूरियाद गरुन्तरु हेगॆ श्रियःपतिगॆ सेवॆ यन्नु माडुत्तारॆम्बुवदन्नु हेळुत्तारॆ. यः त्रयमयः - याव मूरु वेदमयवाद दिव्यमङ्गळ विग्रहयुक्तनादवनो दासः - नीनु (सद्वेश्वरनु) शेषियॆम्बुवदन्नरितु सत्वविध कै गळन्नॆसगुवनादनो, सखा - समानचित्त वृत्तियुळ्ळ स्नेहितनो, वाहनं . निनगॆ इष्टवाद स्थळक्कॆ तन्न बॆन्निन मेलॆ बिजमाडिसि कॊण्डु होगुवनो, आसनं - विश्रमिसिकॊळ्ळलु आसनवागुवनो ध्वजः · रथक्कॆ पताकॆयागुवनो, वितानं - सभॆयल्लि मॆल्कट्टु, आगुवनो, व्यजनं - शैत्योपचारक्कॆ बीसणिगॆयागुवनो, त्वदम्फ्रि सम्मरकिणाङ्कशोभिना - वाहनवादाग निन्न कालुगळु आतन कैगळ मेलॆ उज्जुवदरिन्द, जॆड्डु गट्टिरुव गुर्तिनिन्द प्रका शिसुत्तिरुव, तेन - अन्तह माहात्मयुळ्ळ, गरुत्मता - गरुतन्त निन्द, पुरः उपस्थितं - ऎदुरिगॆ इरुव, यारॆन्दरॆ, भवन्तम् ऎन्दु मुन्दॆ इरुत्तदॆ. अन्तह विभूतिगळुळ्ळ सश्वेश्वरनाद निन्नन्नु ऎन्दु यामनॆयरु स्तोत्र माडुत्तारॆ. आदरॆ आकरवश्यराद नित्यसूरिगळाद ई वैनतेयरिगॆ बुद्धि पूरापराधद सम्भववु हेगॆ ऎम्बक्षेप उण्टागबहुदॆन्दु योचिसि समाधानवन्नु हेळुत्तारॆ–________________
अपराध परिहाराधिकारः त्वाभिनयं पलोकहित प्रवर्ति नार्थवाग अपचार परि हारादिगळ्ळि नड पोरुवगळ, सर्वॆश्वरन् पोलॆ - सश्वरन हागॆ, सूरिगळु म् - नित्य सूरिगळू कूड, अवतरित्ताल् - कारणान्तरदिन्द अवतरिसिदरॆ, कर्मवश्यत्वाभिनयम्पण्णि - तावु करक्कॆ ऒळपट्टवरन्तॆ नटिसि, लोकहित प्रवर्तनार्थ माग लोकद जनरिगॆ हितवन्नुण्टु माडुवदक्कागि, अपचार परिहारादिगळ् - भगवद्भागवतरल्लि अप चारपडुवदेनु, अदक्कागि प्रायश्चित्तवन्न नुष्ठिसुवदेनु, इवे मॊदलादवुगळन्नु, इल्लि आदिपददिन्द अपचारक्कागि लघुदण्डनवू सङ्ग्रहिसल्पट्टितु, नडत्ति पोरुवर्गळ - नडिसि होगुवरु. लोकसङ्ग्रहार्थवागि हीगॆल्ला नटिसुत्तारॆम्ब भाववु. भगव द्भागवतापराधवु बुद्धि पूरैकवागि माडल्पडतक्कद्दल्लवॆन्दू, अदक्कॆ फलवन्नु ऎन्थावने आगलि अनुभविसिये तीरबेकॆन्दू, आ दण्डनॆयन्नु तप्पिसिकॊळ्ळबेकादरॆ, पुनः प्रायश्चित्तवन्ननुष्ठिस बेकॆन्दू लोकक्कॆल्ला चन्नागि तिळियपडिसुवदक्कागि हागॆ नटसु रम्ब भाववु हीगॆ बुद्धि पूत्तराघवु प्रसन्नन स्वरूपक्कॆ विहितवादु दल्लवॆन्दू, अदु सम्भविसिदरॆ प्रायश्चित्तवन्नु अनुष्ठिसबेकॆन्दू, हागॆ अनुष्ठिसदिद्दरॆ अदक्कॆ लघुदण्डवादरू तप्पिद्दल्लवॆन्दू हेळ ल्पट्टितु. आदरॆ अन्तह अपराधवु प्राप्तवागि अदक्कागि प्रायश्चित्त माडिकॊळ्ळुवदक्किन्त, साध्यवादरॆ बुद्दिपूापराधवे प्राप्त वागद हागॆ एकॆ माडिकॊळ्ळकूडदु ? प्रक्षाळनाद्दि पङ्कस्य दूरादस्पर्शनं वरम् ऎन्दरॆ कॆसरु तुळिदु कालु तॊळॆयुवदक्किन्त हॆसरु तुळियदॆ दूरदल्लिरुवुदु उत्तमवु ऎम्ब न्यायप्रकार, बुद्दि पूरॆत्तराघ उण्टागद हागॆ माडिकॊळ्ळुवदु ऒळ्ळॆ उपाय वॆन्दुपदेशिसुत्तारॆ. सश्वरनै प्रोलॆ ऎन्दु हेळिरुवदरिन्द सत्येश्वरन कूड अवतारगळन्नॆत्तिदाग तानू कवश्यनॆन्दु तोर डिसिकॊण्डिरुत्तारॆ. श्रीरामनु तनगॆ यव्वराज्याभिषेकवु तप्पि नन________________
५६१ श्रीमद्रहस्यत्रयसारे आगैयाल् भगवति यळनाका गवु, अदुक्काग पुनः प्रपत्तियादल्, लघुदण्डवादल् प्रसज्जि यानॆ क्या वास प्राप्तवादाग, ननु दैवस्य करतत् करानुसार प्राप्त वाद दैवसङ्कल्पवॆन्दु हेळिरुत्तारॆ. हागॆये सीतॆय कूड “विधिन म संहारः प्राणिनां हृवगोत्तम । सौमित्रिं माञ्चा मञ्च व्यसनैः पश्य मोहिर्ता !” करफलवन्नु मीरलु असाध्यवु एकॆन्दरॆ ओ आञ्जनेयने गुरुवे परदेवतॆयॆन्दु तिळिद लक्ष्मणनिगूनू, पतिये परदैववॆन्दु भाविसिद तनगू, धरवे मनिसिद हागिरुव रामनिगू सह दुःखवु तप्पलिल्लवॆन्दु हेळिकॊण्डिरुत्ताळॆ. हागॆये तनगॆ राक्षस स्त्रीयरुगळिन्दुण्टाद बाधॆयू कूड “भाग्य वैषम्य योगेन पुरादुश्चरिते न च । मतत्रापते सत्वं स्वकृतं हु पभुज्यते” तन्न दुष्करफलवॆन्दू, तन्न करफलवन्ने तानु अनुभविसतक्क द्दॆन्दू, “ममैन दुष्कृतं किञ्चहद न संशयः” तनगॆ पूरार्जित दुष्कृतविद्दुदरिन्दले इन्तह दुःखप्राप्ति ऎन्दू हेळि कॊण्डिरुत्ताळॆ. हागॆये श्री कृष्ण बलरामरू कूड सत्यभामॆय मूलक आकॆय तन्दॆय वधॆ यन्नु केळदवरागि तदाकरेश्वररार्ज अनुसृत्य नृलोकताम् । अहोनः परमं कष्ट मित्या विलेपतुः ऎन्दु हेळिरुव हागॆ मानुष व्यापारवन्न भिनयिसुवरागि कण्णिनल्लि नीरु सुरिसुत्ता रोदनॆ माडिदरु ऎन्दु हेळिरुत्तदॆ. हीगॆ कर वश्यरॆन्दु अभिनयिसिरुत्तारॆ. आगैयाल् - हीगॆ महा अन्तरज्ञर विषयदल्लि बुद्दि इत्त राघवु प्रत्यवायकरवादुदरिन्द, भगवतियिळवा मै क्यागवु - भगवतियन्नु होगलाडिसिकॊळ्ळदे इरुवद क्कागियू, अदक्काग - आ कारणक्कागि, पुनः प्रपत्तियादल् - प्रायश्चित्त रूपदल्लि पुनः प्रपत्तियागलि, प्रसः यामैक्काग वु - उण्टागदॆ इरुवदक्कागियू, मेल्क मरुम पराध - वुम् 1________________
अपराधपरिहाराधिकार गवु म, मेलवरुम परार्ध नेररुक्कुम् (पॊरुक्कुम्) विरगु पार वेणु, अपराधळॆल्लात्तुक्कु मडि अविवेक, अदिल् प्रधानमान अविवेकम् अचित्सभावमान जडत्व विकारादिगळॊच्चु मक्क युम्, ईश्वरस्वभावमान स्व निष्ठ सातन्त्रानन्यार्थ विरुगु- ఆ प्रपत्र नन्तर प्राप्तवागुव अपराधगळन्नु, वेररुक्कु बुडसहितवागि कत्तरिसुव उपायवन्नु, सारवेणुम् , गमनिस तक्कद्दु. आ उपायवु यावुदॆन्दरॆ अपराधगळॊन्दू उण्टागद हागॆ माडिकॊळ्ळोणवु. बुद्धिपूरै राघ उण्टागदेने इरु वदक्कॆ अदक्कॆ कारणभूतवाद प्रारब्धकनाशक्कागि प्रपदनवॆन्द ऎ हेळल्पट्टितु. अनन्तर याव अपराधगळू बारद हागॆ माडि कॊळ्ळुव उपायविल्लवे ? ऎन्दरॆ अविवेकवन्नु तनगॆ स्वामियु कॊट्ट विवेकदिन्द छेदिसुवदे ऒळ्ळॆ उपायवॆन्दु हेळुत्तारॆ. अपराध ऎल्ला तुक्कुम् - ई बुद्धि पूत्त राघवे मॊद लाद सरापराधगळिगू, अडि-कारणव, अविवेकवु. अदिल् - आ अवि वेकगळल्लि प्रधानमान अविवेकम् - मुख्यवादवॆन्दरॆ प्रबल वाद अएवेकवु अचिभावमान जडत्व विकारादिगळ्ळि - अचि तिन लक्षणवाद जडत्व विकार मॊदल-दवुगळन्नू इल्लि आदि शब्दवु स्वरूपनाशवन्नु बोधिसुत्तदॆ. शुम युम् आ रोपिसि कॊळ्ळोणवु तनगॆ सम्बन्धपट्टवॆन्दु भाविसोणवू, ऎन्दरॆ देह लक्षणवन्नु आत्मलक्षणवागि भाविसोणवु, ऎन्दरॆ देहात्म भ्रान्तियू, ईश्वरलक्षणवाद, स्वनिष्ठ त्व - तन्नि ष्टानुसार इरुविकॆयु, इतररिगॆ अधीनवागदिरुविकॆयु स्वातन्त्रवु, अनन्यारत्न - यारिगू शेष नॆन्दु भाविसदॆ इरोणवु, इवुगळन्नु, शुमक्कॆयुम् - आरो पिसिकॊळ्ळोणवु, ऎन्दरॆ स्वतन्त्रात्मभ्रान्तियू, अविवेकगळॆल्ला प्रबल अविवेकगळु, 3 “अनात्म न्यात्म बुद्धिय्या चास्टे स्वमितियामतिः । अविद्यातरु सम्भूति बीजमे तदि धा तं 2 (2, 3). 2.2.00)________________
१५५६३ श्रीमद्रहस्य त्रयसारे त्यादिगळॊच्चु मक्कॆ युम्, इ (अ) त्व विवेकय रुक्कु तॆळिवाळायिरुपर्देच्चु रक्कॆ मरतन्नळविलुण्डान तॆळिवु. ऎन्दु हेळिरुव हागॆ देहात्म भ्रमॆयू, स्वतन्त्रात्म भ्रमॆयू; जडस्वभावगळन्नारोपिसिकॊळ्ळुवदरिन्द ताने देहवॆम्ब भ्रमॆ युण्टागुत्तदॆ. परमात्मन स्वतन्त्रादि स्वभावगळन्नु आरोपिसि कॊळ्ळुवदरिन्द स्वतन्त्रनॆम्ब भ्रमॆयुण्टागुत्तदॆ. इवॆरडु विध अविवेकवन्नु विवेकवॆम्ब कत्तियिन्द कत्तरिसतक्कद्दॆन्दु हेळुत्तारॆ इव्व विवेक - ई देहात्मभ्रम स्वतन्त्रात्मभ्रमरूपवाद आवि वेकवन्नु, अरुक्कु " कत्तरिसुवदक्कॆ, छेदिसुवदक्कॆ, तॆळि नालायि रुप्पदु - तीक्ष्मवाद कत्तियागिरुवदु, एच्चु रक्कॆ मर - आधिक्य न्यूनतॆयिल्लद हागॆ, तन्नळविलुण्डान तिळिवु - तन्न स्वरूपद यथार्थ ज्ञानवु. तनगॆ इन्तह अविवेकवॆल्ला कत्तरिसिद हागॆ निवरिसुवदक्कॆ, तन्न महिमॆयन्नु हॆच्चिसद हागू कम्मियागद हागू यथार्थवागि तन्न स्वरूपवेनॆम्बुवदर तिळुवळिकॆयु, तानु ज्ञानत्व, आनन्दत्व अमलत्यादिगळिन्द परिशुद्धनॆन्दू, आदुदरिन्द प्रत्यक्ष जडत्वादिगळु, अचेतनवाद देहक्किन्तलू विलक्षण नॆन्दू तिळियुवदरिन्द देहवे आत्मा ऎम्ब भ्रमॆयु तॊलगु వ
- ईश्वरोहमहं भोगी सिद्योहं बलर्वा सुखी । अय्योzभिजनवनको सदृ शोमया” (गी १६-१४) इत्यादि स्वतन्त्रात्मभ्रान्ति जीवेशैक्य भ्रान्तिगळु तानु सत्येश्वरनिगॆ दासभूतन, नियाम्यवरक्कॆ सेरिदवनु, तानु प्रास्ता अवनु प्राप्यनु, तानु भगवदनन्यार्ह शेषभूतनु, भगवदनन्य शर ण्यनु, भगवदनन्य प्रयोजननु, ऎन्दरॆ भगवन्तनल्लदॆ इन्नु यारिगू तानु शेषभूतनल्लवु, भगवन्तनल्लदॆ इन्यारू तनगॆ रक्षकनिल्लवु, भगवन्तनिगल्लदॆ इन्नु अवरिगू तानु प्रयोजनवल्ल वॆम्बिवे मॊदलाद ज्ञानदिन्द ई अविवेकवु तॊलगुत्तदॆम्ब भाववु,________________
(२८) अपराधपरिहाराधिकारः १५६४ अविवेक प्रभुत्वादेर्निदानस्य निवर नात् । अर्थकामापचाराणा मयस्कूलनम्भवेत् ॥१६॥ हीगॆ भगवन्तनिगॆ सल्लुव महिमॆयन्नू, अचेतनक्कॆ सल्लुव निक्क ष्टतॆयन्नू ईतनु आरोपिसिकॊळ्ळकूडदॆम्बभिप्रायदिन्दले एत्त चरक्कम् ऎम्ब प्रयोगवु. आदुदरिन्द इन्तह आगमो तत्व त्रयस्वरूपज्ञान मूलक विवेक उण्टागि तन्न नैजस्वरूपक्कॆ एत चुरक्कगळन्नु न्यूनातिरिक्तगळन्नु त्यजिसि यथार्थस्वरूपज्ञान हॊन्दुवनागुवनु ई अभिप्रायवे तत्वत्रयाधिकारद आदि श्लोक उदल्लि बहु चॆन्नागि पपादिसिरुत्तारॆ. अदन्ने प्रासङ्गिकवागि इल्लि ज्ञापकक्कॆ कॊडुत्तारॆ. मुन्दॆ तम्म स्वन्त कारिकॆय मूलकवागि इन्तह अपराधगळिगॆ मूलभूतवाद अविवेकवु आत्मयाथार्थज्ञानदिन्द यावाग निव रिसि होगुत्तदो, आग अर्थकाम प्रयुक्त उण्टागबहुदाद बुद्दि वू राघगळु यावुवू प्रपन्ननिगॆ प्राप्तवागुवदिल्ल वॆन्दू प्रयत्न विल्लदेने अन्तह अपचारगळॆल्ला निलवागुव वॆन्दू, उपदेशिसुत्तारॆ :- निदानस्य . सत्वविधापराधगळिगू आदि कारणभूतवाद, अविवेक प्रभुत्वादेः - अविवेकवॆन्दरॆ देहवे आत्मा ऎम्ब अविवेक मत्तु प्रभुत्व - ताने स्वतन्त्रनॆम्ब भ्रमॆ, आदेति - मॊदलादवुगळ, इल्लि आदिशब्ददिन्द जीवपॆरमात्म भ्रम मत्तु तानल्लदॆ बेरे ईश्वरनिल्लवॆम्ब भ्रमॆगळ, निवत्त नात्-तत्रॆय ज्ञान आत्मस्वरूप याथार्थज्ञान इवुगळिन्द निवरिसुवदरिन्द अर्थकामापचाराणां-द्रव्य, काम इवुगळमूलक प्राप्तवागुव बुद्धि पूराघगळ, अयतॊलनं- प्रयत्नविल्लद निरूल नवु, भवेत्- उण्टागुत्तदॆ. हिन्दॆ जीवात्मन स्वरूप याथार्थ ज्ञानवॆम्ब तीक्ष्य कत्तियिन्द ई भ्रमॆगळॆल्ला कत्तॆरिसल्पडुत्तवॆ ऎन्दु हेळिदुदन्ने समनॆ माडुवुदक्कागि ई कारिकॆयन्नु अनुग्रहिसिरु त्तारॆ. अदन्न नुसरिसिये ई कारिकॆगॆ अर्थमाडुवदु युक्तवु. हीगॆये ऎल्ला व्याख्यात्सॆगळू अर्थमाडिद्दारॆ. आदरॆ सारदीप________________
इवॆ यॆल्ला तु कनाडि फलप्रदासोन्मुख मायि- ऒप्प ऎम्बुवदन्नु अविवेक सभादेश ई देहक्कॆ कै त बरुत्तदॆ. ई ऎ१३ने अल्ल दल्लि आ पराधगळिगॆ अनि न न कारणवॆन्दॆ ई मूल कारण वाद अविवेक, बुद्धि नि राघवु मूल कारणवॆन्दु हेळिदरॆ मूल कारणक्कॆ मूल वोदु ऎन्दु हेळुव दु मूलक आ समञ्जसवु नन्नू कष्ट पट्टु ऒन्दु विधवागि समन्मथनन्नु माडबहुदा हेगॆन्दरॆ : हिन्दिन अपराधगळ ई अनिवॆकगळिगॆल्ला मूल कार इवु. ई अविवेकगळिगॆ मूलकारणवु, पारकवु ऎन्दु हेळु नदरिन्द अपराधगळिन्द. एने इवू, अविवे निदिन्द अपराधगळ हीगॆ बीज न्यायद प्रकार उण्टागुत्तवॆन्दु हेळबहुदु. आदरॆ हिन्दॆ उसपादिसिदुदन्नॆ कालकॆ मूलक समरनॆ माडुवॆ पद्धतियिरुवुदरिन्द मॊदलिन अर्थवे समञ्जसवागि तोरुत्तदॆ. बुद्धि पूत्त राघगळु उण्टागदे इरुव क्रमवु हिन्दॆ उपपादिसिदरल्ल कारिका मूलक समनॆयल्ल आत्म स्वरूप- यथार्थज्ञानदिन्दुटाद विवेकदिन्द आएवेकरूपवाद देहात्म स्वतन्त्रात्म देव परमात्म भ्रमगळु तॊलगुवदरिन्द बुद्धिपुत्र राघ रूपवाद द्रव्य कामाभिलाषॆगळिन्द प्राप्तवागुव बुद्दि राघगळु नशिसिहोगुत्तवॆ ऎन्दु हेळल्पट्टितु. आदरॆ________________
अपराध परिहराधिकारे CALL गॊरु पूरामाय्कॆयाले अदिनुडैय निवृत्तिक्कुवाग व लाली प्रशसदल्, इदनु ऒन्नॊरु प्रहहुदल् कॆय दाल् क्लिफैयॆल्लां सरिस्कृताम्. अभ्यासगळ परब्बर पाषारम्भक पापदिन्द प्राप्तवाद वासना ऒलिवागिद्दरॆ, आग इदु ई दिवेकानवन्नु विरोधिसि, बुद्दि पूर्ति राघव ऒन्दु वेळॆ प्राप्तवागबहुदल्ला ऎन्दरॆ, अन्था दैव कूड प्रशस्ति संस्कार बलदिन्द प्राप्तवागद हागॆ परिहरिस हनॆन्दु, “इनैयॆल्लाक्कु” ” ऎन्दु प्रारम्भिसि हेळुत्तारॆ. इवै ऎल्ला कन ई बुद्धिरापराधगळाद अत्म कामानॆकारगळिगिल्ला, अडि – मूलकारणवु, फलप्रदानो न्मुख मार, हृद) - फलवन्नु कॊडलु अभिमुखवागिरुवन्थ, ऒरु पूरामागैयले - ऒन्दु मॊदलु माडिद पासकरॆ वागि ईग प्रारषापकनॆन्दु हॆसरन्नु हॊन्दिरुवन्तादादुद रिन्द अदिनुडैय निवृत्ति - आ प्रारहास निवृत्तिगागि, आडि मले – प्रतिमदल्लि’ ऎन्दरॆ मोक्षार्थदॊन्दिगेनॆ, प्रपति सण्ण दल् - प्रश्नॆ नष्ठान वन्नागलि, इदक्कॆनु – अनन्तर मोक्षार्थ कैन्दल्लदॆ, ई प्रारब्ध पापनिवृत्तिगागि ऎन्दु ऒरु प्रपत्ति षण्मुदल् इन्नॊन्दु सल प्रपु, नष्ठानवन्नागलि, యా 89
