भागसूचना
षोडशाधिकद्विशततमोऽध्यायः
सूचना (हिन्दी)
कौशिक-धर्मव्याध-संवादका उपसंहार तथा कौशिकका अपने घरको प्रस्थान
मूलम् (वचनम्)
व्याध उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
एवं शप्तोऽहमृषिणा तदा द्विजवरोत्तम।
अभिप्रसादयमृषिं गिरा त्राहीति मां तदा ॥ १ ॥
अजानता मयाकार्यमिदमद्य कृतं मुने।
क्षन्तुमर्हसि तत् सर्वं प्रसीद भगवन्निति ॥ २ ॥
मूलम्
एवं शप्तोऽहमृषिणा तदा द्विजवरोत्तम।
अभिप्रसादयमृषिं गिरा त्राहीति मां तदा ॥ १ ॥
अजानता मयाकार्यमिदमद्य कृतं मुने।
क्षन्तुमर्हसि तत् सर्वं प्रसीद भगवन्निति ॥ २ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
धर्मव्याध कहता है— विप्रवर! जब इस प्रकार ऋषिने मुझे शाप दे दिया, तब मैंने कहा—‘भगवन्! मेरी रक्षा कीजिये—मुझे उबारिये। मुने! मैंने अनजानमें यह आज अनुचित काम कर डाला है। मेरा सब अपराध क्षमा कीजिये और मुझपर प्रसन्न हो जाइये।’ ऐसा कहकर उन्हें प्रसन्न करनेकी चेष्टा की॥१-२॥
मूलम् (वचनम्)
ऋषिरुवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
नान्यथा भविता शाप एवमेतदसंशयम्।
आनृशंस्यात् त्वहं किञ्चित् कर्तानुग्रहमद्य ते ॥ ३ ॥
मूलम्
नान्यथा भविता शाप एवमेतदसंशयम्।
आनृशंस्यात् त्वहं किञ्चित् कर्तानुग्रहमद्य ते ॥ ३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
ऋषिने कहा— यह शाप टल नहीं सकता। ऐसा होकर ही रहेगा, इसमें संशय नहीं है। परंतु मेरा स्वभाव क्रूर नहीं है, इसलिये मैं तुझपर आज कुछ अनुग्रह करता हूँ॥३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
शूद्रयोन्यां वर्तमानो धर्मज्ञो हि भविष्यसि।
मातापित्रोश्च शुश्रूषां करिष्यसि न संशयः ॥ ४ ॥
मूलम्
शूद्रयोन्यां वर्तमानो धर्मज्ञो हि भविष्यसि।
मातापित्रोश्च शुश्रूषां करिष्यसि न संशयः ॥ ४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
तू शूद्रयोनिमें रहकर धर्मज्ञ होगा और माता-पिताकी सेवा करेगा। इसमें तनिक भी संदेहके लिये स्थान नहीं है॥४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तया शुश्रूषया सिद्धिं महत्त्वं समवाप्स्यसि।
जातिस्मरश्च भविता स्वर्गं चैव गमिष्यसि ॥ ५ ॥
मूलम्
तया शुश्रूषया सिद्धिं महत्त्वं समवाप्स्यसि।
जातिस्मरश्च भविता स्वर्गं चैव गमिष्यसि ॥ ५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
उस सेवासे तुझे सिद्धि और महत्ता प्राप्त होगी। तू पूर्वजन्मकी बातोंको स्मरण रखनेवाला होगा और अन्तमें स्वर्गलोकमें जायगा॥५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
शापक्षये तु निर्वृत्ते भवितासि पुनर्द्विजः।
एवं शप्तः पुरा तेन ऋषिणास्म्युग्रतेजसा ॥ ६ ॥
मूलम्
शापक्षये तु निर्वृत्ते भवितासि पुनर्द्विजः।
एवं शप्तः पुरा तेन ऋषिणास्म्युग्रतेजसा ॥ ६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
शापका निवारण हो जानेपर तू फिर ब्राह्मण होगा। इस प्रकार उन उग्र तेजस्वी महर्षिने पूर्वकालमें मुझे शाप दिया था॥६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
प्रसादश्च कृतस्तेन ममैव द्विपदां वर।
शरं चोद्धृतवानस्मि तस्य वै द्विजसत्तम ॥ ७ ॥
आश्रमं च मया नीतो न च प्राणैर्व्ययुज्यत।
मूलम्
प्रसादश्च कृतस्तेन ममैव द्विपदां वर।
