भागसूचना
चतुर्विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
सूचना (हिन्दी)
इन्द्रका देवसेनाके साथ ब्रह्माजीके पास तथा ब्रह्मर्षियोंके आश्रमपर जाना, अग्निका मोह और वनगमन
मूलम् (वचनम्)
कन्योवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
अहं प्रजापतेः कन्या देवसेनेति विश्रुता।
भगिनी दैत्यसेना मे सा पूर्वं केशिना हृता ॥ १ ॥
मूलम्
अहं प्रजापतेः कन्या देवसेनेति विश्रुता।
भगिनी दैत्यसेना मे सा पूर्वं केशिना हृता ॥ १ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
कन्या बोली— देवेन्द्र! मैं प्रजापतिकी पुत्री हूँ। मेरा नाम देवसेना है। मेरी बहिनका नाम दैत्यसेना है, जिसे इस केशीने पहले ही हर लिया था॥१॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
सदैवावां भगिन्यौ तु सखीभिः सह मानसम्।
आगच्छावेह रत्यर्थमनुज्ञाप्य प्रजापतिम् ॥ २ ॥
मूलम्
सदैवावां भगिन्यौ तु सखीभिः सह मानसम्।
आगच्छावेह रत्यर्थमनुज्ञाप्य प्रजापतिम् ॥ २ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
हम दोनों बहिनें अपनी सखियोंके साथ प्रजापतिकी आज्ञा लेकर सदा क्रीडाविहारके लिये इस मानस पर्वतपर आया करती थीं॥२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
नित्यं चावां प्रार्थयते हर्तुं केशी महासुरः।
इच्छत्येनं दैत्यसेना न चाहं पाकशासन ॥ ३ ॥
मूलम्
नित्यं चावां प्रार्थयते हर्तुं केशी महासुरः।
इच्छत्येनं दैत्यसेना न चाहं पाकशासन ॥ ३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
पाकशासन! महान् असुर केशी प्रतिदिन यहाँ आकर हम दोनोंको हर ले जानेके लिये फुसलाया करता था। दैत्यसेना इसे चाहती थी, परंतु मेरा इसपर प्रेम नहीं था॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
सा हृतानेन भगवन् मुक्ताहं त्वद्बलेन तु।
त्वया देवेन्द्र निर्दिष्टं पतिमिच्छामि दुर्जयम् ॥ ४ ॥
मूलम्
सा हृतानेन भगवन् मुक्ताहं त्वद्बलेन तु।
त्वया देवेन्द्र निर्दिष्टं पतिमिच्छामि दुर्जयम् ॥ ४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
अतः दैत्यसेनाको तो यह हर ले गया, परंतु मैं आपके पराक्रमसे बच गयी। भगवन्! देवेन्द्र! अब मैं आपके आदेशके अनुसार किसी दुर्जय वीरको अपना पति बनाना चाहती हूँ॥४॥
मूलम् (वचनम्)
इन्द्र उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
मम मातृष्वसेयी त्वं माता दाक्षायणी मम।
आख्यातुं त्वहमिच्छामि स्वयमात्मबलं त्वया ॥ ५ ॥
मूलम्
मम मातृष्वसेयी त्वं माता दाक्षायणी मम।
आख्यातुं त्वहमिच्छामि स्वयमात्मबलं त्वया ॥ ५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
इन्द्र बोले— शुभे! तुम मेरी मौसेरी बहिन हो। मेरी माता भी दक्षकी ही पुत्री हैं। मेरी इच्छा है कि तुम स्वयं ही अपने बलका परिचय दो॥५॥
मूलम् (वचनम्)
कन्योवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
अबलाहं महाबाहो पतिस्तु बलवान् मम।
वरदानात् पितुर्भावी सुरासुरनमस्कृतः ॥ ६ ॥
मूलम्
अबलाहं महाबाहो पतिस्तु बलवान् मम।
वरदानात् पितुर्भावी सुरासुरनमस्कृतः ॥ ६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
