[TABLE]
श्रीवैकुण्ठविहारिणे नमः | |
**अथ श्रीमद्भागवतभाषाटीकाविषयानुक्रमणिकाप्रारम्भः | ** |
अध्याया | विषया |
प्रथमस्कन्धः १. | |
१ | मगलाचरण, नैमिषारण्योपाख्यान, सूतजीका आगमन और शौनकादिक ऋषियोंका प्रश्न |
२ | सूतजीका उत्तर तथा भगवद्गुणानुवर्णनका उपोद्घात |
३ | विष्णुभगवानके चौबीस अवतारोंके चरित्रोंका वर्णन तथा अवतारकथाके प्रश्नोंका उत्तर |
४ | व्यासजीका तपस्यादिकसे सन्तोष और श्रीमद्भागवतके आरम्भका कारण |
५ | व्यासनारदका संवाद और भगवद्गुणोंका श्रेष्ठत्व सुनकर चित्तका सावधान होना |
६ | नारदमुनिके पूर्वजन्मका वृत्तान्त वर्णन |
७ | श्रीमद्भागवतका प्रारम्भ और अश्वत्थामाका निग्रह वर्णन |
८ | अश्वत्थामाके अस्त्रसे परीक्षित्की रक्षा तथा कुन्तीकृतस्तुति और युधिष्ठिरपश्चात्ताप |
९ | भीष्मकृत युधिष्ठिरको धर्मोपदेश, भगवत्स्तुति, भीष्मजीकी मुक्ति, युधिष्ठिरराज्यप्राप्ति |
१० | श्रीकृष्णजीका आनर्तदेशमें आगमन और द्वारकावासियोंका श्रीकृष्णजीकी स्तुति करना |
११ | बन्धुसहित श्रीकृष्णजीका द्वारका पधारना और द्वारकावासियोंका श्रीकृष्णकी स्तुति करना |
१२ | उत्तराके गर्भ में श्रीकृष्णकृत परीक्षित्का रक्षण और परीक्षित्का जन्मोत्सव |
१३ | विदुरकी तीर्थयात्रा, धृतराष्ट्रका मोक्ष और परीक्षित्के राज्याभिषेकका महोत्सव |
१४ | द्वारकाके कुशलवृत्तान्तमें युधिष्ठिरका वितर्क और अर्जुनके मुखसे श्रीकृष्णका परलोकगमनवर्णन |
१५ | कलियुगका प्रवेश और राजा युधिष्ठिरका स्वर्गारोहण |
१६ | राजा परीक्षित्का दिग्विजय और पृथ्वीका धर्मसंवाद |
१७ | महाप्रतापी राजा परीक्षित्का कलियुगको दण्ड देना |
१८ | धर्मपालक राजा परीक्षित्को विप्रपुत्रका शाप देना |
१९ | गंगाजीमें प्रायोपविष्ट राजा परीक्षित्के समीप शुकदेवजीका शुभागमन |
द्वितीयस्कन्धः २. | |
१ | श्रीशुकदेवकृत राजा परीक्षित्के प्रश्नकी प्रशंसा और भगवान्के विराट् रूपका वर्णन |
२ | भगवान् के सूक्ष्मरूपका ध्यानवर्णन, तथा पुरुषसंस्थानुवर्णन |
३ | ब्रह्मादिक देवताओंकी पूजाका पृथक् पृथक् फल और भगवद्भक्तिमें परीक्षित्का प्रेम |
४ | सृष्टि आदि हरिचरित्रसंबंधी प्रश्नोंका ब्रह्मनारदसंवादरूप उत्तर |
५ | विराट्सृष्टि, भगवल्लीला, तथा ब्रह्मनारदके संवाद में विराट् रूपका वर्णन |
६ | विराट्विभूति, तथा पुरुषसूक्तके अर्थका वर्णन |
७ | गुणकर्मप्रयोजन सहित भगवान्के चौबीस अवतार का वर्णन |
८ | राजापरीक्षित्कृत भगवत्तत्त्वमें अनेक प्रश्नविधि |
९ | भगवत्कृत चतुःश्लोकी भागवतवर्णन |
१० | पुराणके दशविध लक्षण और पुरुषसस्थानका वर्णन |
तृतीयस्कन्धः ३. | |
१ | विदुरोद्धव संवाद वर्णन |
२ | कृष्णके विरहमे व्याकुल होकर उद्धवजीका विदुरसे कृष्णके बालचरित्र कहना |
३ | प्रभासक्षेत्रमें श्रीकृष्णादि यादवोंका आगमन |
४ | विदुरोद्धवसंवादान्तर्गत यदुवंशका क्षय |
५ | विदुरमैत्रेयसमागम, विदुरमैत्रेय संवाद तहाँ महदादिक सर्गमें सर्वदेवकृत स्तुति |
६ | विराट् देहमें ईश्वरका प्रवेश तथा आध्यात्मिक भेदका निरूपण |
७ | संशयमन मैत्रयजीका उत्तर श्रवण कर विदुरजीके अनेक प्रश्नविधान |
[TABLE]
[TABLE]
अभ्यायाः | विषयाः |
१२ | चारों आश्रमोंके धर्मवर्णन |
१३ | भगवान् दत्तात्रेयजीने प्रह्लादके सामने परमहंस धर्मवर्णन किया |
१४ | गृहस्थाश्रमके धर्मका वर्णन |
१५ | सब जनोंके सदाचारका वर्णन |
अष्टमस्कन्धः ८. | |
१ | स्वायंभुवमनु आदि चार मन्वन्तरोंका वर्णन |
२ | गजेन्द्रोपाख्यान अर्थात् ग्राहसे हार मान गजराजने भगवान्की स्तुति की |
३ | गजेन्द्रमोक्ष, अर्थात् गजराजको ग्राहसे आनकर छुटाया |
४ | गजेन्द्रकृत भगवत्स्तोत्र वर्णन |
५ | रैवत मन्वन्तरका वर्णन |
६ | अमृत मथनमें मन्दराचल पर्वतका स्थानान्तर करना |
७ | हालाहलके भयसे देवताओंने शिवकी स्तुति की |
८ | कामधेनु आदि रत्नोंका प्रादुर्भाव तथा दैत्योंको मोहनेके लिये भगवान् ने मोहिनीरूप धारण किया |
९ | सब दैत्योंने मिलकर मोहिनीको अमृत दिया और मोहिनीने सब देवताओंको पान कराया |
१० | देवता और दैत्योंका परस्पर संग्राम वर्णन |
११ | देवासुर संग्राममें शुक्राचार्यकृत दैत्योंकी रक्षावर्णन |
१२ | भगवान् ने अपना मोहिनीरूप शिवजीको दिखाया |
१३ | सप्तम मनुसे लगाकर छ प्रकार के मन्वन्तरोंका वृत्तान्तवर्णन |
१४ | मन्वन्तरमें मन्वन्तरके ईशोंका वर्णन |
१५ | राजा बलिका विजयवृत्तान्त वर्णन |
१६ | अदितिको कश्यपजीने पयोव्रतकी शिक्षा की |
१७ | पयोव्रतके प्रतापसे अदितिके गर्भमें भगवान् ने वामन अवतार लिया |
१८ | राजा बलिके यज्ञमें वामनजीका आना |
१९ | राजा बलिने तीन पग धरणी वामनभगवान्को दान करके दी और गुरुका कहना न माना |
२० | श्रीवामनजीकृत विश्वरूपदर्शन |
२१ | वामनजीकृत राजाबलिनिग्रह वर्णन |
२२ | भगवान् ने राजा बलिपर संतुष्ट हो पातालका राज्य दिया |
२३ | वामनजीका प्रभाववर्णन |
२४ | मत्स्य अवतारकी कथा वर्णन |
नवमस्कन्धः ९. | |
१ | वैवस्वतमनुके पुत्रोंका वंश और सुद्युम्नका स्त्रीभाववर्णन |
२ | करूषआदि पाँच मनुपुत्रोंके वंशका वर्णन |
३ | मनुपुत्र शर्यातिका वंशवर्णन, सुकन्या और रेवतीका आख्यान वर्णन |
४ | मनुपुत्र नभगका इतिहास, उसके पुत्र अम्बरीषराजाका उपा० |
५ | विष्णु भगवान् के चक्रसे अम्बरीषकी रक्षा वर्णन |
६ | अम्बरीषका वश, शशादसे लेकर मान्धाता पर्यन्त इक्ष्वाकुका वंश और सौमरि ऋषिकी कथा |
७ | पुरु कुत्स और हरिश्चन्द्रका उपाख्यान |
८ | रोहितका वंश और कपिलदेवजीसे राजा सगर के पुत्रोंका वि० |
९ | राजा अंशुमान के वंशका खट्वागतक वर्णन और पृथ्वीपर भगीरथकृत गंगाका लाना |
१० | खट्वागके वंशमे रामचन्द्रका जन्म और उनके चरित्र |
११ | श्रीरामचन्द्रजीका भ्राताओं समेत अयोध्यामें राज्य और यज्ञवर्णन |
१२ | रामचन्द्रके पुत्र कुशका वंशवर्णन और इक्ष्वाकुपुत्र शशादिका वंशवर्णन |
१३ | इक्ष्वाकुपुत्र निमिराजाके वंशका वर्णन |
१४ | चन्द्रवंशका वर्णन औरबृहस्पतिकीस्त्रीमें चन्द्रमासे बुधकी उ० |
१५ | पुरूरवाके पुत्रोंका वंश, सहस्रबाहु अर्जुनका वध |
१६ | परशुरामजीकृत क्षत्रियवंशका क्षय वर्णन |
१७ | पुरूरवाके ज्येष्ठपुत्र आयुके चार पुत्रोंका वंश |
१८ | राजा नहुषका पुत्र ययातिराजाका इतिहास |
१९ | राजा ययातिकृत शोकवर्णन |
२० | पुरुके वंशमें भरतका यशवर्णन |
२१ | भरतवशमें रतिदेव अजमीढ आदि राजाओं की कीर्तिवर्णन |
२२ | दिवोदास, ऋक्षकेवंशमेंजरासन्ध, युधिष्ठिर, दुर्योधनादिरा० वं० |
२३ | अनु, द्रुह्यु, तुर्वसु, यदुका वंशका वर्णन |
२४ | विदर्भके तीन पुत्रोंका जन्म और रामकृष्णतक अनेक वंशवर्णन |
दशमस्कन्धपूर्वार्द्धम् १०. | |
१ | कंसका देवकीके पुत्रसे अपना मरणसुन उसके छ पुत्रोंका वधक० |
२ | ब्रह्मादिककृत गर्भस्तुति |
३ | भगवान् का चतुर्भुज रूप देख उनको गोकुलमें पहुँचाया और योगमायाको लेआये |
४ | कंसकृत बालकवधादिक उपद्रव वर्णन |
५ | नन्दके घरमे पुत्रोत्सववर्णन और मथुरामे वसुदेवजीसे मिलनेके लिये जाना |
६ | पूतनाराक्षसीका वधवृत्तान्त वर्णन |
७ | शकटासुरका मारण, तृणावर्त्तका वध, विश्वरूपदर्शन |
८ | श्रीकृष्णका जातकर्म, नामकरणसंस्कार, ओर मिट्टी खानेके बहानेसे मुखमें माताको त्रिलोकी दिखाई |
९ | श्रीकृष्णको यशोदाने उलूखलसे बाँधा |
[TABLE]
अध्यायाः | विषयाः |
७२ | भीमसेनके हाथ से जरासन्धका वध वर्णन |
७३ | जरासन्धके मरनेके पीछे सब राजाओंको छुटाकर अपने अपने देशको भेजदिया |
७४ | युधिष्ठिरके यज्ञमें अग्रपूजासमारम्भ तहां शिशुपालका वध |
७५ | यज्ञमे आये हुए राजा ब्राह्मणादिकोंका सत्कार और दुर्योधनका मानभंग |
७६ | राजा शाल्वका वध |
७७ | द्युमान् राजाका वध, सौभराजाका वध |
७८ | दन्तवक्रका वध, बलदेवजीका नैमिषारण्यमें जाना |
७९ | बलदेवजीका तीर्थयात्राके लिये प्रस्थान |
८० | सुदामजीका श्रीकृष्णके दर्शनके लिये द्वारकामे जाना, और श्रीकृष्णकृत सुदामजीका आदरसत्कार |
८१ | सुदामके तन्दुल चाबकर उसको त्रिलोकीकी सम्पदा देना |
८२ | श्रीकृष्णका सूर्यग्रहणके समय कुरुक्षेत्रमे जाना, तहाँ नन्दादिक गोपगोपियोंका मिलना |
८३ | श्रीकृष्णयुधिष्ठिरका संगम, श्रीकृष्णपत्नी और द्रौपदीका परस्पर संवाद |
८४ | श्रीकृष्णप्रभाव वर्णन और तीर्थयात्रा महोत्सव |
८५ | श्रीकृष्णने अपनी माताको मरेहुए पुत्र ला दिये और अपने पिताको उपदेश किया |
८६ | अर्जुनकृत सुभद्राहरण और भगवान् ने श्रुतदेव ब्राह्मणको प्रसन्न किया |
८७ | नारायणनारदसंवाद और वेदस्तुति |
८८ | वृकासुरका वध और रुद्रमहादेव संकट मोचन |
८९ | भृगुजीने निश्चय किया कि सब देवोंमें विष्णु श्रेष्ठ हैं |
९० | संक्षेपसे श्रीकृष्णलीला और यदुवंशियोंकी असंख्यातताका व० |
एकादशस्कंधः ११. | |
१ | यदुवंशियोंको विप्रशाप वर्णन |
२ | वसुदेवके आगे नारदमुनिका कहा शुद्ध वैष्णवधर्म वर्णन |
३ | जायन्तेय उपाख्यान, ब्रह्म व कर्म इन चार प्रश्नोंका उत्तर |
४ | द्रुमिलनाम योगेश्वरने अवतारकी चेष्टाके प्रश्नका उत्तर दिया |
५ | भक्तिरहित पुरुषोंकी गति और युग युगमें पूजाकी विधिका व० |
६ | ब्रह्माजीकृत कृष्णस्तुति, उद्धवजीकृत श्रीकृष्णचद्रजीकी प्रार्थ० |
७ | उद्धवजीको ज्ञान देनेके लिये अवधूतका इतिहास और गुरुके आठ गुण |
८ | अवधुतको अजगर आदि गुरुकी शिक्षा और पिङ्गला वेश्याका गीत |
९ | अवधूतको कुररपक्षी आदि गुरुकी शिक्षा और अवधूतगीत |
१० | आत्माको संसारके कारणका वर्णन |
११ | बद्ध, मुक्त, साधु और भक्ति के लक्षण |
१२ | सत्संगकी महिमा, कर्म करनेकी और उसके त्यागने की रीति |
१३ | गुणका बन्धन छूटने का प्रकार और हंसकी कथा |
१४ | परम श्रेष्ठ भक्तिका उत्सव और साधन सहित ध्यान वर्णन |
१५ | धारणा सहित सिद्धिका और भगवान् की प्राप्तिका विघ्नत्व परमेश्वरकी तत्परता वर्णन |
१६ | हरिकी विभूतियोंका वर्णन और ज्ञान, वीर्य, प्रभावका वर्णन |
१७ | इस अवतारसे ब्रह्मचारी और गृहस्थियोंके धर्मका वर्णन |
१८ | वानप्रस्थ और सन्यासियोंके धर्मका वर्णन |
१९ | विरक्तोंका आत्मानुभाव वर्णन |
२० | भक्ति, ज्ञान, क्रिया, तीनों योगोंका वर्णन |
२१ | द्रव्य, देश, आदि पदार्थोंका गुण दोष वर्णन |
२२ | तत्त्वोंकीसंख्या प्रकृतिपुरुषका विवेकजन्ममरणका प्रकारवर्णन |
२३ | भिक्षुगीतका वर्णन |
२४ | सांख्यशास्त्रके उपदेशसे मनका मोह निवारण |
२५ | सत्त्व, रज, तम, गुणकी वृत्तियोंका वर्णन |
२६ | साधुसंगसे योगसिद्धि और पुरूरवा राजाका उपाख्यान |
२७ | सांख्यकी रीतिसे कर्मयोगका वर्णन |
२८ | ज्ञानयोगका सङ्क्षेपसे वर्णन |
२९ | भक्तियोगका सक्षेपसे वर्णन |
३० | मुशलयुद्धसे यदुकुलका क्षय वर्णन |
३१ | श्रीकृष्णका निजधाम जानेका वर्णन |
द्वादशस्कधः १२. | |
१ | मगधदेशके राजाओंकी उत्पत्ति और उनकेवर्णसंकरताका वर्णन |
२ | कलियुग पुरुषोंकी स्थितिका वर्णन |
३ | युगयुगका अनुवर्णन |
४ | परमाणु आदि द्विपरार्द्वपर्यन्तकालका वर्णन परमात्माका निर्णय |
५ | परमाणुका लक्षणवर्णन |
६ | व्यासदेवकृत वेदशाखावर्णन |
७ | शिष्यप्रशिष्य करके वेदकी शाखाओंके विस्तारका वर्णन |
८ | मार्कण्डेय जी के तपका वर्णन |
९ | मार्कण्डेयजीको भगवान् ने अपनी माया दिखाई |
१० | मार्कण्डेयजी को शिवजीने दया करके वरदान दिया |
११ | आदित्यहृदयकी व्यूहरचनावर्णन |
१२ | बारहो स्कन्धकी कही हुई कथा राजाको फिर स्मरण कराई |
१३ | पुराणसंख्यावर्णन, तथा ग्रंथान्त मंगलमयवन्दना |
इति श्रीमद्भागवतभाषाटीकाविषयानुक्रमः समाप्तः |
निगमकल्पतरोर्गलितं फलं शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम्॥ पिबत भागवतं रसमालयं मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः॥१॥
सूचना।
सर्वविद्वद्वर कृष्णचरणाम्बुजपरायणसे विनय है कि, सम्वत् १९४६ में इस महापुराण कल्पवृक्षका भारतान्तर्गत प्रथमजन्म अत्यन्त सरल सुखमय जगत्प्रसिद्ध व्रजभाषामें पदार्थमुक्तावलीनामक अतिशुद्ध भाषाटीका कराई और अत्युत्तम प्राचीन २ कविवरोंके ज्ञान भक्तिमार्गी वचनचातुरी प्रेमप्रवाहके ५०० सुललित दृष्टांत भी सम्मिलित कराये, टीका अक्षरार्थ होने पर भी अनेक श्रुति स्मृति पुराणके दृष्टांत देकर शंकासमाधान कियागया, परीक्षासे और मान्यवर पण्डितोंकी विद्वत्तासे इसकी टीका ऐसी अत्युत्तम मनोरंजन दुःखभंजन हुई कि, जिसके श्रवणामृत पानसे कदापि इच्छा तृप्त नहीं होती। ऐसे अनुपम अमूल्य अलभ्य रत्नका विकास होतेही ग्राहकगण आनंदपूर्वक अंगीकारकर इस निगम कल्पतरुकी छाया में विश्रांत हो भवसेतुरूपी कथामृत पानकर पुनर्वार छापनेका सावकाश दिया। इसकी दूसरी आवृत्ति संवत् १९४८ में छपाई इस अन्तर में इतर क्षुद्र व्यापारियों को व्यापारकी सुझी फिर क्या था रुपयाही कमाना अभीष्ट। झटपट सावकाश पा काट छाँट कागज स्याही पाठ नकल गढ यामिनी वामिनीकी गढी बनालिया। ग्राहक जानतेही हैं कि, असलसे तुच्छ नकलभी मन विकल करदेती है सो महिमाभी लम्बे लम्बे शब्दोंसे गाई गई, पर “क्रयविक्रयवेलायां काचः काचो मणिर्मणिः” इससे सावधान! पुनः सावधान!! यह देखिये जिसकी बहुत दिनोंसे लोग चन्द्रचकोरकी समान अपेक्षा करते थे सो तृतीयावृत्ति छपकर प्रसिद्ध होगई थी, तिस उपरांतभी भागवतरसास्वादी सत्पुरुषोंके कथारसपानार्थ पुनःभी छपनेका अवकाश आया इसलिये विशेषतः सज्जनलोगोंके प्रेमार्थ चतुर्थावृत्ति श्रीयुत विद्वद्वर कृष्णकृपापात्राधिकारी नानाविधग्रन्थनिर्माणनिपुण आयुर्वेदोद्धारक परमपवित्रचरित्रपण्डितमण्डलीमण्डितमुरादाबादनिवासी श्रीशालिग्रामजीके रसमय मधुर सुन्दर भाषाटीकासे परिष्कृत करि पुष्ट कागज में पहले की अपेक्षा बड़े २ टाईपमें छपीथी वो भी सब हाथोंहाथ बिकगई फिर भी यह उसी प्रकार पंचम और षष्ठआवृत्ति बिकनेपर सप्तमावृत्ति पहलेकी अपेक्षा कथा दृष्टांत और बड़ा अक्षर होनेसे बहुत ही बढगईहै सो यह अलभ्य स्वर्ण सुगंध कल्पतरु भवसागरसेतु आनन्दमय सब प्राणिमात्रको एक२प्रति रखनी परमावश्यकहै॥
दोहा — एक पंक्तिकी आधी हू, ताहूकी पुनि आध। कृष्ण कथा जे नित पढ़ैं, कोटि कोटि अपराध॥१॥
खेमराज श्रीकृष्णदास “श्रीवेङ्कटेश्वर” (स्टीम् ) मुद्रणालयाध्यक्ष
–मुंबई.
प्रस्तावना।
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भारतवर्षके विद्वानोंपर यह बात छिपी नहीं है कि, संसारसागर से पार करनेको भागवतही परमोत्तम ग्रंथ है, जिसकी महिमा सारे भारतवर्षमें छारही है, सम्पूर्ण इतिहास पुराण भागवतकी प्रशंसा करते हैं, कारण यही है कि, चार वेद, छः शास्त्र, अष्टादश पुराणका सार भागवतमें विद्यमान है, वेदके गूढ आशय, वेदान्तका रहस्य, सांख्ययोगका सार, मीमांसाका विचार, न्यायका सिद्धान्त, श्रीमद्भागवतमें स्पष्टरूप से दिखाकर सर्वोपरि भगवद्भक्तिकी महिमा वर्णन की है। यह वह महापुराण है कि, जिसको निर्माण कर श्रीवेदव्यासजीका व्यग्रभी चित्त शांत होगया, यह वही अमृत है जिससे श्रवणद्वारा पानकर राजा परीक्षित् नेअमरत्व लाभ किया, गोकर्णका भ्राता धुन्धुकारी इसीके श्रवण करनेसे प्रेतत्वसे मुक्त हुआ; सूतके द्वारा शौनकादिक श्रीमद्भागवतही श्रवणकर मुक्त हुए, यह क्या, लाखों जीव इसके श्रवणमात्रसे मुक्त होगये, होते जाते हैं, और होंगे; प्रतिवर्ष नगर नगर गाँव गाँवमें इसका पारायण सप्ताह यज्ञके नामसे होता है और स्त्री पुरुष रुचिके अनुसार इसे श्रवणकर अपनी मनोकामनाको प्राप्त होते हैं, शुकदेवजीके मुख से निकली हुई भागवत रूपी अमृत की सरिता अनन्तधारा हो जगत् कोपावन कर रही है, संपूर्ण धर्म कर्मके विचार और भगवद्भक्तिसे भरपूर यह “श्रीभागवत” श्रोता वक्ताओंका सर्वस्व है, इसी से जगत्मेंभगवत महिमा अप्रतिहतरूपसे विराजरही है, चौबीसौं अवतारोंकी कथा इसमें विस्तारसहित वर्णन कीगई है, जिसके पाठसे मनुष्य भगवद्भक्तिका स्वरूप होजाता है और चारों पदार्थोंकी भी इच्छा नहीं रखता विशेषकर इसमें श्रीकृष्णचंद्र आनंदकंद नंदनंदन मुकुन्द गोविन्दके जन्मसे लेकर पश्चिमावस्थातक ऐसे मनोहर चरित्र वर्णन किये हैं, जिसके श्रवण करनेसे मनुष्योंका चित्त स्नेहमय होजाता है, जिन श्रीकृष्णकी लीलाका आश्रय ले आजदिन व्रजमंडलसहित भारतमंडल उनके स्वरूपाकार होरहा है, संस्कृत प्राकृत भाषामें बड़े२ कवि काव्य बनाकर जिनकी लीलाओंका वर्णन और अपनी जिह्वाको पवित्र कर गोलोकवासी हुए हैं, प्रत्येक मनुष्य के मुखसे जिन श्रीकृष्णके चरित्र मंगलकार्यमें श्रवणगोचर होतेहैं उन श्रीकृष्णके स्वरूपका ज्ञान करानेहारा और उनके निकट प्राप्त करनेहारा यह महापुराणहीहै, श्रीकृष्णके गोलोक पधारनेपर उनकी मूर्त्तिरूप “श्रीमद्भागवत” विद्यमान है जिसप्रकार मणियोंके भीतर सूत रहकर उनकी माला कर देताहै
इसीप्रकार इसके प्रत्येक पदमें भगवन्महिमा गर्भितहो इसकी महिमा विस्तार कररही है। यह ग्रंथ जैसा सम्पूर्ण वेद शास्त्र पुराणोंका सारहै, उसी प्रकार बृहत् और महाकठिनभी है। इसी कारण इसके अर्थोंमें अच्छे विद्वानोंकी बुद्धिभी चकित होजाती है कहाभी है कि—"विद्यावतां भागवते परीक्षा" यह विस्तृत ग्रंथ १२ स्कंध ३३५ अध्याय एवं १८००० अष्टादश सहस्र श्लोकोंमें पूर्णहुआ है। इसकी कठिनता से सर्व साधारणको इसका स्वाद मिलना बडाही कठिन था और सप्ताहयज्ञमेंही इसका श्रवण होताथा और जिनको अधिक विद्या नहींथी, वे पंडित इसके बाँचने का साहस नहीं करतेथे और इसके स्वादसे बहुधा वंचित रहते थे। इसी कारण चार पदार्थके साधक इस श्रीमद्भागवतको सर्व साधारणके समझने के निमित्त जगद्विख्यात उपकारपरायण सज्जनमनरंजन गुणग्राहक सद्ग्रन्थप्रचारक वैश्यवंशदिवाकर सेठजी श्रीखेमराज श्रीकृष्ण दासजी महाशयने विक्रम सम्वत् १९४६ में इस ग्रंथको वृंदावननिवासी सुप्रसिद्ध विद्वद्वर श्रीमन्नारायणशास्त्रीजीसे परमप्रिय सुमधुर व्रजभाषामें “पदार्थमुक्तावली” नामक भाषाटीका (जिस सरल सुखसमय व्रजभाषा, व्रजवल्लभी, व्रजमनरंजनी, व्रजवचनामृतको देवताभी, अपेक्षा करते हैं) वही सुप्रसिद्ध पण्डित गणेशीलालकी सहायतासे शुद्ध कराकर दोप्रकारसे यंत्रालयमें मुद्रित कराई, जिसमें एकमें तो मूल और भाषाटीका, दूसरी केवल भाषा — इसमें श्रीभागवतके प्रत्येक अध्यायके आदि अन्तका श्लोक लिखकर शेष श्लोकांकसहित केवल भाषाही छापकर उसका यथार्थ नाम “शुकसागर” रक्खा। वास्तविक यह कार्य भारतवर्षमें प्रथमही हुआ, इससे पूर्व देशभाषामें ऐसी कोई टीका निर्मित नहीं हुईथी, बस छपतेही यह पुस्तक हाथों हाथ महात्माओंने मँगाई और ऐसी मनभाई कि, थोडे महीनों के पश्चात् ही यंत्रालयमें एकभी पुस्तक नहीं रही, इसकारण इसके छापनेकी आवश्यकता समझकर यंत्रालयाधिपतिने इसके शोधनेका भार श्रीयुत पंडित ज्वालाप्रसादजीको समर्पण किया उस समय उन्होंने इस महापुराणमें कथा कहनेवालोंके उपयोगी बहुत से दृष्टान्त मिलाकर और शोधकर इसे यंत्रालयमें संवत् १९४८ में भेजदिया परन्तु छपनेहीकी देर थी कि, प्रेमी महाशयोंके पत्र पर पत्र आनेलगे और ग्रन्थ यंत्रालयमें न रहनेके कारण तृतीयावृत्ति छापने की आवश्यकता हुई तबकी वारभी फिर इस ग्रन्थमें बहुतसे कथानक जो परिश्रमसे प्राप्त हुए हैं जो कि व्रजवासी अपनी कथाओंमें कहा करतेहैं और पंचाध्यायीकी विशेष वार्ता दूसरे ग्रंथोंसे संग्रह की हुई यह सब दशमस्कंधमें यथास्थानमें टिप्पणी करके उन्होंने
लगादिये हैं और दृष्टन्तभी बहुत कथाके उपयोगी लिखदिये हैं और प्रत्येक श्लोकके अर्थ और आशयको श्रीधरीटीकाके अनुसार विचार कर बहुत स्पष्टतासे खोल दियाहै जिससे पाठ करनेवालोंको किसीप्रकार की भ्रांति न हो और शंका समाधानभी जिनका भागवतसे सबन्धहै उचित रीतिसे यथायोग्य अपने स्थानोंपर लगादिये गये तब तो वह तृतीयावृत्तिभी भक्तिरसिकजनोंकी अत्यन्त उत्कंठासे थोडेही समयमें बिकगई ऐसी इस पुस्तककी तीन आवृत्तियां उठगईं। और तोभी भक्तिमान् सद्गृहस्थोंकी इस ग्रन्थके संग्रहमें उत्कंठा अधिकतर रही इसवास्ते—औरभी इस ग्रंथमें वाचकजनोंके विशेष सुलभताके अर्थ भाषासौंदर्य आनेकी आवश्यकता थी सो पूर्ण करनेके लिये मेरेको कहा तब मैंने—पूर्व पूर्व आवृत्तियोंमें पंडितजनोंने कीहुई सब व्यवस्थाओंको विशेषरीतिसे अलंकृत कर भाषासौंदर्य पूर्ण रीतिसे लायाहै, बहुत कहनेसे क्या है। शब्द शास्त्रकी गंभीरता को विद्वान् जानते हैं, उसका जितना खोज कियाजाय उतनाहीसूक्ष्म अर्थ दीखताहै। सुवर्णको जितना आगमें धरा जाय उतनाही निखरताहै, इसीप्रकार चतुर्थावृत्तिमें भी बहुत सावधानीसे इसके अर्थ और शुद्धतापर ध्यान देकर यंत्रित किया गयाहै। पुनः पंचम और षष्ठ आवृत्तिके पुस्तक न रहनेसे अब सप्तमावृत्ति छपीहै देखनेसे विदित होजायगा कि, अबकी बार किसप्रकार इस महापुराणको अलंकृत कियाहै आपके प्रसन्न होनेही पर परिश्रमके सफल होनेकी आशा है। यद्यपि यथाशक्ति इसके शोधनादिमें सावधानी कीगई है तथापि कहीं न्यूनाधिक होगया हो तो उसमें सज्जन महाशय हंसके समान गुणग्राही होंगे। कारण कि, सर्वज्ञ और निर्भ्रान्त तो केवल एक परमेश्वरही है।
सज्जनोंका प्रेमाभिलाषी—शालिग्राम, मुरादाबाद—(पश्चिमोत्तर प्र०)
श्रीगणेशाय नमः॥ दोहा — गणपति गौरि गिरीशश्री, — कृष्णचरण चित लाय। करत तिलक माहात्म्यको, कीजै आय सहाय॥१॥ व्यासदेव शुकदेव श्री, — शौनक सूत प्रणाम॥ बार बार कर प्रेमसे, कीजै पूरणकाम॥२॥ जिन जातेहुएके पीछे चलते २ श्रीव्यासजी महाराज विरहसे व्याकुल होकर पुत्र २ पुकारने लगे, वही वार्ता तन्मय होजानेके कारण वृक्षोंनेभी उनसे कही उस सर्व प्राणियोंके हृदयमें स्थित मुनिको मैं नमस्कार करताहॅू॥१॥ नैमिषारण्य क्षेत्रमें बैठेहुए महाबुद्धिमान् सूतजीको प्रणाम करके कथारूपी अमृतस्वादके रसिक शौनकजी कहतेभये॥२॥ शौनकजी बोले कि, हे सूत! सर्वथा अज्ञानतिमिरको नाशक कोटिसूर्यसमप्रकाशक हमारे कर्णोंको रसायनरूप कथाओंका सार आप वर्णन की
श्रीगणेशाय नमः॥ अथ श्रीमद्भागवत माहात्म्यं प्रारभ्यते॥ ॥यं प्रव्रजंतमनुपेतमपेतकृत्यं द्वैपायनो विरहकातर आजुहाव॥ पुत्रेति तन्मयतया तरवोऽभिनेदुस्तं सर्वभूतहृदयं मुनिमानतोऽस्मि॥१॥ नैमिशे सूतमासीनमभिवाद्य महामतिम्॥ कथामृतरसास्वादकुशलः शौनकोऽब्रवीत्॥२॥ शौनक उवाच॥ अज्ञानध्वांतविध्वंसकोटिसूर्यसमप्रभ॥ सूताऽऽख्याहि कथासारं मम कर्णरसायनम्॥३॥ भक्तिज्ञानविरागाप्तविवेको वर्धते कथम्॥ मायामोहनिरासश्च वैष्णवैः क्रियते कथम्॥४॥ इह घोरे कलौ प्राप्ते जीवश्चासुरतां गतः॥ क्लेशक्लांतस्य तस्यैव शोधने किं परायणम्॥५॥ श्रेयसां यद्भवेच्छ्रेयः पावनानां च पावनम्॥ कृष्णप्राप्तिकरं शश्वत्साधनं तद्वदाधुना॥६॥ चिंतामणिर्लोकसुखं सुरेंद्रः स्वर्गसंपदम्॥ प्रयच्छति गुरुः प्रीतो वैकुंठं योगिदुर्लभम्॥७॥
जिये॥३॥ किसप्रकारसे भक्ति ज्ञान वैराग्यकी प्राप्ति होती है और ज्ञान किसप्रकारसे वृद्धिको प्राप्त होता है और, महात्मा वैष्णवजन किसप्रकारसे मायामोहको त्याग करते हैं॥४॥ इस घोर कलियुगके प्रवृत्त होनेसे जीव असुरभावको प्राप्त होगये हैं उन क्लेशसे दबे हुए जीवोंके शोधनेके निमित्त क्या कर्तव्य है?॥५॥ जो कल्याणोंका कल्याण पवित्रोंका पवित्र और सम्यक्प्रकार कृष्णकी प्राप्ति करनेवाला साधन होय सो आप हमसे अब कहिये॥६॥ चिन्तामणि संसारसुखको इन्द्र स्वर्गकी संपदाको देता है और गुरु प्रसन्न होकर योगिदुर्लभ वैकुंठगतिको देताहै॥७॥
