भागसूचना
चतुर्दशाधिकद्विशततमोऽध्यायः
सूचना (हिन्दी)
माता-पिताकी सेवाका दिग्दर्शन
मूलम् (वचनम्)
मार्कण्डेय उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
एवं संकथिते कृत्स्ने मोक्षधर्मे युधिष्ठिर।
दृढप्रीतमना विप्रो धर्मव्याधमुवाच ह ॥ १ ॥
मूलम्
एवं संकथिते कृत्स्ने मोक्षधर्मे युधिष्ठिर।
दृढप्रीतमना विप्रो धर्मव्याधमुवाच ह ॥ १ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
मार्कण्डेयजी कहते हैं— युधिष्ठिर! धर्मव्याधने जब इस प्रकार पूर्णरूपसे मोक्ष-धर्मका वर्णन किया, तब कौशिक ब्राह्मण अत्यन्त प्रसन्न होकर उससे यों बोला॥१॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
न्याययुक्तमिदं सर्वं भवता परिकीर्तितम्।
न तेऽस्त्यविदितं किंचिद् धर्मेष्विह हि दृश्यते ॥ २ ॥
मूलम्
न्याययुक्तमिदं सर्वं भवता परिकीर्तितम्।
न तेऽस्त्यविदितं किंचिद् धर्मेष्विह हि दृश्यते ॥ २ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘तात! तुमने मुझसे जो कुछ कहा, यह सब न्याययुक्त है। मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि यहाँ धर्मके विषयमें कोई ऐसी बात नहीं दिखायी देती जो तुम्हें ज्ञात न हो’॥२॥
मूलम् (वचनम्)
व्याध उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
प्रत्यक्षं मम यो धर्मस्तं च पश्य द्विजोत्तम।
येन सिद्धिरियं प्राप्ता मया ब्राह्मणपुङ्गव ॥ ३ ॥
मूलम्
प्रत्यक्षं मम यो धर्मस्तं च पश्य द्विजोत्तम।
येन सिद्धिरियं प्राप्ता मया ब्राह्मणपुङ्गव ॥ ३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
धर्मव्याधने कहा— विप्रवर! अब मेरा जो प्रत्यक्ष धर्म है, जिसके प्रभावसे मुझे यह सिद्धि प्राप्त हुई है, ब्राह्मणश्रेष्ठ! उसका भी दर्शन कर लीजिये॥३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
उत्तिष्ठ भगवन् क्षिप्रं प्रविश्याभ्यन्तरं गृहम्।
द्रष्टुमर्हसि धर्मज्ञ मातरं पितरं च मे ॥ ४ ॥
मूलम्
उत्तिष्ठ भगवन् क्षिप्रं प्रविश्याभ्यन्तरं गृहम्।
द्रष्टुमर्हसि धर्मज्ञ मातरं पितरं च मे ॥ ४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
भगवन्! आप धर्मके ज्ञाता हैं, उठिये और शीघ्र घरके भीतर चलकर मेरे माता-पिताका दर्शन कीजिये॥४॥
मूलम् (वचनम्)
मार्कण्डेय उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
इत्युक्तः स प्रविश्याथ ददर्श परमार्चितम्।
सौधं हृद्यं चतुःशालमतीव च मनोरमम् ॥ ५ ॥
देवतागृहसंकाशं दैवतैश्च सुपूजितम् ।
शयनासनसम्बाधं गन्धैश्च परमैर्युतम् ॥ ६ ॥
मूलम्
इत्युक्तः स प्रविश्याथ ददर्श परमार्चितम्।
सौधं हृद्यं चतुःशालमतीव च मनोरमम् ॥ ५ ॥
देवतागृहसंकाशं दैवतैश्च सुपूजितम् ।
शयनासनसम्बाधं गन्धैश्च परमैर्युतम् ॥ ६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
मार्कण्डेयजी कहते हैं— धर्मव्याधके ऐसा कहनेपर कौशिक ब्राह्मणने भीतर प्रवेश करके देखा—एक बहुत सुन्दर साफ-सुथरा घर था, उसकी दीवारोंपर चूनेसे सफेदी की हुई थी। उसमें चार कमरे थे, वह भवन बहुत प्रिय और मनको लुभा लेनेवाला था, ऐसा जान पड़ता था, मानो देवताओंका निवासस्थान हो। देवता भी उसका आदर करते थे। एक ओर सोनेके लिये शय्या बिछी थी और दूसरी ओर बैठनेके लिये आसन रखे गये थे। वहाँ धूप और चन्दन, केसर आदिकी उत्तम गन्ध फैल रही थी॥५-६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तत्र शुक्लाम्बरधरौ पितरावस्य पूजितौ।