शरं चोद्धृतवानस्मि तस्य वै द्विजसत्तम ॥ ७ ॥
आश्रमं च मया नीतो न च प्राणैर्व्ययुज्यत।
अनुवाद (हिन्दी)
नरश्रेष्ठ! फिर उन्होंने ही मेरे ऊपर अनुग्रह किया। द्विजश्रेष्ठ! तदनन्तर मैंने उनके शरीरसे बाण निकाला और उन्हें उनके आश्रमपर पहुँचा दिया। परंतु उनके प्राण नहीं गये॥७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
एतत् ते सर्वमाख्यातं यथा मम पुराभवत् ॥ ८ ॥
अभितश्चापि गन्तव्यं मया स्वर्गं द्विजोत्तम ॥ ९ ॥
मूलम्
एतत् ते सर्वमाख्यातं यथा मम पुराभवत् ॥ ८ ॥
अभितश्चापि गन्तव्यं मया स्वर्गं द्विजोत्तम ॥ ९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
विप्रवर! पूर्वजन्ममें मेरे ऊपर जो कुछ बीता था, वह सब मैंने आपसे कह सुनाया। अब इस जीवनके पश्चात् मुझे स्वर्गलोकमें जाना है॥८-९॥
मूलम् (वचनम्)
ब्राह्मण उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
एवमेतानि पुरुषा दुःखानि च सुखानि च।
आप्नुवन्ति महाबुद्धे नोत्कण्ठां कर्तुमर्हसि ॥ १० ॥
मूलम्
एवमेतानि पुरुषा दुःखानि च सुखानि च।
आप्नुवन्ति महाबुद्धे नोत्कण्ठां कर्तुमर्हसि ॥ १० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
ब्राह्मण बोला— महामते! मनुष्य इसी प्रकार दुःख और सुख पाते रहते हैं। इसके लिये आपको चिन्ता नहीं करनी चाहिये॥१०॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
दुष्करं हि कृतं कर्म जानता जातिमात्मनः।
लोकवृत्तान्ततत्त्वज्ञ नित्यं धर्मपरायणः ॥ ११ ॥
मूलम्
दुष्करं हि कृतं कर्म जानता जातिमात्मनः।
लोकवृत्तान्ततत्त्वज्ञ नित्यं धर्मपरायणः ॥ ११ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
जिसके फलस्वरूप आपको अपने पूर्वजन्मकी बातोंका ज्ञान बना हुआ है, वह पिता-माताकी सेवारूप कर्म दूसरोंके लिये दुष्कर है; किंतु आपने उसे सम्पन्न कर लिया है। आप लोकवृत्तान्तका तत्त्व जानते हैं और सदा धर्ममें तत्पर रहते हैं॥११॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
कर्मदोषश्च वै विद्वन्नात्मजातिकृतेन ते।
कञ्चित् कालमुष्यतां वै ततोऽसि भविता द्विजः ॥ १२ ॥
मूलम्
कर्मदोषश्च वै विद्वन्नात्मजातिकृतेन ते।
कञ्चित् कालमुष्यतां वै ततोऽसि भविता द्विजः ॥ १२ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
विद्वन्! आपको जो यह कर्मदोष (दूषित कर्म) प्राप्त हुआ है, वह आपके पूर्वजन्मके कर्मका फल है। इस जन्मके नहीं। अतः कुछ कालतक और इसी रूपमें रहें। फिर आप ब्राह्मण हो जायँगे॥१२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
साम्प्रतं च मतो मेऽसि ब्राह्मणो नात्र संशयः।
ब्राह्मणः पतनीयेषु वर्तमानो विकर्मसु ॥ १३ ॥
दाम्भिको दुष्कृतः प्रायः शूद्रेण सदृशो भवेत्।
मूलम्
साम्प्रतं च मतो मेऽसि ब्राह्मणो नात्र संशयः।
ब्राह्मणः पतनीयेषु वर्तमानो विकर्मसु ॥ १३ ॥
दाम्भिको दुष्कृतः प्रायः शूद्रेण सदृशो भवेत्।
अनुवाद (हिन्दी)
मैं तो अभी आपको ब्राह्मण मानता हूँ। आपके ब्राह्मण होनेमें संदेह नहीं है। जो ब्राह्मण होकर भी पतनके गर्तमें गिरानेवाले पापकर्मोंमें फँसा हुआ है और प्रायः दुष्कर्मपरायण तथा पाखंडी है, वह शूद्रके समान है॥१३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
यस्तु शूद्रो दमे सत्ये धर्मे च सततोत्थितः ॥ १४ ॥