सूतजी बोले हे शौनक! तुम्हारे मनमें बहुत प्रीति है, इसकारण मैं विचारकर सर्वसिद्धान्तयुक्त संसारका भगनाशक॥८॥ भक्ति की वृद्धि करनेहारा, श्रीकृष्णके संतोषका कारण मैं तुमसे वर्णन करता हूँसो तुम सावधान होकर सुनो॥९॥ कालसर्पके मुखके ग्रास होनेके त्रासका नाशक श्रीमद्भागवतशास्त्र कलियुगमें शुकदेवजीने कहाहै॥१०॥ इससे अधिक मन शुद्ध करनेके निमित्त और कुछ नहीं है जन्मान्तरके पुण्य प्राप्त होनेसे भागवतकी प्राप्ति होतीहै॥११॥ जिस समय परीक्षित् सभामें बैठेथे और शुकदेवजी कथा कहनेका प्रारंभ कियाचाहते थे तब वहां देवता
सूत उवाच॥ प्रीतिः शौनक चित्ते ते यतो वच्मि विचार्य च॥ सर्वसिद्धांतनिष्पन्नं संसारभयनाशनम्॥८॥ भक्त्यो घवर्धनं यच्च कृष्णसंतोषहेतुकम्॥ तदहं तेऽभिधास्यामि सावधानतया शृणु॥९॥ कालव्यालमुखग्रासत्रासनिर्णा शहेतवे॥ श्रीमद्भागवतं शास्त्रं कलौ कीरेण भाषितम्॥१०॥ एतस्मादपरं किंचिन्मनश्शुद्ध्यै न विद्यते॥ जन्मांतरे भवेत्पुण्यं तदा भागवतं लभेत्॥११॥ परीक्षिते कथां वक्तुं सभायां संस्थिते शुके॥ सुधाकुंभं गृहीत्वैव देवास्तत्र समागमन्॥१२॥ शुकं नत्वाऽवदन्सर्वे स्वकार्यकुशलाः सुराः॥ कथासुधां प्रयच्छस्व गृहीत्वैव सुधामिमाम्॥१३॥ एवं विनिमये जाते सुधा राज्ञा प्रपीयताम्॥ प्रपास्यामो वयं सर्वे श्रीमद्भागवतामृतम्॥१४॥ क्व सुधा क्व कथा लोके क्वकाचः क्व मणिर्महान्॥ ब्रह्मरातो विचार्येति तदा देवाञ्जहास ह॥१५॥
अमृतका कलश लेकर आये॥१२॥ शुकदेवजीको दंडवत् करके सब बोले महाराज! कथारूपी अमृत हमें दीजिये, इसके बदले यह अमृत लीजिये, देवता अपने कार्यमें कुशल होतेही हैं॥१३॥ इस बदलेके करनेसे राजाको आप अमृत पिलाइये और हम सब देवता भागवतरूपी अमृत पियें॥१४॥ कहां तो अमृत और कहां संसारमें यह कथा, कहां काच कहां मणि, यह बात विचार शुकदेवजी देवताओंके ऊपर हँसे॥१५॥
तिनको अभक्त जानकर कथारूपी अमृत नहीं दिया श्रीमद्भागवतकी कथा देवताओंकोभी दुर्लभ है॥१६॥ इसप्रकार राजाका मोक्ष देखकर ब्रह्माजीभी विस्मित हुये सत्यलोकमें तुलाको बाॅध और साधनोंके संग इसे तोला॥१७॥ इसके गौरवके सामने और सब साधन हलके भये तिस समय सब ऋषि बडे विस्मित हुए॥१८॥ पृथ्वी में भागवतशास्त्रको भगवान् का रूप मानतेभये जो पढने सुननेसे शीघ्र वैकुण्ठका फल देताहै॥१९॥ सप्ताहमें श्रवण करनेहारेको सर्वथा मुक्तिदायक है यह सनकादिकोंने दया करके नारदजीके अर्थ पूर्वकालमें कहा है॥२०॥ यद्यपि यह कथा
अभक्तांस्तांश्च विज्ञाय न ददौ स कथामृतम्॥ श्रीमद्भागवती वार्ता सुराणामपि दुर्ल्लभा॥१६॥ राज्ञो मोक्षं तथा वीक्ष्य पुरा धाताऽपि विस्मितः॥ सत्यलोके तुलां बद्धा तोलयत्साधनान्यदः॥१७॥ लघून्यन्यानि जातानि गौरवेण इदं महत्॥ तदा ऋषिगणाः सर्वे विस्मयं परमं ययुः॥१८॥ मेनिरे भगवद्रूपं शास्त्रं भागवतं क्षितौ॥ पठनाच्छ्रवणात्सद्यो वैकुंठफलदायकम्॥१९॥ सप्ताहश्रवणेनैव सर्वथा मुक्तिदायकम्॥ सनकाद्यैः पुरा प्रोक्तं नारदाय दयापरैः॥२०॥ यद्यपि ब्रह्मसंबंधाच्छ्रुतमेतत्सुरर्षिणा॥ सप्ताहश्रवणविधिः कुमारैस्तस्य भाषितः॥२१॥ शौनक उवाच॥ लोकविग्रहयुक्तस्य नारदस्यास्थिरस्य च॥ विधिश्रवे कुतः प्रीतिः संयोगः कुत्र तैः सह॥२२॥ सूत उवाच॥ अत्र ते कीर्तयिष्यामि भक्तिपुष्टं कथानकम्॥ शुकेन मम यत्प्रोक्तं रहः शिष्यं विचार्य च॥२३॥
नारदजीने ब्रह्माजीसे सुनी है परन्तु इसके सप्ताहमें श्रवण करनेकी विधिसे सनत्कुमारने तिनसे वर्णन करी है॥२१॥ शौनकजी बोले लोकमें द्वेष करानेवाले दो घडीसे अधिक एक स्थानमें न रहनेवाले नारदजी ने यह किसप्रकार स्थिर होकर प्रीतिपूर्वक विधिसे श्रवण करी और उनके साथ इनका संयोग कहाॅहुआ॥२२॥ सूतजी बोले यह भक्तियुक्त कथा मैं आपके प्रति कहूंगा जो कुछ मुझसे शुकदेवजीने अपना अन्तरंग शिष्य विचारकर कहाहै॥२३॥
एक समय बदरिकाश्रममें वे शुद्ध चारों ऋषि सत्संगके निमित्त नारदजीके देखनेको आये॥२४॥ कुमार बोले नारदजी! तुम दीनमुख कस होरहे हो, तुम्हैंक्या चिंता है? जल्दीसे कहाँको जाओगे और अब कहाँसे आये हो?॥२५॥ इस समय तुम ऐसे शून्यचित्त हो जैसे किसीका धन खोजाय, मुक्तसंग तुममें यह बात अनुचित है इसकारण इसका कारण कहो?॥२६॥ नारदजी बोले, मैं सब लोकोंमें उत्तम पृथ्वीको जानकर पुष्कर, प्रयाग, काशी, गोदावरीको गया॥२७॥ हरिक्षेत्र, कुरुक्षेत्र, श्रीरङ्ग, सेतुबन्ध आदि तीर्थोंमें इधर उधर घूमता फिरा॥२८॥ परन्तु कहीं
एकदा तु विशालायां चत्वार ऋषयोऽमलाः॥ सत्संगार्थं समायाता ददृशुस्तत्र नारदम्॥२४॥ कुमारा ऊचुः॥ कथं ब्रह्मन्दीनमुखः कुतश्चिंतापरो भवान्॥ त्वरितं गम्यते कुत्र कुतश्चागमनं तव॥२५॥ इदानीं शून्यचित्तोऽसि गतवित्तो यथा जनः॥ तवेदं मुक्तसंगस्य नोचितं वद कारणम्॥२६॥ नारद उवाच॥ अहं तु पृथिवीं यातो ज्ञात्वा सर्वोत्तमामिति॥ पुष्करं च प्रयागं च काशीं गोदावरीं तथा॥२७॥ हरिक्षेत्रं कुरुक्षेत्रं श्रीरंगं सेतुबन्धनम्॥ एवमादिषु तीर्थेषु भ्रममाण इतस्ततः॥२८॥ नापश्यं कुत्रचिच्छर्ममनस्संतोषकारकम्॥ कलिनाऽधर्ममित्रेण धरेयं बाधिताऽधुना॥२९॥ सत्यं नास्ति तपः शौचं दया दानं न विद्यते॥ उदरम्भरिणो जीवा वराकाः कूटभाषिणः॥३०॥ मंदाः सुमंदमतयो मंदभाग्या ह्यपद्रुताः॥ पाखंडनिरताः संतो विरक्ताः सपरिग्रहाः॥३१॥ तरुणीप्रभुता गेहे श्यालको बुद्धिदायकः॥ कन्याया विक्रयो लोभाद्दंपतीनां च कल्कनम्॥३२॥
मन संतोषकारक कोई कल्याणकी बात न देखी अधर्मके मित्र कलियुगने अब यह सब पृथ्वी बाधित करली है॥२९॥ अब सत्य तप शौच दया नहीं हैं इसकारण जीव तुच्छ झूठ बोलने और केवल उदरपोषण करनेवाले होगयेहैं॥३०॥ आलसी बुद्धिहीन मंदभाग्य रोगादिसे पीडित पाखंड निरत लिंगसे विरक्त यति आदिभी स्त्री धन सहित हैं॥३१॥ घरमें स्त्रीहीकी प्रभुताई है, साले सम्मतिदाता हैं, लोभसे कन्याविक्रय होता है, स्त्री पुरुषोंमें कलह रहने लगाहै॥३२॥
आश्रम अर्थात् मठोंमें तीर्थ और नदियोंमें यवनोंका अधिकार होगया है और देवताओंके स्थानभी दुष्टोंने नष्टप्राय करदिये हैं॥३३॥ न योगी न सिद्ध न ज्ञानी न कोई सत्क्रियायुक्त मनुष्य है कलिरूपी दावानलसे सब साधन भस्म होगये हैं॥३४॥ अन्नके बेचनेवाले जनपदके मनुष्य, वेद बेचने हारे ब्राह्मण, भग बेचनेवाली स्त्रियें कलियुगमें होती हैं॥३५॥ इसप्रकार कलियुगके दोष देखता पृथ्वीमें विचरताहुआ मैं यमुनाके किनारे आया जहां कृष्णचंद्रने अनेक लीला करी थीं॥३६॥ वहां जो मैंने आश्चर्य देखा सो हे मुनियो! श्रवण करो— वहां एक युवा स्त्री दुःखीमन बैठीथी॥३७॥
आश्रमा यवनैरुद्धास्तीर्थानि सरितस्तथा॥ देवतायतनान्यत्र दुष्टैर्नष्टानि भूरिशः॥३३॥ न योगी नैव सिद्धो वा न ज्ञानी सत्क्रियो नरः॥ कलिदावानलेनाद्य साधनं भस्मतां गतम्॥३४॥ अट्टशूला1 जनपदाः शिवशूला द्विजातयः॥ कामिन्यः केशशूलिन्यः संभवति कलाविह॥३५॥ एवं पश्यन्कलेर्दोषान्पर्यटन्नवनीमहम्॥ यामुनं तटमापन्नो यत्र लीला हरेरभूत्॥३६॥ तत्राश्चर्यंमया दृष्टं श्रूयतां तन्मुनीश्वराः॥ एका तु तरुणी तत्र निषण्णा खिन्नमानसा॥३७॥ द्वौवृद्धौ पतितौ पार्श्वे निःश्वसंतावचेतनौ॥ शुश्रूषंती प्रबोधंती रुदती च तयोः पुरः॥३८॥ दशदिक्षु निरीक्षंती रक्षितारं निजं वपुः॥ वीज्यमाना शतस्त्रीभिर्बोध्यमाना मुहुर्मुहुः॥३९॥ दृष्ट्वा दूरागतः सोऽहं कौतुकेन तदंतिकम्॥ मां दृष्ट्वा चोत्थिता बाला विह्वला चाब्रवीद्वचः॥४०॥ बालोवाच॥ भोभोः साधो क्षणं तिष्ठ मच्चिंतामपि नाशय॥ दर्शनं तव लोकस्य सर्वथाऽघहरं परम्॥४१॥
उसके धोरे दो बुड़े अचेत पड़े साँस ले रहे थे वोह उनकी शुश्रूषा करती और समझाती हुईं उनके आगे रोतीथी॥३८॥ अपने शरीरकी रक्षा करनेवालेको दशों दिशामें देखतीथी सैकडों स्त्री उसको पवन करतीं और वारंवार समझातीथीं॥३९॥ उसे दूर से देखेतेही मैं कौतुकसे उसके धोरे गया। वोह बाला मुझे देखतेही उठ बैठी और व्याकुल होकर बोली॥४०॥ हे साधु! थोड़ी देर ठहरो मेरी चिन्ताकोभी नाश करो तुम्हारा दर्शन संसारके जीवोंका निश्चय पाप दूर करनेवाला है॥४१॥
प्रायः तुम्हारे वाक्यसे दुःखकी शांति होजायगी जब बडा भाग्य होता है तब तुम्हारा दर्शन होता है॥४२॥ नारदजी बोले तू कौन है और यह दोनों कौन हैं और यह कमलनयनी स्त्रियें कौन हैं? हें देवि! अपने दुःखके कारणको विस्तारसहित कहो?॥४३॥ बाला बोली, मैं भक्ति जगत् विख्यात हुॅऔर यह ज्ञान वैराग्य नाम मेरे दोनों पुत्र कालयोगसे वृद्ध हुए पड़े हैं॥४४॥ यह गंगादि नदियें मेरी सेवा करनेको आगई हैं तौभी देवताओंके सेवा करनेसेभी मेरी शांति नहीं होगी॥४५॥ हे तपोधन! इससमय मन लगाकर मेरी बात सुनो मेरी कथा बड़ी है उसे सुनकर सुख
बहुधा तव वाक्येन दुःखशांतिर्भविष्यति॥ यदा भाग्यं भवेद्भूरि भवतो दर्शनं तदा॥४२॥ नारद उवाच॥ कासि त्वं काविमौ चेमा नार्यः काः पद्मलोचनाः॥ वद देवि सविस्तारं स्वस्य दुःखस्य कारणम्॥४३॥ बालोवाच॥ अहं भक्तिरिति ख्याता इमौ मे तनयौ मतौ॥ ज्ञानवैराग्यनामानौ कालयोगेन जर्जरौ॥४४॥ गंगाद्याः सरितश्चेमा मत्सेवार्थं समागताः॥ तथापि न च मे श्रेयः सेवितायाः सुरैरपि॥४५॥ इदानीं शृणु मद्वार्तां सचित्तस्त्वं तपोधन॥ वार्ता मेवितताऽप्यस्ति तां श्रुत्वा सुखमावह॥४६॥ उत्पन्ना द्रविडे साहं वृद्धिं कर्णाटके गता॥ क्वचित्क्वचिन्महाराष्ट्रे गुर्जरे जीर्णतां गता॥४७॥ तत्र घोरकलेर्योगात्पाखण्डैः खंडितांगिका॥ दुर्बलाहं चिरं जाता पुत्राभ्यां सह मंदता॥४८॥ वृंदावनं पुनः प्राप्य नवीने वसुरूपिणी॥ जाताहं युवती सम्यक्प्रेष्टरूपा तु सांप्रतम्॥४९॥ इमौ तु शयितावत्र सुतौ मे विश्यतः श्रमात्॥ इदं स्थानं परित्यज्य विदेशं गम्यते मया॥५०॥
होगा॥४६॥ मैं द्रविडदेशमें उत्पन्न होकर कर्णाटकदेशमें वृद्धिको प्राप्त भई कहीं कहीं महाराष्ट्रदेशमें और गुर्जरदेशमें वृद्ध होगई॥४७॥ तहाॅघोर कलियुग से पाखण्डोंसे खंडितशरीर मैंपुत्रोंसहित बडी दुर्बल होगई॥४८॥ अब इस समय वृन्दावनमें फिर सुन्दर रूपवती पहलेकी नाईं होगई हूॅ॥४९॥ यह मेरे दोनों पुत्र श्रमसे दुःखित पडेहैं इस स्थानको छोडके परदेशको जारहीहूॅ॥५०॥
सो यह दोनों बूढे होगये,इस दुःखसे मैं दुःखी हुँऔर मैं जवान होगई और मेरे दोनों पुत्र कैसे वृद्ध होगये॥५१॥ तीनों साथही रहते थे यह विपरीतता कैसे हुई माता वृद्धा पुत्र तरुण यह तो योग्य है पर यह विपरीत तो घटताही नहीं॥५२॥ इसकारण मैं बडे आश्चर्यपूर्वक अपने आत्माको शोचतीहूँ हे योगी महात्मन्! आप कहिये इसमें क्या कारण है?॥५३॥ नारदजी बोले, हे निष्पापे ! मैं ज्ञानसे अपने में यह सब तेरी वार्ता देखता हूँ तू दुःख मत कर परमेश्वर तेरा कल्याण करेंगे॥५४॥ सूतजी बोले, क्षणमात्रमें सब विचारकर मुनीश्वर कहने लगे, हे बाले! सावधान होकर सुन
जरठत्वं समायातौतेन दुःखेन दुःखिता॥ साहं तु तरुणी कस्मात्सुतौ वृद्धाविमौ कुतः॥५१॥ त्रयाणां सहचारित्वाद्वैपरीत्यं कुतः स्थितम्॥ घटते जरठा माता तरुणौ तनयाविति॥५२॥ अतः शोचामि चात्मानं विस्मयाविष्टमानसा॥ वद योगनिधे धीमन्कारणं चात्र किं भवेत्॥५३॥ नारद उवाच॥ ज्ञानेनात्मनि पश्यामि सर्वमेतत्तवानघे॥ न विषादस्त्वया कार्यो हरिः शं ते करिष्यति॥५४॥ ॥सूत उवाच॥ ॥क्षणमात्रेण तज्ज्ञात्वा वाक्यमूचे मुनीश्वरः॥ नारद उवाच॥ शृणुष्वाऽवहिता बाले युगोऽयं दारुणः कलिः॥५५॥ तेन लुप्तः सदाचारो योगमार्गस्तपांसि च॥ जना अघासुरायंते शाठ्यदुष्कर्मकारिणः॥५६॥ इह संतो विषीदंति प्रहृष्यंति ह्यसाधवः॥ धत्ते धैर्यं तु यो धीमान्स धीरः पंडितोऽथ वा॥५७॥ अस्पृश्याऽनवलोक्येयं शेषभारकरी धरा॥ वर्षेवर्षे क्रमाज्जाता मंगलं नापि दृश्यते॥५८॥
इससमय दारुण कलियुग वर्त्तता है॥५५॥ इसकारण सदाचार योगमार्ग तप लुप्त होगये हैं इसी कारण से मनुष्य पाप करनेके कारण असुरभावको। प्राप्त होगयेहैं॥५६॥ इस युग में संत दुःख पातेहैं असाधु प्रसन्न रहते हैं जो बुद्धिमान् धैर्य धारण करता है वोही धीर पंडित है अथवा॥५७॥ यह शेषजीको भार करानेहारी पृथ्वी अब छूने और देखनेके अयोग्य होगई है और प्रतिवर्ष क्रमसे ऐसी ही होती जाती है कि, अब कहीं शुभ वार्ता नहीं दीखती॥५८॥
तुझेभी पुत्रसहित अब कोई नहीं देखता पुत्र दारा धनादिके अनुरागसे अंधेहुए तेरा आदर कोई नहीं करते इससे तू जर्जर होगई है॥५९॥ वृंदावनके संयोगसे अब फिर तु नवीन तरुणी होगई इससे वृंदावन धन्य है जहां भक्ति विराजती है॥६०॥ इस वृंदावनमें यह ज्ञान वैराग्य ग्राहका भावसे वृद्धावस्थाको नहीं त्यागन करैंगे इस स्थानमें इन ज्ञान वैराग्यकी और कुछ तेरीभी कामक्रोधादि दुःखाभावसे सुखपूर्वक स्थिति होगी ऐसा माना जाता है॥६१॥ भक्ति बोली, महाराज! परीक्षित् नेइस अपवित्र कलियुगको क्यों स्थापित किया और इसके प्रवृत्त होतेही सब बडा सार बल कहाँ गया?॥६२॥ दयायुक्त भगवान् विष्णु इस पापको कैसे देखते हैं यह मेरा संदेह दूर करो तुम्हारी वाणीसे मैं प्रसन्न हूं॥६३॥ नारदजी बोले
न त्वामपि सुतैः साकं कोऽपि पश्यति सांप्रतम्॥ उपेक्षिताऽनुरागांधैर्जर्जरत्वेन संस्थिता॥५९॥ वृंदावनस्य संयोगात्पुनस्त्वं तरुणी नवा॥ धन्यं वृंदावनं तेन भक्तिर्नृत्यति यत्र च॥६०॥ अत्रेमौग्राहकाभावान्न जरामपि मुंचतः॥ किंचिदात्मसुखेनेह प्रसुप्तिर्मन्यतेऽनयोः॥६१॥ श्रीभक्तिरुवाच॥ कथं परीक्षिता राज्ञा स्थापितो ह्यशुचिः कलिः॥ प्रवृत्ते तु कलौ सर्वसारः कुत्र गतो महान्॥६२॥ करुणापरेण हरिणाप्यधर्मः कथमीक्ष्यते॥ इमं मे संशयं छिन्धि त्वद्वाचा सुखितास्म्यहम्॥६३॥ नारद उवाच॥ यदि पृष्टस्त्वया बाले प्रेमतः श्रवणं कुरु॥ सर्वं वक्ष्यामि ते भद्रे कश्मलं ते गमिष्यति॥६४॥ यदा मुकुंदो भगवान्क्ष्मां त्यक्त्वा स्वपदं गतं गतः॥ तद्दिनात्कलिरायातः सर्वसाधनबाधकः॥६५॥ दृष्टो दिग्विजये राज्ञा दीनवच्छरणं गतः॥ न मया मारणीयोऽयं सारंग इव सारभुक्॥६६॥
हे बाले! जो तैंने पूछा है तो प्रेमसे श्रवण कर मैं तेरे अर्थ सम्पूर्ण वर्णन करूंगा जिससे तेरा दुःख दूर होगा॥६४॥ जब मुकुन्द भगवान् पृथ्वीको त्यागन कर अपने धामको पधारे उसी दिन से सब साधनका बाधक कलियुग आनकर प्राप्त हुआ॥६५॥ जिस समय दिग्विजय करते राजा परीक्षित्ने कलिको देखा तुरंत यह इसे मारनेको उद्यत हुए तब यह दीनतापूर्वक शरणमें आनकर प्राप्त हुआ तब राजाने विचारा कि, यह शरणमें आया है इस कारण मुझे मारना नहीं योग्य, राजाकी नाई सारका भोगनेवाला था॥६६॥
क्योंकि जो फल तपस्या और योगसमाधिसे भी नहीं होता है वोह फल कलियुगमें केवल अच्छीप्रकार केशवके नाम लेनेसे प्राप्त होता है॥६७॥ जिसमें केवल एक भक्तिही साधन है और ज्ञान वैराग्यादि जिसविषे निरस हैं ऐसें कलियुगको देख कलिवासी जनोंके सुख करनेको केवल भक्ति करनेसेही मनुष्य तर जायँगे राजाने उसका स्थापन किया॥६८॥ कुकर्माचरण करनेसे सबका स्थिरांश अब निकलगया है और पृथ्वीमें पदार्थ बीजहीन भूसीकी नाईं उत्पन्न होतेहैं॥६९॥ ब्राह्मणों ने थोडे धनके लोभसे भगवत्सम्बन्धी वार्ता घरघरमें जिस तिस मनुष्यसे कहनी प्रारम्भ करदी है इससे कथाका सार अर्थात् फल जातारहा॥७०॥ बडे भयंकर कुत्सितकर्म नास्तिक पापी मनुष्य तीर्थोंमें वास करनेलगे इसकारण तीर्थोंका सार
यत्फलं नास्ति तपसा न योगेन समाधिना॥ तत्फलं लभते सम्यक्कलौ केशवकीर्त्तनात्॥६७॥ एकाकारं कलिं दृष्ट्वा सारवत्सारनीरसम्॥ विष्णुरातः स्थापितवान्कलिजानां सुखाय च॥६८॥ कुकर्माचरणात्सारः सर्वतो निर्गतोऽधुना॥ पदार्थाः संस्थिता भूमौ बीजहीनास्तुषा यथा॥६९॥ विप्रैर्भागवती वार्ता गेहेगेहे जनेजने॥ कारिता कणलोभेन कथा सारस्ततो गतः॥७०॥ अत्युग्रभूरिकर्माणो नास्तिका रौरवा जनाः॥ तेपि तिष्ठंति तीर्थेषु तीर्थसारस्ततो गतः॥७१॥ कामक्रोधमहालोभतृष्णाव्याकुलचेतसः॥ तेऽपि तिष्टंति तपसि तपस्सारस्ततो गतः॥७२॥ मनसश्चाजयाल्लोभाद्दंभात्पाखंडसंश्रयात्॥ शास्त्रानभ्यसनाच्चैव ध्यानयोगफलं गतम्॥७३॥ पंडितास्तु कलत्रेण रमंते महिषा इव॥ पुत्रस्योत्पादने दक्षा अदक्षा मुक्तिसाधने॥७४॥ न हि वैष्णवता कुत्र संप्रदायपुरस्सरा॥ एवं प्रलयतां प्राप्तो वस्तुसारः स्थलेस्थले॥७५॥
जातारहा॥७१॥ जिनके चित्त काम क्रोध महालोभसे व्याकुल हैं वेभी तप करनेलगे इससे तपस्याका सार जातारहा॥७२॥ मनके नहीं जीतनेसे लोभ दंभ पाखण्डके आश्रय करनेसे शास्त्र के अनभ्याससे ध्यानयोगका फल जातारहा॥७३॥ पंडित महिषकी नाईंं स्त्रियोंके साथ रमते हुये पुत्रोत्पादन करनेमें तो चतुर हैं परंतु मुक्तिसाधनमें मूर्ख हैं॥७४॥ कहीं वैष्णवता जो सब संप्रदायोंमें श्रेष्ठ है नहीं पाईजाती। इसप्रकार स्थान २ में सब पदार्थोंका सार जातारहा॥७५॥
फिर यह तो युगधर्मही है इसमें किसीका दोष नही इसकारण पुण्डरीकाक्ष निकट स्थितहुएभी सहन करते हैं॥७६॥ सूतजी बोले, हे शौनक! इसप्रकार नारदजीके वचन सुन बडी विस्मयको प्राप्त हो भक्ति फिर बोली सो तुम सुनो॥७७॥ भक्ति बोली देवर्षि! तुम धन्य हो मेरे भाग्यसेही आनकर प्राप्त हुए हो साधुओंका दर्शन लोकमें सब सिद्धियोंका देनेहारा है॥७८॥ जगत् में जिन तुम्हारी केवल अनुपम वचनरचनाको विचारकर, कयाधूका पुत्र प्रह्राद शापको त्यागताभया और जिसकी कृपा से यह ध्रुव अचलपदको प्राप्त हुआ सब क्षेमोके पात्र ऐसे ब्रह्मा के पुत्र नारदको नमस्कार
अयं तु युगधर्मो हि वर्तते कस्य दूषणम्॥ अतस्तु पुंडरीकाक्षः सहते निकटे स्थितः॥७६॥ सूत उवाच॥ इति तद्वचनं श्रुत्वा विस्मयं परमं गता॥ भक्तिरूचे वचो भूयः श्रूयतां तच्च शौनक॥७७॥ श्रीभक्तिरुवाच॥ सुरर्षेत्वं च धन्योऽसि मद्भाग्येन समागतः॥ साधूनां दर्शनं लोके सर्वसिद्धिकरं परम्॥७८॥ जयति जयति माया यस्य कायाधवस्ते वचनरचनमेकं केवलं चाकलय्य॥ ध्रुवपदमपि यातो यत्कृपातो ध्रुवोऽयं सकलकुशलपात्रं ब्रह्मपुत्रं नताऽस्मि॥७९॥ इति श्रीपद्मपुराणे उत्तरखंडे श्रीभागवतमाहात्म्ये भक्तिनारदसमागमो नाम प्रथमोऽध्यायः॥१॥ ॥छ॥ नारद उवाच॥ वृथा खेदायसे बाले अहो चिन्तातुरा कथम्॥ श्रीकृष्णचरणांभोजं स्मर दुःखं गमिष्यति॥१॥ द्रौपदी चपरित्राता येन कौरवकश्मलात्॥ पालिता गोपसुंदर्यः स कृष्णः क्वापि नो गतः॥२॥ त्वं तु भद्रे प्रिया तस्य सततं प्राणतोऽधिका॥ त्वयाहूतस्तु भगवान्याति नीचगृहेष्वपि॥३॥
करतीहूॅ॥७९॥ इति श्रीपद्मपुराणे उत्तरखंडे भागवतमाहात्म्ये भाषाटीकायां भक्तिनारदसमागमो नाम प्रथमोऽध्यायः॥१॥ नारदजी बोले — तू वृथा खेद करती है और क्यों चिंतातुर होरही है? श्रीकृष्णके चरणकमलके स्मरण करते ये सब दुःख जाता रहेगा॥१॥ जिन श्रीकृष्णने कौरवोंके महासंकटसे द्रौपदीकी रक्षा करी गोपकुमारी शंखचूडादिसे बचाई वोह कहीं नहीं गये हैं॥२॥ और तू तो भक्ति उनको प्राणोंसेभी अधिक प्यारी है तुझसे बुलाये भगवान् तो नीचोंके घरोंमेंभी आते हैं॥३॥
सत्ययुगादि तीन युगोंमे ज्ञान और वैराग्य मुक्तिके साधक थे कलियुगमें केवल भक्तिही ब्रह्मसायुज्यकी देनेहारी है॥४॥ वोह परमात्मा चिद्रूप परमानन्द चिन्मूर्ति सुन्दरी कृष्णवल्लभा अपना स्वरूपही तुमको उत्पन्न करतेहुए॥५॥ तब तैंने हाथ जोडकर कहा कि, मैं क्या करूं? तब कृष्णने आज्ञा करी कि, मेरे भक्तोंको पुष्ट कर जब तैंने यह अंगीकार किया तब भगवान् कृष्ण प्रसन्न हुए॥६॥ तब तेरे निमित्त यह मुक्ति दासी दी और यह दोनों ज्ञान वैराग्यभी दास दिये॥७॥ अपने निजरूपसे तो तू वैकुण्ठमें पोषण करती है और पृथ्वीमें भक्तोंके विशेष संतुष्टिके अर्थ
सत्यादित्रियुगे बोधवैराग्यौ मुक्तिसाधकौ॥ कलौ तु केवलं भक्तिर्ब्रह्मसायुज्यकारिणी॥४॥ इति निश्चित्य चिद्रूपः सरूपां त्वां ससर्ज ह॥ परमानंदचिन्मूर्तिः सुंदरीं कृष्णवल्लभाम्॥५॥ वद्धांजलिं त्वया पृष्टं किं करोमीति चैकदा॥ त्वां तदाज्ञापयत्कृष्णो मद्भक्तान्योपयेति च॥६॥ अंगीकृतं त्वया तद्वै प्रसन्नोऽभूद्धरिस्तदा॥ मुक्तिं दासीं ददौ तुभ्यं ज्ञानवैराग्यकाविमौ॥७॥ पोषणं स्वेन रूपेण वैकुंठे त्वं करोषि च॥ भूमौ भक्तिविपोषाय छायारूपं त्वया कृतम्॥८॥ मुक्तिं ज्ञानं विरक्तिं च सह कृत्वा गता भुवि॥ कृतादिद्वापरस्यान्तं महानन्देन संस्थिता॥९॥ कलौ मुक्तिः क्षयं प्राप्ता पाखंडामयपीडिता॥ त्वदाज्ञया गता शीघ्रं वैकुंठं पुनरेव सा॥१०॥ स्मृता त्वयापि चात्रैव मुक्तिरायाति याति च॥ पुत्रीकृत्य त्वयेमौ च पार्श्वे स्वस्यैव रक्षिता॥११॥ उपेक्षातः कलौ मंदौवृद्धौ जातौ सुतौ तव॥ तथापि चिंतां मुंच त्वमुपायं चिंतयाम्यहम्॥१२॥
तैंने छायारूप किया है॥८॥ मुक्ति और ज्ञान वैराग्यके साथ लेकर तुम पृथ्वीमें आई और सत्ययुगसे लेकर द्वापरके अन्ततक तुम बडे आनंदसे पृथ्वीमें रही॥९॥ कलियुगमें पाखण्डसे पीडित होनेसे क्षयको प्राप्त होगई तुम्हारी आज्ञासे फिर वोह शीघ्र वैकुण्ठको गई॥१०॥ और फिर तेरे स्मरणमात्रसेही इस स्थानमें फिर आजाती है और तैंने यह पुत्र करके अपने निकट रक्खे हैं॥११॥ कलियुगमें यद्यपि त्यागसे यह मंद बूढे तेरे पुत्र होगये हैं तोभी चिन्ता त्यागनकर इसका मैं उपाय शोचताहूॅ॥१२॥
हे सुमुखी! कलियुगके समान कोईभी युग नहीं है तिसमें तुझे मैं घरघर प्रत्येक मनुष्यमें स्थापन करूंगा॥१३॥ और धर्मोंका तिरस्कार कर और महोत्सवोंको आगे करके जो मैं लोकमें तुझे प्रवृत्त न करूं तो हरिका दास नहीं॥१४॥ जो इस कलियुगमें तुझसे युक्त जीव होंगे यदि वे पापीभी हों तोभी कृष्णके मंदिरमें जायँगे॥१५॥ जिनके हृदयमें सर्वदा प्रेमरूपिणी भक्ति वास करेगी वे उज्ज्वलमूर्त्तिहोजायँगे कभी यमका दर्शन नहीं करैंगे॥१६॥ भक्तियुक्त मनवाले महात्माओंको प्रेत, पिशाच, राक्षस, असुर कोईभी स्पर्श नहीं करसकैंगे॥१७॥ तप,
कलिना सदृशः कोपि युगो नास्ति वरानने॥ तस्मिंस्त्वां स्थापयिष्यामि गेहेगेहे जनेजने॥१३॥ अन्यधर्मांस्तिरस्कृत्य पुरस्कृत्य महोत्सवान्॥ तदा नाहं हरेर्दासो लोके त्वां न प्रवर्तये॥१४॥ तदन्विताश्च ये जीवा भविष्यन्ति कलाविह॥ पापिनोऽपि गमिष्यंति निर्भयाः कृष्णमंदिरम्॥१५॥ येषां चित्ते वसेद्भक्तिः सर्वदा प्रेमरूपिणी॥ न ते पश्यंति कीनाशं स्वप्नेऽप्यमलमूर्तयः॥१६॥ न प्रेतो न पिशाचो वा राक्षसो वाऽसुरोऽपि वा॥ भक्तियुक्तमनस्कानां स्पर्शने न प्रभुर्भवेत्॥१७॥ न तपोभिर्न वेदैश्च न ज्ञानेनापि कर्मणा॥ हरिर्हि साध्यते भक्त्या प्रमाणं तत्र गोपिकाः॥१८॥ नृणां जन्मसहस्रेण भक्तौ प्रीतिर्हि जायते॥ कलौ भक्तिः कलौ भक्तिर्भक्त्या कृष्णः पुरः स्थितः॥१९॥ भक्तिद्रोहकरा ये च ते सीदंति जगत्रये॥ दुर्वासा दुःखमापन्नः पुरा भक्तिविनिंदकः॥२०॥ अलं व्रतैरलं तीर्थैरलं योगैरलं मखैः॥ अलं ज्ञानकथालापैर्भक्तिरेकैव मुक्तिदा॥२१॥
वेद और ज्ञानभी हरिको ऐसा वशमें नहीं करसके जैसा कि, भक्ति वश करदेती है इसमें गोपियें प्रमाण हैं॥१८॥ हजार जन्मके अनुष्ठानसे मनुष्यकी भक्तिमें प्रीति होती है कलियुगमें भक्तिसेही कृष्ण आगे स्थित होते हैं॥१९॥ जो भक्तिद्रोह करते हैं वोह त्रिलोकीमें दुःखी होते हैं आगे भक्तिकी निंदा करनेसे दुर्वासा बडे दुःखी हुएथे॥२०॥ व्रत, तीर्थ, योग, यज्ञ, ज्ञानकथालापसे क्या है? एक भक्तिही मुक्ति देनेवाली है॥२१॥
सूतजी बोले — इसप्रकार नारदजीसे कहेहुए अपने माहात्म्यको सुनकर भक्ति सर्वांगपुष्टिसंयुक्त हो नारदजी से बोली॥२२॥ भक्ति बोली — अहो नारदजी! तुमको धन्य है, तुममें मेरी दृढ प्रीति है सो मैं कभी नहीं त्यागन करूंगी सदैव चित्तमें धारण किये रहूंगी॥२३॥ हे महात्मन्! तुमने कृपापूर्वक मेरी सब बाधा क्षणमात्रमें दूर करदी परन्तु अभीतक इन मेरे पुत्रोंको चेतना नहीं हुई सो इन्हें जगाओ जगाओ॥२४॥ सूतजी बोले, दयालु नारदजी भक्तिके वचन सुनकर हाथसे सहरातेहुए उन दोनोंको जगाने लगे॥२५॥ कानके धोरे मुखकरके नारदजीने ऊँचे स्वरसे पुकारा — ज्ञान!