कृताहारौ तु संतुष्टावुपविष्टौ वरासने।
धर्मव्याधस्तु तौ दृष्ट्वा पादेषु शिरसापतत् ॥ ७ ॥
मूलम्
तत्र शुक्लाम्बरधरौ पितरावस्य पूजितौ।
कृताहारौ तु संतुष्टावुपविष्टौ वरासने।
धर्मव्याधस्तु तौ दृष्ट्वा पादेषु शिरसापतत् ॥ ७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
एक सुन्दर आसनपर धर्मव्याधके माता-पिता भोजन करके संतुष्ट हो बैठे हुए थे। उस दोनोंके शरीरपर श्वेत वस्त्र शोभा पा रहे थे और पुष्प, चन्दन आदिसे उनकी पूजा की गयी थी। धर्मव्याधने उन दोनोंको देखते ही चरणोंमें मस्तक रख दिया और पृथ्वीपर पड़कर साष्टांग प्रणाम किया॥७॥
मूलम् (वचनम्)
वृद्धावूचतुः
विश्वास-प्रस्तुतिः
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ धर्मज्ञ धर्मस्त्वामभिरक्षतु ।
प्रीतौ स्वस्तव शौचेन दीर्घमायुरवाप्नुहि ॥ ८ ॥
मूलम्
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ धर्मज्ञ धर्मस्त्वामभिरक्षतु ।
प्रीतौ स्वस्तव शौचेन दीर्घमायुरवाप्नुहि ॥ ८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
तब बूढ़े माता-पिताने (स्नेहपूर्वक) कहा— बेटा! उठो! उठो! तुम धर्मके जानकार हो, धर्म तुम्हारी सब ओरसे रक्षा करे। हम दोनों तुम्हारे शुद्ध आचार-विचार तथा सेवासे बहुत प्रसन्न हैं। तुम्हारी आयु बड़ी हो॥८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
गतिमिष्टां तपो ज्ञानं मेधां च परमां गतः।
सत्पुत्रेण त्वया पुत्र नित्यं काले सुपूजितौ ॥ ९ ॥
मूलम्
गतिमिष्टां तपो ज्ञानं मेधां च परमां गतः।
सत्पुत्रेण त्वया पुत्र नित्यं काले सुपूजितौ ॥ ९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
तुमने उत्तम गति, तप, ज्ञान और श्रेष्ठ बुद्धि प्राप्त की है, बेटा! तुम सुपुत्र हो। तुमने नित्य नियमपूर्वक समयानुसार हमारा पूजन—आदर-सत्कार किया है॥९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
(सुखमावां वसावोऽत्र देवलोकगताविव)
न तेऽन्यद् दैवतं किंचिद् दैवतेष्वपि वर्तते।
प्रयतत्वाद् द्विजातीनां दमेनासि समन्वितः ॥ १० ॥
मूलम्
(सुखमावां वसावोऽत्र देवलोकगताविव)
न तेऽन्यद् दैवतं किंचिद् दैवतेष्वपि वर्तते।
प्रयतत्वाद् द्विजातीनां दमेनासि समन्वितः ॥ १० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
हम इस घरमें इस प्रकार सुखसे रहते हैं मानो देवलोकमें पहुँच गये हों। देवताओंमें भी तुम्हारे लिये हम दोनोंके सिवा और कोई देवता नहीं है। तुम हमें ही देवता मानते हो। अपने मनको पवित्र एवं संयममें रखनेके कारण तुम द्विजोचित शम-दमसे सम्पन्न हो॥१०॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
पितुः पितामहा ये च तथैव प्रपितामहाः।
प्रीतास्ते सततं पुत्र दमेनावां च पूजया ॥ ११ ॥
मूलम्
पितुः पितामहा ये च तथैव प्रपितामहाः।
प्रीतास्ते सततं पुत्र दमेनावां च पूजया ॥ ११ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
वत्स! मेरे पिताके पितामह और प्रपितामह आदि सभी तुम्हारे इन्द्रियसंयमसे सदा प्रसन्न रहते हैं। हम दोनों भी तुम्हारे द्वारा की हुई पूजा-सेवासे बहुत संतुष्ट हैं॥११॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