कन्या बोली— महाबाहो! मैं तो अबला हूँ। पिताजीके वरदानसे मेरे भावी पति बलवान् तथा देवदानव-वन्दित होंगे॥६॥
मूलम् (वचनम्)
इन्द्र उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
कीदृशं तु बलं देवि पत्युस्तव भविष्यति।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं तव वाक्यमनिन्दिते ॥ ७ ॥
मूलम्
कीदृशं तु बलं देवि पत्युस्तव भविष्यति।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं तव वाक्यमनिन्दिते ॥ ७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
इन्द्रने पूछा— देवि! तुम्हारे पतिका बल कैसा होगा? अनिन्दिते! यह बात मैं तुम्हारे ही मुँहसे सुनना चाहता हूँ॥७॥
मूलम् (वचनम्)
कन्योवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
देवदानवयक्षाणां किन्नरोरगरक्षसाम् ।
जेता यो दुष्टदैत्यानां महावीर्यो महाबलः ॥ ८ ॥
यस्तु सर्वाणि भूतानि त्वया सह विजेष्यति।
स हि मे भविता भर्ता ब्रह्मण्यः कीर्तिवर्धनः ॥ ९ ॥
मूलम्
देवदानवयक्षाणां किन्नरोरगरक्षसाम् ।
जेता यो दुष्टदैत्यानां महावीर्यो महाबलः ॥ ८ ॥
यस्तु सर्वाणि भूतानि त्वया सह विजेष्यति।
स हि मे भविता भर्ता ब्रह्मण्यः कीर्तिवर्धनः ॥ ९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
कन्या बोली— देवराज! जो देवता, दानव, यक्ष, किन्नर, नाग, राक्षस तथा दुष्ट दैत्योंको जीतनेवाला हो; जिसका पराक्रम महान् और बल असाधारण हो तथा जो तुम्हारे साथ रहकर समस्त प्राणियोंपर विजय प्राप्त कर सके, वह ब्राह्मणहितैषी तथा अपने यशकी वृद्धि करनेवाला वीर पुरुष मेरा पति होगा॥८-९॥
मूलम् (वचनम्)
मार्कण्डेय उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
इन्द्रस्तस्या वचः श्रुत्वा दुःखितोऽचिन्तयद् भृशम्।
अस्या देव्याः पतिर्नास्ति यादृशं सम्प्रभाषते ॥ १० ॥
मूलम्
इन्द्रस्तस्या वचः श्रुत्वा दुःखितोऽचिन्तयद् भृशम्।
अस्या देव्याः पतिर्नास्ति यादृशं सम्प्रभाषते ॥ १० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
मार्कण्डेयजी कहते हैं— राजन्! देवसेनाकी बात सुनकर इन्द्र अत्यन्त दुःखी हो सोचने लगे ‘इस देवीको जैसा यह बता रही है, वैसा पति मिलना सम्भव नहीं जान पड़ता’॥१०॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अथापश्यत् स उदये भास्करं भास्करद्युतिः।
सोमं चैव महाभागं विशमानं दिवाकरम् ॥ ११ ॥
मूलम्
अथापश्यत् स उदये भास्करं भास्करद्युतिः।
सोमं चैव महाभागं विशमानं दिवाकरम् ॥ ११ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
तदनन्तर सूर्यके समान तेजस्वी इन्द्रने देखा, सूर्य उदयाचलपर आ गये हैं। महाभाग चन्द्रमा भी सूर्यमें ही प्रवेश कर रहे हैं॥११॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अमावास्यां प्रवृत्तायां मुहुर्ते रौद्र एव तु।
देवासुरं च संग्रामं सोऽपश्यदुदये गिरौ ॥ १२ ॥
मूलम्
अमावास्यां प्रवृत्तायां मुहुर्ते रौद्र एव तु।
देवासुरं च संग्रामं सोऽपश्यदुदये गिरौ ॥ १२ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
अमावस्या आरम्भ हो गयी थी। उस रौद्र (भयंकर) मुहूर्तमें ही उदयगिरिके शिखरपर उन्हें देवासुर-संग्रामका लक्षण दिखायी दिया॥१२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