॥सूत उवाच॥ ॥इति नारदनिर्णीतं स्वमाहात्म्यं निशम्य सा॥ सर्वांगपुष्टिसंयुक्ता नारदं वाक्यमब्रवीत्॥२२॥ श्रीभक्तिरुवाच॥ अहो नारद धन्योऽसि प्रीतिस्ते मयि निश्चला॥ न कदाचिद्विमुंचामि चित्ते स्थास्यामि सर्वदा॥२३॥ कृपालुना त्वया साधो मद्बाधा ध्वंसिता क्षणात्॥ पुत्रयोश्चेतना नास्ति ततो बोधयबोधय॥२४॥ सूत उवाच॥ तस्या वचः समाकर्ण्य कारुण्यं नारदो गतः॥ तयोर्बोधनमारेभे कराग्रेण विमर्दयन्॥२५॥ मुखं संयोज्य कर्णांते शब्दमुच्चैः समुच्चरन्॥ ज्ञानं प्रबुध्यतां शीघ्रं रे वैराग्यं प्रबुध्यताम्॥२६॥ वेदवेदांतघोषैश्च गीतापाठैर्मुहुर्मुहुः॥ बोध्यमानौ तदा तेन कथंचिच्चोत्थितौ बलात्॥२७॥ नेत्रैरनवलोकंतौ जृंभंतौ सालसावुभौ॥ बकवत्पलितौ प्रायः शुष्ककाष्ठसमांगकौ॥२८॥ क्षुत्क्षामौ तौ निरीक्ष्यैव पुनः स्वापपरायणौ॥ ऋषिश्चिंतापरो जातः किं विधेयं मयेति च॥२९॥ अहो निद्रा कथं याति वृद्धत्वं च महत्तरम्॥ चिंतयन्निति गोविन्दं स्मरयामास भार्गव॥३०॥
शीघ्र जागो रे वैराग्य! शीघ्र जागो॥२६॥ वेदवेदान्तके शब्द और वारंवार गीताके पाठ करके जब नारदजीने जगाया तो बलपूर्वक वे बडी कठिनाई से उठे॥२७॥ नेत्र
मीचे बडे आलसमें जॅभाई लेने लगे बगलेकी नाईं श्वेत बाल होरहे सूखे काष्ठकी नाईं शरीर था॥२८॥ भूखके मारे क्षीण होनेके कारण वे फिर सोगये तब नारदजीको बडी चिन्ता हुई क्या करूं॥२९॥ अहो! इन वृद्धोंकी बडी निद्रा कैसे जायगी? इसप्रकार विचार करते करते नारदजी गोविंद भगवान् कास्मरण करनेलगे॥३०॥
तब आकाशवाणी हुई तपोधन! खेद मत करो तुम्हारा उद्यम सफल होगा इसमें कुछ सन्देह नहीं है॥३१॥ इसके निमित्त देवऋषि!तुम सत्कर्मका प्रारम्भ करो और साधुओंके भूषण महात्मा वे सत्कर्म तुमसे कहैंगे॥३२॥ सत्कर्मके करनेमात्रसेही इन दोनोंकी निद्रासहित वृद्धता जाती रहैगी और सब जगह भक्तिका प्रकाश होगा॥३३॥ यह आकाशवाणी उन सवोंने स्पष्ट सुनी नारदजीने कही यह क्या बात है मैंने नहीं जानी तब बडे आश्चर्यको प्राप्त हुए॥३४॥ नारदजी बोले, इस आकाशवाणीनेभी गुप्तरूपसे कहा है सो वोह क्या साधन है जिससे इन दोनोंका कार्य हो॥३५॥
व्योमवाणी तदैवाभून्मा ऋषे खिद्यतामिति॥ उद्यमः सफलस्ते तु भविष्यति न संशयः॥३१॥ एतदर्थं तु सत्कर्म सुरर्षे त्वं समाचर॥ तत्ते कर्माभिधास्यंति साधवः साधुभूषणाः॥३२॥ सत्कर्मणि कृते तस्मिन्सनिद्रा वृद्धताऽनयोः॥ गमिष्यति क्षणाद्भक्तिः सर्वतः प्रसरिष्यति॥३३॥ इत्याकाशवचः स्पष्टं तत्सर्वैरपि विश्रुतम्॥ नारदो विस्मयं लेभे नेदं ज्ञातमिति ब्रुवन्॥३४॥ नारद उवाच॥ ॥अनयाऽऽकाशवाण्याऽपि गोप्यत्वेन निरूपितम्॥ किं वा तत्साधनं कार्यं येन कार्यं भवेत्तयोः॥३५॥ क्वभविष्यंति संतस्ते कथं दास्यंति साधनम्॥ मयात्र किं प्रकर्तव्यं तदुक्तं व्योमभाषया॥३६॥सूत उवाच॥ तत्र तावपि संस्थाप्य निर्गतो नारदो मुनिः॥ तीर्थं तीर्थं विनिष्क्रम्य पृच्छन्मार्गे मुनीश्वरान्॥३७॥ वृत्तांतः श्रूयते सर्वैः किंचिन्निश्चित्य नोच्यते॥ असाध्यं केचन प्रोचुर्द्धर्ज्ञेयमिति चापरे॥३८॥ मूकीभूतास्तथाऽन्ये तु कियंतस्तु पलायिताः॥ हाहाकारो महानासीत्त्रैलोक्ये विस्मयावहः॥३९॥
वोह सन्त कहाॅहोंगे और साधन किसप्रकार देंगे और जो आकाशवाणीने कहा है मैं उसे किस प्रकार करूं॥३६॥ सूतजी बोले, नारदजी भक्तिज्ञान वैराग्यको तहांही ठहराकर आप वहांसे चले तीर्थोंमें होतेहुए मुनियोंसे पूछते हुए॥३७॥ सबने वृतान्त सुना परन्तु किसीने निश्चय करके न बताया कोई बोले असाध्य है कोई बोले समझ में नहीं आता॥३८॥ कोई चुप होगये कोई सुनतेही चलदिये इसप्रकार त्रिलोकीमें विस्मय दायक बडा हाहाकार हुआ॥३९॥
जब कि, वेदान्त और वारंवार गीताके पाठसेभी भक्ति ज्ञान वैराग्यका त्रिक (तिगड्डा) न उठा तो॥४०॥ और उपाय कछु नही है यह वार्ता मनुष्य कानों कानोंमें कहनेलगे भाई योगिराज! नारदजीके भी तो बुद्धिमें यह बात न आई॥४१॥ तो और इतर मनुष्य इसे किसप्रकार कहसकते हैं? इसप्रकार ऋषियोंने दुर्गम वार्ता निर्णय करके कही॥४२॥ तब नारदजी चिन्तातुर होकर बदरीवनमें आये और यह निश्चय किया कि, यहां तप करूंगा॥४३॥ तबतक आगे सनकादिमुनियोंको जिनकी करोड सूर्यके समान कान्ति है देखकर मुनिश्रेष्ठ नारदजी
वेदवेदांतघोषैश्च गीतापाठैर्विबोधितम्॥ भक्तिज्ञानविरागाणां नोदतिष्ठत्त्रिकं यदा॥४०॥ उपायो नापरोऽस्तीति कर्णे कर्णेऽजपञ्जनाः॥ योगिना नारदेनापि स्वयं न ज्ञायते तु यत्॥४१॥ तत्कथं शक्यते वक्तुमितरैरिह मानुषैः॥ एवं ऋषिगणैः पृष्टं निर्णीयोक्तं दुरासदम्॥४२॥ ततश्चिंतातुरः सोऽथ बदरीवनमागतः॥ तपश्चरामि चात्रेति तदर्थं कृतनिश्चयः॥४३॥ तावद्ददर्श पुरतः सनकादीन्मुनीश्वरान्॥ कोटिसूर्यसमाभासानुवाच मुनिसत्तमः॥४४॥ ॥नारद उवाच॥ इदानीं भूरिभाग्येन भवद्भिः संगमः स्थितः॥ कुमारा ब्रुवतां शीघ्रं कृपां कृत्वा ममोपरि॥४५॥ भवंतो योगिनः सर्वे बुद्धिमंतो बहुश्रुताः॥ पंचहायनसंयुक्ताः पूर्वेषामपि पूर्वजाः॥४६॥ सदा वैकुंठनिलया हरिकीर्तनतत्पराः॥ लीलामृतरसोन्मत्ताः कथामात्रैकजीविनः॥४७॥ हरिः शरणमेवं हि नित्यं येषां मुखे वचः॥ अतः कालसमादिष्टा जरा युष्मान्न बाधते॥४८॥
बोले॥४४॥ नारदजी कहने लगे इस समय बडे भाग्य से आपका दर्शन हुआ है हे कुमारो!मेरे ऊपर कृपा करके शीघ्र कहो॥४५॥ तुम सब बुद्धिमान् शास्त्रवेत्ता योगी हो सदा पांच वर्षके रहते और सबसे पूर्व उत्पन्न हुये हो॥४६॥ सदा वैकुंठमें रहते भगवान्के गुणानुवाद गाते हो भगवान् केलीलारूपी अमृतरससे मत्त एक कथामात्रसेही जीते हो॥४७॥ “हरिः शरणम्"अर्थात् परमात्माकी शरण हूं यही जिनके मुखसे नित्य वचन निकलता है इस कारण कालसे प्राप्त जरा तुमको बाधा नहीं करती॥४८॥
पहले नारायणके दो द्वारपाल जिनके भ्रूभंगमात्रसेही पृथ्वीमें गिरे और फिर जिनकी कृपासे शीघ्र वैकुंठको गये॥४९॥ वोही बडाही भाग्य है जो आपका दर्शन प्राप्त हुआ है आप दयालुओंको मुझ दीनके ऊपर दया करनी योग्य है॥५०॥ जो कुछ आकाशवाणीने कहा है सो क्या साधन है यह आप बताइये और कैसे अनुष्ठान करना चाहिये सो आप विस्तारपूर्वक कहो॥५१॥ भक्ति ज्ञान वैराग्यको किसप्रकारसे सुख की प्राप्ति होगी और सब वर्णोंमें प्रेमपूर्वक यत्नसे उनका कैसे स्थापन होगा॥५२॥ कुमार बोले, देवर्षे!चिंता मत करो मनमें प्रसन्न हो इसका उपाय सुखसाध्य पूर्वकालसेही
येषां भ्रूभंगमात्रेण द्वारपालौ हरेः पुरा॥ भूमौ निपतितौ सद्यो यत्कृपातः परं गतौ॥४९॥ अहो भाग्यस्य योगेन दर्शनं भवतामिह॥ अनुग्रहस्तु कर्तव्यो मयि दीने दयापरैः॥५०॥ अशरीरगिरोक्तं यत्तत्किं साधनमुच्यताम्॥ अनुष्ठेयं कथं तावत्प्रब्रुवंतु सविस्तरम्॥५१॥ भक्तिज्ञानविरागाणां सुखमुत्पद्यते कथम्॥ स्थापनं सर्ववर्णेषु प्रेमपूर्वंप्रयत्नतः॥५२॥ कुमारा ऊचुः॥ मा चिंतां कुरु देवर्षे हर्षं चित्ते समावह॥ उपायः सुखसाध्योऽत्र वर्तते पूर्व एव हि॥५३॥ अहो नारद धन्योऽसि विरक्तानां शिरोमणिः॥ सदा श्रीकृष्णदासानामग्रणीर्योगभास्करः॥५४॥ त्वयि चित्रं न मंतव्यं भक्त्यर्थमनुवर्तिनि॥ घटते कृष्णदासस्य भक्तेः स्थापनता सदा॥५५॥ ऋषिभिर्बहवो लोके पंथानः प्रकटीकृताः॥ श्रमसाध्याश्च ते सर्वे प्रायः स्वर्गफलप्रदाः॥५६॥ वैकुंठसाधकः पंथाः स तु गोप्यो हि वर्तते॥ तस्योपदेष्टा पुरुषः प्रायो भाग्येन लभ्यते॥५७॥
है॥५३॥ अहो नारदजी!धन्य हो तुम विरक्तोंके शिरोमणि हो सदा श्रीकृष्णके दासोंमें तुम अग्रणी हो योगके सूर्य हो॥५४॥ भक्तिके निमित्त श्रम करना यह तुममें कुछ विचित्र वार्ता नहीं है श्रीकृष्णदासोंको तो सदा भक्तिकी स्थापना करनी योग्यही है॥५५॥ ऋषियोंने लोकमें बहुतसे मार्ग प्रगट कियेहैं वे सब श्रमसाध्य हैं और प्रायः सब स्वर्गफलके देनेहारे हैं॥५६॥ परन्तु जो वैकुंठसाधक पंथ है वोह गुप्तही है उसके उपदेश करने वाले पुरुष भाग्यसेही प्राप्त होते हैं॥५७॥
जो पूर्व आकाशवाणीने तुमको सत्कर्मका उपदेश दिया है सो स्थिरचित्तसे प्रसन्न होकर सुनो हम कहते हैं॥५८॥ द्रव्ययज्ञ, तपयज्ञ, योगयज्ञ, स्वाध्याययज्ञ (वेदका पढना), ज्ञानयज्ञ यह सर्व कर्म फलसे स्वर्गादिके देनेहारे हैं॥५९॥ परन्तु सत्कर्मका जतानेहारा पंडितोंने ज्ञानयज्ञ कहा है वोह श्रीमद्भागवतका आलाप जो शुकादिमहात्माओंने गाया है॥६०॥ उसके शब्दसे भक्ति ज्ञान वैराग्यका बड़ा बल बढेगा दोनोंका कष्ट दूर होगा भक्तिको सुख मिलैगा॥६१॥ श्रीमद्भागवतकी ध्वनिसे यह सब कलिके दोष इसप्रकार नाश होजायॅगे जैसे कि, सिंहके शब्दसे
सत्कर्म तव निर्दिष्टं व्योमवाचा तु यत्पुरा॥ तदुच्यते शृणुष्वाद्य स्थिरचित्तः प्रसन्नधीः॥५८॥ द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथाऽपरे॥ स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च ते तु कर्मविसूचकाः॥५९॥ सत्कर्मसूचको नूनं ज्ञानयज्ञः स्मृतो बुधैः॥ श्रीमद्भागवतालापः स तु गीतः शुकादिभिः॥६०॥ भक्तिज्ञानविरागाणां तद्दोषेण बलं महत्॥ व्रजिष्यति द्वयोः कष्टं सुखं भक्तेर्भविष्यति॥६१॥ प्रलयं हि गमिष्यंति श्रीमद्भागवतध्वनेः॥ कलिदोषा इमे सर्वे सिंहशब्दाद्वृका इव॥६२॥ ज्ञानवैराग्यसंयुक्ता भक्तिः प्रेमरसावहा॥ प्रतिगेहं प्रतिजनं ततः क्रीडां करिष्यति॥६३॥ नारद उवाच॥ वेदवेदांतघोषैश्च गीतापाठैः प्रबोधितम्॥ भक्तिज्ञानविरागाणां नोदतिष्ठत्त्रिकं यदा॥६४॥ श्रीमद्भागवतालापात्तत्कथं बोधमेष्यति॥ तत्कथासु तु वेदार्थः श्लोकेश्लोके पदेपदे॥६५॥ छिंदंतु संशयं ह्येतं भवतोऽमोघदर्शनाः॥ विलंबो नात्र कर्तव्यः शरणागतवत्सलाः॥६६॥
भेडिये भाग जाते हैं॥६२॥ तब ज्ञान वैराग्यसे संयुक्त प्रेमरस बहानेहारी भक्ति घर घर मनुष्य मनुष्यमें क्रीडा करेगी॥६३॥ नारदजी बोले — जब कि, वेद वेदान्तके शब्द और गीतापाठसेभी भक्ति ज्ञान वैराग्यका त्रिक नहीं उठा तो॥६४॥ श्रीमद्भागवतके आलापसे कैसे चैतन्यको प्राप्त होगा उसकी कथामें भी तो श्लोक श्लोकमें पदपदमें वेदार्थही है॥६५॥ अमोघदर्शन आप लोग यह मेरा संदेह दूर कीजिये,हे शरणागत वत्सलो! इसमें विलम्ब मत करो॥६६॥
कुमार बोले — वेदोपनिषद् के सारसे भागवत कथा हुई, तिससे पृथग्भूत हुई, फलोन्नति औरभी अतिउत्तम होगई है॥६७॥ जैसे मूलसे लेकर अग्रभागपर्य्यन्त रसवाली चीज बाहरसे उतना स्वादिष्ट नहीं लगती जितना कि, वोही रस पृथक् फलमें होकर विश्वमनोहररूप होता है॥६८॥ जैसे दूधमें स्थित घी ऐसा स्वादिष्ठनहीं होता जैसा कि, पृथक् होकर वोह स्वादिष्ठदेवताओंका रसवर्द्धक होता है॥६९॥ जैसे बूरा गन्नेमें सर्वत्र व्याप्त रहती है परन्तु वोह पृथग्भूत होकर जैसी मीठी लगती है तैसी भागवतकथा है॥७०॥ यह सर्व वेदसम्मत भागवत पुराण ज्ञान वैरा
कुमारा ऊचुः॥ वेदोपनिषदां साराज्जाता भागवती कथा॥ अत्युत्तमा ततो भाति पृथग्भूता फलोन्नतिः॥६७॥ आमूलाग्रं रसस्तिष्ठन्नास्ते न स्वदते यथा॥ संभूय स पृथग्भूतः फले विश्वमनोहरः॥६८॥ यथा दुग्धे स्थितं सर्पिर्न स्वादायोपकल्पते॥ पृथग्भूतं हि तद्दिव्यं देवानां रसवर्धनम्॥६९॥ इक्षूणामपि मध्यांतं शर्करा व्याप्य तिष्ठति॥ पृथग्भूता च सा मिष्टा तथा भागवती कथा॥७०॥ इदं भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसंमितम्॥ भक्तिज्ञानविरागाणां स्थापनाय प्रकाशितम्॥७१॥ वेदांतवेदसुस्नाते गीताया अपि कर्तरि॥ परितापवति व्यासे मुह्यत्यज्ञानसागरे॥७२॥ तदा त्वया पुरा प्रोक्तं चतुःश्लोकसमन्वितम्॥ तदीयश्रवणात्सद्यो निर्बाधो बादरायणः॥७३॥ तत्र ते विस्मयः केन यतः प्रश्नकरो भवान्॥ श्रीमद्भागवतश्रावे शोकदुःखविनाशनम्॥७४॥
ग्यके स्थापन करनेहीको प्रकाश किया है॥७१॥ वेद वेदान्तके पारगामी गीताके कर्त्ता दुःखको प्राप्त होतेहुए अज्ञानसागरमें मोहित व्यासजीसे॥७२॥ जो तुमने पहले चतुःश्लोकी भागवत कही जिसके श्रवणमात्रसे तत्काल व्यासजी दुःखरहित होगये॥७३॥ फिर तुमैं इसमें विस्मय कैसे प्राप्त हुआ जो तुम प्रश्न करते हो श्रीमद्भागवत जो शोक दुःखका नाशक है सो सुनाओ॥७४॥
नारद बोले — जिसका दर्शन तत्काल अशुभोंको दूरकर संसारी दुःखसे दुःखियोंका कल्याण करता है, सम्पूर्ण शेषजीके मुखोंसे गाईहुई कथाका पान करनेवालेके प्रेमसे प्रकाश करनेवाले भगवान् कीमैं शरण हूं॥७५॥ जब बहुत जन्मके भाग्य उदय होनेसे मनुष्योंको सत्संगकी प्राप्ति होतीहै तब अज्ञानकृत मोह मदके अन्धकारका नाश होकर ज्ञान उदय होता है॥७६॥ इति श्रीपद्मपुराणे उत्तरखण्डे श्रीभागवतमाहात्म्ये भाषाटीकायां कुमारनारदसंवादो नाम द्वितीयोध्यायः॥२॥ नारदजी बोले — यत्नपूर्वक भक्ति ज्ञानके स्थापनके निमित्त मैं शुकशास्त्रकी कथाका उज्ज्वल ज्ञानयज्ञ
नारद उवाच॥ यद्दर्शनंं च विनिहंत्यशुभानि सद्यः श्रेयस्तनोति भवदुःखदवार्दितानाम्॥ निश्शेषशेषमुखगीतकथैकपानाः प्रेमप्रकाशकृतये शरणं गतोऽस्मि॥७५॥ भाग्योदयेन बहुजन्मसमार्जितेन सत्संगमं च लभते पुरुषो यदा वै॥ अज्ञानहेतुकृतमोहमदांधकारनाशं विधाय हि तदोदयते विवेकः॥७६॥ इति श्रीपद्मपुराणे उत्तरखंडे श्रीभागवतमाहात्म्ये कुमारनारदसंवादो नाम द्वितीयोऽध्यायः॥२॥ ॥नारदउवाच॥ ज्ञानयज्ञं करिष्यामि शुकशास्त्रकथोज्ज्वलम्॥ भक्तिज्ञानविरागाणां स्थापनार्थं प्रयत्नतः॥१॥ यत्र कार्यो महायज्ञः स्थलं तद्वाच्यतामिह॥ महिमा शुकशास्त्रस्य वक्तव्यो वेदपारगैः॥२॥ कियद्भिर्दिवसैः श्राव्या श्रीमद्भागवती कथा॥ को विधिस्तत्र कर्तव्यो ममेदं ब्रुवतामितः॥३॥ कुमारा ऊचुः॥ शृणु नारद वक्ष्यामो विनम्राय विवेकिने॥ गंगाद्वारसमीपे तु तटमानंदनामकम्॥४॥ नानाऋषिगणैर्जुष्टं देवसिद्धनिषेवितम्॥ नानातरुलताकीर्णं नवकोमलवालुकम्॥५॥
करूंगा॥१॥ जहां यह महायज्ञ कियाजाय आप उस स्थानको बताइये वेदके जाननेवालोंमें शुकशास्त्रकी महिमा कहने योग्य है॥२॥ यह श्रीमद्भागवतकी कथा कितने दिनतक सुननी योग्य है और उसमें क्या विधान है सो मुझसे आप कहिये॥३॥ कुमार बोले — हे नारदजी! सुनो हम कहते हैं नम्रीभूत ज्ञानयुक्त गंगाद्वारके समीपही आनन्द नाम तट है॥४॥ अनेक ऋषिगणोंसे युक्त देवता सिद्धोंसे सेवित अनेक वृक्ष बेलोंसे संघटित नवीन कोमल वालुकासे युक्त॥५॥
बडा मनोहर एकान्त स्थान सुवर्णके आकारवाले कमलोंकी सुगन्धिसे युक्त जिसके समीपके रहनेवाले जीवोंके मनमें वैर नहीं होता॥६॥ उस स्थान में तुमको अप्रयत्न होकर ज्ञानयज्ञ करना चाहिये और तहाँही अपूर्व और रसरूपवाली कथा होगी॥७॥ और निर्बल जरासे जर्जरित देह वे ज्ञान वैराग्यको भक्तिसहित आगे करके तहाँ हमभी जाॅयगे॥८॥ जहाँ भागवतकी कथा होती है तहां भक्ति आदिक सब जायँ कथाशब्दश्रवणमात्रसे भक्ति ज्ञान वैराग्यका त्रिक तरुणतायुक्त होता है॥९॥ सूतजी बोले कि, इसप्रकार कहकर कुमार नारदजी
रम्यमेकांतदेशस्थं हैमपद्मसुशोभितम्॥ यत्समीपस्थजीवानां वैरं चेतसि न स्थितम्॥६॥ ज्ञानयज्ञस्त्वया तत्र कर्तव्यो ह्यप्रयत्नतः॥ अपूर्वा रसरूपा च कथा तत्र भविष्यति॥७॥ पुरःस्थं निर्बलं चैव जराजीर्णकलेवरम्॥ तद्द्वयं च पुरस्कृत्य भक्तिस्तत्र गमिष्यति॥८॥ यत्र भागवती वार्ता तत्र भक्त्यादिकं व्रजेत्॥ कथाशब्दं समाकर्ण्य तत्त्रिकं तरुणायते॥९॥ सूत उवाच॥ एवमुक्त्वा कुमारास्ते नारदेन समं ततः॥ गंगातटं समाजग्मुः कथापानाय सत्वराः॥१०॥ यदा यातास्तटं ते तु तदा कोलाहलोऽप्यभूत्॥ भूर्लोके देवलोके च ब्रह्मलोके तथैव च॥११॥ श्रीभागवतपीयूषपानाय रसलंपटाः॥ धावंतोप्याऽऽययुः सर्वे प्रथमं ये च वैष्णवाः॥१२॥ भृगुर्वसिष्ठश्च्यवनश्च गौतमो मेधातिथिर्देवलदेवरातौ॥ रामस्तथा गाधिसुतश्च शाकलो मृकंडुपुत्रोऽत्रिजपिप्पलादाः॥१३॥
के साथहीकथाके पान करनेको शीघ्र गंगातटमें आये॥१०॥ जब वे उस तटपर आये तब बडा कोलाहल हुआ भूलोकमें, देवलोकमें और इसीप्रकार ब्रह्मलोकमें भी कोलाहल हुआ॥११॥ श्रीमद्भागवतरूपी अमृतके पान करनेको प्रथम तो जो वैष्णव थे वे चारों ओरसे दौडे॥१२॥ भृगु, वसिष्ठ, च्यवन, गौतम, मेधातिथि, देवल, देवरात, परशुरामजी, विश्वामित्र, शाकल, मृकण्डुके पुत्र मार्कण्डेय, अत्रिके पुत्र दत्तात्रेय, पिप्पलाद,॥१३॥
योगीश्वर याज्ञवल्क्य,
जैगीपव्य, व्यास, पराशर, छायाशुक, जाजलि, जह्नुये मुख्य मुख्य ऋषिगण अपने पुत्र शिष्य स्त्रीसहित प्रणयपूर्वक आये॥१४॥ वेदान्त वेद मंत्र तंत्र अपनी मूर्ति धारणकर आये, इसीप्रकार सत्रह पुराण छः शास्त्रभी आये॥१५॥ गंगादि नदियें, पुष्करादि सरोवर, सब क्षेत्र दिशा और दंडकादिवन॥१६॥ पर्वत आदि सब आये और जो देवता गंधर्व दानव शरीरके गौरवसे नहीं आये उन्हें मानपूर्वक ब्रह्माके पुत्र भृगुजी बुलालाये॥१७॥ तब नारदसे दीक्षित हो दियेहुए उत्तम आसनपर कृष्णकथामें तत्पर सबसे नमस्कृत हो कुमार बैठे॥१८॥ वैष्णव विरक्त
योगीश्वरौ व्यासपराशरौ च च्छायाशुको जाजलिजह्नुमुख्याः॥ सर्वेप्यमी मुनिगणाः सहपुत्रशिष्याः स्वस्त्रीभिराययुरतिप्रणयेन युक्ताः॥१४॥ ॥वेदांतानि च वेदाश्च मंत्रास्तंत्राः समूर्तयः॥ दश सप्त पुराणानि षट् शास्त्राणि तथाऽऽययुः॥१५॥ गंगाद्याः सरितस्तत्र पुष्करादिसरांसि च॥ क्षेत्राणि च दिशः सर्वा दंडकादिवनानि च॥१६॥ नगादयो ययुस्तत्र देवगंधर्वकिन्नराः॥ गुरुत्वात्तत्र नायातान्भृगुः संबोध्य चानयत्॥१७॥ दीक्षिता नारदेनाथ दत्तमासनमुत्तमम्॥ कुमारा वंदिताः सर्वैर्निषेदुः कृष्णतत्पराः॥१८॥ वैष्णवाश्च विरक्ताश्च न्यासिनो ब्रह्मचारिणः॥ मुख्यभागे स्थितास्ते च तदग्रे नारदः स्थितः॥१९॥ एकभागे ऋषिगणास्तदन्यत्र दिवौकसः॥ वेदोपनिषदोऽन्यत्र तीर्थोऽन्यत्र स्त्रियोन्यतः॥२०॥ जयशब्दो नमश्शब्दः शंखशब्दस्तथैव च॥ चूर्णलाजाप्रसूनानां निक्षेपः सुमहानभूत्॥२१॥ विमानानि समारुह्य कियंतो देवनायकाः॥ कल्पवृक्षप्रसूनानि सर्वे तत्र समाकिरन्॥२२॥
संन्यासी ब्रह्मचारी यह मुख्य भागमें स्थित हुए, सबके आगे नारदजी बैठे॥१९॥ एक भागमें ऋषिगण एक भागमें देवता एक स्थानमें वेद उपनिषद एक स्थानमें तीर्थ और एक स्थानमें स्त्रियें बैठीं॥२०॥ तब जयशब्द नमःशब्द और शंखोंका शब्द होनेलगा और चूर्ण खीलैंफूलोंकी बड़ी वर्षा हुई॥२१॥ कितने तो देवनायक विमानोंमें चढे आकाशसे फूलोंकी वर्षा करने लगे॥२२॥
सुतजी बोले — इसप्रकार सबके एकचित्त होकर बैठनेमें नारदजीके निमित्त कुमारने भागवतमाहात्म्य कहना प्रारंभ किया॥२३॥ कुमार बोले शुकशास्त्रसे उत्पन्न हुई महिमाको मैं तुमसे कहूंगा जिसके श्रवणमात्रसे हाथमें मुक्ति प्राप्त होती है॥२४॥ यह श्रीमद्भागवतकी कथा सदा सेवनीय है जिसके श्रवणमात्रसे श्रीकृष्ण चित्तमें प्राप्त होते हैं॥२५॥ इस ग्रन्थमें अठारह सहस्र श्लोक और द्वादश स्कंध हैं यह परीक्षित् और शुकदेवजीके संवादवाली भागवत सुनो॥२६॥ पुरुष अज्ञानसे तबतक इस संसारचक्रमें भ्रमता है जबतक शुकशास्त्रकी कथा
