भागसूचना
त्रयोदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः
सूचना (हिन्दी)
प्राणवायुकी स्थितिका वर्णन तथा परमात्म-साक्षात्कारके उपाय
मूलम् (वचनम्)
ब्राह्मण उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
पार्थिवं धातुमासाद्य शारीरोऽग्निः कथं भवेत्।
अवकाशविशेषेण कथं वर्तयतेऽनिलः ॥ १ ॥
मूलम्
पार्थिवं धातुमासाद्य शारीरोऽग्निः कथं भवेत्।
अवकाशविशेषेण कथं वर्तयतेऽनिलः ॥ १ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
ब्राह्मणने पूछा— व्याध! शरीरमें रहनेवाला अग्निस्वरूप प्राण पार्थिव धातुका अवलम्बन करके कैसे रहता है? और प्राणवायु नाड़ियोंके मार्गविशेषके द्वारा किस प्रकार (रस-रक्तादिका) संचालन करता है?॥१॥
मूलम् (वचनम्)
मार्कण्डेय उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
प्रश्नमेतं समुद्दिष्टं ब्राह्मणेन युधिष्ठिर।
व्याधस्तु कथयामास ब्राह्मणाय महात्मने ॥ २ ॥
मूलम्
प्रश्नमेतं समुद्दिष्टं ब्राह्मणेन युधिष्ठिर।
व्याधस्तु कथयामास ब्राह्मणाय महात्मने ॥ २ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
मार्कण्डेयजी कहते हैं— युधिष्ठिर! ब्राह्मणके द्वारा उपस्थित किये गये इस प्रश्नको सुनकर धर्मव्याधने उन महामना ब्राह्मणसे इस प्रकार कहा—॥२॥
मूलम् (वचनम्)
व्याध उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
मूर्धानमाश्रितो वह्निः शरीरं परिपालयन्।
प्राणो मूर्धनि चाग्नौ च वर्तमानो विचेष्टते ॥ ३ ॥
मूलम्
मूर्धानमाश्रितो वह्निः शरीरं परिपालयन्।
प्राणो मूर्धनि चाग्नौ च वर्तमानो विचेष्टते ॥ ३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
धर्मव्याध बोला— ब्रह्मन्! प्राणीके शरीरको सुरक्षित रखता हुआ अग्निस्वरूप उदान वायु मस्तकका आश्रय लेकर शरीरमें रहता है एवं मुख्य प्राण मस्तक और उदानवायु—इन दोनोंमें स्थित हुआ समस्त शरीरमें जीवनका संचार करता है1॥३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
भूतं भव्यं भविष्यं च सर्वं प्राणे प्रतिष्ठितम्।
श्रेष्ठं तदेव भूतानां ब्रह्मयोनिमुपास्महे ॥ ४ ॥
मूलम्
भूतं भव्यं भविष्यं च सर्वं प्राणे प्रतिष्ठितम्।
श्रेष्ठं तदेव भूतानां ब्रह्मयोनिमुपास्महे ॥ ४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
भूत, वर्तमान और भविष्य—सब कुछ प्राणके ही आश्रित है, वह प्राण ही समस्त भूतोंमें श्रेष्ठ है।2 अतः परब्रह्मसे उत्पन्न होनेवाले प्राणकी हम सब उपासना करते हैं3॥४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
स जन्तुः सर्वभूतात्मा पुरुषः स सनातनः।
महान् बुद्धिरहङ्कारो भूतानां विषयश्च सः ॥ ५ ॥
मूलम्
स जन्तुः सर्वभूतात्मा पुरुषः स सनातनः।
महान् बुद्धिरहङ्कारो भूतानां विषयश्च सः ॥ ५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
वह प्राण ही जीव है, वही समस्त प्राणियोंका आत्मा है, वही सनातन पुरुष है, महत्तत्त्व, बुद्धि और अहंकार तथा पाँचों भूतोंके कार्यरूप इन्द्रियाँ और उनके विषय सब कुछ वही है (क्योंकि इस शरीरमें सबकी स्थिति उसीके आश्रित है और भविष्यमें मिलनेवाले शरीरमें जाना-आना भी इसीके आश्रित रहकर होता है। इसलिये यह प्राणकी स्तुति की गयी है)4॥५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
(अव्यक्तं सत्त्वसंज्ञं च जीवः कालः स चैव हि।
प्रकृतिः पुरुषश्चैव प्राण एव द्विजोत्तम॥
जागर्ति स्वप्नकाले च स्वप्ने स्वप्नायते च सः।
मूलम्
(अव्यक्तं सत्त्वसंज्ञं च जीवः कालः स चैव हि।
प्रकृतिः पुरुषश्चैव प्राण एव द्विजोत्तम॥
जागर्ति स्वप्नकाले च स्वप्ने स्वप्नायते च सः।
अनुवाद (हिन्दी)
द्विजश्रेष्ठ! प्राण ही अव्यक्त, सत्त्व, जीव, काल, प्रकृति और पुरुष है। वही जाग्रत्-अवस्थामें जागता है। वही स्वप्नकालमें स्वप्न-जगत्का निर्माण करके स्वप्नावस्थाकी सारी चेष्टाएँ करता है॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
जाग्रत्सु बलमाधत्ते चेष्टत्सु चेष्टयत्यपि॥
