२३१ स्वाहासत्कारो भद्रवटयात्रा देवासुरसङ्ग्रामः

भागसूचना

एकत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः

सूचना (हिन्दी)

स्कन्दद्वारा स्वाहादेवीका सत्कार, रुद्रदेवके साथ स्कन्द और देवताओंकी भद्रवट-यात्रा, देवासुर-संग्राम, महिषासुर-वध तथा स्कन्दकी प्रशंसा

मूलम् (वचनम्)

मार्कण्डेय उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

यदा स्कन्देन मातॄणामेवमेतत् प्रियं कृतम्।
अथैनमब्रवीत् स्वाहा मम पुत्रस्त्वमौरसः ॥ १ ॥

मूलम्

यदा स्कन्देन मातॄणामेवमेतत् प्रियं कृतम्।
अथैनमब्रवीत् स्वाहा मम पुत्रस्त्वमौरसः ॥ १ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

मार्कण्डेयजी कहते हैं— युधिष्ठिर! जब स्कन्दने इस प्रकार मातृगणोंका यह प्रिय मनोरथ पूर्ण किया, तब स्वाहाने आकर उनसे कहा—‘तुम मेरे औरस पुत्र हो॥१॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

इच्छाम्यहं त्वया दत्तां प्रीतिं परमदुर्लभाम्।
तामब्रवीत् ततः स्कन्दः प्रीतिमिच्छसि कीदृशीम् ॥ २ ॥

मूलम्

इच्छाम्यहं त्वया दत्तां प्रीतिं परमदुर्लभाम्।
तामब्रवीत् ततः स्कन्दः प्रीतिमिच्छसि कीदृशीम् ॥ २ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘अतः मैं चाहती हूँ कि तुम मुझे परम दुर्लभ प्रीति प्रदान करो।’ तब स्कन्दने पूछा—‘माँ तुम कैसी प्रीति पानेकी अभिलाषा रखती हो?’॥२॥

मूलम् (वचनम्)

स्वाहोवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

दक्षस्याहं प्रिया कन्या स्वाहा नाम महाभुज।
बाल्यात्प्रभृति नित्यं च जातकामा हुताशने ॥ ३ ॥

मूलम्

दक्षस्याहं प्रिया कन्या स्वाहा नाम महाभुज।
बाल्यात्प्रभृति नित्यं च जातकामा हुताशने ॥ ३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

स्वाहा बोली— महाबाहो! मैं प्रजापति दक्षकी प्रिय पुत्री हूँ, मेरा नाम स्वाहा है। मैं बचपनसे ही सदा अग्निदेवके प्रति अनुराग रखती आयी हूँ॥३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

न स मां कामिनीं पुत्र सम्यक् जानाति पावकः।
इच्छामि शाश्वतं वासं वस्तुं पुत्र सहाग्निना ॥ ४ ॥

मूलम्

न स मां कामिनीं पुत्र सम्यक् जानाति पावकः।
इच्छामि शाश्वतं वासं वस्तुं पुत्र सहाग्निना ॥ ४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

पुत्र! परंतु अग्निदेवको इस बातका अच्छी तरह पता नहीं है कि मैं उन्हें चाहती हूँ। बेटा! मेरी यह हार्दिक अभिलाषा है कि मैं नित्य-निरन्तर अग्निदेवके ही साथ निवास करूँ॥४॥

मूलम् (वचनम्)

स्कन्द उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

हव्यं कव्यं च यत्किंचिद् द्विजानां मन्त्रसंस्तुतम्।
होष्यन्त्यग्नौ सदा देवि स्वाहेत्युक्त्वा समुद्‌धृतम् ॥ ५ ॥
अद्यप्रभृति दास्यन्ति सुवृत्ताः सत्पथे स्थिताः।
एवमग्निस्त्वया सार्धं सदा वत्स्यति शोभने ॥ ६ ॥

मूलम्

हव्यं कव्यं च यत्किंचिद् द्विजानां मन्त्रसंस्तुतम्।
होष्यन्त्यग्नौ सदा देवि स्वाहेत्युक्त्वा समुद्‌धृतम् ॥ ५ ॥
अद्यप्रभृति दास्यन्ति सुवृत्ताः सत्पथे स्थिताः।
एवमग्निस्त्वया सार्धं सदा वत्स्यति शोभने ॥ ६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

स्कन्द बोले— देवि! आजसे सन्मार्गपर चलने-वाले सदाचारी धर्मात्मा मनुष्य देवताओं तथा पितरोंके लिये हव्य और कव्यके रूपमें उठाकर ब्राह्मणोंद्वारा उच्चारित वेदमन्त्रोंके साथ अग्निमें जो कुछ आहुति देंगे, वह सब स्वाहाका नाम लेकर ही अर्पण करेंगे। शोभने! इस प्रकार तुम्हारे साथ निरन्तर अग्निदेवका निवास बना रहेगा॥५-६॥

मूलम् (वचनम्)

मार्कण्डेय उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

एवमुक्ता ततः स्वाहा तुष्टा स्कन्देन पूजिता।
पावकेन समायुक्ता भर्त्रा स्कन्दमपूजयत् ॥ ७ ॥

मूलम्

एवमुक्ता ततः स्वाहा तुष्टा स्कन्देन पूजिता।
पावकेन समायुक्ता भर्त्रा स्कन्दमपूजयत् ॥ ७ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

मार्कण्डेयजी कहते हैं— युधिष्ठिर! स्कन्दके इस प्रकार कहने और आदर देनेपर स्वाहा बहुत संतुष्ट हुई। अपने स्वामी अग्निदेवका संयोग पाकर उसने भी स्कन्दका पूजन किया॥७॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ततो ब्रह्मा महासेनं प्रजापतिरथाब्रवीत्।
अभिगच्छ महादेवं पितरं त्रिपुरार्दनम् ॥ ८ ॥

मूलम्

ततो ब्रह्मा महासेनं प्रजापतिरथाब्रवीत्।
अभिगच्छ महादेवं पितरं त्रिपुरार्दनम् ॥ ८ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

तदनन्तर प्रजापति ब्रह्माजीने महासेनसे कहा—‘वत्स! अब तुम अपने पिता त्रिपुरविनाशक महादेवजीसे मिलो॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

रुद्रेणाग्निं समाविश्य स्वाहामाविश्य चोमया।
हितार्थं सर्वलोकानां जातस्त्वमपराजितः ॥ ९ ॥

मूलम्

रुद्रेणाग्निं समाविश्य स्वाहामाविश्य चोमया।
हितार्थं सर्वलोकानां जातस्त्वमपराजितः ॥ ९ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘भगवान् रुद्रने अग्निमें और भगवती उमाने स्वाहामें प्रवेश करके समस्त लोकोंके हितके लिये तुम-जैसे अपराजित वीरको उत्पन्न किया है॥९॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

उमायोन्यां च रुद्रेण शुक्रं सिक्तं महात्मना।
अस्मिन् गिरौ निपतितं मिञ्जिकामिञ्जिकं यतः ॥ १० ॥
सम्भूतं लोहितोदे तु शुक्रशेषमवापतत्।
सूर्यरश्मिषु चाप्यन्यदन्यच्चैवापतद् भुवि ॥ ११ ॥
आसक्तमन्यद् वृक्षेषु तदेवं पञ्चधापतत्।
तत्र ते विविधाकारा गणा ज्ञेया मनीषिभिः।
तव पारिषदा घोरा य एते पिशिताशिनः ॥ १२ ॥

मूलम्

उमायोन्यां च रुद्रेण शुक्रं सिक्तं महात्मना।
अस्मिन् गिरौ निपतितं मिञ्जिकामिञ्जिकं यतः ॥ १० ॥
सम्भूतं लोहितोदे तु शुक्रशेषमवापतत्।
सूर्यरश्मिषु चाप्यन्यदन्यच्चैवापतद् भुवि ॥ ११ ॥
आसक्तमन्यद् वृक्षेषु तदेवं पञ्चधापतत्।
तत्र ते विविधाकारा गणा ज्ञेया मनीषिभिः।
तव पारिषदा घोरा य एते पिशिताशिनः ॥ १२ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘महात्मा रुद्रने उमाके गर्भमें जिस वीर्यकी स्थापना की थी, उसका कुछ भाग इसी पर्वतपर गिर पड़ा था, जिससे मिंजिका-मिंजिक नामक जोड़ेकी उत्पत्ति हुई। शेष शुक्रका कुछ अंश लोहित-सागरमें, कुछ सूर्यकी किरणोंमें, कुछ पृथ्वीपर और कुछ वृक्षोंपर गिर पड़ा। इस प्रकार वह पाँच भागोंमें विभक्त होकर गिरा था। उसीसे ये तुम्हारे विभिन्न आकृतिवाले, मांसभक्षी एवं भयंकर पार्षद प्रकट हुए हैं; जिन्हें मनीषी पुरुष ही जान पाते हैं’॥१०—१२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

एवमस्त्विति चाप्युक्त्वा महासेनो महेश्वरम्।
अपूजयदमेयात्मा पितरं पितृवत्सलः ॥ १३ ॥

मूलम्

एवमस्त्विति चाप्युक्त्वा महासेनो महेश्वरम्।
अपूजयदमेयात्मा पितरं पितृवत्सलः ॥ १३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

तब अपरिमित आत्मबलसे सम्पन्न एवं पितृभक्त कुमार महासेनने ‘एवमस्तु’ कहकर अपने पिता भगवान् महेश्वरका पूजन किया॥१३॥

मूलम् (वचनम्)