मनसा कर्मणा वाचा शुश्रूषा नैव हीयते।
न चान्या हि तथा बुद्धिर्दृश्यते साम्प्रतं तव ॥ १२ ॥
मूलम्
मनसा कर्मणा वाचा शुश्रूषा नैव हीयते।
न चान्या हि तथा बुद्धिर्दृश्यते साम्प्रतं तव ॥ १२ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
तुम मन, वाणी और क्रियाद्वारा कभी हम दोनोंकी सेवा नहीं छोड़ते। इस समय भी तुम्हारा विचार इसके प्रतिकूल नहीं दिखायी देता॥१२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
जामदग्न्येन रामेण यथा वृद्धौ सुपूजितौ।
तथा त्वया कृतं सर्वं तद्विशिष्टं च पुत्रक ॥ १३ ॥
मूलम्
जामदग्न्येन रामेण यथा वृद्धौ सुपूजितौ।
तथा त्वया कृतं सर्वं तद्विशिष्टं च पुत्रक ॥ १३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
बेटा! जमदग्निनन्दन परशुरामने जिस प्रकार अपने वृद्ध माता-पिताकी सेवा-पूजा की थी, उसी प्रकार तथा उससे भी बढ़कर तुमने हमारी सब सेवाएँ की हैं॥१३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
ततस्तं ब्राह्मणं ताभ्यां धर्मव्याधो न्यवेदयत्।
तौ स्वागतेन तं विप्रमर्चयामासतुस्तदा ॥ १४ ॥
मूलम्
ततस्तं ब्राह्मणं ताभ्यां धर्मव्याधो न्यवेदयत्।
तौ स्वागतेन तं विप्रमर्चयामासतुस्तदा ॥ १४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
तदनन्तर धर्मव्याधने अपने माता-पिताको उस कौशिक ब्राह्मणका परिचय दिया। तब उन दोनोंने भी स्वागतपूर्वक ब्राह्मणका पूजन किया॥१४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
प्रतिपूज्य च तां पूजां द्विजः पप्रच्छ तावुभौ।
सुपुत्राभ्यां सभृत्याभ्यां कच्चिद् वां कुशलं गृहे ॥ १५ ॥
अनामयं च वां कच्चित् सदैवेह शरीरयोः।
मूलम्
प्रतिपूज्य च तां पूजां द्विजः पप्रच्छ तावुभौ।
सुपुत्राभ्यां सभृत्याभ्यां कच्चिद् वां कुशलं गृहे ॥ १५ ॥
अनामयं च वां कच्चित् सदैवेह शरीरयोः।
अनुवाद (हिन्दी)
ब्राह्मणने उनके द्वारा की हुई पूजाको स्वीकार करके कृतज्ञता प्रकट की और उनसे पूछा—‘आप दोनों इस घरमें अपने सुयोग्य पुत्र तथा सेवकोंके साथ सकुशल तो हैं न? आप दोनों शरीरसे भी सदा नीरोग रहते हैं न?’॥१५॥
मूलम् (वचनम्)
वृद्धावूचतुः
विश्वास-प्रस्तुतिः
कुशलं नौ गृहे विप्र भृत्यवर्गे च सर्वशः।
कच्चित् त्वमप्यविघ्नेन सम्प्राप्तो भगवन्निति ॥ १६ ॥
मूलम्
कुशलं नौ गृहे विप्र भृत्यवर्गे च सर्वशः।
कच्चित् त्वमप्यविघ्नेन सम्प्राप्तो भगवन्निति ॥ १६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
उन वृद्धोंने उत्तर दिया— ब्रह्मन्! इस घरमें हम दोनों सकुशल हैं। हमारे सेवक तथा कुटुम्बके लोग भी कुशलसे हैं। भगवन्! अपना समाचार कहें, आप यहाँ सकुशल पहुँच गये न? किसी विघ्न-बाधाका सामना तो नहीं करना पड़ा?॥१६॥
मूलम् (वचनम्)
मार्कण्डेय उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
बाढमित्येव तौ विप्रः प्रत्युवाच मुदान्वितः।
धर्मव्याधो निरीक्ष्याथ ततस्तं वाक्यमब्रवीत् ॥ १७ ॥
मूलम्
बाढमित्येव तौ विप्रः प्रत्युवाच मुदान्वितः।
धर्मव्याधो निरीक्ष्याथ ततस्तं वाक्यमब्रवीत् ॥ १७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