- माडिदवरिगॆ, इवैयॆल्ला - ई बुद्धिपू’राघ शपगळाद अर्थकामा पचारगळॆल्ला, परिष्कृतराम् - सरि हारवागुववु. बुद्दिपूराघगळिगॆ कारणवु पापारम्भक प्रारब्ध पापकरवु. इदु होदरॆ बुद्दिपूराघगळु निवर्तिसुत्तवॆ. आदुदरिन्द आ पापारम्भक प्रारब्बर निवृत्तिगागि मोक्षार्थ प्रपदनवन्नु गुरुसन्निधियल्लि अनुष्टिसुवागले अदर निवृत्तिगागियू ऎन्दु ससि प्रपत्र नुष्ठान माडबहुदु. कागिल्लदिद्दरॆ ई प्रारब्ध पाप निवृत्तिगॆन्दु मात्रवे इन्नॊन्दु सल गुरुसन्निधियल्लि प्रपदनवन्ननुसबहुदु. आदरॆ आर्थ प्रस दनवु सकृदनुष्टिसतक्कदादुदरिन्द ई ऎरडने सल अनुष्टिसुवाग________________
श्रीमद्रहस्य नित्र यारे एवं परिहरणीयेसु भागवतापचार- प्रधान इप्पडि इवनुक्कु परिहरणीयज्ञानव ल् राजारा पराधमोलॆ भागवतापचारव प्रधानवन्नु मिड (१) ए मोक्षार्थवागि पुनः अनुष्ठिसतक्कद्दल्लवॆन्दु तिळिसुवदक्कागि इल्लि इदक्कनु ऎम्ब प्रयोगवु. हीगॆ बुद्धि पूरो राघगळन्नु आगमोक्षज्ञान, विवेको ज्ञानगळिन्दलू पापारम्भक प्रारब्ध पापकर निवृत्तिगागि प्रपत्ति यन्न नुसुवदरिन्दलू, अर्थ कामापचाररूप बुद्धिपू राघगळन्नु संहरिसिकॊळ्ळतक्कद्दॆन्दु उपदेशिसिदरु. मुन्दॆ इन्तह परिहरिसिकॊळ्ळुव अपचारगळल्लि तुम्बा प्रबलवाद अपचारवु भाग वतापचारवॆन्दू भागवतरुगळ विषयदल्लि हेगिरबेकॆन्दू, भाग वतापचारवु प्राप्तवादरॆ हेगॆ परिहरिसिकॊळ्ळतक्कद्दॆन्दू, इवे मॊदलादवुगळन्नॆल्ला तिळिसि, मूरु कारिकॆगळिन्द समद्धिसि, अधिकार परिसमाप्तियन्नु माडुत्तारॆ. हीगॆ परिहरिसिकॊळ्ळुव अपचारगळल्लि भागवतापचारवु प्रधानवु. इप्पडि - हीगॆ ऎन्दरॆ आत्म याथार्थज्ञानदिन्दलू, मत्तु प्रारब्ध पाप निवृत्तिगागियू प्रपत्ति माडुवदरिन्दलू इवनुक्कु - ई कृतकृत्यनाद प्रसन्ननिगॆ, परिहरणीयङ्गळानवल् - परि हरिसिकॊळ्ळबेकादवुगळल्लि, राजदारापराधमोलॆ - राजपत्निय अपराधद हागॆ, पतिव्रता धरवन्नु त्यजिसिद अपराधद हागॆ, भाग वतापचारवु, प्रधानवन्नु मिड - मुख्यवादुदु ऎन्दरॆ प्रबलवादुदु ऎम्ब सन्दर्भदल्लि “एवं मुक्ति फलानियमः…. ऎम्बुव शारीरक सूत्रदल्लि श्री भाष्यकाररवरु, आरुळिचॆ दार्- अप्पणॆ कॊडिसिरुत्तारॆ. श्री भाष्यकाररु ई भागवतापचारवु (१) ब्र. सू, ३, ४, ५०________________
नं न ऎ अपराधपरिहाराधिकार mater फलानियम दवस्थावध्यतॆ स्वदवाव धृते” सूत्रलॆ श्री भाष्यकारर् अरुळिचॆय दारि, प्रबलवादुदॆन्दु ई सूत्रद भाष्यदल्लि उपदेशिसिरुत्तारॆम्ब भाववु ई सूत्रार्थवेनॆन्दरॆ :- एवं - हीगॆये ऎन्दरॆ हिन्दॆ ऐहिक श्रेयस्सिगागि माडुव उपासनॆसिद्धियल्लि हेगो हागॆ, मुक्तिफला नियम : पुफलवन्नु कॊडव उपासनासिद्धियल्ल, अनिय मवु - नियमविल्लवु, एकॆन्दरॆ तदवस्त्रवॆन्दरॆ अन्तह प्रतिबन्धविल्ल दिरुव अवस्थॆयल्लि, अवधृते - मुक्तिफलद निश्चयवु तोरिबरु वदरिन्द ; श्री यतिवर ु हेळुत्तार :- तत्रापि ब्रह्मविदपचारा सां पूत्व कृतानां प्रबलानां सम्भवात् प्रतिबद्ध सम्भवः” “ब्रह्मवित्तुगळिगॆ माडिद अपचार रूपवाद हिन्दॆ माडिद दुष्कर गळु तुम्बा प्रबलवादुदरिन्द प्रतिबन्ध उण्टागुत्तदॆ” ऎन्दु अल्लि व्याख्यानमाडिरुत्तारॆ. इल्लि प्रतिबन्धवावुवॆन्दरॆ ब्रह्मविदप चारवु, इदु बलवत्तरवाद विघ्नवादुदरिन्द, अन्तह प्रतिबन्ध विद्दरॆ विळम्बवू, प्रतिबन्धविल्लदिद्दरॆ ऒडनॆये उण्टागबहुदु ऎम्ब भिप्रायवु. “तदवावधृते” ऎन्दु ऎरडु सल हेळिरुवदु अध्यायवु मुगियितॆन्दु सूचिसुत्तदॆ. उपनिषत्तुगळल्लि कूड “नारयण सायुज्यमवाति नारायण सायुज्यमवा प्रति” ऎन्दु ऎरडु सल हेळुव वाडिकॆयुण्टु. राजनिगॆ तन्न हॆण्डतियु सतीधरदल्लिल्लवॆन्दु तिळिदरॆ आतन प्रबल निग्रहक्कॆ हेगॆ पात्रळागुवळो, हागॆये प्रपन्ननू भागवतापचार माडिदुदादरॆ भगवन्तन प्रबल निग्रहक्कॆ गुरियागुवनॆम्ब भाववु. आदुदरिन्दले सल्प सूरोदयदल्लि, “त्र ब्रह्म विदागसः,” ब्रह्मवित्तिगॆ अप चार ऎल्लि सम्भविसुत्तदो ऎन्दु भयपडतक्कद्दॆन्दुपदेशिसिरुत्तारॆ. भागवतापचारवु भगवदपचारक्किन्तलू गुरुतरवादुदु, “श्री विष्णरवमाननाद्दु रुतरं श्रीवैष्णवोल्लङ्घनं” विष्णुविगॆ अवमान माडुवदक्किन्त श्री वैष्णवन अवमानवु गुरुतरवॆन्दु हेळल्पट्टिरुत्तदॆ. श्रीमा शॆट्टिलूरु नरसिंहाचारैरवरु सल्प________________
CHLF श्रीमद हस्यत्रयसारे भागवत विषये कथं प्रपन्नस्य प्रवृत्ति ? (१) आनपिस्टु गुणवृत्तादिगळाले उत्कृष्टरान पराशर सूरोदयद इन्नॊन्दु श्लोकवन्नु दाहरिसिरुत्तारॆ : “समस्त वृजिनोदधि ग्रसन डम्भ कुम्भोद्भवं निवृत्त मसि धर मत्तॆ नघ तत्वविन्नि ग्रहः, अगस्य महर्षियु समुद्रवन्नु हेगॆ पानमाडिदरो, हागॆ ई निवृत्ति धररूपवाद भक्ति प्रपरूप उपायगळु समस्त पापगळॆम्ब समुद्रवन्नू पानमाडिबिडुत्तवॆ. ऎन्दरॆ नाश माडुत्तवॆम्ब भाववु. इन्तह माहात्म युळ्ळ ई उपायगळन्नू कूड नुङ्गिबिडुवदॆन्दुण्टु, अदु यावुदॆन्दरॆ * अनघ तत्वविन्नि ग्रहः” उत्कृष्टनाद ब्रह्मवित्ताद परम भाग वतन निग्रहवु ऎन्दु हेळल्पट्टिरुत्तदॆ. हागॆये, 66 निर्धनांश्चरतो लोकेवृत्त रमिह वैष्णर्व । नावम नैत शैर्लोकं पवत्रि करुते हरिः, अनेक वैष्णवराद भागवतोत्तमरु विरक्तिभावदिन्दिरुवदरिन्द धनार्जनॆयल्लि मनस्सन्निडदे निर्धनरागिद्दारॆ. अन्थावर देह यात्रॆगोस्करवागि अल्लल्लि ई लोकदल्लि सञ्चरिसुत्ता इरुवरु. हीगिरुवदन्नु कण्डु अवरन्नु अवमान माडकूडदु. एकॆन्दरॆ अनेक कुमारवरिगळाद दुष्टरिन्द अपवित्रवागि माडल्पट्ट ई लोकवन्नु ज्ञाननिष्ठॆ कनिष्ठॆगळिन्द प्रकाशिसुत्तिरुव इवरुगळ मूलक श्रीहरियु पवित्र माडलु उद्देशिसिरुवनु. आदुदरिन्द इन्तह महनीयरल्लि माडुव अपचारदिन्द हॆच्चाद निग्रहवु प्राप्तवागुत्तदॆन्दु तिळिसुवदक्कागि राजदारापराधम्पोलॆ ऎम्ब प्रयोगवु. भागवतर विषयदल्लि प्रपन्ननु हेगॆ नडॆयतक्कद्दॆम्बुदु. ईग भागवतापचारवु सविधापचारगळल्लि अत्यन्त प्रबल वादुदु ऎन्दु हेळल्पट्टितु. हागादनन्तर अवर विषयदल्लि नम्म नडतॆयु हेगिरबेकु ? कॆलवरल्लि उत्कृष्ट निकृष्ट भाववन्नु प्रद________________
अपराधपरिहाराधिकार 0220 व्यास शुक शौनक नाथ मुनि प्रकृतिगळु क्कु, तनक्कु, भागवतत्यादिगळुव परम पुरुषार्थ लाभवुं तुल्यमा यिरुनालुम्, भगवत्सरिग्रहमान गो गोपजातिगळु र्शिसबहुदो ? कॆलवरु निकृष्टरॆन्दु भाविसि, अवरल्लि तिरस्कार बुद्धि यन्नु माडबहुदो ? इत्यादि प्रश्नॆशब्दादिगळिगॆ समाधानवु मुन्दिन “ आनपिन ऎन्दारम्भिसि, “ पॊरन्दु प्रोरवुम् प्राप्त ” ऎन्दु मुगिसि उपदेशिसिद ऒन्दु महावाक्यवागिरु तदॆ. व्याख्यानद अनुकूलक्कागि ई वाक्यवन्नु नाल्कागि विभा गिसिरत्तदॆ. निनैयादॊळियुव’ ऎम्बल्लिगॆ प्रथम वाक्यवागियू, कुरियुत्तिरुक्कुवम् ऎम्बल्लिगॆ द्वितीयवाक्यवागियू सिद्धमॆ निरु कवु ऎम्बल्लिगॆ तृतीय वाक वागियू, पोरवुम् प्राप्तम् ऎम्बल्लिगॆ चतुर्थ वाक्यवागियू भाविसबहुदु. ई कॊनॆयल्लिरुव प्रापम् ऎम्बुवदन्नु इन्नु मूरु कडॆयल्लियू इट्टु कॊण्डरॆ सरि होगुत्तदॆ. हेगॆन्दरॆ “निनैयादॊळियुव प्राप्त इत्यादि. मॊदलु उत्कृष्टराद भागवतरन्नु निकृष्टरॆन्दू निकृष्टरादवरन्नु उत्कृष्टरॆन्दु भाविस कूडदॆन्दुपदेशिसुत्तारॆ :- (१) आनपिन्यु - हीगादनन्तर, ऎन्दरॆ अपचारगळल्लॆल्ला भाग वतापचारवु तुम्बा प्रबलवादुदागि अदन्नु मुख्यवागि त्यजिस तक्कद्दॆन्दु स्थापितवादनन्तर, गुण - शास्त्रज्ञान, भक्ति वैराग्यादि गुणगळु इदरिन्द ज्ञाननिष्ठॆ यु. हेळल्पट्टितु, वृत्तादिगळालॆ - वृत्तवॆम्बुवदरिन्द नित्य नैमित्तिकादि आचारगळु, इदरिन्द कर निष्ठॆयु हेळल्पट्टितु ; सारास्वादिनियवरु वृत्त शब्दक्कॆ काय केशादि रूपवृत्तवॆन्दु व्याख्यान माडिरुत्तारॆ. गुणवृत्तशब्द गळिन्द ज्ञाननिष्ठॆ कनिष्ठॆगळु बोधितवादवॆन्दु इतररु अल्ल माडि रुवदे समञ्जसवागिरुत्तदॆ. इल्लि आदि पददिन्द आश्रमविहित कर गळू उपासनादिगळू सङ्ग्रहिसल्पट्टिवु ; इवुगळिन्द उत्कृष्टराद पराशररु, व्यासरु, शुकरु, शौनकरु, नाथमुनिगळु, प्रकृतिगळु कुम् - मॊदलादवरिगू, तनक्कु - तनगू सह, भागव म________________
१५६१ श्रीमदहस्यत्रयसारे डैयवुम्, तुळसी चम्पकादिगळुडैयवु, गोमय मृगमदादिगळुडैयवुदु, वैषम्यवलॆ भगवत्सङ्कल्प विशेष प्रयुक्त मान तत्वदुपाधि स्वभावत्ताले, सिद्धङ्गळान उत्कक्षापकर असूया प्रादुराव प्रकरणत्तिल् आमातमानपडिये तिरस्करिक्कॆ निनैयादॊळॆयुवुम् ; तत्ववे मॊदलादवुगळू, परम पुरुषार्थगळू, तुल्य मायिरु नालु - समानवागि इद्दरू, भगवत्सरिग्रहमान - सत्येश्वर निगॆ प्रियवाद, गो गोपजातिगळुडैयवु - गोवुगळेनु गोपालकरु गोपि जनवेनु इवुगळिगिरुव तुळसियेनु चम्पक वॆन्दरॆ सम्पिगॆ मॊदलाद पुष्पगळेनु इवुगळिगू इरुव; गोमय वॆन्दरॆ पवित्रवॆनिसुव आकळ सगणि एनु; मृगमदवॆन्दरॆ कस्तूरि एनु इवुगळिगिरुव; वैषम्यम्पोलॆ - व्यत्यासद हागॆ, मॊदलनॆयवु गळाद गोवु, तुळसि, गोमयगळु तुम्बा उत्कृष्टवादवॆन्दू, गोपीजनवु गोविनष्टू चम्पकवु तुळसियन्नू कस्तूरि गोमयदष्टू उत्कृष्टवल्लवॆम्ब व्यत्यासद हागॆ ऎम्ब तात्सरवु, भगवत्सल्प विशेष प्रयुक्तमान . सत्येश्वरन सिक्किदिन्दुं वाद, तत्र दुषाधि स्वभावत्ताले - आया वस्तुगळिगॆ आयाया मेलॆ हेळिद जाति गुण वृत्ति मॊदलाद कारणदिन्दुण्टाद स्वभाव दिन्दले, सिद्धळान - सिद्धवागिरुव, उत्कर्षापकर्ष - ऒन्दु तुम्बा उत्कृष्टवागियू, इन्नॊन्दु अष्टु उत्कृष्टवल्लदिरु वदरिन्द स्वल्प निकृष्टवागियू इरुविकॆयु, असूया प्रादुराव प्रकरणलॆ - असूयोत्पत्तियन्नु पपादिसुव प्रकरणदल्लि, आम्मा तमानपडिय - उपनिषत्तिनल्लि उपदेशिसिरुव रीतियल्लि, अथव रहस्याम्यायदल्लि हेळिरुव मेरॆगॆ, तिरस्करिक्क निनैयादॊळि युम् प्राप्तं - तिरस्करिसबेकॆम्ब अभिसन्धि इल्लदिरोणवु योग्य वादुदु. यद्यपि भागवतरॆल्लरू समानरे एकॆन्दरॆ, अवरॆल्लरू भगवद्भक्तरागि सश्वेश्वरनिगॆ “योमक्कॆ स्पमे प्रियः” (गी १२-१६) ऎन्दु हेळिरुव हागॆ, आतनिगॆ प्रियरु. ऎल्लरू उपायान________________
(9F) अपराधपरिहाराधिकारः ज्ञानवन्नु माडिरुवदरिण्ड परम पुरुषार्थ लाभवु ऎल्लरिगू समानवादुदे, “ समोहं सत्व भूतेषु” ऎन्दु सद्देश्वरनु हेळिरुवदु ऎल्लरन्नू प्रीतियिन्द समवागि भाविसि तत्करानुसार फलवन्नु कॊडुत्तेनॆम्बभिप्रायदिन्द मात्रवे अल्लदॆ, ऎल्लरू समरु ऎम्बभिप्रायदिन्दल्लवु. ऎल्ला चेतनरिगू अवरवर करायत्तवाद तारतम्य उण्टे उण्टु. हागॆये भागवतत्ववु ऎल्ला प्रसन्नरिगू समनागिद्दरू अवरुगळल्लि तारतम्यवु उण्टे उण्टु. श्री परा शरॆ, व्यास, शुक शौनकादिगळू, आदि पददिन्द श्री यामुनेयरू यतिवररे मॊदलाद परमै कान्तिगळू प्रपन्नराद नावुगळू सह समरे ऎन्दु ऎन्दिगू भाविसतक्कद्दल्लवु, हागॆये आचाररू नावू सह समरॆन्दू ऎणिस कूडदु. पिता मॊदलाद गुरुजनवू नावू समरागुवदिल्लवु. श्री पराशररादरो वसिष्ठ पात्ररु. तम्म तन्दॆयन्नु विश्वा मित्ररिन्द प्रेरिसल्पट्ट राक्षसरु कॊन्दु हाकिदुदरिन्द राक्षसनाश क्कागि सत्रवन्नु माडि अनेक राक्षसरु हतरागुव हागॆ माडलु ; अदन्नु कण्डु वसिष्ठरु तम्म पौत्ररं कुरितु क्रोधोनाशकरः परः” ऎन्दू “नाशानाम् आकरः क्रोधः” ऎन्दू हेळिरुवदरिन्द क्रोध वन्नु त्यजिसि, सत्रोपसंहारवन्नु माडतक्कद्दॆन्दु उपदेशिसलु, आग गुरुवाक्यवन्नु श्री पराशररु पालिसिदुदरिन्द, चतुरुखब्रह्मन पुत्रराद पुलस्तरु परम प्रीतरागि, पराशररन्नु हरॆसि, पर देवता पारमार्थवन्नु यथावत्तागि तिळिद ब्रह्मवित्तागि, पुराण रत्नवॆन्दु ई भुवनदल्लि प्रसिद्धियन्नु हॊन्दुव हागॆ विष्णु पुराण कावागुवॆ ऎन्दु वरवन्नित्तु तॆरळिदरु, “ पराशरम्मुनिवरं कृत पौरा कक्रियम्” ऎन्दु प्रथम श्लोकदल्लि हेळिरुव हागॆ ज्ञाननिष्ठॆ कनिष्ठॆगळिन्द कङ्गॊळिसुत्तिरुव ई महर्षियु तमगॆ अनुरूपराद शिष्यराद मैत्रेयरिगॆ ई पुराणवन्नु पदेशिसिदरॆम्ब वृत्तान्तविरुवदरिन्द श्री पराशररु ब्रह्मविदग्रेसररु, श्री व्यासमहर्षियु अन्तह श्री पराशर पुत्ररु. इवरु वेदगळन्नॆल्ला क्रमपडिसिदुदरिन्द इवरिगॆ वेदव्यासरॆन्दू हॆसरु. श्रुत्यर्थवु तुम्बा गम्भीरवागि सरियाद समञ्जसारवु व्यक्तवागि________________
09122 श्री मद्र हस्य त्रयारे तोरद सन्दर्भगळल्लि अदरर्थवु हीगॆन्दु ब्रह्मसूत्रगळल्लि ताव बरॆद पञ्चम वेदवॆनिसुव भारतदल्ल, भागवतदल्लि निक्करिसि सापिसिद महनीयरु, इवरु श्रीकृष्णन उपदेशवाद श्री भगव द्गीतॆयन्नु प्रकाशपडिसि लोकविख्यातियन्नु हॊन्दिरुत्तारॆ. कारणगळिन्द इवरु “व्यासाय विष्णु रूपाय व्यास रूपाय विष्णवे” ऎन्दु हेळिरुव हागॆ एष्टंशवॆन्दे भाविसल्पट्टिरुववरु. श्री पराशररे तम्म पुत्रराद व्यासरन्नु हागॆये भाविसिरुत्तारॆ :- * कृष्ण दैपायनं व्यासं निद्दि नारायणं प्रभुं को न्यूहि भुवि मैत्रेय महाभारत कृ नेत् महाभारतदल्लि इल्लदिरुव अमोघोपदेशवु इन्नॆल्लिदॆ इल्लवादुद रिन्द अन्तह निरतिशय ग्रन्थनिल्दाणवु श्रीव स्टारामणांशविल्लदे ऎन्दिगू उण्टागलारदॆम्ब तात्सरवु व्यासमर ताळ्मॆयु हीगॆ श्री विष्णु पुराणद तृतीयांश नाल्कनॆय अध्यायदल्लि उप नदित वागिरुत्तदॆ, आदुदरिन्द ई मकर्षिं द. उण्टद, उप क इष्टॆन्दु हेळलु साध्यविल्लदॆ कृत्यताभावदिन्द, ई ऋषियन्ने मॊदलु माडिकॊण्डु देवर्षि पितृ तर्पणदल्लि खषि तर्पणवन्नु प्रति दिनवू कॊडुत्तेवॆ. ७४०-१नॆय पुटगळ न न डि. 5” 5 99 शुकमहर्षियु, श्री व्यासमहर्षिय मक्कळु. निष्ठॆगळल्लि तन्दॆ यन्नु विरिसिदवरु. परिहाराजनिगॆ एळु दिनगळ नन्तर सर दष्ट नागॆन्दु ऋषिपुत्रशाप प्राप्तवादाग आ एळु दिनगळल्लि मोक्ष प्राप्तिगॆ साधकवाद श्रीमद्भागवतवॆन्दु प्रख्यातवागिरुव इतिहास कथॆयन्नु पदेशिसिद परम ब्रह्मवित्तॆ. ज्ञान भक्ति वैराग्यगळन्नू सश्वरनन्नु हॊन्दुव उपायगळन्नू बहु निपुणतरवागि उप पादिसुव ई भागवत कथॆयु तन्दॆयाद श्री व्यासमहर्षियिन्द इवरिगॆ उपदेशिसल्पट्टितु. श्री नाथमुनिगळ वृत्तान्तक्कॆ गुरुपरम्परा सारद (६९-७० ७५-८०) पुटगळन्नु पराम्बरिसबहुदु. हीगॆ इवरुगळु गुणवृत्त गळिन्द सरोत्कृष्टरु. इतर प्रपन्नरिगॆ इष्टु अमोघगुणवृत्त गळिल्लदिरुवदरिन्द अन्तह उत्कर्षवु इवरिगॆ इल्लवु. आदरू ई ऎरडु पङ्गडदवरिगू भागवतत्रदल्लि मोक्षप्राप्तियल्लि सम ई________________