सूत उवाच॥एवं तेष्येकचित्तेषु श्रीमद्भागवतस्य च॥ महात्म्यमूचिरे स्पष्टं नारदाय महात्मने॥२३॥ कुमारा ऊचुः॥ अथ ते संप्रवक्ष्यामो महत्त्वं शुकशास्त्रजम्॥ यस्य श्रवणमात्रेण मुक्तिः करतले स्थिता॥२४॥ सदा सेव्या सदा सेव्या श्रीमद्भागवती कथा॥ यस्याः श्रवणमात्रेण हरिश्चित्तं समाश्रयेत्॥२५॥ ग्रंथोऽष्टादशसाहस्रो द्वादशस्कंधसंमितः॥ परीक्षिच्छुकसंवादः शृणु भागवतं च तत्॥२६॥ तावत्संसारचक्रेऽस्मिन्भ्रमतेऽज्ञानतः पुमान्॥ यावत्कर्णगता नास्ति शुकशास्त्रकथा क्षणम्॥२७॥ किं श्रुतैर्बहुभिः शास्त्रैः पुराणैश्च भ्रमावहैः॥ एकं भागवतं शास्त्रं मुक्तिदानेन गर्जति॥२८॥ कथा भागवतस्यापि नित्यं भवति यद्गृहे॥ तद्गृहंतीर्थरूपं हि वसतां पापनाशनम्॥२९॥ अश्वमेधसहस्राणि वाजपेयशतानि च॥ शुकशास्त्रकथायाश्च कलां नार्हंति षोडशीम्॥३०॥ तावत्पापानि देहेऽस्मिन्निवसंति तपोधनाः॥ यावन्न श्रूयते सम्यक्छ्रीमद्भागवतं नरैः॥३१॥ न गंगा न गया काशी पुष्करं न प्रयागकम्॥ शुकशास्त्रकथायाश्च फलेन समतां नयेत्॥३२॥
क्षणमात्र कर्णगोचर नहीं होती॥२७॥ बहुतसे शास्त्र और भ्रमानेहारे पुराणोंके सुनने से क्या है एक भागवतशास्त्रही मुक्तिदान करके गर्जता है॥२८॥ जिस घरमें नित्य भागवतकी कथा होती है वोह घर तीर्थरूप है वहाँ रहनेहारों के पाप नाश होजाते हैं॥२९॥ हजार अश्वमेध सौ वाजपेय शुकशास्त्रकी कथाकी सोलहवीं कलाभी नहीं है॥३०॥ हे तपोधनो! तबतकही इस देहमें पाप निवास करते हैं जबतक कि मनुष्य मन लगाकर भागवत कथा नहीं श्रवण करते हैं॥३१॥ शुकशास्त्र के फलकी बराबरी गंगा, गया, काशी, पुष्कर, प्रयागभी नहीं करसक्ते॥३२॥
जो परा गतिकी इच्छा रखते हो तो नित्यही अपने मुखसे आधा श्लोक वा एक चौथाई श्लोकही भागवतका उच्चारण किया करो॥३३॥ वेदादि ओंकार, वेदमाता गायत्री, पुरुषसूक्त, ऋक्, यजुः, साम, तीनों वेद, भागवत पुराण “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” द्वादशाक्षर मंत्र॥३४॥ द्वादशात्मा सूर्य, प्रयाग, संवत्सरात्मक काल, ब्राह्मण, अग्निहोत्र, कामधेनु, द्वादशी॥३५॥ तुलसी, वसन्त ऋतु, पुरुषोत्तम, श्रीकृष्ण इनको बुद्धिमान् तत्त्वसे पृथग्भाव नहीं देखते हैं॥३६॥ जो प्रतिदिन भागवत शास्त्रको अर्थसे बाॅचतेहैं उनके कोटि जन्मके किये पाप नष्ट होजातेहैं इसमें कुछ
श्लोकार्धं श्लोकपादं वा नित्यं भागवतोद्भवम्॥ पठस्व स्वमुखेनैव यदीच्छसि परां गतिम्॥३३॥ वेदादिर्वेदमाता च पौरुषं सूक्तमेव च॥ त्रयी भागवतं चैव द्वादशाक्षर एव च॥३४॥ द्वादशात्मा प्रयागश्च कालः संवत्सरात्मकः॥ ब्राह्मणाश्चाग्निहोत्रं च सुरभिर्द्वादशी तथा॥३५॥ तुलसी च वसंतश्च पुरुषोत्तम एव च॥ एतेषां तत्त्वतः प्राज्ञैर्न पृथग्भाव इष्यते॥३६॥ यश्च भागवतं शास्त्रं वाचयेदर्थतोऽनिशम्॥ जन्मकोटिकृतं पापं नश्यते नात्र संशयः॥३७॥ श्लोकार्धं श्लोकपादं वा पठेद्भागवतं च यः॥ नित्यं पुण्यमवाप्नोति राजसूयाश्वमेधयोः॥३८॥ उक्तं भागवतं नित्यं कृतं च हरिचिंतनम्॥ तुलसीपोषणं चैव धेनूनां सेवनं समम्॥३९॥ अंतकाले तु येनैव श्रूयते शुकशास्त्रवाक्॥ प्रीत्या तस्यैव वैकुंठं गोविंदोऽपि प्रयच्छति॥४०॥ हेमसिंहयुतं चैतद्वैष्णवाय ददाति च॥ कृष्णेन सह सायुज्यं स पुमाल्लँभते ध्रुवम्॥४१॥
संदेह नहीं॥३७॥ जो भागवतका आधा वा चौथाई श्लोक प्रतिदिन पढतेहैं उन्हैंराजसूय और अश्वमेधका फल प्राप्त होता है॥३८॥ नित्य भागवतका कथन नारायणका कीर्तन तुलसीका पोषण और धेनुओंका सेवन समान है॥३९॥ अन्तकालमें जिसने शुकशास्त्रकी वाणी श्रवण करीहै उसे श्रीव्रजराज प्रसन्न हो वैकुंठ देते हैं॥४०॥ जो कोई सुवर्णसिंहासनसहित वैष्णवके निमित्त इसे प्रदान करते हैं वोह पुरुष निश्चय श्रीकृष्णकी सायुज्य पदवीको प्राप्त होते हैं॥४१॥
जिस मूर्खने जन्मसे अन्ततक मन लगाकर शुकशास्त्रकथा नहीं पान करी उसने चंडाल और खरकी नाईं अपना जन्म वृथा खोया और उत्पन्न होकर माताको दुःख दिया॥४२॥ जिसने कभी शुककथाका कोई वचन नहीं सुना वोह पापकर्मा जीवितही मृतक है उस पशुसमान पृथ्वीपर भाररूप मनुष्यको धिक्कार है ऐसा ब्रह्मादिदेवता कहते हैं॥४३॥ श्रीमद्भागवतकी कथा संसारमें दुर्लभ है कोटिजन्मके प्राप्त हुये पुण्योंसे प्राप्त होती है॥४४॥ इस कारण हे योगनिधान बुद्धिमन्! यह कथा यत्नपूर्वक सुनने योग्य है इसमें कोई दिनोंका नियम नहीं सदा सुनै॥४५॥ सत्य
आजन्ममात्रमपि येन शठेन किंचिच्चित्रं विधाय शुकशास्त्रकथा न पीता॥ चांडालवच्च खरवद्वत तेन नीतं मिथ्या स्वजन्म जननीजनिदुःखभाजा॥४२॥ जीवच्छवो निगदितः स तु पापकर्मा येन श्रुतं शुककथावचनं न किंचित्॥ धिक्तं नरं पशुसमं भुवि भाररूपमेवं वदंति दिवि देवसरोजमुख्यः॥४३॥ दुर्लभैव कथा लोके श्रीमद्भागवतोद्भवा॥ कोटिजन्मसमुत्थेन पुण्येनैव तु लभ्यते॥४४॥ तेन योगनिधे धीमञ्छ्रोतव्या सा प्रयत्नतः॥ दिनानां नियमो नास्ति सर्वदा श्रवणं मतम्॥४५॥ सत्येन ब्रह्मचर्येण सर्वदा श्रवणं मतम्॥ अशक्यत्वात्कलौ बोध्यो विशेषोऽत्र शुकाज्ञया॥४६॥ मनोवृत्तिजयश्चैव नियमाचरणं तथा॥ दीक्षा कर्तुमशक्यत्वात्सप्ताहश्रवणं मतम्॥४७॥ श्रद्धातः श्रवणे नित्यं माघे तावद्धि यत्फलम्॥ तत्फलं शुकदेवेन सप्ताहश्रवणे कृतम्॥४८॥ मनसश्चाजयाद्रोगात्पुंसां चैवायुषः क्षयात्॥ कलेर्दोषबहुत्वाच्च सप्ताहश्रवणं मतम्॥४९॥ यत्फलं नास्ति तपसा न योगेन समाधिना॥ अनायासेन तत्सर्वं सप्ताहश्रवणाल्लभेत्॥५०॥
और ब्रह्मचर्यसहित सदा सुनै अशक्य होने से कलियुगमें शुकआज्ञासे विशेषता कही है॥४६॥ मनवृत्तियोंका जीतना नियमाचरण करना दीक्षा करनेमें अशक्य हो तो सप्ताह सुनना श्रेष्ठ है॥४७॥ नित्य श्रद्धापूर्वक श्रवण करनेसे माघमासमें जितना फल कहा है वोह फल सप्ताह श्रवण करनेसे होता है॥४८॥ मनके अजय होने रोग होने और आयुके क्षय होने और कलियुगके बहुत दोष होनेसे सप्ताह श्रवण श्रेष्ठ है॥४९॥ जो फल तप योग समाधिसे नहीं होता सो फल अनायास सप्ताह श्रवणसे होता है॥५०॥
यज्ञसे सप्ताह गर्जता है, सप्ताह व्रतसे गर्जता है, तपसे तीर्थोंसे नित्य गर्जता है॥५१॥ योग ज्ञान ध्यानसे सप्ताह गर्जता है, हम उसके गर्जनेको क्या कहैं रे रे कहकर गर्जता है अर्थात् जबतक भागवत नहीं सुनी तबतक व्रतादिक हैं इसके श्रवण करनेके अन्तरमें सब आ जाते हैं॥५२॥ शौनकजी बोले यह बडे आश्चर्यका कथानक सुनाया ज्ञान धर्मादिकोंको तिरस्कार करके अब परब्रह्मका सूचक भागवतपुराण मोक्षको देनेहारा है सो सुनाओ॥५३॥ सूतजी बोले, जब श्रीकृष्ण पृथ्वीको त्यागन करके अपने पदको जाने लगे तब एकादशमें कहे ज्ञानको सुनकर उद्धवजी बोले॥५४॥
यज्ञाद्गर्जति सप्ताहः सप्ताहो गर्जति व्रतात्॥ तपसो गर्जति प्रोच्चैस्तीर्थान्नित्यं हि गर्जति॥५१॥ योगाद्गर्जति सप्ताहो ध्यानाज्ज्ञानाच्च गर्जति॥ किं ब्रूमो गर्जनं तस्य रे रे गर्जति गर्जति॥५२॥ शौनक उवाच॥ साश्चर्यमेतत्कथितं कथानकं ज्ञानादिधर्मान्विगणय्य सांप्रतम्॥ निःश्रेयसे भागवतं पुराणं जातं कुतो योगविदादिसूचकम्॥५३॥ सूत उवाच॥ यदा कृष्णो धरां त्यक्त्वा स्वपदं गंतुमुद्यतः॥ एकादशं परिश्रुत्वाप्युद्धवो वाक्यमब्रवीत्॥५४॥ उद्धव उवाच॥ त्वं तु यास्यसि गोविन्द भक्तकार्यं विधाय च॥ मच्चित्ते महती चिंता तां श्रुत्वा सुखमावह॥५५॥ आगतोऽयं कलिर्घोरो भविष्यंति पुनः खलाः॥ तत्संगेनैव संतोऽपि गमिष्यंत्युग्रतां यदा॥५६॥ तदा भारवती भूमिर्गोरूपेयं कमाश्रयेत्॥ अन्यो न दृश्यते त्राता त्वत्तः कमललोचन॥५७॥ अतः सत्सु दयां कृत्वा भक्तवत्सल मा व्रज॥ भक्तार्थं सगुणो जातो निराकारोऽपि चिन्मयः॥५८॥
हे भगवन्! आप तो भक्तकार्यको विधान करके जातेहो अब जो मेरे मनमें बड़ी चिन्ता है उसे सुनकर मुझे समझाकर सुखी करो॥५५॥ यह घोर कलियुग आया है इसमें बड़े खल उत्पन्न होंगे उनके संगसे सन्तभी जब उग्रताको प्राप्त होंगे॥५६॥ तब यह गोरूपा भूमि भाराक्रान्त होकर किसका आश्रय करैगी? हे कमललोचन! तुम्हैंछोड कोई इसका दूसरा रक्षक नहीं है॥५७॥ इसकारण हे भक्तवत्सल! सत्पुरुषोंके ऊपर दया करके मत जाओ निराकार चिन्मय आप भक्तोंहीके कारणसे सगुण हुयेहो॥५८॥
तुम्हारे वियोगसे तुम्हारे भक्त पृथ्वीमें कैसे रहैंगे निर्गुण उपासनामें कष्ट होगा इससे कुछ विचारिये॥५९॥ ऐसे उद्धवजीके वचन सुनकर भगवान् प्रभासक्षेत्रमें विचार करने लगे भक्तोंके अवलम्बनके निमित्त मुझे क्या करना योग्य है?॥६०॥ जो अपना तेज था सो भागवतमें धरदिया अन्तर्धान होकर यह श्रीमद्भागवतरूपी समुद्रमें प्रवेश करगये॥६१॥ इसकारण यह श्रीकृष्णकी वाणीरूप प्रत्यक्ष मूर्ति है सेवन श्रवण पाठ दर्शन करनेसे पाप दूर करती है॥६२॥ इसकारण सबसे अधिक सप्ताहश्रवण कहा है और सब साधनोंका तिरस्कार करके कलियुगमें यह धर्म कहाहै॥
त्वद्वियोगेन ते भक्ताः कथं स्थास्यति भूतले॥ निर्गुणोपासने कष्टमतः किंचिद्विचारय॥५९॥ इत्युद्धववचः श्रुत्वा प्रभासेऽचिंतयद्धरिः॥ भक्ताबलंबनार्थाय किं विधेयं मयेति च॥६०॥ स्वकीयं यद्भवेत्तेजस्तच्च भागवतेऽदधात्॥ तिरोधाय प्रविष्टोयं श्रीमद्भागवतार्णवम्॥६१॥ तेनेयं वाङ्मयी मूर्तिः प्रत्यक्षा वर्तते हरेः॥ सेवनाच्छ्रवणात्पाठाद्दर्शनात्पापनाशिनी॥६२॥ सप्ताहश्रवणं तेन सर्वेभ्योप्यधिकं कृतम्॥ साधनानि तिरस्कृत्य कलौ धर्मोऽयमीरितः॥६३॥ दुःखदारिद्र्यदौर्भाग्यपादप्रक्षालनाय च॥ कामक्रोधजयार्थं हि कलौ धर्मोऽयमीरितः॥६४॥ अन्यथा वैष्णवी माया देवैरपि सुदुस्त्यजा॥ कथं त्याज्या भवेत्पुंभिः सप्ताहोऽतः प्रकीर्तितः॥६५॥ सूत उवाच॥ एवं नगाहश्रवणोरुधर्मे प्रकाश्यमाने ऋषिभिः सभायाम्॥ आश्चर्यमेकं समभूत्तदानीं तदुच्यते संशृणु शौनक त्वम्॥६६॥ भक्तिः सुतौ तौ तरुणौ गृहीत्वा प्रेमैकरूपा सहसाऽऽविरासीत्॥ श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे नाथेति नामानि मुहुर्वदंती॥६७॥
॥६३॥ दुःख दरिद्र दुर्भाग्य और पापके धोनेके निमित्त काम क्रोध के जयके निमित्त कलियुगमें यही धर्म कहा है॥६४॥ अथवा वैष्णवी माया जो देवतोंकोभी दुस्त्यज सो मनुष्योंसे कैसे त्यागन होगी इसकारण सप्ताहविधि कही है॥६५॥ सूतजी बोले — इसप्रकार सप्ताह श्रवणका बड़ा धर्म जब ऋषिने सभामें कथन किया तब एक बड़ा आश्चर्य उस समय हुआ हे शौनकजी! तुम सुनो॥६६॥ तब भक्ति अपने दोनों जवान हुए ज्ञान वैराग्योंको लेकर शीघ्र प्रेमके मारे सभामें प्रगट हुई और श्रीकृष्ण, गोविन्द, हरे, मुरारे, नाथ — यह नाम वारंवार उच्चारण करने लगी॥६७॥
उस भागवतार्थभूषण सुन्दर वेष किये सभामें आईहुई को देखने लगे और यह कैसे मुनिजनोंके मध्यमें आई इसप्रकार सब कोई तर्कना करने लगे॥६८॥ तब कुमार उस समय बोले यह इस समय कथाहीके निमित्त आई इसप्रकार वोह भक्ति ज्ञान वैराग्यसहित सुनकर बड़ी नम्र हो सनत्कुमारसे बोली॥६९॥ भक्ति बोली कि, कलियुगसे प्रनष्टभी मुझको आपने कथारस सुनाकर पुष्ट किया है अब मैं कहाॅरहूँ सो बतावो तब वे ब्रह्माके पुत्र इसप्रकार वचन बोले॥७०॥ गोविंदके समान रूप धारण करनेवाली स्नेह करनेहारी संसाररोगकी हरनेहारी बड़े धीरज
तां चागतां भागवतार्थभूषां सुचारुवेषां ददृशुः सदस्याः॥ कथं प्रविष्टा कथमागतेयं मध्यं मुनीनामिति तर्कयंतः॥६८॥ ऊचुः कुमारा वचनं तदानीं कथार्थतो निष्पतिताऽधुनेयम्॥ एवं गिरः सा ससुता निशम्य सनत्कुमारं निजगाद नम्रा॥६९॥ भक्तिरुवाच॥ भवद्भिरद्यैव कृतास्मि पुष्टा कलिप्रनष्टाऽपि कथारसेन॥ क्वाहं तु तिष्ठाम्यधुना ब्रुवंतु ब्राह्मा इदं तां गिरमूचिरे ते॥७०॥ भक्तेषु गोविंदसुरूपधर्त्रीप्रेमैककर्त्री भवरोगहंत्री॥ सा त्वं च तिष्ठस्व सुधैर्यसंश्रया निरंतरं वैष्णवमानसानि॥७१॥ ततोऽपि दोषाः कलिजा इमे त्वा द्रष्टुं न शक्ताः प्रभवोऽपि लोके॥ एवं तदाज्ञाऽवसरेऽपि भक्तिस्तदा निषण्णा हरिदासचित्ते॥७२॥ सकलभुवनमध्ये निर्धनास्तेऽपि धन्या निवसति हृदि येषां श्रीहरेर्भक्तिरेका॥ हरिरपि निजलोकं सर्वथाऽतो विहाय प्रविशति हृदि तेषां भक्तिसूत्रोपनद्धः॥७३॥
धरनेहारे वैष्णवभक्तोंके मनमें तू नित्य वासकर॥७१॥ तो यह कलियुगके दोष तुझको देखनेको समर्थ न हो इसप्रकार उनकी आज्ञा से भक्ति नारायणके भक्तोंके चित्तमें प्रवेश करगई॥७२॥ सम्पूर्ण संसारके मध्यमें वे निर्धनभी धन्य जिनके हृदयमें भक्ति निवास करती है भक्तिसूत्रसे वशीभूत हो भगवान् अपने लोकको छोड़कर उनके हृदयमें प्रवेश करते हैं॥७३॥
इस ब्रह्मरूप भागवतका पृथ्वीमें हम आपसे क्या माहात्म्य कहैं जिसके कहने सुननेसे श्रोता वक्ता कृष्णके समान विभूतिको प्राप्त करते हैं फिर और धर्मोंसे क्या है?॥७४॥ इति श्रीपद्मपुराणे उत्तरखण्डे श्रीभागवतमाहात्म्ये भाषाटीकायां भक्तिकष्टनिवर्तनं नाम तृतीयोऽध्यायः॥३॥ सूतजी बोले इसके उपरान्त वैष्णवोंके चित्तमें अलौकिक भक्ति देख भगवान् भक्तवत्सलं॥१॥ वनमाली घनश्याम पीतवस्त्रधारे मनोहर वेष किये कमरमें क्षुद्रघंटिका मोरमुकुट सुंदर कुंडल धारण किये॥२॥ त्रिभंगी छबिकिये सुंदर कौस्तुभ मणिसे विराजमान कोटि कामदेवके समान शोभायमान हरिचं
ब्रुमोऽद्य ते किमधिकं महिमानमेवं ब्रह्मात्मकस्य भुवि भागवताभिधस्य॥ यत्संश्रयान्निगदिते लभते सुवक्ता श्रोतापि कृष्णसमतामलमन्यधर्मैः॥७४॥ इति श्रीपद्मपुराणे उत्तरखंडे श्रीभागवतमाहात्म्ये भक्तिकष्टनिवर्तनं नाम तृतीयोऽध्यायः॥३॥ सूत उवाच॥ अथ वैष्णवचित्तेषु दृष्ट्वा भक्तिमलौकिकीम्॥ निजलोकं परित्यज्य भगवान्भक्तवत्सलः॥१॥ वनमाली घनश्यामः पीतवासा मनोहरः॥ कांचीकलापरुचिरोल्लसन्मुकुटकुण्डलः॥२॥ त्रिभंगललितश्चारुकौस्तुभेन विराजितः॥ कोटिमन्मथलावण्यो हरिचंदनचर्चितः॥३॥ परमानंदचिन्मूर्तिर्मधुरो मुरलीधरः॥ आविवेश स्वभक्तानां हृदयान्यमलानि च॥४॥ वैकुंठवासिनो ये च वैष्णवा उद्धवादयः॥ तत्कथाश्रवणार्थं ते गूढरूपेण संस्थिताः॥५॥ तदा जयजयारावो रसपुष्टिरलौकिकी॥ चूर्णप्रसूनदृष्टिश्च मुहुः शंखरवोऽप्यभूत्॥६॥ तत्सभासंस्थितानां च देहगेहात्मविस्मृतिः॥ दृष्ट्वा च तन्मयावस्थां नारदो वाक्यमब्रवीत्॥७॥ अलौकिकोऽयं महिमा मुनीश्वराः सप्ताह जन्योऽद्य विलोकितो मया॥ मूढाः शठा ये पशुपक्षिणोऽत्र सर्वेऽपि निष्पापतमा भवंति॥८॥
दन लगाये हुए॥३॥ परमानंद चिन्मूर्ति मधुर मुरली धारण किये भक्तोंके निर्मल मनोंमें प्रवेश करते हुए॥४॥ जो वैकुण्ठके रहनेवाले और जो वैष्णव उद्धवादिक हैं वे गूढरूपसे कथा सुननेको स्थित हुए॥५॥ तब जय जय शब्द रसरूप भागवतकी पुष्टिचूर्ण और पुष्पोंकी वृष्टि और वारंवार शंखध्वनि हुई॥६॥ उस सभामें स्थित हुओंको देह गेह और आत्माकी सुधि न रही सबकी तन्मय अवस्था देखकर नारदजी वचन बोले॥७॥ हे मुनीश्वरो! आज इस जनसमुदायमें मैंने सप्ताहकी अलौकिक महिमा देखी जिससे मूढ शठ पशु पक्षीभी सब निष्पाप होते हैं॥८॥
इससे इस कलियुगमें चित्तके शुद्ध करनेके निमित्त और कुछ नहीं है पापसमूह विध्वंस करनेको इसके समान पृथ्वीमें और कुछ नहीं है॥९॥ परन्तु यह आप मुझसे कहिये कि, कथामय सप्ताह यज्ञसे कौन कौन विशुद्ध होते हैं महात्माओंने लोकका हित विचारकर क्या कोई नवीन मार्ग स्थापित कियाहै?॥१०॥ कुमार बोले — जो मानदेनेवाले पापात्मा सदा दुराचारवाले कुत्सितमार्गमें चलनेवाले क्रोधाग्निसे दग्ध कुटिल कामी हैं वेभी कलियुगमें सप्ताहयज्ञसे पवित्र होजाते हैं॥११॥ सत्यसे हीन पिता माताको दोष देनेवाले तृष्णासे व्याकुल आश्रमधर्मसे
अतो नृलोके ननु नास्ति किंचिच्चित्तस्य शोधाय कलौ पवित्रम्॥ अघौघविध्वंसकरं तथैव कथासमानं भुवि नास्ति चान्यत्॥९॥ केके विशुध्यंति वदंतु मह्यं सप्ताहयज्ञेन कथामयेन॥ कृपालुभिर्लोकहितं विचार्य प्रकाशितः कोपि नवीनमार्गः॥१०॥ कुमारा ऊचुः॥ ये मानवाः पापकृतस्तु सर्वदा सदा दुराचाररता विमार्गगाः॥ क्रोधाग्निदग्धाः कुटिलाश्च कामिनः सप्ताहयज्ञेन कलौ पुनंति ते॥११॥ सत्येन हीनाः पितृमातृदूषकास्तृष्णाकुलाश्चाश्रमधर्मवर्जिताः॥ ये दांभिका मत्सरिणोऽपि हिंसकाः सप्ताहयज्ञेन कलौ पुनंति ते॥१२॥ पंचोग्रपापाश्छलछद्मकारिणः क्रूराः पिशाचा इव निर्दयाश्च ये॥ ब्रह्मस्वपुष्टा व्यभिचारकारिणः सप्ताहयज्ञेन कलौ पुनंति ते॥१३॥ कायेन वाचा मनसापि पातकं नित्यं प्रकुर्वंति शठा हठेन ये॥ परस्वपुष्टा मलिना दुराशयाः सप्ताहयज्ञेन कलौ पुनंति ते॥१४॥ अत्र ते कीर्तयिष्याम इतिहासं पुरातनम्॥ यस्य श्रवणमात्रेण पापहानिः प्रजायते॥१५॥
वर्जित जो पाखण्डी घमंडी हिंसकभी हैं वे भी सप्ताहयज्ञसे कलियुगमें पवित्र होजाते हैं॥१२॥ पांच बडे उग्र पाप छल छद्मकारी जो क्रूर और पिशाचोंकी नाईं निर्दयी हैं जो ब्राह्मणोके द्रव्य हरणकर पुष्ट होते व्यभिचारी हैं वे भी कलियुगमें सप्ताहयज्ञसे पवित्र होते हैं॥१३॥ और जो शठ हठपूर्वक मन वचन कर्म से नित्य पाप करते हैं पराये द्रव्य लेकर पुष्ट होते हैं वे मलीन दुष्टचित्तवारे कलियुगमें सप्ताहयज्ञसे पवित्र होते हैं॥१४॥ यहाँ मैं तुमसे एक पुरातन इतिहास कहूॅगा जिसके सुननेसेही पाप नष्ट होजाते हैं॥१५॥
तुंगभद्रा नदीके किनारे एक सर्वोत्तम नाम उत्तम पत्तन था, जहांके चारों वर्ण अपने धर्मके सत्कर्मोंमें तत्पर थे॥१६॥ उसी पुरमें सब वेदोंका जाननेवाला आत्मदेव नाम ब्राह्मण श्रौतस्मार्तकर्मोंका पारंगत दूसरे सूर्यकी नाईनिवास करता रहा॥१७॥ वो भिक्षुक धनवान् था उसकी स्त्रीका नाम धुन्धुली सुन्दरी सत्कुलोत्पन्ना सदा अपनी टेक रखनेहारी थी॥१८॥ लोकवार्त्तामें प्रीतिकरनेहारी क्रूरा और बहुत बोलती थी बलवान् घरके कार्योंमें कृपण क्लेशकारिणी थी॥१९॥ इसप्रकार प्रेमपूर्वक उन दोनोंको रहते विहार करते हे राजन्!अर्थ कामसम्पन्न गृहादिक उन्हैंसुखकारी न हुआ॥२०॥ तब उन्होने सन्तानके निमित्त दीनोंको गौ भूमि सुवर्ण सदा देकर धर्म करना प्रारम्भ
तुंगभद्रातटे पूर्वमभूत्पत्तनमुत्तमम्॥ यत्र वर्णाः स्वधर्मेण सत्यसत्कर्मतत्पराः॥१६॥ आत्मदेवः पुरे तस्मिन्सर्ववेदविशारदः॥ श्रौतस्मार्तेषु निष्णातो द्वितीय इव भास्करः॥१७॥भिक्षुको वित्तवाँल्लोके तत्प्रिया धुंधुली स्मृता॥ स्ववाक्य स्थापिका नित्यं सुंदरी मुकुलोद्भवा॥१८॥ लोकवार्तारता क्रूरा प्रायशो बहुजल्पिका॥ शूरा च गृहकृत्येषु कृपणा कलहप्रिया॥१९॥ एवं निवसतोः प्रेम्णा दंपत्यो रममाणयोः॥ अर्थाः कामास्तयोरासन्न सुखाय गृहादिकम्॥२०॥ पश्चाद्धर्माः समारब्धास्ताभ्यां संतानहेतवे॥गोभूहिरण्यवासांसि दीनेभ्यो यच्छतः सदा॥२१॥ धनार्थं धर्ममात्रेण ताभ्यां नीतं तथाऽपि च॥ न पुत्रो नापि वा पुत्री ततश्चिंतातुरो भृशम्॥२२॥ एकदा स द्विजो दुःखाद्गृहं त्यक्त्वा वनं गतः॥ मध्याह्ने तृषितो जातस्तडागं समुपेयिवान्॥२३॥ पीत्वा जलं विषण्णस्तु प्रजादुःखेन कर्शितः॥ मुहूर्तादपि तत्रैव संन्यासी कश्चिदागतः॥२४॥ दृष्ट्वा पीतजलं तं तु विप्रो यातस्तदंतिकम्॥ नत्वा च पादयोस्तस्य निःश्वसन्संस्थितः पुरः॥२५॥