मार्कण्डेयजी कहते हैं— राजन्! तब कौशिक ब्राह्मणने उन्हें प्रसन्नतापूर्वक उत्तर दिया—‘हाँ, मुझे कोई कष्ट नहीं हुआ।’ तदनन्तर धर्मव्याधने अपने पिता-माताकी ओर देखते हुए कौशिक ब्राह्मणसे कहा॥१७॥
मूलम् (वचनम्)
व्याध उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
पिता माता च भगवन्नेतौ मद्दैवतं परम्।
यद् दैवतेभ्यः कर्तव्यं तदेताभ्यां करोम्यहम् ॥ १८ ॥
मूलम्
पिता माता च भगवन्नेतौ मद्दैवतं परम्।
यद् दैवतेभ्यः कर्तव्यं तदेताभ्यां करोम्यहम् ॥ १८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
धर्मव्याध बोला— भगवन्! ये माता-पिता ही मेरे प्रधान देवता हैं। जो कुछ देवताओंके लिये करना चाहिये, वह मैं इन्हीं दोनोंके लिये करता हूँ॥१८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
त्रयस्त्रिंशद् यथा देवाः सर्वे शक्रपुरोगमाः।
सम्पूज्याः सर्वलोकस्य तथा वृद्धाविमौ मम ॥ १९ ॥
मूलम्
त्रयस्त्रिंशद् यथा देवाः सर्वे शक्रपुरोगमाः।
सम्पूज्याः सर्वलोकस्य तथा वृद्धाविमौ मम ॥ १९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
जैसे समस्त संसारके लिये इन्द्र आदि तैंतीस1 देवता पूजनीय हैं, उसी प्रकार मेरे लिये ये दोनों बूढ़े माता-पिता ही आराधनीय हैं॥१९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
उपाहारानाहरन्तो देवतानां यथा द्विजाः।
कुर्वन्ति तद्वदेताभ्यां करोम्यहमतन्द्रितः ॥ २० ॥
मूलम्
उपाहारानाहरन्तो देवतानां यथा द्विजाः।
कुर्वन्ति तद्वदेताभ्यां करोम्यहमतन्द्रितः ॥ २० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
द्विजलोग देवताओंके लिये जैसे नाना प्रकारके उपहार समर्पण करते हैं, उसी प्रकार मैं इनके लिये करता हूँ। इनकी सेवामें मुझे आलस्य नहीं होता॥२०॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
एतौ मे परमं ब्रह्मन् पिता माता च दैवतम्।
एतौ पुष्पैः फलै रत्नैस्तोषयामि सदा द्विज ॥ २१ ॥
मूलम्
एतौ मे परमं ब्रह्मन् पिता माता च दैवतम्।
एतौ पुष्पैः फलै रत्नैस्तोषयामि सदा द्विज ॥ २१ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
ब्रह्मन्! ये माता-पिता ही मेरे सर्वश्रेष्ठ देवता हैं। मैं सदा फूल, फल तथा रत्नोंसे इन्हींको संतुष्ट करता हूँ॥२१॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
एतावेवाग्नयो मह्यं यान् वदन्ति मनीषिणः।
यज्ञा वेदाश्च चत्वारः सर्वमेतौ मम द्विज ॥ २२ ॥
मूलम्
एतावेवाग्नयो मह्यं यान् वदन्ति मनीषिणः।
यज्ञा वेदाश्च चत्वारः सर्वमेतौ मम द्विज ॥ २२ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
विप्रवर! जिन्हें विद्वान् लोग ‘अग्नि’ कहते हैं, वे मेरे लिये ये ही हैं। चारों वेद और यज्ञ सब कुछ मेरे लिये ये माता-पिता ही हैं॥२२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
एतदर्थं मम प्राणा भार्या पुत्रः सुहृज्जनः।
सपुत्रदारः शुश्रूषां नित्यमेव करोम्यहम् ॥ २३ ॥
मूलम्
एतदर्थं मम प्राणा भार्या पुत्रः सुहृज्जनः।
सपुत्रदारः शुश्रूषां नित्यमेव करोम्यहम् ॥ २३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
मेरे प्राण, स्त्री, पुत्र, और सुहृद् सब इन्हींकी सेवाके लिये हैं। मैं स्त्री और पुत्रोंके साथ प्रतिदिन इन्हींकी शुश्रूषामें लगा रहता हूँ॥२३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
