२३० कृत्तिकावरो ग्रहवर्णनञ्च

भागसूचना

त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः

सूचना (हिन्दी)

कृत्तिकाओंको नक्षत्रमण्डलमें स्थानकी प्राप्ति तथा मनुष्योंको कष्ट देनेवाले विविध ग्रहोंका वर्णन

मूलम् (वचनम्)

मार्कण्डेय उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

श्रिया जुष्टं महासेनं देवसेनापतिं कृतम्।
सप्तर्षिपत्न्यः षड् देव्यस्तत्सकाशमथागमन् ॥ १ ॥

मूलम्

श्रिया जुष्टं महासेनं देवसेनापतिं कृतम्।
सप्तर्षिपत्न्यः षड् देव्यस्तत्सकाशमथागमन् ॥ १ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

मार्कण्डेयजी कहते हैं— राजन्! कुमार महासेनको श्रीसम्पन्न और देवताओंका सेनापति हुआ देख सप्तर्षियोंमेंसे छःकी पत्नियाँ उनके पास आयीं॥१॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ऋषिभिः सम्परित्यक्ता धर्मयुक्ता महाव्रताः।
द्रुतमागम्य चोचुस्ता देवसेनापतिं प्रभुम् ॥ २ ॥

मूलम्

ऋषिभिः सम्परित्यक्ता धर्मयुक्ता महाव्रताः।
द्रुतमागम्य चोचुस्ता देवसेनापतिं प्रभुम् ॥ २ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

वे धर्मपरायणा तथा महान् पातिव्रत्यका पालन करनेवाली थीं, तो भी ऋषियोंने उन्हें त्याग दिया था। अतः उन्होंने देवसेनाके स्वामी भगवान् स्कन्दके पास शीघ्रतापूर्वक आकर कहा—॥२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

वयं पुत्र परित्यक्ता भर्तृभिर्देवसम्मितैः।
अकारणाद् रुषा तैस्तु पुण्यस्थानात् परिच्युताः ॥ ३ ॥

मूलम्

वयं पुत्र परित्यक्ता भर्तृभिर्देवसम्मितैः।
अकारणाद् रुषा तैस्तु पुण्यस्थानात् परिच्युताः ॥ ३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘बेटा! हमारे देवतुल्य पतियोंने अकारण रुष्ट होकर हमें त्याग दिया है, इसलिये (हम) पुण्यलोकसे च्युत हो गयी हैं॥३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अस्माभिः किल जातस्त्वमिति केनाप्युदाहृतम्।
तत् सत्यमेतत् संश्रुत्य तस्मान्नस्त्रातुमर्हसि ॥ ४ ॥

मूलम्

अस्माभिः किल जातस्त्वमिति केनाप्युदाहृतम्।
तत् सत्यमेतत् संश्रुत्य तस्मान्नस्त्रातुमर्हसि ॥ ४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘उन्हें किसीने यह बता दिया है कि तुम हमारे गर्भसे उत्पन्न हुए हो, (परंतु ऐसी बात नहीं है।) अतः हमारे सत्य कथनको सुनकर तुम इस संकटसे हमारी रक्षा करो॥४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अक्षयश्च भेवत् स्वर्गस्त्वत्प्रसादाद्धि नः प्रभो।
त्वां पुत्रं चाप्यभीप्सामः कृत्वैतदनृणो भव ॥ ५ ॥

मूलम्

अक्षयश्च भेवत् स्वर्गस्त्वत्प्रसादाद्धि नः प्रभो।
त्वां पुत्रं चाप्यभीप्सामः कृत्वैतदनृणो भव ॥ ५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘प्रभो! तुम्हारी कृपासे हमें अक्षय स्वर्गकी प्राप्ति हो सकती है। इसके सिवा हम तुम्हें अपना पुत्र भी बनाये रखना चाहती हैं। यह सब कार्य सम्पन्न करके तुम हमसे उऋण हो जाओ’॥५॥

मूलम् (वचनम्)

स्कन्द उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

मातरो हि भवत्यो मे सुतो वोऽहमनिन्दिताः।
यद्वापीच्छत तत् सर्वं सम्भविष्यति वस्तथा ॥ ६ ॥

मूलम्

मातरो हि भवत्यो मे सुतो वोऽहमनिन्दिताः।
यद्वापीच्छत तत् सर्वं सम्भविष्यति वस्तथा ॥ ६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

स्कन्द बोले— वन्दनीय सतियो! आपलोग मेरी माताएँ हैं और मैं आप सबका पुत्र हूँ। इसके सिवा यदि आप लोगोंकी और कोई इच्छा हो तो वह भी पूर्ण हो जायगी॥६॥

मूलम् (वचनम्)

मार्कण्डेय उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

विवक्षन्तं ततः शक्रं किं कार्यमिति सोऽब्रवीत्।
उक्तः स्कन्देन ब्रूहीति सोऽब्रवीद् वासवस्ततः ॥ ७ ॥

मूलम्

विवक्षन्तं ततः शक्रं किं कार्यमिति सोऽब्रवीत्।
उक्तः स्कन्देन ब्रूहीति सोऽब्रवीद् वासवस्ततः ॥ ७ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

मार्कण्डेयजी कहते हैं— राजन्! तदनन्तर इन्द्रको कुछ कहनेके लिये उत्सुक देख स्कन्दने पूछा—‘क्या काम है, कहिये।’ स्कन्दके इस प्रकार आदेश देनेपर इन्द्र बोले—॥७॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अभिजित् स्पर्धमाना तु रोहिण्या अनुजा स्वसा।
इच्छन्ती ज्येष्ठतां देवी तपस्तप्तुं वनं गता ॥ ८ ॥