किया॥२१॥ जब कि, उन दोनों स्त्री पुरुषोंने धर्ममार्गमें आधा धन लगादिया और तौ भी कोई बेटा बेटी न हुई तब ब्राह्मणको बड़ी चिन्ता हुई॥२२॥ एक समय वोह ब्राह्मण दुःखी हो घरसे निकल वनको चलागया दुपहरके समय प्याससे व्याकुल हो एक सरोवरके निकट प्राप्त हुआ॥२३॥ जल पीकर सन्तानके दुःखसे दुःखी वोह तहांही बैठगया कि, एक मुहूर्त उपरान्त कोई संन्यासी तहां आया॥२४॥ जब वोह जल पीचुका तब यह ब्राह्मण उसके धोरे जा चरण वंदनकर श्वास लेता आगे बैठा॥२५॥
यति बोला ब्राह्मण!क्यों रोता है तेरे मनमें क्या चिंता है तू शीत्र मुझसे अपने दुःखका कारण कह॥२६॥ ब्राह्मण बोला महाराज! सब पापसे संचित किये दुःखको आपसे क्या कहूं मेरे पूर्वज पितर मेरे दिये हुये जलको श्वाससे गरम कर पीते हैं कि, आगेको इसके सन्तान न होनेसे हमैंजल न मिलेगा॥२७॥ मेरे दियेहुएको प्रीति से देवता ब्राह्मणभी नहीं ग्रहण करते मैं सन्तानके दुःखसे जडताको प्राप्त हो प्राण त्यागन करनेको यह आयाहूँ॥२८॥ संतानके बिना जीनेको धिक्कार है विना संतान के घरको धिक्कार है पुत्रहीनके धनको धिक्कार है संतानके बिना कुलको धिक्कार है॥
यतिरुवाच॥ कथं रोदिषि विप्र त्वं का ते चिंता बलीयसी॥ वद त्वं सत्वरं मह्यं स्वस्य दुःखस्य कारणम्॥२६॥ ब्राह्मण उवाच॥ किं ब्रवीमि ऋषे दुःखं पूर्वपापेन संचितम्॥ मदीयाः पूर्वजास्तोयं कवोष्णमुपभुंजते॥२७॥ मद्दत्तं नैव गृह्णंति प्रीत्या देवा द्विजातयः॥ प्रजादुःखेन शून्योऽहं प्राणांस्त्यक्तुमिहागतः॥२८॥ धिग्जीवितं प्रजाहीनं धिग्गृहं च प्रजां विना॥ धिग्धनं चानपत्यस्य धिक्कुलं संततिं विना॥२९॥ पाल्यते या मया धेनुः सा वंध्या सर्वथा भवेत्॥ यो मया रोपितो वृक्षः सोऽपि वंध्यत्वमाश्रयेत्॥३०॥ यत्फलं मद्गृहायातं शीघ्रं तच्च विशुष्यति॥ निर्भाग्यस्यानपत्यस्य किमतो जीवितेन मे॥३१॥ इत्युक्त्वा स रुरोदोच्चैस्तत्पार्श्वं दुःखपीडितः॥ तदा तस्य यतेश्चित्ते करुणाऽभूद्गरीयसी॥३२॥ तद्भालाक्षरमालां च वाचयामास योगवान्॥ सर्वं ज्ञात्वा यतिः पश्चाद्विप्रमूचे सविस्तरम्॥३३॥
॥२९॥ जो मैं धेनु पालता हूं वोहभी तो वंध्या होती है और जो मैं वृक्ष लगाता हूं वोहभी फलरहित होजाता है॥३०॥ जो फल मेरे घर आता है वह शीघ्र सूखजाता है तो निर्भाग्य पुत्रहीन मेरे जीनेसे क्या है?॥३१॥ ऐसा कह वोह ब्राह्मण उस यतिके धोरे बैठकर ऊंचे स्वरसे रोने लगा तब उस संन्यासीके चित्तमें बड़ी दया हुई॥३२॥ वोह योगी उसकी माथेकी रेखा अर्थात् प्रारब्धको बाॅचताहुआ सब जानकर फिर ब्राह्मणके प्रति विस्तारपूर्वक वचन बोला॥३३॥
यति बोले, ब्राह्मण! संतानरूप अज्ञानको त्यागनकर, कर्मकी गति बड़ी बलवान् है ज्ञानके आश्रित हो संसारवासनाको त्यागन कर॥३४॥ सुन ब्राह्मण! इस समय मैंने तेरी प्रारब्ध देखी सात जन्मपर्यन्त तेरे पुत्र नहीं है॥३५॥ संतानसे सगर और अंगराजाने पहले बड़ा दुःख पायाथा अरे कुटुम्बकी आशा त्याग संन्यास में सर्वथा सुख है॥३६॥ ब्राह्मण बोला मुझे ज्ञानसे कुछ न होगा कैसेही हो पुत्र दीजिये नहीं तो तुम्हारे आगेही मैं प्राणोंको दुःखी हुआ त्याग करदूंगा॥३७॥ पुत्रादिसुखहीन यह संन्यास भी शुष्कही है गृहस्थही जो पुत्र पौत्र युक्त हैं वो लोकमें प्रसन्न
यतिरुवाच॥ मुंचाज्ञानं प्रजारूपं बलिष्टा कर्मणो गतिः॥ विवेकं तु समासाद्य त्यज संसारवासनाम्॥३४॥ शृणु विप्र मया तेऽद्य प्रारब्धं तु विलोकितम्॥ सप्तजन्मावधि तव पुत्रो नैव च नैव च॥३५॥ संततेः सगरो दुःखमवापांगः पुरा तथा॥ रे मुंचाद्य कुटुंबाशां संन्यासे सर्वथा सुखम्॥३६॥ ब्राह्मण उवाच॥ विवेकेन भवेत्किं मे पुत्रं देहि बलादपि॥ नो चेत्त्यजाम्यहं प्राणांस्त्वदग्रेशोकमूर्च्छितः॥३७॥ पुत्रादिसुखहीनोऽयं संन्यासः शुष्क एव हि॥ गृहस्थः सरसो लोके पुत्रपौत्रसमन्वितः॥३८॥ इति विप्राग्रहं दृष्ट्वा प्राब्रवीत्स तपोधनः॥ चित्रकेतुर्गतः कष्टं विधिलेखाविमार्जनात्॥३९॥ न यास्यसि सुखं पुत्राद्यथा दैवहतोद्यमः॥ अतो हठेन युक्तोऽसि ह्यर्थिनं किं वदाम्यहम्॥४०॥ तस्याग्रहं समालोक्य फलमेकं स दत्तवान्॥ इदं भक्षय पत्न्या त्वं ततः पुत्रो भविष्यति॥४१॥
हैं॥३८॥ यह ब्राह्मणका आग्रह देख वोह तपस्वी बोला अरे विधिके अंक मिटानेसे चित्रकेतुको बड़ा दुःख हुआ था इस कारण प्रारब्धका अतिक्रमण नहीं करना॥३९॥ जैसे दैवहत होनेसे उद्यम वृथाहोता है इसीप्रकार पुत्रसे तुझे कुछ सुख नहीं प्राप्तहोगा इसकारण तुझे हठी अर्थीसे मैं क्या कहूं॥४०॥ उस ब्राह्मणका बहुत आग्रह देखकर यतीने उसे एक फल दिया और यह कहा इसे तू अपनी स्त्रीको खवाव एक पुत्र होगा॥४१॥
सत्य शौच दया दानपूर्वक रहना दुपहरके उपरांत अतिथिको भोजन कराकर आप खाना इसप्रकारसे एक वर्षतक स्त्री रहैगी तो श्रेष्ठ पुत्र होगा॥४२॥ यह कहकर योगी चलेगये ब्राह्मण अपने घरमें आया वोह फल स्त्रीको दे उसका विधान बताय ब्राह्मण कहीं चलागया॥४३॥ उसकी तरुणी कुटिल तो थी ही सखीके आगे रुदन करनेलगी अरी मुझे बड़ी चिंता उत्पन्न हुई है मैं इस फलको न खाऊॅगी॥४४॥ फल खानेसे गर्भ रहेगा फिर पेट बढेगा थोड़ा भोजन करनेसे निर्बलता हो जायगी तो घरके काम कैसे होंगे?॥४५॥ कहीं भाग्यसे गाँवमें डाका पडजाय तो
सत्यं शौचं दयादानमेकभक्तं तु भोजनम्॥ वर्षावधि स्त्रिया कार्यं तेन पुत्रोऽतिनिर्मलः॥४२॥ एवमुक्त्वा ययौ योगी विप्रस्तु गृहमागतः॥ पत्न्याः पाणौ फलं दत्त्वा स्वयं यातस्तु कुत्रचित्॥४३॥ तरुणी कुटिला तस्य सख्यग्रे च रुरोदाह॥ अहो चिंता ममोत्पन्ना फलं चाहं न भक्षये॥४४॥ फलभक्ष्येण गर्भः स्याद्गर्भेणोदरवृद्धिता॥ स्वल्पभक्ष्यं ततोऽशक्तिर्गृहकार्यं कथं भवेत्॥४५॥ दैवाद्धाटी व्रजेद्ग्रामे पलायेद्गर्भिणी कथम्॥ शुकवन्निवसेद्गर्भस्तं कुक्षेः कथमुत्सृजेत्॥४६॥ तिर्यक् चेदागतो गर्भस्तदा मे मरणं भवेत्॥ प्रसूता दारुणं दुःखं सुकुमारी कथं सहे॥४७॥ मंदाया मयि सर्वस्वं ननां दासंहरेत्तदा॥ सत्यशौचादिनियमो दुराराध्यः स दृश्यते॥४८॥ लालने पालने दुःखं प्रसूतायाश्च वर्तते॥ वंध्या वा विधवा नारी सुखिनी चेति मे मतिः॥४९॥
गर्भिणी कैसे भाजैंशुककी नाईं रहते हुए गर्भको कोखसे कैसे त्यागन करै॥४६॥ और जो कहीं गर्भ टेढा पड़गया तो मेरा मरणही होजायगा, प्रसूतिके समय बड़ा दुःख होता है उसे सुकुमारी मैं कैसे सहूं॥४७॥ तब मुझ मंदभागिनीके सर्वस्व धनको ननद हरण करलेगी और फिर सत्य शौचादि नियमसे मुझे यह दुःसाध्यही दीखेहै॥४८॥ फिर बालकके लालन पालनमें बड़ा दुःख होता है या तो वंध्या या विधवा नारी सुखी है यह मेरी मति है॥४९॥
ऐसी कुतर्कना करके उसने वोह फल नहीं खाया और जब पतिने पूँछा कि, फल खाया तो कहदिया कि हो खालिया॥५०॥ एक समय उसकी भगिनी निज इच्छासे उसके घर आई उसके आगे इसने सबवृत्तान्त सुनाकर कहा कि, मुझे यह बड़ी चिन्ता है॥५१॥ इसी दुःखसे दुर्बल हो गई हूॅछोटी बहन!बता तो क्या करूं तब वोह बोली मुझे गर्भ है उत्पन्न होनेपर तुझे दूंगी॥५२॥ तबतक तू सगर्भासी होकर घरमें सुखी रह तू मेरे पतिको द्रव्य दीजै वोह तुझे बालकको देदेगा॥५३॥ मेरा बालक छः महीनेका मरगया ऐसा मैं प्रगट करदूंगी और प्रतिदिन आकर तेरे
एवं कुतर्कयोगेन तत्फलं नैव भक्षितम्॥ पत्या पृष्टं फलं भुक्तं भुक्तं चेति तयेरितम्॥५०॥ एकदा भगिनी तस्यास्तद्गृहे स्वेच्छयाऽऽगता॥ तदग्रे कथितं सर्वं चिंतेयं महती हि मे॥५१॥ दुर्बला तेन दुःखेन ह्यनुजे करवाणि किम्॥ साऽऽब्रवीन्मम गर्भोऽस्ति तं दास्यामि प्रसूतितः॥५२॥ तावत्कालं सगर्भेव गुप्ता तिष्ठ गृहे सुखम्॥ वित्तं त्वं मत्पतेर्यच्छ स ते दास्यति बालकम्॥५३॥ षाण्मासिको मृतो बाल इति लोको वदिष्यति॥ तं बालं पोषयिष्यामि नित्यमागत्य ते गृहे॥५४॥ फलमर्पय धेन्वै त्वं परीक्षार्थं तु सांप्रतम्॥ तत्तदाचरितं सर्वं तथैव स्त्रीस्वभावतः॥५५॥ अथ कालेन सा नारी प्रसूता बालकं तदा॥ आनीय जनको बालं रहस्ये धुंधुलीं ददौ॥५६॥ तया च कथितं भर्त्रे प्रसूतः सुखमर्भकः॥ लोकस्य सुखमुत्पन्नमात्मदेवप्रजोदयात्॥५७॥ ददौ दानं द्विजातिभ्यो जातकर्म विधाय च॥ गीतवादित्रघोषोऽभूत्तद्द्वारे मंगलं बहु॥५८॥
बालककूॅमैं दूध पियाया करूंगी॥५४॥ और परीक्षा के निमित्त तू यह फल इस समय गायकूं देदे यह सुनकर उसने स्त्रीस्वभावसे यह सब कुछ किया॥५५॥ कुछ समय उपरान्त उस नारीके बालक हुआ तब उसके पिताने एकान्तमें वोह बालक लाकर धुंधुलीको दिया॥५६॥ तब धुन्धुलीने अपने स्वामीसे कही कि, मेरे सुखपूर्वक बालक उत्पन्न होगया आत्मदेवके संतान होनेसे बहुतों को प्रसन्नता हुई॥५७॥ जातकर्म किया ब्राह्मणोंको दान दिया गीत बाजोंके शब्द और सब मंगल उसके द्वारेपर हुए॥५८॥
धुन्धुली अपने पतिसे बोली मेरे कुचोंमें दूध नहीं है सो मैं निर्दुग्धा दूसरीके दूध विना बालकको कैसे पालोंगी॥५९॥ मेरी बहनका थोडेही दिनोंका उत्पन्न हुआ बालक मरगया है उसे अपने घरमें बुलालो काम धंधाभी करैगी बालककोभी पालन करेगी॥६०॥ पतिने पुत्ररक्षाके निमित्त यह सब कुछ किया माताने पुत्रका नाम धुंधुकारी रक्खा॥६१॥ तीन महीने उपरान्त उस गायकेभी एक बालक उत्पन्न हुआ सर्वांग सुंदर उज्ज्वल दिव्यशरीर सुवर्णकी नाई॥६२॥ ब्राह्मण उसे देख बडा प्रसन्न हो स्वयं उसके संस्कार करता हुआ इसे आश्चर्य मानकर बहुत
भर्तुरग्रेऽब्रवीद्वाक्यं स्तन्यं नास्ति कुचे मम॥ अन्यस्तन्येन निर्दुग्धा कथं पुष्णामि बालकम्॥५९॥ मत्स्वसायाः प्रसूताया मृतो बालस्तु वर्तते॥ तामाकार्य गृहे रक्ष सा तेऽर्भं पोषयिष्यति॥६०॥ पतिना तत्कृतं सर्वं पुत्ररक्षणहेतवे॥ पुत्रस्य धुंधुकारीति नाम मात्रा प्रतिष्ठितम्॥६१॥ त्रिमासे निर्गते चाथ सा धेनुः सुषुवेऽर्भकम्॥ सर्वांगसुंदरं दिव्यं निर्मलं कनकप्रभम्॥६२॥ दृष्ट्वा प्रसन्नो विप्रस्तु संस्कारान्स्वयमादधे॥ मत्वाश्चर्यं जनाः सर्वे दिदृक्षार्थंसमागताः॥६३॥ भाग्योदयोऽधुना जात आत्मदेवस्य पश्यत॥ धेन्वा बालः प्रसूतस्तु देवरूपीति कौतुकम्॥६४॥ न ज्ञातं तद्रहस्यं तु केनापि विधियोगतः॥ गोकर्णं च सुतं दृष्ट्वा गोकर्णं नाम चाकरोत्॥६५॥ कियत्कालेन तौ जातौ तरुणौ तनयावुभौ॥ गोकर्णः पंडितो ज्ञानी धुंधुकारी महाखलः॥६६॥ स्नानशौचक्रियाहीनो दुर्भक्षी क्रोधसंयुतः॥ दुष्परिग्रहकर्ता च शवहस्तेन भोजनः॥६७॥
मनुष्य देखनेको आये॥६३॥ देखो अब आत्मदेवका भाग्य उदय हुआ है जो गौने भी देवरूपी बालक उत्पन्न किया हैबड़े आश्चर्यकी बात है॥६४॥ दैवसे किसीने भी इस भेदको नहीं जाना सब शरीर मनुष्यका केवल कानही गौके थे इसकारण पिताने इसका गोकर्णही नाम धरा॥६५॥ कुछ कालमें वोह दोनों बालक तरुण हुए गोकर्ण ज्ञानी पंडित और धुन्धुकारी बडा दुष्ट हुआ॥६६॥ स्नान शौच क्रियासे रहित कुत्सित वस्तु भक्षण करैक्रोधी दुष्टपरिग्रहकर्ता चाण्डालोंके हाथ भोजन करै॥६७॥
चोर सबसे वैरकर पराये घरोंमें आग लगादे छोटे बालकोंको देखकर कुएमें डालदे॥६८॥ हत्यारा शस्त्र धारे दीन और अंधोंको दुःख दे चांडालोंके संग प्रीति करै जाल लिये फिरै॥६९॥ वेश्याके संगसे उसने अपने पिताका सब धन नष्ट करदिया एक समय पिता माताको पीटकर घरके बर्तन लेगया॥७०॥ उसका पिता कृपण धनहीन होजानेसे ऊंचे स्वरसे रोनेलगा पुत्रका न होनाही भला है, क्योंकि, कुपुत्र दुःखदायक है॥७१॥ कहाँ रहूॅकहाँ जाऊँ कौन मेरे दुःख दूरकरैमैं दुःखसे प्राण त्याग दूंगा हा!बड़ा कष्ट है॥७२॥ उस समय ज्ञानी गोकर्ण आकर
चौरः सर्वजनद्वेषी परवेश्मप्रदीपकः॥ लालनायार्भकान्हृत्वा सद्यः कूपे न्यपातयत्॥६८॥ हिंसकः शस्त्रधारी च दीनांधानां प्रपीडकः॥ चांडालाभिरतो नित्यं पाशहस्तश्च संगतः॥६९॥ तेन वेश्याकुसंगेन पित्र्यं वित्तं तु नाशितम्॥ एकदा पितरौ ताड्य पात्राणि स्वयमाहरत्॥७०॥ तत्पिता कृपणः प्रोच्चैर्धनहीनो रुरोद ह॥ वंध्यत्वं तु समीचीनं कुपुत्रो दुःखदायकः॥७१॥ क्व तिष्ठामि क्व गच्छामि को मे दुःखं व्यपोहयेत्॥ प्राणांस्त्यजामि दुःखेन हा कष्टं मम संस्थितम्॥७२॥ तदानीं तु समागत्य गोकर्णो ज्ञानसंयुतः॥ बोधयामास जनकं वैराग्यं परिदर्शयन्॥७३॥ असारः खलु संसारो दुःखरूपी विमोहकः॥ सुतः कस्य धनं कस्य स्नेहवाञ्ज्वलतेऽनिशम्॥७४॥ न चेंद्रस्य सुखं किंचिन्न सुखं चक्रवर्तिनः॥ सुखमस्ति विरक्तस्य मुनेरेकांतजीविनः॥७५॥ मुंचाज्ञानं प्रजारूपं मोहतो नरके गतिः॥ निपतिष्यति देहोऽयं सर्वंत्यक्त्वा वनं व्रज॥७६॥
पिताको वैराग्य दिखाता हुआ समझाने लगा॥७३॥ यह संसार असार है दुःखरूप मोह करानेहारा है। सुत किसका, धन किसका यह सब मिथ्या है, इसमें प्रेम करनेहारा रात दिन दुःखी होता है॥७४॥ इंद्रकोभी कुछ सुख नहीं न चक्रवर्तीको कुछ है परन्तु एकान्तसेभी विरक्त मुनिकोही कुछ सुख है॥७५॥ यह संतानरूप अज्ञान छोड़ मोहसे नरक होता है यह देह एक दिन गिरजायगा इसकारण सब कुछ त्यागनकर वनको जाओ॥७६॥
उसके यह वचन सुन वनके जानेकी इच्छा करते गोकर्णसे इसप्रकार इसके पिता बोले हे पुत्र!वनमें क्या कर्तव्य है सो तुम विस्तारसे कहो॥७७॥ स्नेहपाश से बॅधाहुआ मैं लँगडा हुआ मूर्ख कर्मोंसे इस संसाररूपी अंधकूपमें पड़ा हूँ। हे दयालु प्लव!मुझे निकाल॥७८॥ गोकर्ण बोला इस अस्थि मांस रुधिरसे बनेहुए देहमें अभिमान मत करो, स्त्रीपुत्रोंसे ममताको त्यागन करो, इस जगत्को प्रतिदिन क्षणभंगुर जानो, भक्तिमें प्रीति करके वैराग्यका सुख अनुभव करो॥७९॥ नित्य भागवतधर्मोंको सेवन करो, काम्यकर्मोंका त्यागन करो, काम और तृष्णाको छोड साधुओंकी सेवा
तद्वाक्यं तु समाकर्ण्य गंतुकामः पिताऽब्रवीत्॥ किं कर्तव्यं वने तात तत्त्वं वद सुविस्तरम्॥७७॥ अंधकूपे स्नेहपाशैर्बद्धः पंगुरहं शठः॥ कर्मणा पतितो नूनं मामुद्धर दयानिधे॥७८॥ गोकर्ण उवाच॥ देहेऽस्थिमांसरुधिरेऽभिमति त्यज त्वं जायासुतादिषु सदा ममतां विमुंच॥ पश्याऽनिशं जगदिदं क्षणभंगनिष्ठंवैराग्यरागरसिको भव भक्ति निष्ठः॥७९॥ धर्मंभजस्व सततं त्यज लोकधर्मान्सेवस्व साधुपुरुषाञ्जहि कामतृष्णाम्॥ अन्यस्य दोषगुणचिंतनमाशु मुक्त्वासेवाकथारसमहो नितरां पिबत्वम्॥८०॥ एवं सुतोक्तिवशतोऽपि गृहं विहाय यातो वनं स्थिरमतिर्गतषष्टिवर्षः॥ भक्तो हरेरनुदिनं परिचर्ययाऽसौ श्रीकृष्णमाप नियतं दशमस्य पाठात्॥८१॥ इति श्रीपद्मपुराणे उत्तरखंडे श्रीभागवतमाहात्म्ये विप्रमोक्षो नाम चतुर्थोऽध्यायः॥४॥ ॥छ॥ सूत उवाच॥ पितर्युपरते तेन जननी ताडिता भृशम्॥ क्व वित्तं तिष्ठति ब्रूहि हनिष्ये लत्तया न चेत्॥१॥
करो, औरोंके दोष गुणोंका चिंतन छोड़ भगवत्की सेवा और कथारसको नित्य पिओ॥८०॥ यह पुत्रका उपदेश सुन घर त्यागन कर वोह साठ वर्षकी अवस्था युक्त ब्राह्मण स्थिरमति करके वनको चलागया। नित्यप्रति श्रीकृष्णचन्द्रकी सेवा करने और दशमके पाठ करनेसे श्रीकृष्णको प्राप्त हुआ॥८१॥ इति श्रीपद्मपुराणे उत्तरखण्डे भागवतमाहात्म्ये भाषाटीकायां चतुर्थोऽध्यायः॥४॥ सूतजी बोले, पिता के मरजानेसे धुन्धुकारीने माता को बहुत मारा और कहा बता, धन कहाॅहै? नहीं तो लातोंसे मारूंगा॥१॥
इसप्रकार माता उसके वचनसे भयभीत दुःखी हो रातमें कुएमें गिरकर मरगई॥२॥ गोकर्ण योगमें स्थित हो तीर्थयात्राको चलेगये उसे न दुःख न सुख न कोई वैरी है न बन्धु॥३॥ धुंधुकारी उस घर में पांच वेश्याओंके साथ रहनेलगा बडा कुत्सितकर्मी उनका पालन मूर्खतासे करने लगा॥४॥ एक समय उनको गहनेकी इच्छा हुई तो यह कामान्ध मृत्युका विचार न करके घरसे निकला॥५॥ इधर उधरसे द्रव्य संचय करके फिर घरको आया उन्हें कितने एक भूषण और वस्त्र दिये॥६॥ बहुत धनसंचय देखकर वे स्त्री रात्रिमें विचारने लगीं यह प्रतिदिन चोरी करता है
इति तद्वाक्यसंत्रासाज्जनन्या पुत्रदुःखतः॥ कूपे पातः कृतो रात्रौ तेन सा निधनं गता॥२॥ गोकर्णस्तीर्थयात्रार्थं निर्गतो योगसंस्थितः॥ न दुःखं न सुखं तस्य न वैरी नापि बांधवः॥३॥ धुंधुकारी गृहेऽतिष्ठत्पंचपण्यवधूवृतः॥ अत्युग्रकर्मकर्ता च तत्पोषणविमूढधीः॥४॥ एकदा कुलटास्तास्तु भूषणान्यभिलिप्सवः॥ तदर्थं निर्गतो गेहात्कामांधो मृत्युमस्मरन्॥५॥ यतस्ततश्च संहृत्य वित्तं वेश्म पुनर्गतः॥ ताभ्योऽयच्छत्सुवस्त्राणि भूषणानि कियंति च॥६॥ बहुवित्तचयं दृष्ट्वा रात्रौ नार्यो व्यचारयन्॥ चौर्यं करोत्यसौ नित्यमतो राजा ग्रहीष्यति॥७॥ वित्तं हृत्वा पुनश्चैनं मारयिष्यति निश्चितम्॥ अतोऽर्थगुप्तये गूढमस्माभिः किं न हन्यते॥८॥ निहत्यैनं गृहीत्वाऽर्थं यास्यामो यत्र कुत्रचित्॥ इति ता निश्चयं कृत्वा सुप्तं संबध्य रश्मिभिः॥९॥ पाशं कंठे निधायास्य तन्मृत्युमुपचक्रमुः॥ त्वरितं न ममारासौ चिंतायुक्तास्तदाऽभवन्॥१०॥
कदाचित् राजा पकडलेगा तो॥७॥ यह सब धन लेकर फिर इसे निश्चय मार डालेगा तो धनकी रक्षाके निमित्त गुप्त रीति से हमहीं इसे क्यों न मारडालैं॥८॥ इसे मारके यह सब धन ले इच्छापूर्वक विचरैं। यह उन्होंने निश्चय करके सोते हुएको रस्सियोंसे बाँधा॥९॥ इसके गलेमें फाँसी डालकर मारने लगीं जब यह जल्दी न मरा तो चिन्तासे विचारने लगीं॥१०॥
बहुतसारे अंगारोंसे उसका मुख जलाया तब अग्नि लगनेके दुःखं करके वोह मरगया॥दोहा – जो गणिकाके सँग रमै, तेहिकी यह गति होय॥ तासे कबहूं भूलसे, इनसे रमो न कोय॥११॥वे साहसवाली स्त्रियें उसके देहको गढेमें दाब देतीहुई यह भेद किसीने भी नहीं जाना॥१२॥ आदमियोंके पूछनेपर कहा कि, हमारा प्यारा दूर गया है वोह द्रव्य कमानेगया है इस वर्षके अन्तमें आवेगा॥१३॥पंडितोंको योग्य है कि, दुष्ट स्त्रियोंका विश्वास न करैंजो इनका विश्वास करता है सो दुःखी होता है॥१४॥ इनके वचन कामियोंको रस बढानेवाले अमृतकी
तप्तांगारसमूहांश्च तन्मुखे हि विचिक्षिषुः॥ अग्निज्वालातिदुःखेन व्याकुलो निधनं गतः॥११॥ तं देहं मुमुचुर्गर्ते प्रायः साहसिकाः स्त्रियः॥ न ज्ञातं तद्रहस्यं तु केनापीदं तथैव च॥१२॥ लोकैः पृष्टा वदंति स्म दूरं यातः प्रियो हि नः॥ आगमिष्यति वर्षेऽस्मिन्वित्तलोभविकर्षितः॥१३॥ स्त्रीणां नैव तु विश्वासं दुष्टानां कारयेद्बुधः॥ विश्वासे यः स्थितो मूढः स दुःखैः परिभूयते॥१४॥ सुधामयं वचो यासां कामिनां रसवर्धनम्॥ हृदयं क्षुरधाराभं प्रियः को नाम योषिताम्॥१५॥ संहृत्य वित्तं ता याताः कुलटा बहुभर्तृकाः॥ धुंधुकारी बभूवाऽथ महान्प्रेतः कुकर्मतः॥१६॥ वात्यारूपधरो नित्यं धावन्दशदिशोऽन्तरम्॥ शीतातपपरिक्लिष्टो निराहारः पिपासितः॥१७॥ न लेभे शरणं कुत्र हा दैवेति मुहुर्वदन्॥ कियत्कालेन गोकर्णो मृतं लोकादबुध्यत॥१८॥ अनाथं तं विदित्वैव गयाश्राद्धमचीकरत्॥ यस्मिंस्तीर्थे तु संयाति तत्र श्राद्धं प्रवर्तयन्॥१९॥
