२२६ स्कन्दोत्पत्तौ

भागसूचना

षड्‌विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

सूचना (हिन्दी)

विश्वामित्रका स्कन्दके जातकर्मादि तेरह संस्कार करना और विश्वामित्रके समझानेपर भी ऋषियोंका अपनी पत्नियोंको स्वीकार न करना तथा अग्निदेव आदिके द्वारा बालक स्कन्दकी रक्षा करना

मूलम् (वचनम्)

मार्कण्डेय उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

तस्मिञ्जाते महासत्त्वे महासेने महाबले।
समुत्तस्थुर्महोत्पाता घोररूपाः पृथग्विधाः ॥ १ ॥

मूलम्

तस्मिञ्जाते महासत्त्वे महासेने महाबले।
समुत्तस्थुर्महोत्पाता घोररूपाः पृथग्विधाः ॥ १ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

मार्कण्डेयजी कहते हैं— राजन्! उन महान् धैर्यशाली और महाबली महासेनके जन्म लेनेपर भाँति-भाँतिके बड़े भयंकर उत्पात प्रकट होने लगे॥१॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

स्त्रीपुंसोर्विपरीतं च तथा द्वन्द्वानि यानि च।
ग्रहा दीप्ता दिशः खं च ररास च मही भृशम्॥२॥

मूलम्

स्त्रीपुंसोर्विपरीतं च तथा द्वन्द्वानि यानि च।
ग्रहा दीप्ता दिशः खं च ररास च मही भृशम्॥२॥

अनुवाद (हिन्दी)

स्त्री-पुरुषोंका स्वभाव विपरीत हो गया। सर्दी आदि इन्होंनें भी (अद्भुत) परिवर्तन दिखायी देने लगा। ग्रह, दिशाएँ और आकाश ये सब जलने लगे और पृथ्वी जोर-जोरसे गर्जना-सी करने लगी॥२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ऋषयश्च महाघोरान् दृष्ट्वोत्पातान् समन्ततः।
अकुर्वञ्छान्तिमुद्विग्ना लोकानां लोकभावनाः ॥ ३ ॥

मूलम्

ऋषयश्च महाघोरान् दृष्ट्वोत्पातान् समन्ततः।
अकुर्वञ्छान्तिमुद्विग्ना लोकानां लोकभावनाः ॥ ३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

लोकहितकी भावना रखनेवाले महर्षि चारों ओर अत्यन्त भयंकर उत्पात देखकर उद्विग्न हो उठे और जगत्‌में शान्ति बनाये रखनेके लिये शास्त्रीय कर्मोंका अनुष्ठान करने लगे॥३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

निवसन्ति वने ये तु तस्मिंश्चैत्ररथे जनाः।
तेऽब्रुवन्नेष नोऽनर्थः पावकेनाहितो महान् ॥ ४ ॥
संगम्य षड्भिः पत्नीभिः सप्तर्षीणामिति स्म ह।

मूलम्

निवसन्ति वने ये तु तस्मिंश्चैत्ररथे जनाः।
तेऽब्रुवन्नेष नोऽनर्थः पावकेनाहितो महान् ॥ ४ ॥
संगम्य षड्भिः पत्नीभिः सप्तर्षीणामिति स्म ह।

अनुवाद (हिन्दी)

उस चैत्ररथ नामक वनमें जो लोग निवास करते थे, वे कहने लगे, ‘अग्निने सप्तर्षियोंकी छः पत्नियोंके साथ समागम करके हमलोगोंपर यह बहुत बड़ा अनर्थ लाद दिया है’॥४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अपरे गरुडीमाहुस्त्वयानर्थोऽयमाहृतः ॥ ५ ॥
यैर्दृष्टा सा तदा देवी तस्या रूपेण गच्छती।
न तु तत् स्वाहया कर्म कृतं जानाति वै जनः॥६॥

मूलम्

अपरे गरुडीमाहुस्त्वयानर्थोऽयमाहृतः ॥ ५ ॥
यैर्दृष्टा सा तदा देवी तस्या रूपेण गच्छती।
न तु तत् स्वाहया कर्म कृतं जानाति वै जनः॥६॥

अनुवाद (हिन्दी)