मूलम्

अभिजित् स्पर्धमाना तु रोहिण्या अनुजा स्वसा।
इच्छन्ती ज्येष्ठतां देवी तपस्तप्तुं वनं गता ॥ ८ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘रोहिणीकी छोटी बहिन अभिजित् देवी स्पर्धाके कारण ज्येष्ठता पानेकी इच्छासे तपस्या करनेके लिये वनमें चली गयी है॥८॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तत्र मूढोऽस्मि भद्रं ते नक्षत्रं गगनाच्च्युतम्।
कालं त्विमं परं स्कन्द ब्रह्मणा सह चिन्तय ॥ ९ ॥

मूलम्

तत्र मूढोऽस्मि भद्रं ते नक्षत्रं गगनाच्च्युतम्।
कालं त्विमं परं स्कन्द ब्रह्मणा सह चिन्तय ॥ ९ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘तुम्हारा कल्याण हो, आकाशसे यह एक नक्षत्र च्युत हो गया है; (इसकी पूर्ति कैसे हो?) इस प्रश्नको लेकर मैं किंकर्तव्यविमूढ हो गया हूँ। स्कन्द! तुम ब्रह्माजीके साथ मिलकर इस उत्तम काल (मुहूर्त या नक्षत्र) की पूर्तिके उपायका विचार करो॥९॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

धनिष्ठादिस्तदा कालो ब्रह्मणा परिकल्पितः।
रोहिणी ह्यभवत् पूर्वमेवं संख्या समाभवत् ॥ १० ॥

मूलम्

धनिष्ठादिस्तदा कालो ब्रह्मणा परिकल्पितः।
रोहिणी ह्यभवत् पूर्वमेवं संख्या समाभवत् ॥ १० ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘अभिजित्‌का पतन होनेसे ब्रह्माजीने धनिष्ठासे ही (सत्ययुग आदि) कालकी गणनाका क्रम निश्चित किया (क्योंकि वही उस समय युगादि नक्षत्र था)। इसके पूर्व रोहिणीको ही युगादि नक्षत्र माना जाता था (क्योंकि उसीके प्रारम्भकालमें चन्द्रमा, सूर्य तथा गुरुका योग होता था)—इस प्रकार नाक्षत्र मासकी दिन-संख्या उन दिनों सम थी’॥१०॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

एवमुक्ते तु शक्रेण त्रिदिवं कृत्तिका गताः।
नक्षत्रं सप्तशीर्षाभं भाति तद् वह्निदैवतम् ॥ ११ ॥

मूलम्

एवमुक्ते तु शक्रेण त्रिदिवं कृत्तिका गताः।
नक्षत्रं सप्तशीर्षाभं भाति तद् वह्निदैवतम् ॥ ११ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

इन्द्रके उपर्युक्त प्रस्ताव करनेपर उनका आशय समझकर छहों कृत्तिकाएँ अभिजित्‌के स्थानकी पूर्ति करनेके लिये आकाशमें चली गयीं। वह अग्निदेवता-सम्बन्धी कृत्तिका नक्षत्र सात सिरोंकी आकृतिमें प्रकाशित हो रहा है॥११॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

विनता चाब्रवीत् स्कन्दं मम त्वं पिण्डदः सुतः।
इच्छामि नित्यमेवाहं त्वया पुत्र सहासितुम् ॥ १२ ॥

मूलम्

विनता चाब्रवीत् स्कन्दं मम त्वं पिण्डदः सुतः।
इच्छामि नित्यमेवाहं त्वया पुत्र सहासितुम् ॥ १२ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

गरुड़जातीय विनताने स्कन्दसे कहा—‘बेटा! तुम मेरे पिण्डदाता पुत्र हो। मैं सदा तुम्हारे साथ रहना चाहती हूँ’॥१२॥

मूलम् (वचनम्)

स्कन्द उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

एवमस्तु नमस्तेऽस्तु पुत्रस्नेहात् प्रशाधि माम्।
स्नुषया पूज्यमाना वै देवि वत्स्यसि नित्यदा ॥ १३ ॥

मूलम्

एवमस्तु नमस्तेऽस्तु पुत्रस्नेहात् प्रशाधि माम्।
स्नुषया पूज्यमाना वै देवि वत्स्यसि नित्यदा ॥ १३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

स्कन्दने कहा— एवमस्तु (ऐसा ही हो), मा! तुम्हें नमस्कार है। तुम मेरे ऊपर पुत्रोचित स्नेह रखकर कर्तव्यका आदेश देती रहो। देवि! तुम यहाँ सदा अपनी पुत्रवधू देवसेनाद्वारा सम्मानित होकर रहोगी॥१३॥

मूलम् (वचनम्)

मार्कण्डेय उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

अथ मातृगणः सर्वः स्कन्दं वचनमब्रवीत्।
वयं सर्वस्य लोकस्य मातरः कविभिः स्तुताः।
इच्छामो मातरस्तुभ्यं भवितुं पूजयस्व नः ॥ १४ ॥

मूलम्

अथ मातृगणः सर्वः स्कन्दं वचनमब्रवीत्।
वयं सर्वस्य लोकस्य मातरः कविभिः स्तुताः।
इच्छामो मातरस्तुभ्यं भवितुं पूजयस्व नः ॥ १४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

मार्कण्डेयजी कहते हैं— राजन्! तदनन्तर समस्त मातृगणोंने आकर स्कन्दसे कहा—‘बेटा! विद्वानोंने हमें सम्पूर्ण लोकोंकी माताएँ कहकर हमारी स्तुति की है। अब हम तुम्हारी माता होना चाहती हैं। तुम मातृभावसे हमारा पूजन करो’॥१४॥