समान हैं हृदय छुरेकी धाराकी नाईं है इससे कहते हैं कि, स्त्रियोंको कौन प्यारा है अर्थात् कोई भी नहीं है॥१५॥वे कुलटा बहुत भर्त्ता करने वाली उसका सब धन लेकर चलीगईं और धुंधुकारी कुकर्म से महाप्रेत हुआ॥१६॥वायुरूप धारण कियेहुये नित्य दश दिशाओं में फिरै शीत धूपसे व्याकुल निराहार भूँखा प्यासा॥१७॥कहीं शांतिको न प्राप्त हुआ।हा दैव! ऐसा वारंवार कहने लगा कुछ कालमें गोकर्णने लोगोंसे सुना कि, धुंधुकारी मरगया॥१८॥उसे अनाथ जानकर गयामें श्राद्ध किया और जिस जिस तीर्थमें जाय तहाॅतहाॅश्राद्ध करै॥१९॥
इसप्रकार भ्रमण करताहुआ अपने नगरमें प्राप्त हुआ रात्रिमें घरके आँगनमें सोनेको आया इसे किसीने न जाना॥२०॥वोह धुंधुकारी तहाँ अपने भाईको सोता जानकर अर्द्धरात्रिमें महाभयानक शरीर दिखाता हुआ॥२१॥कभी मेढा कभी हाथी कभी भैंसा होजाय कभी इन्द्र कभी अग्नि होजाय फिर पुरुष होगया॥२२॥इस विपरीतको देखकर धीरज धारणकर गोकर्णने जाना कि, यह कोई दुर्गतिको प्राप्त हुआ है ऐसा निश्चयकर बोला॥२३॥गोकर्ण बोला, भाई! तू कौन है जो रात्रिमें यहाॅआया है और इस दशाको प्राप्त है क्या तू प्रेत पिशाच वा राक्षस है सो
एवं भ्रमन्स गोकर्णः स्वपुरं समुपेयिवान्॥ रात्रौ गृहांगणे स्वप्तुमागतोऽलक्षितः परैः॥२०॥ तत्र सुप्तं स विज्ञाय धुंधुकारी स्वबांधवम्॥ निशीथे दर्शयामास महारौद्रतरं वपुः॥२१॥ सकृन्मेषः सकृद्धस्ती सकृच्च महिषोऽभवत्॥ सकृदिंद्रः सकृच्चाग्निः पुनश्च पुरुषोऽभवत्॥२२॥ वैपरीत्यमिदं दृष्ट्वा गोकर्णो धैर्यसंयुतः॥ अयं दुर्गतिकः कोऽपि निश्चित्याथ तमब्रवीत्॥२३॥ गोकर्ण उवाच॥ कस्त्वमुग्रतरो रात्रौ कुतो यातो दशामिमाम्॥ किं वा प्रेतः पिशाचो वा राक्षसोऽसीति शंस नः॥२४॥ सूत उवाच॥ एवं पृष्टस्तदा तेन रुरोदोच्चैः पुनःपुनः॥ अशक्तो वचनोच्चारे संज्ञामात्रं चकार ह॥२५॥ ततोंजलौ जलं कृत्वा गोकर्णस्तमुदीरयन्॥ तत्सेकाद्गतपापोऽसौ प्रवक्तुमुपचक्रमे॥२६॥ प्रेत उवाच॥ अहं भ्राता त्वदीयोऽस्मि धुंधुकारीति नामतः॥ स्वकीयेनैव दोषेण ब्रह्मत्वं नाशितं मया॥२७॥
हमसे कह॥२४॥सूतजी बोले, जब इसप्रकारसे गोकर्णने पूछा तो वोह ऊंचे स्वरसे रोनेलगा वचन कहनेमें असमर्थ था केवल संज्ञाही करता हुआ अर्थात् संकेतसे कहा॥२५॥तब गोकर्ण अंजलीमें जल ले मंत्र पढकर छिडका उसके छिडकनेसे पापरहित हो वोह कहने लगा॥॥२६॥ प्रेत बोला, गोकर्ण!मैं धुन्धुकारी नाम तुह्मारा भाई हूँ अपनेही दोषसे मैंने अपना ब्राह्मणत्व नाश करदिया है॥२७॥
महा अज्ञानमें रहनेवाले मेरे कुकर्मोंकी संख्या नहीं है मैं लोकोंका मारनेवाला मुझे स्त्रियोंने दुःखसे मारडाला॥२८॥इससे प्रेतत्वको प्राप्त हुआ हूं अपनी दुर्दशाभी कहता हूं दैवाधीनके फल प्राप्त होनेसे मैं पवन भक्षण कर जीता हूं॥२९॥हे कृपासिंधु बंधु!मुझे इस संकटसे शीघ्र छुड़ाओ यह वचन सुनकर गोकर्ण उसके प्रति कहने लगा॥३०॥गोकर्ण बोला भाई! मैंने तो तेरे निमित्त गयामें पिण्ड दिये थे सो अबभी मुक्ति नहीं हुई यह बड़े आश्चर्यकी बात है॥३१॥जो गयामें पिंड देनेसे मुक्ति न होवे तो फिर और उपाय नहीं है। हे प्रेत! अब मैं क्या करूं सो तू विस्तारसे
कर्मणो नास्ति संख्या मे महाऽज्ञाने विवर्तिनः॥ लोकानां हिंसकः सोऽहं स्त्रीभिर्दुःखेन मारितः॥२८॥ अतः प्रेतत्वमापन्नो दुर्दशां च वहाम्यहम्॥ वाताहारेण जीवामि दैवाधीनफलोदयात्॥२९॥ अहो बंधो कृपासिंधो भ्रातर्मामाशु मोचय॥ गोकर्णो वचनं श्रुत्वा तस्मै वाक्यमथाऽब्रवीत्॥३०॥ गोकर्ण उवाच॥ त्वदर्थं तु गयापिंडो मया दत्तो विधानतः॥ तत्कथं नैव मुक्तोऽसि ममाश्चर्यमिदं महत्॥३१॥ गयाश्राद्धान्न मुक्तिश्चेदुपायो नापरस्त्विह॥ किं विधेयं मया प्रेत तत्त्वं वद सविस्तरम्॥३२॥ प्रेत उवाच॥ गयाश्राद्धशतेनापि मुक्तिर्मे न भविष्यति॥ उपायमपरं किंचित्तद्विचारय सांप्रतम्॥॥३३॥ इति तद्वाक्यमाकर्ण्य गोकर्णो विस्मयं गतः॥ शतश्राद्धैर्न मुक्तिश्चेदसाध्यं मोचनं तव॥३४॥ इदानीं तु निजस्थानमातिष्ठ प्रेत निर्भयः॥ त्वन्मुक्तिसाधकं किंचिदाचरिष्ये विचार्य च॥३५॥ धुंधुकारी निजस्थानं तेनादिष्टस्ततो गतः॥ गोकर्णश्चिंतयामास तां रात्रिं न तदध्यगात्॥३६॥
कह॥३२॥प्रेत बोला, सौ गयाश्राद्धसेभी मेरी मुक्ति नहीं होगी कोई और उपाय तुम विचारो॥३३॥ उसके यह वचन सुनकर गोकर्णको बड़ाआश्चर्य हुआ जो सौ श्राद्धसेभी मुक्ति न हो तो तेरी मुक्ति असाध्य है॥३४॥अब तू प्रेत! अपने स्थानमें निर्भय रह तेरी मुक्तिका साधन मैं विचारकर करूंगा॥३५॥ यह सुनके धुंधुकारी अपने स्थानको गया गोकर्णने सब रात्रिमें विचार किया परन्तु कोई उपाय निश्चित न हुआ॥३६॥
प्रातः कालको गोकर्णका आना सुनकर बहुत लोग देखनेको आये तब गोकर्णने रात्रिका वृत्तान्त उनसे सब कहकर सुनाया॥३७॥विद्वान् योगी ब्रह्मवादी बहुत शास्त्र देखने लगे परन्तु कोई उपाय उसकी मुक्तिका नहीं सिद्ध हुआ॥३८॥तब सबने यही निश्चय किया कि, सूर्य भगवान् से इसका उपाय बूझिये जो वोह कहैं सो करो। तब गोकर्णने मंत्रबलसे सूर्यका वेग रोक दिया॥३९॥हे जगत् केसाक्षी! तुम को नमस्कार है इसकी मुक्तिका उपाय बताओ॥४०॥यह वचन सुनकर भगवान् भास्कर दूरसे स्फुट बोले श्रीमद्भागवतका सप्ताह यज्ञ
प्रातस्तमागतं दृष्ट्वा लोकाः प्रीत्या समागताः॥ तत्सर्वं कथितं तेन यज्जातं च यथा निशि॥३७॥ विद्वांसो योगनिष्ठाश्च ज्ञानिनो ब्रह्मवादिनः॥ तन्मुक्तिं नैव पश्यंति पश्यंतः शास्त्रसंचयान्॥३८॥ ततः सर्वैः सूर्यवाक्यं तन्मुक्तौ स्थापितं परम्॥ गोकर्णः स्तंभनं चक्रे सूर्यवेगस्य वै तदा॥३९॥ तुभ्यं नमो जगत्साक्षिन्ब्रूहि मे मुक्तिहेतुकम्॥४०॥ तच्छ्रुत्वा दूरतः सूर्यः स्फुटमेतदभाषत॥ श्रीमद्भागवतान्मुक्तिः सप्ताहे वाचनं कुरु॥४१॥ इति सूर्यवचः सर्वैर्धर्मरूपं तु विश्रुतम्॥ सर्वेऽब्रुवन्प्रयत्नेन कर्तव्यं सुकरं त्विदम्॥४२॥ गोकर्णो निश्चयं कृत्वा वाचनार्थं प्रवर्तितः॥ तत्र संश्रवणार्थाय देशग्रामाज्जना ययुः॥४३॥ पंग्वंधवृद्धमंदाश्च तेपि पापक्षयाय वै। समाजस्तु महाञ्जातो देवविस्मयकारकः॥४४॥ यदैवासनमास्थाय गोकर्णोऽकथयत्कथाम्॥ स प्रेतोपि तदाऽऽयातः स्थानं पश्यन्नितस्ततः॥४५॥
करो मुक्ति हो जायगी॥४१॥यह धर्मरूप सूर्य भगवानका वचन सबने सुना सब कहने लगे निश्चय यह शुभकर्म कीजिये॥४२॥गोकर्णभी निश्चय कर कथा बाँचनेमें प्रवृत्त हुए तहाँ श्रवण करनेको देश और गाँव के मनुष्य आये॥४३॥लँगडे अंधे वृद्ध मंदभी पाप दूर करनेके निमित्त आये देवताओंको विस्मयदायक बडा समाज हुआ॥४४॥जब आसनके ऊपर बैठके गोकर्ण कथा कहने लगे तब वोह प्रेतभी आया और इधर उधर स्थान देखने लगा॥४५॥
तब तहाॅएक सात गाठोंका बांस देखकर उसकी मूलमें छिद्रके द्वारा प्रवेशकर सुननेको बैठगया॥४६॥ वोह पवनरूपी था इसकारण स्थित न रहसका तब बांसमें प्रवेश किया गोकर्णने एक मुख्य वैष्णव ब्राह्मणको श्रोता कल्पना करके॥४७॥ प्रथमस्कंधकी अच्छीप्रकार कथा गोकर्णने सुनाई जब संध्यासमय कथा विसर्जन हुई तब बडा आश्चर्य हुआ॥४८॥ बांसकी एक गाॅठ टूटगई और बडा शब्द हुआ इसीप्रकार दूसरे दिन संध्याके समय दूसरी गाॅठ फटगई॥४९॥ तीसरे दिन संध्यासमय तीसरी गाॅठ फट गई।इसप्रकार सात दिनमें सात गाॅठें
सप्तग्रंथियुतं तत्रापश्यत्कीचकमुच्छ्रितम्॥ तन्मूलच्छिद्रमाविश्य श्रवणाय स्थितो ह्यसौ॥४६॥ वातरूपी स्थितिं कर्तुमशक्तो वंशमाविशत्॥ वैष्णवं ब्राह्मणं मुख्यं श्रोतारं परिकल्प्य सः॥४७॥ प्रथमस्कंधतः स्पष्टमाख्यानं धेनुजोऽकरोत्॥ दिनांते रक्षिता गाथा तदा चित्रं बभूवह॥४८॥ वंशैकग्रंथिभेदोऽभूत्सशब्दं पश्यतां सताम्॥ द्वितीयेह्नितथा सायं द्वितीयग्रंथिभेदनम्॥४९॥ तृतीयेऽह्नि तथा सायं तृतीयग्रंथिभेदनम्॥ एवं सप्तदिनैर्वंशसप्तग्रंथिविभेदनम्॥५०॥ कृत्वापि द्वादशस्कंधश्रवणात्प्रेततां जहौ॥ दिव्यरूपधरो जातस्तुलसीदाममंडितः॥५१॥ पीतवासा घनश्यामो मुकुटी कुण्डलान्वितः॥ ननाम भ्रातरं सद्यो गोकर्णमिति चाब्रवीत्॥५२॥ त्वयाहं मोचितो बंधात्कृपया प्रेतकश्मलात्॥ धन्या भागवती वार्ता प्रेतपीडाविनाशिनी॥५३॥
टूटगईं॥५०॥ द्वादशस्कंधके श्रवण करनेसे धुंधुकारी प्रेतत्वको त्यागन करता हुआ दिव्यरूप धारण कियेहुए तुलसीमाला पहरेहुए॥५१॥ पीतवस्त्र धारण किये घनश्याम मुकुटधारे कुंडल पहरे, गोकर्ण अपने भाईको नमस्कार करके बोला॥५२॥ भाई!तुमने बडी कृपाकरके प्रेत रूपी पापसे छुडाया है यह भागवती कथा प्रेतबाधा दूर करनेवाली धन्य है॥५३॥
यह सप्ताह धन्य है जो कृष्णलोक फलका देनेहारा है सप्ताह सुनने को बैठतेही मनुष्यके पाप काँपने लगते हैं॥५४॥हम प्रेतोंकी तो यह भागवत प्रलय करदेगी गीला सूखा लघु स्थूल वाणी मन कर्मसे किये॥५५॥पापको यह सप्ताह यज्ञ नाशकर देता है जैसे अग्निसमिधाको इस भारतवर्षमें देवताओंकी सभा में विद्वानोंने॥५६॥कथा नहीं सुननेवालोंका निष्फल जन्म कहा है मोहसे रक्षा कर करके पुष्ट बलवान् देहसे क्या है॥५७॥जिस शरीरने यह शुकशास्त्रकथा नहीं सुनी वोह अस्थियोंका स्तंभ नसोंसे बद्ध मांस रुधिरसे लेपित॥५८॥चर्मसे
सप्ताहोऽपि तथा धन्यः कृष्णलोकफलप्रदः॥ कंपंते सर्वपापानि सप्ताहश्रवणे स्थिते॥५४॥ अस्माकं प्रलयं सद्यः कथा चेयं करिष्यति॥ आर्द्रं शुष्कं लघु स्थूलं वाङ्मनःकर्मभिः कृतम्॥५५॥ श्रवणं विदहेत्पापं पावकः समिधो यथा॥ अस्मिन्वै भारतेवर्षे सूरिभिर्वेदसंसदि॥५६॥ अकथाश्रविणां पुंसां निष्फलं जन्म कीर्तितम्॥ किं मोहतो रक्षितेन सुपुष्टेन बलीयसा॥५७॥ अश्रवेण शरीरेण शुकशास्त्रकथां विना॥ अस्थिस्तंभं स्नायुबद्धं मांसशोणितलेपितम्॥५८॥ चर्मावनद्धं दुर्गंधं पात्रं मूत्रपुरीषयोः॥ जराशोकविपाकार्तं रोगमंदिरमातुरम्॥५९॥ दुष्पूरं दुर्धरं दुष्टं सदोषं क्षणभंगुरम्॥ कृमिविड्भस्मसंज्ञांतं शरीरमिति वर्णितम्॥६०॥ अस्थिरेण स्थिरं कर्म कुतोऽयं साधयेन्न हि॥ यत्प्रातः संस्कृतं चान्नं सायं तच्च विनश्यति॥६१॥ तदीयरससंपुष्टे काये का नाम नित्यता। सप्ताह श्रवणाल्लोके प्राप्यते निकटे हरिः॥६२॥
आच्छादित दुर्गन्धयुक्त मूत्र पुरीषका पात्र है।बुढापा, शोकके फलसे युक्त रोगका स्थान दुःखरूप॥५९॥कभी मरता नहीं दुर्धर खोटा दोषसहित क्षणभंगुर कीडे विष्ठा और भस्मसंज्ञावाला यह शरीर कहा है॥६०॥इस अस्थिरसे सदैव रहनेहारा कर्म क्यों न साधन किया जाय जो प्रातःकाल खाया हुआ अन्न सायंकालमें नष्ट होजाता है॥६१॥सो अन्नादिके रससे पुष्ट इस कायाकी क्या नित्यता है क्षणभंगुर है सप्ताह श्रवण करनेसे लोकमें भगवान् निकटही प्राप्त होते हैं॥६२॥
इससे दोषनिवृत्तिके निमित्त एक यही साधन है जलोंमें बुद्बुदेकी नाईं, जंतुओंमें मशककी नाईं, कथाश्रवण रहित जन वृथाही उत्पन्न होते हैं॥६३॥जहाॅजड और सूखे बाॅसकी भी गांठें टूट गईं तो फिर चित्तकी ग्रंथि टूट जाय तो क्या आश्चर्य है॥६४॥हृदयकी ग्रंथि टूट जाती सब संदेह नाश होजाते कर्म क्षय होजाते हैं जो सप्ताह श्रवण करते हैं॥६५॥ संसाररूपी कीचडमें फॅसे हुओंको धोनेमें यह कथा श्रेष्ठ है जिसका चित्त कथारूपी तीर्थमें है उसकी पंडितोंने मुक्ति कही है॥६६॥यह उसके कहते हुएही वैकुंठसे विमान आया जिसके चारों ओर प्रभा फैली
अतो दोषनिवृत्त्यर्थमेतदेव हि साधनम्॥ बुद्बुदा इव तोयेषु मशका इव जंतुषु॥ जायन्ते मरणायैव कथाश्रवणवर्जिताः॥६३॥ जडस्य शुष्कवंशस्य यत्र ग्रंथिविभेदनम्॥ चित्रं किमु तदा चित्तग्रंथिभेदः कथाश्रवात्॥६४॥ भिद्यते हृदयग्रंथिश्छिद्यंते सर्वसंशयाः॥ क्षीयंते चास्य कर्माणि सप्ताहश्रवणे कृते॥६५॥ संसारकर्दमालेपप्रक्षालनपटीयसि॥ कथातीर्थे स्थिते चित्ते मुक्तिरेव बुधैः स्मृता॥६६॥ एवं ब्रुवति वै तस्मिन्विमानमगमत्तदा॥ वैकुंठवासिभिर्युक्तं प्रस्फुरद्दीप्तिमंडलम्॥६७॥ सर्वेषां पश्यतां भेजे विमानं धुंधुलीसुतः॥ विमाने वैष्णवान्वीक्ष्य गोकर्णोवाक्यमब्रवीत्॥६८॥ गोकर्ण उवाच॥ अत्रैव बहवः संति श्रोतारो मम निर्मलाः॥ आनीतानि विमानानि न तेषां युगपत्कुतः॥६९॥ श्रवणं समभागेन सर्वेषामिह दृश्यते॥ फलभेदः कुतो जातः प्रब्रुवंतु हरिप्रियाः॥७०॥ हरिदासा ऊचुः॥ श्रवणस्य विभेदेन फलभेदोपि संस्थितः॥ श्रवणं तु कृतं सर्वैर्न तथा मननं कृतम्॥७१॥
हुई वैकुंठ वासियोंसे युक्त॥६७॥सबके देखते हुए धुॅधुलीका पुत्र विमानमें बैठा और तब विमानमें वैष्णवोंको बैठा देखकर गोकर्ण कहने लगा॥६८॥गोकर्ण बोले यहाॅबहुतसे सुननेवाले उज्ज्वल चित्त मेरी कथाके हैं उनके निमित्त विमान क्यों नहीं आये॥६९॥जब कि, सबका श्रवण बराबरही होता है तो फलमें भेद क्यों हुआ है हरिके प्यारो? यह बात कहो॥७०॥हरिदास बोले, श्रवणके भेदसे फलका भी भेद हुआ है सबने सुना है परन्तु तिस प्रकारसे मनन नहीं किया॥७१॥
इसकारणसे भजनसेभी फलभेद हुआ सात रात्रिपर्यंत व्रत करके प्रेतने श्रवण किया॥७२॥और उसने स्थिरचित्त होकर मननादि भी किया जिसको दृढ नहीं होता उसका ज्ञान हत है जिसने प्रमादसे सुनाहै वोहभी हत है॥७३॥संदिग्ध मंत्र हत है व्यग्रचित्तका जप हत अर्थात् निरर्थक है वैष्णवरहित देश हत है अपात्र अर्थात् विद्या सद्गुण रहितको श्राद्धमें देनाभी वृथा है॥७४॥वेदविद्यारहितको दान देना निरर्थक है सदाचाररहित कुल हत है गुरुके वाक्योंमें विश्वास और अपनेमें दीनताकी भावना करनी योग्य है॥७५॥मनके दोषोंको जीतना कथामें निश्चल
फलभेदस्ततो जातो भजनादपि मानद॥ सप्तरात्रमुपोष्यैव प्रेतेन श्रवणं कृतम्॥७२॥ मननादि तथा तेन स्थिरचित्ते कृतं भृशम्॥ अदृढं च हतं ज्ञानं प्रमादेन हतं श्रुतम्॥७३॥ संदिग्धो हि हतो मंत्रो व्यग्रचित्तो हतो जपः॥ अवैष्णवो हतो देशो हतं श्राद्धमपात्रकम्॥७४॥ हतमश्रोत्रिये दानमनाचारहतं कुलम्॥ विश्वासो गुरुवाक्येषु स्वस्मिन्दीनत्वभावना॥७५॥ मनो दोषजयश्चैव कथायां निश्चला मतिः॥ एवमादि कृतं चेत्स्यात्तदा वै श्रवणे फलम्॥७६॥ पुनः श्रवांते सर्वेषां वैकुंठे वसतिर्ध्रुवम्॥ गोकर्ण तव गोविंदो गोलोकं दास्यति स्वयम्॥७७॥ एवमुक्त्वा ययुः सर्वे वैकुंठं हरि कीर्तनाः॥ श्रावणे मासि गोकर्णः कथामूचे तथा पुनः॥७८॥ सप्तरात्रवतीं भूयः श्रवणं तैः कृतं पुनः॥ कथासमाप्तौ यज्जातं श्रूयतां तच्च नारद॥७९॥ विमानैः सह भक्तैश्च हरिराविर्बभूव ह॥ जयशब्दा नमश्शब्दास्तत्रासन्बहवस्तदा॥८०॥
मति रखनी जब इसप्रकार से विश्वस्त शुद्धचित्त हो तब कथा सुननेका फल होता है॥७६॥फिर कथान्तमें सबका वैकुंठलोकमें वास होताहै हे गोकर्ण!तुझे तो गोविंद भगवान् स्वयं गोलोकको देंगे॥७७॥ इसप्रकार से कहकर वे भगवान् केपार्षद सब वैकुंठलोकको चले गये फिर श्रावणके महीनेमें गोकर्णने कथाका आरंभ किया॥७८॥फिर सात रात्रिवाली सप्ताहकी कथाको उन सबने सुना॥ हे नारदजी!सुनो जब कथा समाप्त हुई तब॥७९॥विमानों और भक्तों सहित भगवान् प्रगट हुए तब चारों ओरसे जयशब्द नमः शब्द होने लगा॥८०॥
भगवान् ने प्रसन्न होकर तहाॅपांचजन्य शंखकी ध्वनि करी गोकर्णको आलिंगन करिकै अपने रूपकी समान बनालिया॥८१॥और जितने श्रोता थे उनको क्षणमात्रमें भगवान् नेघनश्याम पीतवस्त्रयुक्त किरीट कुंडलधारी करदिया॥८२॥और जो उस ग्राममें श्वानसे लेकर चांडालादि जाति के थे वेभी गोकर्णकी कृपासे विमानमें स्थितहुए॥८३॥वे भगवान् नेउस स्थानमें भेजदिये जहाॅयोगी गमन करते हैं और गोपाल श्रीकृष्णचंद्र गोकर्णसहित गोपवल्लभ गोलोकको गये॥८४॥कथा श्रवणसे प्रसन्न होकर भक्तवत्सल भगवान् गये जैसे पूर्वकालमें श्रीरामचंद्र अयोध्या
पांचजन्यध्वनिं चक्रे हर्षात्तत्र स्वयं हरिः॥ गोकर्णं तु समालिंग्याकरोत्स्वसदृशं हरिः॥८१॥ श्रोतॄनन्यान्घनश्यामान्पीतकौशेयवाससः॥ किरीटिनः कुंडलिनस्तथा चक्रे हरिः क्षणात्॥८२॥ तद्ग्रामे ये स्थिता जीवा आश्वचांडालजातयः॥ विमाने स्थापितास्तेऽपि गोकर्णकृपया तदा॥८३॥ प्रेषिता हरिलोके तै यत्र गच्छंति योगिनः॥ गोकर्णे न स गोपालो गोलोकं गोपवल्लभम्॥८४॥ कथाश्रवणतः प्रीतो निर्ययौ भक्तवत्सलः। अयोध्यावासिनः पूर्वं यथा रामेण संगताः॥८५॥ तथा कृष्णेन ते नीता गोलोकं योगिदुर्लभम्॥ यत्र सूर्यस्य सोमस्य सिद्धानां न गतिः कदा॥ तं लोकं हि गतास्ते तु श्रीमद्भागवतश्रवात्॥८६॥ ब्रूमोऽद्य ते किं फलवृंदमुज्ज्वलं सप्ताहयज्ञेन कथासु संचितम्॥ कर्णेन गोकर्णकथाक्षरं यैः पीतं च ते गर्भगता न भूयः॥८७॥वातांबुपर्णाशनदेहशोषणैस्तपोभिरुग्रैश्चिरकालसंचितैः॥ योगैश्च संयाति न तां गतिं वै सप्ताहगाथाश्रवणेन याति याम्॥८८॥
वासियोंको साकेत लोकको लेगयेथे॥८५॥इसीप्रकार भगवान् कृष्णचंद्रभी योगियोंके दुर्लभ गोलोकको उन्हे लेगये वहां सूर्य चंद्रमा और सिद्धोंकीभी कभी गति नहीं होती॥८६॥जो सप्ताहयज्ञमें इस कथाश्रवणसे फल प्राप्त होता है है महात्माओ!हम कहांतक वर्णन करें जिन्होंने गोकर्णकथाके अक्षर कर्णद्वारा पान किये हैं वे फिर गर्भमें नहीं आते॥८७॥जिस गतिको सप्ताह श्रवण करनेसे प्राप्त होते हैं तिस गतिको पवन जल पत्ते भक्षण करि तपस्यासे देहके सुखानेवाले बहुत दिनोंसे उग्र तपके संचयवाले तथा योगीभी नहीं प्राप्त होते॥८८॥
इस पवित्र इतिहासकोभी शांडिल्य मुनीश्वर चित्रकूटमे पाठ करनेसे ब्रह्मानंदसे व्याप्त हुए॥८९॥यह पवित्र आख्यान है जो इसे एक बार भी पाठकर लेताहै उसके सब पाप दूर होजाते हैं जो श्राद्ध में पढैतो पितरोंकी तृप्ति होती है नित्य पाठ करनेसे फिर जन्म नही होता॥९०॥इति श्रीपद्मपुराणे उत्तरखंडे श्रीभागवतमाहात्म्ये भाषाटीकायां गोकर्णवर्णनं नाम पंचमोऽध्यायः॥५॥कुमार बोले - अब हम तुम्हे सप्ताह श्रवणकी विधि सुनाते हैं जो विधि प्रायः धनसे भी साध्य है॥१॥प्रथम तो ज्योतिषीको बुलाकर मुहूर्त पूछैजैसी विवाहादिमें मंडप रचना होती है तिसप्रकार करै॥२॥
इतिहासमिमं पुण्यं शांडिल्योऽपि मुनीश्वरः॥ पठते चित्रकूटस्थो ब्रह्मानंदपरिप्लुतः॥८९॥ आख्यानमेतत्परमं पवित्रं श्रुतं सकृद्वै विदहेदघौघम्॥ श्राद्धे प्रयुक्तं पितृतृप्तिमावहेन्नित्यं सुपाठादपुनर्भवं च॥९०॥ इति श्रीपद्मपुराणे उत्तरखंडे श्रीभागवतमाहात्म्ये गोकर्णमोक्षवर्णनं नाम पंचमोऽध्यायः॥५॥ कुमारा ऊचुः॥ अथ ते संप्रवक्ष्यामः सप्ताहश्रवणे विधिम्॥ सहायैर्वसुभिश्चैव प्रायः साध्यो विधिः स्मृतः॥१॥ दैवज्ञं तु समाहूय मुहूर्तं पृच्छ्ययत्नतः॥ विवाहे यादृशं वित्तं तादृशं परिकल्पयेत्॥२॥ नभस्य आश्विनोर्जौच मार्गशीर्षः शुचिर्नभाः॥ एते मासाः कथारंभे श्रोतॄणां मोक्षसूचकाः॥३॥ मासानां विग्रहे यानि तानि त्याज्यानि सर्वथा॥ सहायाश्चेतरे चात्र कर्तव्याः सोद्यमाश्च ये॥४॥ देशे देशे तथा सेयं वार्ता प्रेष्या प्रयत्नतः॥ भविष्यति कथा चात्र आगंतव्यं कुटुंबिभिः॥५॥ दूरे हरिकथाः केचिद्दूरे चाच्युतकीर्तनाः॥ स्त्रियः शूद्रादयो ये च तेषां बोधो यतो भवेत्॥॥६॥
भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, आषाढ, श्रावण ये महीनें कथारंभमें सुननेवालोंको मोक्षसूचक हैं॥३॥जो महीनो के विग्रह हैं अर्थात् भद्रा, दग्ध, व्यतीपात, वैधृत, गंडान्त, रक्ष, मृत्यु उत्पातादि निंदित दिनोंको त्यागदे और सहाय जो अच्छा दिन नक्षत्रादि हैं सो सर्वथा करणीय हैं॥४॥देश देश में यत्नपूर्वक यह वार्ता प्रगटकर देनी हमारे यहाँ कथा होगी सब कोई कुटुम्बसहित आओ॥५॥कोई हरिकथासे दूर हैं, कोई अच्युतके गुण कीर्तनसे दूर हैं, स्त्री शूद्रादिकोंको जिसप्रकारसे बोध होजाय सो करना॥६॥