मार्कण्डेय उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

अर्कपुष्पैस्तु ते पञ्च गणाः पूज्या धनार्थिभिः।
व्याधिप्रशमनार्थं च तेषां पूजां समाचरेत् ॥ १४ ॥

मूलम्

अर्कपुष्पैस्तु ते पञ्च गणाः पूज्या धनार्थिभिः।
व्याधिप्रशमनार्थं च तेषां पूजां समाचरेत् ॥ १४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

मार्कण्डेयजी कहते हैं— राजन्! धनार्थी पुरुषों-को आकके फूलोंसे उन पाँचों गणोंकी सेवा करनी चाहिये। रोगोंकी शान्तिके लिये भी उनका पूजन करना उचित है॥१४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

मिञ्जिकामिञ्जिकं चैव मिथुनं रुद्रसम्भवम्।
नमस्कार्यं सदैवेह बालानां हितमिच्छता ॥ १५ ॥

मूलम्

मिञ्जिकामिञ्जिकं चैव मिथुनं रुद्रसम्भवम्।
नमस्कार्यं सदैवेह बालानां हितमिच्छता ॥ १५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

मिंजिका-मिंजकका जोड़ा भी भगवान् शंकरसे उत्पन्न हुआ है। अतः बालकोंके हितकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको चाहिये कि वे सदा इस जोड़ेको नमस्कार करें॥१५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

स्त्रियो मानुषमांसादा वृद्धिका नाम नामतः।
वृक्षेषु जातास्ता देव्यो नमस्कार्याः प्रजार्थिभिः ॥ १६ ॥

मूलम्

स्त्रियो मानुषमांसादा वृद्धिका नाम नामतः।
वृक्षेषु जातास्ता देव्यो नमस्कार्याः प्रजार्थिभिः ॥ १६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

वृक्षोंपरसे गिरे हुए शुक्रसे ‘वृद्धिका’ नामवाली स्त्रियाँ उत्पन्न हुई हैं, जो मनुष्यका मांस भक्षण करनेवाली हैं। संतानकी इच्छा रखनेवाले लोगोंको इन देवियोंके आगे मस्तक झुकाना चाहिये॥१६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

एवमेते पिशाचानामसंख्येया गणाः स्मृताः।
घण्टायाः सपताकायाः शृणु मे सम्भवं नृप ॥ १७ ॥

मूलम्

एवमेते पिशाचानामसंख्येया गणाः स्मृताः।
घण्टायाः सपताकायाः शृणु मे सम्भवं नृप ॥ १७ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

इस प्रकार ये पिशाचोंके असंख्य गण बताये गये हैं। राजन्! अब तुम मुझसे स्कन्दके घण्टे और पताकाकी उत्पत्तिका वृत्तान्त सुनो॥१७॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ऐरावतस्य घण्टे द्वे वैजयन्त्याविति श्रुते।
गुहस्य ते स्वयं दत्ते क्रमेणानाय्य धीमता ॥ १८ ॥

मूलम्

ऐरावतस्य घण्टे द्वे वैजयन्त्याविति श्रुते।
गुहस्य ते स्वयं दत्ते क्रमेणानाय्य धीमता ॥ १८ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

इन्द्रके ऐरावत हाथीके उपयोगमें आनेवाले जो दो ‘वैजयन्ती’ नामसे विख्यात घण्टे थे, उन्हें बुद्धिमान् इन्द्रने क्रमशः ले आकर स्वयं कुमार कार्तिकेयको अर्पण कर दिया॥१८॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

एका तत्र विशाखस्य घण्टा स्कन्दस्य चापरा।
पताका कार्तिकेयस्य विशाखस्य च लोहिता ॥ १९ ॥

मूलम्

एका तत्र विशाखस्य घण्टा स्कन्दस्य चापरा।
पताका कार्तिकेयस्य विशाखस्य च लोहिता ॥ १९ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

उनमेंसे एक घण्टा विशाखने ले लिया और दूसरा स्कन्दके पास रह गया। कार्तिकेय और विशाख दोनोंकी पताकाएँ लाल रंगकी हैं॥१९॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

यानि क्रीडनकान्यस्य देवैर्दत्तानि वै तदा।
तैरेव रमते देवो महासेनो महाबलः ॥ २० ॥

मूलम्

यानि क्रीडनकान्यस्य देवैर्दत्तानि वै तदा।
तैरेव रमते देवो महासेनो महाबलः ॥ २० ॥

अनुवाद (हिन्दी)

उस समय देवताओंने जो खिलौने इन्हें दिये थे, उन्हींसे महाबली महासेन खेलते और मन बहलाते हैं॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

स संवृतः पिशाचानां गणैर्देवगणैस्तथा।
शुशुभे काञ्चने शैले दीप्यमानः श्रिया वृतः ॥ २१ ॥

मूलम्

स संवृतः पिशाचानां गणैर्देवगणैस्तथा।
शुशुभे काञ्चने शैले दीप्यमानः श्रिया वृतः ॥ २१ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

राजन्! अद्‌भुत शोभासे सम्पन्न और कान्तिमान् कुमार कार्तिकेय उस समय उस स्वर्णमय शिखरपर पिशाचों और देवताओंके समूहसे घिरकर बड़ी शोभा पा रहे थे॥२१॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तेन वीरेण शुशुभे स शैलः शुभकाननः।
आदित्येनेवांशुमता मन्दरश्चारुकन्दरः ॥ २२ ॥

मूलम्

तेन वीरेण शुशुभे स शैलः शुभकाननः।
आदित्येनेवांशुमता मन्दरश्चारुकन्दरः ॥ २२ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

जैसे अंशुमाली सूर्यके उदयसे मनोहर कन्दरावाले मन्दराचलकी शोभा होती है, उसी प्रकार वीरवर स्कन्दके निवाससे सुन्दर वनवाले उस श्वेतगिरिकी शोभा बढ़ गयी थी॥२२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

संतानकवनैः फुल्लैः करवीरवनैरपि ।
पारिजातवनैश्चैव जपाशोकवनैस्तथा ॥ २३ ॥
कदम्बतरुषण्डैश्च दिव्यैर्मृगगणैरपि ।
दिव्यैः पक्षिगणैश्चैव शुशुभे श्वेतपर्वतः ॥ २४ ॥

मूलम्

संतानकवनैः फुल्लैः करवीरवनैरपि ।
पारिजातवनैश्चैव जपाशोकवनैस्तथा ॥ २३ ॥
कदम्बतरुषण्डैश्च दिव्यैर्मृगगणैरपि ।
दिव्यैः पक्षिगणैश्चैव शुशुभे श्वेतपर्वतः ॥ २४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

वहाँ कहीं फूलोंसे भरे हुए कल्पवृक्षके वन और कहीं कनेरके कानन सुशोभित होते थे। कहीं पारिजातके वन थे तो कहीं जपा और अशोकके उपवन शोभा पाते थे। कहीं कदम्ब नामक वृक्षोंके समूह लहलहा रहे थे तो कहीं दिव्य मृगगण विचर रहे थे। सब ओर दिव्य पक्षियोंके समुदाय कलरव कर रहे थे। इन सबसे उस श्वेत पर्वतकी शोभा बहुत बढ़ गयी थी॥२३-२४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तत्र देवगणाः सर्वे सर्वे देवर्षयस्तथा।
मेघतूर्यरवाश्चैव क्षुब्धोदधिसमस्वनाः ॥ २५ ॥

मूलम्

तत्र देवगणाः सर्वे सर्वे देवर्षयस्तथा।
मेघतूर्यरवाश्चैव क्षुब्धोदधिसमस्वनाः ॥ २५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

वहाँ सम्पूर्ण देवता तथा देवर्षिगण आकर विराजमान हो गये। क्षुब्ध महासागरकी गम्भीर गर्जनाके समान मेघों और दिव्य वाद्योंका तुमुल घोष सब ओर गूँजने लगा॥२५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तत्र दिव्याश्च गन्धर्वा नृत्यन्तेऽप्सरसस्तथा।
हृष्टानां तत्र भूतानां श्रूयते निनदो महान् ॥ २६ ॥

मूलम्

तत्र दिव्याश्च गन्धर्वा नृत्यन्तेऽप्सरसस्तथा।
हृष्टानां तत्र भूतानां श्रूयते निनदो महान् ॥ २६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘वहाँ दिव्य गन्धर्व और अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। हर्षमें भरे हुए प्राणियोंका महान् कोलाहल सुनायी देने लगा॥२६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

एवं सेन्द्रं जगत् सर्वं श्वेतपर्वतसंस्थितम्।
प्रहृष्टं प्रेक्षते स्कन्दं न च ग्लायति दर्शनात् ॥ २७ ॥

मूलम्

एवं सेन्द्रं जगत् सर्वं श्वेतपर्वतसंस्थितम्।
प्रहृष्टं प्रेक्षते स्कन्दं न च ग्लायति दर्शनात् ॥ २७ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

इस प्रकार इन्द्रसहित सम्पूर्ण जगत् बड़ी प्रसन्नताके साथ श्वेत पर्वतपर विराजमान कुमार कार्तिकेयका दर्शन करने लगा। उनके दर्शनसे किसीका जी नहीं भरता था॥२७॥

मूलम् (वचनम्)

मार्कण्डेय उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

यदाभिषिक्तो भगवान् सैनापत्येन पावकिः।
तदा सम्प्रस्थितः श्रीमान् हृष्टो भद्रवटं हरः ॥ २८ ॥
रथेनादित्यवर्णेन पार्वत्या सहितः प्रभुः।
(अनुयातः सुरैः सर्वैः सहस्राक्षपुरोगमैः)
सहस्रं तस्य सिंहानां तस्मिन् युक्तं रथोत्तमे ॥ २९ ॥