लोहितैश्च धनैर्युक्तां पूर्वां संध्यां शतक्रतुः।
अपश्यल्लोहितोदं च भगवान् वरुणालयम् ॥ १३ ॥
मूलम्
लोहितैश्च धनैर्युक्तां पूर्वां संध्यां शतक्रतुः।
अपश्यल्लोहितोदं च भगवान् वरुणालयम् ॥ १३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
ऐश्वर्यशाली इन्द्रने देखा, पूर्वसंध्या (प्रभात)-का समय है, प्राचीके आकाशमें लाल रंगके घने बादल घिर आये हैं और समुद्रका जल भी लाल ही दृष्टिगोचर हो रहा है॥१३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
भृगुभिश्चाङ्गिरोभ्यश्च हुतं मन्त्रैः पृथग्विधैः।
हव्यं गृहीत्वा वह्निं च प्रविशन्तं दिवाकरम् ॥ १४ ॥
मूलम्
भृगुभिश्चाङ्गिरोभ्यश्च हुतं मन्त्रैः पृथग्विधैः।
हव्यं गृहीत्वा वह्निं च प्रविशन्तं दिवाकरम् ॥ १४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
भृगु तथा अंगिरा गोत्रके ऋषियोंद्वारा पृथक्-पृथक् मन्त्र पढ़कर हवन किये हुए हविष्यको ग्रहण करके अग्निदेव भी सूर्यमें ही प्रवेश करते हैं॥१४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
पर्व चैव चतुर्विंशं तदा सूर्यमुपस्थितम्।
तथा धर्मगतं रौद्रं सोमं सूर्यगतं च तम् ॥ १५ ॥
मूलम्
पर्व चैव चतुर्विंशं तदा सूर्यमुपस्थितम्।
तथा धर्मगतं रौद्रं सोमं सूर्यगतं च तम् ॥ १५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
उस समय भगवान् सूर्यके निकट चौबीसवाँ पर्व उपस्थित था; अर्थात् पहले जिस अमावस्यापर्वमें देवासुर-संग्राम हुआ था; उससे पूरे एक वर्षके बाद पुनः वैसा अवसर आया था। धर्मकी अर्थात् होम और संध्याकी वेलामें वह रौद्र मुहूर्त उपस्थित था और चन्द्रमा सूर्यकी राशिमें स्थित हो गये थे॥१५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
समालोक्यैकतामेव शशिनो भास्करस्य च।
समवायं तु तं रौद्रं दृष्ट्वा शक्रोऽन्वचिन्तयत् ॥ १६ ॥
मूलम्
समालोक्यैकतामेव शशिनो भास्करस्य च।
समवायं तु तं रौद्रं दृष्ट्वा शक्रोऽन्वचिन्तयत् ॥ १६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
इस प्रकार चन्द्रमा और सूर्यकी एकता (एक राशिपर स्थिति) तथा रौद्र मुहूर्तका संयोग देखकर इन्द्र मन-ही-मन इस प्रकार चिन्तन करने लगे—॥१६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
सूर्याचन्द्रमसोर्घोरं दृश्यते परिवेषणम् ।
एतस्मिन्नेव रात्र्यन्ते महद् युद्धं तु शंसति ॥ १७ ॥
मूलम्
सूर्याचन्द्रमसोर्घोरं दृश्यते परिवेषणम् ।
एतस्मिन्नेव रात्र्यन्ते महद् युद्धं तु शंसति ॥ १७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘अहो! इस समय चन्द्रमा और सूर्यपर यह भयंकर घेरा दिखायी दे रहा है। इससे सूचित होता है कि रात बीतते-बीतते भारी युद्ध छिड़ जायगा॥१७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
सरित्सिन्धुरपीयं तु प्रत्यसृग्वाहिनी भृशम्।
शृगालिन्यग्निवक्त्रा च प्रत्यादित्यं विराविणी ॥ १८ ॥
मूलम्
सरित्सिन्धुरपीयं तु प्रत्यसृग्वाहिनी भृशम्।
