दीक्षित-पुष्पा

महामहोपाध्यायाचार्या डॉ. पुष्पा दीक्षित जी का जीवन इस बात का उदाहरण है कि किसी एक शास्त्र के प्रति दशकों की तपस्या क्या कर सकती है।

1 जुलाई 1942 को जबलपुर में जन्मी डॉ. दीक्षित ने संस्कृत में M.A. के दौरान तीन स्वर्ण पदक प्राप्त किए, Ph.D. की, संस्कृत विभागाध्यक्ष एवं प्राध्यापक रहीं, और उनकी वेबसाइट के अनुसार वे छह दशकों से अधिक समय से निरन्तर अध्यापन कर रही हैं।

लेकिन उनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान पाणिनीय व्याकरण में है।

लगभग चार दशकों के गहन अध्ययन और चिन्तन के बाद उन्होंने “पाणिनीया पौष्पी प्रक्रिया” विकसित की, जिसका उद्देश्य अष्टाध्यायी की शब्द-सिद्धि और प्रक्रियाविज्ञान को उसके अन्तर्निहित क्रम और गणितीय संरचना के आधार पर समझाना है।

इसी पद्धति के आधार पर उन्होंने अनेक ग्रन्थ तैयार किए हैं और पाणिनीय व्याकरण के अध्ययन की एक स्वतंत्र शिक्षण-परम्परा विकसित की है।

सन् 2000 में स्थापित पाणिनीय शोध संस्थान, बिलासपुर में देश-विदेश से आने वाले विद्यार्थियों और अध्यापकों को पाणिनीय व्याकरण पढ़ाया जाता है।

विशेष बात यह है कि संस्थान की पाठशाला में शिक्षा, भोजन और आवास तक निःशुल्क उपलब्ध कराया जाता है। ऑनलाइन अध्यापन भी 2020 से चल रहा है और लगभग 500 विद्यार्थी उससे जुड़ चुके हैं।

उन्होंने सौ से अधिक राष्ट्रीय संगोष्ठियों में शोधपत्र प्रस्तुत किए, विश्व संस्कृत सम्मेलन, Edinburgh में भारत से चयनित संस्कृत कवियों में स्थान पाया, लगभग 10,000 संस्कृत पुस्तकों का अपना पुस्तकालय शोधार्थियों के लिए उपलब्ध कराया और स्थानीय लोगों को गीता, स्तोत्र तथा शुद्ध संस्कृत उच्चारण तक निःशुल्क सिखाती रही हैं।

उनके सम्मान भी उनके कार्य की व्यापकता बताते हैं:

• वेद-वेदाङ्ग सम्मान

• राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम द्वारा Certificate of Honour

• छत्तीसगढ़ राज्य अलंकरण

• वाचस्पति

• महामहोपाध्याय

• महाराष्ट्र राज्य महाकवि कालिदास संस्कृत साधना पुरस्कार

• मानद D.Litt. सहित अनेक सम्मान।

ऐसे समय में जब हम अपने ही शास्त्रों के बारे में अक्सर secondary translations, ideological summaries और social-media quotations से मत बना लेते हैं, डॉ. पुष्पा दीक्षित जैसी विदुषी हमें एक बिल्कुल दूसरी दिशा दिखाती हैं:

मूल भाषा सीखिए।

व्याकरण सीखिए।

सूत्र का क्रम समझिए।

परम्परा पढ़िए।

फिर ग्रन्थ पर मत बनाइए।

संस्कृत की रक्षा केवल उसके गौरव की बातें करने से नहीं होगी।

उसके शास्त्रों को उसी कठोरता से पढ़ने वाले आचार्य और अगली पीढ़ी के शास्त्रज्ञ तैयार करने से होगी।

डॉ. पुष्पा दीक्षित जी ने अपना जीवन इसी कार्य में लगा दिया।

भारत को अपने ऐसे जीवित विद्वानों को केवल सम्मानित ही नहीं करना चाहिए, उनके ज्ञान को व्यवस्थित रूप से record, digitise, publish और अगली पीढ़ियों तक पहुँचाना चाहिए।

ऐसी विदुषियों की जीवित ज्ञान-परम्परा स्वयं हमारी राष्ट्रीय बौद्धिक धरोहर है।

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