भागसूचना
त्रयोविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
सूचना (हिन्दी)
इन्द्रके द्वारा केशीके हाथसे देवसेनाका उद्धार
मूलम् (वचनम्)
(वैशम्पायन उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
श्रुत्वेमां धर्मसंयुक्तां धर्मराजः कथां शुभाम्।
पुनः पप्रच्छ तमृषिं मार्कण्डेयं तपस्विनम्॥
मूलम्
श्रुत्वेमां धर्मसंयुक्तां धर्मराजः कथां शुभाम्।
पुनः पप्रच्छ तमृषिं मार्कण्डेयं तपस्विनम्॥
अनुवाद (हिन्दी)
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! यह धर्मयुक्त कल्याणमयी कथा सुनकर धर्मराज युधिष्ठिरने पुनः उन तपस्वी मुनि मार्कण्डेयजीसे पूछा॥
मूलम् (वचनम्)
युधिष्ठिर उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
कुमारस्तु यथा जातो यथा चाग्नेः सुतोऽभवत्।
यथा रुद्राच्च सम्भूतो गङ्गायां कृत्तिकासु च॥
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं कौतूहलमतीव मे॥)
मूलम्
कुमारस्तु यथा जातो यथा चाग्नेः सुतोऽभवत्।
यथा रुद्राच्च सम्भूतो गङ्गायां कृत्तिकासु च॥
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं कौतूहलमतीव मे॥)
अनुवाद (हिन्दी)
युधिष्ठिर बोले— मुने! कुमार (स्कन्द)-का जन्म कैसे हुआ? वे अग्निके पुत्र किस प्रकार हुए? भगवान् शिवसे उनकी उत्पत्ति किस प्रकार हुई? तथा वे गंगा और छहों कृत्तिकाओंके गर्भसे कैसे प्रकट हुए? मैं यह सुनना चाहता हूँ। इसके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल है॥
मूलम् (वचनम्)
मार्कण्डेय उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
अग्नीनां विविधा वंशाः कीर्तितास्ते मयानघ।
शृणु जन्म तु कौरव्य कार्तिकेयस्य धीमतः ॥ १ ॥
मूलम्
अग्नीनां विविधा वंशाः कीर्तितास्ते मयानघ।
शृणु जन्म तु कौरव्य कार्तिकेयस्य धीमतः ॥ १ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
मार्कण्डेयजीने कहा— निष्पाप युधिष्ठिर! मैंने तुमसे अग्नियोंके विविध वंशोंका वर्णन किया। अब तुम परम बुद्धिमान् कार्तिकेयके जन्मका वृत्तान्त सुनो॥१॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अद्भुतस्याद्भुतं पुत्रं प्रवक्ष्याम्यमितौजसम् ।
जातं ब्रह्मर्षिभार्याभिर्ब्रह्मण्यं कीर्तिवर्धनम् ॥ २ ॥
मूलम्
अद्भुतस्याद्भुतं पुत्रं प्रवक्ष्याम्यमितौजसम् ।
जातं ब्रह्मर्षिभार्याभिर्ब्रह्मण्यं कीर्तिवर्धनम् ॥ २ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
अद्भुत अग्निके अद्भुत पुत्र कार्तिकेयके बल और तेज असीम हैं। उनका जन्म ब्रह्मर्षियोंकी पत्नियोंके गर्भसे हुआ है। वे अपने उत्तम यशको बढ़ानेवाले तथा ब्राह्मणभक्त हैं। मैं उनके जन्मका वृत्तान्त बता रहा हूँ, सुनो॥२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
देवासुराः पुरा यत्ता विनिघ्नन्तः परस्परम्।
तत्राजयन् सदा देवान् दानवा घोररूपिणः ॥ ३ ॥
मूलम्
देवासुराः पुरा यत्ता विनिघ्नन्तः परस्परम्।
तत्राजयन् सदा देवान् दानवा घोररूपिणः ॥ ३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
पूर्वकालकी बात है, देवता और असुर युद्धके लिये उद्यत हो एक-दूसरेको अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा चोट पहुँचाया करते थे। उस संघर्षके समय भयंकर रूपवाले दानव सदा ही देवताओंपर विजय पाते थे॥३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