तं ब्राह्मणमहं मन्ये वृत्तेन हि भवेद् द्विजः।
मूलम्
यस्तु शूद्रो दमे सत्ये धर्मे च सततोत्थितः ॥ १४ ॥
तं ब्राह्मणमहं मन्ये वृत्तेन हि भवेद् द्विजः।
अनुवाद (हिन्दी)
इसके विपरीत जो शूद्र होकर भी (शम,) दम, सत्य तथा धर्मका पालन करनेके लिये सदा उद्यत रहता है, उसे मैं ब्राह्मण ही मानता हूँ; क्योंकि मनुष्य सदाचारसे ही द्विज होता है॥१४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
कर्मदोषेण विषमां गतिमाप्नोति दारुणाम् ॥ १५ ॥
क्षीणदोषमहं मन्ये चाभितस्त्वां नरोत्तम।
मूलम्
कर्मदोषेण विषमां गतिमाप्नोति दारुणाम् ॥ १५ ॥
क्षीणदोषमहं मन्ये चाभितस्त्वां नरोत्तम।
अनुवाद (हिन्दी)
कर्मदोषसे ही मनुष्य विषम एवं भयंकर दुर्गतिमें पड़ जाता है। परंतु नरश्रेष्ठ! मैं तो समझता हूँ कि आपके सारे कर्मदोष सर्वथा नष्ट हो गये हैं॥१५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
कर्तुमर्हसि नोत्कण्ठां त्वद्विधा ह्यविषादिनः।
लोकवृत्तानुवृत्तज्ञा नित्यं धर्मपरायणाः ॥ १६ ॥
मूलम्
कर्तुमर्हसि नोत्कण्ठां त्वद्विधा ह्यविषादिनः।
लोकवृत्तानुवृत्तज्ञा नित्यं धर्मपरायणाः ॥ १६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
अतः आपको अपने विषयमें किसी प्रकारकी चिन्ता नहीं करनी चाहिये। आपके-जैसे ज्ञानी पुरुष, जो लोकवृत्तान्तके अनुवर्तनका रहस्य जाननेवाले तथा नित्य धर्मपरायण हैं, कभी विषादग्रस्त नहीं होते हैं॥१६॥
मूलम् (वचनम्)
व्याध उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
प्रज्ञया मानसं दुःखं हन्याच्छारीरमौषधैः।
एतद् विज्ञानसामर्थ्यं न बालैः समतामियात् ॥ १७ ॥
मूलम्
प्रज्ञया मानसं दुःखं हन्याच्छारीरमौषधैः।
एतद् विज्ञानसामर्थ्यं न बालैः समतामियात् ॥ १७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
धर्मव्याधने कहा— ज्ञानी पुरुष शारीरिक कष्टका औषधसेवनद्वारा नाश करे और विवेकशील बुद्धिद्वारा मानसिक दुःखको नष्ट करे। यही ज्ञानकी शक्ति है। बुद्धिमान् मनुष्यको बालकोंके समान शोक या विलाप नहीं करना चाहिये॥१७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अनिष्टसम्प्रयोगाच्च विप्रयोगात् प्रियस्य च।
मनुष्या मानसैर्दुःखैर्युज्यन्ते चाल्पबुद्धयः ॥ १८ ॥
मूलम्
अनिष्टसम्प्रयोगाच्च विप्रयोगात् प्रियस्य च।
मनुष्या मानसैर्दुःखैर्युज्यन्ते चाल्पबुद्धयः ॥ १८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
मन्दबुद्धि मनुष्य ही अप्रिय वस्तुके संयोग और प्रिय वस्तुके वियोगमें मानसिक दुःखसे दुःखी होते हैं॥१८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुणैर्भूतानि युज्यन्ते वियुज्यन्ते तथैव च।
सर्वाणि नैतदेकस्य शोकस्थानं हि विद्यते ॥ १९ ॥
मूलम्
गुणैर्भूतानि युज्यन्ते वियुज्यन्ते तथैव च।
सर्वाणि नैतदेकस्य शोकस्थानं हि विद्यते ॥ १९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
सभी प्राणी तीनों गुणोंके कार्यभूत विभिन्न वस्तु आदिसे जिस प्रकार संयुक्त होते हैं, वैसे ही वियुक्त भी होते रहते हैं। अतः किसी एकका संयोग और किसी एकका वियोग वास्तवमें शोकका कारण नहीं है॥१९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अनिष्टं चान्वितं पश्यंस्तथा क्षिप्रं विरज्यते।