देश देशमें जो विरक्त वैष्णव कीर्तन करनेवाले हैं उनके पास भी पत्र भेजने और यह लिखदेना॥७॥ महादुर्लभ सात दिनपर्यन्त सत्पुरुषोंका समाज होगा और अपूर्वरसरूपी भगवान् की कथा होगी॥८॥श्रीमद्भागवतरूपी अमृतके पानमें रसलंपट आप प्रेमीजन शीघ्र आइये॥९॥यदि अवकाश न हो तो एक दिनको तो अवश्य आइये क्योंकि इस समाजका क्षणमात्रकाभी सत्संग दुर्लभ है॥१०॥ इसप्रकार से उन सबको पत्र भेजकर आयेहुओंके निमित्त वास और स्थान कल्पना करें॥११॥चाहे तीर्थमें, चाहे वनमें, चाहे घरमें सुनै
देशेदेशे विरक्ता ये वैष्णवाः कीर्तनोत्सुकाः॥ तेष्वेव पत्रं प्रेष्यं च तल्लेखनमितीरितम्॥७॥ सतां समाजो भविता सप्तरात्रं सुदुर्लभः॥ अपूर्वरसरूपेव कथा चात्र भविष्यति॥८॥ श्रीभागवतपीयूषपानाय रसलंपटाः॥ भवंतश्च तथा शीघ्रमायांतु प्रेमतत्पराः॥९॥ नावकाशः कदाचिच्चेद्दिनमात्रं तथापि तु॥ सर्वथागमनं कार्यं क्षणोऽत्रैव सुदुर्लभः॥१०॥ एवमाकारणं तेषां कर्तव्यं विनयेन च॥ आगंतुकानां सर्वेषां वासस्थानानि कल्पयेत्॥११॥ तीर्थे वापि वने वापि गृहे वा श्रवणं मतम्॥ विशाला वसुधा यत्र कर्तव्यं तत्कथास्थलम्॥१२॥ शोधनं मार्जनं भूमेर्लेपनं धातुमंडनम्॥ गृहोपस्करमुद्धृत्य गृहकोणे निवेशयेत्॥१३॥ अर्वाक्पंचाहतो यत्नादास्तीर्णानि प्रमेलयेत्॥ कर्तव्यो मंडपः प्रोच्चैः कदलीखंडमंडितः॥१४॥ फलपुष्पदलैर्विष्वग्वितानेन विराजितः॥ चतुर्दिक्षु ध्वजारोपो बहुसंपद्विराजितः॥१५॥
कहीं कथा स्थान बडी पृथ्वीमें कल्पना करे जहाॅबहुत स्थान हो॥१२॥ जलादिकोंसे संमार्जन कर बुहारीसे बुहार गोबर से लीपदे गेरू आदिकोंसे चित्रित कर घरकी सामग्री उठाकर एक कोनेमें लगादे॥१३॥पांच दिन पहले बड़े बड़े आसन ग्रहणकर रक्खे केलेके वृक्षोंसे मंडित मंडप ऊॅचा बनावै॥१४॥ फल पुष्प पत्ते आदि सहित चारोंओर बंदनवार बांधदे चारोंओर ध्वजा बांधदे वितान अर्थात् चंदोवा तानदे॥१५॥
वेदिकाके ऊपरभागमें सात लोक अर्थात् सात स्थान बनावैउनमें विरक्त ब्राह्मण बैठावै॥१६॥प्रथम तो तिन्हैंयथायोग्य आसन दे पुनः वक्ताकोभी एक दिव्य सुंदर ऊँचा आसन जिसपर बैठकर कथा कहै॥१७॥वक्ता उत्तरकी ओर मुख करके बैठे और सुननेहारे पूर्वकी ओर मुख करके बैठें अथवा वक्ता पूर्वको देखकर बैठे श्रोता उत्तरको॥१८॥अथवा पूजा करनेहारे और पूज्यके मध्यसे पूर्वदिशामें सब सुननेहारे बैठें॥१९॥विरक्त वैष्णव ब्राह्मण वेदशास्त्रानुसार शुद्ध अथवा वेदशास्त्रका जाननेहारा दृष्टान्त देनेमें कुशल धीर लोभरहित ऐसा वक्ता होना चाहिये॥२०॥जो अनेक धर्मोमें भ्रमते हैं अर्थात् जहां जैसा देखा वहाँ पैसेके निमित्त उसी मतमें होगये स्त्रीलंपट अर्थात् पराई
ऊर्ध्वं सप्तैव लोकाश्च कल्पनीयाः सविस्तरम्॥ तेषु विप्रा विरक्ताश्च स्थापनीयाः प्रबोध्य च॥१६॥ पूर्वं तेषामासनानि कर्तव्यानि यथोत्तरम्॥ वक्तुश्चापि तदा दिव्यमासनं परिकल्पयेत्॥१७॥ उदङ्मुखो भवेद्वक्ता श्रोता वै प्राङ्मुखस्तदा॥ प्राङ्मुखश्चेद्भवेद्वक्ता श्रोता चोदङ्मुखस्तदा॥१८॥ अथ वा पूर्वदिग्ज्ञेयाः पूज्यपूजकमध्यतः॥ श्रोतॄणामागमे प्रोक्ता देशकालादिकोविदैः॥१९॥ विरक्तो वैष्णवो विप्रो वेदशास्त्राभिशुद्धिकृत्॥ दृष्टांतकुशलो धीरो वक्ता कार्योऽतिनिस्स्पृहः॥२०॥ अनेकधर्मविभ्रांताः स्त्रैणाः पाखंडवादिनः॥ शुकशास्त्रकथोच्चारे त्याज्यास्ते यदि पंडिताः॥२१॥ वक्तुः पार्श्वे सहायार्थमन्यः स्थाप्यस्तथाविधः॥ पंडितः संशयच्छेत्ता लोकबोधनतत्परः॥२२॥ वक्त्रा क्षौरं प्रकर्तव्यं दिनादर्वाग्व्रताप्तये॥ अरुणोदयेऽसौ निर्वर्त्य शौचं स्नानं समाचरेत्॥२३॥ नित्यं संक्षेपतः कृत्वा संध्याद्यं संप्रत्नतः॥ कथाविघ्नविघाताय गणनाथं प्रपूजयेत्॥२४॥
स्त्रियोंको चोरीसे ले भागनेवाले पाखंडवादी यदि वे पंडित भी हों तोभी यह श्रेष्ठ शास्त्रकी कथा उनसे न कहावै॥२१॥कथा कहनेवालेके धोरे एक औरभी पंडित स्थापन करने योग्य है जो संदेहोंको छेदन करनेमें समर्थ हो लोकोंको समझासकै॥२२॥व्रतके निमित्त वक्ताको एक दिन पहले क्षौर कराना योग्य है और अरुणोदय होतेही यह शौचादिसे निवृत्तहो स्नान करै॥२३॥ प्रथम तो नित्य संध्या संक्षेपसे करके कथाके विघ्ननाशके निमित्त गणेशजीका पूजन करै॥२४॥
पितरोंका तर्पण करकैशुद्धिके वास्ते प्रायश्चित्त करै, एक मंडल बनाकर हरि भगवान् का पूजन करना चाहिये॥२५॥कृष्णके उद्देशसे अर्थात् “नमः कृष्णाय” इस मंत्रोंसे आरंभ कर पूजा सम्पूर्ण करै प्रदक्षिणा नमस्कारादि करकै पूजाके अन्तमें स्तुति करै॥२६॥कि, हे करुणानिधान! संसारसागरमें मग्न हुये मुझ दीनको जो कि, मैं कर्ममोहसे गृहीत होरहा हूं आप संसारसागरसे उद्धार कीजिये॥२७॥ फिर श्रीमद्भागवतकी भी पूजा यत्नपूर्वक करनी चाहिये प्रीतिसे धूप दीप नैवेद्य करे॥२८॥फिर नारियल चढाकर नमस्कार करै, फिर प्रसन्न चित्त होकर स्तुति
पितॄन्संतर्प्य शुद्ध्यर्थं प्रायश्चित्तं समाचरेत्॥ मंडलं च प्रकर्तव्यं तत्र स्थाप्यो हरिस्तथा॥२५॥ कृष्णमुद्दिश्य मंत्रेण चरेत्पूजाविधिं क्रमात्॥ प्रदक्षिणनमस्कारान्पूजांते स्तुतिमाचरेत्॥२६॥ संसारसागरे मग्नं दीनं मां करुणानिधे॥ कर्ममोहगृहीतांगं मामुद्धर भवार्णवात्॥२७॥ श्रीमद्भागवतस्यापि ततः पूजा प्रयत्नतः॥ कर्तव्या विधिना प्रीत्या धूपदीपसमन्विता॥२८॥ ततस्तु श्रीफलं दत्त्वा नमस्कारं समाचरेत्॥ स्तुतिः प्रसन्नचित्तेन कर्तव्या केवलं तदा॥२९॥ श्रीमद्भागवताख्योऽयं प्रत्यक्षः कृष्ण एव हि॥ स्वीकृतोऽसि मया नाथ मुक्त्यर्थं भवसागरे॥३०॥ मनोरथो मदीयोयं सफलः सर्वथा त्वया॥ निर्विघ्नेनैव कर्तव्यो दासोहं तव केशव॥३१॥ एवं दीनवचः प्रोक्त्वावक्तारं चाथ पूजयेत्॥ संभूष्य वस्त्रभूषाभिः पूजांते तं च संस्तवेत्॥३२॥ शुकरूप प्रबोधज्ञ सर्वशास्त्रविशारद। एतत्कथाप्रकाशेन मदज्ञानं विनाशय॥३३॥ तदग्रे नियमः पश्चात्कर्तव्यः श्रेयसे मुदा॥सप्तरात्रं यथाशक्त्या धारणीयः स एव हि॥३४॥
करै॥२९॥ यह श्रीभागवतकी कथा प्रत्यक्ष श्रीकृष्णरूपही है। हे नाथ!भवसागरसे मुक्तहोनेके निमित्त मैंने यह स्वीकार किया है॥३०॥यह मेरा मनोरथ तुम्हींसे सफल होगा सो महाराज मैं आपका दास हूं ऐसा हो कि, इसकी निर्विघ्न समाप्ति होजाय॥३१॥ ऐसे नम्र वचन कहकर फिर वक्ताका पूजान करै।वस्त्र भूषणसे भूषित कर फिर पूजा करके स्तुति करै॥३२॥आप शुकदेवके रूप ज्ञानदेनेहारे सब शास्त्रके ज्ञाता हो इस कथाके प्रकाशसे मेरा अज्ञान दूर करो॥३३॥फिर वक्ता के आगे कल्याणके निमित्त नियम करै प्रसन्न होकर यथाशक्ति सात रात्रितक नियम धारण करे॥३४॥
कथाभंगनिवृत्तिके निमित्त पांच ब्राह्मणोंको वरण करैवे द्वादशाक्षर “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” इस विद्याका जप करते रहैं॥३५॥और वैष्णव ब्राह्मणोंको तथा हरिचरित्र कीर्तन करने वालोंको नमस्कार कर पूजन कर उनसे आज्ञा ले आप आसनपर बैठे॥३६॥ लोक, धन, स्थान, पुत्रादि सबकी चिंता त्यागन करकै कथामें शुद्ध बुद्धिसे चित्त लगावैउसे उत्तम फल प्राप्त होताहै॥३७॥वक्ताको सूर्योदयसे लेकर साढेतीन प्रहरतक कथा बाँचनी योग्य है और जल्दी न करैधीरे कंठसे बाँचे॥३८॥दुपहरको दो घडीपर्यंत कथाका विराम करै कथान्तमें वैष्णव भगवा
वरणं पंचविप्राणां कथाभंगनिवृत्तये॥ कर्तव्यं तैर्हरेर्जाप्यं द्वादशाक्षरविद्यया॥३५॥ब्राह्मणान्वैष्णवांश्चान्यांस्तथा कीर्तनकारिणः॥ नत्वा संपूज्य दत्ताज्ञः स्वयमासनमाविशेत्॥३६॥ लोकवित्तधनागारपुत्रचितां व्युदस्य च॥ कथाचित्तः शुद्धमतिः स लभेत्फलमुत्तमम्॥३७॥ आसूर्योदयमारभ्य सार्धत्रिप्रहरांतिकम्॥ वाचनीया कथा सम्यग्धीरकंठं सुधीमता॥३८॥ कथाविरामः कर्तव्यो मध्याह्ने घटिकाद्वयम्॥ तत्कथामनुकार्यं वै कीर्तनं वैष्णवैस्तदा॥३९॥ मलमूत्रजयार्थं हि लघ्वाहारः सुखावहः॥ हविष्यान्नेन कर्तव्यो ह्येकवारं कथार्थिना॥४०॥ उपोष्य सप्तरात्रं वै शक्तिश्चेच्छृणुयात्तदा॥ घृतपानं पयःपानं कृत्वा वै शृणुयात्सुखम्॥४१॥ फलाहारेण वा श्राव्यमेकभुक्तेन वा पुनः॥ सुखसाध्यं भवेद्यत्तु कर्तव्यं श्रवणाय तत्॥४२॥ भोजनं तु वरं मन्ये कथाश्रवणकारणम्॥ नोपवासो वरः प्रोक्तः कथाविघ्नकरो यदि॥४३॥
न् का कीर्तन करै॥३९॥मल मूत्रकी बाधा शान्तिके निमित्त लघु आहार करना योग्य है सो कथा सुननेहारोंको चावल दुग्धादिका भोजन एकबार कर्तव्य है॥४०॥ यदि शक्ति हो तो सात रात्रिपर्य्यन्त व्रत करकै कथा सुनै अथवा घृतपान दुग्धपान कर सुनै॥४१॥या फलाहार करकै सुने वा एकही बार भोजन करें अथवा जिसप्रकारसे श्रवण करनेमें आलस्य न आवै सुखमिले सो करै॥४२॥यदि भोजन करनेसे कथाश्रवण करनेमें आलस्यादि न आवै तो अच्छा है और यदि उपवास करने से कथामें विघ्न पडे तो वोह ठीक नहीं॥४३॥
हे नारदजी! सप्ताहमें व्रत करनेवालोंके तुम नियम सुनो विष्णुदीक्षाविहीन जो गायत्रीका जप वा जिन्होंने भगवान् का मंत्र गुरुसे नहीं लियाहै उनका कथाश्रवणकरनेमें अधिकार नहीं है॥४४॥ब्रह्मचर्य, पृथ्वीमें शयन, पत्तलमें भोजन, कथासमाप्तिमें भोजन, नित्यव्रती करै॥४५॥कथा सुनने वाले व्रती दो पत्तेवाले अन्न, मधु, तैल, गरिष्ठ अन्न, स्वाभाविक दुष्ट अन्न और बासी अन्नको सदा त्यागन करे॥४६॥काम, क्रोध, मद, मान, मत्सर, लोभ, दंभ, मोह, वैर कथाश्रवणकरनेहारा त्यागदे॥४७॥कथाका व्रती वेद वैष्णव ब्राह्मण गुरु गौ व्रतधारी स्त्री राजा कुटुम्बियोंकी निंदा न
सप्ताहव्रतिनां पुंसां नियमाञ्छृणु नारद॥ विष्णुदीक्षाविहीनानां नाधिकारः कथाश्रवे॥४४॥ ब्रह्मचर्यमधः सुप्तिः पत्रावल्यां च भोजनम्॥ कथासमाप्तौ भुक्तिं च कुर्यान्नित्यं कथाव्रती॥४५॥ द्विदलं मधु तैलं च गरिष्ठान्नं तथैव च॥ भावदुष्टं पर्युषितं जह्यान्नित्यं कथाव्रती॥४६॥ कामं क्रोधं मदं मानं मत्सरं लोभमेव च॥ दंभं मोहं तथा द्वेषं दूरयेच्च कथाव्रती॥४७॥ वेदवैष्णवविप्राणां गुरुगोव्रतिनां तथा॥ स्त्रीराजमहतां निन्दां वर्जयेद्यः कथाव्रती॥४८॥ रजस्वलांत्यजम्लेच्छपतितव्रात्यकैस्तथा॥ द्विजद्विङ्वेदबाह्यैश्च न वदेद्यः कथाव्रती॥४९॥ सत्यं शौचं दयां मौनमार्जवं विनयं तथा॥ उदारं मानसं तद्वदेवं कुर्यात्कथाव्रती॥५०॥ दरिद्रश्च क्षयी रोगी निर्भाग्यः पापकर्मवान्॥ अनपत्यो मोक्षकामः शृणुयाच्च कथामिमाम्॥५१॥ अपुष्पा काकवंध्या च वंध्या या च मृतार्भका॥ स्रवद्गर्भा च या नारी तया श्राव्या प्रयत्नतः॥५२॥
करै॥४८॥ रजस्वला नीच म्लेच्छ पतित चांडाल ब्राह्मणद्वेषीऔर जोवेदबाह्य हैं उनसे व्रती बात न करै॥४९॥सत्य, पवित्रता, दया, मौन, नम्रता, विनय, मनमें उदारता यह व्रतीको कर्तव्य हैं॥५०॥ दरिद्री क्षयी रोगी निर्भाग्य पापकर्मा जिसके पुत्र न हो और मुक्तिकी इच्छावाला सदा इस कथाको सुनै॥५१॥जिसको रजोदर्शन न होता हो काकवंध्या अर्थात् एकबार जिसके बालक हुआहो अथवा जिसके बालक होकर मरजातेहों जिसका गर्भ गिरनेलगे वह स्त्रीभी कथाको प्रयत्नसे सुनै॥५२॥
इन सात दिनपर्यंत जो विधिपूर्वक सुनैतो अक्षय फल होताहै, यह दिव्य कथा अत्युत्तम है, करोडों यज्ञ फलकी देनेहारी है॥५३॥ इसप्रकार व्रतका विधान करकै फिर उद्यापन करै फलकी इच्छा करनेवालोंको जन्माष्टमीके व्रतकी नाईं यह कर्तव्य है॥५४॥ निष्किंचन अर्थात् निष्काम भक्तोंको उद्यापनकी आवश्यकता नहीं है वे निष्काम वैष्णव श्रवणमात्रसेही पवित्र होजाते हैं॥५५॥ इस सप्ताहयज्ञकी समाप्तिमें श्रोताओंको पुस्तककी और वक्ताकी भक्तिपूर्वक पूजा करनी योग्य है॥५६॥ प्रसाद नैवेद्य तुलसीमाला सुननेवालोंको देनी फिर मृदंग ताल आदि
एतेषु विधिना श्रावे तदक्षय्यतरं भवेत्॥ अत्युत्तमा कथा दिव्या कोटियज्ञफलप्रदा॥५३॥ एवं कृत्वा व्रतविधिमुद्यापनमथाचरेत्॥ जन्माष्टमीव्रतमिव कर्तव्यं फलकांक्षिभिः॥५४॥ अकिंचनेषु भक्तेषु प्रायो नोद्यापनाग्रहः॥ श्रवणेनैव पूतास्ते निष्कामा वैष्णवा यतः॥५५॥ एवं नगाहयज्ञेऽस्मिन्समाप्ते श्रोतृभिस्तदा॥ पुस्तकस्य च वक्तुश्च पूजा कार्याऽतिभक्तितः॥५६॥ प्रसादतुलसी मालाः श्रोतृभ्यश्चाथ दीयताम्॥ मृदंगतालललितं कर्तव्यं कीर्तनं ततः॥॥५७॥ जयशब्दं नमश्शब्दं शंखशब्दं च कारयेत्॥ विप्रेभ्यो याचकेभ्यश्च वित्तमन्नं च दीयताम्॥५८॥ विरक्तश्चेद्भवेच्छ्रोता गीता वाच्या परेऽहनि॥ गृहस्थश्चेत्तदा होमः कर्तव्यः कर्मशांतये॥५९॥ प्रतिश्लोकं च जुहुयाद्विधिना दशमस्य च॥ पायसं मधु सर्पिश्च तिलान्नादिकसंयुतम्॥६०॥ अथवा हवनं कुर्याद्गायत्र्या सुसमाहितः॥ तन्मयत्वात्पुराणस्य परमस्य च तत्त्वतः॥६१॥
बाजोंसे कीर्तन करना योग्य है॥५७॥ फिर जयशब्द नमःशब्द और शंखध्वनि करै ब्राह्मण और याचकोंको धन और अन्न दे॥५८॥ जो मुख्य श्रोता विरक्त हो तो दूसरे दिन गीता बाँचनी और जो गृहस्थ होय तो कर्मशांतिके निमित्त हवन कर्तव्य है॥५९॥ प्रतिश्लोक दशमस्कंधकेसे विधिपूर्वक खीर शहद घी तिल अन्नोंसे हवन करै॥६०॥ अथवा गायत्री से सावधान होकर हवन करैक्योंकि यह परम पुराण तत्त्वसे गायत्रीमय ही है॥६१॥
जो होम करनेमें असमर्थ हो तो बुद्धिमान् उसके फलकी सिद्धि के निमित्त होम करने योग्य वस्तु दे अनेक प्रकार छिद्रशांतिके निमित्त और न्यूनता अधिकता॥६२॥ दोषोंके शान्त करनेको सहस्रनामका पाठ करैइससे सब सफल होजाता है क्योंकि इससे अधिक और कुछ नहीं है॥॥६३॥ फिर बारह ब्राह्मणोंको बूरा मिश्रित खीरसे भोजन करावैऔर व्रतपूर्तिके निमित्त सुवर्ण गाय देना योग्य है॥६४॥ और जो समर्थ हो तो तीन पलका सोनेका सिंह बनाकर उसके ऊपर सुंदर अक्षरोंसे लिखीहुई यह पुस्तक स्थापन करै॥६५॥ पूजन कर आवाहनादि उपचार दक्षिणा सहित वस्त्र भूषण गंधादिसे पूजित जितेन्द्रिय॥६६॥ बुद्धिमान् आचार्यके निमित्त पुस्तक प्रदान करैतौ भवबंधनसे मुक्त होजाय
होमाशक्तौ बुधो हौम्यं दद्यात्तत्फलसिद्धये॥ नानाच्छिद्रनिरोधार्थं न्यूनताधिकताख्ययोः॥६२॥ दोषयोः प्रशमार्थं च पठेन्नामसहस्रकम्॥ तेन स्यात्सफलं सर्वं नास्त्यस्मादधिकं यतः॥६३॥ द्वादश ब्राह्मणान्पश्चाद्भोजयेन्मधुपायसैः॥ दद्यात्सुवर्णंधेनुं च व्रतपूर्णत्वहेतवे॥६४॥ शक्तौ पलत्रयमितं स्वर्णसिंहं विधाय च॥ तत्रास्य पुस्तकं स्थाप्यं लिखितं ललिताक्षरम्॥६५॥ संपूज्यावाहनाद्यैस्तदुपचारैः सदक्षिणम्॥ वस्त्रभूषणगंधाद्यैः पूजिताय यतात्मने॥६६॥ आचार्याय सुधीर्दत्त्वा मुक्तः स्याद्भवबंधनैः॥ एवं कृते विधाने च सर्वपापनिवारणे॥६७॥ फलदं स्यात्पुराणं तु श्रीमद्भागवतं शुभम्॥ धर्मकामार्थमोक्षाणां साधनं स्यान्न संशयः॥६८॥ कुमारा ऊचुः॥ इति ते कथितं सर्वं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि॥ श्रीमद्भागवतेनैव भुक्तिमुक्ती करे स्थिते॥६९॥ सूत उवाच॥ इत्युक्त्वा ते महात्मानः प्रोचुर्भागवतीं कथाम्॥ सर्वपापहरां पुण्यां भुक्तिमुक्तिप्रदायिनीम्॥७०॥
इस प्रकारके सब पाप हरनेहारे विधानके करनेसे॥६७॥ यह श्रीमद्भागवत पुराण फलका देनेहारा होताहै। यह धर्मार्थकाममोक्षका साधनहै इसमें, कुछभी सन्देह नहीं है॥६८॥कुमार बोले नारदजी, यह तो सब कुछ तुमको सुनाया अब क्या सुननेकी इच्छाहै? श्रीमद्भागवतके श्रवण करनेसेही भुक्ति मुक्ति हाथमें स्थित होतीहै॥६९॥ सूतजी बोले, ऐसा कहने के उपरान्त वे सनकादिक महात्मा भागवतकी कथा वर्णन करते हुए जो कथा सब पापकी हरनेहारी पुण्यरूप भुक्ति मुक्तिकी देनेहारीहै॥७०॥
इस सप्ताह कथाको सब जितेंद्रिय महात्मा और सबप्राणियोंसे यथाविधि श्रवण करनेसे पुरुषोत्तम भगवान् कोप्रसन्न किया॥७१॥तिससे अन्तमें ज्ञान वैराग्य और भक्तिकी बड़ी पुष्टि हुई सब प्राणियोंके मनहरनेहारे ज्ञान वैराग्य तत्काल तरुण होगये॥७२॥नारदजी अपना मनोरथ पूर्ण होजानेसे कृतार्थ होगये शरीर पुलकित सर्वांगमें आनंद भरगया॥७३॥इसप्रकार भगवान् के प्यारे नारदजी कथा श्रवण करके प्रेमसे गद्गदवाणी हो हाथ जोड सनकादिकोंसे॥७४॥नारदजी बोले – मैं धन्य हूं, आप करुणासागरोंने मेरे ऊपर बड़ी कृपा की, आज मुझे
शृण्वतां सर्वभूतानां सप्ताहं नियतात्मनाम्॥ यथाविधि ततो देवं तुष्टुवुः पुरुषोत्तमम्॥७१॥ तदंते ज्ञानवैराग्यभक्तीनां पुष्टता पुरा॥ तारुण्यं परमं चाभूत्सर्वभूतमनोहरम्॥७२॥ नारदश्च कृतार्थोऽभूत्सिद्धे स्वीये मनोरथे॥ पुलकी कृतसर्वांगः परमानंदसंभृतः॥७३॥ एवं कथां समाकर्ण्य नारदो भगवत्प्रियः॥ प्रेमगद्गदया वाचा तानुवाच कृतांजलिः॥७४॥ नारद उवाच॥॥ धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि भवद्भिः करुणापरैः॥ अद्य मे भगवाँल्लब्धः सर्वपापहरो हरिः॥७५॥ श्रवणं सर्वधर्मेभ्यो वरं मन्ये तपोधनाः॥ वैकुंठस्थो यतः कृष्णः श्रवणाद्यस्य लभ्यते॥७६॥ सूत उवाच॥ एवं ब्रुवति वै तत्र नारदे वैष्णवोत्तमे॥ परिभ्रमन्समायातः शुको योगेश्वरस्तदा॥७७॥तत्राययौ षोडशवार्षिकस्तदा व्यासात्मजो ज्ञानमहाब्धिचंद्रमाः॥ कथावसाने निजलाभपूर्णः प्रेम्णा पठन्भागवतं शनैश्शनैः॥७८॥
सब पाप हरनेहारे हरि भगवान् मिलगये॥७५॥हे तपोधनवारे महात्माओ!सब धर्मोंसे श्रवणधर्म अधिक है कारण कि, जिसके श्रवणसे वैकुंठमें स्थित कृष्ण प्राप्त होतेहैं॥७६॥सूतजी बोले कि, वैष्णवोत्तम नारदजी जिससमय यह कहरहेथे उसी समय विचरते हुए योगीश्वर शुकदेवजी आगये॥७७॥वोह षोडश वर्षकी अवस्था युक्त व्यासजीके पुत्र ज्ञानमहासागरके चन्द्रमा श्रीमद्भागवतके प्रकाशक कथावसानमें अपनेही लाभसे परिपूर्ण प्रेमपूर्वक शनैःशनैः श्रीमद्भागवतका पाठकरते हुए आये॥७८॥
इन बडे उग्र तेजस्वीको देखतेही सब सभासद् उठ खडेहुये और महा आसन दिया और नारदजीने प्रीतिपूर्वक उनका पूजन किया तब सुखसे स्थित हो शुकदेवजी बोले सो वाणी सुनो॥७९॥शुकदेवजी बोले वेद कल्पवृक्ष है उसका यह भागवत फल है सो मुझ शुकदेव के मुखसे पृथ्वीमें गिराहै इस कारण अमृतरूपी रससे संयुक्त है जिस फलमें तोतेकी चोंच लगजाती है वोह अधिक मीठा होता है यहाँ शुकरूपी शुकदेवजीने इसका स्वाद लिया है इसकारण यह अधिक मीठा होगया है “यह भाग्य है” यह भक्तिरूप रससे पूर्ण है हेरसिको!भगवच्चरितामृत पान करनेहारे महात्माओ!इससे मोक्षभी न्यून है इसकारण इसे वारंवार पान करो॥८०॥जिस श्रीमद्भागवतमेंसे फलकांक्षारूप कपट धर्म सम्यक् त्यागदियाहै
दृष्ट्वा सदस्याः परमोरुतेजसं सद्यः समुत्थाय ददुर्महासनम्॥ प्रीत्या सुरर्षिस्तमपूजयत्सुखं स्थितोऽवदत्संशृणुतामलां गिरम्॥७९॥ श्रीशुक उवाच॥ निगमकल्पतरोर्गलितं फलं शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम्॥ पिबत भागवतं रसमालयं मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः॥८०॥ धर्मः प्रोज्झितकैतवोऽत्र परमो निर्मत्सराणां सतां वेद्यं वास्तवमत्र वस्तुशिवदं तापत्रयोन्मूलनम्॥ श्रीमद्भागवते महामुनिकृते किं वा परैरीश्वरः सद्यो हृद्यवरुध्यतेऽत्र कृतिभिः शुश्रूषुभिस्तत्क्षणात्॥८१॥ श्रीमद्भागवतं पुराणतिलकं यद्वैष्णवानां धनं यस्मिन्पारमहंस्यमेकममलं ज्ञानं परं गीयते॥ यत्र ज्ञानविरागभक्तिसहितं नैष्कर्म्यमाविष्कृतं तच्छृण्वन्प्रपठन्विचारणपरो भक्त्या विमुच्येन्नरः॥८२॥