अपराधपरिहाराधिकार १५७४ भाववु आदुदरिन्द इवरुगळॆल्ला समरॆम्बभिप्रायवु सरियल्लवु. एकॆन्दरॆ, इवरुगळिगिरुव उत्कर्षापकर्षगळु सरेश्वरन सङ्कल दिन्द अवरवरुगळ सुकृतानुसार सिद्धवादवु. आदुदरिन्द निकृष्टरा दवरु उत्कृष्टरादवर विषयदल्लि असूयॆयन्नु तोरिसि अवरु गळ माहात्मनिदॆ ऎन्दु अवरन्नु तिरस्करिस कूडदु. हागॆये निकृष्टरादवरन्नु उत्कृष्टरादवरिगॆ समवॆन्दु इल्लद माहात्म यनारोपिसलू कूडदु ऎन्दपदेशिसुत्तारॆ. हीगॆ असूया प्रादुराव सरियल्लवॆन्दु ऎल्लि हेळिदॆ ऎम्बुवदु व्यक्तवागुवद क्यागि “ अमातमान पडिये” ऎम्ब प्रयोगवु रहस्या माय दल्लि उपपादितवागिदॆ ऎन्दु श्री देशिकरवरे तात्पर चन्द्रिकॆ यल्लि (गी, १८ ४४) हेळिरुत्तारॆ. आ प्रकरणवु यावुदॆन्दरॆ :- ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्ररुगळ करगळु शास्त्रविहितवादवु यावु दॆम्बुवदु श्री गीतॆय १८नॆय अध्यायद ४२, ४३ ४४नॆय श्लोक गळल्लि उपपादितवागिरुत्तदॆ. कृतयुगान्त्य, त्रेतायुगारम्भदल्लि क्षत्रिय, वैश्य, शूद्ररु स्वक निरतरागदॆ, ब्राह्मणरिगिन्त निकृष्ट वाद करवॆन्दु क्षत्रिय, वैश्यरु ब्राह्मण क्षत्रियरिगिन्त निकृष्ट करवु तम्मदॆन्दू, शूद्ररु इन्नु मूरु वदवरॆ करक्किन्त तुम्बा निकृष्टवॆन्दू असूयाविष्ट मनस्करादरॆन्दु हेळल्पट्टरु इन्तह आसूयॆगळु इदरिन्द ऎल्ला कालदल्लू उण्टॆम्बु वदु तोरिबरुत्तदॆ. आदरॆ कलियुगदल्लि इन्तह असूयॆयु तुम्बा हॆच्चु ऎन्दु अनेक पुराणॆ तिहासगळल्लि उपपादितवागिरुवदु ईग नमगॆ प्रत्यक्षसिद्धवागिरुत्तदॆ, हीगॆ असूयॆयु हॆच्चलु कारण वेनॆन्दु योचिसुवल्लि, उत्कृष्ट जातीयनु तन्न स्वधवन्नु त्यजिसि कीळुजातियवन हागॆ प्रवरिसुविकॆयु, निकृष्ट वरदवन असूयॆ यन्नु इन्नू वृद्धि माडुत्तदॆ. वाश्रमधरगळल्लि ब्राह्मणकरवु बहु कष्टवादुदु, आज्ञानुज्ञा कैरगळन्नु साधिसुवदु सुलभ वल्लवु, सुखवु कम्मियु. हीगिद्दरू एतक्को तिळियदु, मुक्ति फलवु मुन्दिन श्लोकवाद “सै सै नरः” ऎम्बल्लि उपपादितवागिरुत्तदॆ. ब्राह्मणकरापेक्षॆयु इतररिगॆ साल्वत्रिकवागि सामान्यवॆन्दु करण्यभिरत स्संसिद्धिं लभते शूद्रस्साधुः ऎम्ब व्यासो________________
श्रीमद्र हस्यत्रयसारे क्तिय ई अभिप्रायवन्ने सूचिसुत्तदॆ. मेलॆ मूलदल्लि आमातमानपडिये ऎन्दु इरुवदरिन्द श्रुतियल्लियू सह ई असूया प्रादुराववु उपपादितवागिरुत्त दॆम्बभिप्रायवू उण्टागुत्तदॆ. आदुदरिन्द सारवीडिका, सारप्रकाशिका, सारविवरिणि व्याख्यातृगळु वाजसनेयदल्लि उपपादितवागिदॆ ऎन्दु हेळुत्तारॆ. जनकमहाराजनु सहस्र गोवुगळन्नु तरिसि, ऋषिगळ सभामध्यदल्लि साधिकरु यारो अवरु ई गोवुगळन्नु परिग्रहिसबहुदॆन्दु हेळिदनु. ऋषिगळल्लि प्रतियॊब्बरु तानु साधिकनॆन्दु हेळिकॊळ्ळुवदु उचितवल्लवॆन्दु सुम्मनिरलु, आग याज्ञवल्करु सभॆयल्लि ऎद्दु तावु परिग्रहिसु वदागि हेळलु ; आग इतर ऋषिगळु ऎद्दु असूयॆयिन्द प्रेरित रागि आ याज्ञवल्क र माहात्मयन्नु तिरस्करिसलु उद्युक्तराद रॆम्ब वृत्तान्तवुण्टु. हीगॆ ई ऎरडु प्रकरणगळल्लि यावुदन्नादरू अङ्गीकरिसबहुदु. श्री सारास्वादिनियवरु रहस्याम्या यदल्लि हेळि रुवदे श्री देशिकरवरिगॆ उद्देश्यवॆम्बुवदन्नु तोरिसिरुत्तारॆ. हीगॆ परस्पर व्यत्यास उण्टे उण्टु ऎन्नुवदक्कॆ कॆलवु दृष्टान्तगळन्नु कॊट्टिरुत्तारॆ. गोपजातीयरु यद्यपि चेतन रागि गोवुगळिगिन्त हॆच्चु ज्ञानवुळ्ळवरादरू, गोवुगळिगॆ शास्त्र मय्यादॆयिन्द उत्कृष्टतॆयुण्टु. हागॆये चम्पकादि पुष्पगळु तम्मल्लिरुव परिमळदिन्द प्राशस्त्रवन्नु हॊन्दिद्दरू, तुळसियष्टु महिमॆयन्नु हॊन्दिददल्लवु मृगमदवु सुवासनॆयुळ्ळद्दागियू, देहक्कॆ उत्तेजकवागियू, सत्येश्वरनिगॆ तिलकादिगळिगॆ उपयुक्त वागिद्दरू, गोमयद हागॆ पावनतदिन्द उत्कृष्टतॆयन्नु हॊन्दिद्दल्लवु. आदुदरिन्द इन्तह उत्कर्षापकर्षवु स्वामि सङ्कल्प दिन्दले सिद्धवादुवु. आ कारणदिन्द परस्परासूयॆगळू तिर स्वारादिगळू प्रपन्नरिगॆ योग्यवल्लवॆन्दु पदेशवु. २. हिन्दिन वाक्यखण्डदिन्द महाभागवतोत्तमरागि कर ज्ञाननिष्ठॆगळिन्द प्रसिद्धरादवरल्लि असूयॆयिन्द तिरस्कार कूड दॆन्दु हेळल्पट्टितु. ई वाक्यखण्डदिन्द निकृष्ट जातिय प्रसन्नर विषयदल्लि प्रपन्नन कत्रव्यवेनॆम्बुवदन्नु उपदेशिसुत्तारॆ - जात्या________________
अपराधपरिहाराधिकार १५७६ २. जात्याद्य पाधिगळाले भागवतर् 3रल् (१) अनुज्ञा परिहार् देहसम्बन्धाति रादिवत्” ऎंर न्याय तालॆ प्रवृत्ति विशेषळुक्कु यथाशास्त्रम नियम मुण्णा द्रुपाधिगळाले - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य शूद्रादि जातिगळ मूलक प्राप्तवाद कारणगळिन्द, भागवतर् तिरल् - अन्तह भागवतरुगळ विषयदल्लि “ अनुज्ञापरिहार् - ऎल्ला भागवतरु गळू भागवतत्वदिन्द समानरादरू कूड, कॆलवर विषयदल्लि उत्तम जातीयराद ब्राह्मण भागवतर विषयदल्लि शुशूषादि प्रवृत्तियल्लि अनुज्ञॆयू, जातियल्लि कम्मियाद शूद्रादि भाग वतर विषयदल्लि शुशूषादि प्रवृत्तिय परिहारवू ऎन्दरॆ त्याज्यवू शास्त्रसिद्धवादुदु, एकॆन्दरॆ :- देहसम्बन्धात् - ई भागवतरु उत्कृष्ट निकृष्ट देहवुळ्ळवराद प्रयुक्त; अदु हेगॆन्दरॆ :- ज्योतिरादिवत् - अग्नि मॊदलादवुगळ हागॆ ; प्रोत्रियागार दिन्द होमक्कागि अग्नियन्नु तरलु अनुज्ञॆयू, अदक्कागि स्मशा नाग्नियु त्याज्यवॆन्दु हेगॆ विधिसल्पट्टिदॆयो हागॆ, यद्यपि ऎरडू अग्नि यादरू ऒन्दु ग्राह्यवु ऒन्दु अपरिग्राह्यवु. हागॆये मडिकॆ मुन्ताद सामानुगळू हव्यक्कागि उपयोगिसिदुदु ग्राह्यवु, कव्यक्कागि उपयोगिसिदुदु ग्राह्यवल्लवु. आदि पददिन्द इवुगळॆल्ला बोधिसल्पट्टवु.” ऎङ्गिरन्यायत्ताले - ऎन्दु कॆलवु ग्राह वागियू, इन्नु कॆलवु अपरिग्राह्यवागियू हेळिरुव न्याय प्रकार, प्रवृत्ति विशेषण्णळुक्कु हीगॆ प्रवृत्ति व्यत्यासगळिगॆ, यथा शास्त्रं शास्तानुगुणवागि, नियममुण्डानालुम - नियम उण्टॆयादरू, “साधुरेव समन्तव्य” अन्थावनु वैष्ण वाग्रेसरने सरि”, ऎन्थावनु वैष्णवाग्रेसरनॆम्बुवदु ई गीताश्लोकद पूरार्धदल्लि हेळल्पट्टिरुत्तदॆ.
“अपि चेत्सु दुराचारो भजते मामनन्य भक् । साधुरेव समन्तव्य समवसितोहिस (0) 3. n. 9.2.42________________
09122 श्रीमद्रहस्यत्रयसारे नालुम् (१) “साधुरेव समन्तव्यः” ऎनव, २) स्मृत सम्भाषितो पिना” ऎन्नुम् (२) य शूद्रं भगवद्भक्तम् ऎम्बुवदु पूराशिकवु जाति आकार स्वभावगुणादिगळिन्द उत्कृष्ट निकृष्णराद सभूतगळल्लियू सश्वरन आश्रयणीय भाग दल्लि ऎल्लरिगू समनु, इवनु इन्तह अ त र स्वभाव ड्यानादि गळिन्द निकृष्णनॆम्ब द्वेषवू तनगिल्लव, अन्तवगळिन्द इवनु उत्कृष्ट नॆम्ब हॆच्चु प्रीतिय इल्लवु. इदू अल्लदॆ, यावनु ऎष्टु जात्य गळल्लि हॆच्चु निकृष्टनागिद्दरू कूड, नन्न जनवे मुख्य प्रयो जनवॆन्दु भाविसि भजिसिदुदॆयादरॆ, अन्थावनन्नॆ वैष्णवासर नॆन्दु हॆच्चागि बहुमानिसतक्कद्दु. याव कारणदिन्दॆन्दरॆ, “सम आदुद वसितो हि सः - आतन व्यवसायवु तुम्बा सचीनवादुद रिन्द; भगवन्तनु समस्त जगत्तिगू कारणभूतन, आतनु पर ब्रह्मनागि सकल चराचरक्कू स्वामियु, नियामकनु रिन्द ननगू स्वामियु नियामकनु, ननगॆ परमगुरुव, परम सुहृत्तु, आदुदरिन्द ननगॆ परमभोग्यनु, ऎम्बिवे मॊदलाद स रिगू साधारणवागि लभिसदॆ इरुव इन्तह समीचीन व्यवसायवु आतनिगुण्टु. इदर कारभूतवाद निरन्तर भजनवू आतनिगुण्टु. आ कारणदिन्दले अन्तवनन्नु साधुरेव समन्तव्य- - वैष्णवा ग्रेसरनॆम्बदागि भाविसतक्कद्दु ऎम्ब भाववु. आतनल्लि आचार व्यति क्रम स्वल्पविद्दरू अदरिन्दातनु अनादरणीयनल्लवु, तुम्बा आद रिसलु योग्यने ऎम्ब तात्परवु”, ऎन्नु - ऎन्दू, “ त स्मरिसल्पट्टरू, अथवा सम्भाषितोपिवा सम्भाषिसल्पट्टरू कूड, ना ऎम्बुवदरिन्द समुच्चयारदिन्द ऎरडरिन्दलू कूडु पुनाति भगवद्भक्तस्सहस्रांशु रिवोदितः ऎन्दु मुन्दॆ इर इदॆ ; सहस्रांशुरिवोदितः, उदिसिद सूरनु हेगॆ लोकव न्नॆल्ला तन्न अनेक किरणमूलक पवित्र माडुत्तानो, हागॆ भगवद्भक्तः सारत्रिकवागि भगवद्भक्तनु याव जातियवने आगलि, पुनाति - पवित्रीकरिसुत्तानॆ.” ऎन्नुम, इदरिन्द, भग (१) गी, ९.३०. (२) इतिहास समुच्चयम् ३३,५२________________
अपराध परिहाराधिकार १५७८ निषादं श्वपचं तथा । वीक्षते जाति सामान्यायाति नर कं नरः” ऎन्नुम् (४) तस्मादिष्टु प्रसादाय वैष्णर्वा परितोषयेत् ! प्रसाद सुमुख विष्णु सैनै वस्त्रान्न 66 वद्भक्तनु उत्कृष्ट जातियवनागलि, निकृष्ट जातियवनेयागलि ई लोकवन्ने सूरनोपादियल्लि पवित्र माडतक्कवनॆन्दु हेळल्प ट्टितु, “यः - यावनु, भगवद्भक्तनाद शूद्रनन्नागलि, निषादं- बेडरवनन्नागलि, तथा - हागॆये, श्वपचं - चण्डालनन्नेयागलि, जाति सामान्यात् - आतन शूद्र, बेड अथवा चण्डालरूप निकृष्ट जातिय सामान्य भावदिन्द, वीक्षते - नोडुत्तानो, ऎन्दरॆ भगवद्भक्तनॆन्दु अभिमानिसदॆ ईतनु हीनजातियवनॆन्दु नोडुवनो ऎम्बरवु, सः - अन्तह, नरः - मनुष्यनु, नरकं याति - नरकवन्नु हॊन्दुवनु,” ऎन्नुव - ऎम्ब दागियू, ई अभिप्रायवन्नॆ व्यासमहर्षियु भारत अश्वमेध पक्षदल्लि, “न शूद्रा भगवद्भक्ता विषा, भागवतास्कृताः । सत्ववसु ते शूदाये हृभक्त जनारने? ऎम्ब श्लोकदल्लि उपपादिसिरुत्तारॆ; भगवद्भक्तनाद शूद्रनु शूद्र नल्लवु, आतनु विप्रनिगॆ समाननु, अन्थावनु भागवतनॆन्दु स यल्लि हेळल्पट्टिरुत्तदॆ. जनारननल्लि यारु अभक्तरो, भक्त रल्लवो अवरु समस्त वरगळल्लि शूद्रनिगॆ समानरु, ब्राह्मण क्षत्रियादि जातिगॆ सेरिदवरादरू अवरु शूद्ररे सरि ऎम्ब भाववु; (४) तस्मात् - हीगॆ निकृष्ट जातीयरन्नु जातिसामान्यभावदिन्द नोडिदरॆ प्रत्यवाय उण्टागुवदरिन्द, विष्णु प्रसादाय - विष्णुवु प्रसन्ननागुवदक्कागि, वैष्णर्वा - समस्त जातीय विष्णुभक्तरन्नु, - परितोषयेत् - सन्तोषपडिसतक्कद्दु, तेनैव - आ भागवतरु सन्तुष्टतॆयन्नु हॊन्दुवदरिन्दलेने, विष्णुः - श्री महाविष्णु वु प्रसाद सुमुखः अनुग्रहक्कॆ सुमुखनादवनागि, स्यात् - आगुवनु, नसंशयः - ई विषयदल्लि सन्देहविल्लवु. कीळुजाति यवनन्नु जातिसामान्यदिन्द नोडबारदॆन्दु हेळि, ई मेलिन (३) इतिहास समुच्चयं २७-२६ (४) इतिहास समुच्चयं २७-२७________________
0925 श्री मद्रहस्य, त्रयसारे संशयः” ऎन्नुव माडि” गळिलुं यत्तिरुवुव ; (२५)
- पयिलुव शु डरळि” (६) “ नडु विशेषि पडिये प्रतिपत्तियिल् कुरै श्लोकदिन्द आतनन्नु बहुमानिसि सन्तोषपडिसतक्कदॆन्दू, हागॆ सन्तोषपडिसुवदरिन्द सुप्रीतनाद विष्णुवु नम्म नुगहिसुव नॆम्बुवदरल्लि ईषद सन्देहविल्लवॆन्दू हेळल्पट्टितु. इन्नु मुन्दॆ आळ्वार् पाशुरगळन्नु उदाहरिसुत्तारॆ :- “ पयिलु शुडरल्लि ” ऎन्दु प्रारम्भिसि हेळुव हत्तु पाशुरगळल्लि, नॆडुमार् कडिमॆ गळिलुम् - ऎन्दु प्रारम्भिसि हेळुव हत्तु पाशुरगळल्लू, विशे षि पडिये विशेषिसि हेळिरुव हागॆ, कुनाथनॆन्दू, स्वामियॆन्दू, भोग्यनॆन्दू ऎम्बिवे मॊदलाद अल्लि हेळल्पट्ट आकारगळिन्द ऎम्ब भाववु प्रतिपत्तियिल् , दृढवाद भक्तियल्लि, कुरैयुत्तिरु कुवु - न्यूनतॆयिल्लदिरोणवू ; प्राप्तव - उचितवु. इद रिन्द निकृष्ट जातिय भागवतरन्नु हेगॆ भाविसतक्कद्दॆम्बुवदु उप देशिसल्पट्टितु. तनगिन्तलू निकृष्ट जातियवराद भागवतरुगळन्नु तुच्छवागि काणकूडदु. हागॆ कण्डरॆ प्रत्यवाय उण्टॆन्दु प्रमाणसहितवागि तिळिसिदरु. अवरु शूद्ररादुदरिन्द अवरल्लि भक्ति यन्नु कम्मि माडकूडदु ऎन्दु हेळल्पट्टितु. मानसिक भक्ति विश्वासगळिरबेकॆम्बुवदक्कॆ नम्माळ्वारवर पाशुरगळन्नु उदाहरिसि, अदरिन्द इतर आळ्वारुगळू कूड अदे अभिप्रायवुळ्ळवरॆन्दु सूचि सिरुत्तारॆ :- “ पयिलुं तॊडरळि” ऎम्ब हत्तु पाशुरगळल्लि भागवत शेषत्वद महिमॆयु हेळल्पट्टिरुत्तदॆ. मॊदलनॆय पाशुर दल्लि आ भागवतरुगळु “ अवरेलुमवर् कण्डीर्…. ऎम्मॆ म परमरेश ऎन्दु हेळिरुवदरिन्द, जाति वृत्तगळिन्द ऎष्टु निकृष्टरादरू नम्मन्नाळुव शेषिगळॆन्दू ऎरडनॆय पाशुरदल्लि अवरु नमगॆ “नाथरे” ऎन्दू, मूरनॆय पाशुरदल्लि ऎम्मॆयाळु डैयार्गळे नम्मन्नु दासरागि हॊन्दिरुवरॆन्दू, नाल्कनॆय पाशुरदल्लि अवरु तमगॆ शेषिगळॆन्दू, ऐदनॆयदरल्लि नम्मॆ कुम् पिराळ्, नम्मन्नु उज्जिसुव हागॆ माडुव उपकारि गळॆन्दू, आरनेयदरल्लि 2 न्मजन्मान्तरगळन्नॆत्तद हागॆ माडुव अळि________________
