भागसूचना
सप्तविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
सूचना (हिन्दी)
पराजित होकर शरणमें आये हुए इन्द्रसहित देवताओंको स्कन्दका अभयदान
मूलम् (वचनम्)
मार्कण्डेय उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
ग्रहाः सोपग्रहाश्चैव ऋषयो मातरस्तथा।
हुताशनमुखाश्चैव दृप्ताः पारिषदां गणाः ॥ १ ॥
एते चान्ये च बहवो घोरास्त्रिदिववासिनः।
परिवार्य महासेनं स्थिता मातृगणैः सह ॥ २ ॥
मूलम्
ग्रहाः सोपग्रहाश्चैव ऋषयो मातरस्तथा।
हुताशनमुखाश्चैव दृप्ताः पारिषदां गणाः ॥ १ ॥
एते चान्ये च बहवो घोरास्त्रिदिववासिनः।
परिवार्य महासेनं स्थिता मातृगणैः सह ॥ २ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
मार्कण्डेयजी कहते हैं— राजन्! ग्रह, उपग्रह, ऋषि, मातृकागण और मुखसे आग उगलनेवाले दर्पयुक्त पार्षदगण—ये तथा दूसरे बहुत-से भयंकर स्वर्गवासी प्राणी मातृकागणोंके साथ रहकर महासेनको सब ओरसे घेरे हुए उनकी रक्षाके लिये खड़े थे॥१-२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
संदिग्धं विजयं दृष्ट्वा विजयेप्सुः सुरेश्वरः।
आरुह्यैरावतस्कन्धं प्रययौ दैवतैः सह ॥ ३ ॥
मूलम्
संदिग्धं विजयं दृष्ट्वा विजयेप्सुः सुरेश्वरः।
आरुह्यैरावतस्कन्धं प्रययौ दैवतैः सह ॥ ३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
देवेश्वर इन्द्रको अपनी विजयके विषयमें संदेह ही दिखायी देता था, तो भी वे विजयकी अभिलाषासे ऐरावत हाथीपर आरुढ़ हो देवताओंके साथ आगे बढ़े॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
आदाय वज्रं बलवान् सर्वैर्देवगणैर्वृतः।
विजिघांसुर्महासेनमिन्द्रस्तूर्णतरं ययौ ॥ ४ ॥
मूलम्
आदाय वज्रं बलवान् सर्वैर्देवगणैर्वृतः।
विजिघांसुर्महासेनमिन्द्रस्तूर्णतरं ययौ ॥ ४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
सब देवताओंसे घिरे हुए बलवान् इन्द्र महासेनको मार डालनेकी इच्छासे हाथमें वज्र ले बड़े वेगसे अग्रसर हो रहे थे॥४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
उग्रं तं च महानादं देवानीकं महाप्रभम्।
विचित्रध्वजसंनाहं नानावाहनकार्मुकम् ॥ ५ ॥
प्रवराम्बरसंवीतं श्रिया जुष्टमलङ्कृतम् ।
विजिघांसुं तमायान्तं कुमारः शक्रमन्वयात् ॥ ६ ॥
मूलम्
उग्रं तं च महानादं देवानीकं महाप्रभम्।
विचित्रध्वजसंनाहं नानावाहनकार्मुकम् ॥ ५ ॥
प्रवराम्बरसंवीतं श्रिया जुष्टमलङ्कृतम् ।
विजिघांसुं तमायान्तं कुमारः शक्रमन्वयात् ॥ ६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
देवताओंकी सेना बड़ी भयानक थी। उसमें जोर-जोरसे विकट गर्जना हो रही थी। उसकी प्रभाका विस्तार महान् था। उसके ध्वज संनाह (कवच) विचित्र थे। सभी सैनिकोंके वाहन और धुनष नाना प्रकारके दिखायी देते थे। सबने श्रेष्ठ वस्त्रोंसे अपने शरीरको आच्छादित कर रखा था। सभी लोग श्रीसम्पन्न तथा विविध आभूषणोंसे विभूषित दिखायी देते थे। इन्द्रको अपने वधके लिये आते देख कुमारने भी उनपर धावा बोल दिया॥५-६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
विनदन् पार्थ देवेशो द्रुतं याति महाबलः।
संहर्षयन् देवसेनां जिघांसुः पावकात्मजम् ॥ ७ ॥
मूलम्
विनदन् पार्थ देवेशो द्रुतं याति महाबलः।