दूसरे लोगोंने उस गरुडी पक्षिणीसे कहा—‘तूने ही यह अनर्थ उपस्थित किया है’। यह उन लोगोंका विचार था, जिन्होंने स्वाहादेवीको गरुडीके रूपमें जाते देखा था। लोग यह नहीं जानते थे कि यह सारा कार्य स्वाहाने किया है॥५-६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

सुपर्णी तु वचः श्रुत्वा ममायं तनयस्त्विति।
उपगम्य शनैः स्कन्दमाहाहं जननी तव ॥ ७ ॥

मूलम्

सुपर्णी तु वचः श्रुत्वा ममायं तनयस्त्विति।
उपगम्य शनैः स्कन्दमाहाहं जननी तव ॥ ७ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

गरुडीने लोगोंकी बातें सुनकर कहा—‘यह मेरा पुत्र है।’ फिर उसने धीरेसे स्कन्दके पास जाकर कहा—‘बेटा! मैं तुम्हें जन्म देनेवाली माता हूँ’॥७॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अथ सप्तर्षयः श्रुत्वा जातं पुत्रं महौजसम्।
तत्यजुः षट् तदा पत्नीर्विना देवीमरुन्धतीम् ॥ ८ ॥

मूलम्

अथ सप्तर्षयः श्रुत्वा जातं पुत्रं महौजसम्।
तत्यजुः षट् तदा पत्नीर्विना देवीमरुन्धतीम् ॥ ८ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

इधर सप्तर्षियोंने जब यह सुना कि हमारी छः पत्नियोंके रंगसे अग्निदेवके एक महातेजस्वी पुत्र उत्पन्न हुआ है, तब उन्होंने अरुन्धती देवीके सिवा अन्य छः पत्नियोंको त्याग दिया॥८॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

षड्भिरेव तदा जातमाहुस्तद्वनवासिनः ।
सप्तर्षीनाह च स्वाहा मम पुत्रोऽयमित्युत ॥ ९ ॥
अहं जाने नैतदेवमिति राजन् पुनः पुनः।

मूलम्

षड्भिरेव तदा जातमाहुस्तद्वनवासिनः ।
सप्तर्षीनाह च स्वाहा मम पुत्रोऽयमित्युत ॥ ९ ॥
अहं जाने नैतदेवमिति राजन् पुनः पुनः।

अनुवाद (हिन्दी)

क्योंकि उस वनके निवासियोंने उस समय छः पत्नियोंके गर्भसे ही उस बालककी उत्पत्ति बतायी थी। राजन्! यद्यपि स्वाहाने सप्तर्षियोंसे बार-बार कहा कि ‘यह मेरा पुत्र है। मैं इसके जन्मका रहस्य जानती हूँ; लोग जैसी बात उड़ा रहे हैं, वैसी नहीं है।’ (तो भी वे सहसा उसकी बातपर विश्वास न कर सके)॥९॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

विश्वामित्रस्तु कृत्वेष्टिं सप्तर्षीणां महामुनिः ॥ १० ॥
पावकं कामसंतप्तमदृष्टः पृष्ठतोऽन्वगात् ।
तत् तेन निखिलं सर्वमवबुद्धं यथातथम् ॥ ११ ॥

मूलम्

विश्वामित्रस्तु कृत्वेष्टिं सप्तर्षीणां महामुनिः ॥ १० ॥
पावकं कामसंतप्तमदृष्टः पृष्ठतोऽन्वगात् ।
तत् तेन निखिलं सर्वमवबुद्धं यथातथम् ॥ ११ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

महामुनि विश्वामित्र जब सप्तर्षियोंकी इष्टि पूर्ण कर चुके, तब वे भी कामपीड़ित अग्निके पीछे-पीछे गुप्तरूपसे चल दिये थे, उस समय कोई उन्हें देख नहीं पाता था। अतः उन्होंने यह सारा वृत्तान्त यथार्थरूपसे जान लिया॥१०-११॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

विश्वामित्रस्तु प्रथमं कुमारं शरणं गतः।
स्तवं दिव्यं सम्प्रचक्रे महासेनस्य चापि सः ॥ १२ ॥