(20) अपराधपरिहाराधिकारः रॆन्दू एळनेयदरल्लि नन्नॆ पॆरुतु, ऎम्मॆ नाळुय्यकॊळकिन नम्बरे भागवत शेषप्प पठ्यस्तवाद भगवच्छेष सम्पत्तन्नुण्टु माडि नम्मन्नु भगवन्तन पादकमलदल्लि कैरवन्नु निरन्तर माडुव हागॆ कृपॆगैद विश्वसनीयरॆन्दू, ऎण्टनॆयदरल्लि अन्तह भागवतरु ऎष्टु निकृष्टरागिद्दरू अवरुगळ कुलवु नम्म कुलगळिगॆ आचार सन्तानवॆन्दू, ऒम्भत्तरल्लि “आळनु उळि कलन्सार् अडि यार् तम्मडि यारॆम्मडिगळे” तावु शेषभूतरॆन्दु तिळिदु अनन्य प्रयोजनरागि सेरिरुव दासरिगॆ शेषभूतरादवरु नमगॆ स्वामिगळॆन्दू, हत्तनॆय पाशुरदल्लि श्रियःपतिगॆ शेषभूतरिगॆ शेष रॆन्दु भाविसुव पारम्परदल्लिरुववरिगॆ तावु शेषभूतरॆन्दू श्री नम्माळ्वारवरु हेळिकॊण्डिरुत्तारॆ. हागॆये “नॆडुमाल् कडिमै” ऎम्ब (तिरु ८. १०) हत्तु पाशुरगळल्लियू वैष्णव भागवत शेषवु कॊण्डाडल्पट्टिरुत्तदॆ. नॆय पुट नोडि) इल्लॆल्ला वैष्णव भागवतनॆन्दु मात्र हेळिरुवदरिन्द ब्राह्मणनागिये इरबेकॆन्दु हेळलिल्लवु ; याव जातिय भागवतनादरू पूजनीयनॆन्दु हेळल्पट्टितु. अन्तवर श्री पादवन्नु बिट्ट मूरु लोकवू तनगॆ बेकिल्लवॆन्दू, अदर मुन्दॆ ऐश्वर कैवल्य सुखगळू तमगॆ बेकिल्लवॆन्दू, अदु इल्ले उण्टागुव सन्दर्भदल्लि बेरॆ वैकुण्ठयात्रॆ ताने एकॆयॆन्दू, दिव्य तिरुवाय मॊळॆयन्नभ्यसिसुव महाभागवतरॊन्दिगॆ सुखानुभवक्कॆ श्री वैकुण्ठदल्लि नित्यानुभववु समवागलारदॆन्दू, अवरॊन्दिगॆ सेरि अवर प्रसन्नतॆयन्नु हॊन्दुवदे तमगॆ सत्ववू ऎन्दू हेळि कॊनॆगॆ “ कॊदिलडियार् तम्तमर्गळ् तमगळ तमर् गळां शदिरेवायक्कॆ तमियरे” अनन्य प्रयोजनराद भागवतरुगळ दासरिगॆ दासरागिरुव दास्यभाववॆम्ब पुरुषार्थवन्नु तावु हॊन्दबेकॆन्दु श्री नम्मळ्वारवरु प्रार्थिसिरुत्तारॆ. हिन्दॆ शूद्रादि भागवतर विषयदल्लू “ प्रतिपत्तियिल् कुरै यत्तिरुक्कुवु” ऎन्दु हेळिद नन्तर, अन्तह भागवतर शेष कारभूतवाद प्रणामादि कैर परनवादरल्लवे भक्ति यल्लि कम्मियागलिल्लवॆन्दु हेळबहुदु. हागॆ प्रणामादि कैय्य________________
D १५८१ श्रीमद्र हस्यत्रयसारे (३) इप्रतिप मात्र तालुव “तद मिति धीहेतु रफ्तु पकारि” ऎच्चरहडिये परिपूर्ण विषयल् शेष चित किञ्चित्कारमान कैरं सिद्धमॆनिरुक्कवु म, गळन्नु अन्तह शूद्रादि भागवतरुगळिगॆ ऎसगबहुदो ऎन्दरॆ अदक्कॆ मुन्दिन वाक्यवाद “इप्रतिपत्ति मात्रत्तालुम्” ऎम्बुवदरिन्द समाधानवन्नु हेळुत्तार :- इप्रतिप मात्रतालुव - ई विश्वास मात्रॆदिन्दलू कूड ऎन्दरॆ, ई निकृष्ट वर्णद भागवतनिगॆ नानु दासभूतनु ऎम्ब इष्टु मात्र मानसिक प्रतिपत्तियिन्दलू ऎम्बरवु, इल्लि मात्र शब्दवन्नु पयोगिसिरुवदरिन्द कायक प्रणा मादिगळु युक्तवल्लवॆम्बुवदु व्यक्तवु ; “तदं . इदू कूड आ भगवन्तनिगे शेषभूतवादुदागि अदरिन्द आतनिगॆ प्रीतिकरवाद व्यापार उळ्ळद्दु, इति - ऎम्ब, धीहेतुरपि - बुद्धिगॆ कारणवागि रुवदू कूड, उपकारी - उपकारकवु ऎन्दरॆ शास्त्र मूलक सत्ववू सरेश्वरनिगॆ शेषभूतवु ऎम्ब अभिसन्धियिन्द ई भागवतरु गळिगू कूड नावु शेषभूतरॆम्बनुसन्धानवु भगवतिकरवागु तदॆम्ब भाववु” ऎज रपडिये - ऎन्दु हेळिरुव हागॆ, परि पूर्ण विषयल् - परिपूर्णनाद भगवन्तन विषयदल्लि, शेष तोचित - तानु शेषनागिरुवदक्कॆ योग्यवाद, किञ्चित्कार मान कै रम्-दासनागि माडुव कै रवु, सिद्धमॆनिरुक्कुवुम्- उण्टायितॆन्दु भाविसुवदू कूड, प्राप्तम-उचितवु ऎन्दु इट्टु कॊळ्ळतक्कद्दु, ऎन्दरॆ इवरुगळिगॆ तानु शेषभूतनॆम्ब बुद्धिगॆ विषयवादुदू कूड अन्तह बुद्धियन्नुण्टुमाडुवदरिन्द किञ्चि तारवु सिद्धिसिद हागॆ भावनॆ ऎम्ब तात्परवु. भागवतर शेषत्ववु भगवच्छेषत्वद कारवादुदरिन्द, शास्त्रविरोधविल्लदिरुव सन्दरदल्लि परम शेषिगॆ प्रीणन रूपवाद प्रणामादि परन्तवागि कैर रूपवागिरतक्कद्दु, आदरॆ शास्त्रविरोधवुळ्ळ सन्दरदल्लि, इतर वरद भागवतर विषयदल्लि प्रणामादि पठ्यन्त कृरवु परमशेषिगॆ अनभिमातवादुदरिन्द, इवरू अवनिगॆ शेषभूतरॆम्ब अनुसन्धान मात्रदिन्दले अन्तह कैइरवु सिद्धिसितु ऎन्दु भाविसतक्कद्दॆम्ब________________
अपराधपरिहाराधिकारः भागवतापचारस्य तद्भागवत प्रसादनमेव प्रायश्चित्तम् (४) इन्नि (लङ्गळॆले १५८२ गळिन्नु कोणिनपोदु, (१) “सत्वं जिक्कं मृत्यु पद मार्जनं ब्रह्मणः पदम् ” भाववु. अवरू भागवतरुगळे ऎन्दु अवरिगॆ साक्षातणामादि गळु शास्त्रनिषिद्धवॆम्बुदु इदरिन्द एर्पट्टितु. हीगॆ उत्कृष्ट जातिय भागवतरुगळ विषयदल्लू निकृष्ण जातिय भागवतरुगळ विषयदल्लि प्रपन्ननु नडॆदुकॊळ्ळबेकाद प्रका रवु हिन्दॆ उपदेशिसल्पट्टितु. हीगॆ नडॆदुकॊळ्ळुवदक्कॆ बदलागि एनादरू विपरीताचरणि प्राप्तवागि अपराध प्राप्तवादरॆ, अदु अप राधगळल्लि गुरुतरवादुदरिन्द अन्तह सन्दर्भदल्लि अदक्कागि नडुगि अन्तह भागवतापचारक्कागि आ महाभागवतन कापणॆयन्नु प्रासि, अन्तह अपचारवु तनगॆ स्वरूपहानियादुदरिन्द, अदन्नु प्रकटिसदॆ वनदिन्दिरतक्कद्दॆन्दु मुन्दॆ उपदेशिसुत्तारॆ :- भागवतापचारक्कॆ आ भागवतर प्रसादनवे प्रायश्चित्तवु. इन्निलैगळिल् - ई मेलॆ हेळिद रीतियल्लि नडॆयबेकाद प्रकारगळल्लि, ऒन्नु कॊणिन पोदु - यावुदादरू ऒन्दु वक्र वादाग ऎन्दरॆ विपरीताचरणॆयु प्राप्तवादरॆ ऎम्बरवु ; भगवत्स बिल्पसिद्धवाद जात्यादु पाधियिन्दुण्टाद भागवतोत्ता पकर्ष गळन्नु तिरस्करिसियागलि, निकृष्टजाति भागवतरल्लि प्रतिपत्ति कम्मि यादरागलि हीगॆ भागवतापचार प्राप्तवादरॆ, “सञ्जिक्कं - वक्रवाद समस्तवू, मृत्युपदं-संसारक्कॆ आस्पदवादुदु ; अर्ज नं - वक्रवल्लद्दॆल्लवू, ब्रह्मणः पदं - परब्रह्मन स्थानवादुदु.” इदु भीष्मरु युधिष्ठिरादिगळिगॆ माडुव उपदेशवु, यज्ञ क्किन्तलू श्रेष्ठवादुदु तपस्सु, आदुदरिन्द शास्त्रमय्यादॆयन्नु मीरदॆ नडॆयतक्कद्दे तपस्सॆन्दु हेळि, हागॆ वक्रतॆयिल्लदॆ नडियु (7) भार, शान्ति ७९,२१.________________
श्रीमद्रहस्यत्रयसारे ऎच्चर पडिये मृत्युर्वि कडॆवायिले यगप्पट्टार् पोलॆ नडु, (२) *कृतापराधस्य हि ते नान्यक्ष श्याम्यहं क्षमम्! अन्तरेणाञ्जलिं बद्धा लक्षणस्य प्रसाद नात” ऎन्नुम्, वदे परब्रह्म पदक्कॆ सोपानवॆन्दू, शास्त्रमय्यादॆयन्नु मीरि वक वागि नडियुवदे संसारक्कॆ बीजवॆन्दू, “एतावाळ् ज्ञान विषयः किं प्रलापः करिष्यति” (उत्तरार्धवु इदे मुख्य नागि तिळियतक्क विषयवॆन्दुपदेशिसिरुत्तारॆ, GM पॆडिये ऎन्दु हेळिरुव हागॆ, मृत्युर्वि-यमुन, कठवायिले कोरॆहल्लुगळ मध्यॆ बायियल्लि, अगपट्टार् पोलॆनडुज - सिक्कि दवर हागॆ भयदिन्द नडुगि, प्रपन्ननादुदरिन्दयमन वशक्कॆ सिक्कु वदु इल्लवे इल्लवु, अगपट्टार् पोलॆ ऎन्दु हेळिरुवदरिन्द भाग वतापचारवु अपचारगळल्लॆल्ला प्रधानवादुदरिन्द अदक्कॆ यमन बायिगॆ तुत्तादरॆ ऎष्टु भयपडबेको हागॆभयपडबेकु ऎम्बु वदक्कॆ प्रमाणवन्नु उदाहरिसिदरु. हागॆयेरहोगणनॆम्ब सौवीर राजनु आदिभरतराद परम भागवतोत्तमरन्नु तन्न मनावन्नु हॊरलु आज्ञापिसिदरे ? ई भागवतापचारवु तनगॆ प्राप्तवायिते ? ऎन्दु भयदिन्द नडुगि हेळुत्तानॆ :- नाहं विश सुरराज वज्रान्नत्रक शूलान्न यमस्य दण्डात् । नाग सोमा निलवित्त पास्ता) च्छङ्के शृतं ब्रह्म कुलावानात् । “इन्द्रन वज्रायुधक्कागलि, रुद्रन शूलक्कागलि, यमन दण्डक्कागलि, अग्नि सूर चन्द्र वायु कुबेररुगळ अस्त्रक्कागलि नानु अञ्जुव दिल्लवु, आदरॆ परबह्मविदपचारक्कॆ मात्रनडुगुवॆनु ऎन्दु हेळि रुत्तानॆ”. हागॆ अपराधवु ऒन्दु वेळॆ प्राप्तवादरॆ आ भागव क्षा पणॆये आग आवश्यकवॆन्नुवदक्कॆ रामायणदिन्द उदाहरिसु तारॆ :- मॊदलु भगवदपचारक्कू कूड आ भगवन्तनिगॆ तुम्बा प्रियरादवर प्रसादनवे प्रायश्चित्तवॆन्दु तिळिसुत्तारॆ - कृताप राधस्य - माडल्पट्ट अपराधवुळ्ळ, ते - निनगॆ, इदु सचिवश्रेष्ठ
(२) रा. किन्धा ३२ १७________________
अपराधपरिहाराधिकार १५८४ (३) “ यदि किञ्चिदति क्रान्तं विश्वासाथ्णनेनवा 1 प्रेत्यस्य क्षमितव्यं मे नकश्चिन्नापराध्यति” ऎन्नुम् (४) *यच्च · नाद आञ्जनेयनु सुग्रीवनिगॆ माडुव हितोपदेशवु ; इन्नू अपराधारम्भकालवागि अनुतापवादरू इद्दुदादरॆ लघुप्राय श्चित्तदिन्दलागलि परिहार उण्टु, हागल्लदॆ ओ सुग्रीवने नीनु कृता पराधनु, आदुदरिन्द प्रबल प्रायश्चित्तवे आवश्यकवु ; अदु यावुदॆन्दरॆ, अञ्जलिम्बल्वा - अञ्जलियन्नु माडि कै जोडिसिकॊण्डु लक्षणस्य प्रसादनात् - श्री रामनिगॆ अन्तरङ्गभूतनागि महा भागवतनाद लक्ष्मणन प्रसन्नतॆय, अन्तरेण - विना, अन्यत् - बेरे उपायवन्नु अथवा प्रायश्चित्तवन्नु, क्षमं - योग्य वादुदागि, अहं - नानु, नमश्यामि - काणॆनु, परम भागवतनिगॆ माडुव अञ्जलि बन्धवे नीनु माडिरुव प्रबल भगवदपराधक्कॆ प्राय श्चित्तवु. आ अञ्जलिबन्धक्कॆ अष्टु माहात्रॆये ऎन्दरॆ अञ्जलिः परनामुद्राक्षि प्रं देव प्रसादि, सत्येश्वरन प्रसादनवन्नु बहु क्षिप्रवागि उण्टुमाडुव शक्तियुळ्ळद्दॆन्दु शास्त्रदल्लि हेळल्पट्टि रुत्तदॆ. आदुदरिन्द भगवदपचारदल्लि परम भागवत प्रसादनवे प्रायश्चित्तवॆन्दु हेळल्पट्टितु. हागॆये प्रमाणविरुत्तदॆ :- * “ अनुतस्तु तानेव कामयेनान्यथा शमः । भगवत्य पचारेपि सैषा शान्तिरनुत्त मा अपराध माडिदवनिगॆ अनुताप प्राप्तवादरॆ भागवतर क्षा पणॆयन्नॆ प्रासतक्कद्दु. अदक्किन्तलू बेरॆ प्रायश्चित्तविल्लवु, भगवदपचार उण्टादरू अदे असदृशवाद प्रायश्चित्तॆवॆन्दु हेळल्पट्टिरुत्तदॆ. हीगिरुवाग भागवतापचारक्कॆ भागवत प्रसादनवे प्रायश्चित्तवॆन्दु हेळतक्कद्देनिदॆ ऎम्ब भाववू तोरिबरुत्तॆदॆ”, ऎन्नु - ऎम्ब दागियू, हीगॆ प्रज्ञाशालियाद आञ्जनेयनु हितोपदेश माडलु, महाराजनाद सुग्रीवनु महाभागवतनाद लक्ष्मणनन्नु क्षमिसबेकागि प्रार्थिसुवनु ; “किञ्चित् - एनादरू, अति क्रान्तं (३) रामा, किष्ठिन्धा. ३६ ११ (४) रामा, किन्धा ३६२०________________
श्रीमदहस्यश्रयसारे शोकाभि भूतस्य श्रुत्वा रामस्य भाषितम् । मया त्वं परुषा यदि - अतिक्रमिसि नडॆदुदु उण्टागिद्दरॆ, प्रेष्ठस्य - भागवतनाद निनगॆ दासभूतनाद, मे . ननगॆ, इदरिन्द भागवत शेषत्ववु प्रद र्शिसल्पट्टितु, विश्वासात् - विश्वासदिन्दलागलि, प्रणयेनवा - प्रीतियिन्दलागलि, तत् - अन्तह अन्तह अतिक्रमणापराधवु. क्षमि तव्यं - कवि सतक्कद्दु, कश्चित् - कश्चित् - यावनॊब्बन, नापराधृति - अपराध माडिल्लवॆम्बुवदु, न - इल्लवु ऎन्दरॆ सत्वरू अपराधि गळे ऎम्ब भाववु. इदरिन्द भगवद्विषयदल्लि अपराध माडिदव निन्द भागवत क्षमापणॆयु माडल्पट्टिदुदादरॆ, अदरिन्द सुप्रीत नाद भगवन्तनु ईतन अपराधवन्नु क्षमिसुवनागि, आतनु तनगॆ मुन्दॆ कैर माडलु योग्यनन्नागि माडुवनॆम्ब शास्त्रार्थवु ई श्लोकदिन्द व्यक्तमाडल्पट्टितु. ई मुन्दिन श्लोकदिन्द भागव तापचारक्कॆ आ भागवतन क्षमापणॆये प्रायश्चित्तवॆम्बुवदु निद र्शिसल्पडुत्तदॆ :- शोकाभिभूतस्य - शोकाकान्तनाद, रामस्य श्री रामन, भाषि तं - मातन्नु, श्रुत्वा - केळिदवनागि, तडॆयदॆ मया - भ्रातृ व्यसनदिन्द सन्तप्तनाद नन्निन्द, परुषाणि - क्रूरवाक्कुगळु, “ अनारसङ्कृ तम्म मिथ्यावादीच वानर, (रामायण. किन्धा) ऎन्दु हीगॆल्ला हेळिद निष्ठुरोक्तिगळु, उक्त इतियक् - हेळल्पट्टिवॆम्बुवदु यावुदुण्टॆ, तज्ञ - अवॆल्लवन्नू, त्वं त्वं - महा भागवतोत्तमनाद नीनु, क्षन्तु मरसि - क्षमिसलु योग्यनागुत्तीये, यावाग सुग्रीवनु तन्न प राधवन्नु क्षमिसु ऎन्दु अञ्जलिबद्धनागि बेडिदनो, आग लक्ष्मणनु तानु अन्तह परम भागवतनन्नु अनारनॆन्दू, कृतघ्न नॆन्दू मिथ्यावादि ऎन्दू हीगॆल्ला निष्ठुरोक्तिगळन्नु हेळिदुदरिन्द भाग वतापचारवु तनगॆ सङ्घटितवायितॆन्दु भाविसि, आ अपराध परी हारक्कागि आतन क्षमापणॆयन्नु प्रार्थिसिदनु. यद्यपि राम नेनू क्रूरवाक्यगळन्नु हेळलिल्लवु, “उच्च मानोपि हरुषं नोत्तरं प्रतिपद्यते” ऎन्दु हेळिरुव हागॆ प्रपन्नन विषयदल्लि क्रूरवाक्कुगळन्नु पयोगिसुवदिल्लवु, * मावालि पथमन्नगति ” -________________
-1 अपराधपरिहाराधिकार १५८६ णुकस्तचत्वं कन्तु मर्हसि” ऎन्नुम्, महाराजरुडैय वुम्, इळ्ळॆय पॆरुमाळुडैयवुम्, अन्यून्य प्रसादन प्रकारं शूल्लुगिर श्लोकण्ण परामरित्तु आ (इ) हूडिये ईनवाय् तॆरियामल् वलेप घटत मानाक्कॊलॆ, पॊरु पोरुवुम्, प्राप्त म्. वालिय मार्गक्कॆ नीनू होगबेडवॆन्दू हितोपदेश माडि बा ऎन्दू, इष्टु मात्र हेळिदरॆ, रामनु शोकसन्तप्तनादनल्ला ऎम्बा ग्रहदिन्द नाने ई निष्ठुरोक्तिगळन्नाडिदॆनु, अवुगळन्नॆल्ला मन्नि स तक्कद्दॆन्दु प्रार्थिसिदनॆम्ब भाववु. हीगॆ भागवतरुगळाद श्री वैष्ण वरुगळ सन्निधियल्लि अपचार सम्भविसिदरॆ पश्चात्तापदिन्द अवर गळ क्षमापणॆयन्नु प्रासि अवरन्नु प्रसन्नरागि माडिकॊळ तक्कद्दु मुख्य कत्रव्यवॆम्ब शास्त्रार्थवु ई श्लोकदिन्द उपपादि सल्पट्टित्तु” ऎन्नुम् - ऎम्बदागियू महाराजरुडैयवु - श्री रामनु तॆनगॆ राजनागि भाविसिद सुग्रीव महाराजन, इळ्ळॆय पॆरुमाळुडैयुवुम् - श्री रामानुजनाद लक्ष्मणन, अन्यून्य प्रसादन प्रकारम् - परस्पर प्रसन्नरागि माडिकॊण्ड रीतियन्नु, शूल्लुगिर श्लोकण्ण - उपपादिसुव ई मेलिन श्लोकगळन्नु, परामर्शित्तु - चन्नागि विमर्शिसि तिळिदु, अप्पडिये - अदे प्रकारवागि, ई नवाय् - ऎरडागि भागिसल्पट्ट बायि, तॆरया मल् - तॆगॆयद हागॆ, वजलेप घटतमानालॆ - वज्र हाकि अण्टिसिद रीतियल्लि हेगो हागॆ, पॊरु पोरुवुम् प्रां- अवरॊन्दिगॆ परम मैत्रियिन्द सेरिदवरागि नडॆयतक्कद्दु युक्तवु. मेलिन नाल्कु वाक्यगळिगू सम्बन्धपट्ट प्राप्तम् ऎम्ब क्रियापदवु इल्लि इरुत्तदॆ. ई भागवतापचारवु प्राप्तवाद विषयवु स्वरूपक्कॆ योग्यवल्लवाद विषयवादुदरिन्द अदन्नु इतररल्लि प्रकटिसदॆ अदु नडॆयदे इद्द हागॆ भाविसि, आ भागवतरुगळॊन्दिगॆ प्रीति विश्वासादि युक्तनागि वरिसतक्कद्दॆम्ब भाववु. हीगॆ भागवताप चारक्कॆ भागवत प्रसादनवे प्रायश्चित्तवॆम्ब विषयदल्लि जात्यादि नियमवेनू इल्लवु. यावाग वैष्णव भागवतनानदनो अन्त________________