मूलम्

यदाभिषिक्तो भगवान् सैनापत्येन पावकिः।
तदा सम्प्रस्थितः श्रीमान् हृष्टो भद्रवटं हरः ॥ २८ ॥
रथेनादित्यवर्णेन पार्वत्या सहितः प्रभुः।
(अनुयातः सुरैः सर्वैः सहस्राक्षपुरोगमैः)
सहस्रं तस्य सिंहानां तस्मिन् युक्तं रथोत्तमे ॥ २९ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

मार्कण्डेयजी कहते हैं— राजन्! जब अग्निनन्दन भगवान् स्कन्दका सेनापतिके पदपर अभिषेक हो गया, तब श्रीमान् भगवान् शिव देवी पार्वतीके साथ सूर्यके समान रथपर आरूढ हो प्रसन्नतापूर्वक भद्रवटकी ओर प्रस्थित हुए। उस समय इन्द्र आदि सब देवता उनके पीछे-पीछे चले। भगवान् शिवके उस उत्तम रथमें एक हजार सिंह जुते हुए थे॥२८-२९॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

उत्पपात दिवं शुभ्रं कालेनाभिप्रचोदितम्।
ते पिबन्त इवाकाशं त्रासयन्तश्चराचरान् ॥ ३० ॥
सिंहा नभस्यगच्छन्त नदन्तश्चारुकेसराः ।

मूलम्

उत्पपात दिवं शुभ्रं कालेनाभिप्रचोदितम्।
ते पिबन्त इवाकाशं त्रासयन्तश्चराचरान् ॥ ३० ॥
सिंहा नभस्यगच्छन्त नदन्तश्चारुकेसराः ।

अनुवाद (हिन्दी)

साक्षात् काल उस रथका संचालन कर रहा था। उसकी प्रेरणासे वह शुभ्र रथ आकाशमें उड़ चला। मनोहर केसरोंसे सुशोभित वे सिंह चराचर प्राणियोंको भयभीत करते और दहाड़ते हुए आकाशमें इस प्रकार चलने लगे, मानो उसे पी जायँगे॥३०॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तस्मिन् रथे पशुपतिः स्थितो भात्युमया सह ॥ ३१ ॥
विद्युता सहितः सूर्यः सेन्द्रचापे घने यथा।

मूलम्

तस्मिन् रथे पशुपतिः स्थितो भात्युमया सह ॥ ३१ ॥
विद्युता सहितः सूर्यः सेन्द्रचापे घने यथा।

अनुवाद (हिन्दी)

उस रथपर भगवती उमाके साथ बैठे हुए भगवान् शिव इस प्रकार शोभित हो रहे थे, मानो इन्द्रधनुषयुक्त मेघोंकी घटामें विद्युत्‌के साथ भगवान् सूर्य प्रकाशित हो रहे हों॥३१॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अग्रतस्तस्य भगवान् धनेशो गुह्यकैः सह ॥ ३२ ॥
आस्थाय रुचिरं याति पुष्पकं नरवाहनः।

मूलम्

अग्रतस्तस्य भगवान् धनेशो गुह्यकैः सह ॥ ३२ ॥
आस्थाय रुचिरं याति पुष्पकं नरवाहनः।

अनुवाद (हिन्दी)

उनके आगे-आगे गुह्यकोंसहित नरवाहन धनाध्यक्ष भगवान् कुबेर मनोहर पुष्पक विमानपर बैठकर जा रहे थे॥३२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ऐरावतं समास्थाय शक्रश्चापि सुरैः सह ॥ ३३ ॥
पृष्ठतोऽनुययौ यान्तं वरदं वृषभध्वजम्।

मूलम्

ऐरावतं समास्थाय शक्रश्चापि सुरैः सह ॥ ३३ ॥
पृष्ठतोऽनुययौ यान्तं वरदं वृषभध्वजम्।

अनुवाद (हिन्दी)

देवताओंसहित इन्द्र भी ऐरावत हाथीपर आरूढ़ हो (भद्रवटको) जाते हुए वरदायक भगवान् वृषभध्वजके पीछे-पीछे चल रहे थे॥३३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

जृम्भकैर्यक्षरक्षोभिः स्रग्विभिः समलङ्कृतः ॥ ३४ ॥
यात्यमोघो महायक्षो दक्षिणं पक्षमास्थितः।

मूलम्

जृम्भकैर्यक्षरक्षोभिः स्रग्विभिः समलङ्कृतः ॥ ३४ ॥
यात्यमोघो महायक्षो दक्षिणं पक्षमास्थितः।

अनुवाद (हिन्दी)

मालाधारी जृम्भकगण, यक्ष तथा राक्षसोंसे सुशोभित महायक्ष अमोघ भगवान् शंकरके दाहिने भागमें रहकर चल रहा था॥३४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तस्य दक्षिणतो देवा बहवश्चित्रयोधिनः ॥ ३५ ॥
गच्छन्ति वसुभिः सार्धं रुद्रैश्च सह सङ्गताः।

मूलम्

तस्य दक्षिणतो देवा बहवश्चित्रयोधिनः ॥ ३५ ॥
गच्छन्ति वसुभिः सार्धं रुद्रैश्च सह सङ्गताः।

अनुवाद (हिन्दी)

उसके दाहिने भागमें विचित्र प्रकारके युद्ध करनेवाले बहुत-से देवता वसुओं तथा रुद्रोंके साथ संगठित होकर चल रहे थे॥३५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

यमश्च मृत्युना सार्धं सर्वतः परिवारितः ॥ ३६ ॥
घोरैर्व्याधिशतैर्याति घोररूपवपुस्तथा ।

मूलम्

यमश्च मृत्युना सार्धं सर्वतः परिवारितः ॥ ३६ ॥
घोरैर्व्याधिशतैर्याति घोररूपवपुस्तथा ।

अनुवाद (हिन्दी)

मृत्युसहित यमराज अत्यन्त भयंकर रूप धारण करके देवताओंके साथ यात्रा कर रहे थे। उन्हें सैकड़ों भयानक रोगोंने मूर्तिमान् होकर चारों ओरसे घेर रखा था॥३६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

यमस्य पृष्ठतश्चैव घोरस्त्रिशिखरः शितः ॥ ३७ ॥
विजयो नाम रुद्रस्य याति शूलः स्वलङ्कृतः।

मूलम्

यमस्य पृष्ठतश्चैव घोरस्त्रिशिखरः शितः ॥ ३७ ॥
विजयो नाम रुद्रस्य याति शूलः स्वलङ्कृतः।

अनुवाद (हिन्दी)

यमराजके पीछे-पीछे भगवान् शंकरका विजय नामक भयंकर त्रिशूल जा रहा था, जो तीन शिखरोंसे सुशोभित और तीक्ष्ण था। उस त्रिशूलको सिन्दूर आदिसे भलीभाँति सजाया गया था॥३७॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तमुग्रपाशो वरुणो भगवान् सलिलेश्वरः ॥ ३८ ॥
परिवार्य शनैर्याति यादोभिर्विविधैर्वृतः ।

मूलम्

तमुग्रपाशो वरुणो भगवान् सलिलेश्वरः ॥ ३८ ॥
परिवार्य शनैर्याति यादोभिर्विविधैर्वृतः ।

अनुवाद (हिन्दी)

जलके स्वामी भगवान् वरुण हाथमें भयंकर पाश लिये उस त्रिशूलको सब ओरसे घेरकर धीरे-धीरे चल रहे थे। उनके साथ नाना प्रकारकी आकृतिवाले जलजन्तु भी थे॥३८॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

पृष्ठतो विजयस्यापि याति रुद्रस्य पट्टिशः ॥ ३९ ॥
गदामुसलशक्त्याद्यैर्वृतः प्रहरणोत्तमैः ।

मूलम्

पृष्ठतो विजयस्यापि याति रुद्रस्य पट्टिशः ॥ ३९ ॥
गदामुसलशक्त्याद्यैर्वृतः प्रहरणोत्तमैः ।

अनुवाद (हिन्दी)

विजयके पीछे भगवान् रुद्रका पट्टिश नामक शस्त्र जा रहा था, जिसे गदा, मुसल और शक्ति आदि उत्तम आयुधोंने घेर रक्खा था॥३९॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

पट्टिशं त्वन्वगाद् राजञ्छत्रं रौद्रं महाप्रभम् ॥ ४० ॥
कमण्डलुश्चाप्यनु तं महर्षिगणसेवितः ।

मूलम्

पट्टिशं त्वन्वगाद् राजञ्छत्रं रौद्रं महाप्रभम् ॥ ४० ॥
कमण्डलुश्चाप्यनु तं महर्षिगणसेवितः ।

अनुवाद (हिन्दी)

राजन्! पट्टिशके पीछे भगवान् रुद्रका अत्यन्त प्रभापूर्ण छत्र जा रहा था और उसके पीछे महर्षियोंद्वारा सेवित कमण्डलु यात्रा कर रहा था॥४०॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तस्य दक्षिणतो भाति दण्डो गच्छन् श्रिया वृतः ॥ ४१ ॥
भृग्वङ्गिरोभिः सहितो दैवतैश्चानुपूजितः ।

मूलम्

तस्य दक्षिणतो भाति दण्डो गच्छन् श्रिया वृतः ॥ ४१ ॥
भृग्वङ्गिरोभिः सहितो दैवतैश्चानुपूजितः ।

अनुवाद (हिन्दी)

कमण्डलुके दाहिने भागमें जाते हुए तेजस्वी दण्डकी बड़ी शोभा हो रही थी। उसके साथ भृगु और अंगिरा आदि महर्षि थे और देवता भी बार-बार उसका पूजन करते थे॥४१॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

