०३

[तीसरा अध्याय]

विषय

भगवान् का आविर्भाव तथा योगमायाद्वारा कंसकी वंचना

मूलम् (वचनम्)

श्रीपराशर उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

एवं संस्तूयमाना सा देवैर्देवमधारयत्।
गर्भेण पुण्डरीकाक्षं जगतस्त्राणकारणम्॥ १॥

मूलम्

एवं संस्तूयमाना सा देवैर्देवमधारयत्।
गर्भेण पुण्डरीकाक्षं जगतस्त्राणकारणम्॥ १॥

अनुवाद (हिन्दी)

श्रीपराशरजी बोले—हे मैत्रेय! देवताओंसे इस प्रकार स्तुति की जाती हुई देवकीजीने संसारकी रक्षाके कारण भगवान् पुण्डरीकाक्षको गर्भमें धारण किया॥ १॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ततोऽखिलजगत्पद्मबोधायाच्युतभानुना।
देवकीपूर्वसन्ध्यायामाविर्भूतं महात्मना॥ २॥

मूलम्

ततोऽखिलजगत्पद्मबोधायाच्युतभानुना।
देवकीपूर्वसन्ध्यायामाविर्भूतं महात्मना॥ २॥

अनुवाद (हिन्दी)

तदनन्तर सम्पूर्ण संसाररूप कमलको विकसित करनेके लिये देवकीरूप पूर्व सन्ध्यामें महात्मा अच्युतरूप सूर्यदेवका आविर्भाव हुआ॥ २॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तज्जन्मदिनमत्यर्थमाह्लाद्यमलदिङ्मुखम्।
बभूव सर्वलोकस्य कौमुदी शशिनो यथा॥ ३॥

मूलम्

तज्जन्मदिनमत्यर्थमाह्लाद्यमलदिङ्मुखम्।
बभूव सर्वलोकस्य कौमुदी शशिनो यथा॥ ३॥

अनुवाद (हिन्दी)

चन्द्रमाकी चाँदनीके समान भगवान् का जन्म-दिन सम्पूर्ण जगत‍्को आह्लादित करनेवाला हुआ और उस दिन सभी दिशाएँ अत्यन्त निर्मल हो गयीं॥ ३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

सन्तस्सन्तोषमधिकं प्रशमं चण्डमारुताः।
प्रसादं निम्नगा याता जायमाने जनार्दने॥ ४॥

मूलम्

सन्तस्सन्तोषमधिकं प्रशमं चण्डमारुताः।
प्रसादं निम्नगा याता जायमाने जनार्दने॥ ४॥

अनुवाद (हिन्दी)

श्रीजनार्दनके जन्म लेनेपर सन्तजनोंको परम सन्तोष हुआ, प्रचण्ड वायु शान्त हो गया तथा नदियाँ अत्यन्त स्वच्छ हो गयीं॥ ४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

सिन्धवो निजशब्देन वाद्यं चक्रुर्मनोहरम्।
जगुर्गन्धर्वपतयो ननृतुश्चाप्सरोगणाः॥ ५॥

मूलम्

सिन्धवो निजशब्देन वाद्यं चक्रुर्मनोहरम्।
जगुर्गन्धर्वपतयो ननृतुश्चाप्सरोगणाः॥ ५॥

अनुवाद (हिन्दी)

समुद्रगण अपने घोषसे मनोहर बाजे बजाने लगे, गन्धर्वराज गान करने लगे और अप्सराएँ नाचने लगीं॥ ५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ससृजुः पुष्पवर्षाणि देवा भुव्यन्तरिक्षगाः।
जज्वलुश्चाग्नयश्शान्ता जायमाने जनार्दने॥ ६॥

मूलम्

ससृजुः पुष्पवर्षाणि देवा भुव्यन्तरिक्षगाः।
जज्वलुश्चाग्नयश्शान्ता जायमाने जनार्दने॥ ६॥

अनुवाद (हिन्दी)

श्रीजनार्दनके प्रकट होनेपर आकाशगामी देवगण पृथिवीपर पुष्प बरसाने लगे तथा शान्त हुए यज्ञाग्नि फिर प्रज्वलित हो गये॥ ६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