मूलम् (वचनम्)

स्कन्द उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

मातरो हि भवत्यो मे भवतीनामहं सुतः।
उच्यतां यन्मया कार्यं भवतीनामथेप्सितम् ॥ १५ ॥

मूलम्

मातरो हि भवत्यो मे भवतीनामहं सुतः।
उच्यतां यन्मया कार्यं भवतीनामथेप्सितम् ॥ १५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

स्कन्दने कहा— आप मेरी माताएँ हैं। मैं आपलोगोंका पुत्र हूँ। मुझसे सिद्ध होनेयोग्य जो आपका अभीष्ट कार्य हो, उसे बताइये॥१५॥

मूलम् (वचनम्)

मातर ऊचुः

विश्वास-प्रस्तुतिः

यास्तु ता मातरः पूर्वं लोकस्यास्य प्रकल्पिताः।
अस्माकं तु भवेत् स्थानं तासां चैव न तद् भवेत्॥१६॥

मूलम्

यास्तु ता मातरः पूर्वं लोकस्यास्य प्रकल्पिताः।
अस्माकं तु भवेत् स्थानं तासां चैव न तद् भवेत्॥१६॥

अनुवाद (हिन्दी)

माताओंने कहा— (ब्राह्मी, माहेश्वरी आदि) सुप्रसिद्ध लोकमाताएँ जो पहलेसे इस सम्पूर्ण जगत्‌की माताओंके स्थानपर प्रतिष्ठित हों, (वे अपना पद छोड़ दें।) उनके उस स्थानपर अब हमारा अधिकार हो जाय। उनका उसपर कोई अधिकार न रहे॥१६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

भवेम पूज्या लोकस्य न ताः पूज्याः सुरर्षभ।
प्रजाऽस्माकं हृतास्ताभिस्त्वत्कृते ताः प्रयच्छ नः ॥ १७ ॥

मूलम्

भवेम पूज्या लोकस्य न ताः पूज्याः सुरर्षभ।
प्रजाऽस्माकं हृतास्ताभिस्त्वत्कृते ताः प्रयच्छ नः ॥ १७ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

सुरश्रेष्ठ! हम सम्पूर्ण जगत्‌की पूजनीया हों। जो पहले मातृकाएँ थीं, उनकी अब पूजा न हो। उन्होंने तुम्हारे लिये हमपर मिथ्या अपवाद लगाकर हमारे पतियोंको कुपित करके हमारे संतानसुखको छीन लिया है। अतः तुम हमें संतान प्रदान करो (हमारे पतियोंको अनुकूल करके हमें संतान-सुखकी प्राप्ति कराओ)॥१७॥

मूलम् (वचनम्)

स्कन्द उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

वृत्ताः प्रजा न ताः शक्या भवतीभिर्निषेवितुम्।
अन्यां वः कां प्रयच्छामि प्रजां यां मनसेच्छथ ॥ १८ ॥

मूलम्

वृत्ताः प्रजा न ताः शक्या भवतीभिर्निषेवितुम्।
अन्यां वः कां प्रयच्छामि प्रजां यां मनसेच्छथ ॥ १८ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

स्कन्द बोले— माताओ! जिन प्रजाओंकी उत्पत्तिका अवसर बीत गया, उन्हें आपलोग अब नहीं पा सकतीं। यदि दूसरी कोई प्रजा पानेकी आपके मनमें इच्छा हो तो कहिये, मैं उसे प्रदान करूँगा॥१८॥

मूलम् (वचनम्)

मातर ऊचुः

विश्वास-प्रस्तुतिः

इच्छाम तासां मातॄणां प्रजा भोक्तुं प्रयच्छ नः।
त्वया सह पृथग्भूता ये च तासामथेश्वराः ॥ १९ ॥

मूलम्

इच्छाम तासां मातॄणां प्रजा भोक्तुं प्रयच्छ नः।
त्वया सह पृथग्भूता ये च तासामथेश्वराः ॥ १९ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

माताओंने कहा— यदि ऐसी बात है, तो हमें इन लोकमाताओंकी संतानें सौंप दो। हम उन्हें खाना चाहती हैं। तुमसे पृथक् जो उन संतानोंके पिता आदि अभिभावक हैं, उन्हें भी हम खाना चाहती हैं॥१९॥

मूलम् (वचनम्)

स्कन्द उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

प्रजा वो दद्मि कष्टं तु भवतीभिरुदाहृतम्।
परिरक्षत भद्रं वः प्रजाः साधु नमस्कृताः ॥ २० ॥

मूलम्

प्रजा वो दद्मि कष्टं तु भवतीभिरुदाहृतम्।
परिरक्षत भद्रं वः प्रजाः साधु नमस्कृताः ॥ २० ॥

अनुवाद (हिन्दी)

स्कन्द बोले— देवियो! आपलोगोंने यह दुःखकी बात कही है, तो भी मैं आपको पहलेकी मातृकाओंकी संतानको अर्पित कर देता हूँ; परंतु आपलोग उन सबकी रक्षा करें; इसीसे आपका भला होगा। मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ॥२०॥

मूलम् (वचनम्)

मातर ऊचुः

विश्वास-प्रस्तुतिः

परिरक्षाम भद्रं ते प्रजाः स्कन्द यथेच्छसि।
त्वया नो रोचते स्कन्द सहवासश्चिरं प्रभो ॥ २१ ॥

मूलम्

परिरक्षाम भद्रं ते प्रजाः स्कन्द यथेच्छसि।
त्वया नो रोचते स्कन्द सहवासश्चिरं प्रभो ॥ २१ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