एषां तु पृष्ठतो रुद्रो विमले स्यन्दने स्थितः ॥ ४२ ॥
याति संहर्षयन् सर्वांस्तेजसा त्रिदिवौकसः।

मूलम्

एषां तु पृष्ठतो रुद्रो विमले स्यन्दने स्थितः ॥ ४२ ॥
याति संहर्षयन् सर्वांस्तेजसा त्रिदिवौकसः।

अनुवाद (हिन्दी)

इन सबके पीछे उज्ज्वल रथपर आरुढ़ हो रुद्रदेव यात्रा करते थे, जो अपने तेजसे सम्पूर्ण देवताओंका हर्ष बढ़ा रहे थे॥४२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ऋषयश्चापि देवाश्च गन्धर्वा भुजगास्तथा ॥ ४३ ॥
नद्यो ह्रदाः समुद्राश्च तथैवाप्सरसां गणाः।
नक्षत्राणि ग्रहाश्चैव देवानां शिशवश्च ये ॥ ४४ ॥

मूलम्

ऋषयश्चापि देवाश्च गन्धर्वा भुजगास्तथा ॥ ४३ ॥
नद्यो ह्रदाः समुद्राश्च तथैवाप्सरसां गणाः।
नक्षत्राणि ग्रहाश्चैव देवानां शिशवश्च ये ॥ ४४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

रुद्रदेवके पीछे ऋषि, देवता, गन्धर्व, नाग, नदियाँ, गहरे जलाशय, समुद्र, अप्सराएँ, नक्षत्र, ग्रह तथा देवकुमार चल रहे थे॥४३-४४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

स्त्रियश्च विविधाकारा यान्ति रुद्रस्य पृष्ठतः।
सृजन्त्यः पुष्पवर्षाणि चारुरूपा वराङ्गनाः ॥ ४५ ॥

मूलम्

स्त्रियश्च विविधाकारा यान्ति रुद्रस्य पृष्ठतः।
सृजन्त्यः पुष्पवर्षाणि चारुरूपा वराङ्गनाः ॥ ४५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

मनोहर रूप और भाँति-भाँतिकी आकृति धारण करनेवाली बहुत-सी सुन्दरी स्त्रियाँ फूलोंकी वर्षा करती हुई भगवान् रुद्रके पीछे-पीछे जा रही थीं॥४५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

पर्जन्यश्चाप्यनुययौ नमस्कृत्य पिनाकिनम् ।
छत्रं च पाण्डुरं सोमस्तस्य मूर्धन्यधारयत् ॥ ४६ ॥

मूलम्

पर्जन्यश्चाप्यनुययौ नमस्कृत्य पिनाकिनम् ।
छत्रं च पाण्डुरं सोमस्तस्य मूर्धन्यधारयत् ॥ ४६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

पिनाकधारी भगवान् शंकरको नमस्कार करके पर्जन्यदेव भी उनके पीछे-पीछे चले। चन्द्रमाने उनके मस्तकपर श्वेत छत्र लगा रखा था॥४६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

चामरे चापि वायुश्च गृहीत्वाग्निश्च धिष्ठितौ।
शक्रश्च पृष्ठतस्तस्य याति राजञ्छ्रिया वृतः ॥ ४७ ॥
सह राजर्षिभिः सर्वैः स्तुवानो वृषकेतनम्।

मूलम्

चामरे चापि वायुश्च गृहीत्वाग्निश्च धिष्ठितौ।
शक्रश्च पृष्ठतस्तस्य याति राजञ्छ्रिया वृतः ॥ ४७ ॥
सह राजर्षिभिः सर्वैः स्तुवानो वृषकेतनम्।

अनुवाद (हिन्दी)

राजन्! वायु और अग्नि चँवर लेकर दोनों ओर खड़े थे। तेजस्वी इन्द्र समस्त राजर्षियोंके साथ भगवान् वृषभध्वजकी स्तुति करते हुए उनके पीछे-पीछे जा रहे थे॥४७॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

गौरी विद्याथ गान्धारी केशिनी मित्रसाह्वया ॥ ४८ ॥
सावित्र्या सह सर्वास्ताः पार्वत्या यान्ति पृष्ठतः।
तत्र विद्यागणाः सर्वे ये केचित् कविभिः कृताः ॥ ४९ ॥

मूलम्

गौरी विद्याथ गान्धारी केशिनी मित्रसाह्वया ॥ ४८ ॥
सावित्र्या सह सर्वास्ताः पार्वत्या यान्ति पृष्ठतः।
तत्र विद्यागणाः सर्वे ये केचित् कविभिः कृताः ॥ ४९ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

गौरी, विद्या, गान्धारी, केशिनी, मित्रा और सावित्री—ये सब पार्वतीदेवीके पीछे-पीछे चल रही थीं। विद्वानोंद्वारा प्रकाशित सम्पूर्ण विद्याएँ भी उन्हींके साथ थीं॥४८-४९॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तस्य कुर्वन्ति वचनं सेन्द्रा देवाश्चमूमुखे।
गृहीत्वा तु पताकां वै यात्यग्रे राक्षसो ग्रहः ॥ ५० ॥

मूलम्

तस्य कुर्वन्ति वचनं सेन्द्रा देवाश्चमूमुखे।
गृहीत्वा तु पताकां वै यात्यग्रे राक्षसो ग्रहः ॥ ५० ॥

अनुवाद (हिन्दी)

इन्द्र आदि देवता सेनाके मुहानेपर उपस्थित हो भगवान् शिवके आदेशका पालन करते थे। एक राक्षस ग्रह सेनाका झंडा लेकर आगे-आगे चलता था॥५०॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

व्यापृतस्तु श्मशाने यो नित्यं रुद्रस्य वै सखा।
पिङ्गलो नाम यक्षेन्द्रो लोकस्यानन्ददायकः ॥ ५१ ॥

मूलम्

व्यापृतस्तु श्मशाने यो नित्यं रुद्रस्य वै सखा।
पिङ्गलो नाम यक्षेन्द्रो लोकस्यानन्ददायकः ॥ ५१ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

भगवान् रुद्रका सखा यक्षराज पिंगलदेव जो सदा श्मशानमें ही (उसकी रक्षाके लिये) निवास करता और सम्पूर्ण जगत्‌को आनन्द देनेवाला था, उस यात्रामें भगवान् शिवके साथ था॥५१॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

एभिश्च सहितो देवस्तत्र याति यथासुखम्।
अग्रतः पृष्ठतश्चैव न हि तस्य गतिर्ध्रुवा ॥ ५२ ॥

मूलम्

एभिश्च सहितो देवस्तत्र याति यथासुखम्।
अग्रतः पृष्ठतश्चैव न हि तस्य गतिर्ध्रुवा ॥ ५२ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

इन सबके साथ महादेवजी सुखपूर्वक भद्रवटकी यात्रा कर रहे थे। वे कभी सेनाके आगे रहते और कभी पीछे। उनकी कोई निश्चित गति नहीं थी॥५२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

रुद्रं सत्कर्मभिर्मर्त्याः पूजयन्तीह दैवतम्।
शिवमित्येव यं प्राहुरीशं रुद्रं पितामहम् ॥ ५३ ॥
भावैस्तु विविधाकारैः पूजयन्ति महेश्वरम्।

मूलम्

रुद्रं सत्कर्मभिर्मर्त्याः पूजयन्तीह दैवतम्।
शिवमित्येव यं प्राहुरीशं रुद्रं पितामहम् ॥ ५३ ॥
भावैस्तु विविधाकारैः पूजयन्ति महेश्वरम्।

अनुवाद (हिन्दी)

मरणधर्मा मनुष्य इस संसारमें सत्कर्मोंद्वारा रुद्रदेवकी ही पूजा करते हैं। इन्हींको शिव, ईश, रुद्र और पितामह कहते हैं। लोग नाना प्रकारके भावोंसे भगवान् महेश्वरकी पूजा करते हैं॥५३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

देवसेनापतिस्त्वेवं देवसेनाभिरावृतः ।
अनुगच्छति देवेशं ब्रह्मण्यः कृत्तिकासुतः ॥ ५४ ॥

मूलम्

देवसेनापतिस्त्वेवं देवसेनाभिरावृतः ।
अनुगच्छति देवेशं ब्रह्मण्यः कृत्तिकासुतः ॥ ५४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

इसी प्रकार ब्राह्मणहितैषी, देवसेनापति, कृत्तिका-नन्दन स्कन्द भी देवताओंकी सेनासे घिरे हुए देवेश्वर भगवान् शिवके पीछे-पीछे जा रहे थे॥५४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अथाब्रवीन्महासेनं महादेवो बृहद् वचः।
सप्तमं मारुतस्कन्धं रक्ष नित्यमतन्द्रितः ॥ ५५ ॥

मूलम्

अथाब्रवीन्महासेनं महादेवो बृहद् वचः।
सप्तमं मारुतस्कन्धं रक्ष नित्यमतन्द्रितः ॥ ५५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

तदनन्तर महादेवजीने कुमार महासेनसे यह उत्तम बात कही—‘बेटा! तुम सदा सावधानीके साथ मारुतस्कन्ध नामक देवताओंके सातवें व्यूहकी रक्षा करना’॥५५॥

मूलम् (वचनम्)

स्कन्द उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

सप्तमं मारुतस्कन्धं पालयिष्याम्यहं प्रभो।
यदन्यदपि मे कार्यं देव तद् वद माचिरम् ॥ ५६ ॥