मन्दं जगर्जुर्जलदाः पुष्पवृष्टिमुचो द्विज।
अर्द्धरात्रेऽखिलाधारे जायमाने जनार्दने॥ ७॥

मूलम्

मन्दं जगर्जुर्जलदाः पुष्पवृष्टिमुचो द्विज।
अर्द्धरात्रेऽखिलाधारे जायमाने जनार्दने॥ ७॥

अनुवाद (हिन्दी)

हे द्विज! अर्द्धरात्रिके समय सर्वाधार भगवान् जनार्दनके आविर्भूत होनेपर पुष्पवर्षा करते हुए मेघगण मन्द-मन्द गर्जना करने लगे॥ ७॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

फुल्लेन्दीवरपत्राभं चतुर्बाहुमुदीक्ष्य तम्।
श्रीवत्सवक्षसं जातं तुष्टावानकदुन्दुभिः॥ ८॥

मूलम्

फुल्लेन्दीवरपत्राभं चतुर्बाहुमुदीक्ष्य तम्।
श्रीवत्सवक्षसं जातं तुष्टावानकदुन्दुभिः॥ ८॥

अनुवाद (हिन्दी)

उन्हें खिले हुए कमलदलकी-सी आभावाले, चतुर्भुज और वक्षःस्थलमें श्रीवत्स-चिह्नसहित उत्पन्न हुए देख आनकदुन्दुभि वसुदेवजी स्तुति करने लगे॥ ८॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अभिष्टूय च तंवाग्भिः प्रसन्नाभिर्महामतिः।
विज्ञापयामास तदा कंसाद्भीतो द्विजोत्तम॥ ९॥

मूलम्

अभिष्टूय च तंवाग्भिः प्रसन्नाभिर्महामतिः।
विज्ञापयामास तदा कंसाद्भीतो द्विजोत्तम॥ ९॥

अनुवाद (हिन्दी)

हे द्विजोत्तम! महामति वसुदेवजीने प्रसादयुक्त वचनोंसे भगवान् की स्तुति कर कंससे भयभीत रहनेके कारण इस प्रकार निवेदन किया॥ ९॥

मूलम् (वचनम्)

वसुदेव उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

जातोऽसि देवदेवेश शङ्खचक्रगदाधरम्।
दिव्यरूपमिदं देव प्रसादेनोपसंहर॥ १०॥

मूलम्

जातोऽसि देवदेवेश शङ्खचक्रगदाधरम्।
दिव्यरूपमिदं देव प्रसादेनोपसंहर॥ १०॥

अनुवाद (हिन्दी)

वसुदेवजी बोले—हे देवदेवेश्वर! यद्यपि आप [साक्षात् परमेश्वर] प्रकट हुए हैं, तथापि हे देव! मुझपर कृपा करके अब अपने इस शंख-चक्र-गदाधारी दिव्य रूपका उपसंहार कीजिये॥ १०॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अद्यैव देव कंसोऽयं कुरुते मम घातनम्।
अवतीर्ण इति ज्ञात्वा त्वमस्मिन्मम मन्दिरे॥ ११॥

मूलम्

अद्यैव देव कंसोऽयं कुरुते मम घातनम्।
अवतीर्ण इति ज्ञात्वा त्वमस्मिन्मम मन्दिरे॥ ११॥

अनुवाद (हिन्दी)

हे देव! यह पता लगते ही कि आप मेरे इस गृहमें अवतीर्ण हुए हैं, कंस इसी समय मेरा सर्वनाश कर देगा॥ ११॥

मूलम् (वचनम्)

देवक्युवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

योऽनन्तरूपोऽखिलविश्वरूपो
गर्भेऽपि लोकान्वपुषा बिभर्त्ति।
प्रसीदतामेष स देवदेवो
यो माययाविष्कृतबालरूपः॥ १२॥

मूलम्

योऽनन्तरूपोऽखिलविश्वरूपो
गर्भेऽपि लोकान्वपुषा बिभर्त्ति।
प्रसीदतामेष स देवदेवो
यो माययाविष्कृतबालरूपः॥ १२॥