ततश्च प्रतिकुर्वन्ति यदि पश्यन्त्युपक्रमात् ॥ २० ॥
मूलम्
अनिष्टं चान्वितं पश्यंस्तथा क्षिप्रं विरज्यते।
ततश्च प्रतिकुर्वन्ति यदि पश्यन्त्युपक्रमात् ॥ २० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
यदि किसी कार्यमें अनिष्टका संयोग दिखायी देता है तो मनुष्य शीघ्र ही उससे निवृत्त हो जाता है। और यदि आरम्भ होनेसे पहले ही उस अनिष्टका पता लग जाता है तो लोग उसके प्रतीकारका उपाय करने लगते हैं॥२०॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
शोचतो न भवेत् किंचित् केवलं परितप्यते।
परित्यजन्ति ये दुःखं सुखं वाप्युभयं नराः ॥ २१ ॥
त एव सुखमेधन्ते ज्ञानतृप्ता मनीषिणः।
असंतोषपरा मूढाः संतोषं यान्ति पण्डिताः ॥ २२ ॥
मूलम्
शोचतो न भवेत् किंचित् केवलं परितप्यते।
परित्यजन्ति ये दुःखं सुखं वाप्युभयं नराः ॥ २१ ॥
त एव सुखमेधन्ते ज्ञानतृप्ता मनीषिणः।
असंतोषपरा मूढाः संतोषं यान्ति पण्डिताः ॥ २२ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
केवल शोक करनेसे कुछ नहीं होता, संतापमात्र ही हाथ लगता है। जो ज्ञानतृप्त मनीषी मानव सुख और दुःख दोनोंका परित्याग कर देते हैं, वे ही सुखी होते हैं। मूढ़ मनुष्य असंतोषी होते हैं और ज्ञानवानोंको संतोष प्राप्त होता है॥२१-२२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
असंतोषस्य नास्त्यन्तस्तुष्टिस्तु परमं सुखम्।
न शोचन्ति गताध्वानः पश्यन्तः परमां गतिम् ॥ २३ ॥
मूलम्
असंतोषस्य नास्त्यन्तस्तुष्टिस्तु परमं सुखम्।
न शोचन्ति गताध्वानः पश्यन्तः परमां गतिम् ॥ २३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
असंतोषका अन्त नहीं है, अतः संतोष ही परम सुख है। जिन्होंने ज्ञानमार्गको पार करके परमात्माका साक्षात्कार कर लिया है, वे कभी शोकमें नहीं पड़ते हैं॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
न विषादे मनः कार्यं विषादो विषमुत्तमम्।
मारयत्यकृतप्रज्ञं बालं क्रुद्ध इवोरगः ॥ २४ ॥
मूलम्
न विषादे मनः कार्यं विषादो विषमुत्तमम्।
मारयत्यकृतप्रज्ञं बालं क्रुद्ध इवोरगः ॥ २४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
मनको विषादकी ओर न जाने दे। विषाद उग्र विष है। वह क्रोधमें भरे हुए सर्पकी भाँति विवेकहीन अज्ञानी मनुष्यको मार डालता है॥२४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
यं विषादोऽभिभवति विक्रमे समुपस्थिते।
तेजसा तस्य हीनस्य पुरुषार्थो न विद्यते ॥ २५ ॥
मूलम्
यं विषादोऽभिभवति विक्रमे समुपस्थिते।
तेजसा तस्य हीनस्य पुरुषार्थो न विद्यते ॥ २५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
पराक्रमका अवसर उपस्थित होनेपर जिसे विषाद घेर लेता है, उस तेजोहीन पुरुषका कोई पुरुषार्थ सिद्ध नहीं होता॥२५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अवश्यं क्रियमाणस्य कर्मणो दृश्यते फलम्।
न हि निर्वेदमागम्य किंचित् प्राप्नोति शोभनम् ॥ २६ ॥
मूलम्
अवश्यं क्रियमाणस्य कर्मणो दृश्यते फलम्।
न हि निर्वेदमागम्य किंचित् प्राप्नोति शोभनम् ॥ २६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
किये जानेवाले कर्मका फल अवश्य दृष्टिगोचर होता है। केवल खिन्न होकर बैठ रहनेसे कोई अच्छा परिणाम हाथ नहीं लगता॥२६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अथाप्युपायं पश्येत दुःखस्य परिमोक्षणे।
