भागसूचना
अष्टादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः
सूचना (हिन्दी)
अंगिराकी संततिका वर्णन
मूलम् (वचनम्)
मार्कण्डेय उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
ब्रह्मणो यस्तृतीयस्तु पुत्रः कुरुकुलोद्वह।
तस्याभवत् सुभा भार्या प्रजास्तस्यां च मे शृणु ॥ १ ॥
मूलम्
ब्रह्मणो यस्तृतीयस्तु पुत्रः कुरुकुलोद्वह।
तस्याभवत् सुभा भार्या प्रजास्तस्यां च मे शृणु ॥ १ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
मार्कण्डेयजी कहते हैं— कुरुकुलधुरन्धर युधिष्ठिर! ब्रह्माजीके जो तीसरे पुत्र अंगिरा हैं, उनकी पत्नीका नाम सुभा है। उसके गर्भसे जो संतानें उत्पन्न हुईं, उनका वर्णन करता हूँ, सुनो॥१॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
बृहत्कीर्तिर्बृहज्ज्योतिर्बृहद्ब्रह्मा बृहन्मनाः ।
बृहन्मन्त्रो बृहद्भासस्तथा राजन् बृहस्पतिः ॥ २ ॥
मूलम्
बृहत्कीर्तिर्बृहज्ज्योतिर्बृहद्ब्रह्मा बृहन्मनाः ।
बृहन्मन्त्रो बृहद्भासस्तथा राजन् बृहस्पतिः ॥ २ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
राजन्! बृहत्कीर्ति, बृहज्ज्योति, बृहद्ब्रह्मा, बृहन्मना, बृहन्मन्त्र, बृहद्भास तथा बृहस्पति (ये अंगिरासे सुभाके सात पुत्र हुए)॥२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
प्रजासु तासु सर्वासु रूपेणाप्रतिमाभवत्।
देवी भानुमती नाम प्रथमाङ्गिरसः सुता ॥ ३ ॥
मूलम्
प्रजासु तासु सर्वासु रूपेणाप्रतिमाभवत्।
देवी भानुमती नाम प्रथमाङ्गिरसः सुता ॥ ३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
अंगिराकी प्रथम पुत्रीका नाम देवी भानुमती है। वह उनकी संतानोंमें सबसे अधिक रूपवती है; उसके रूपकी कहीं तुलना ही नहीं है (भानु अर्थात् सूर्यसे युक्त होनेके कारण यह दिनकी अभिमानिनी है)॥३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
भूतानामेव सर्वेषां यस्यां रागस्तदाभवत्।
रागाद्रागेति यामाहुर्द्वितीयाङ्गिरसः सुता ॥ ४ ॥
मूलम्
भूतानामेव सर्वेषां यस्यां रागस्तदाभवत्।
रागाद्रागेति यामाहुर्द्वितीयाङ्गिरसः सुता ॥ ४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
अंगिरा मुनिकी दूसरी कन्या ‘रागा’ नामसे विख्यात है। उसपर समस्त प्राणियोंका विशेष अनुराग प्रकट हुआ था। इसीलिये उसका ऐसा नाम प्रसिद्ध हुआ। (यह रात्रिकी अभिमानिनी है)॥४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
यां कपर्दिसुतामाहुर्दृश्यादृश्येति देहिनः ।
तनुत्वात् सा सिनीवाली तृतीयाङ्गिरसः सुता ॥ ५ ॥
मूलम्
यां कपर्दिसुतामाहुर्दृश्यादृश्येति देहिनः ।
तनुत्वात् सा सिनीवाली तृतीयाङ्गिरसः सुता ॥ ५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
अंगिराकी तीसरी पुत्री ‘सिनीवाली’ (चतुर्दशीयुक्ता अमावास्या) है जो अत्यन्त कृश होनेके कारण कभी दीखती है और कभी नहीं दीखती; इसीलिये लोग उसे ‘दृश्यादृश्या’ कहते हैं। भगवान् रुद्र उसे ललाटमें धारण करते हैं, इस कारण उसे सब लोग ‘रूद्रसुता, भी कहते हैं॥५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
पश्यत्यर्चिष्मती भाभिर्हविर्भिश्च हविष्मती ।
षष्ठीमङ्गिरसः कन्यां पुण्यामाहुर्महिष्मतीम् ॥ ६ ॥
मूलम्
पश्यत्यर्चिष्मती भाभिर्हविर्भिश्च हविष्मती ।
षष्ठीमङ्गिरसः कन्यां पुण्यामाहुर्महिष्मतीम् ॥ ६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
उनकी चौथी पुत्री ‘अर्चिष्मती’ है, (यही पूर्ण चन्द्रमासे युक्त होनेके कारण शुद्ध पौर्णमासी कही जाती है) इसकी प्रभासे लोग रातमें भी सब वस्तुओंको स्पष्ट देखते हैं। पाँचवीं कन्या ‘हविष्मती’ (प्रतिपद्युक्ता पूर्णिमा ‘राका’) है, जिसके सांनिध्यमें हविष्यद्वारा देवताओंका यजन किया जाता है। अंगिरा मुनिकी जो छठी पुण्यात्मा कन्या है, उसे ‘महिष्मती’ कहते हैं (यही चतुर्दशीयुक्ता पूर्णिमा है, जिसे ‘अनुमति’ भी कहते हैं)॥६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
महामखेष्वाङ्गिरसी दीप्तिमत्सु महामते ।
महामतीति विख्याता सप्तमी कथ्यते सुता ॥ ७ ॥
मूलम्
महामखेष्वाङ्गिरसी दीप्तिमत्सु महामते ।
महामतीति विख्याता सप्तमी कथ्यते सुता ॥ ७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
महामते! जो दीप्तिशाली सोमयाग आदि महायज्ञोंमें प्रकाशित होनेके कारण ‘महामती’ नामसे विख्यात है, वह (प्रतिपद्युक्त अमावास्या) अंगिरा मुनिकी सातवीं पुत्री कहलाती है॥७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
यां तु दृष्ट्वा भगवतीं जनः कुहुकुहायते।
एकानंशेति तामाहुः कुहूमङ्गिरसः सुताम् ॥ ८ ॥
मूलम्
यां तु दृष्ट्वा भगवतीं जनः कुहुकुहायते।
एकानंशेति तामाहुः कुहूमङ्गिरसः सुताम् ॥ ८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
जिस भगवती अमाको देखकर लोग ‘कुहु-कुहु’ ध्वनि कर उठते (चकित हो जाते) हैं, अंगिरा मुनिकी वह आठवीं पुत्री ‘कुहू’ नामसे विख्यात है। उसमें चन्द्रमाकी एकमात्र कला अत्यन्त सूक्ष्म अंशसे शेष रहती है। (यही शुद्ध अमावस्या है)॥८॥
मूलम् (समाप्तिः)
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि अङ्गिरसोपाख्याने अष्टादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१८ ॥
मूलम् (वचनम्)
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें अंगिरसोपाख्यानविषयक दो सौ अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥२१८॥