१५८७ श्रीमद्रहस्य त्रयसारे प्रायश्चित्त रूप पुनः प्रपदनेन सल्वेश्वरः क्षाम्यति इत्यत्र दृष्टा नः అంబ ज्ञानानानानर्व प्रातिकूल्यतिले बुद्धि पूरकवाग प्रवृत्त नानालुम् पुनः प्रपत्तियाले सत्वश्वर्र क्षमिक्कु वन विषयदल्लि उण्टाद बुद्धिपूापराधक्कॆ आतन प्रसादनवे प्रायश्चित्तवु. सुग्रीवनु वानरनु, लक्ष्मणनु क्षत्रियनु, आदरू इब्बरू परस्पर क्षमापणॆयन्नु प्रारिसिरुत्तारॆ. हागॆये रीषोपाख्यानदल्लि ई विषयवु स्पष्टवु ; दुर्वासरु ऋषियादुद रिन्द ब्राह्मणरु, अम्बरीषनु क्षत्रियनु. आदरू बुद्धिपूर्वकवागि दुासरु अरबरीषन विषयदल्लि अपराध माडिदुदरिन्द, क्षत्रिय महाभागवतन क्षमापणॆये प्रायश्चित्तवॆन्दु श्री हरिय दुरा सरिगॆ उपदेशिसिरुत्तारॆ. दुरासऋषियु सुदर्शन चक्रदिन्द पीडितरागि मुकुन्दनन्नु मरॆहॊगलु, आग करुणासागरनु “ अहं भक्त पराधीनः” नानु भक्त पराधीननादुदरिन्द अस्वतन्त्रनु नानु इन्नेनन्नू माडलारॆनु, “उपायं कथयिष्यामि तव निर श्रुणुष्ट तत्” ओ ऋषिये निनगॊन्दु पायवन्नु मात्र उपदेशिस वॆनु अदन्नु केळु, “ब्रह्मं स्त च्छभद्रन्ते नाभाग तनयं नृपम् । क्षमापय महाभाग ततशास्त्रद्भविष्यति” ओ ब्रह्मवित्तादऋषिये, नीनु इल्लिन्द नाभागन मगनागि राजनाद अम्बरीषनल्लिगॆ होगु, निनगॆ मङ्गळवागुत्तदॆ, आतनल्लिगॆ होगि आ न क्षमापणॆयन्नु प्रार्थिसु, अनन्तर निनगॆ ई भागवतापराध दिन्द प्राप्तवाद केशद शानियु उण्टागुत्तॆदॆ” ऎन्दुपदेशिसिद नन्तर, ऋषियु हागॆये नडॆसिद्दरिन्द सुदर्शन चक्रभयवु शान्त वायितु. हीगॆ ई शास्त्रार्थवु बहु स्वारस्यवागि इतिहासगळल्लि उपपादिसल्पट्टिरुत्तदॆ. अदक्कॆ ऒन्दु दृष्टानवन्नु उदाहरिसुत्तारॆ. प्रायश्चित्ररूपदल्लि पुनः प्रपदनानुष्ठानदिन्द भगवन्तनु क्षमिसुवनु ऎम्बुवदक्कॆ दृष्टानवु ज्ञानवानानर्व - ज्ञानवुळ्ळवनु, प्राति कूल्नत्तिलॆ - प्रति________________
(an) अपराधपरिहाराधिकारः १५८८ मन्नु मिडं श्री बदरीकाश्रमले क्रोधान्यनां धरा त्मजनान भगवानोडॆ वित्तु निलक्क, अवनु नारायणं प्रभुं रिवर् ” ऎरपडिय ण्ण, (२) “तशोध नर 9 ऎदिरन्नु को रुद्र ब्रह्मातॆ (१) “प्रसादयावास भवोदेवं शरणञ्च जगामाद्यं वरेण्यं वरदं ह प्रसाद नमान शरणागतिय स्पणि र्ना) देवो जितकॊ विकेन्द्रियः। कूलाचरणॆयल्लि बुद्धि पूरैकवागि, प्रवृत्त नानालुम् - पवरिसि दवनादरू, पुनः प्रदयाले प्रायश्चित रूपदल्लि पुनः प्रतियिन्द, सश्वरनु क्षमि मॆन्नुमिदम् - क्षमिसुवनु क्कु ऎम्बुव सन्दरवु, बदरिकाश्रमले , बदरिकाश्रमदल्लि, ध रात्मजनन - धम्मनॆम्बुवनिगॆ पुत्रनाद, भगवानोडॆ - नरनारा यणरूपदल्लि तपस्सु माडुत्तिद्द नारायण ऋषियॊन्दिगॆ, क्रोधा ननाय् - कॊपदिन्द ज्ञानवन्नु कळॆदुकॊण्डु ऎदिरं पु कोत्त ऎदुरागि निन्तु युद्ध माडिद, रुद्रनै .. रुद्रनिगॆ, ब्रह्मा - चतुरख ब्रह्मनु, तिळिवित्तु - सरियाद ज्ञानवन्नु पदे शिसुवदरिन्द कोपशान्तियन्नुण्टुमाडि, विलक्क - युद्धदिन्द निव रिसुव हागॆ माडलु, अवनु, आ, “भवः - रुद्रनु, देवनाद, प्रभुं स्वामियाद, नारायणं - नारायणनन्नु, प्रसाद यामास - प्रसन्ननागि माडिकॊण्डनु, आद्यं - सत्वक्कू आदि यागि कारणभूतनाद, वरेण्यं - वात्सल्यादि गुणगळिरुवदरिन्द वरिसलु योग्यनाद, परद प्रान्सिसिदुदन्नु कॊडुव श्री हरियन्नु, शरणञ्च जगाम, शरणवन्नू हॊन्दिदनु” ऎरपडिये - ऎन्दु हेळिरुव हागॆ, शरणागतिय्कॆ सण्ण प्रायश्चित्त रूप शरणागतियन्नु माडलु, “ ततः - आ कारण दिन्द ऎन्दरॆ आ रुद्रनु शरणागति माडिदुदरिन्द अथ - अनन्तरदल्लि वरदः - चतुरिद पुरुषार्थगळन्नू दयपालिसुव जितधः – क्रोधवन्नु जयिसिदवनाद, जितेन्द्रियनाद, देवः - क्रीडा पर नाद स्वामियु, तत्र - आ कालदल्लि, प्रीतिर्मा - सन्तुष्टनादवनु, (१) भार, शान्ति, ३५२. ९४. (२) भार, शान्ति, ३५२.९५ 1 1________________
१५८९ श्रीमद्र हस्यत्रयसारे प्रीतिमान भवत्र रुद्रेण सह सङ्गतः” ऎरपडिये सरेश्वर्र प्रसन्न नाम् अङ्गीकरित्तानॆयाले सिद्दम्. रुद्र अभवत् - आदनु, रुद्रेणसहसङ्खतः - रुद्रनॊन्दिगॆ सेरिदवनू आदनु ऎन्दरॆ आतनपराधवन्नु मन्निसि आतनिगॆ पूर्णानुग्रहवन्नु माडिदनॆम्ब भाववु. हीगॆ बुद्धि पूरा पराधक्कू पश्चात्तापपट्टु प्रायश्चित्त शरणागतियन्नु माडिदरॆ, सश्वरनु अदरिन्द प्रीतनागि आतन अपराधवन्नु मन्निसि अनुग्रह माडुवनॆम्बुवदु मुख्या प्रायवु. ई रुद्रेतिहासवु भारत शान्तिपद ३५२नॆय अध्यायदल्लि उपपादितवु. दक्षनु तन्न अळियनाद रुद्रनिगॆ उदल्लि ई विरागवन्नु समसलिल्लवु इदक्कॆ कोपाविष्टनाद रुद्रनु त्रिशूलवन्नु ०टु माडि बिडलु, अदु दक्षयज्ञवन्नु ध्वंसमाडि, बदरिकाश्रमदल्लि धम्मदेव तॆय पुत्ररागवतरिसिद नरनारायणरु तपस्सु माडुत्तिद्द कालदल्लि नारायणन वक्षस्थळदल्लि बिद्दितु. आग नारायणनिन्द केश हॊन्दिद आ त्रिशूलवु शङ्करन करवन्नु होगि सेरितु. इदक्कागि रुद्रनु कोपगॊण्डु नारायणनॊन्दिगॆ घोरयुद्दवन्नॆ सगलु, आग तुम्बा भीतराद देवतॆगळु होगि चतुरुखब्रह्मनल्लि मॊरॆयिडलु, आतनु होगि रुद्रनु माडुत्तिद्द अविवेकवन्नु अवनिगॆ तिळिसि, ई महाप राध शमनक्कागि नारायणनल्लि शरणागतियन्नु माडॆन्दुपदेशिसि दनु. आ प्रकार रुद्रनु शरणागतियन्नु माडिदुदरिन्द नारा यणनु सुप्रीतनागि आतन अपराधवन्नु मन्निसि अनुग्रहिसिदनॆम्बु वदु कथा सारांशवु. इदु अद्दु ननिगॆ श्री कृष्णनु रुद्रनिगॆ खण्ड परशु, श्रीकण्ठादिनामगळु हेगॆ उण्टायितॆन्दू, हागॆये तनगॆ हेगॆ नामगळु प्राप्तवायितॆन्दू हेळुव प्रकरणवु’’ ऎर पडिये ऎन्दु हेळिरुव हागॆ, सद्वेश्वरनु, प्रसन्न नायर् - अनुग्रह माडुवनागि, रुद्रनन्नु, अकरिर्त्ता - अङ्गीकरिसि दनु, ऎन्नॆयाले - ऎन्दु हेळिरुवदरिन्द, सि द्दम् - स्थापित वाद विषयवु. सश्वर्र क्षमिक्कु मॆन्नु मिडन् ऎम्बुवदु, ई सिद्दन ऎम्बुवदक्कॆ करपदवु.________________
अपराधपरिहाराधिकारः र्ता कुत्तनाळ नागवुाम, तानिप्पोदु कुत्तं कॆय्यादे इरुक्क जन्मान्तर दुष्कृ तालॆ यागवु नाम्, शिलभागवतर् तन्नॆ वॆरुल्, एदेनु मॊरुविरगाले यव गळ्ळ क्षमैकॊळ्ळुगिर मुखत्तालॆ ईश्वर कमैकॊळ्ळवेणु हीगॆ बुद्दिपूरकवागि भागवतापचारवु प्राप्तवादरॆ, आ भाग वतरल्लि क्षमापणॆये प्रायश्चित्तवॆन्दु सप्रमाणवागि सदृष्टान्नवागि स्थापिसल्पट्टितु. ऒन्दु वेळॆ बुद्धि पूरैकापराधवन्नु भागवतरुगळल्लि माडदेने भागवतरु, तन्न जन्मान्तर दुष्कृत फलवागि निष्टु रोक्तिगळन्नाडिदरॆ, आग प्रसन्ननादवनु हेगॆ नडॆदुकॊळ्ळबेकॆम्बुव दन्नु मुन्दिन वाक्यवाद “र्ताकुत्तवाळ नागवु मान्” ऎम्बु वदरिन्दु पदेशिसुत्तारॆ. अन्तह सन्दरदल्लि अदन्नु सहिसिकॊण्डु ताळ्मॆयिन्द अवरुगळ क्षमापणॆयन्नु केळि कॊळ्ळुवदे युक्तवॆन्दु सप्रमाणवागि हेळुत्तारॆ. तिळिसि, अदरिन्द सश्वरनु सन्तुष्टनागुवनॆन्दु र्ता कुत्त वाळनागवुमाम् - तानु ई जन्मदल्ले माडिद अपराधवुळ्ळवनागलि, र्ता इप्पोदु कुत्तम शय्या दे इरुक्क- तानु ईग ई जन्मदल्लि एनॊन्दू अपराध माडदिद्दरू, जन्मान्तर दुष्कृत शालॆयागवु माम् - हिन्दिन जन्मदल्लि माडिद दुष्कृत मूलकवेयागलि, शिलभागवत तन्नॆ वॆरुक्किल् - कॆलवु भाग वतरु तन्नन्नु दूषिसिदरॆ, यावाग भागवतरु निष्टु रोक्तिगळन्नाडि दरो, अदु कारणविल्लदे बेरॆ आदुदल्लवु, ई जन्मदल्लेनू प्रत्यक्ष वागि आ भागवतरुगळिगॆ अपराध माडदिद्दरू, हिन्दिद जन्मदल्लेनो दुष्कृत नडॆदिरबेकु, अदक्कागि ई भागवतरुगळु स्वामिसानु सार निष्टुगळन्नाडिद्दारॆन्दु भाविसतक्कद्दॆम्ब भाववु, एदे नुमॊरुविरुगाले - यावुदादरू ऒन्दु उपाय मूलकवागि, अवरुगळ्ळि क्षमैकॊळ्ळुगिर मुखत्ताळॆ, आ निन्दिसिद भागवतरुगळ क्षमापणॆयन्नु माडुवदर मूलकवागि, ईश्वर क्षमॆ कॊळ वेणुम् - सक्षेश्वरन क्षमॆयन्नु प्रारिसबेकु, ऎन्नु मिडम् ऎन्नुव सन्दरवु, “तथा - हागॆयॆ, भागवतेरिर्ता - भागवतरु________________
१५९१ श्रीमद्रहस्यत्रयसारे मॆन्नु मिडम्, (१) “ रूक्षाक्षराणि शृण्वनैत भागवतेरि र्ता प्रणाम पूरैकं का योनि दे दृष्टवो हि सः” ऎन्न श्रीवैष्णव लक्षणं सल्लुगिर प्रमाणत्तिले सिद्धम् इण्णन आयावपोम (१) “ये ब्राह्मणा स्नेहमसंशय गळिन्द हेळल्पट्ट, रूक्षाक्षणि - कूरवाक्कुगळन्नु, तुण्ण केळुववनादरू, कात्या - ताळ्मॆयिन्द, प्रणाम पूर कं - आ निन्दिसिद भागवतरुगळिगॆ प्रणाम पूकनागि, योवदेत् - याव अपराध परिहारद पदा प्रसन्नरागि माडुवदक्कागि सम्भाषणॆ माडुवनो, सः - अवनीग वैष्णवोहि - सरियाद - वैष्णवनॆन्दु हेळिसिकॊळ्ळुवनु” ऎन्नु - ऎम्बदागि, श्री वैष्णव तिलॆ - प्रमाणदल्लि, सिद्धव् , स्थापितवु, ई सिद्धव ऎम्बुवदु क्षमैकॊळ्ळवेणु मॆट्टि निडवु ऎम्बुवरॊन्दिगॆ अतव्र यावाग भागवतरु तन्नन्नु निन्दिसिदरॆ, आग अदक्कॆ कारणविद्दे इरबेकु ; कनुसारवागि स्वामि सल्पविल्लदॆ अदु नव दिल्ल ईग तानेनू इवरिगॆ अपराध माडदिद्दरू, हिन्दॆ पूजन्म दल्लादरू दुष्कृतवु तन्निन्द नडॆदिरबेकु, अदक्कागि सश्वरनु ई रूपदल्लि शिक्षिसिरुवनु. आदुदरिन्द तानु ईग निरपराधि ऎन्दु भाविसि आ निन्दिसिद भागवतरन्नु धिक्करिसदॆ, अवर क्षमापणॆयन्ने प्रार्थिसतक्कद्दु. इदरिन्द सश्वरनु सुप्रीतनागि आ हिन्दिन दुष्कृत परिहारवन्नु माडि अनुग्रहिसुवनॆम्ब भाववु. हीगॆ माडदॆ, तानु ईग निरपराधियु, निष्कारणवागि ई भाग वतरुगळु तन्नन्नु निन्दिसिरुत्तारॆन्दु भाविसि, तानू अवरन्नु धिक्क रिसि, मेलॆ हेळिद रीतियल्लि क्षमापणॆ माडिकॊळ्ळदिद्दरॆ प्राप्तवागुव प्रत्यवायवेनॆम्बुवदन्नु “ इल्लिन इयादपोदु” ऎन्दारम्भिसि हेळुत्तारॆ :- इण्णन इत्यॆयाद पोदु - हीगॆ माडदे होदरॆ, (१) ये - यारु, ब्राह्मणाः - ब्रह्मवित्ताद ऎन्दरॆ परब्रह्म नन्नु तिळिद भागवत रो, ते - अवरु, अहं - नानु ऎन्दरॆ नन्न (१) लैङ्ग पुराणं (१) विष्णु धर ५२.२० 0356________________
अपराध परिहाराधिकारः १५९२ नृप तेष्टरि तेरि तोहं यथावत् । तेव तुष्टह मेव तुषो वैरञ्च शैर ममापि वैरन.” (२) घन्तं शपं परुषं वदन्तं यो ब्राह्मणं न प्रणमेद्य थाहं स पापकृह्मदवाद वध्यक्ष दण्ड्य नचास्मदीयः” रूपदल्लि सञ्चरिसुवन्थावरु, इदु युधिष्टरनिगॆ हेळुव भगवद्वा क्यवु, जेनृप-ओ राजनाद युधिष्टरने, ई विषयदल्लि असंशयं- संशयविल्लवु, केपु अरिसु - आ भागवतरु पूजिसल्पट्टरॆ, अहं नानु, यथावत् शास्त्र रीतियल्लि, अग्नि तः . पूजिसल्पडुवॆनु. तेव त स्टेषु . आ ब्रह्मएत्तुगळु सन्तुष्टरादरॆ, अहमेह तुष्टः - नाने सन्तुष्टनागवनु ; यस्य - यावनिगॆ, तैः - आ भागवतरॊन्दिगॆ, वैरं - द्वेषवो, सामा३ - ननगू कूड, आत नल्लि, वैरं - द्वेषवे; “पाण्डर्वा द्विष सेरार्ज मन प्राणाहि पाण्डवा” नन्न भक्तरद पाण्डवरन्नु द्वेषिसुवदरिन्द ननगॆ नीनु द्वेषियॆ, ऎन्दु धुधननिगॆ हेळिद श्री कृष्णन उक्तियु ई सन्दर्भदल्लि - नुनयवु. मत्तु, (२) अन्त - हॊडॆयुत्तिरुव, श प - शपिसुत्तिरुव परुषं वदनं - क्रूर वाक्कुगळन्नाडुत्तिरुव, ब्राह्मणं - ब्रह्मविनु, यथा - हेगॆ, अहं - नानु, बृगुऋषियु कोपदिन्द नन्नन्नु कालिनिन्द ऒद्दाग आतन क्षमापणॆयन्नु हेगॆ केळिकॊण्डॆनो हागॆ, न प्रणमेत्. आत निगॆ नमस्करिसि क्षमाहणॆयन्नु केळिकॊळ्ळुवदिल्लवो, सः – अन्त - वनु, पापकृत् पापमाडिदवनु, ब्रह्मदनाग्नि दग्धः - ब्रह्म वित्तादवन कोपवॆम्ब काडिच्चिनिन्द भस्मवादवनु, वः - वधि सल्पट्टवनु, ऎन्दरॆ स्वरूपहानि माडिकॊण्डवनु, दण्ड्यश्च - दण्डि सल्पट्टवनू ऎन्दरॆ स्वभावनाश माडिकॊण्डवनु, नच स्मदीयः - आतनु ननगू नन्न भक्तरिगू सेरिदवने अल्लव ; ऒब्ब ब्रह्मवित्ता दवनु ऒब्बनन्नु हॊडॆयुत्ता शपिसुत्ता निष्टु रोक्तिगळन्नु हेळुत्ता इद्दरू, आतन विषयदल्लि ताळ्मॆयिन्द आतनिगॆ प्रणामवन्नु माडि, कोपकारणवन्नु विचारिसि क्षमापणॆयन्नु माडतक्कद्दु, भैगु महर्षियु कोपदिन्द बन्दु, तानु मलगिरुवाग तन्नन्नु कालि________________