अशोचन्नारभेतैवं मुक्तश्चाव्यसनी भवेत् ॥ २७ ॥
मूलम्
अथाप्युपायं पश्येत दुःखस्य परिमोक्षणे।
अशोचन्नारभेतैवं मुक्तश्चाव्यसनी भवेत् ॥ २७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
अतः दुःखसे छूटनेके उपायको अवश्य देखे। शोक और विषादमें न पड़कर आवश्यक कार्य आरम्भ कर दे। इस प्रकार प्रयत्न करनेसे मनुष्य निश्चय ही दुःखसे छूट जाता है और फिर किसी संकट या व्यसनमें नहीं फँसता॥२७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
भूतेष्वभावं संचिन्त्य ये तु बुद्धेः परं गताः।
न शोचन्ति कृतप्रज्ञाः पश्यन्तः परमां गतिम् ॥ २८ ॥
मूलम्
भूतेष्वभावं संचिन्त्य ये तु बुद्धेः परं गताः।
न शोचन्ति कृतप्रज्ञाः पश्यन्तः परमां गतिम् ॥ २८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
संसारके सभी पदार्थ अनित्य हैं, ऐसा सोचकर जो बुद्धिसे पार होकर परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो गये हैं वे ज्ञानी महापुरुष परमात्माका साक्षात्कार करते हुए कभी शोकमें नहीं पड़ते॥२८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
न शोचामि च वै विद्वन् कालाकाङ्क्षी स्थितो ह्यहम्।
एतैर्निदर्शनैर्ब्रह्मन् नावसीदामि सत्तम ॥ २९ ॥
मूलम्
न शोचामि च वै विद्वन् कालाकाङ्क्षी स्थितो ह्यहम्।
एतैर्निदर्शनैर्ब्रह्मन् नावसीदामि सत्तम ॥ २९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
विद्वन्! मैं अन्तकालकी प्रतीक्षा करता हूँ। अतः कभी शोकमग्न नहीं होता। सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण! उपर्युक्त विचारोंका मनन करते रहनेसे मुझे कभी दुःख या अनुत्साह नहीं होता॥२९॥
मूलम् (वचनम्)
ब्राह्मण उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
कृतप्रज्ञोऽसि मेधावी बुद्धिर्हि विपुला तव।
नाहं भवन्तं शोचामि ज्ञानतृप्तोऽसि धर्मवित् ॥ ३० ॥
मूलम्
कृतप्रज्ञोऽसि मेधावी बुद्धिर्हि विपुला तव।
नाहं भवन्तं शोचामि ज्ञानतृप्तोऽसि धर्मवित् ॥ ३० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
ब्राह्मण बोला— धर्मव्याध! आप ज्ञानी और बुद्धिमान् हैं। आपकी बुद्धि विशाल है। आप धर्मके तत्त्वको जानते हैं और ज्ञानानन्दसे तृप्त रहते हैं। अतः मैं आपके लिये शोक नहीं करता॥३०॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
आपृच्छे त्वां स्वस्ति तेऽस्तु धर्मस्त्वां परिरक्षतु।
अप्रमादस्तु कर्तव्यो धर्मे धर्मभृतां वर ॥ ३१ ॥
मूलम्
आपृच्छे त्वां स्वस्ति तेऽस्तु धर्मस्त्वां परिरक्षतु।
अप्रमादस्तु कर्तव्यो धर्मे धर्मभृतां वर ॥ ३१ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
अब मैं जानेके लिये आपकी अनुमति चाहता हूँ। आपका कल्याण हो और धर्म सदा आपकी रक्षा करे। धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ व्याध! आप धर्माचरणमें कभी प्रमाद न करें॥३१॥
मूलम् (वचनम्)
मार्कण्डेय उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
बाढमित्येव तं व्याधः कृताञ्जलिरुवाच ह।
प्रदक्षिणमथो कृत्वा प्रस्थितो द्विजसत्तमः ॥ ३२ ॥
मूलम्
बाढमित्येव तं व्याधः कृताञ्जलिरुवाच ह।
प्रदक्षिणमथो कृत्वा प्रस्थितो द्विजसत्तमः ॥ ३२ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