मूलम्

सप्तमं मारुतस्कन्धं पालयिष्याम्यहं प्रभो।
यदन्यदपि मे कार्यं देव तद् वद माचिरम् ॥ ५६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

स्कन्द बोले— प्रभो! मैं सातवें व्यूह मारुतस्कन्धकी अवश्य रक्षा करूँगा। देव! इसके सिवा और भी मेरा जो कुछ कर्तव्य हो, उसके लिये आप शीघ्र आज्ञा दीजिये॥

मूलम् (वचनम्)

रुद्र उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

कार्येष्वहं त्वया पुत्र संद्रष्टव्यः सदैव हि।
दर्शनान्मम भक्त्या च श्रेयः परमवाप्स्यसि ॥ ५७ ॥

मूलम्

कार्येष्वहं त्वया पुत्र संद्रष्टव्यः सदैव हि।
दर्शनान्मम भक्त्या च श्रेयः परमवाप्स्यसि ॥ ५७ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

रुद्रने कहा— पुत्र! काम पड़नेपर तुम सदा मुझसे मिलते रहना। मेरे दर्शनसे तथा मुझमें भक्ति करनेसे तुम्हारा परम कल्याण होगा॥५७॥

मूलम् (वचनम्)

मार्कण्डेय उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

इत्युक्त्वा विससर्जैनं परिष्वज्य महेश्वरः।
विसर्जिते ततः स्कन्दे बभूवौत्पातिकं महत् ॥ ५८ ॥

मूलम्

इत्युक्त्वा विससर्जैनं परिष्वज्य महेश्वरः।
विसर्जिते ततः स्कन्दे बभूवौत्पातिकं महत् ॥ ५८ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

मार्कण्डेयजी कहते हैं— राजन्! ऐसा कहकर भगवान् महेश्वरने कार्तिकेयको हृदयसे लगाकर बिदा किया। स्कन्दके बिदा होते ही बड़ा भारी उत्पात होने लगा॥५८॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

सहसैव महाराज देवान् सर्वान् प्रमोहयत्।
जज्वाल खं सनक्षत्रं प्रमूढं भुवनं भृशम् ॥ ५९ ॥

मूलम्

सहसैव महाराज देवान् सर्वान् प्रमोहयत्।
जज्वाल खं सनक्षत्रं प्रमूढं भुवनं भृशम् ॥ ५९ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

महाराज! सहसा समस्त देवताओंको मोहमें डालता हुआ नक्षत्रोंसहित आकाश प्रज्वलित हो उठा। समस्त संसार अत्यन्त मूढ़-सा हो गया॥५९॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

चचाल व्यनदच्चोर्वी तमोभूतं जगद् बभौ।
ततस्तद् दारुणं दृष्ट्वा क्षुभितः शङ्करस्तदा ॥ ६० ॥
उमा चैव महाभागा देवाश्च समहर्षयः।

मूलम्

चचाल व्यनदच्चोर्वी तमोभूतं जगद् बभौ।
ततस्तद् दारुणं दृष्ट्वा क्षुभितः शङ्करस्तदा ॥ ६० ॥
उमा चैव महाभागा देवाश्च समहर्षयः।

अनुवाद (हिन्दी)

पृथ्वी हिलने लगी। उसमें गड़गड़ाहट पैदा हो गयी। सारा जगत् अन्धकारमें मग्न-सा जान पड़ता था। उस समय यह दारुण उत्पात देखकर भगवान् शंकर, महाभागा उमा, देवगण तथा महर्षिगण क्षुब्ध हो उठे॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ततस्तेषु प्रमूढेषु पर्वताम्बुदसंनिभम् ॥ ६१ ॥
नानाप्रहरणं घोरमदृश्यत महद् बलम्।
तद् वै घोरमसंख्येयं गर्जच्च विविधा गिरः ॥ ६२ ॥

मूलम्

ततस्तेषु प्रमूढेषु पर्वताम्बुदसंनिभम् ॥ ६१ ॥
नानाप्रहरणं घोरमदृश्यत महद् बलम्।
तद् वै घोरमसंख्येयं गर्जच्च विविधा गिरः ॥ ६२ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

जिस समय वे सब लोग मोहग्रस्त हो रहे थे, उसी समय पर्वतों और मेघमालाओंके समान दैत्योंकी विशाल एवं भयंकर सेना दिखायी दी। वह नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित थी। उसके सैनिकोंकी संख्या गिनी नहीं जा सकती थी। वह भयंकर वाहिनी अनेक प्रकारकी बोली बोलती हुई भीषण गर्जना कर रही थी॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अभ्यद्रवद् रणे देवान् भगवन्तं च शङ्करम्।
तैर्विसृष्टान्यनीकेषु बाणजालान्यनेकशः ॥ ६३ ॥

मूलम्

अभ्यद्रवद् रणे देवान् भगवन्तं च शङ्करम्।
तैर्विसृष्टान्यनीकेषु बाणजालान्यनेकशः ॥ ६३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

उसने रणभूमिमें आकर देवताओं तथा भगवान् शंकरपर धावा बोल दिया। दैत्योंने देवताओंके सैनिकोंपर कई बार बाण-वर्षा की॥६३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

पर्वताश्च शतघ्न्यश्च प्रासासिपरिघा गदाः।
निपतद्भिश्च तैर्घोरैर्देवानीकं महायुधैः ॥ ६४ ॥
क्षणेन व्यद्रवत् सर्वं विमुखं चाप्यदृश्यत।

मूलम्

पर्वताश्च शतघ्न्यश्च प्रासासिपरिघा गदाः।
निपतद्भिश्च तैर्घोरैर्देवानीकं महायुधैः ॥ ६४ ॥
क्षणेन व्यद्रवत् सर्वं विमुखं चाप्यदृश्यत।

अनुवाद (हिन्दी)

शिलाखण्ड, शतघ्नी (तोप), प्रास, खड्ग, परिघ और गदाओंके लगातार प्रहार हो रहे थे। इन भयंकर महान् अस्त्रोंकी मारसे देवताओंकी सारी सेना क्षणभरमें (पीठ दिखाकर) भाग चली। सारे सैनिक युद्धसे विमुख दिखायी देते थे॥६४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

निकृत्तयोधनागाश्वं कृत्तायुधमहारथम् ॥ ६५ ॥
दानवैरर्दितं सैन्यं देवानां विमुखं बभौ।

मूलम्

निकृत्तयोधनागाश्वं कृत्तायुधमहारथम् ॥ ६५ ॥
दानवैरर्दितं सैन्यं देवानां विमुखं बभौ।

अनुवाद (हिन्दी)

बहुत-से योद्धा, हाथी और घोड़े काट डाले गये। असंख्य आयुध और बड़े-बड़े रथ टूक-टूक कर दिये गये। इस प्रकार दानवोंद्वारा पीड़ित हुई देवताओंकी सेना युद्धसे विमुख हो गयी॥६५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

असुरैर्वध्यमानं तत् पावकैरिव काननम् ॥ ६६ ॥
अपतद् दग्धभूयिष्ठं महाद्रुमवनं यथा।

मूलम्

असुरैर्वध्यमानं तत् पावकैरिव काननम् ॥ ६६ ॥
अपतद् दग्धभूयिष्ठं महाद्रुमवनं यथा।

अनुवाद (हिन्दी)

जैसे आग समूचे वनको जला देती है, उसी प्रकार असुरोंने देवताओंकी सेनामें भारी मार-काट मचा दी। बड़े-बड़े वृक्षोंसे भरे हुए वनका अधिकांश भाग जल जानेपर उसकी जैसी दुरवस्था दिखायी देती है, उसी प्रकार दैत्योंकी अस्त्राग्निमें अधिकांश सैनिकोंके दग्ध हो जानेके कारण वह देवसेना धराशायिनी हो रही थी॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ते विभिन्नशिरोदेहाः प्राद्रवन्तो दिवौकसः ॥ ६७ ॥
न नाथमधिगच्छन्ति वध्यमाना महारणे।

मूलम्

ते विभिन्नशिरोदेहाः प्राद्रवन्तो दिवौकसः ॥ ६७ ॥
न नाथमधिगच्छन्ति वध्यमाना महारणे।

अनुवाद (हिन्दी)

उस महासमरमें असुरोंकी मार खाकर वे सब देवता भागते हुए कहीं कोई रक्षक नहीं पा रहे थे। किन्हींके सिर फट गये थे तो किन्हींके सब अंगोंमें गहरे घाव हो गये थे॥६७॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अथ तद् विद्रुतं सैन्यं दृष्ट्वा देवः पुरंदरः ॥ ६८ ॥
आश्वासयन्नुवाचेदं बलभिद् दानवार्दितम् ।
भयं त्यजत भद्रं वः शूराः शस्त्राणि गृह्णत ॥ ६९ ॥
कुरुध्वं विक्रमे बुद्धिं मा वः काचिद् व्यथा भवेत्।
जयतैनान् सुदुर्वृत्तान् दानवान् घोरदर्शनान् ॥ ७० ॥
अभिद्रवत भद्रं वो मया सह महासुरान्।
शक्रस्य वचनं श्रुत्वा समाश्वस्ता दिवौकसः ॥ ७१ ॥

मूलम्

अथ तद् विद्रुतं सैन्यं दृष्ट्वा देवः पुरंदरः ॥ ६८ ॥
आश्वासयन्नुवाचेदं बलभिद् दानवार्दितम् ।
भयं त्यजत भद्रं वः शूराः शस्त्राणि गृह्णत ॥ ६९ ॥
कुरुध्वं विक्रमे बुद्धिं मा वः काचिद् व्यथा भवेत्।
जयतैनान् सुदुर्वृत्तान् दानवान् घोरदर्शनान् ॥ ७० ॥
अभिद्रवत भद्रं वो मया सह महासुरान्।
शक्रस्य वचनं श्रुत्वा समाश्वस्ता दिवौकसः ॥ ७१ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