अनुवाद (हिन्दी)

देवकीजी बोलीं—जो अनन्तरूप और अखिल-विश्वस्वरूप हैं, जो गर्भमें स्थित होकर भी अपने शरीरसे सम्पूर्ण लोकोंको धारण करते हैं तथा जिन्होंने अपनी मायासे ही बालरूप धारण किया है वे देवदेव हमपर प्रसन्न हों॥ १२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

उपसंहर सर्वात्मन् रूपमेतच्चतुर्भुजम्।
जानातु मावतारं ते कंसोऽयं दितिजन्मजः॥ १३॥

मूलम्

उपसंहर सर्वात्मन् रूपमेतच्चतुर्भुजम्।
जानातु मावतारं ते कंसोऽयं दितिजन्मजः॥ १३॥

अनुवाद (हिन्दी)

हे सर्वात्मन्! आप अपने इस चतुर्भुज रूपका उपसंहार कीजिये। भगवन्! यह राक्षसके अंशसे उत्पन्न* कंस आपके इस अवतारका वृत्तान्त न जानने पावे॥ १३॥

पादटिप्पनी
  • द्रुमिल नामक राक्षसने राजा उग्रसेनका रूप धारण कर उनकी पत्नीसे संसर्ग किया था। उसीसे कंसका जन्म हुआ। यह कथा हरिवंशमें आयी है।
मूलम् (वचनम्)

श्रीभगवानुवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

स्तुतोऽहं यत्त्वया पूर्वं पुत्रार्थिन्या तदद्य ते।
सफलं देवि सञ्जातं जातोऽहं यत्तवोदरात्॥ १४॥

मूलम्

स्तुतोऽहं यत्त्वया पूर्वं पुत्रार्थिन्या तदद्य ते।
सफलं देवि सञ्जातं जातोऽहं यत्तवोदरात्॥ १४॥

अनुवाद (हिन्दी)

श्रीभगवान् बोले—हे देवि! पूर्वजन्ममें तूने जो पुत्रकी कामनासे मुझसे [पुत्ररूपसे उत्पन्न होनेके लिये] प्रार्थना की थी। आज मैंने तेरे गर्भसे जन्म लिया है—इससे तेरी वह कामना पूर्ण हो गयी॥ १४॥

मूलम् (वचनम्)

श्रीपराशर उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

इत्युक्त्वा भगवांस्तूष्णीं बभूव मुनिसत्तम।
वसुदेवोऽपि तं रात्रावादाय प्रययौ बहिः॥ १५॥

मूलम्

इत्युक्त्वा भगवांस्तूष्णीं बभूव मुनिसत्तम।
वसुदेवोऽपि तं रात्रावादाय प्रययौ बहिः॥ १५॥

अनुवाद (हिन्दी)

श्रीपराशरजी बोले—हे मुनिश्रेष्ठ! ऐसा कहकर के भगवान् मौन हो गये तथा वसुदेवजी भी उन्हें उस रात्रिमें ही लेकर बाहर निकले॥ १५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

मोहिताश्चाभवंस्तत्र रक्षिणो योगनिद्रया।
मथुराद्वारपालाश्च व्रजत्यानकदुन्दुभौ॥ १६॥

मूलम्

मोहिताश्चाभवंस्तत्र रक्षिणो योगनिद्रया।
मथुराद्वारपालाश्च व्रजत्यानकदुन्दुभौ॥ १६॥

अनुवाद (हिन्दी)

वसुदेवजीके बाहर जाते समय कारागृहरक्षक और मथुराके द्वारपाल योगनिद्राके प्रभावसे अचेत हो गये॥ १६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

वर्षतां जलदानां च तोयमत्युल्बणं निशि।
संवृत्यानुययौ शेषः फणैरानकदुन्दुभिम्॥ १७॥

मूलम्

वर्षतां जलदानां च तोयमत्युल्बणं निशि।
संवृत्यानुययौ शेषः फणैरानकदुन्दुभिम्॥ १७॥

अनुवाद (हिन्दी)