माताओंने कहा— स्कन्द! जैसी तुम्हारी इच्छा है, उसके अनुसार हम उन संतानोंकी रक्षा अवश्य करेंगी। शक्तिशाली कुमार! हमें दीर्घकालतक तुम्हारे साथ रहनेकी इच्छा है॥२१॥

मूलम् (वचनम्)

स्कन्द उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

यावत् षोडश वर्षाणि भवन्ति तरुणाः प्रजाः।
प्रबाधत मनुष्याणां तावद्रूपैः पृथग्विधैः ॥ २२ ॥

मूलम्

यावत् षोडश वर्षाणि भवन्ति तरुणाः प्रजाः।
प्रबाधत मनुष्याणां तावद्रूपैः पृथग्विधैः ॥ २२ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

स्कन्द बोले— संसारके मनुष्य जबतक सोलह वर्षके तरुण न हो जायँ, तबतक आप मानव-प्रजाको पृथक्-पृथक् उतने ही रूप धारण करके संताप दे सकती हैं॥२२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अहं च वः प्रदास्यामि रौद्रमात्मानमव्ययम्।
परमं तेन सहिताः सुखं वत्स्यथ पूजिताः ॥ २३ ॥

मूलम्

अहं च वः प्रदास्यामि रौद्रमात्मानमव्ययम्।
परमं तेन सहिताः सुखं वत्स्यथ पूजिताः ॥ २३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

मैं आपलोगोंको एक भयंकर एवं अविनाशी पुरुष प्रदान करूँगा, जो मेरा अभिन्न स्वरूप होगा। उसके साथ सम्मानपूर्वक रहकर आपलोग परम सुखकी भागिनी होंगी॥२३॥

मूलम् (वचनम्)

मार्कण्डेय उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

ततः शरीरात् स्कन्दस्य पुरुषः पावकप्रभः।
भोक्तुं प्रजाः स मर्त्यानां निष्पपात महाप्रभः ॥ २४ ॥

मूलम्

ततः शरीरात् स्कन्दस्य पुरुषः पावकप्रभः।
भोक्तुं प्रजाः स मर्त्यानां निष्पपात महाप्रभः ॥ २४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

मार्कण्डेयजी कहते हैं— राजन्! तदनन्तर स्कन्दके शरीरसे अग्निके समान तेजस्वी तथा परम कान्तिमान् एक पुरुष प्रकट हुआ, जो समस्त मानव-प्रजाको खा जानेकी इच्छा रखता था॥२४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अपतत् सहसा भूमौ विसंज्ञोऽथ क्षुधार्दितः।
स्कन्देन सोऽभ्यनुज्ञातो रौद्ररूपोऽभवद् ग्रहः ॥ २५ ॥

मूलम्

अपतत् सहसा भूमौ विसंज्ञोऽथ क्षुधार्दितः।
स्कन्देन सोऽभ्यनुज्ञातो रौद्ररूपोऽभवद् ग्रहः ॥ २५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

वह पैदा होते ही भूखसे पीडित हो सहसा अचेत होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। फिर स्कन्दकी आज्ञासे वह भयंकर रूपधारी ग्रह हो गया॥२५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

स्कन्दापस्मारमित्याहुर्ग्रहं तं द्विजसत्तमाः ।
विनता तु महारौद्रा कथ्यते शकुनिग्रहः ॥ २६ ॥

मूलम्

स्कन्दापस्मारमित्याहुर्ग्रहं तं द्विजसत्तमाः ।
विनता तु महारौद्रा कथ्यते शकुनिग्रहः ॥ २६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

श्रेष्ठ द्विज! इस ग्रहको ‘स्कन्दापस्मार’ कहते हैं। इसी प्रकार अत्यन्त रौद्र रूप धारण करनेवाली विनताको ‘शकुनि ग्रह’ बताया जाता है॥२६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

पूतनां राक्षसीं प्राहुस्तं विद्यात् पूतनाग्रहम्।
कष्टा दारुणरूपेण घोररूपा निशाचरी ॥ २७ ॥

मूलम्

पूतनां राक्षसीं प्राहुस्तं विद्यात् पूतनाग्रहम्।
कष्टा दारुणरूपेण घोररूपा निशाचरी ॥ २७ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

पूतनाको राक्षसी बताया गया है, उसे ‘पूतनाग्रह’ समझना चाहिये। वह भयंकर रूप धारण करनेवाली निशाचरी बड़ी क्रूरताके साथ बालकोंको कष्ट पहुँचाती है॥२७॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

पिशाची दारुणाकारा कथ्यते शीतपूतना।
गर्भान् सा मानुषीणां तु हरते घोरदर्शना ॥ २८ ॥

मूलम्

पिशाची दारुणाकारा कथ्यते शीतपूतना।
गर्भान् सा मानुषीणां तु हरते घोरदर्शना ॥ २८ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

इसके सिवा भयानक आकारवाली एक पिशाची है, जिसे ‘शीतपूतना’ कहते हैं, वह देखनेमें बड़ी डरावनी है। वह मानवी स्त्रियोंका गर्भ हर ले जाती है॥२८॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अदितिं रेवतीं प्राहुर्ग्रहस्तस्यास्तु रैवतः।
सोऽपि बालान् महाघोरो बाधते वै महाग्रहः ॥ २९ ॥

मूलम्

अदितिं रेवतीं प्राहुर्ग्रहस्तस्यास्तु रैवतः।
सोऽपि बालान् महाघोरो बाधते वै महाग्रहः ॥ २९ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