शृगालिन्यग्निवक्त्रा च प्रत्यादित्यं विराविणी ॥ १८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘यह सिन्धु नदी भी उलटी धारामें बहकर रक्तके स्रोत बहा रही है। सियारिन मुँहसे आग उगलती हुई-सी सूर्यकी ओर देखकर रोती है॥१८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
एष रौद्रश्च सङ्घातो महान् युक्तश्च तेजसा।
सोमस्य वह्निसूर्याभ्यामद्भुतोऽयं समागमः ॥ १९ ॥
मूलम्
एष रौद्रश्च सङ्घातो महान् युक्तश्च तेजसा।
सोमस्य वह्निसूर्याभ्यामद्भुतोऽयं समागमः ॥ १९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘अनेक योगोंका यह भयंकर तथा महान् संघात (सम्मेलन) तेजसे आलोकित हो रहा है। अग्नि और सूर्यके साथ चन्द्रमाका यह अद्भुत समागम दृष्टिगोचर होता है॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
जनयेद् यं सुतं सोमः सोऽस्या देव्याः पतिर्भवेत्।
अग्निश्चैतैर्गुणैर्युक्तः सर्वैरग्निश्च देवता ॥ २० ॥
मूलम्
जनयेद् यं सुतं सोमः सोऽस्या देव्याः पतिर्भवेत्।
अग्निश्चैतैर्गुणैर्युक्तः सर्वैरग्निश्च देवता ॥ २० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘जान पड़ता है, इस समय चन्द्रमा जिस पुत्रको जन्म देंगे, वही इस देवीका पति होगा अथवा अग्नि भी इन सभी अभीष्ट गुणोंसे युक्त हैं। वे भी देवकोटिमें ही हैं॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
एष चेज्जनयेद् गर्भं सोऽस्या देव्याः पतिर्भवेत्।
एवं संचिन्त्य भगवान् ब्रह्मलोकं तदा गतः ॥ २१ ॥
गृहीत्वा देवसेनां तामवदत् स पितामहम्।
उवाच चास्या देव्यास्त्वं साधुशूरं पतिं दिश ॥ २२ ॥
मूलम्
एष चेज्जनयेद् गर्भं सोऽस्या देव्याः पतिर्भवेत्।
एवं संचिन्त्य भगवान् ब्रह्मलोकं तदा गतः ॥ २१ ॥
गृहीत्वा देवसेनां तामवदत् स पितामहम्।
उवाच चास्या देव्यास्त्वं साधुशूरं पतिं दिश ॥ २२ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘अतः ये यदि किसी बालकको उत्पन्न करें तो वही इस देवीका पति होगा।’ ऐसा सोच-विचारकर ऐश्वर्यशाली इन्द्र उस समय उस देवसेनाको साथ ले ब्रह्मलोकमें गये और ब्रह्माजीसे इस प्रकार बोले—‘भगवन्! आप इस देवीके लिये कोई अच्छे स्वभावका शूरवीर पति प्रदान कीजिये’॥२१-२२॥
मूलम् (वचनम्)
ब्रह्मोवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
मयैतच्चिन्तितं कार्यं त्वया दानवसूदन।
तथा स भविता गर्भो बलवानुरुविक्रमः ॥ २३ ॥
मूलम्
मयैतच्चिन्तितं कार्यं त्वया दानवसूदन।
तथा स भविता गर्भो बलवानुरुविक्रमः ॥ २३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
ब्रह्माजीने कहा— दानवसूदन! इस विषयमें तुमने जो विचार किया है वही मैंने भी सोचा है। वैसा होनेपर ही एक महान् पराक्रमी बलवान् वीरका प्रादुर्भाव होगा॥२३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
स भविष्यति सेनानीस्त्वया सह शतक्रतो।
अस्या देव्याःपतिश्चैव स भविष्यति वीर्यवान् ॥ २४ ॥
मूलम्
स भविष्यति सेनानीस्त्वया सह शतक्रतो।
अस्या देव्याःपतिश्चैव स भविष्यति वीर्यवान् ॥ २४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
शतक्रतो! वही तुम्हारे साथ रहकर देवसेनाका पराक्रमी सेनापति होगा और वही इस देवीका भी पति होगा॥२४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