उस रात्रिके समय वर्षा करते हुए मेघोंकी जलराशिको अपने फणोंसे रोककर श्रीशेषजी आनकदुन्दुभिके पीछे-पीछे चले॥ १७॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

यमुनां चातिगम्भीरां नानावर्त्तशताकुलाम्।
वसुदेवो वहन्विष्णुं जानुमात्रवहां ययौ॥ १८॥

मूलम्

यमुनां चातिगम्भीरां नानावर्त्तशताकुलाम्।
वसुदेवो वहन्विष्णुं जानुमात्रवहां ययौ॥ १८॥

अनुवाद (हिन्दी)

भगवान् विष्णुको ले जाते हुए वसुदेवजी नाना प्रकारके सैकड़ों भँवरोंसे भरी हुई अत्यन्त गम्भीर यमुनाजीको घुटनोंतक रखकर ही पार कर गये॥ १८॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

कंसस्य करदानाय तत्रैवाभ्यागतांस्तटे।
नन्दादीन् गोपवृद्धांश्च यमुनाया ददर्श सः॥ १९॥

मूलम्

कंसस्य करदानाय तत्रैवाभ्यागतांस्तटे।
नन्दादीन् गोपवृद्धांश्च यमुनाया ददर्श सः॥ १९॥

अनुवाद (हिन्दी)

उन्होंने वहाँ यमुनाजीके तटपर ही कंसको कर देनेके लिये आये हुए नन्द आदि वृद्ध गोपोंको भी देखा॥ १९॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तस्मिन्काले यशोदापि मोहिता योगनिद्रया।
तामेव कन्यां मैत्रेय प्रसूता मोहते जने॥ २०॥

मूलम्

तस्मिन्काले यशोदापि मोहिता योगनिद्रया।
तामेव कन्यां मैत्रेय प्रसूता मोहते जने॥ २०॥

अनुवाद (हिन्दी)

हे मैत्रेय! इसी समय योगनिद्राके प्रभावसे सब मनुष्योंके मोहित हो जानेपर मोहित हुई यशोदाने भी उसी कन्याको जन्म दिया॥ २०॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

वसुदेवोऽपि विन्यस्य बालमादाय दारिकाम्।
यशोदाशयनात्तूर्णमाजगामामितद्युतिः॥ २१॥

मूलम्

वसुदेवोऽपि विन्यस्य बालमादाय दारिकाम्।
यशोदाशयनात्तूर्णमाजगामामितद्युतिः॥ २१॥

अनुवाद (हिन्दी)

तब अतिशय कान्तिमान् वसुदेवजी भी उस बालकको सुलाकर और कन्याको लेकर तुरन्त यशोदाके शयन-गृहसे चले आये॥ २१॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ददृशे च प्रबुद्धा सा यशोदा जातमात्मजम्।
नीलोत्पलदलश्यामं ततोऽत्यर्थं मुदं ययौ॥ २२॥

मूलम्

ददृशे च प्रबुद्धा सा यशोदा जातमात्मजम्।
नीलोत्पलदलश्यामं ततोऽत्यर्थं मुदं ययौ॥ २२॥

अनुवाद (हिन्दी)

जब यशोदाने जागनेपर देखा कि उसके एक नीलकमलदलके समान श्यामवर्ण पुत्र उत्पन्न हुआ है तो उसे अत्यन्त प्रसन्नता हुई॥ २२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

आदाय वसुदेवोऽपि दारिकां निजमन्दिरे।
देवकीशयने न्यस्य यथापूर्वमतिष्ठत॥ २३॥

मूलम्

आदाय वसुदेवोऽपि दारिकां निजमन्दिरे।
देवकीशयने न्यस्य यथापूर्वमतिष्ठत॥ २३॥

अनुवाद (हिन्दी)

इधर, वसुदेवजीने कन्याको ले जाकर अपने महलमें देवकीके शयनगृहमें सुला दिया और पूर्ववत् स्थित हो गये॥ २३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ततो बालध्वनिं श्रुत्वा रक्षिणस्सहसोत्थिताः।
कंसायावेदयामासुर्देवकीप्रसवं द्विज॥ २४॥