लोग अदिति देवीको रेवती कहते हैं। रेवतीके ग्रहका नाम रैवत है। वह महाभयंकर महान् ग्रह भी बालकोंको बड़ा कष्ट देता है॥२९॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

दैत्यानां या दितिर्माता तामाहुर्मुखमण्डिकाम्।
अत्यर्थं शिशुमांसेन सम्प्रहृष्टा दुरासदा ॥ ३० ॥

मूलम्

दैत्यानां या दितिर्माता तामाहुर्मुखमण्डिकाम्।
अत्यर्थं शिशुमांसेन सम्प्रहृष्टा दुरासदा ॥ ३० ॥

अनुवाद (हिन्दी)

दैत्योंकी माता जो दिति है, उसे ‘मुखमण्डिका’ कहते हैं। वह छोटे बच्चोंके मांससे अधिक प्रसन्न होती है। उसे पराजित करना अत्यन्त कठिन है॥३०॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

कुमाराश्च कुमार्यश्च ये प्रोक्ताः स्कन्दसम्भवाः।
तेऽपि गर्भभुजः सर्वे कौरव्य सुमहाग्रहाः ॥ ३१ ॥

मूलम्

कुमाराश्च कुमार्यश्च ये प्रोक्ताः स्कन्दसम्भवाः।
तेऽपि गर्भभुजः सर्वे कौरव्य सुमहाग्रहाः ॥ ३१ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

कुरुनन्दन! स्कन्दके शरीरसे उत्पन्न हुए जिन कुमार एवं कुमारियोंका वर्णन किया गया है, वे सभी गर्भस्थ बालकोंका भक्षण करनेवाले महान् ग्रह हैं॥३१॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तासामेव तु पत्नीनां पतयस्ते प्रकीर्तिताः।
आजायमानान् गृह्णन्ति बालकान् रौद्रकर्मिणः ॥ ३२ ॥

मूलम्

तासामेव तु पत्नीनां पतयस्ते प्रकीर्तिताः।
आजायमानान् गृह्णन्ति बालकान् रौद्रकर्मिणः ॥ ३२ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

वे कुमार उन्हीं पत्नीस्वरूपा कुमारियोंके पति कहे गये हैं। उनके कर्म बड़े भयंकर हैं। वे जन्म लेनेके पहले ही बच्चोंको पकड़ ले जाते हैं॥३२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

गवां माता तु या प्राज्ञैः कथ्यते सुरभिर्नृप।
शकुनिस्तामथारुह्य सह भुङ्क्ते शिशून् भुवि ॥ ३३ ॥

मूलम्

गवां माता तु या प्राज्ञैः कथ्यते सुरभिर्नृप।
शकुनिस्तामथारुह्य सह भुङ्क्ते शिशून् भुवि ॥ ३३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

राजन्! विद्वान् पुरुष जिसे गोमाता सुरभि कहते हैं, उसीपर आरूढ़ होकर शकुनिग्रह—विनता अन्य ग्रहोंके साथ भूमण्डलके बालकोंका भक्षण करती है॥३३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

सरमा नाम या माता शुनां देवी जनाधिप।
सापि गर्भान् समादत्ते मानुषीणां सदैव हि ॥ ३४ ॥

मूलम्

सरमा नाम या माता शुनां देवी जनाधिप।
सापि गर्भान् समादत्ते मानुषीणां सदैव हि ॥ ३४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

नरेश्वर! कुत्तोंकी माता जो देवजातीय सरमा है, वह भी सदैव मानवीय स्त्रियोंके गर्भस्थ बालकोंका अपहरण करती रहती है॥३४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

पादपानां च या माता करञ्जनिलया हि सा।
वरदा सा हि सौम्या च नित्यं भूतानुकम्पिनी ॥ ३५ ॥

मूलम्

पादपानां च या माता करञ्जनिलया हि सा।
वरदा सा हि सौम्या च नित्यं भूतानुकम्पिनी ॥ ३५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

जो वृक्षोंकी माता है, वह करंजवृक्षपर निवास किया करती है। वह वर देनेवाली तथा सौम्य है और सदा समस्त प्राणियोंपर कृपा करती है॥३५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

करञ्जे तां नमस्यन्ति तस्मात् पुत्रार्थिनो नराः।
इमे त्वष्टादशान्ये वै ग्रहा मांसमधुप्रियाः ॥ ३६ ॥
द्विपञ्चरात्रं तिष्ठन्ति सततं सूतिकागृहे।
कद्रूः सूक्ष्मवपुर्भूत्वा गर्भिणीं प्रविशत्यथ ॥ ३७ ॥
भुङ्क्ते सा तत्र तं गर्भं सा तु नागं प्रसूयते।

मूलम्

करञ्जे तां नमस्यन्ति तस्मात् पुत्रार्थिनो नराः।
इमे त्वष्टादशान्ये वै ग्रहा मांसमधुप्रियाः ॥ ३६ ॥
द्विपञ्चरात्रं तिष्ठन्ति सततं सूतिकागृहे।
कद्रूः सूक्ष्मवपुर्भूत्वा गर्भिणीं प्रविशत्यथ ॥ ३७ ॥
भुङ्क्ते सा तत्र तं गर्भं सा तु नागं प्रसूयते।

अनुवाद (हिन्दी)

इसीलिये पुत्रार्थी मनुष्य करंजवृक्षपर रहनेवाली उस देवीको नमस्कार करते हैं। ये तथा दूसरे अठारह ग्रह मांस और मधुके प्रेमी हैं और दस राततक सूतिका-गृहमें निरन्तर टिके रहते हैं। कद्रू सूक्ष्म शरीर धारण करके गर्भिणी स्त्रीके शरीरके भीतर प्रवेश कर जाती है और वहाँ उस गर्भको खा जाती है। इससे वह गर्भिणी स्त्री सर्प पैदा करती है॥३६-३७॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