एतच्छ्रुत्वा नमस्तस्मै कृत्वासौ सह कन्यया।
तत्राभ्यगच्छद् देवेन्द्रो यत्र देवर्षयोऽभवन् ॥ २५ ॥
वसिष्ठप्रमुखा मुख्या विप्रेन्द्राः सुमहाबलाः।
मूलम्
एतच्छ्रुत्वा नमस्तस्मै कृत्वासौ सह कन्यया।
तत्राभ्यगच्छद् देवेन्द्रो यत्र देवर्षयोऽभवन् ॥ २५ ॥
वसिष्ठप्रमुखा मुख्या विप्रेन्द्राः सुमहाबलाः।
अनुवाद (हिन्दी)
यह सुनकर देवराज इन्द्र ब्रह्माजीको नमस्कार करके उस कन्याको साथ ले जहाँ महान् शक्तिशाली वसिष्ठ आदि श्रेष्ठ ब्राह्मण एवं देवर्षि थे, वहाँ उनके आश्रमपर आये॥२५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
भागार्थं तपसो धातुं तेषां सोमं तथाध्वरे ॥ २६ ॥
पिपासवो ययुर्देवाः शतक्रतुपुरोगमाः ।
मूलम्
भागार्थं तपसो धातुं तेषां सोमं तथाध्वरे ॥ २६ ॥
पिपासवो ययुर्देवाः शतक्रतुपुरोगमाः ।
अनुवाद (हिन्दी)
उन दिनों वे महर्षिगण जो यज्ञ कर रहे थे, उसमें भाग लेनेके लिये तथा सोमपान करनेके लिये इन्द्र आदि सभी देवता वहाँ पधारे थे। उन सबके मनमें सोमपान की इच्छा थी॥२६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
इष्टिं कृत्वा यथान्यायं सुसमिद्धे हुताशने ॥ २७ ॥
जुहुवुस्ते महात्मानो हव्यं सर्वदिवौकसाम्।
मूलम्
इष्टिं कृत्वा यथान्यायं सुसमिद्धे हुताशने ॥ २७ ॥
जुहुवुस्ते महात्मानो हव्यं सर्वदिवौकसाम्।
अनुवाद (हिन्दी)
उन महात्मा ऋषियोंने प्रज्वलित अग्निमें शास्त्रीय विधिसे इष्टिका सम्पादन करके सम्पूर्ण देवताओंके लिये हविष्यकी आहुति दी॥२७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
समाहूतो हुतवहः सोऽद्भुतः सूर्यमण्डलात् ॥ २८ ॥
विनिःसृत्य ययौ वह्निर्वाग्यतो विधिवत् प्रभुः।
आगम्याहवनीयं वै तैर्द्विजैर्मन्त्रतो हुतम् ॥ २९ ॥
स तत्र विविधं हव्यं प्रतिगृह्य हुताशनः।
ऋषिभ्यो भरतश्रेष्ठ प्रायच्छत दिवौकसाम् ॥ ३० ॥
मूलम्
समाहूतो हुतवहः सोऽद्भुतः सूर्यमण्डलात् ॥ २८ ॥
विनिःसृत्य ययौ वह्निर्वाग्यतो विधिवत् प्रभुः।
आगम्याहवनीयं वै तैर्द्विजैर्मन्त्रतो हुतम् ॥ २९ ॥
स तत्र विविधं हव्यं प्रतिगृह्य हुताशनः।
ऋषिभ्यो भरतश्रेष्ठ प्रायच्छत दिवौकसाम् ॥ ३० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
भरतश्रेष्ठ! मन्त्रोंद्वारा आवाहन होनेपर वे अद्भुत नामक अग्नि सूर्यमण्डलसे निकलकर मौनभावसे वहाँ आये और ब्रह्मर्षियोंद्वारा मन्त्रोच्चारणपूर्वक विधिवत् हवन किये हुए भाँति-भाँतिके हवनीय पदार्थोंको उन महर्षियोंसे प्राप्त करके उन्होंने सम्पूर्ण देवताओंकी सेवामें अर्पित किया॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
निष्क्रामंश्चाप्यपश्यत् स पत्नीस्तेषां महात्मनाम्।
स्वेष्वासनेषूपविष्टाः स्वपन्तीश्च तथा सुखम् ॥ ३१ ॥
मूलम्
निष्क्रामंश्चाप्यपश्यत् स पत्नीस्तेषां महात्मनाम्।
स्वेष्वासनेषूपविष्टाः स्वपन्तीश्च तथा सुखम् ॥ ३१ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
देवताओंको हविष्य पहुँचाकर जब अग्निदेव वहाँसे जाने लगे, तब उनकी दृष्टि उन महात्मा सप्तर्षियोंकी पत्नियोंपर पड़ी। उनमेंसे कुछ तो अपने आसनोंपर बैठी थीं और कुछ सुखपूर्वक सो रही थीं’॥३१॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