तदनन्तर बलासुरविनाशक देवराज इन्द्रने अपनी उस सेनाको दानवोंसे पीड़ित होकर भागती देख उसे आश्वासन देते हुए कहा—‘शूरवीरो! भय त्याग दो, इससे तुम्हारा मंगल होगा। हथियार उठाओ और पराक्रममें मन लगाओ। तुम्हें किसी प्रकार व्यथित नहीं होना चाहिये। इन भयंकर दिखायी देनेवाले दुराचारी दानवोंको जीतो। तुम्हारा कल्याण हो। तुम सब लोग मेरे साथ इन महाकाय दैत्योंपर टूट पड़ो।’ इन्द्रकी यह बात सुनकर देवताओंको बड़ी सान्त्वना मिली॥६८—७१॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

दानवान् प्रत्ययुध्यन्त शक्रं कृत्वा व्यपाश्रयम्।
ततस्ते त्रिदशाः सर्वे मरुतश्च महाबलाः ॥ ७२ ॥
प्रत्युद्ययुर्महाभागाः साध्याश्च वसुभिः सह।

मूलम्

दानवान् प्रत्ययुध्यन्त शक्रं कृत्वा व्यपाश्रयम्।
ततस्ते त्रिदशाः सर्वे मरुतश्च महाबलाः ॥ ७२ ॥
प्रत्युद्ययुर्महाभागाः साध्याश्च वसुभिः सह।

अनुवाद (हिन्दी)

उन्होंने इन्द्रको अपना आश्रय बनाकर दानवोंके साथ पुनः युद्ध प्रारम्भ किया। तत्पश्चात् वे सभी देवता महाबली मरुद्‌गण तथा वसुओं एवं महाभाग साध्यगण-सहित युद्धभूमिमें आगे बढ़ने लगे॥७२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तैर्विसृष्टान्यनीकेषु क्रुद्धैः शस्त्राणि संयुगे ॥ ७३ ॥
शराश्च दैत्यकायेषु पिबन्ति रुधिरं बहु।

मूलम्

तैर्विसृष्टान्यनीकेषु क्रुद्धैः शस्त्राणि संयुगे ॥ ७३ ॥
शराश्च दैत्यकायेषु पिबन्ति रुधिरं बहु।

अनुवाद (हिन्दी)

उन्होंने संग्राममें कुपित होकर दैत्योंकी सेनाओंके ऊपर जो अस्त्र-शस्त्र और बाण चलाये, वे उनके शरीरोंमें घुसकर प्रचुर मात्रामें रक्त पीने लगे॥७३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तेषां देहान् विनिर्भिद्य शरास्ते निशितास्तदा ॥ ७४ ॥
निपतन्तोऽभ्यदृश्यन्त नगेभ्य इव पन्नगाः।

मूलम्

तेषां देहान् विनिर्भिद्य शरास्ते निशितास्तदा ॥ ७४ ॥
निपतन्तोऽभ्यदृश्यन्त नगेभ्य इव पन्नगाः।

अनुवाद (हिन्दी)

वे तीखे बाण उस समय दैत्योंके शरीरोंको विदीर्ण कर रणभूमिमें इस प्रकार गिरते दिखायी देते थे, मानो वृक्षोंसे सर्प गिर रहे हों॥७४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तानि दैत्यशरीराणि निर्भिन्नानि स्म सायकैः ॥ ७५ ॥
अपतन् भूतले राजंश्छिन्नाभ्राणीव सर्वशः।

मूलम्

तानि दैत्यशरीराणि निर्भिन्नानि स्म सायकैः ॥ ७५ ॥
अपतन् भूतले राजंश्छिन्नाभ्राणीव सर्वशः।

अनुवाद (हिन्दी)

राजन्! देवताओंके बाणोंसे विदीर्ण हुए वे दैत्योंके शरीर सब प्रकारसे छिन्न-भिन्न हुए बादलोंके समान धरतीपर गिरने लगे॥७५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ततस्तद् दानवं सैन्यं सर्वैर्देवगणैर्युधि ॥ ७६ ॥
त्रासितं विविधैर्बाणैः कृतं चैव पराङ्‌मुखम्।

मूलम्

ततस्तद् दानवं सैन्यं सर्वैर्देवगणैर्युधि ॥ ७६ ॥
त्रासितं विविधैर्बाणैः कृतं चैव पराङ्‌मुखम्।

अनुवाद (हिन्दी)

तदनन्तर समस्त देवताओंने उस युद्धमें दानवसेनाको अपने विविध बाणोंके प्रहारसे भयभीत करके रणभूमिसे विमुख कर दिया॥७६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अथोत्क्रुष्टं तदा हृष्टैः सर्वैर्देवैरुदायुधैः ॥ ७७ ॥
संहतानि च तूर्याणि प्रावाद्यन्त ह्यनेकशः।

मूलम्

अथोत्क्रुष्टं तदा हृष्टैः सर्वैर्देवैरुदायुधैः ॥ ७७ ॥
संहतानि च तूर्याणि प्रावाद्यन्त ह्यनेकशः।

अनुवाद (हिन्दी)

फिर तो उस समय हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र उठाये सम्पूर्ण देवता हर्षमें भरकर कोलाहल करने लगे और अनेक प्रकारके विजय-वाद्य एक साथ बज उठे॥७७॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

एवमन्योन्यसंयुक्तं युद्धमासीत् सुदारुणम् ॥ ७८ ॥
देवानां दानवानां च मांसशोणितकर्दमम्।
अनयो देवलोकस्य सहसैवाभ्यदृश्यत ॥ ७९ ॥
तथा हि दानवा घोरा विनिघ्नन्ति दिवौकसः।

मूलम्

एवमन्योन्यसंयुक्तं युद्धमासीत् सुदारुणम् ॥ ७८ ॥
देवानां दानवानां च मांसशोणितकर्दमम्।
अनयो देवलोकस्य सहसैवाभ्यदृश्यत ॥ ७९ ॥
तथा हि दानवा घोरा विनिघ्नन्ति दिवौकसः।

अनुवाद (हिन्दी)

इस प्रकार देवताओं और दानवोंमें परस्पर अत्यन्त भयंकर युद्ध हो रहा था। रक्त और मांससे वहाँकी भूमिपर कीचड़ जम गयी थी। फिर सहसा बाजी पलट गयी। देवलोककी पराजय दिखायी देने लगी। भयंकर दानव देवताओंको मारने लगे॥७८-७९॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ततस्तूर्यप्रणादाश्च भेरीणां च महास्वनः ॥ ८० ॥
बभूवुर्दानवेन्द्राणां सिंहनादाश्च दारुणाः ।

मूलम्

ततस्तूर्यप्रणादाश्च भेरीणां च महास्वनः ॥ ८० ॥
बभूवुर्दानवेन्द्राणां सिंहनादाश्च दारुणाः ।

अनुवाद (हिन्दी)

उस समय दानवेन्द्रोंके भयंकर सिंहनाद सुनायी पड़ते थे। उनके रणवाद्यों तथा भेरियोंका गम्भीर घोष सब ओर गूँज उठा॥८०॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अथ दैत्यबलाद् घोरान्निष्पपात महाबलः ॥ ८१ ॥
दानवो महिषो नाम प्रगृह्य विपुलं गिरिम्।

मूलम्

अथ दैत्यबलाद् घोरान्निष्पपात महाबलः ॥ ८१ ॥
दानवो महिषो नाम प्रगृह्य विपुलं गिरिम्।

अनुवाद (हिन्दी)

इतनेहीमें दैत्योंकी भयंकर सेनासे महाबली दानव ‘महिष’ हाथोंमें एक विशाल पर्वत लिये निकला और देवताओंपर टूट पड़ा॥८१॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ते तं घनैरिवादित्यं दृष्ट्वा सम्परिवारितम् ॥ ८२ ॥
तमुद्यतगिरिं राजन् व्यद्रवन्त दिवौकसः।

मूलम्

ते तं घनैरिवादित्यं दृष्ट्वा सम्परिवारितम् ॥ ८२ ॥
तमुद्यतगिरिं राजन् व्यद्रवन्त दिवौकसः।

अनुवाद (हिन्दी)

राजन्! बादलोंसे घिरे हुए सूर्यकी भाँति पर्वत उठाये हुए उस दानवको देखकर सब देवता भाग चले॥८२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अथाभिद्रुत्य महिषो देवांश्चिक्षेप तं गिरिम् ॥ ८३ ॥
पतता तेन गिरिणा देवसैन्यस्य पार्थिव।
भीमरूपेण निहतमयुतं प्रापतद् भुवि ॥ ८४ ॥

मूलम्

अथाभिद्रुत्य महिषो देवांश्चिक्षेप तं गिरिम् ॥ ८३ ॥
पतता तेन गिरिणा देवसैन्यस्य पार्थिव।
भीमरूपेण निहतमयुतं प्रापतद् भुवि ॥ ८४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

परंतु महिषासुरने देवताओंका पीछा करके उनके ऊपर वह पहाड़ पटक दिया। युधिष्ठिर! उस भयानक पर्वतके गिरनेसे देवसेनाके दस हजार योद्धा कुचलकर धरतीपर गिर पड़े॥८३-८४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अथ तैर्दानवैः सार्धं महिषस्त्रासयन् सुरान्।
अभ्यद्रवद् रणे तूर्णं सिंहः क्षुद्रमृगानिव ॥ ८५ ॥