स्वयं च स्नापयाम्येतौ तथा पादौ प्रधावये।
आहारं च प्रयच्छामि स्वयं च द्विजसत्तम ॥ २४ ॥
मूलम्
स्वयं च स्नापयाम्येतौ तथा पादौ प्रधावये।
आहारं च प्रयच्छामि स्वयं च द्विजसत्तम ॥ २४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
द्विजश्रेष्ठ! मैं स्वयं ही इन्हें नहलाता हूँ, इनके चरण धोता हूँ और स्वयं ही भोजन परोसकर इन्हें जिमाता हूँ॥२४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अनुकूलं तथा वच्मि विप्रियं परिवर्जये।
अधर्मेणापि संयुक्तं प्रियमाभ्यां करोम्यहम् ॥ २५ ॥
मूलम्
अनुकूलं तथा वच्मि विप्रियं परिवर्जये।
अधर्मेणापि संयुक्तं प्रियमाभ्यां करोम्यहम् ॥ २५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
मैं वही बात बोलता हूँ, जो इनके मनके अनुकूल हो, जो इन्हें प्रिय न लगे, ऐसी बात मुँहसे कभी नहीं निकालता। इनको पसंद हो, तो मैं अधर्मयुक्त कार्य भी कर सकता हूँ॥२५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
धर्ममेव गुरुं ज्ञात्वा करोमि द्विजसत्तम।
अतन्द्रितः सदा विप्र शुश्रूषां वै करोम्यहम् ॥ २६ ॥
मूलम्
धर्ममेव गुरुं ज्ञात्वा करोमि द्विजसत्तम।
अतन्द्रितः सदा विप्र शुश्रूषां वै करोम्यहम् ॥ २६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
विप्रवर! इस प्रकार माता-पिताकी सेवारूप धर्मको ही महान् मानकर मैं उसका पालन करता हूँ। ब्रह्मन्! आलस्य छोड़कर मैं सदा इन्हीं दोनोंकी सेवामें लगा रहता हूँ॥२६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
पञ्चैव गुरवो ब्रह्मन् पुरुषस्य बुभूषतः।
पिता माताग्निरात्मा च गुरुश्च द्विजसत्तम ॥ २७ ॥
मूलम्
पञ्चैव गुरवो ब्रह्मन् पुरुषस्य बुभूषतः।
पिता माताग्निरात्मा च गुरुश्च द्विजसत्तम ॥ २७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
ब्राह्मणश्रेष्ठ! उन्नति चाहनेवाले पुरुषके पाँच ही गुरु हैं—पिता, माता, अग्नि, परमात्मा तथा गुरु॥२७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
एतेषु यस्तु वर्तेत सम्यगेव द्विजोत्तम।
भवेयुरग्नयस्तस्य परिचीर्णास्तु नित्यशः ।
गार्हस्थ्ये वर्तमानस्य एष धर्मः सनातनः ॥ २८ ॥
मूलम्
एतेषु यस्तु वर्तेत सम्यगेव द्विजोत्तम।
भवेयुरग्नयस्तस्य परिचीर्णास्तु नित्यशः ।
गार्हस्थ्ये वर्तमानस्य एष धर्मः सनातनः ॥ २८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
द्विजश्रेष्ठ! जो इन सबके प्रति उत्तम बर्ताव करेगा, उस गृहस्थ-धर्मका पालन करनेवालेके द्वारा सदा सब अग्नियोंकी सेवा सम्पन्न होती रहेगी। यही सनातन धर्म है॥२८॥
मूलम् (समाप्तिः)
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि ब्राह्मणव्याधसंवादे चतुर्दशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१४ ॥
मूलम् (वचनम्)
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें ब्राह्मण-व्याध-संवादविषयक दो सौ चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥२१४॥
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आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, इन्द्र और प्रजापति—ये तैंतीस देवता हैं। ↩︎