रुक्मवेदिनिभास्तास्तु चन्द्रलेखा इवामलाः ।
हुताशनार्चिप्रतिमाः सर्वास्तारा इवाद्भुताः ॥ ३२ ॥
मूलम्
रुक्मवेदिनिभास्तास्तु चन्द्रलेखा इवामलाः ।
हुताशनार्चिप्रतिमाः सर्वास्तारा इवाद्भुताः ॥ ३२ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
उनकी अंगकान्ति सुवर्णमयी वेदीके समान गौर थी, वे चन्द्रमाकी कलाके समान निर्मल थीं, अग्निकी लपटोंके समान प्रभा बिखेर रही थीं और तारिकाओंके समान अद्भुत सौन्दर्यसे प्रकाशित हो रही थीं॥३२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
स तत्र तेन मनसा बभूव क्षुभितेन्द्रियः।
पत्नीर्दृष्ट्वा द्विजेन्द्राणां वह्निः कामवशं ययौ ॥ ३३ ॥
मूलम्
स तत्र तेन मनसा बभूव क्षुभितेन्द्रियः।
पत्नीर्दृष्ट्वा द्विजेन्द्राणां वह्निः कामवशं ययौ ॥ ३३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
इस प्रकार वहाँ (आसक्तियुक्त) मनसे उन ब्रह्मर्षियोंकी पत्नियोंको देखकर अग्निदेवकी सारी इन्द्रियाँ क्षोभसे चञ्चल हो उठीं। वे सर्वथा कामके अधीन हो गये॥३३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
भूयः संचिन्तयामास न न्याय्यं क्षुभितो ह्यहम्।
साध्व्यः पत्न्यो द्विजेन्द्राणामकामाः कामयाम्यहम् ॥ ३४ ॥
मूलम्
भूयः संचिन्तयामास न न्याय्यं क्षुभितो ह्यहम्।
साध्व्यः पत्न्यो द्विजेन्द्राणामकामाः कामयाम्यहम् ॥ ३४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
फिर उन्होंने मन-ही-मन विचार किया कि ‘मेरा यह कार्य कदापि उचित नहीं है। मेरे मनमें विचार आ गया है। इन ब्रह्मर्षियोंकी पत्नियाँ पतिव्रता हैं। ये मुझे बिलकुल नहीं चाहतीं, तो भी मैं इनकी कामना करता हूँ॥३४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
नैताः शक्या मया द्रष्टुं स्प्रष्टुं वाप्यनिमित्ततः।
गार्हपत्यं समाविश्य तस्मात् पश्याम्यभीक्ष्णशः ॥ ३५ ॥
मूलम्
नैताः शक्या मया द्रष्टुं स्प्रष्टुं वाप्यनिमित्ततः।
गार्हपत्यं समाविश्य तस्मात् पश्याम्यभीक्ष्णशः ॥ ३५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘मैं अकारण न तो इन्हें देख सकता हूँ और न इनका स्पर्श ही कर सकता हूँ। ऐसी दशामें यदि मैं गार्हपत्य अग्निमें प्रविष्ट हो जाऊँ तो बार-बार इनके दर्शनका अवसर पा सकता हूँ’॥३५॥
मूलम् (वचनम्)
मार्कण्डेय उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
संस्पृशन्निव सर्वास्ताः शिखाभिः काञ्चनप्रभाः।
पश्यमानश्च मुमुदे गार्हपत्यं समाश्रितः ॥ ३६ ॥
मूलम्
संस्पृशन्निव सर्वास्ताः शिखाभिः काञ्चनप्रभाः।
पश्यमानश्च मुमुदे गार्हपत्यं समाश्रितः ॥ ३६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
मार्कण्डेयजी कहते हैं— राजन्! ऐसा निश्चय करके अग्निदेवने गार्हपत्य अग्निका आश्रय लिया और अपनी लपटोंसे स्वर्गकी-सी कान्तिवाली उन ऋषि-पत्नियोंका स्पर्श तथा दर्शन-सा करते हुए वे बड़ी प्रसन्नताका अनुभव करने लगे॥३६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
निरुष्य तत्र सुचिरमेवं वह्निर्वशं गतः।
मनस्तासु विनिक्षिप्य कामयानो वराङ्गनाः ॥ ३७ ॥
मूलम्