मूलम्

अथ तैर्दानवैः सार्धं महिषस्त्रासयन् सुरान्।
अभ्यद्रवद् रणे तूर्णं सिंहः क्षुद्रमृगानिव ॥ ८५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

तदनन्तर जैसे सिंह छोटे मृगोंको डराता हुआ उनपर टूट पड़ता है, उसी प्रकार महिषासुरने अपने दानव-सैनिकोंके साथ रणभूमिमें समस्त देवताओंको भयभीत करते हुए उनपर शीघ्र ही प्रबल आक्रमण किया॥८५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तमापतन्तं महिषं दृष्ट्वा सेन्द्रा दिवौकसः।
व्यद्रवन्त रणे भीता विकीर्णायुधकेतनाः ॥ ८६ ॥

मूलम्

तमापतन्तं महिषं दृष्ट्वा सेन्द्रा दिवौकसः।
व्यद्रवन्त रणे भीता विकीर्णायुधकेतनाः ॥ ८६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

उस महिषासुरको आते देख इन्द्र आदि सब देवता भयभीत हो अपने अस्त्र-शस्त्र और ध्वजा फेंककर युद्धभूमिसे भागने लगे॥८६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ततः स महिषः क्रुद्धस्तूर्णं रुद्ररथं ययौ।
अभिद्रुत्य च जग्राह रुद्रस्य रथकूबरम् ॥ ८७ ॥

मूलम्

ततः स महिषः क्रुद्धस्तूर्णं रुद्ररथं ययौ।
अभिद्रुत्य च जग्राह रुद्रस्य रथकूबरम् ॥ ८७ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

तब क्रोधमें भरा हुआ महिषासुर तुरंत ही भगवान् रुद्रके रथकी ओर दौड़ा और पास जाकर उनके रथका कूबर1 पकड़ लिया॥८७॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

यदा रुद्ररथं क्रुद्धो महिषः सहसा गतः।
रेसतू रोदसी गाढं मुमुहुश्च महर्षयः ॥ ८८ ॥

मूलम्

यदा रुद्ररथं क्रुद्धो महिषः सहसा गतः।
रेसतू रोदसी गाढं मुमुहुश्च महर्षयः ॥ ८८ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

जब क्रोधमें भरे हुए महिषासुरने सहसा भगवान् रुद्रके रथपर आक्रमण किया, उस समय पृथ्वी और आकाशमें भारी कोलाहल मच गया और महर्षिगण भी घबरा गये॥८८॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अनदंश्च महाकाया दैत्या जलधरोपमाः।
आसीच्च निश्चितं तेषां जितमस्माभिरित्युत ॥ ८९ ॥

मूलम्

अनदंश्च महाकाया दैत्या जलधरोपमाः।
आसीच्च निश्चितं तेषां जितमस्माभिरित्युत ॥ ८९ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

इधर विशालकाय दैत्य मेघोंके समान गम्भीर गर्जना करने लगे। उन्हें यह निश्चय हो गया कि ‘हमारी जीत होगी’॥८९॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तथाभूते तु भगवान् नावधीन्महिषं रणे।
सस्मार च तदा स्कन्दं मृत्युं तस्य दुरात्मनः ॥ ९० ॥

मूलम्

तथाभूते तु भगवान् नावधीन्महिषं रणे।
सस्मार च तदा स्कन्दं मृत्युं तस्य दुरात्मनः ॥ ९० ॥

अनुवाद (हिन्दी)

उस अवस्थामें भी भगवान् रुद्रने युद्धमें महिषासुरको स्वयं नहीं मारा किंतु उस दुरात्मा दानवकी मृत्यु जिनके हाथोंसे होनेवाली थी, उन कुमार कार्तिकेयका स्मरण किया॥९०॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

महिषोऽपि रथं दृष्ट्वा रौद्रो रुद्रस्य चानदत्।
देवान् संत्रासयंश्चापि दैत्यांश्चापि प्रहर्षयन् ॥ ९१ ॥

मूलम्

महिषोऽपि रथं दृष्ट्वा रौद्रो रुद्रस्य चानदत्।
देवान् संत्रासयंश्चापि दैत्यांश्चापि प्रहर्षयन् ॥ ९१ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

भयानक महिषासुर रुद्रके रथको देखकर देवताओंको त्रास और दैत्योंको हर्ष प्रदान करता हुआ बार-बार सिंहनाद करने लगा॥९१॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ततस्तस्मिन् भये घोरे देवानां समुपस्थिते।
आजगाम महासेनः क्रोधात् सूर्य इव ज्वलन् ॥ ९२ ॥

मूलम्

ततस्तस्मिन् भये घोरे देवानां समुपस्थिते।
आजगाम महासेनः क्रोधात् सूर्य इव ज्वलन् ॥ ९२ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

देवताओंके लिये वह घोर भयका अवसर उपस्थित था। इसी समय जगमगाते हुए सूर्यकी भाँति कुमार महासेन क्रोधमें भरे हुए वहाँ आ पहुँचे॥९२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

लोहिताम्बरसंवीतो लोहितस्रग्विभूषणः ।
लोहिताश्वो महाबाहुर्हिरण्यकवचः प्रभुः ॥ ९३ ॥

मूलम्

लोहिताम्बरसंवीतो लोहितस्रग्विभूषणः ।
लोहिताश्वो महाबाहुर्हिरण्यकवचः प्रभुः ॥ ९३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

उन्होंने अपने शरीरको लाल वस्त्रोंसे आच्छादित कर रखा था। उनके हार और आभूषण भी लाल रंगके ही थे। उनके घोड़ेका रंग भी लाल था। उन महाबाहु भगवान् स्कन्दने सुवर्णमय कवच धारण किया था॥९३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

रथमादित्यसंकाशमास्थितः कनकप्रभम् ।
तं दृष्ट्वा दैत्यसेना सा व्यद्रवत् सहसा रणे ॥ ९४ ॥

मूलम्

रथमादित्यसंकाशमास्थितः कनकप्रभम् ।
तं दृष्ट्वा दैत्यसेना सा व्यद्रवत् सहसा रणे ॥ ९४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

वे सूर्यके समान तेजस्वी रथपर विराजमान थे। उनकी अंगकान्ति भी सुवर्णके समान ही उद्भासित हो रही थी। उन्हें सहसा संग्राममें उपस्थित देख दैत्योंकी सेना रणभूमिसे भाग चली॥९४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

स चापि तां प्रज्वलितां महिषस्य विदारिणीम्।
मुमोच शक्तिं राजेन्द्र महासेनो महाबलः ॥ ९५ ॥

मूलम्

स चापि तां प्रज्वलितां महिषस्य विदारिणीम्।
मुमोच शक्तिं राजेन्द्र महासेनो महाबलः ॥ ९५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

राजेन्द्र! महाबली महासेनने महिषासुरपर एक प्रज्वलित शक्ति चलायी, जो उसके शरीरको विदीर्ण करनेवाली थी॥९५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

सा मुक्ताभ्यहरत् तस्य महिषस्य शिरो महत्।
पपात भिन्ने शिरसि महिषस्त्यक्तजीवितः ॥ ९६ ॥

मूलम्

सा मुक्ताभ्यहरत् तस्य महिषस्य शिरो महत्।
पपात भिन्ने शिरसि महिषस्त्यक्तजीवितः ॥ ९६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

कुमारके हाथसे छूटते ही उस शक्तिने महिषासुरके महान् मस्तकको काट गिराया। सिर कट जानेपर महिषासुर प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा॥९६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

पतता शिरसा तेन द्वारं षोडशयोजनम्।
पर्वताभेन पिहितं तदागम्यं ततोऽभवत् ॥ ९७ ॥

मूलम्

पतता शिरसा तेन द्वारं षोडशयोजनम्।
पर्वताभेन पिहितं तदागम्यं ततोऽभवत् ॥ ९७ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

उसके पर्वत-सदृश विशाल मस्तकने गिरकर (उत्तर-पूर्व देशके) सोलह योजन लम्बे द्वारको बंद कर दिया। अतः वह देश सर्वसाधारणके लिये अगम्य हो गया॥९७॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

उत्तराः कुरवस्तेन गच्छन्त्यद्य यथासुखम्।
क्षिप्ताक्षिप्ता तु सा शक्तिर्हत्वा शत्रून् सहस्रशः ॥ ९८ ॥
स्कन्दहस्तमनुप्राप्ता दृश्यते देवदानवैः ।

मूलम्

उत्तराः कुरवस्तेन गच्छन्त्यद्य यथासुखम्।
क्षिप्ताक्षिप्ता तु सा शक्तिर्हत्वा शत्रून् सहस्रशः ॥ ९८ ॥
स्कन्दहस्तमनुप्राप्ता दृश्यते देवदानवैः ।

अनुवाद (हिन्दी)

उत्तर कुरुके निवासी अब उस मार्गसे सुखपूर्वक आते-जाते हैं। देवताओं और दानवोंने देखा, कुमार कार्तिकेय बार-बार शत्रुओंपर शक्तिका प्रहार करते हैं और वह सहस्रों योद्धाओंको मारकर पुनः उनके हाथमें लौट आती है॥९८॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

प्रायः शरैर्विनिहता महासेनेन धीमता ॥ ९९ ॥
शेषा दैत्यगणा घोरा भीतास्त्रस्ता दुरासदैः।
स्कन्दपारिषदैर्हत्वा भक्षिताश्च सहस्रशः ॥ १०० ॥

मूलम्

प्रायः शरैर्विनिहता महासेनेन धीमता ॥ ९९ ॥
शेषा दैत्यगणा घोरा भीतास्त्रस्ता दुरासदैः।
स्कन्दपारिषदैर्हत्वा भक्षिताश्च सहस्रशः ॥ १०० ॥