मूलम्

ततो बालध्वनिं श्रुत्वा रक्षिणस्सहसोत्थिताः।
कंसायावेदयामासुर्देवकीप्रसवं द्विज॥ २४॥

अनुवाद (हिन्दी)

हे द्विज! तदनन्तर बालकके रोनेका शब्द सुनकर कारागृह-रक्षक सहसा उठ खड़े हुए और देवकीके सन्तान उत्पन्न होनेका वृत्तान्त कंसको सुना दिया॥ २४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

कंसस्तूर्णमुपेत्यैनां ततो जग्राह बालिकाम्।
मुञ्च मुञ्चेति देवक्या सन्नकण्ठ्या निवारितः॥ २५॥
चिक्षेप च शिलापृष्ठे सा क्षिप्ता वियति स्थिता।
अवाप रूपं सुमहत्सायुधाष्टमहाभुजम्॥ २६॥

मूलम्

कंसस्तूर्णमुपेत्यैनां ततो जग्राह बालिकाम्।
मुञ्च मुञ्चेति देवक्या सन्नकण्ठ्या निवारितः॥ २५॥
चिक्षेप च शिलापृष्ठे सा क्षिप्ता वियति स्थिता।
अवाप रूपं सुमहत्सायुधाष्टमहाभुजम्॥ २६॥

अनुवाद (हिन्दी)

यह सुनते ही कंसने तुरन्त जाकर देवकीके रुँधे हुए कण्ठसे ‘छोड़, छोड़’—ऐसा कहकर रोकनेपर भी उस बालिकाको पकड़ लिया और उसे एक शिलापर पटक दिया। उसके पटकते ही वह आकाशमें स्थित हो गयी और उसने शस्त्रयुक्त एक महान् अष्टभुजरूप धारण कर लिया॥ २५-२६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

प्रजहास तथैवोच्चैः कंसं च रुषिताब्रवीत्।
किं मया क्षिप्तया कंस जातो यस्त्वां वधिष्यति॥ २७॥
सर्वस्वभूतो देवानामासीन्मृत्युः पुरा स ते।
तदेतत्सम्प्रधार्याशु क्रियतां हितमात्मनः॥ २८॥

मूलम्

प्रजहास तथैवोच्चैः कंसं च रुषिताब्रवीत्।
किं मया क्षिप्तया कंस जातो यस्त्वां वधिष्यति॥ २७॥
सर्वस्वभूतो देवानामासीन्मृत्युः पुरा स ते।
तदेतत्सम्प्रधार्याशु क्रियतां हितमात्मनः॥ २८॥

अनुवाद (हिन्दी)

तब उसने ऊँचे स्वरसे अट्टहास किया और कंससे रोषपूर्वक कहा—‘अरे कंस! मुझे पटकनेसे तेरा क्या प्रयोजन सिद्ध हुआ? जो तेरा वध करेगा उसने तो [पहले ही] जन्म ले लिया है; देवताओंके सर्वस्व वे हरि ही तुम्हारे [कालनेमिरूप] पूर्वजन्ममें भी काल थे। अतः ऐसा जानकर तू शीघ्र ही अपने हितका उपाय कर’॥ २७-२८॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

इत्युक्त्वा प्रययौ देवी दिव्यस्रग्गन्धभूषणा।
पश्यतो भोजराजस्य स्तुता सिद्धैर्विहायसा॥ २९॥

मूलम्

इत्युक्त्वा प्रययौ देवी दिव्यस्रग्गन्धभूषणा।
पश्यतो भोजराजस्य स्तुता सिद्धैर्विहायसा॥ २९॥

अनुवाद (हिन्दी)

ऐसा कह, वह दिव्य माला और चन्दनादिसे विभूषिता तथा सिद्धगणद्वारा स्तुति की जाती हुई देवी भोजराज कंसके देखते-देखते आकाशमार्गसे चली गयी॥ २९॥

मूलम् (समाप्तिः)

इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेंऽशे तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