निरुष्य तत्र सुचिरमेवं वह्निर्वशं गतः।
मनस्तासु विनिक्षिप्य कामयानो वराङ्गनाः ॥ ३७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
इस प्रकार बहुत देरतक वहाँ टिके रहकर अग्निदेव कामके वशमें हो गये। वे अपना हृदय उन सुन्दरियोंपर निछावर करके उनसे मिलनेकी कामना कर रहे थे॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
कामसंतप्तहृदयो देहत्यागविनिश्चितः ।
अलाभे ब्राह्मणस्त्रीणामग्निर्वनमुपागमत् ॥ ३८ ॥
मूलम्
कामसंतप्तहृदयो देहत्यागविनिश्चितः ।
अलाभे ब्राह्मणस्त्रीणामग्निर्वनमुपागमत् ॥ ३८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
उनका हृदय कामाग्निसे संतप्त हो रहा था। वे उन ब्रह्मर्षियोंकी पत्नियोंके न मिलनेसे अपने शरीरको त्याग देनेका निश्चय कर चुके थे। अतः वनमें चले गये॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
स्वाहा तं दक्षदुहिता प्रथमं कामयत् तदा।
सा तस्य छिद्रमन्वैच्छच्चिरात्प्रभृति भाविनी ॥ ३९ ॥
मूलम्
स्वाहा तं दक्षदुहिता प्रथमं कामयत् तदा।
सा तस्य छिद्रमन्वैच्छच्चिरात्प्रभृति भाविनी ॥ ३९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
प्रजापति दक्षकी पुत्री स्वाहा पहलेसे ही अग्निदेवको अपना पति बनाना चाहती थी और इसके लिये बहुत दिनोंसे वह अग्निका छिद्र ढूँढ़ रही थी॥३९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अप्रमत्तस्य देवस्य न च पश्यत्यनिन्दिता।
सा तं ज्ञात्वा यथावत् तु वह्निं वनमुपागतम् ॥ ४० ॥
तत्त्वतः कामसंतप्तं चिन्तयामास भाविनी।
मूलम्
अप्रमत्तस्य देवस्य न च पश्यत्यनिन्दिता।
सा तं ज्ञात्वा यथावत् तु वह्निं वनमुपागतम् ॥ ४० ॥
तत्त्वतः कामसंतप्तं चिन्तयामास भाविनी।
अनुवाद (हिन्दी)
परंतु अग्निदेवके सदा सावधान रहनेके कारण साध्वी स्वाहा उनका कोई दोष नहीं देख पाती थी। जब उसे अच्छी तरह मालूम हो गया कि अग्नि कामसंतप्त होकर वनमें चले गये हैं, तब उसने मन-ही-मन इस प्रकार विचार किया॥४०॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अहं सप्तर्षिपत्नीनां कृत्वा रूपाणि पावकम् ॥ ४१ ॥
कामयिष्यामि कामार्ता तासां रूपेण मोहितम्।
एवं कृते प्रीतिरस्य कामावाप्तिश्च मे भवेत् ॥ ४२ ॥
मूलम्
अहं सप्तर्षिपत्नीनां कृत्वा रूपाणि पावकम् ॥ ४१ ॥
कामयिष्यामि कामार्ता तासां रूपेण मोहितम्।
एवं कृते प्रीतिरस्य कामावाप्तिश्च मे भवेत् ॥ ४२ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
मैं अग्निके प्रति कामभावसे पीड़ित हूँ। अतः स्वयं ही सप्तर्षिपत्नियोंके रूप धारण करके अग्निदेवकी कामना करूँगी; क्योंकि वे उनके रूपसे मोहित हो रहे हैं। ऐसा करनेसे उन्हें प्रसन्नता होगी और मेरी कामना भी पूर्ण हो जायगी’॥४१-४२॥
मूलम् (समाप्तिः)
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि आङ्गिरसोपाख्याने स्कन्दोत्पत्तौ चतुर्विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२४ ॥
मूलम् (वचनम्)
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें आंगिरसोपाख्यानके प्रसंगमें स्कन्दकी उत्पत्तिविषयक दो सौ चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥२२४॥