संहर्षयन् देवसेनां जिघांसुः पावकात्मजम् ॥ ७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
युधिष्ठिर! महाबली देवराज इन्द्र अग्निनन्दन स्कन्दको मार डालनेकी इच्छासे देवताओंकी सेनाका हर्ष बढ़ाते हुए तीव्र गतिसे विकट गर्जनाके साथ आगे बढ़ रहे थे॥७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
सम्पूज्यमानस्त्रिदशैस्तथैव परमर्षिभिः ।
समीपमथ सम्प्राप्तः कार्तिकेयस्य वासवः ॥ ८ ॥
सिंहनादं ततश्चक्रे देवेशः सहितः सुरैः।
गुहोऽपि शब्दं तं श्रुत्वा व्यनदत् सागरो यथा ॥ ९ ॥
मूलम्
सम्पूज्यमानस्त्रिदशैस्तथैव परमर्षिभिः ।
समीपमथ सम्प्राप्तः कार्तिकेयस्य वासवः ॥ ८ ॥
सिंहनादं ततश्चक्रे देवेशः सहितः सुरैः।
गुहोऽपि शब्दं तं श्रुत्वा व्यनदत् सागरो यथा ॥ ९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
उस समय सम्पूर्ण देवता और महर्षि उनका बड़ा सम्मान कर रहे थे। जब देवराज इन्द्र कुमार कार्तिकेयके निकट पहुँचे, तब उन्होंने देवताओंके साथ सिंहके समान गर्जना की। उनका वह सिंहनाद सुनकर कुमार कार्तिकेय भी समुद्रके समान भयंकर गर्जना करने लगे॥८-९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तस्य शब्देन महता समुद्धूतोदधिप्रभम्।
बभ्राम तत्र तत्रैव देवसैन्यमचेतनम् ॥ १० ॥
मूलम्
तस्य शब्देन महता समुद्धूतोदधिप्रभम्।
बभ्राम तत्र तत्रैव देवसैन्यमचेतनम् ॥ १० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
देवताओंकी सेना उमड़ते हुए समुद्रके समान जान पड़ती थी। परंतु स्कन्दकी भारी गर्जनासे अचेत-सी होकर वहीं चक्कर काटने लगी॥१०॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
जिघांसूनुपसम्प्राप्तान् देवान् दृष्ट्वा स पावकिः।
विससर्ज मुखात् क्रुद्धः प्रवृद्धाः पावकार्चिषः ॥ ११ ॥
मूलम्
जिघांसूनुपसम्प्राप्तान् देवान् दृष्ट्वा स पावकिः।
विससर्ज मुखात् क्रुद्धः प्रवृद्धाः पावकार्चिषः ॥ ११ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
अग्निकुमार स्कन्द यह देखकर कि देवतालोग मेरा वध करनेकी इच्छासे यहाँ एकत्र हुए हैं, कुपित हो उठे और अपने मुँहसे आगकी बढ़ती हुई लपटें छोड़ने लगे॥११॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अदहद् देवसैन्यानि वेपमानानि भूतले।
ते प्रदीप्तशिरोदेहाः प्रदीप्तायुधवाहनाः ॥ १२ ॥
मूलम्
अदहद् देवसैन्यानि वेपमानानि भूतले।
ते प्रदीप्तशिरोदेहाः प्रदीप्तायुधवाहनाः ॥ १२ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
इस प्रकार उन्होंने देवताओंकी सेनाको जलाना प्रारम्भ किया। सारे सैनिक पृथ्वीपर गिरकर छटपटाने लगे। किसीका शरीर जल गया, किसीका सिर, किसीके आयुध जल गये और किसीके वाहन॥१२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
प्रच्युताः सहसा भान्ति व्यस्तास्तारागणा इव।
दह्यमानाः प्रपन्नास्ते शरणं पावकात्मजम् ॥ १३ ॥
देवा वज्रधरं त्यक्त्वा ततः शान्तिमुपागताः।
त्यक्तो देवैस्ततः स्कन्दे वज्रं शक्रो न्यपातयत् ॥ १४ ॥
मूलम्
प्रच्युताः सहसा भान्ति व्यस्तास्तारागणा इव।
दह्यमानाः प्रपन्नास्ते शरणं पावकात्मजम् ॥ १३ ॥
देवा वज्रधरं त्यक्त्वा ततः शान्तिमुपागताः।