१५९३ श्रीमदहस्यत्रयसारे ऎङ्गिरपडिये, भगवदभिमान बाह्य नुमा, वैष्णव प्रकृतियायिरुक्किर तनक्कु स्वरूप ऎन्नलामृडि अरण्य मान भागवत शेषत्वक्कॆयुम्, स्वभाववाय निन्निर शम दमादिगळ्ळॆयु मिळिना नाम्, निन्द ऒद्दरू, अदक्कॆ प्रतियागि कोपिसदॆ, आ खुषिय क्षमापणॆ यन्नु तानु केळिकॊण्डनु. हागॆ माडदिद्दरॆ, प्रतियागि कोपिसि दवनु पाप माडुवनु. तनगॆ स्वरूपवाद भागवत शेषवन्नु कळॆद कॊळ्ळुवनु. इदु वद्य शब्दद प्रायवु, मत्तु प्रपन्नन स्वभाववाद शवदमादिगळन्नु कळॆदुकॊळ्ळवन्नु इदु दण्ड्य ऎम्बु वदर अभिप्राय वु इदीग अभिप्रायगळॆन्दु तावे मुन्दॆ व्यक्त पडिसिरुत्तारॆ . इदू अल्लदॆ, भगवदभि “गृह्यन्ते यदिरो षेण त्वादशोपि विपश्चितः । तत शास्त्र विपश्चित्वं श्रमएव हि केवलं” (रामा, सुं ५२८) ऎन्दरॆ, यारो निनगॆ अपकार माडिदरॆन्दु निन्नन्तह शास्त्रज्ञरू अवर विषयदल्लि कोपक्कॆ वशवादरॆ, आग शास्त्र पाण्डित्यवॆल्ला केवल श्रम रूपवायिते विना पुरुषार्थ दायकवागलिल्लवॆन्दु निभीषणनु तन्नण्णनिगॆ बुद्धि हेळिद हागॆ ईतन तिळुवळिकॆयल्लवू निरर्थकवादुवू आगुत्तवॆ. ऎरपडिये - ऎन्दु हेळिरुव हागॆ, मान बाह्यनुवाय - भगवदनुग्रहक्कॆ हॊरगादवनागि, वैष्णव प्रकृतियायिरुत्तिर त नक्कु - वैष्णव स्वभाव उळ्ळवनागिरुव, वैष्णव देहवन्नॆत्तिद तनगॆ, स्वरूपवॆन्नलाम्पडि - स्वरूपवॆन्दु हेळबहुदाद, अरमान भागवत शेषयुम् प्रियवाद भागवत शेषवन्नू, स्वभावमाय् निर. अन्तह वैष्णव प्रपन्नन स्वभाववागिरुव शमदमादिगळ्ळॆयुम्, शव वॆन्दरॆ अन्तरिन्द्रिय निग्रहवु, दमवॆन्दरॆ बाहेन्द्रिय निग्रहव, इल्लि आदि शब्ददिन्द “ शमोदमस्तप शौचं कान्तिरार्जवमेवच । ज्ञानं विज्ञान मास्ति क्यं ब्राह्मं कर स्वभावजं________________
अपराधपरिहाराधिकार १५९४ इव ळि ताने यवनन्नु वधमुव, दण्ड मुम्, भगवदभिमान बाह्यतॆर्यि कॊडुमैयॆ (१) “अळि ऎम्ब श्लोकदल्लि (गी, ९८. ४२) हेळिरुव तपस्सु मॊदलादवुगळु हेळ ल्पट्टवु. इवुगळन्नॆल्ला, इन्सानाक् - नाशमाडिकॊण्डवनागु वनु. अन्तवनिगॆ भगवदनुग्रहवू इल्लवु ; भागवत शेषत्वरूप स्वरूपहानिय, शमदमादिगळाद तन्न स्वभावक्कॆ हानियू सह उण्टागुत्तवॆ ऎम्ब तात्सरवु. इल्लि वध्यक्कॆ दण्ड्य ऎम्बुवदक्कॆ स्वरूप स्वभावहानि ऎम्ब हेळल्पट्टि इल्ला, अदु हेगॆ ऎन्दरॆ उप पादिसुत्तारॆ, तनगॆ स्वरूपवे भागवत शेषत्ववु, इदन्नु कळॆदुकॊं डर स्वरूपमानियु, स्वरूपहानिये वधॆगॆ समानवु हागॆये शम दमादिगुणगळे तनगॆ स्वभाववु बन्द्रिय अन्तरिन्द्रियगळिगॆ म नागि भागवतरुगळॊन्दिगॆ परुषोक्तियिन्द तन्न स्वभाववन्नु हाळश माडिकॊळ्ळुवदु, बाह्यन्द्रिय अन्तरिन्द्रियगळन्नु नाशमाडिकॊण्ड हागॆ आगुवदरिन्द दण्डक्कॆ समानवु ; ऎन्दु मुन्दॆ तिळिसुत्तारॆ :-
इवत्तॆ - ई भागवत शेष रूपवाद स्वरूपवन्नू, शम दवादि रूप स्वभाववन्नू, इळि ताने - हाळुमाडिकॊळ्ळुवदु ताने, वधमु दण्डमु वर् - आत्मनाशरूप वधवू इन्द्रिय नाशमाडिकॊण्ड शिक्षॆयू वध्यशब्दक्कू दण्ड्य शब्दक्कू सरियाद रवेनॆम्बुवदन्नु पदेशिसि, आ श्लोकद नचादीयति ऎम्बुवदरर्थ वेनॆम्बुवदन्नु तॊण्डरडिप्रॊडियाळ्वारवर तिरुमालॆ ऎम्ब ग्रन्थद पाशुरदिन्द समनॆ माडि तिळिसुत्तारॆ. इवरु भागवत शेष माहात्रॆयन्नरितु अदरल्ले अभिरुचियुण्टवराद प्रय कवे, तॊण्डर् ऎन्दरॆ भागवतर, अडि - कालिन पॊडि - धूळु तावु ऎन्दु भाविसि आ नामधेयवन्ने धरिसिकॊण्डिरुत्तारॆ. भगव दभिमान बाह्यतैर्यि- भगवदनुग्रहक्कॆ दूरवागिरुवदर, कॊडु मैय्य - कौल्यवन्नु, “अळिय - मनोहरनाद, क मनोहरनाद, कृपॆमाडलु योग्यनाद ऎन्दु श्रीर्मा शॆट्टलूरु नरसिंहाचारैरु व्याख्यान (१) तिरुमालॆ, ३७________________
१५९५ श्री मद्र हस्यत्रयसारे यन मैयलॆनारम्यवो कॊडियवरे” ऎन, भागवत शेषत्व मे तमक्कु निरूपकनागिरुचित्त श्री तॊण्डरॆडिप्रॊडि माडिरुत्तारॆ, नम्मॆयल् - दास्यभाववन्नु आदरिसि नम्म बाल नॆन्दु, ऎन्नार् - ऎन्दु अभिमानिसि हेळुवदिल्लवे, यारु ऎन्दरॆ नम्म स्वामियाद श्री रङ्गनाथनॆम्ब भाववु. अम्मवो - अय्यो, कॊडियवारे नन्न मष्कृतद कौरवे” ऎन्नु - ऎन्दु निन्दिसि पूरापाशुरवु यावुदॆन्दरॆ :- 66 *तॆळिविलाक लल् नीरि शूळ् तिरुवरत्तुज्जुम् । ऒळियुळा तामेयने तन्नॆयुन्नायु मावा ऎळिय तोररुळुमश्रेर्यॆ तिरुत्तॆ मैरानार । دته ريه अळिय नयलॆन्नार मृवो कॊडियवार ” इदरर्थवु :- तॆळुविल्ला - तिळियागुवुदक्कॆ अवकाशविल्लदॆ मेलॆ मेलॆ प्रवाह बरुवदरिन्द, कलब्बल् - नीरु कलकि कॆम्पगिरुवदु तप्पदे इरुव, नीर् शूळ् - कावेरि नदिय नीरिनिन्द सुत्तल्पट्टि, तिरुवरत्तु ळ - श्रीरङ्ग विमानदल्लि ओट्टु म् ऒळियुळा तामे अने - तिशयवाद तेजस्सुळ्ळ श्रीरङ्गनाथनॆ अल्लवे, तन्दॆ युव - हितवन्नु कल्पिसिकॊडुव तन्दॆय, तायियु - वागि भोग्यवादुदन्नुण्टुमाडुव तायिय आ फार् - आगिरु ववरु, ऎन्तिरुत्तु . नन्न विषयदल्लि माडतक्कद्दु, ऎळियम - श्रम साध्यवल्लद (देवतॆगळिगागि समुद्रमथन माडबेकाद श्रम बेकिल्लव, मन्दरगिरियन्नु हॊरुव कॆलसविल्लव, विभीषणनिगागि राक्षस रन्नु वधिसुव श्रम बेकिल्लवु, इत्यादि) ओर् अरुळ् अने - ऒन्दु सल दिव्यकटाक्षदिन्द नोडुवदल्लवे ऎन्दु तॊण्डरडि पॊडिया क्यार्- भक्तां र ण वाळ्वारवरु, अरुळिच्चॆयदा-अप्पणॆ कॊ डिसिरुत्तारॆ. आळ्वरवरु ऎन्तवरॆन्दरॆ अवरन्नु श्लाघिसि हेळुत्तारॆ- भागवत शेषत्वमे तनक्कु निरूपकवाग र चित्तव-भागवत शेषत्ववे तमगॆ स्वरूपवॆन्दु भाविसि अदरल्लि अभिरुचियुळ्ळवु, ई अभिप्रायवन्ने तिरुवर मुदनार् इरामानुजन्नू ना डिय शात्तु मरै पाशुरदल्लि श्री रामानुजरन्नु कुरितु तानु, 26________________
(29) अपराधपरिहाराधिकार याळ्वावाररुळिच्चॆय् दार्. इश्लोकळिल् १५९६ ब्राह्मण शब्द, (२) विष्णुक्रां वासुदेवं विजानन्निप्रो विज्र
शूल्लुवनुण्डु प्रार्थिसुवदॊन्दुण्टु, अदेनॆन्दरॆ- र्उ तॊण्डगळ अनुसरुक्क पडि , निनगॆ दासभूतराद भागवतरुगळ विषयदल्लि प्रीतियुळ्ळववनागि, ऎन्नॆ आक्कि - नन्नन्नु माडि, नन्नन्नु अण्णडुत्तॆ अवर विषयदल्लि दासनन्नागि कृपया माडतक्कद्दॆन्दु प्रार्थिसिरुत्तारॆ. इन्तह महनीयरु, श्रीरङ्गनायकनु तम्मन्नु तन्न बालनागि अभिमानिसलिल्लवे ? तम्म दुष्कृतवु ऎष्टु प्रबलवादुदु? ऎन्दु निन्दिसिकॊण्डिरुत्तारॆ. आदुद रिन्द भगादभिमानक्कॆ बाहिरवागि माडिकॊळ्ळुवदु तुम्बा प्रबल वाद दुष्कृतवादुदरिन्द हागॆ भागवतापचारदिन्द भगवन्नि ग्रहक्कॆ गुरियागकूडदॆन्दु पदेशिसिरुत्तारॆ. हीगॆ, आ श्लोकदल्लि न चास दीयः ऎम्ब पदक्कॆ सविस्तरवागि अभ्यवन्नु बरॆदवरागि, मुन्दॆ ब्राह्मण शब्दक्कॆ, आ श्लोकदल्लू, अदर हिन्दिन श्लोकवाद “ये ब्राह्मणा” ऎम्बल्ल, अर्थवेनॆम्बुवदन्नु तिळिसुत्तारॆ– इन्नूक इळिल् - ई ऎरडु श्लोकगळल्लि ब्राह्मण शब्द वु, “विष्णु - सत्व वन्नु व्यापिसिद, क्रान्तं - सत्वलोकगळन्नु अळॆदु आक्रमिसिद, नानु देवं - तानु ऎल्लादरल्ल, ऎल्लवू तन्नल्लू इरुव सश्वरनन्नु, विजानन् - चन्नागि तिळिदु ब्रह्मवित्तॆन्दु यावाग ऎनिसिदनो आग तत्वदर्शि - ई लोकद मत्तु जीव परमात्म याथार्थवन्नु तिळिद, विप्र - ब्राह्मणनीग, हीगॆ विप्रत्वं गच्छते विप्रभाववन्नु हॊन्दुवनु ऎन्दरॆ ब्राह्मणनॆन्दॆनिसुवदक्कॆ योग्यनागुवनु” इदर परार्धवु :-“पंविष्णुं वासुदेवं विजार्न सरा प्र्रा बोधतेतत्वदर्शि”यज्ञद यूपस्तम्भवन्नू, यज्ञ विष्णु ऎम्ब प्रकार सत्वयज्ञभोक्तानाद विष्णुवन्नू तिळिदरॆ तत्व दर्शियादवनु आ यज्ञाधिकारिगळाद समस्त ब्राह्मणरन्नू तिळिदव नागि, अवर महिमॆयन्नु बोधिसुवनॆम्ब भाववु ; ऎन्दरॆ यज्ञवू, यज्ञभोक्तवू यज्ञाधिकारिगळू ऎल्ला ऒन्दे राशिगॆ सेरिदवरॆम्ब (२) भारत. आनु, १६२________________
おし श्रीमद्रहस्यत्रयसारे तङ्गच्छते तत्वदर्शि” ऎङ्गिर प्रक्रियॆयाले विशेष विष यम् ; सामान्य विषयमानालु भागवत विषयत्तिल्ल अपराध (क्षा पण)व कैमुतिक न्यायत्तले सिद्ध. भाववु.” ऎच्चर . ऎन्दु हेळिरुव प्रक्रियॆयाले प्रकरणानु सारवागि, विशेष विषयम् - हीगॆ ब्रह्मवित्ताद ब्राह्मणनॆन्दु विशेषिसि हेळुव सन्दर्भवु. हागॆये इल्लि अर्थवॆम्बुवदु निगमात्र देशिकरभिप्रायवु. हागल्लद ब्राह्मणनु ब्राह्मण शब्दक्कॆ अयोग्यनॆम्ब भाववु, ब्रह्मान तीति ऎम्ब यिन्द, ब्राह्मणनॆन्दु योगरूपदल्लि अर्थ हेळतक्कद्दु ऎम्ब तात्स रवु. आदुदरिन्द ब्रह्मवॆन्दरॆ, वेदगळू वेदवन्नु तिळिद ब्राह्मणर वेदप्रतिपाद्यनाद परब्रह्मवू, इवुगळन्नु अरियुववनु ब्राह्मणनु, इदक्कॆ वेदा विप्रा, केशव काशि” ऎम्बुव प्रमाणवनु सन्दे द वु हीगॆ अर्थ हेळिदरेनॆ, क्षत्रियादि इतर वरद भागवतरु इदरल्लि सेरिदवरागि अन्थावर अपचारवू कूडदु, अदू कूड प्रत्य वायकरवादुदॆन्दु हेळिदन्तागुत्तदॆ. हागल्लदॆ सामान्यवागि रूढि यिन्द हेळुव ब्राह्मण शब्ददिन्द ब्राह्मण जातियल्लि हुट्टिदवनॆन्दु इष्टु मात्र हेळिदरॆ अन्तह भागवतर विषयवु बिट्ट होगुत्तदॆ आदुदरिन्द ई श्लोकगळल्लि ब्राह्मण शब्ददिन्द ब्रह्मवित्तॆ हेळल्पट्ट नॆन्दु भाविसतक्कद्दु, आगलि, ब्राह्मणशब्द रूढियल्लि हेळुव आत्मवे सरि ऎन्दु हेळिदुदादरू चिन्तॆयिल्लवु ; आगलू कूड ऒन्दु विधवागि स्वारस्यवन्ने कल्पिसबहुदॆन्दु अभिप्राय पडुत्तारॆ. आग ई प्रमा णवु ब्राह्मणनन्नु मात्र हेळुव सन्दर्भवॆन्दु भाविसि, सामान्य ब्राह्मणनिगॆ अपराधवागुत्तदॆन्दु हेळिदरॆ, भागवत ब्राह्मणन विषयदल्लि अपराधवॆन्दु हेळुवदु कैमुतिक न्यायद प्रकार सिद्ध वॆन्दु हेळुत्तारॆ :- सामान्य विषयमानालुम् - ई ब्राह्मण शब्दवु सामान्यवागि ब्राह्मणयोनियल्लि हुट्टिदवरिगॆल्ला अन्वयिसु इदॆन्दरॆ, भागवत विषयल् - भागवत ब्राह्मण विषयदल्लि अपराध अपराधवागुत्तदॆम्बुवदू, अदरिन्द प्रत्य- वाय नॆम्ब भाववू, जैमुतिक न्यायत्तालॆ सिद्धव - * मुत इन्नु________________
अपराधपरिहाराधिकार १५९८ हेळतक्कद्देनिदॆ ऎम्ब न्यायदिन्द सिद्धवु. साधारण ब्राह्मण निगेनॆ अपराधवादरॆ, भागवत ब्राह्मणनिगॆ अपराधवॆम्बुवदु स्वतस्सिद्धवॆम्ब भाववु. अपराध ापण’ ऎम्ब पाठान्तर वादरॆ, साधारण ब्राह्मणनिगॆ माडिद अपराधक्कॆ क्षमापणवु आवश्यक वादरॆ भागवत ब्राह्मणन वषयदल्लि क्षमापणद आवश्यक उण्टॆन्दु हेळतक्कद्देनिदॆ ऎम्ब भाववु. ईग हेळल्पट्टिदुदु, बुद्धिपूराघवु प्राप्तवागद हागॆ माडुवदक्कागि प्रारब्धकल्मद पापारम्भकांशद नाशक्कागिय प्रथम शरणागतियल्ले सेरिसि माड तक्कद्दु. हागॆ माडदिद्दरॆ बुद्धिपू राघव प्राप्तवागबहुदु. अदरल्लि तुम्बा प्रबलवादुदु भागवताप चारवु. ई बुद्धिवू राघगळ विनाशक्कागि प्रायश्चित्त रूप पुनश्यगणागतियन्नु माडतॆक्कद्दु. आदरॆ श्री कूरेशरवर वैकुण्ठ श्रवद (६२) श्री वरदराजस्तव (८५) श्लोकगळल्लि अपराधमाडि बिट्टॆने ऎम्ब अनुतापवू, इन्नु मुन्दॆ अन्तह अपराधवन्नु ऎन्दिगू माडुवुदिल्लवॆम्ब अपराध निवृत्तियू, इवुगळू कूड पापनाशकगळॆ, दु हेळिदॆयल्ला, पुनः प्रायश्चित्तरूप शरणा गतिय आवश्यकतॆयेनु ऎन्दरॆ अदक्कॆ समाधानवागि मूरु कारिका श्लोकगळन्न नुग्रहिसुत्तारॆ. श्री कूरेशर आ ऎरडु श्लोकगळु यावु वॆन्दरॆ :-(१) निरवधिसु कृतेषु चाग स्सहो मतिरनुशयिनी यदिस्या तवरद हि दयसे नसंशेमहे निरनुशयधियो हता वैवयं - अपराधगळु अनन्त वागि माडल्पट्टरू, अय्यो माडिबिट्टॆने ऎम्ब पश्चात्ताप बुद्धियुण्टादरॆ, ओ वरदने नीनु दयमाडि आ अपराधगळन्नु होगलाडिसुवि. ई विषयदल्लि ईषदपि नावु सन्देह पडुवुदिल्लवु पश्चात्तापविल्लदॆ नावु कॆट्टॆवु.” ऎम्बु वदु अभिप्रायवु. (२) “यह्म कल्प नियतानुभवे प्यनाशं तल्पिषं सृजति जन्तु रिजक्षणर्धॆ ! एवं सदा सकल जन्मसुसापराधं कामसह तदभि सन्धिविराम मात्रात् अनेक कल्पगळनुभविसिदरू नाशवागदष्टु पापवन्नु ई ज्ञानशून्यनागि पशु समाननागि जन्ममरणाद्यवस्थॆगळन्नु हॊन्दिद ई तनु अत्यल्प कालदल्ले माडुवनु. हीगॆ यावागलू समस्त________________
१५९९ श्रीमद्रहस्यत्रयसारे अनुतापादु परमात्रायश्चित्तोन्मुखतः । तरणाच्छापराधात्सर्वनश्यनि पादशः ॥१७॥ जन्मगळल्लि अपराधगळन्नॆसगिदवनन्नु, अय्यो पापमाडुत्तिद्दॆ नॆये, इन्नु मुन्दॆ माडुवुदिल्लवॆम्ब मात्रदिन्दले क्षमिसिबिड ये, निन्न कृपामहिमॆयु अत्यद्भुतवु, ऎन्दु हीगॆ अनुताप दिन्दलू, तदभिसन्धि विरामदिन्दलू, बुद्दिपूरोत्तराघवु नशिसि होगुत्तदॆन्दु हेळिरुत्तदॆयल्ला ऎन्दरॆ, अदक्कॆ समाधानवन्नु हेळुत्तारॆ; अनुतापवु उण्टागुवदे पापनिवरिगॆ प्रथम पादवागि पॆरिणमिसि, मुन्दक्कॆ अपराधनिवृत्तियुळ्ळवनागुवनॆम्बुवदु पाप परिहारक्कॆ द्वितीय पादवागि परिणमिसि, अनन्तर अदक्कॆ प्राय श्चित्तोन्मुखनागुवदु मूरने पादवॆन्दू, प्रायश्चित्त समा प्रिये अपराधपरीहारक्कॆ नाल्कने पादवॆन्दू हीगॆ पादशः ई नाल्कु कारणगळिन्द अपराधद नाल्करल्लि ऒन्दॊन्दु भागवु परिहार वागुत्तदॆन्दु मुन्दिन श्लोकगळिन्द तिळिसुत्तारॆ :- अनुतापात् - अनुतापदिन्द अपराधगळ कालुभागवू, अनुताप हेगॆन्दरॆ, तिळु वळिकॆ इद्दरू लोभादिगळिन्द नानु ऎन्तह अपराधगळन्नु हेगॆ माडिदॆनु, मौड्यदिन्द अय्यो नडॆयिते, महत्ताद भगवन्निग्रहक्कॆ पात्रनादने, शिष्टर निन्दॆगॆ गुरियादॆने इवे मॊदलाद पश्चा तापदिन्द कालुभागवू, उपरमा - ई विधवाद दुष्कृत्य गळल्लि नानु ऎन्दिगू इन्नु मेलॆ प्रवरिसतक्कद्दल्लवु ऎन्दु पाप माडुव बुद्धियिल्लदिरुवदरिन्द कालुभागवू, प्रायश्चित्तोन्मुख ततः - प्रायश्चित्तवन्नु ईगले माडिकॊळ्ळुवदु युक्तवु ऎन्द अदन्नु माडिकॊळ्ळलभिमुखनागुवदरिन्द कालुभागवू, तत्तूर णात् - आ प्रायश्चित्तवन्नु निहिसि पूरैसुवदरिन्द, कालुभागवू, हीगॆ सत्व अपराधा8 - समस्त अपराधगळू, ऎन्दरॆ, अबुद्धि पूरैक वादवुगळु बुद्धि पूरकवादवुगळु, गुरु वादवु, लघुवादवु ऎल्लवू हीगॆ ईनाल्करिन्दलू, ऒन्दॊन्दरिन्द अपराधगळ कालकालु भागवु नश्यनि-नशिसिहोगुत्तवॆ. प्रायश्चित्त पूरणदिन्दले निशेषवागि अप राधगळ नाशवॆम्ब भाववु. आदुदरिन्द अनुतापदिन्दलू, उपरम 1________________