अनुवाद (हिन्दी)

परम बुद्धिमान् महासेनने अपने बाणोंद्वारा अधिकांश दैत्योंको समाप्त कर दिया, बचे-खुचे भयंकर दैत्य भी भयभीत हो साहस खो चुके थे। स्कन्ददेवके दुर्धर्ष पार्षद उन सहस्रों दैत्योंको मारकर खा गये॥९९-१००॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

दानवान् भक्षयन्तस्ते प्रपिबन्तश्च शोणितम्।
क्षणान्निर्दानवं सर्वमकार्षुर्भृशहर्षिताः ॥ १०१ ॥

मूलम्

दानवान् भक्षयन्तस्ते प्रपिबन्तश्च शोणितम्।
क्षणान्निर्दानवं सर्वमकार्षुर्भृशहर्षिताः ॥ १०१ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

उन सबने अत्यन्त हर्षमें भरकर दानवोंको खाते और उनके रक्त पीते हुए क्षणभरमें सारी रणभूमिको दानवोंसे खाली कर दिया॥१०१॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तमांसीव यथा सूर्यो वृक्षानग्निर्घनान् खगः।
तथा स्कन्दोऽजयच्छत्रून् स्वेन वीर्येण कीर्तिमान् ॥ १०२ ॥

मूलम्

तमांसीव यथा सूर्यो वृक्षानग्निर्घनान् खगः।
तथा स्कन्दोऽजयच्छत्रून् स्वेन वीर्येण कीर्तिमान् ॥ १०२ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

जैसे सूर्य अन्धकार मिटा देते हैं, आग वृक्षोंको जला डालती है और आकाशचारी वायु बादलोंको छिन्न-भिन्न कर देती है, वैसे ही कीर्तिशाली कुमार कार्तिकेयने अपने पराक्रमद्वारा समस्त शत्रुओंको नष्ट करके उनपर विजय पायी॥१०२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

सम्पूज्यमानस्त्रिदशैरभिवाद्य महेश्वरम् ।
शुशुभे कृत्तिकापुत्रः प्रकीर्णांशुरिवांशुमान् ॥ १०३ ॥

मूलम्

सम्पूज्यमानस्त्रिदशैरभिवाद्य महेश्वरम् ।
शुशुभे कृत्तिकापुत्रः प्रकीर्णांशुरिवांशुमान् ॥ १०३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

उस समय देवतालोग कृत्तिकानन्दन स्कन्ददेवकी स्तुति और पूजा करने लगे। कुमार स्कन्द अपने पिता महेश्वरको प्रणाम करके सब ओर किरणें बिखेरनेवाले अंशुमाली सूर्यकी भाँति शोभा पाने लगे॥१०३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

नष्टशत्रुर्यदा स्कन्दः प्रयातस्तु महेश्वरम्।
तदाब्रवीन्महासेनं परिष्वज्य पुरंदरः ॥ १०४ ॥

मूलम्

नष्टशत्रुर्यदा स्कन्दः प्रयातस्तु महेश्वरम्।
तदाब्रवीन्महासेनं परिष्वज्य पुरंदरः ॥ १०४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

शत्रुओंका नाश करके जब कुमार कार्तिकेय भगवान् महेश्वरके पास पहुँचे, उस समय इन्द्रने उनको हृदयसे लगा लिया और इस प्रकार कहा—॥१०४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ब्रह्मदत्तवरः स्कन्द त्वयायं महिषो हतः।
देवास्तृणसमा यस्य बभूवुर्जयतां वर ॥ १०५ ॥
सोऽयं त्वया महाबाहो शमितो देवकण्टकः।
शतं महिषतुल्यानां दानवानां त्वया रणे ॥ १०६ ॥
निहतं देवशत्रूणां यैर्वयं पूर्वतापिताः।
तावकैर्भक्षिताश्चान्ये दानवाः शतसङ्घशः ॥ १०७ ॥

मूलम्

ब्रह्मदत्तवरः स्कन्द त्वयायं महिषो हतः।
देवास्तृणसमा यस्य बभूवुर्जयतां वर ॥ १०५ ॥
सोऽयं त्वया महाबाहो शमितो देवकण्टकः।
शतं महिषतुल्यानां दानवानां त्वया रणे ॥ १०६ ॥
निहतं देवशत्रूणां यैर्वयं पूर्वतापिताः।
तावकैर्भक्षिताश्चान्ये दानवाः शतसङ्घशः ॥ १०७ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ स्कन्द! इस महिषासुरको ब्रह्माजीने वरदान दिया था, जिसके कारण इसके सामने सब देवता तिनकोंके समान हो गये थे। आज तुमने इसे मार गिराया है। महाबाहो! यह देवताओंके लिये बड़ा भारी काँटा था, जिसे तुमने निकाल फेंका है। यही नहीं, आज रणभूमिमें इस महिषके समान पराक्रमी एक सौ देवद्रोही दानव और तुम्हारे हाथसे मारे गये हैं, जो पहले हमें बहुत कष्ट दे चुके हैं। तुम्हारे पार्षद भी सैकड़ों दानवोंको खा गये हैं॥१०५—१०७॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अजेयस्त्वं रणेऽरीणामुमापतिरिव प्रभुः ।
एतत् ते प्रथमं देव ख्यातं कर्म भविष्यति ॥ १०८ ॥
त्रिषु लोकेषु कीर्तिश्च तवाक्षय्या भविष्यति।
वशगाश्च भविष्यन्ति सुरास्तव महाभुज ॥ १०९ ॥

मूलम्

अजेयस्त्वं रणेऽरीणामुमापतिरिव प्रभुः ।
एतत् ते प्रथमं देव ख्यातं कर्म भविष्यति ॥ १०८ ॥
त्रिषु लोकेषु कीर्तिश्च तवाक्षय्या भविष्यति।
वशगाश्च भविष्यन्ति सुरास्तव महाभुज ॥ १०९ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘देव! तुम भगवान् शंकरके समान ही युद्धमें शत्रुओंके लिये अजेय हो। यह तुम्हारा प्रथम पराक्रम सर्वत्र विख्यात होगा। तुम्हारी अक्षय कीर्ति तीनों लोकोंमें फैल जायगी। महाबाहो! सब देवता तुम्हारे वशमें रहेंगे’॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

एवमुक्त्वा महासेनं निवृत्तः सह दैवतैः।
अनुज्ञातो भगवता त्र्यम्बकेण शचीपतिः ॥ ११० ॥

मूलम्

एवमुक्त्वा महासेनं निवृत्तः सह दैवतैः।
अनुज्ञातो भगवता त्र्यम्बकेण शचीपतिः ॥ ११० ॥

अनुवाद (हिन्दी)

महासेनसे ऐसा कहकर शचीपति इन्द्र भगवान् शंकरकी आज्ञा ले देवताओंके साथ स्वर्गलोकको लौट गये॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

गतो भद्रवटं रुद्रो निवृत्ताश्च दिवौकसः।
उक्ताश्च देवा रुद्रेण स्कन्दं पश्यत मामिव ॥ १११ ॥

मूलम्

गतो भद्रवटं रुद्रो निवृत्ताश्च दिवौकसः।
उक्ताश्च देवा रुद्रेण स्कन्दं पश्यत मामिव ॥ १११ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

भगवान् रुद्र भद्रवटके समीप गये और देवता अपने-अपने स्थानको लौटने लगे। उस समय भगवान् शंकरने देवताओंसे कहा—‘तुम सब लोग कुमार कार्तिकेयको मेरे ही समान मानना’॥१११॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

स हत्वा दानवगणान् पूज्यमानो महर्षिभिः।
एकाह्नैवाजयत् सर्वं त्रैलोक्य वह्निनन्दनः ॥ ११२ ॥

मूलम्

स हत्वा दानवगणान् पूज्यमानो महर्षिभिः।
एकाह्नैवाजयत् सर्वं त्रैलोक्य वह्निनन्दनः ॥ ११२ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

अग्निनन्दन स्कन्दने सब दानवोंको मारकर महर्षियोंसे पूजित हो एक ही दिनमें समूची त्रिलोकीको जीत लिया॥११२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

स्कन्दस्य य इदं विप्रः पठेज्जन्म समाहितः।
स पुष्टिमिह सम्प्राप्य स्कन्दसालोक्यमाप्नुयात् ॥ ११३ ॥

मूलम्

स्कन्दस्य य इदं विप्रः पठेज्जन्म समाहितः।
स पुष्टिमिह सम्प्राप्य स्कन्दसालोक्यमाप्नुयात् ॥ ११३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

जो ब्राह्मण एकाग्रचित्त हो स्कन्ददेवके इस जन्मवृत्तान्तका पाठ करता है, वह संसारमें पुष्टिको प्राप्त हो अन्तमें भगवान् स्कन्दके लोकमें जाता है॥

मूलम् (समाप्तिः)

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि आङ्गिरसे स्कन्दोत्पत्तौ महिषासुरवधे एकत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥२३१॥

मूलम् (वचनम्)

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें अंगिरसोपाख्यानके प्रसंगमें स्कन्दकी उत्पत्ति तथा महिषासुरवधविषयक दो सौ एकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥२३१॥

सूचना (हिन्दी)

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका श्लोक मिलाकर कुल ११३ श्लोक हैं)


  1. रथका वह अग्रभाग जहाँ जूआ बाँधा जाता है, कूबर कहलाता है। ग्राम्य भाषामें उसे ‘नकेला’ या ‘सबुनी’ कहते हैं। ↩︎