केवल ईश्वरसेवारूप धर्म निरूपण किया है मत्सरता रहित सत्पुरुषोंका इसमें अधिकार है महामुनि श्रीनारायणके बनायेहुए इस श्रीमद्भागवतमें वास्तव परमार्थरूप एक परमेश्वरही जानने योग्य है जो कल्याणदायक तीनों तापका नाश करनेहारा है निश्चय श्रीमद्भागवतके सुननेवाले माहात्माओंके हृदयमें शीघ्र ईश्वर प्राप्त होजाताहै क्या और शास्त्रोंसे शीघ्र हृदयमें प्राप्त होजाताहै अर्थात् नहीं होता॥८१॥यह श्रीमद्भागवत पुराणों में श्रेष्ठ वैष्णवों का परमधन है जिसमें भक्तोंके परमप्रिय ज्ञान परब्रह्म श्रीकृष्णही गाये जाते हैं जिस श्रीमद्भागवतमें ज्ञान वैराग्य भक्तिसहित निष्कर्मतारूप ब्रह्म हृदयमें प्राप्त होते हैं इसके श्रवण पठन करनेसे विचारकरने भक्ति करनेसे मनुष्य मुक्त होजाता है॥८२॥
स्वर्गमें सत्यलोकमें कैलासमें वैकुंठमें यह रस नहीं है इस कारणसे सद्भाग्यवाले इसे पियो कभी त्याग न करो॥८३॥सूतजी बोले, शुकदेवजीके ऐसा कहते संते सभाके मध्य में नारायण प्रगट होगये। प्रह्लाद, बलि, उद्धव, अर्जुनादि करके युक्त भगवान् कानारदजीने पूजन किया॥८४॥आगे आसनमें बैठे हुए भगवानके सम्मुख वे सब कीर्तन करने लगे पार्वती सहित शिव और ब्रह्माजी कीर्त्तन दर्शन करनेके निमित्तं तहाॅआये॥८५॥प्रह्लादने तालैं धारण करीं, तरलगति से उद्धवने छैने अर्थात् झॅझ धारण करीं, नारदजीने वीणा धारण
स्वर्गे सत्ये च कैलासे वैकुंठे नास्त्ययं रसः॥ अतः पिबंतु सद्भाग्या मा मा मुंचत कर्हिचित्॥८३॥ सूत उवाच॥ एवं ब्रुवाणे सति बादरायणे मध्ये सभायां हरिराविरासीत्॥ प्रह्लादबल्युद्धवफाल्गुनादिभिर्वृतः सुरर्षिस्तमपूजयच्च तान्॥॥८४॥ दृष्ट्वा प्रसन्नं महदासने हरिं ते चक्रिरे कीर्त्तनमग्रतस्तदा॥ भवो भवान्या कमलासनस्तु तत्रागमत्कीर्तनदर्शनाय॥८५॥ प्रह्लादस्तालधारी तरलगतितया चोद्भवः कांस्यधारी वीणाधारी सुरर्षिः स्वरकुशलतया रागकर्ताऽर्जुनोऽभूत्॥ इंद्रोऽवादीन्मृदंगं जयजयसुकराः कीर्तने ते कुमारा यत्राग्रे भाववक्ता रसविरचनया व्यासपुत्रो बभूव॥८६॥ ननर्त मध्ये त्रिकमेव तत्र भक्त्यादिकानां नटवत्सुतेजसाम्॥ अलौकिकं कीर्तनमेतदीक्ष्य हरिः प्रसन्नोऽपि वचोऽब्रवीत्तत्॥८७॥ मत्तो वरं भागवताः शृणुध्वं प्रीतः कथाकीर्तनतोऽस्मि सांप्रतम्॥ श्रुत्वेति तद्वाक्यमतिप्रसन्नाः प्रेमार्द्रचित्ता हरिमूचिरे ते॥८८॥
किया, स्वरभेदमें कुशल होनेसे अर्जुनने राग गाना प्रारम्भ किया, इन्द्रने मृदंग बजाना प्रारम्भ किया। कुमार जय जय अथवा धन्य २ कहने लगे और सबके आगे रसकी विरचनासे भावके बतानेवाले शुकदेवजी हुए॥८६॥उन तेजस्वियोंके स्थानमें भक्ति ज्ञान वैराग्योंका त्रिक नटकी नाईं नाचने लगा यह अलौकिक कीर्तन देखकर नारायण प्रसन्न होकर वचन बोले॥८७॥ हे भक्तो! तुम्हारे कीर्तनसे मैं बहुत प्रसन्न हुआ जो इच्छा हो सो वर माँगों। यह सुनकर वे सब हरिभक्त प्रेमसे गद्गद हो बोले॥८८॥
महाराज! सप्ताहकी कथाओं मे इसीप्रकार आपको प्रगट होना योग्य है अथवा भक्तोंके हृदयमें प्रगटहुआ कीजिये यही हमारा मनोरथ पूर्ण करो बहुत अच्छा ऐसा कहकर नारायण अन्तर्धान होगये॥८९॥इसके उपरान्त नारदजी सनकादिकोंके चरणोंको नमस्कार करते हुए और शुकदेवजी तथा अन्य तपस्वियोंकोभी नमस्कार किया वे सब मोहरहित प्रसन्न हो कथामृत पान करकैयथास्थानको चले गये॥९०॥भक्ति ज्ञान वैराग्य सहित शुकदेवजीने इस भागवत शास्त्रमें स्थापित करीहै इस कारण भागवतके सेवन करनेसे भगवान् वैष्णवोंके चित्तमें प्राप्त होते हैं॥९१॥
नगाहगाथासु च सर्वभक्तैरेभिस्त्वया भाव्यमतिप्रयत्नात्॥ मनोरथोऽयं परिपूरणीयस्तथेति चोक्त्वान्तरधीयताच्युतः॥८९॥ ततोऽनमत्तच्चरणेषु नारदस्तथा शुकादीनपि तापसांश्च॥ अथ प्रहृष्टाः परिनष्टमोहाः सर्वे ययुः पीतकथामृतास्ते॥९०॥ भक्तिः सुताभ्यां सह रक्षिता सा शास्त्रे स्वकीयेपि तदा शुकेन॥ अतो हरिर्भागवतस्य सेवनाच्चित्तं समायाति हि वैष्णवानाम्॥९१॥ दारिद्र्यदुःखज्वरदाहितानां मायापिशाचीपरिमर्द्दितानाम्॥ संसारसिंधोः परिपातितानां क्षमाय वै भागवतं प्रगर्जति॥९२॥ शौनक उवाच॥ शुकेनोक्तं कदा राज्ञे गोकर्णेन कदा पुनः॥ सुरर्षये कदा ब्राह्मैश्छिंधि मे संशयं त्विमम्॥९३॥ सूत उवाच॥ आकृष्णनिर्गमात्त्रिंशद्वर्षाधिकगते कलौ॥ नवमीतो नभस्ये च कथारंभं शुकोऽकरोत्॥९४॥
दारिद्र्य दुःखज्वरसे दुःखित माया पिशाचिनीसे मर्दित संसारसमुद्र में गिरतेहुओंको कल्याणके निमित्त यह भागवतकी कथा गर्जतीहै॥९२॥शौनकजी बोले, शुकदेवजीने राजा परीक्षित्को यह कथा कब सुनाई और गोकर्णने कब सुनाई तथा सनत्कुमारादिकोंने नारदजीको कब सुनाई? यह हमारा संदेह दूर करो॥९३॥सूतजी बोले – कृष्णचंद्रके परलोक जानेके तीस वर्ष उपरान्त भादोंके शुक्ल पक्षकी नौमीको शुकदेवजी ने यह कथा राजा परीक्षितको सुनाई॥९४॥
परीक्षित्को कथासुनानेके दोसौ वर्ष उपरान्त आषाढके शुक्ल पक्षमें गोकर्णने कथाका आरम्भ कियाथा॥९५॥तिससेभी फिर कलियुगके तीनसौ वर्ष व्यतीत होनेमें कार्तिकके शुक्ल पक्षमें सनकादिकोंने कथा सुनाई॥९६॥ हे पापरहित!जो कुछ तुमने पूछा सो मैंने सुनाया कलियुगमें।यह भागवतकी वार्ता संसाररोगकी नाश करनेवाली है॥९७॥ कृष्णकी प्यारी सबपापोंकी नाश करनेहारी मुक्तिकी कारण भक्तिकी लीला कराने हारी यह कथाहै जो जो महात्मा आदरसे इस कथाको पान करते हैं उनको और तीर्थोंके सेवन करनेकी क्या आवश्यकता है॥९८॥ यमराजने
परीक्षिच्छ्रवणांते च कलौ वर्षशतद्वये॥ शुद्धे शुचौ नवम्याञ्च धेनुजोऽकथयत्कथाम्॥९५॥ तस्मादपि कलौ प्राप्ते त्रिंशद्वर्षगते सति॥ ऊचुरूर्जे सिते पक्षे नवम्यां ब्रह्मणः सुताः॥९६॥ इत्येतत्ते समाख्यातं यत्पृष्टोऽहं त्वयाऽनघ॥ कलौ भागवती वार्ता भवरोगविनाशिनी॥९७॥ कृष्णप्रियं सकलकश्मलनाशनं च मुक्त्येकहेतुमिह भक्तिविलासकारि॥ संतः कथानकमिदं पिबतादरेण लोके हितार्थपरिशीलनसेवया किम्॥९८॥ स्वपुरुषमभिवीक्ष्य पाशहस्तं वदति यमः किल तस्य कर्णमूले॥परिहर भगवत्कथासु मत्तान्प्रभुरहमन्यनृणां न वैष्णवानाम्॥९९॥ असारे संसारे विषयविषसंगाकुलधियः क्षणार्धंक्षेमार्थं पिबत शुकगाथाऽतुलसुधाम्॥ किमर्थं व्यर्थं भो व्रजत कुपथे कुत्सितकथे परीक्षित्साक्षी यच्छ्रवणगतमुन्युक्तिकथने॥१००॥
पाश हाथमें लिये अपने दूतोंके कानमें यह बात कही कि, जो भगवत्कथा रसमें मत्त हैं तुम उनके निकट कभी मत जाइयो मैं औरोंका कर्ता हूं परन्तु वैष्णवोंका नहीं हूं वे प्रतिदिन भागवतकी सेवा करते हैं॥९९॥इस असार संसारमें विषयरूपी विषके संसर्गसे व्याकुल बुद्धिवालोंको योग्य है कि आधे क्षणको तो अतुल अमृतरूपी शुकदेवजीकी गाथाको कल्याणके निमित्त पानकरें, अरे!कुत्सित कथाके कुमार्गमें क्यों व्यर्थ फिरते हो इस कथाके श्रवण करनेमें निश्चय मुक्ति होती है इस वार्त्ताके महाराज परीक्षित् साक्षी हैं॥१००॥
रसप्रवाहके युक्त श्रीशुकदेवजीने यह कथा कही है जो कोई इसे कंठमें धारण करता है वोह वैकुंठका प्रभु होता है॥१०१॥ हे शौनक!इस प्रकारसे यह परमगुह्य सब सिद्धान्तोंका सिद्धान्त अनेक शास्त्रोंकी आलोचना कर कहा है जगत् मेंशुक कथासे निर्मल और कुछ नहीं है परम सुखके कारण द्वादशस्कंधात्मक श्रीमद्भागवत रसको पानकर॥१०२॥जो नियमित होकर इस कथाको श्रवण करते और भक्ति प्रीतिसे शुद्ध
रसप्रवाहसंस्थेन श्रीशुकेनेरिता कथा॥कंठे संबध्यते येन स वैकुंठप्रभुर्भवेत्॥१०१॥इति च परमगुह्यं सर्वसिद्धांतसिद्धं सपदि निगदितं ते शास्त्रपुंजं विलोक्य॥ जगति शुककथातो निर्मलं नास्ति किचित्पिबपरसुखहेतोर्द्वादशस्कन्धसारम्॥१०२॥एतां यो नियततया शृणोति भक्त्या यश्चैनां कथयति शुद्धवैष्णवाग्रे॥तौ सम्यग्विधिकरणात्फलं लभेते याथार्थ्यान्नहि भुवने किमप्यसाध्यम्॥१०३॥॥इति श्रीपाद्मे महापुराणे उत्तरखंडे श्रीमद्भागवतमाहात्म्ये श्रवणविधिकथनं नाम षष्ठोऽध्यायः॥६॥॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु॥ ॥छ॥ ॥छ॥
वैष्णवोंके आगे सुनाते हैवे वक्ता श्रोता सम्यक् विधान करनेसे सम्पूर्ण फलको प्राप्त होते हैं सत्य वचनसे संसारमें कोई वस्तुभी असाध्य नहीं है॥१०३॥इति श्रीपद्मपुराणे उत्तरखंडे श्रीमद्भागवतमाहात्म्ये कान्यकुब्जवंशोद्भवसुखानंदमिश्रसूनुपण्डित-ज्वालाप्रसादकृत-भाषाटीकायां श्रवण विधिकथनं नाम षष्ठोऽध्यायः॥६॥ शुभमस्तु॥
कवित्त – नित्यप्रति प्रेम नेम यम व्रत धारकर राखिकै विश्वास सुनै कथा मन लायकै॥ ताके सब पापके पहारहू विलाय जात होय सो पवित्र ब्रह्म तीर्थमैं नहायके॥कैसोही हो कार्य अभिलाषहियेमाहिं धरो तुर्त होय सिद्ध सुख पाइये अघायकै॥ कहै ज्वालाप्रसाद जो पाठ करै सदैवहू धर्म अर्थ काम मोक्ष लेवै सो बुलायकै॥१॥
दोहा – श्रीव्रजचन्द मुकुन्दको, ध्यान हृदयमें लाय।कियो महातमको तिलक, यदुपति रहैं सहाय॥
एतच्छ्रीमद्भागवतमाहात्म्यं भाषाटीकासमेतं मुंबय्यां श्रीकृष्णदासात्मजेन खेमराजेन स्वकीये “श्रीवेङ्कटेश्वर” स्टीम् – यन्त्रालयेऽङ्कितम्। वैशाख कृष्ण शके १८३५, संवत् १९७०.
श्रीभागवतस्थवृत्तलक्षणानि उवाचपरिगणनं ग्रंथसंख्यागणना च।
॥श्रीहरिः॥ निगमकल्पतरोः०
॥ द्रुतविलंबितमाह नभौ भरौ॥ जयजय जह्यजामजित०॥ यह वेदस्तुतिमें नर्कुटक छंदहै॥ ताको लक्षण॥ यदि भवतो नजौ भजजला गुरु नर्कुटकम्॥ वामबाहुकृतवामकपोलो०॥ इहां युगलगीतमें स्वागता छंदहै॥तस्य लक्षणम्॥ स्वागतेति रनभाद्गुरुयुग्मम्॥ जन्माद्यस्य यतो०॥ यह शार्दूलविक्रीडित छंदहै॥ तस्य ल०॥ सूर्याश्वैर्मसजस्तताः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्॥॥ नृवाजिकांचनशिबिकाभिरच्युतं०॥ यह रुचिरा छंद है॥तस्य लक्षणम्॥ जभौ सजौगिति रुचिरा चतुर्ग्रहैः॥ चतुर्थमें दक्षयज्ञकी स्तुतिमें॥ सदस्या ऊचुः॥ उत्पत्त्यध्वन्यशरण उरुक्लेशदुर्गेऽत्रकोग्र०॥ यह मंदाक्रांता छंदहै॥ तस्यलक्षणम्॥ मंदाक्रांतांबुधिरसनगैर्मोभनौ तौगयुग्मम्॥ रुद्र उवाच॥ तववरदवराह्ना०॥ यह मालिनी छंदहै तल्लक्षणम्॥ ननमयययुततेयं मालिनी भोगिलोकैः॥ पत्न्य ऊचुः॥ यज्ञोयं तव यजनाय०॥ यह प्रहर्षिणी छंद है॥ तल्लक्षणम्॥ आशाभिर्मनजरगाः प्रहर्षणीयम्॥ सिद्धा ऊचुः॥ अयं त्वत्कथामृष्टपीयूषनद्याम्॥ यह भुजंगप्रयात छंद है॥तल्लक्षणम्॥ भुजंगप्रयातं चतुर्भिर्यकारैः॥ यजमान्युवाच॥ स्वागतं ते प्रसीदेश तुभ्यं नमः०॥ यह स्रग्विणी छंदहै॥ तल्लक्षणम्॥ कीर्त्तितैषा चतूरेफिका स्रग्विणी॥ लोकपाला ऊचुः॥ दृष्टः किं नो दृग्भिरसद्ग्रहैस्त्वं यह वातोर्म्मी छंद है॥तल्लक्षणम्॥ वातोर्म्मीयं गदिताम्भौतगौगः॥ ब्राह्मणा ऊचुः॥ त्वं ऋतुस्त्वं हविः॥ यहभी स्रग्विणी छंदहै॥ योगेश्वरा ऊचुः॥ जगदुद्भवस्थितिलयेषु०॥ यह मंजुभाषिणी छंदहै॥ तल्लक्षणम्॥ सजसा जगौ च यदि मंजुभाषिणी॥ गंधर्वाप्सरस ऊचुः॥ अंशां शास्ते देवमरीच्यादय एते०॥ यह मत्तमयूर छंदहै॥ तल्लक्षणम्॥ वेदैरंध्रैर्म्नौयसगामत्तमयूरम्॥ सप्तम में प्रह्लादचरित्र देवतानकी स्तुतिमें॥चारणा ऊचुः॥ हरेतवांघ्रिपंकजम्०॥ यह प्रमाणिका छंद है॥तल्लक्षणम्॥ प्रमाणिका जरौलगौ॥ तीर्थंचक्रे नृपाणां यदजनियदुषु०॥ यह स्रग्धरा छंद है॥ ताको लक्षण॥ म्रभ्नैर्यानांत्रयेण त्रिमुनियतियुता स्रग्धरा कीर्तितेयम्॥ इति मतिरुपक
Xपता वितृष्णा०॥ यह भीष्मजी की स्तुति॥ पुष्पिताग्रा छंदहे ताको लक्षण॥ अयुजि नयुगरफतोयकारो युजि तु नजौ जरगाश्च पुष्पिताग्रा॥ नायं देहो देहभाजां नृलोके०॥ यह शालिनी छंद है॥तल्लक्षणम्॥ मात्तौ गौ चेच्छालिनी वेदलोकैः॥ इति छंदांसि॥ अथ उवाच॥ प्रथमस्कंध में॥ वेदव्यास०॥३॥ सूत०॥३३॥ ऋषय०॥२॥ शौनकः॥६॥ नारद॥३॥ अर्जुन०॥१॥ भगवान्०॥२॥ कुंत्युवाच॥१॥ भीष्म उवाच॥१॥ रजोवाच॥३॥ ब्रह्मणा ऊचुः॥१॥ युधिष्ठिर उ०॥४॥ संजय०॥१॥ धारण्युवा०॥१॥ धर्म उ०॥१॥ प्रथमस्कंध में सब उवाच ६३ हैं॥अथ द्वितीयस्कंधे॥ शुकउ०॥८॥ राजोवा०॥३॥ शौनकउ०॥२॥ सूत०॥४॥ नारद उ०॥१॥ ब्रह्मा उ०॥४॥ भगवानु०॥२॥ द्वितीयस्कंधमें सब उवाच २४ है॥ अथ तृतीयस्कंध में॥ शुक उ०॥१४॥ रजोवा०॥२॥ सूत उ०॥५॥ विदुर०॥११॥
उद्धव ३ भगवान् २० मैत्रेय ४२ शौनक २ कुमाराः १ देवाः २ ऋषिरु० ४ ब्रह्मो० ८ मनु २ ऋषयः २ दिति ३ कश्यप २ मुनयः १ देवहूती ७ जीव १॥ तृतीयस्कंधमें सब उवाच १३४ हैं॥ अथ चतुर्थस्कंधे॥ मैत्रेय ६६ विदुर ९ शुक ३ अत्रि १ देवाः २ सती १ ऋषिरु० १ भगवान् ६ देवी १ ब्रह्मा ३ दक्ष २ महादेव १ राजो० ५सूत २ ऋत्विजः १ सदस्याः १ रुद्र ३ भृगु १ इंद्र १ पत्न्यः १ ऋषयः २ सिद्धाः १ यजमानी १ लोकपालाः १ योगेश्वर 9 अग्नि १ ब्राह्मण १ पृथ्वी १ देव्यः १ राम २ प्रचेतस २ सुरुचि १ नारद १ ध्रुव ३ मुनयः २ मनु १ धनद १ सुनंदनंदौ १ अंग २ सदसस्पतयः १ वेन १ पृथु ४ प्रजा १ धरा १ सनत्कुमार १॥ चतुर्थस्कंधमें सब उवाच १५९ हैं॥ अथ पंचमस्कंध में राजो० ६ शुक २२ ब्रह्मो १ भगवान्२ ऋषभदेव ३ ऋषिरु० ४ सहो १ ब्राह्मण ३ रहूगण १ भद्रश्रवस १॥ पंचमस्कंध में ४२ हैं॥ अथ षष्ठस्कंधे राजो० १० शुक ३९ बादरायणि ६ विष्णु दूताः २ ऋषिरु० ३ ब्रह्मो १ विश्वरूप १ देवा ३ यम १ सूत ३ प्रजापति १ भगवान् ३ दक्ष १ वृत्र १ इंद्र १ परीक्षित् १ चित्रकेतु ४ अंगिरा २ पार्वती १ दिति २ कश्यप २ नारद २ जीव १॥ षष्ठस्कंधमें सब ९२ हैं॥ अथ सप्तमस्कंधे॥ राजो० २ शुक ३ नारद २८ युधिष्ठिर ६ ऋषि १ हिरण्यकशिपु ५ यम २ प्रह्लाद ८ ब्रह्मो ४ गुरु १ दैत्यपुत्रा १ इंद्र २ रुद्र १ विद्याधर १ सिद्धा १ पितरः १ ऋषयः १ नागा १ मनवः १ प्रजापतयः १ गंधर्वा १ चारणा १ किंपुरुषा १ वैतालिका १ किन्नरा १ विष्णुपार्षदा १ भगवान् ४ ब्राह्मण १॥ सप्तमस्कंधमें सब ८२ हैं॥ अथ अष्टमस्कंधे॥ राजो ७ ऋषि २ मनु १ शुक ४९ सूत ३ गजेंद्र १ गुरु १ भगवान् १२ ब्रह्मो ४ प्रजापति १ शिव २ बलि ६ विंध्यावली १ नारद १ बादरायणि १ अदिति ३ कश्यप १ प्रह्लाद १ शुक्र १॥ अष्टमस्कंधमें९९ हैं॥नवमस्कंधे॥ राजो० ८ शुक ३१ सूत १ ब्रह्मा १ शंकर १ भगवान् २ बादरायणि ४ अंबरीष १ दुर्वासा १ अंशुमान १ ब्राह्मण १ देवा १ पुरूरवा १ उर्वशी २ ययाति १ यदु१ पूरु १ शकुंतला १ दुष्यंत १॥ नवमस्कंध में सब ६१ हैं॥ अथ दशमस्कंधपूर्वार्द्धे॥ राजो० १० शुक ९३ सूत ३ वसुदेव ५ देवकी १ भगवान् १५ नंद ३ नंदादय ऊचुः १ गर्ग २ नारद १ ब्रह्मा १ नागपत्न्यः १ काली १ ऋषि २ गोपा ऊ० १ यज्ञपत्न्यः १ इंद्र १ सुरभि १ बादरायणि ५ वरुण १ गोप्य ऊ० ६ सर्प १ अक्रूर ५ सैरंध्री १ चाणूर १ गुरु १ समुद्र १ उद्धव २ धृतराष्ट्र १ पूर्वार्द्धमें सब १६८ हैं॥ अथ उत्तरार्द्धे॥ शुक ७३ भगवान् २९ राजो० १४ मुचकुंद २ बादरायणि १२ रुक्मिणी ३ ब्राह्मण ३ रति १ युधिष्ठिर ३ कुन्ती १ वसुदेव ४ द्रौपदी १ सत्यभामा १ जांबवती १ भद्रा १ मित्रविंदा १ लक्ष्मणा २ कालिंदी २ महिष्यः २ मुनयः १ सूत ३ देवकी १ बलि १ श्रुतदेव १ भूमि १ उषा १ चित्रलेखा १ ज्वर १ रुद्र १ नृग १ नारद ५ ऋषि ४ ऋषयः ३ दूत १ उद्धव १ राजा १ सारथि १ अर्जुन १ परीक्षित् १ सनंदन १ श्रुतय ऊ० १॥ उत्तरार्द्धमें सब १९० हैं इति दशमः॥ अथ एकादशस्कंधे॥ बादरायणि २ राजो० ७
शुक १३ वसुदेव १ नारद ३ निमि ४ कवि १ हरि१ अंतरिक्ष १ प्रबुद्ध १ पिप्पलायन १ आविर्होत्र १ द्रुमिल १ चमस १ करभाजन १ देवा ऊ० १ ब्रह्मा १ भगवान् ४४ उद्धव २३ यदु १ ब्राह्मण ४ पिंगला १ सनकादयः १ ऋषि १ द्विज १ ऐल १ एकादश में सब ११६ हैं॥ अथ द्वादशस्कंधे॥ शुक ५ राजो० २ सूत १८ शौनक ४ याज्ञवल्क्य १ मार्कंडेय ३ भगवान् ३ ऋषि ३॥ द्वादशमें ३७ हैं॥ सब १२ स्कंधोका जोड़ १२६७॥ अथ स्तुतिर्लिख्यते॥ प्रथमस्कंधमें अर्जुनस्तुति २ कुंतीस्तुति १ भीष्मस्तुति ३॥ द्वितीयमे तृतीय में महदादिकस्तु० ४ ब्रह्मस्तुति ५ ऋषिस्तुति वराहकी ६ देवस्तुति ब्रह्माकी ७ कुमारस्तुति ८ कर्दमस्तुति ९ जीवस्तुति १० देवहूतिस्तु० ११॥ चतुर्थमे नरनारायणस्तुति १२ शिवप्रार्थना १३ दक्ष से क्षमाकराई १४ दक्षस्तुति विष्णुकी १५ ऋत्विज १६ सदस्य १७ रुद्र १८ भृगु १९ ब्रह्मा २० इद्र २१ पत्नी २२ ऋषि २३ सिद्धा २४ यजमानी २९ लोकपाल २६ योगेश्वर २७ ब्रह्मा २८ अग्नि २९ देवता ३० गंधर्वाप्सरा ३१ विद्याधर ३२ ब्राह्मण ३३ ध्रुवस्तु० ३४ पृथुस्तु० ३५ पृथ्वी कृत पृथुस्तु० ३६ पृथुकृतविष्णुस्तव ३७ प्रजाकृतस्तुति पृथुकी ३८ प्रचेताकृत विष्णुस्तुति ३९॥ पंचममे ऋत्विग्जनकृत विष्णुस्तु० ४० भवकर्तृक संकर्षणस्तु० ४१ भद्रश्रवः कर्तृकहयग्रीव० ४२ प्रह्लादकृत नृसिंहस्तुति ४३ लक्ष्मीकर्तृक भगवत्स्तु० ४४ सत्यव्रतकर्तृक मत्स्यस्तु० ४५ पृथ्वीकर्तृक वराहस्तु० ४६ हनुमत्कर्तृकरामस्तु० ४७ नारदकर्तृक नरनारायणस्तु० ४८॥ षष्टस्कंधमें॥हंसगुह्यस्तव ४९ वृत्रदेवकर्तृक विष्णुस्तु० २० पुनः देवकृत विष्णुस्तव ५१ चित्रकेतुकृतसंकर्षणस्तव ५२॥ सप्तमस्कंध में॥ हिरण्यकशिपुकर्तृक विष्णु ५३ ब्रह्मकर्तृकनृसिंहस्तव ५४ रुद्रकर्तृकनृ० ५५ इंद्रकर्तृक० नृ० ५६ ऋषिक० नृ० ५७ पितृक० नृ० ५८ सिद्धक० नृ० ५९ विद्याधरक० नृ० ६० नागकन्याक० नृ० ६१ मनुक० नृ० ६२ प्रजापतिक नृ० ६३ गंधर्वक० नृ० ६४ चारणक० नृ० ६५ यमक० नृ० ६६ किंपुरुषक० नृ० ६७ वैतालिकक० नृ० ६८ किन्नर० नृ०६९ विष्णुपार्ष०नृ० ७० प्रह्लाद० नृ० ७१ पुनर्ब्रह्मक० नृ० ७२॥ अष्टममें॥मनुकृतविष्णुस्तव ७३ गजेंद्रकृतविष्णुस्तव ७४ देवकृ० वि० स्त० ७५ ब्रह्म कृत वि० स्त० ७६ देवादिकृ० शिवस्त० ७७ शिवकृत० वि० स्त० ७८ अदितिकृत वि० स्त० ७९ ब्रह्मकृत विष्णु० स्त० ८० सत्यव्रतकृत० वि० स्त० ८१॥ नवमस्कंध में॥अंबरीषकृतसुदर्शनस्तव ८२ अंशुमत्कृतकपिलस्तुति ८३॥ दशममें पूर्वार्धमें॥गर्भस्तुति ८४ वसुदेवकृतस्तव ८५ देवकीक०स्तुति ८६ यमलार्जुन०स्तव ८७ ब्रह्मस्तुति ८८ नागपत्नी० स्तु० ८९ इंद्रकृ० स्तुति ९० नारदस्तु० ९१ अक्रूरस्तुति ९२ पुनः अक्रूरस्तव ९३॥ उत्तरार्द्धमें॥ मुचुकुंदस्तुति ९४ भूमि० स्तव० ९५ ज्वर० स्तव ९६ रुद्रस्तुति ९७ कौरवकृतबलदेवस्त० ९८ राजकृतस्तव ९९ बलिराज कृ० स्त० १०० श्रुतदेवस्त० १०१ बहुलाश्व० स्तव १०२ देवस्तव १०३॥ एकादशमें॥देव० स्तव १०४॥ द्वादशमें मार्कंडेयस्तव १०२॥
जिला मथुरा, ग्राम गोवर्धननिवासी महाभारती-पंडित-गोवर्धनात्मजस्य आनन्दवल्लभस्य कृतिरियं परोपकाराय।
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“अट्टमन्न शिवो वेद शूलो विक्रय उच्यते। केशो भगमिति प्रोक्तमृषिभिस्तत्त्वदर्शिभिः॥१॥” ↩︎