अपराध परिहाराधिकारः पूरैस्मिन्हा परा क निश्चिण्ण चेतसाम्। निव तारतम्यपि प्रपत्तिर विशिष्यते ॥१८॥ $ १६०० दिन्दलू अपराध परिहार उण्टॆन्दु हेळिद अभि युक्तर वाक्यवु समञ्जसवादुदे. आदरॆ अनुतापादिगळु, प्रायश्चित्त पूर्तिगॆ मूल कारणगळादुदरिन्द अवुगळिन्दलू अपराधगळ चतुर्धांशगळु नाश वॆन्दु भाविसबहुदु ऎम्ब तात्सरवु. राघगळिगॆ प्रायश्चित्तवॆन्दरॆ, हिन्दॆ, बुद्धि पूरा घक्कॆल्ला प्रायश्चित्तरूपदल्लि पुनः प्रपद नन्ननुष्टि सतक्कद्दॆन्दु हेळल्पट्टितु. हीगॆ सत्व विधापराध गळिगॆ इदु ऒन्दे प्रायश्चित्तवॆन्दु हेळबहुदो, गुरुवाद अप राधगळिगू, लघुवाद अपराधिगळिगू गुरुलघुप्रायश्चित्तगळन्नु विधिसुवदु न्यायवु. शास्त्रदल्लि हागॆये विधिसिरुत्तदॆ. हीगॆ ई प्रपदन ऒन्दे ऎल्ला विध बुद्धि पूरो आ शास्त्रक्कॆ वैयद्ध, उण्टागुवदिल्लवे ? शक्तनिगॆ शास्त्रदल्लि हेळि रुव रीत्या प्रायश्चित्तानुष्ठानवॆन्दू अशक्तनिगॆ प्रायश्चित्तरूप पुनः प्रपदनवॆन्दू हेळल्पट्टिरुवदक्कू कूड ई अभिप्रायवु विरोधवागुवुदिल्लवे ? इत्यादि आक्षेपगळ समाधानार्थवागि इन्नॆ रडु कारिकॆगळन्ननुग्रहिसिरुत्तारॆ. ई ऎरडु श्लोकगळल्लि मॊदलनॆय श्लोकदिन्द दृष्टान्तवन्नु हेळि, ऎरडनॆय श्लोकदिन्द दाष्टान्तिक वन्नु पपादिसुत्तारॆ. आदुदरिन्द ऎरडु श्लोकगळिन्दलू ऒन्दे अन्वयवु 3 पूर्त्व किवा - मॊदलिन ब्रह्मकल्पदल्लेयागलि, परर्स्म कवा - अदर ईचिन ब्रह्मकल्पदल्लियागलि, निश्चिण्णचेतसां - संसारॆ ऎन्दु इट्टु कॊळ्ळबेकु, संसारदल्लि जहासॆ हुट्टिरुव चेत नरुगळिगॆ निव तारतम्यपि - निवरिसि होगलु योग्यवाद पापगळ तरतम भावविद्दरू कूड ऎन्दरॆ हिन्दिन ब्रह्मकल्पदल्लि प्रप दन माडि कळॆदुकॊण्ड अपराधगळिगिन्तलू, अदरीचिन ब्रह्म कल्पदल्लि प्रतिदनॆ माडि कळॆदुकॊण्ड अपराधगळु बहु विशेषवागि द्दरू, प्रपत्तिः - प्रपदनवु, नविशिष्यते - एनॊन्दु विशेष मूलक व्यत्यस्तवागिरुवदिल्लवु. ऒब्ब चेतननु हिन्दिन कल्पदल्लि________________
श्री मद्र हस्यत्रयसारे एवमेव गुरूणां ना लघनां नाकमपिवाग सां सकृत्पत्ति रेवैका सद्यः प्रशम कारण म् ॥१९॥ प्रपदनानुष्ठान माडुत्तानॆ, इन्नॊब्बनु अदरीचिन कल्पदल्लि पप्र दनानुष्ठान माडुत्तानॆन्दु भाविसोण. ई ऎरडनॆय चेतननु सम्पादिसिकॊण्डिरुव पापगळु मॊदलनॆयवनिगिन्त सुमारु ऎरड 3 रष्टु पापगळिद्दरू इरबहुदु. हीगिद्दरू ऒन्दे प्रपदनवु एनॊन्दू तारतम्यविल्लदॆ इब्बर पापगळन्नू होगलाडिसि, हेगॆ मुक्तियन्नियितो, हागॆये गुरुलघु बुद्धि पूत्तराघगळ न्नॆल्ला ऒन्दे प्रायश्चित्त रूप प्रपदनवु होगलाडिसुत्तदॆ ऎम्ब दाष्टान्तिकवन्नु एवमेव ऎम्ब कारिकॆयिन्द तोरिसुत्तारॆ. एन मेव - हीगॆये, गुरूणाम् आग सांवा - महत्ताद पूरैकवाद आपराधगळिगू, लघनानु पि आगसां - अल्पवादॆ बुद्धिपूकवाद अपराधगळिगू कूड, सकृत पत्तिका - प्रायश्चित्तरूपदल्लि ऒन्दु सल मात्र अनुष्टिसुव प्रपत्तियॊन्दे सद्यः- प्रपत्तियन्ननुष्ठिसिद उत्तरक्षणदल्ले, ऒडनॆ ऎम्ब भाववु आद क्केनु काय बेकॆम्बुवदिल्लवॆम्ब भाववु, प्रशम कारण ं समस्त पापगळिगू निशेष विनाशहॊन्दलु कारणवु. आदुदरिन्द ई प्रायश्चित्त रूप शरणागतियन्नु ऒन्दु सल अनुष्ठिसुवदरिन्दले ऒडने समस्त बुद्धि पूत्तर पापगळॆल्ला गुरुवादवुगळेयागली लघुवादवुगळेयागलि निशेषवागि नाश हॊन्दुवदरल्लि सन्देहविल्ल वॆम्ब भाववु. हागादरॆ गुरुलघु पापगळिगॆ गुरुलघु प्राय श्चित्रगळन्नु विधिसुव शास्त्रगळिगॆ प्रयोजनवेनु ऎन्दरॆ, विश्वासवे मॊदलादवुगळु इल्लदिरुव अधिकारिगळ विषयदल्लि अन्तह गुरुल घ प्रायश्चित्तगळन्नु विधिसिरुव विषयवॆन्दु तिळियतक्कद्दु. ई प्राय श्चित्त रूपॆ प्रपॆयू कूड सकृ अनुष्ठिसतक्कद्दॆन्दु हेळिरु तारॆ. बुद्दि पूत्तराघगळिगागि अनुतापवू उपरमवू अव श्यकवु. हीगॆ अनुत प हुट्टि, मुन्दॆ इन्तह अपराधगळल्लि प्रवरिसुवदिल्लवॆन्दु निश्चयिसिकॊण्डु अदक्कागि प्रायश्चित्तानु न माडिदरॆ तदनन्तर पुनः बुद्धिवू राघव________________
अपराधपरिहाराधिकार उळदान वल् विनैक्कुळं वॆरुवियुलकळन्न । वळर् तामर् यि वन् शरणाग वरितवर् ताम् । प्रपन्ननिगॆ प्रपत्तिगॆ १६०२ सङ्घटिसलारदादुदरिन्द, इन्नॊन्दु सल प्रायश्चित्त कारणविरुवदिल्लवु. हागल्लदॆ पुनःपुनः बुद्दिपू राघगळन्नु माडि पुनः पुनः प्रायश्चित्त प्रपत्तिगळन्नु माडुवदु सरियल्लवु. इदरिन्द पुनः पुनः बुद्दिपूरैापराध माडुववनिगॆ अनूतावो परमगळु वास्तवादवल्लवॆन्दु एर्पडुवदरिन्द अन्तह प्रायश्चित्तगळु काकारियागलारवु. आदुदरिन्द श्री कूरेश रवरु “निरवधिसु कृतिष” मत्तु “यह्म कल्प” ऎम्बि श्लोकगळल्लि अनुशय उसरमगळिगॆ प्रामुख्यवन्नु कॊट्टिर तारॆ, प्रायश्चित्त प्रपत्तॆ नुष्ठानवाद ऒडनॆये अपराध प्रश मन उण्टागुवदरिन्द लघुदण्डनादिगळिन्द तप्पिसिकॊळ्ळुवदक्कागि प्रसन्ननु अन्तह बुद्धिवू राघ प्राप्तवाद ऒडनॆये अनु ता पा दिवूत्वकवागि प्रायश्चित्त प्रपतियन्नु माडिकॊळ्ळुवद उत्तमवु. सावकाश माडिदरॆ आयुर्वृद्धियॊन्दिगॆ लघुदण्डनॆ प्राप्तवागबहुदॆम्बभिप्रायवू कूड सद्यः प्रशमकारणम् ऎम्बु वदरिन्दुण्टागुत्तदॆ. आदुदरिन्द बेरॆ बेरॆ रोगगळिगॆ बेरॆ बेरॆ चिकित्सॆगळिद्दरू आयुददल्लि सत्वविध रोगगळन्नु निवारिसतक्कॆ ऒन्दे सिद्धषद इरुव हागॆ ई प्रायश्चित्तॆ प्रपदनवु सत्वविध बुद्धिपूापराधगळन्नु शमनमाडुत्तदॆ ऎम्ब भाववु. ऒन्दु पाशुर ई अधिकारदल्लि उपपादिसिदभिप्रायगळन्नु मूलक सङ्ग्रहिसि हेळुत्तारॆ :- उळदान - पू जन्मगळल्लि सञ्चितॆ वादुदागि ईग अनुभविसुत्तिरुव वल् विनैक्कु - प्रारब्दरूपवाद प्रबल पापॆगळिगॆ, उळ्ळव - मनस्सु, वॆरुवि - भयपट्टु, तवक वन्नु हॊन्दि, उलगळन्न - त्रिविक्रमनागि लोकगळन्नॆल्ला अळॆद पळॆ तामरैयि जैहॆ - प समृद्धि यिन्दभिरवन अद्दि ऎन्दिदॆ. तावरॆ पुष्पद हागॆ परम भोग्यवाद प्रियः पतिय चरण द्वन्द नन्नु, वन् शरणाग - दृढपायवागि, वरिवर् ताव - आश्र 3________________
१६०३ श्रीमद्र हस्यत्रयसारे कळ्ळ तानॆन वॆळु कन्मन् तुरप्प तुरडि(लुव) नुम इळ्ळॆ तानिलै शकवॆळ् पिररुट्टॆनॆळुमॆ २५॥ यिसिद प्रसन्नरु, ऎन्दरॆ प्रारबकदल्लि पापारम्भक पाप कू भयपट्टु तत्परिहारार्थवागियू आश्रयिसिद प्रपन्नरु, कळ्ळतानॆन - भगवद्भागवत कैङ्कररूपॆ ऒळ्ळॆ सस्यवृद्धिगॆ प्रतिबन्धकवाद अपाय रूपदल्लि, ऎळ्ळुन् - उत्पन्नवागुव, कन् - दुष्करगळन्नु तुरप्प - परिहरिसिकॊळ्ळुत्तारॆ. तुरन्निडलुम् - हीगॆ बुद्धि पू,राघक्कॆ प्रायश्चित्त माडिकॊळ्ळलागि, इदानि - बुद्दि दौर्बल्यदिन्दुण्टाद स्थितियु, शॆक – हॆगॆ नशिसिहोगबेको हागॆ, ऎळ् पिर्रा - नमगॆ परमोपकारनाद सत्येश्वरन, आरुळ् र्ते - कृपा प्रभाववॆम्ब मधुवु, जेनुतुप्पवु, ऎळुम - अभिवृद्धियन्नु हॊन्दुत्तदॆ. सश्वरन कृपा प्रभावदिन्द ई बुद्दिपूरा घ दिन्दुण्टागुव विषम फलवु नित्तरिसि होगि, भगवद्भागवत कैङ्का भिवृद्धियु प्राप्तवागुत्तदॆम्ब भाववु. तात्सर :- उळदानवल् निन्नॆ ऎम्बुवदरिन्द चेतननुभवि सुव प्रारब्धकवु हेळल्पट्टितु. इदु वल्विद्यॆ - ऎम्बुवदरिन्द तुम्बा प्रबलवादुदॆन्दु हेळल्पट्टिरुत्तदॆ. इदन्नु अनुभविसिय तीरबेकागिरुवदरिन्द हागॆ प्रयोगवु, उपासनादिगळिन्दलू कूड इदु होगतक्कद्दल्लवु ऎन्दु तिळिसुवदक्कागिये वल् ऎम्ब विशे षणवु. प्रारब्ध पापांशवु “उपायभक्तिः प्रारब्ध व्यतिरिक्ता घनाश नी” ऎन्दु हेळिरुव हागॆ भक्तु पायदिन्दलू कूड परि हारवागुवन्थाद्दल्लवु. आदुदरिन्दले ई प्रारब्ध पापांशक्कॆ मनस्सु भयपडुत्तॆदॆन्दु उळ्ळवॆरुवि ऎन्दु हेळिरुत्तारॆ. एकॆ भयवॆन्दरॆ प्रसत्य नन्तरवू कूड बुद्दिपूराघगळिगॆ कारण भूतवागुत्तदॆ. आदरॆ ई बुद्धि पूरो राघगळ नाशक्कागियू नावु मॊदले प्रसदनवन्नु अनुष्टिसलु साध्यविल्लवु. एकॆन्दरॆ * कृते पापनु तापॊनै” ऎन्दु मेलॆ हेळिरुव हागॆ निमित्तवु हुट्टदॆ नैमित्तिकक्कॆ कारणविल्लवु. आदरॆ ई बुद्धिवूत्तराघवु उण्टागद हागॆ माडिकॊळ्ळबहुदु, अदु हेगॆन्दरॆ, शरणागति________________
(३३) अपराधपरिहाराधिकारः ऎ इदू, १६०४ यन्नु अनुष्टिसुवागले ई पापारम्भकवाद प्रारब्ध पापांशवु नशिसिहोगुवदक्कागियू ऎन्दु अनुष्ठिसबहुदु. हागॆ शरणागति यन्ननुष्टिसिदवरु तावु, ऎन्दु “उलगळन्न वळर् तामरॆयि र्व शरण ग वरित्तवु ताम ऎम्बुवदरिन्द तिळिसुत्तारॆ. सश्वेश्वरनाद तानु सत्वलोकक्कू शेषियू, नावुगळॆल्ला तनगॆ शेषभूतरू आदुदरिन्द नम्मल्लिरुव र्नितुक कृपॆयिन्द तन्न चरण द्वन्द्ववु समस्तरिगू मुख्य शरणवॆन्दू तानु सत्वलोक शरण्यनॆन्दू, त्रिविक्रमावतारियु तोर्पडिसिरुत्तानॆ. प्रारब्धकर पापांशवु इन्नु यव उपाय उपायगळिन्दलू निवर वल्लवु, त्रिविक्रमावतारियाद श्रियःपति यल्लदॆ इन्नारन्नाश्रयिसिदरू निवर वल्लवु ऎम्ब ऎरडु अभि प्रायगळु इदरिन्द तोरिबरुत्तवॆ. वळ् तामयि ऎम्ब विशेषणदिन्द सद्वेश्वरन चरणद्वन्ददल्लि परिपूर्ण समृद्धियू भोग्यतॆयू बोधिसल्पट्टितु. हीगॆ पापारम्भक पापांशवू कळॆय बेकॆन्दु प्रपदनानुष्ठान माडुववरु तमगॆ इन्नु मुन्दॆ बुद्धि पूल्वत्तराघवु उण्टागद हागॆ अनुग्रहिसबेकॆम्ब सल्प पूरैक वागि माडुवदरिन्द, कळ्ळदानॆन ऎळु कं तुरप्प - भगवद्भागवत कैङ्कय्यक्कॆ अपाय रूपवागि परिणमिसि विघातिय न्नुण्टुमाडुव बुद्धिपूराघव्यावुदू उण्टागद हागॆ माडिकॊळ्ळुवरु, इच्छॆ तानिशॆक, बुद्धि दौर्बल्यदिन्द पापाभि सन्धिरूपस्थितियु नाशवागुव हागॆ आगुत्तदॆ. अविवेकवु तॊलगि विवेक उण्टागि बद्धिपूरोत्तराघवु सम्भविसुवदे इल्लवु. इदक्कॆ कारणवेनॆन्दरॆ :-ऎ४ पिर्रा अरुळर्ते- नमगॆ पर मोपकारनाद शियःपतिय निर्हेतुक कृपॆयॆम्ब मधुवु, सकल अपायगळन्नु निवरिसि कैङ्कराभिवृद्धि रूप श्रेयस्सन्नुण्टुमाडु इदॆ. तेव ऎन्दु हेळिदुदरिन्द आयुदद सिद्धषधियु सकल व्याधिगळिगू हेगॆ भेषजवो, हागॆ श्रियःपतिय कृपॆयु सत्व विधापायगळिगॆ परिहारवॆम्ब भाववु. सत्येश्वरनु नमगॆ करण कळेबरगळन्नु कॊट्टु, शास्त्रदीपदिन्द अज्ञानान्धकारवन्नु होग लाडिसि, हागॆये शास्त्रपदेशिकरन्नु ऒदगिसिकॊट्टु, यावुदो________________
१६०५ श्रीमद्रहस्य त्रयसारे प्रारबैतर पूरै पाप मखिलं प्रामादिकं चोत्तरं! ऒन्दु यादृच्छिक क सुकृत व्याजदिन्द तन्न कृपाकटाक्षदिन्द जन्मकाल दल्लि क्षिसि, सात्विक सम्भाषणॆ सद्गुरु प्राप्तिगळन्नुण्टुमाडि, उपा यानुष्ठान माड वहागॆ माडि, हीगॆल्ला उपकार माडुवदरिन्द आतनन्नु पिर्रा ऎन्दु श्लाघिसिरुत्तारॆ. आदुदरिन्द अन्तह पर मोपकारकनल्लि तमगिरुव कृतज्ञताभक्ति विश्वासगळन्नु तोरिसुवद क्कागि ऎळ पिर्रा नम्म परमोपकारनॆन्दु प्रयोगिसिरुत्तारॆ. श्री सारदीपिका सार सङ्ग्रह व्याख्यातृगळु मात्र “इदा निलॆ”, ऎम्ब कॊनॆय वाक्यक्कॆ बेरॆ विधवागि अर्थमाडिरुत्तारॆ पापारम्भक पापनिवृत्तिगागि मॊदले प्रपदना नुष्ठान माडु वदरिन्द बुदि पूत्तराघवु उण्टागुवदे इल्लवॆन्दु हिन्दिन वाक्यगळिन्द तिळिसल्पट्टितु. हागॆ सल्लिसि प्रदनानुष्ठान माड दिद्दरॆ बुद्धि पूराघवु प्राप्तवागुत्तदॆ. अदक्कागि प्राय शित माडिकॊळ्ळदॆ कठिण प्रकृतियुळ्ळवनादरॆ आग इ दानिलॆ, युण्टागुत्तदॆ, ऎन्दरॆ बुद्धि दौर्बल्यदिन्द अविवेक मूलक बुद्दि वॊक्रो राघ उण्टागुत्तॆदॆ. इदक्कागि प्रायश्चित्त रूप शरणागति यन्न नुट्टिसबेकु. हागॆ अनुष्ठिसदिद्दरू अगलू सत्येश्वरन कृपॆ यॆम्ब र्ते मधुवे नम्मन्नु कायुत्तदॆ. ई इळॆदा निखॆयु, शॆक - नाशवागोण हेगो हागॆ, नम्म महोपकारकन कृपॆये वृद्धि हॊन्दुत्तदॆ ऎन्दरॆ, आगलू कूड ई प्रपन्ननु नष्टनागि होगुवुदिल्लवु, अल्प दण्डनॆय मूलक आ अपराधगळु नष्टवागुव हागॆ माडि, कॊनॆगू आतन कृपॆये रक्षिसिबिडुत्तदॆ ऎन्दु व्याख्यान माडिरुत्तारॆ. अवतारिकॆ. ई अधिकारदल्लि हेळल्पट्ट मुख्याभिप्रायगळ न्नॆल्ला सङ्ग्रहिसि ऒन्दु संस्कृत श्लोकद मूलक हेळुत्तारॆ :- विशदीकरिसि अर्थ-नः - भगवत् पया भरन्यासवन्न मुष्ठिसि प्रपन्नराद नम्म, अखिलं-समस्तवाद प्रारम्तर पूत्वपापं-प्रारब्धनॆन्दरॆ ई देहदिन्द अनुभविसबेकागिरुव पुण्यपापगळु, अवुगळल्लद इतर________________