वध्यमानं बल दृष्ट्वा बहुशस्तैः पुरंदरः।
स सैन्यनायकार्थाय चिन्तामाप भृशं तदा ॥ ४ ॥
मूलम्
वध्यमानं बल दृष्ट्वा बहुशस्तैः पुरंदरः।
स सैन्यनायकार्थाय चिन्तामाप भृशं तदा ॥ ४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
जब इन्द्रने देखा कि दानव बार-बार देवताओंकी सेनाका वध कर रहे हैं, तब उन्हें एक सुयोग्य सेनापतिकी आवश्यकता हुई। इसके लिये वे बहुत चिन्तित हुए॥४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
देवसेनां दानवैर्हि भरनां दृष्ट्वा महाबलः।
पालयेद् वीर्यमाश्रित्य स ज्ञेयः पुरुषो मया ॥ ५ ॥
मूलम्
देवसेनां दानवैर्हि भरनां दृष्ट्वा महाबलः।
पालयेद् वीर्यमाश्रित्य स ज्ञेयः पुरुषो मया ॥ ५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
उन्होंने सोचा ‘मुझे ऐसे पुरुषका पता लगाना चाहिये जो महान् बलवान् हो और अपने पराक्रमका आश्रय ले देवताओंकी उस सेनाका, जिनका दानव नाश कर देते हैं, संरक्षण करे’॥५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
स शैलं मानसं गत्वा ध्यायन्नर्थमिदं भृशम्।
शुश्रावार्तस्वरं घोरमथ मुक्तं स्त्रिया तदा ॥ ६ ॥
मूलम्
स शैलं मानसं गत्वा ध्यायन्नर्थमिदं भृशम्।
शुश्रावार्तस्वरं घोरमथ मुक्तं स्त्रिया तदा ॥ ६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
इसी बातका बार-बार विचार करते हुए इन्द्र मानसपर्वतपर गये। वहाँ उन्हें एक स्त्रीके मुखसे निकला हुआ भयंकर आर्तनाद सुनायी दिया॥६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अभिधावतु मां कश्चित् पुरुषस्त्रातु चैव ह।
पतिं च मे प्रदिशतु स्वयं वा पतिरस्तु मे॥७॥
मूलम्
अभिधावतु मां कश्चित् पुरुषस्त्रातु चैव ह।
पतिं च मे प्रदिशतु स्वयं वा पतिरस्तु मे॥७॥
अनुवाद (हिन्दी)
वह कह रही थी ‘कोई वीर पुरुष दौड़कर आये और मेरी रक्षा करे। वह मेरे लिये पति प्रदान करे या स्वयं ही मेरा पति हो जाय’॥७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
पुरंदरस्तु तामाह मा भैर्नास्ति भयं तव।
एवमुक्त्वा ततोऽपश्यत् केशिनं स्थितमग्रतः ॥ ८ ॥
मूलम्
पुरंदरस्तु तामाह मा भैर्नास्ति भयं तव।
एवमुक्त्वा ततोऽपश्यत् केशिनं स्थितमग्रतः ॥ ८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
यह सुनकर इन्द्रने उससे कहा—‘भद्रे! डरो मत, अब तुम्हें कोई भय नहीं है।’ ऐसा कहकर जब उन्होंने उधर दृष्टि डाली, तब केशी दानव सामने खड़ा दिखायी दिया॥८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
किरीटिनं गदापाणिं धातुमन्तमिवाचलम् ।
हस्ते गृहीत्वा कन्यां तामथैनं वासवोऽब्रवीत् ॥ ९ ॥
मूलम्
किरीटिनं गदापाणिं धातुमन्तमिवाचलम् ।
हस्ते गृहीत्वा कन्यां तामथैनं वासवोऽब्रवीत् ॥ ९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
उसने मस्तकपर किरीट धारण कर रखा था। उसके हाथमें गदा थी और वह एक कन्याका हाथ पकड़े विविध धातुओंसे विभूषित पर्वत-सा जान पड़ता था। यह देख इन्द्रने उससे कहा—॥९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अनार्यकर्मन् कस्मात् त्वमिमां कन्यां जिहीर्षसि।
वज्रिणं मां विजानीहि विरमास्याः प्रबाधनात् ॥ १० ॥
मूलम्
अनार्यकर्मन् कस्मात् त्वमिमां कन्यां जिहीर्षसि।