गन्धर्वाणां तु या माता सा गर्भं गृह्य गच्छति॥३८॥
ततो विलीनगर्भा सा मानुषी भुवि दृश्यते।

मूलम्

गन्धर्वाणां तु या माता सा गर्भं गृह्य गच्छति॥३८॥
ततो विलीनगर्भा सा मानुषी भुवि दृश्यते।

अनुवाद (हिन्दी)

जो गन्धर्वोंकी माता है, वह गर्भिणी स्त्रीके गर्भको लेकर चल देती है, जिससे उस मानवी स्त्रीका गर्भ विलीन हुआ देखा जाता है॥३८॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

या जनित्री त्वप्सरसां गर्भमास्ते प्रगृह्य सा ॥ ३९ ॥
उपनष्टं ततो गर्भं कथयन्ति मनीषिणः।

मूलम्

या जनित्री त्वप्सरसां गर्भमास्ते प्रगृह्य सा ॥ ३९ ॥
उपनष्टं ततो गर्भं कथयन्ति मनीषिणः।

अनुवाद (हिन्दी)

जो अप्सराओंकी माता है, वह भी गर्भको पकड़ लेती है, जिससे बुद्धिमान् मनुष्य कहते हैं कि अमुक स्त्रीका गर्भ नष्ट हो गया॥३९॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

लोहितस्योदधेः कन्या धात्री स्कन्दस्य सा स्मृता ॥ ४० ॥
लोहितायनिरित्येवं कदम्बे सा हि पूज्यते।

मूलम्

लोहितस्योदधेः कन्या धात्री स्कन्दस्य सा स्मृता ॥ ४० ॥
लोहितायनिरित्येवं कदम्बे सा हि पूज्यते।

अनुवाद (हिन्दी)

लालसागरकी कन्याका नाम लोहितायनि है, जिसे स्कन्दकी धाय बताया गया है। उसकी कदम्बवृक्षोंमें पूजा की जाती है॥४०॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

पुरुषेषु यथा रुद्रस्तथाऽऽर्या प्रमदास्वपि ॥ ४१ ॥
आर्या माता कुमारस्य पृथक् कामार्थमिज्यते।
एवमेते कुमाराणां मया प्रोक्ता महाग्रहाः ॥ ४२ ॥
यावत् षोडश वर्षाणि शिशूनां ह्यशिवास्ततः।

मूलम्

पुरुषेषु यथा रुद्रस्तथाऽऽर्या प्रमदास्वपि ॥ ४१ ॥
आर्या माता कुमारस्य पृथक् कामार्थमिज्यते।
एवमेते कुमाराणां मया प्रोक्ता महाग्रहाः ॥ ४२ ॥
यावत् षोडश वर्षाणि शिशूनां ह्यशिवास्ततः।

अनुवाद (हिन्दी)

जैसे पुरुषोंमें भगवान् रुद्र श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार स्त्रियोंमें आर्या उत्तम मानी गयी हैं। आर्या कुमार कार्तिकेयकी जननी हैं। लोग अपने अभीष्टकी सिद्धिके लिये उनका उपर्युक्त ग्रहोंसे पृथक् पूजन करते हैं। इस प्रकार मैंने ये कुमारसम्बन्धी महान् ग्रह बताये हैं। जबतक सोलह वर्षकी अवस्था न हो जाय, तबतक ये बालकोंका अमंगल करनेवाले होते हैं॥४१-४२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ये च मातृगणाः प्रोक्ताः पुरुषाश्चैव ये ग्रहाः ॥ ४३ ॥
सर्वे स्कन्दग्रहा नाम ज्ञेया नित्यं शरीरिभिः।

मूलम्

ये च मातृगणाः प्रोक्ताः पुरुषाश्चैव ये ग्रहाः ॥ ४३ ॥
सर्वे स्कन्दग्रहा नाम ज्ञेया नित्यं शरीरिभिः।

अनुवाद (हिन्दी)

जो मातृगण और पुरुषग्रह बताये गये हैं, इन सबको समस्त देहधारी मनुष्य सदा ‘स्कन्दग्रह’ के नामसे जाने1॥४३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तेषां प्रशमनं कार्यं स्नानं धूपमथाञ्जनम्।
बलिकर्मोपहाराश्च स्कन्दस्येज्याविशेषतः ॥ ४४ ॥

मूलम्

तेषां प्रशमनं कार्यं स्नानं धूपमथाञ्जनम्।
बलिकर्मोपहाराश्च स्कन्दस्येज्याविशेषतः ॥ ४४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

स्नान, धूप, अञ्जन, बलिकर्म, उपहार अर्पण तथा स्कन्ददेवकी विशेष पूजा करके इन स्कन्दग्रहोंकी शान्ति करनी चाहिये॥४४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

एवमभ्यर्चिताः सर्वे प्रयच्छन्ति शुभं नृणाम्।
आयुर्वीर्यं च राजेन्द्र सम्यक्पूजानमस्कृताः ॥ ४५ ॥

मूलम्

एवमभ्यर्चिताः सर्वे प्रयच्छन्ति शुभं नृणाम्।
आयुर्वीर्यं च राजेन्द्र सम्यक्पूजानमस्कृताः ॥ ४५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