त्यक्तो देवैस्ततः स्कन्दे वज्रं शक्रो न्यपातयत् ॥ १४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
वे सब-के-सब सहसा तितर-बितर हो आकाशमें बिखरे हुए तारोंके समान जान पड़ते थे। इस तरह जलते हुए देवता वज्रधारी इन्द्रका साथ छोड़कर अग्निनन्दन स्कन्दकी ही शरणमें आये, तब उन्हें शान्ति मिली। देवताओंके त्याग देनेपर इन्द्रने स्कन्दपर अपने वज्रका प्रहार किया॥१३-१४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तद्विसृष्टं जघानाशु पार्श्वं स्कन्दस्य दक्षिणम्।
बिभेद च महाराज पार्श्वं तस्य महात्मनः ॥ १५ ॥
मूलम्
तद्विसृष्टं जघानाशु पार्श्वं स्कन्दस्य दक्षिणम्।
बिभेद च महाराज पार्श्वं तस्य महात्मनः ॥ १५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
महाराज! इन्द्रके छोड़े हुए उस वज्रने शीघ्र ही कुमार कार्तिकेयकी दायीं पसलीपर गहरी चोट पहुँचायी और उन महामना स्कन्दके पार्श्वभागको क्षत-विक्षत कर दिया॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
वज्रप्रहारात् स्कन्दस्य संजातः पुरुषोऽपरः।
युवा काञ्चनसंनाहः शक्तिधृग् दिव्यकुण्डलः ॥ १६ ॥
मूलम्
वज्रप्रहारात् स्कन्दस्य संजातः पुरुषोऽपरः।
युवा काञ्चनसंनाहः शक्तिधृग् दिव्यकुण्डलः ॥ १६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
वज्रका प्रहार होनेपर स्कन्दके (उस दक्षिण पार्श्वसे) एक दूसरा वीर पुरुष प्रकट हुआ, जिसकी युवावस्था थी। उसने सुवर्णमय कवच धारण कर रखा था। उसके एक हाथमें शक्ति चमक रही थी और कानोंमें दिव्य कुण्डल झलमला रहे थे॥१६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
यद्वज्रविशनाज्जातो विशाखस्तेन सोऽभवत् ।
संजातमपरं दृष्ट्वा कालानलसमद्युतिम् ॥ १७ ॥
भयादिन्द्रस्तु तं स्कन्दं प्राञ्जलिः शरणं गतः।
मूलम्
यद्वज्रविशनाज्जातो विशाखस्तेन सोऽभवत् ।
संजातमपरं दृष्ट्वा कालानलसमद्युतिम् ॥ १७ ॥
भयादिन्द्रस्तु तं स्कन्दं प्राञ्जलिः शरणं गतः।
अनुवाद (हिन्दी)
वज्रके प्रविष्ट होनेसे उसकी उत्पत्ति हुई थी, इसलिये वह विशाख नामसे प्रसिद्ध हुआ। प्रलयकालकी अग्निके समान अत्यन्त तेजस्वी उस द्वितीय वीरको प्रकट हुआ देख इन्द्र भयसे थर्रा उठे और हाथ जोड़कर उन स्कन्ददेवकी शरणमें आये॥१७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तस्याभयं ददौ स्कन्दः सह सैन्यस्य सत्तमः।
ततः प्रहृष्टास्त्रिदशा वादित्राण्यभ्यवादयन् ॥ १८ ॥
मूलम्
तस्याभयं ददौ स्कन्दः सह सैन्यस्य सत्तमः।
ततः प्रहृष्टास्त्रिदशा वादित्राण्यभ्यवादयन् ॥ १८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
तब सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ कुमार स्कन्दने सेनासहित इन्द्रको अभयदान दिया। इससे प्रसन्न होकर सब देवता (हर्षसूचक) बाजे बजाने लगे॥१८॥
मूलम् (समाप्तिः)
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि आङ्गिरसे इन्द्रस्कन्दसमागमे सप्तविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२७ ॥
मूलम् (वचनम्)
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें आंगिरसोपाख्यानके प्रसंगमें इन्द्र-स्कन्दसमागमविषयक दो सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥२२७॥