अपराध परिहाराधिकार न्यासेन कषय ननभ्युपगत प्रारब्ध खण्डञ्चनः । धी पूरॊत्तर पात्मना मजनना ज्ञातेपि तन्निष्टतेः। कौटिल्यसति शिक्षयानघर्य क्रोडिकरोति प्रभुः ॥४१ १६०६ पूरैपापगळु, इवुगळिगॆ सञ्चित पुण्यपापगळॆन्दु हॆसरु, इल्लि पापश बवुपुण्यक्कू कूड उपलक्षणवु; पूपापगळॆन्दरॆ, भरन्यासानुष्ठा नक्कॆ मॊदलु सम्भविसिद पापगळु, प्रामादिकञ्चोत्तरं – भर न्यासानुष्ठानानन्तर अबुद्धि पूरैकवागि सम्भविसिद पापगळू, चकार दिन्द देशकालादि कारणगळिन्द तनगभिप्रायविल्लदिद्दरू बुद्दिपूरैक वागि प्राप्तवागुव पापगळु हेळल्पट्टवु, अनभ्युपगत प्रारब्द खण्डञ्च - प्रारब्दवु ऎरडु विदवु, अभ्युपगत अनभ्युपगतवॆम्ब दागि, अभ्यपगत प्रारब्धवु ई देहदल्ले अनुभविसि कळियतक्कद्दु, अनभ्यपगत प्रारब्धवु मुन्दिन देहदिन्द कळॆयतक्कद्दु, इन्तह अन भसगत प्रारब्ब भागवू कूड इवॆल्लवन्नू, न्यासेन - भरन्यास दिन्द, क्षपर्य - होगलाडिसिदवनागि, धीपूतर पाष्म नाम् अजननात्- अन्तह प्रपन्ननु विवेकियागि शास्त्रज्ञानवन्नु हॊन्दिदवनागिद्दरॆ बुद्धि पूरैकवाद उत्तराघवु अन्तवनिगॆ उण्टाग दे इरुवदरिन्दलू, जातेसि तन्निष्टते-ऒन्दु वेळॆ बुद्धिपू तराघवु अविवेकदिन्दुण्टादरू, अनुताप उपरमगळु उण्टागि प्रायश्चित्त रूप शरणागतियन्ननुष्ठिसुवदरिन्दलू, कौटिल्यसति - ऒन्दु वेळॆ कठिन प्रकृतियागि प्रायश्चित्त माडिकॊळ्ळदिद्दरू, शिक्ष यापि . आयुर्वृ, अल्प दण्डनॆ मुन्तादवुगळिन्दलागलि, अन घर्य - आतन अपराधगळन्नॆल्ला परिहरिसि, प्रभुः - सशक्त नागि, स्वतन्त्रनागि, नमगॆ स्वामियागिरुव प्रियःपतियु, क्रोडी कॆरोति - स्वीकरिसुत्तानॆ. ऎन्दरॆ शरणागतिगॆ कट्टुबिद्दु देहाव सानदल्लि मोक्ष प्राप्तियन्नण्टु माडुवनु ऎम्ब तात्सरवु. ताक्षर- प्रपन्ननादवनु शरणागतियन्ननुष्ठिसिदुदरिन्द आत निगॆ ई देहावसानदॊळगॆ सत्व पापगळु नष्टवागि होगि आतनन्नु सश्वेश्वरनु अनघर्य’ परिशुद्धनन्नागि माडि स्वस्वरूपाविराव वन्नुण्टु माडि, मोक्षवन्नु कॊट्टु क्रोडीकरोति स्वीकरिसुवनु________________
६०७ श्रीमद हस्यत्रयसारे ऎन्दु हेळुत्तारॆ. “ पुण्य पापे निधय निरञ्जनः परमं साम्य मुपैति” ऎम्ब श्रुत्यर्थवे इल्लि उपदेशिसल्पट्टिरुत्तदॆ. हागॆ ई श्रुतियू इन्नु बेरॆ कडॆयल्ल “ एवं हास- स पास्नानः प्रदूयन्तॆ” (छां ५. १४३) ऎन्दू, एवमेवं विदिपापं कर नष्यते” - (छां. ४.१४ ३) प्रपन्ननिगॆ समस्त कगळू सुट्टु होगुत्तवॆन्दू, आतनिगॆ पापकगळ लेपविल्ल वॆन्दू हेळुत्तदॆ. आ पापगळॆल्ला नष्टवागुव प्रकारवन्नु ई श्लोकमूलक बोधिसुत्तारॆ. १. प्रारबैतर पूरैपाप मखिलं - समस्त पाप गळन्नू पूराघवॆन्दू उत्तॆराघवॆन्दू विभागिसबहुदु. ईत रु प्रप दनानुष्ठानक्कॆ हिन्दॆ माडिदुदॆल्ला पूराघवॆन्दू अनन्तरविरुव उत्तराघवॆन्दॆनिसुत्तवॆ. प्रारबेतर पूर पापवॆन्दु यावाग हेळल्पट्टितो, आग प्रारब्धवू भू राघदल्ले सेरितु. प्रारब्धवल्लद इतर पूराघक्कॆ सञ्चितवॆन्दु हॆसरु. प्रबल कान्तरवाद प्रारब्धद प्रतिबन्धकदिन्द आ सञ्चितवु इन्नू फलो न्मुखवागिल्लवु फलोन्मुखवादुदे ई देहदल्लि अनुभविसतक्क द्दागि प्रारब्धवॆनिसुत्तदॆ. आदुदरिन्द प्रारबेतर पू पाप मखिलम् ऎम्बुवदरिन्द समस्त सञ्चित पापगळू हेळल्पट्टु प्रसनु ननुष्टिसिद शरणागतियिन्द अवॆल्लवू तॊलगुत्तदॆ ऎम्ब भाववु २. इन्नु यावुवु नाशवागुत्तवॆ ? ऎन्दरॆ अनन्नु पग प्रारब्धखण्डचनः, प्रारब्र करवन्ने नो ई प्रपन्न नु अनुभवि सिय तीरबेकु. आदरॆ ईतननुभविसतक्कद्दु आ प्रारब्धद ऒन्दु खण्डवु, ऒन्दु भागवु, प्रारब्ध पापवु ऎरडु विधवु ; () अभ्युस गत (२) अनभ्युपगतवॆम्बदागि, अभ्युपगळ परव ई जन्मदल्ले अनुभविसतक्कद्दु. अनय्यपगत भागवु देहान्तरदिन्द अनुभविस तक्षर, ई शरणागतियिन्द ई अनय्यहॆगळ प्रारब भागवू नशिसि होगुत्तदॆ. ३. इन्नु याववु नष्टवागुत्तवॆ : उत्तरा घदल्लि यावुद नष्ट वागुत्तवॆ ? ऎन्दरॆ प्रामादिकं जोरं, प्रपचनोत्तर पालदल्लि अबुदि पूरैकागि माडुव पापगळू नष्टवागुत्तवॆ.________________
अपराधपरिहाराधिकार १६०८ हीगॆ ई मूरु विध पापगळु नष्टवागुत्तदॆन्दु (१) “तदधिगवु उत्तरवू राघयो रश्लेष विनाश, तन्न पदेशात्” ऎम्ब ब्रह्मसूत्रदल्लि पूराघगळ विनाशवू उत्तराघगळ निर्लॆ पवू हेळ ल्पट्टिरुत्तदॆ. इल्लि उत्तराघवॆन्दु हेळिदुदु बुद्धि पूरो राघ गळु विना मिक्क इतर उत्तराघगळु ऎन्दु भाविसतक्कद्दु. कॆलवु उत्तराघगळु बुद्धि पूरैकवागि इद्दरू देशकाल प्रमाददिन्द उण्टागबह.दु. हेगॆन्दरॆ मार हेगॆन्दरॆ मार ऒडॆयुव स्थळदल्लि निन्तिरुव प्रपन्ननन्नु कळ्ळरु बन्दु मदुवॆ दिब्बणदवरु याव मात्रदल्लि होदरु सरियागि हेळु ऎन्दु बॆदरिसिदरू, निश्चय हेळिदरॆ दिब्बण दवरिगुण्टागुव दुस्थितियन्नु तप्पिसुवदे न्यायवादुदरिन्द, ई सन्दर्भदल्लि अनृत हेळुवदु,- स्त्रीषु नम्म विवाहेच वृत्य रै प्राणसङ्कटे ! गोब्राह्मणारे हिंसायां नानृतं स्वागुतम् ॥ (भाग) स्त्रीगळन्नु वशमाडिकॊळ्ळुवदरल्ल, परिहासदल्ल, विवाह नडॆसुवद रल्ल, वृत्ति कल्पिसिकॊळ्ळुवदरल्ल, प्राणसङ्कट उण्टादागलू गॊ ब्राह्मणहितवागियू, हिंसॆ तप्पिसुवदक्कागि हेळिद सुळ्ळु निन्दित वल्लवु ऎम्ब शास्तानुगुणवागि, अपराधवागुवदिल्लवु. यावुदो ऒन्दु कारणदिन्द ऒन्दु मरुकान्तारदल्लि सिक्किदुदरिन्द नित्य नैवि तिक कम्मगळिगॆ उण्टागुव लोपवू कूड बुद्धि पूरैकवादरू असॆ राधवागुवदिल्लवु. उषस्ति ऋषिगळु प्राणभयदिन्द आनॆय मावटिगॆ नन्नु याचिसि आतन उच्छिष्टवाद बॆन्द हुरुळियन्नु भुजिसिदुदू अधरवल्लवु. बुद्धि पूरैकवागि माडुव उत्तराघगळु मात्र आ प्रपदनदिन्द नष्टवागुवदिल्लवॆम्ब भाववु. ४. हागादरॆ ई बुद्धिपूराघगळु नष्टवागुव बगॆ हेगॆ ? ऎन्दरॆ प्रॆसॆन्ननु शास्तार तिळिदु प्रति द्धनादरॆ आग बुद्धि इरा घ उण्टागुवदे इल्लवु. मत्तु प्राज्ञनादरॆ बुद्दिपूतर घन उत्पन्नवागद हागॆ ई बदि पूत्र रामक्कॆ पलकरणवु इन्नॊन्दु विधवागि माडिकॊळ्ळबहुदु. () शारीरक सूत्र.________________
१६०९ श्रीमद्रहस्यत्रय सारे प्रारब्धकद पापारम्भक पापांशव. इदु निवरिसुव हागॆयू ससि प्रदनानुष्ठान माडिदरॆ ई बुद्धित्तराघव का गुवदे इल्लवु. ऒन्दु वेळॆ प्रतिबद्धनल्लदॆ, हागॆ सल्पिसदॆ प्रप दन माडिदुदरिन्द बुद्धिपूराघव उण्टागबहुदु. शमन हॊन्दुव रीति हेगॆन्दरॆ हेळुत्तारॆ :-जातेपि तन्निष्ट अदु प्राप्तवादरू, पश्चात्ताप उण्टागि, मुन्दक्कॆ अन्तह आवॆ राधक्कॆ गुरियागुवदिल्लवॆम्ब उपॆरमदिन्द सेरिद प्रायश्चित्त रूप पुनः प्रपदनदिन्द अदू कूड परिहारवागुत्तदॆ. कौटिल्य सति, ऒन्दु वेळॆ मन्दबुद्धियुळ्ळवनादुदरिन्द, कठिणस्वभाव उळ्ळवनादुदरिन्दलो, प्रायश्चित्तदल्लि प्रवृत्तियुण्टागदिद्दरॆ, शिक्षयाज्य नघर्य, “इदैनै षां केचिदु पप्प वा भवन्ति ऎन्दु हेळिरुव हागॆ लघदण्डनॆयिन्द स्वल्प केशपडिसि, हीगॆ ऎल्ला पापगळिन्दलू बिडिसि, अनघर्य, परिशुद्धनन्नागि माडि सत्येश्वरनु देहावसानदल्लि मोक्षवन्नित्तु कापाडुवनु. मेलॆ प्रारब्ब कर मात्र अनुभविसलेबेकॆन्दु हेळल्पट्टितु इदु दृस्त प्रपन्ननन्नु कुरितु हेळिदुदु, आर्तनिगादरो, विक्क प्रारभांशवू कूड ऒडनॆ नाशवागि दॆ-हावसान उण्टागि मोक्ष प्राप्तियुण्टागुत्तदॆ. 66 ई श्लोकदल्लि उपयोगिसिरुव पापशब्दवु पुण्यक्कू कूड अन्वयिसुत्तदॆ. पापगळु हेगॆ मोक्षप्रति बन्धकगळो हागॆये पुण्यगळू कूड प्रतिबन्धकगळु, फलाकाङ्क्षॆयिन्द माडिद पुण्य गळु स्वर्गादि भोगगळन्नु कॊडुवुवु. पुण्यवु क्षीणवाद ऒड नॆये “तेतु भुक्ता स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्य मलोकं विशस्ति” (गि, ९ २१) ऎन्दू, “स्वर्गपि पात भीतस्य क्षयिर्नास्ति नितिः” ऎन्दु हेळिरुवदरिन्द भूलोकक्कॆ हिन्तिरुगि बरबेकादुदरिन्दलू, स्वरदल्लि कूड ई भोगवु कळॆद. लॆकक्कॆ ऎन्दु बीळुवॆवो ऎम्ब भय विरुददरिन्दलू, पुण्यवू पापक्कॆ समानवादुदे ; “ आ ब्रह्म भुवनालोकाः पुनराव नोर्जुन” (२, ८, १६) दिव्य वैकुण्ठवल्लदॆ इतर लोक प्राप्तिगॆल्ला पुनरावरियिरुवदरिन्द पाप________________
अपराधपरिहाराधिकार १६१० - तुल्यवादुदॆम्ब भाववु. इदरिन्द दानधरादिगळू वासी कूप तटाक निल्दाणगळू, विद्याशालॆ औषधशालॆ मुन्तादवुगळन्नु एर्पडि सोणवू, मत्तु इतर प्रजासुखाभिवृद्धियन्नुण्टुमाडुव धर कॆलसगळू इवॆल्लवू इदरिन्द त्याज्यवॆन्दु भाविसकूडदु. इवु गळन्नु मुख्यवागि माड तक्कद्दु. ऒब्ब बालकनु कॆरॆयल्लि बॆदु ऒद्दाडुत्तिद्दरॆ आतनन्नु मेलक्कॆ ऎत्तिदरॆ पुण्यकरवागि परिणमिसि मोक्षप्रतिबन्धकवागुत्तॆन्दु बिडकूडदु. बिट्टरॆने प्रत्यवाय 66835 इन्तह सन्दर्भगळल्लि “ करवाधिकारस्ते माफिलेव कदाचन” ऎम्ब गीताचारद उवदेशवनु सन्धेयवु. तन्न सुखक्कॆ मात्रवे कष्ट पडुवदु अधमपक्षवु, तन्न सुखदॊन्दिगॆ इतररिगॆ सुखवन्नुण्टुमाडुवदु मध्यम पक्षवु. “स्व सुखदॊळासॆय तॊरॆदु इतररिगॆ सुखवन्नुण्टुमाडुवदु उत्तम पक्षवु. इन्तह पुण्यकरगळु मोक्षप्रतिबन्धकवल्लदिरुवदक्कागि फलाकाङ्क्षॆयिल्लदॆ भगवत्यर्थवागि नडॆसि त्यागवन्नु श्रीकृष्णार्पणमस्तु ऎन्दु हेळतक्कद्दु. सश्वरनु हीगॆ प्रपन्न नल्लिरुव परम वात्सल्यदिन्द आतन सत्व पुण्य पापॆगळन्नॆल्ला तॊलगिसि परिशुद्धनन्नागि माडि तन्न दिव्य वैकुण्ठदल्लिरुवदक्कॆ योग्यतॆयन्नु :ट माडि, आतनु माडुव कैर वन्नु स्वीकरिसुत्तानॆम्बुवदु ई श्लोक तात्सरवु. 203) श्रीमद्रहस्ययसारद हदिनॆण्टनॆय अधिकारवाद अपराध परिहाराधिकारक्कॆ तिरुनारायणपुरं विजयराघव शरन आच र हृदयाषिणी ऎम्ब कन्नड अर्थ तात्सरगळु समाप्तवादुवु. श्रीमते श्रीनिवास महादेशिकाय नमः________________
पुट १९४५ शुद्धाशुद्ध पत्रिकॆ अशुद्ध अहित या श्रेष्ठांशवु देदव EL देवतॆ १६५० इतरॆनिगॆ इतॆरनिगॆ १३३ मेदॆनु? अतिशया धान अतिशयाधानं १५५ Cate अतिशय्य इदरर्थवु अतिशय इदरर्थवु. 99 ११३६० १६६२ 77 77 १९६३ १३६८ ఆ C 02 ऎन्द शश्वरन युत्ताल् ०दर्भदल्लि सवस्त ई वदक्कॆ भक्त षु अभ्यधिका आराध ऎन्दु सत्येश्वरन सन्दर्भदल्लि समस्त ई पदक्कॆ अभ्यधिका आराध्य १३८१ शेषभूतन शेषभूतने ; १३८४ 2 व्याख्याताक्कळाद व्याख्याताक्कळान क्रमं क्रयं शोरिटु शोरिट्टु 97 १३८९ no तिरुक्कोटि य आक्षेपिसल तिरुक्कोट्टि यू आक्षेपिसलु पिर्तृ १३९६ وو भर्त कर्मक भर्त कर्मक्कॆ 92 39 यागुत्तॆदॆ. यागुत्तदॆ ; CE तिळिसुत्तारॆ तिळिसुत्तारॆ. १४०० 92 श्रीराम गॆ श्रीरामनिगॆ________________
و पुट १४०२ १९४०३ पु अशुद्ध शेषित इच्छिसिद्दरू १४०५ कॊनॆय प ईश्वर मतात्वनु १४१४ १४१६ Co १४२० १४२३ १८ १४२४ & 19 १४२५ १४२६ 99 १४२७ १४२८ १४३६ १४४३ २१ कॊनॆय पवि १७ १९ भुज स्पषणीय नॆडमारुडिमै ऎम्ब पार्थ परित्याग-आ सचय दुदरिन्द माडि हानियु विन्नदि हॊन्दुवरु शास्त्रदिरपेक्ष आत्मनल्लि धुव शनस्सत्व शुद्ध शेषित्व इच्छॆ सिद्द र्त ईश्वरनु इत्यादि स्पृहणीय नॆडमारडिमै ऎम्ब अपार्थ परित्यागे सञ्चित आदुदरिन्द माडदॆ हानियु. हॊन्दुवरु. शास्त्रनिरपेक्ष इरुनाळ् आतनल्लि १४३३ कॊनॆय प इरुन्ताळ् १८४५ कॊनॆय प 0930 と と १६५१ (४५४ १४९० युषाकं शास्त्रिय द्रोह आज्ञानान्धकार प्रमाणवु मनामसा र १४७९ 02 १९ C950 २१ प्रभव 2 वैगुण लोपवू ध्रुव श्चन स्स युष्माकं शास्त्रीय द्रोह अज्ञानान्धकार प्रमाणवु. म नानु सार प्रभाव वैगुण लोपवू. CH F S भारा १९ सीडितरागि भार पीडिकरागि श्रीरामर________________
पुट 99 7925 Location….. 2 अशुद्ध शरणं न कक्षकळु ……….. 2 शुद्ध शरणं हि व रक्षकळु. शरीरारम्भक शरीराम्भक १५४७ २३ १५४९ له अनष्ठानक्कॆ विरुद्धवादुदु अनुष्ठानक्कॆ विरुद्धवादुदु. १५-३ Da अङ्गीकरिसिर अङ्गिकरिसिरु CHES २१ बिदु 39 इन्तह 2 असाध्यवु गरुत्मन्तनु, बिद्दु इन्तह असाध्यवु. १५६४ नागुवनु नागुवनु. उदल्लि दल्लि 66 पपादिसिरुत्तारॆ. उपपादिसिरुत्तारॆ. १५७१ कॊनॆयप उपायनष्ठान उपायानुष्ठान உறு हॊन्दिददल्लवु हॊन्दिदुदल्लवु. 09122 इरत्तदॆ, इरुत्तदॆ. १५८३ २३ भागव भागवत १५८४ क्षा पणॆयन्नॆ क्षापणॆयन्ने १५८६ कॊनॆयप, भागवतनानदन भागवतनादनो १४ धुधन दु रोधन १५९४ १८ शिक्षॆयू शिक्षॆयू, १४ पूरैकवागि पूरैकवागि 66 प समृद्धियिन्द भि । परम समृद्धियिन्द अभि रवव आद्धि न्दिद वृद्धि हॊन्दिद ACADEMY OF SANSKRIT RESEARCH MELKOTE LIBRARY Acc. No 21903 Date 17001-98________________
C என் 2. e. नम्मल्लि दॊरॆयुव ग्रन्थगळु आचार हृदया न्वेषिणी ऎम्ब कन्नड प्रतिपदार्थ तात्सरगळॊडनॆ श्रीनिग मान्न महादेशिकरवर अभीतिस्तववॆम्ब श्री रङ्गनाथस्तोत्रवु श्री स्तुति ऎम्ब श्री रङ्गनायकी स्तोत्रवु श्रीमद्र हस्यश्रयसारद (१) गुरुपरम्परा सारवु (२) उपोद्घाताधिकारवू सारनिष्कर्षाधि कारवू (३) प्रधान प्रतितन्त्राधिकारवू अर्थ पञ्च काधिकारवू (४) तत्व त्रयाधिकारवु (५) पर देवता पारमाराधिकारवू मुमुक्षुत्वाधिकारवू, (६) अधिकारिविभागाधिकारवू उपायविभागाधि कारवू प्रपत्तियोग्याधिकारवू (७) .परिकरविभागाधिकारवू साजि प्रपदनाधिकारवू (८) कृतकृत्याधिकारवू, स्वनिष्ठाभिज्ञानाधिकारवू उत्तर कृत्याधिकारवू GU O 009 0600 (९) पुरुषार काष्टाधिकारवू, शास्त्रिय निय वनाधिकारवू, अपराध परिहार धिकारवू १ श्री यामुनेयरवर चतुश्लोकी ० १२० ० १०० O 3 O ऎल्ला पुस्तकगळन्नू ट्टिगॆ तॆगॆदुकॊळ्ळुववरिगॆ पुस्तक ऒन्दक्कॆ ऒन्दाणॆ डिस्काट कॊडल्पडुत्तदॆ. सि. यं. विजयराघवाचार्, विद्याभ्यासद इलाखा रिटैर्ड् सर्कल् र्इ स्पॆक्टर्, बसवनगुडि, बॆङ्गळूरु सिटि.