मूलम्

विश्वामित्रस्तु प्रथमं कुमारं शरणं गतः।
स्तवं दिव्यं सम्प्रचक्रे महासेनस्य चापि सः ॥ १२ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

विश्वामित्रजी सबसे पहले कुमार कार्तिकेयकी शरणमें गये तथा उन्होंने महासेनकी दिव्य स्तोत्रोंद्वारा स्तुति भी की॥१२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

मङ्गलानि च सर्वाणि कौमाराणि त्रयोदश।
जातकर्मादिकास्तस्य क्रियाश्चक्रे महामुनिः ॥ १३ ॥

मूलम्

मङ्गलानि च सर्वाणि कौमाराणि त्रयोदश।
जातकर्मादिकास्तस्य क्रियाश्चक्रे महामुनिः ॥ १३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

उन महामुनिने कुमारके सारे मांगलिक कृत्य सम्पन्न किये। जातकर्म आदि तेरह क्रियाओंका भी अनुष्ठान किया॥१३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

षड्वक्त्रस्य तु माहात्म्यं कुक्कुटस्य तु साधनम्।
शक्त्या देव्याः साधनं च तथा पारिषदामपि ॥ १४ ॥
विश्वामित्रश्चकारैतत् कर्म लोकहिताय वै।
तस्मादृषिः कुमारस्य विश्वामित्रोऽभवत् प्रियः ॥ १५ ॥

मूलम्

षड्वक्त्रस्य तु माहात्म्यं कुक्कुटस्य तु साधनम्।
शक्त्या देव्याः साधनं च तथा पारिषदामपि ॥ १४ ॥
विश्वामित्रश्चकारैतत् कर्म लोकहिताय वै।
तस्मादृषिः कुमारस्य विश्वामित्रोऽभवत् प्रियः ॥ १५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

स्कन्दकी महिमा, उनके द्वारा कुक्कुट पक्षीका धारण, देवीके समान प्रभावशालिनी शक्तिका ग्रहण तथा पार्षदोंका वरण आदि कुमारके सभी कार्योंको विश्वामित्रने लोकहितके लिये आवश्यक सिद्ध किया। अतः विश्वामित्र मुनि कुमारके अधिक प्रिय हो गये॥१४-१५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अन्वजानाच्च स्वाहाया रूपान्यत्वं महामुनिः।
अब्रवीच्च मुनीन् सर्वान् नापराध्यन्ति वै स्त्रियः ॥ १६ ॥
श्रुत्वा तु तत्त्वतस्तस्मात्‌ ते पत्नीः सर्वतोऽत्यजन्।

मूलम्

अन्वजानाच्च स्वाहाया रूपान्यत्वं महामुनिः।
अब्रवीच्च मुनीन् सर्वान् नापराध्यन्ति वै स्त्रियः ॥ १६ ॥
श्रुत्वा तु तत्त्वतस्तस्मात्‌ ते पत्नीः सर्वतोऽत्यजन्।

अनुवाद (हिन्दी)

महामुनि विश्वामित्रने यह जान लिया था कि स्वाहाने अन्य ऋषिपत्नियोंके रूप धारण करके अग्निदेवसे सम्बन्ध स्थापित किया था; इसलिये उन्होंने सब ऋषियोंसे कहा—‘आपकी स्त्रियोंका कोई अपराध नहीं है’ उनके मुखसे यथार्थ बात जानकर भी ऋषियोंने अपनी पत्नियोंको सर्वथा त्याग ही दिया॥१६॥

मूलम् (वचनम्)

मार्कण्डेय उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

स्कन्दं श्रुत्वा तदा देवा वासवं सहिताऽब्रुवन् ॥ १७ ॥
अविषह्यबलं स्कन्दं जहि शक्राशु माचिरम्।
यदि वा न निहंस्येनं देवेन्द्रोऽयं भविष्यति ॥ १८ ॥
त्रैलोक्यं संनिगृह्यास्मांस्त्वां च शक्र महाबल।

मूलम्

स्कन्दं श्रुत्वा तदा देवा वासवं सहिताऽब्रुवन् ॥ १७ ॥
अविषह्यबलं स्कन्दं जहि शक्राशु माचिरम्।
यदि वा न निहंस्येनं देवेन्द्रोऽयं भविष्यति ॥ १८ ॥
त्रैलोक्यं संनिगृह्यास्मांस्त्वां च शक्र महाबल।