राजेन्द्र! इस प्रकार पूजित तथा विधिवत् पूजनद्वारा अभिवन्दित होनेपर वे सभी ग्रह मनुष्योंका मंगल करते हैं और उन्हें आयु तथा बल देते हैं॥४५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ऊर्ध्वं तु षोडशाद् वर्षाद्‌ ये भवन्ति ग्रहा नृणाम्।
तानहं सम्प्रवक्ष्यामि नमस्कृत्य महेश्वरम् ॥ ४६ ॥

मूलम्

ऊर्ध्वं तु षोडशाद् वर्षाद्‌ ये भवन्ति ग्रहा नृणाम्।
तानहं सम्प्रवक्ष्यामि नमस्कृत्य महेश्वरम् ॥ ४६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

अब मैं भगवान् महेश्वरको नमस्कार करके उन ग्रहोंका परिचय दूँगा, जो सोलह वर्षकी अवस्थाके बाद मनुष्योंके लिये अनिष्टकारक होते हैं॥४६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

यः पश्यति नरो देवान् जाग्रद् वा शयितोऽपि वा।
उन्माद्यति स तु क्षिप्रं तं तु देवग्रहं विदुः॥४७॥

मूलम्

यः पश्यति नरो देवान् जाग्रद् वा शयितोऽपि वा।
उन्माद्यति स तु क्षिप्रं तं तु देवग्रहं विदुः॥४७॥

अनुवाद (हिन्दी)

जो मनुष्य जागते या सोतेमें देवताओंको देखता और तुरंत पागल हो जाता है, उस कष्ट देनेवाले ग्रहको ‘देवग्रह’ कहते हैं॥४७॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

आसीनश्च शयानश्च यः पश्यति नरः पितॄन्।
उन्माद्यति स तु क्षिप्रं स ज्ञेयस्तु पितृग्रहः ॥ ४८ ॥

मूलम्

आसीनश्च शयानश्च यः पश्यति नरः पितॄन्।
उन्माद्यति स तु क्षिप्रं स ज्ञेयस्तु पितृग्रहः ॥ ४८ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

जो मनुष्य बैठे-बैठे या सोते समय पितरोंको देखता और शीघ्र पागल हो जाता है, उस बाधा देनेवाले ग्रहको ‘पितृग्रह’ जानना चाहिये॥४८॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अवमन्यति यः सिद्धान् क्रुद्धाश्चापि शपन्ति यम्।
उन्माद्यति स तु क्षिप्रं ज्ञेयः सिद्धग्रहस्तु सः ॥ ४९ ॥

मूलम्

अवमन्यति यः सिद्धान् क्रुद्धाश्चापि शपन्ति यम्।
उन्माद्यति स तु क्षिप्रं ज्ञेयः सिद्धग्रहस्तु सः ॥ ४९ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

जो सिद्ध पुरुषोंका अनादर करता है और क्रोधमें आकर वे सिद्ध पुरुष जिसे शाप दे देते हैं, जिसके कारण वह तुरंत पागल हो जाता है, उसे ‘सिद्धग्रह’ की बाधा प्राप्त हुई है, ऐसा समझना चाहिये॥४९॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

उपाघ्राति च यो गन्धान् रसांश्चापि पृथग्विधान्।
उन्माद्यति स तु क्षिप्रं स ज्ञेयो राक्षसो ग्रहः॥५०॥

मूलम्

उपाघ्राति च यो गन्धान् रसांश्चापि पृथग्विधान्।
उन्माद्यति स तु क्षिप्रं स ज्ञेयो राक्षसो ग्रहः॥५०॥

अनुवाद (हिन्दी)

जो विभिन्न सुगन्धोंको सूँघता तथा रसोंका आस्वादन करता है एवं तत्काल ही उन्मत्त हो उठता है, उसपर प्रभाव डालनेवाले ग्रहको ‘राक्षसग्रह’ जानना चाहिये॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

गन्धर्वाश्चापि यं दिव्याः संविशन्ति नरं भुवि।
उन्माद्यति स तु क्षिप्रं ग्रहो गान्धर्व एव सः॥५१॥

मूलम्

गन्धर्वाश्चापि यं दिव्याः संविशन्ति नरं भुवि।
उन्माद्यति स तु क्षिप्रं ग्रहो गान्धर्व एव सः॥५१॥

अनुवाद (हिन्दी)

भूतलपर जिस मनुष्यमें दिव्य गन्धर्वोंका आवेश होता है, वह भी शीघ्र ही उन्मादग्रस्त हो जाता है। इसे ‘गान्धर्वग्रह’ की ही बाधा समझनी चाहिये॥५१॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अधिरोहन्ति यं नित्यं पिशाचाः पुरुषं प्रति।
उन्माद्यति स तु क्षिप्रं ग्रहः पैशाच एव सः॥५२॥

मूलम्

अधिरोहन्ति यं नित्यं पिशाचाः पुरुषं प्रति।
उन्माद्यति स तु क्षिप्रं ग्रहः पैशाच एव सः॥५२॥

अनुवाद (हिन्दी)

जिस पुरुषपर सदा पिशाच चढ़े रहते हैं, वह भी शीघ्र पागल हो जाता है। अतः वह ‘पिशाचग्रह’ की ही बाधा है॥५२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

आविशन्ति च यं यक्षाः पुरुषं कालपर्यये।
उन्माद्यति स तु क्षिप्रं ज्ञेयो यक्षग्रहस्तु सः ॥ ५३ ॥

मूलम्

आविशन्ति च यं यक्षाः पुरुषं कालपर्यये।
उन्माद्यति स तु क्षिप्रं ज्ञेयो यक्षग्रहस्तु सः ॥ ५३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

कालक्रमसे जिस पुरुषमें यक्षोंका आवेश होता है, उसे भी पागल होते देर नहीं लगती। इसे ‘यक्षग्रह’ की बाधा जाननी चाहिये॥५३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