मार्कण्डेयजी कहते हैं— युधिष्ठिर! कौशिक ब्राह्मणकी बात सुनकर धर्मव्याधने हाथ जोड़कर कहा—‘बहुत अच्छा! अब आप अपने घरको पधारें।’ तदनन्तर विप्रवर कौशिक धर्मव्याधकी परिक्रमा करके वहाँसे चल दिया॥३२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
स तु गत्वा द्विजः सर्वां शुश्रूषां कृतवांस्तदा।
मातापितृभ्यां वृद्धाभ्यां यथान्यायं सुशंसितः ॥ ३३ ॥
मूलम्
स तु गत्वा द्विजः सर्वां शुश्रूषां कृतवांस्तदा।
मातापितृभ्यां वृद्धाभ्यां यथान्यायं सुशंसितः ॥ ३३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
घर जाकर उस ब्राह्मणने अपने माता-पिताकी सब प्रकारकी सेवा-शुश्रूषा की और उन बूढ़े माता-पिताने प्रसन्न होकर उसकी यथायोग्य प्रशंसा की॥३३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
एतत् ते सर्वमाख्यातं निखिलेन युधिष्ठिर।
पृष्टवानसि यं तात धर्मं धर्मभृतां वर ॥ ३४ ॥
मूलम्
एतत् ते सर्वमाख्यातं निखिलेन युधिष्ठिर।
पृष्टवानसि यं तात धर्मं धर्मभृतां वर ॥ ३४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ तात युधिष्ठिर! तुमने जो प्रश्न किया था, उसके अनुसार मैंने ये सब बातें कह सुनायीं॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
पतिव्रताया माहात्म्यं ब्राह्मणस्य च सत्तम।
मातापित्रोश्च शुश्रूषा धर्मव्याधेन कीर्तिता ॥ ३५ ॥
मूलम्
पतिव्रताया माहात्म्यं ब्राह्मणस्य च सत्तम।
मातापित्रोश्च शुश्रूषा धर्मव्याधेन कीर्तिता ॥ ३५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
साधुश्रेष्ठ! पतिव्रताका माहात्म्य और धर्मव्याधके द्वारा ब्राह्मणसे कही हुई माता-पिताकी सेवा आदिकी बातें बता दीं॥३५॥
मूलम् (वचनम्)
युधिष्ठिर उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
अत्यद्भुतमिदं ब्रह्मन् धर्माख्यानमनुत्तमम् ।
सर्वधर्मविदां श्रेष्ठ कथितं मुनिसत्तम ॥ ३६ ॥
मूलम्
अत्यद्भुतमिदं ब्रह्मन् धर्माख्यानमनुत्तमम् ।
सर्वधर्मविदां श्रेष्ठ कथितं मुनिसत्तम ॥ ३६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
युधिष्ठिर बोले— ब्रह्मन्! आपने धर्मके विषयमें यह अत्यन्त अद्भुत और उत्तम उपाख्यान सुनाया है। मुनिवर! आप समस्त धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ हैं॥३६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
सुखश्रव्यतया विद्वन् मुहूर्त इव मे गतः।
न हि तृप्तोऽस्मि भगवन् शृण्वानो धर्ममुत्तमम् ॥ ३७ ॥
मूलम्
सुखश्रव्यतया विद्वन् मुहूर्त इव मे गतः।
न हि तृप्तोऽस्मि भगवन् शृण्वानो धर्ममुत्तमम् ॥ ३७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
विद्वन! यह कथा सुननेमें इतनी सुखद थी कि मेरा बहुत-सा समय भी दो घड़ीके समान बीत गया। भगवन्! आपके मुखसे यह धर्मकी उत्तम कथा सुनते-सुनते मुझे तृप्ति ही नहीं हो रही है॥३७॥
मूलम् (समाप्तिः)
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि ब्राह्मणव्याधसंवादे षोडशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१६ ॥
मूलम् (वचनम्)
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें ब्राह्मण-व्याधसंवादविषयक दो सौ सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥२१६॥