अनुवाद (हिन्दी)

मार्कण्डेयजी कहते हैं— राजन्! उस समय स्कन्दके जन्म और बल-पराक्रमका समाचार सुनकर सब देवताओंने एकत्र हो इन्द्रसे कहा—‘देवेश्वर! स्कन्दका बल असह्य है। शीघ्र उन्हें मार डालिये; विलम्ब न कीजिये। महाबली इन्द्र! यदि आप इन्हें अभी नहीं मारते हैं तो ये त्रिलोकीको, हम सबको तथा आपको भी अपने वशमें करके ‘देवेन्द्र’ बन बैठेंगे’॥१७-१८॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

स तानुवाच व्यथितो बालोऽयं सुमहाबलः ॥ १९ ॥
स्रष्टारमपि लोकानां युधि विक्रम्य नाशयेत्।
न बालमुत्सहे हन्तुमिति शक्रः प्रभाषते ॥ २० ॥

मूलम्

स तानुवाच व्यथितो बालोऽयं सुमहाबलः ॥ १९ ॥
स्रष्टारमपि लोकानां युधि विक्रम्य नाशयेत्।
न बालमुत्सहे हन्तुमिति शक्रः प्रभाषते ॥ २० ॥

अनुवाद (हिन्दी)

तब इन्द्रने व्यथित होकर उन देवताओंसे कहा—‘देवताओ! यह बालक बड़ा बलवान् है। यह लोकस्रष्टा ब्रह्माको भी युद्धमें पराक्रम करके मार सकता है। अतः मुझमें इस बालकको मारनेका साहस नहीं है।’ इन्द्र बार-बार यही बात दुहराने लगे॥१९-२०॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तेऽब्रुवन् नास्ति ते वीर्यं यत एवं प्रभाषसे।
सर्वास्त्वद्याभिगच्छन्तु स्कन्दं लोकस्य मातरः ॥ २१ ॥
कामवीर्या घ्नन्तु चैनं तथेत्युक्त्वा च ता ययुः।

मूलम्

तेऽब्रुवन् नास्ति ते वीर्यं यत एवं प्रभाषसे।
सर्वास्त्वद्याभिगच्छन्तु स्कन्दं लोकस्य मातरः ॥ २१ ॥
कामवीर्या घ्नन्तु चैनं तथेत्युक्त्वा च ता ययुः।

अनुवाद (हिन्दी)

यह सुनकर देवता बोले—‘आपमें अब बल और पराक्रम नहीं रह गया है, इसीलिये ऐसी बातें कहते हैं। हमारी राय है कि सम्पूर्ण लोकमातृकाएँ स्कन्दके पास जायँ। ये इच्छानुसार पराक्रम प्रकट कर सकती हैं; अतः स्कन्दको मार डालें।’ तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर वे मातृकाएँ वहाँसे चल दीं॥२१॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तमप्रतिबलं दृष्ट्वा विषण्णवदनास्तु ताः ॥ २२ ॥
अशक्योऽयं विचिन्त्यैवं तमेव शरणं ययुः।
ऊचुश्चैनं त्वमस्माकं पुत्रो भव महाबल ॥ २३ ॥

मूलम्

तमप्रतिबलं दृष्ट्वा विषण्णवदनास्तु ताः ॥ २२ ॥
अशक्योऽयं विचिन्त्यैवं तमेव शरणं ययुः।
ऊचुश्चैनं त्वमस्माकं पुत्रो भव महाबल ॥ २३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

परंतु स्कन्दका अप्रतिम बल देखकर उनके मुखपर उदासी छा गयी। वे सोचने लगीं—‘इस वीरको पराजित करना असम्भव है।’ ऐसा निश्चय होनेपर वे उन्हींकी शरणमें गयीं और बोलीं—‘महाबली कुमार! तुम हमारे पुत्र हो जाओ, हमें माता मान लो॥२२-२३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अभिनन्दस्व नः सर्वाः प्रस्नुताः स्नेहविक्लवाः।
तासां तद् वचनं श्रुत्वा पातुकामः स्तानान् प्रभुः ॥ २४ ॥