यस्य दोषैः प्रकुपितं चित्तं मुह्यति देहिनः।
उन्माद्यति स तु क्षिप्रं साधनं तस्य शास्त्रतः ॥ ५४ ॥

मूलम्

यस्य दोषैः प्रकुपितं चित्तं मुह्यति देहिनः।
उन्माद्यति स तु क्षिप्रं साधनं तस्य शास्त्रतः ॥ ५४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

जिस देहधारी मनुष्यका चित्त वात, पित्त और कफ नामक दोषोंके कुपित होनेसे अपनी संज्ञा खो बैठता है, वह शीघ्र ही विक्षिप्त हो जाता है। उसकी वैद्यक शास्त्रके अनुसार चिकित्सा करानी चाहिये॥५४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

वैक्लव्याच्च भयाच्चैव घोराणां चापि दर्शनात्।
उन्माद्यति स तु क्षिप्रं सान्त्वं तस्य तु साधनम्॥५५॥

मूलम्

वैक्लव्याच्च भयाच्चैव घोराणां चापि दर्शनात्।
उन्माद्यति स तु क्षिप्रं सान्त्वं तस्य तु साधनम्॥५५॥

अनुवाद (हिन्दी)

जो घबराहट, भय तथा घोर वस्तुओंके दर्शनसे ही तत्काल पागल हो जाता है, उनके अच्छे होनेका उपाय केवल उसे सान्त्वना देना है॥५५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

कश्चित् क्रीडितुकामो वै भोक्तुकामस्तथापरः।
अभिकामस्तथैवान्य इत्येष त्रिविधो ग्रहः ॥ ५६ ॥

मूलम्

कश्चित् क्रीडितुकामो वै भोक्तुकामस्तथापरः।
अभिकामस्तथैवान्य इत्येष त्रिविधो ग्रहः ॥ ५६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

कोई ग्रह क्रीडा-विनोदकी, कोई भोजनकी और कोई कामोपभोगकी इच्छा रखता है, इस प्रकार ग्रहोंकी प्रकृति तीन प्रकारकी है॥५६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

यावत् सप्ततिवर्षाणि भवन्त्येते ग्रहा नृणाम्।
अतः परं देहिनां तु ग्रहतुल्यो भवेज्ज्वरः ॥ ५७ ॥

मूलम्

यावत् सप्ततिवर्षाणि भवन्त्येते ग्रहा नृणाम्।
अतः परं देहिनां तु ग्रहतुल्यो भवेज्ज्वरः ॥ ५७ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

जबतक सत्तर वर्षकी अवस्था पूरी होती है, तबतक ये ग्रह मनुष्योंको सताते हैं। उसके बाद तो सभी देहधारियोंको ज्वर आदि रोग ही ग्रहोंके समान सताने लगते हैं॥५७॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अप्रकीर्णेन्द्रियं दान्तं शुचिं नित्यमतन्द्रितम्।
आस्तिकं श्रद्दधानं च वर्जयन्ति सदा ग्रहाः ॥ ५८ ॥

मूलम्

अप्रकीर्णेन्द्रियं दान्तं शुचिं नित्यमतन्द्रितम्।
आस्तिकं श्रद्दधानं च वर्जयन्ति सदा ग्रहाः ॥ ५८ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

जिसने अपनी इन्द्रियोंको सब ओरसे समेट लिया है, जो जितेन्द्रिय, पवित्र, नित्य आलस्यरहित, आस्तिक तथा श्रद्धालु है, उस पुरुषको ग्रह कभी नहीं छेड़ते हैं—उसे दूरसे ही त्याग देते हैं॥५८॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

इत्येष ते ग्रहोद्देशो मानुषाणां प्रकीर्तितः।
न स्पृशन्ति ग्रहा भक्तान् नरान् देवं महेश्वरम् ॥ ५९ ॥

मूलम्

इत्येष ते ग्रहोद्देशो मानुषाणां प्रकीर्तितः।
न स्पृशन्ति ग्रहा भक्तान् नरान् देवं महेश्वरम् ॥ ५९ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

राजन्! इस प्रकार मैंने मनुष्योंको जो ग्रहोंकी बाधा प्राप्त होती है, उसका संक्षेपसे वर्णन किया है। जो भगवान् महेश्वरके भक्त हैं, उन मनुष्योंको भी ये ग्रह नहीं छूते हैं॥५९॥

मूलम् (समाप्तिः)

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि आङ्गिरसे मनुष्यग्रहकथने त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३० ॥

मूलम् (वचनम्)

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें आंगिरसोपाख्यानके प्रसंगमें मनुष्योंको कष्ट देनेवाले ग्रहोंके वर्णनसे सम्बन्ध रखनेवाला दो सौ तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥२३०॥


  1. मनुष्योंको कष्ट देनेवाले ये तामस स्कन्दग्रह भगवान् रुद्रके भूत-प्रेतादि गणोंकी भाँति कुमार स्कन्दके शरीरसे उत्पन्न तमोमय कुमारके साथी माने जाते हैं। इन ग्रहोंसे रक्षा पानेके लिये भगवान् महेश्वरकी भक्ति करनी चाहिये। भय दिखाकर भी भगवान्‌की भक्ति करानेमें हेतुभूत होनेके कारण इन ग्रहोंका वर्णन यहाँ किया गया है। भगवान्‌के भक्तोंको ये ग्रह छू भी नहीं सकते। तमोगुणी प्रजापर ही सब तामस ग्रहोंका बल काम करता है। और वही इनकी पूजा-अर्चना किया करते हैं। ↩︎