वज्रिणं मां विजानीहि विरमास्याः प्रबाधनात् ॥ १० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘रे नीच कर्म करनेवाले दानव! तू कैसे इस कन्याका अपहरण करना चाहता है? समझ ले, मैं वज्रधारी इन्द्र हूँ। अब इस अबलाको सताना छोड़ दे॥१०॥
मूलम् (वचनम्)
केश्युवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
विसृजस्व त्वमेवैनां शक्रैषा प्रार्थिता मया।
क्षमं ते जीवतो गन्तुं स्वपुरं पाकशासन ॥ ११ ॥
मूलम्
विसृजस्व त्वमेवैनां शक्रैषा प्रार्थिता मया।
क्षमं ते जीवतो गन्तुं स्वपुरं पाकशासन ॥ ११ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
केशी बोला— इन्द्र! तू ही इसे छोड़ दे। मैंने इसका वरण कर लिया है। पाकशासन! ऐसा करनेपर ही तू जीता-जागता अपनी अमरावती पुरीको लौट सकता है॥११॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
एवमुक्त्वा गदां केशी चिक्षेपेन्द्रवधाय वै।
तामापतन्तीं चिच्छेद मध्ये वज्रेण वासवः ॥ १२ ॥
मूलम्
एवमुक्त्वा गदां केशी चिक्षेपेन्द्रवधाय वै।
तामापतन्तीं चिच्छेद मध्ये वज्रेण वासवः ॥ १२ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
ऐसा कहकर केशीने इन्द्रका वध करनेके लिये अपनी गदा चलायी। परंतु इन्द्रने अपने वज्रद्वारा उस आती हुई गदाको बीचसे ही काट डाला॥१२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अथास्य शैलशिखरं केशी क्रुद्धो व्यवासृजत्।
तदा पतन्तं सम्प्रेक्ष्य शैलशृङ्गं शतक्रतुः ॥ १३ ॥
बिभेद राजन् वज्रेण भुवि तन्निपपात ह।
पतता तु तदा केशी तेन शृङ्गेण ताडितः ॥ १४ ॥
मूलम्
अथास्य शैलशिखरं केशी क्रुद्धो व्यवासृजत्।
तदा पतन्तं सम्प्रेक्ष्य शैलशृङ्गं शतक्रतुः ॥ १३ ॥
बिभेद राजन् वज्रेण भुवि तन्निपपात ह।
पतता तु तदा केशी तेन शृङ्गेण ताडितः ॥ १४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
तब केशीने कुपित होकर इन्द्रपर पर्वतकी एक चट्टान फेंकी। राजन्! उस शैलशिखरको अपने ऊपर सरिता देख इन्द्रने वज्रसे उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिये और वह चूर-चूर होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। उस समय गिरते हुए उस शिलाखण्डने केशीको ही भारी चोट पहुँचायी॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
हित्वा कन्यां महाभागां प्राद्रवद् भृशपीडितः।
अपयातेऽसुरे तस्मिंस्तां कन्यां वासवोऽब्रवीत्।
कासि कस्यासि किञ्चेह कुरुषे त्वं शुभानने ॥ १५ ॥
मूलम्
हित्वा कन्यां महाभागां प्राद्रवद् भृशपीडितः।
अपयातेऽसुरे तस्मिंस्तां कन्यां वासवोऽब्रवीत्।
कासि कस्यासि किञ्चेह कुरुषे त्वं शुभानने ॥ १५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
उस आघातसे अत्यन्त पीडित हो वह दानव उस परम सौभाग्यशालिनी कन्याको छोड़कर भाग गया। उस असुरके भाग जानेपर इन्द्रने उस कन्यासे पूछा—‘सुमुखि! तुम कौन हो? किसकी पुत्री हो? और यहाँ क्या करती हो?’॥१५॥
मूलम् (समाप्तिः)
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि आङ्गिरसोपाख्याने स्कन्दोत्पत्तौ केशिपराभवे त्रयोविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥२२३॥
मूलम् (वचनम्)
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें आंगिरसोपाख्यानप्रकरणमें स्कन्दकी उत्पत्तिके विषयमें केशिपराभवविषयक दो सौ तेईसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥२२३॥
सूचना (हिन्दी)
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल १७ श्लोक हैं)