मूलम्

अभिनन्दस्व नः सर्वाः प्रस्नुताः स्नेहविक्लवाः।
तासां तद् वचनं श्रुत्वा पातुकामः स्तानान् प्रभुः ॥ २४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘देखो, हम पुत्र-स्नेहसे विकल हो रही हैं, हमारे स्तनोंसे दूध झर रहा है इसे पीकर हम सबको सम्मानित और आनन्दित करो।’ मातृकाओंकी यह बात सुनकर समर्थ स्कन्दके मनमें उनके स्तनपानकी इच्छा जाग्रत हो गयी॥२४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ताः सम्पूज्य महासेनः कामांश्चासां प्रदाय सः।
अपश्यदग्निमायान्तं पितरं बलिनां बली ॥ २५ ॥

मूलम्

ताः सम्पूज्य महासेनः कामांश्चासां प्रदाय सः।
अपश्यदग्निमायान्तं पितरं बलिनां बली ॥ २५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

फिर महासेनने उन सबका समादर करके उनकी मनोवाञ्छा पूर्ण की। तदनन्तर बलवानोंमें बलिष्ठ वीर स्कन्दने अपने पिता अग्निदेवको आते देखा॥२५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

स तु सम्पूजितस्तेन सह मातृगणेन ह।
परिवार्य महासेनं रक्षमाणः स्थितः शिवः ॥ २६ ॥

मूलम्

स तु सम्पूजितस्तेन सह मातृगणेन ह।
परिवार्य महासेनं रक्षमाणः स्थितः शिवः ॥ २६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

कुमार महासेनके द्वारा पूजित हो मंगलकारी अग्निदेव मातृकागणोंके साथ उन्हें घेरकर खड़े हो गये और उनकी रक्षा करने लगे॥२६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

सर्वासां या तु मातॄणां नारी क्रोधसमुद्भवा।
धात्री स्वपुत्रवत् स्कन्दं शूलहस्ताभ्यरक्षत ॥ २७ ॥

मूलम्

सर्वासां या तु मातॄणां नारी क्रोधसमुद्भवा।
धात्री स्वपुत्रवत् स्कन्दं शूलहस्ताभ्यरक्षत ॥ २७ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

उस समय सम्पूर्ण मातृकाओंके क्रोधसे जो एक नारीमूर्ति प्रकट हुई थी, वह हाथमें त्रिशूल ले धायकी भाँति अपने पुत्रके समान प्रिय स्कन्दकी सब ओरसे रक्षा करने लगी॥२७॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

लोहितस्योदधेः कन्या क्रूरा लोहितभोजना।
परिष्वज्य महासेनं पुत्रवत् पर्यरक्षत ॥ २८ ॥

मूलम्

लोहितस्योदधेः कन्या क्रूरा लोहितभोजना।
परिष्वज्य महासेनं पुत्रवत् पर्यरक्षत ॥ २८ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

लाल सागरकी एक क्रूर स्वभाववाली कन्या थी, जिसका रक्त ही भोजन था। वह महासेनको पुत्रकी भाँति हृदयसे लगाकर सर्वतोभावेन उनकी रक्षा करने लगी॥२८॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अग्निर्भूत्वा नैगमेयश्छागवक्त्रो बहुप्रजः ।
रमयामास शैलस्थं बालं क्रीडनकैरिव ॥ २९ ॥

मूलम्

अग्निर्भूत्वा नैगमेयश्छागवक्त्रो बहुप्रजः ।
रमयामास शैलस्थं बालं क्रीडनकैरिव ॥ २९ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

वेदप्रतिपादित अग्नि बकरेका-सा मुख बनाकर अनेक संतानोंके साथ उपस्थित हो पर्वतशिखर पर निवास करनेवाले बालक स्कन्दका इस प्रकार मन बहलाने लगे, मानो उन्हें खिलौनोंसे खेला रहे हों॥२९॥

मूलम् (समाप्तिः)

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि आङ्गिरसे स्कन्दोत्पत्तौ षड्विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२६ ॥

मूलम् (वचनम्)

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें आंङ्गिसोपाख्यानके प्रसंगमें स्कन्दकी उत्पत्तिविषयक दो सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥२२६॥