तस्मिन् निरुद्धे विप्रेन्द्र मृत इत्यभिधीयते।
त्यक्त्वा शरीरं भूतात्मा पुनरन्यत् प्रपद्यते॥)
मूलम्
जाग्रत्सु बलमाधत्ते चेष्टत्सु चेष्टयत्यपि॥
तस्मिन् निरुद्धे विप्रेन्द्र मृत इत्यभिधीयते।
त्यक्त्वा शरीरं भूतात्मा पुनरन्यत् प्रपद्यते॥)
अनुवाद (हिन्दी)
वही जाग्रत्कालमें बलका आधान करता है और चेष्टाशील प्राणियोंमें चेष्टा उत्पन्न करता है। विप्रवर! उस प्राणका निरोध हो जानेपर ही प्रत्येक जीव मरा हुआ कहलाता है। भूतात्मा प्राण एक शरीरको छोड़कर फिर दूसरे शरीरमें प्रविष्ट हो जाता है॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
एवं त्विह स सर्वत्र प्राणेन परिपाल्यते।
पृष्ठतस्तु समानेन स्वां स्वां गतिमुपाश्रितः ॥ ६ ॥
मूलम्
एवं त्विह स सर्वत्र प्राणेन परिपाल्यते।
पृष्ठतस्तु समानेन स्वां स्वां गतिमुपाश्रितः ॥ ६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
इस प्रकार इस जगत्में सर्वत्र प्राणकी स्थिति है। प्राणके द्वारा ही सबका पालन होता है। पीछे वही प्राण जब समानवायु भावको प्राप्त होता है तब अपनी-अपनी पृथक् गतिका आश्रय लेता है॥६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
बस्तिमूलं गुदं चैव पावकं समुपाश्रितः।
वहन् मूत्रं पूरीषं वाऽप्यपानः परिवर्तते ॥ ७ ॥
मूलम्
बस्तिमूलं गुदं चैव पावकं समुपाश्रितः।
वहन् मूत्रं पूरीषं वाऽप्यपानः परिवर्तते ॥ ७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
समानवायुके रूपमें जठराग्निका आश्रय ले वह प्राण जब मूत्राशय और गुदामें स्थित होता है, उस समय मल और मूत्रका भार वहन करनेके कारण वह अपानवायुके नामसे विख्यात हो संचरण करता है॥७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
प्रयत्ने कर्मणि बले स एष त्रिषु वर्तते।
उदानमिति तं प्राहुरध्यात्मविदुषो जनाः ॥ ८ ॥
मूलम्
प्रयत्ने कर्मणि बले स एष त्रिषु वर्तते।
उदानमिति तं प्राहुरध्यात्मविदुषो जनाः ॥ ८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
वही प्राण जब प्रयत्न (काम करनेकी चेष्टा), कर्म (उत्क्षेपण और गमन आदि) तथा बल (बोझ उठानेकी शक्ति)—इन तीन विषयोंमें प्रवृत्त होता है, तब अध्यात्मवेत्ता मनुष्य उसे उदान कहते हैं॥८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
संधौ संधौ संनिविष्टः सर्वेष्वपि तथानिलः।
शरीरेषु मनुष्याणां व्यान इत्युपदिश्यते ॥ ९ ॥
मूलम्
संधौ संधौ संनिविष्टः सर्वेष्वपि तथानिलः।
शरीरेषु मनुष्याणां व्यान इत्युपदिश्यते ॥ ९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
वही जब मनुष्य-शरीरके प्रत्येक संधिस्थलमें व्याप्त होकर रहता है, तब उसे व्यान कहते हैं॥९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
धातुष्वग्निस्तु विततः स तु वायुसमीरितः।
रसान् धातूंश्च दोषांश्च वर्तयन् परिधावति ॥ १० ॥
मूलम्
धातुष्वग्निस्तु विततः स तु वायुसमीरितः।
रसान् धातूंश्च दोषांश्च वर्तयन् परिधावति ॥ १० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
त्वचा आदि सब धातुओंमें जठरानल व्याप्त है। वह प्राण आदि वायुओंसे प्रेरित होकर अन्न आदि रसों, त्वचा आदि धातुओं तथा पित्त आदि दोषोंको परिपक्व करता हुआ समूचे शरीरमें दौड़ा करता है॥१०॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
प्राणानां संनिपातात् तु संनिपातः प्रजायते।
ऊष्मा चाग्निरिति ज्ञेयो योऽन्नं पचति देहिनाम् ॥ ११ ॥
मूलम्
प्राणानां संनिपातात् तु संनिपातः प्रजायते।
ऊष्मा चाग्निरिति ज्ञेयो योऽन्नं पचति देहिनाम् ॥ ११ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
प्राण आदि वायुओंके परस्पर मिलनेसे एक संघर्ष उत्पन्न होता है, उससे प्रकट होनेवाले उत्तापको ही जठरानल समझना चाहिये। वही देहधारियोंके खाये हुए अन्नको पचाता है॥११॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
समानोदानयोर्मध्ये प्राणापानौ समाहितौ ।
समर्थितस्त्वधिष्ठानं सम्यक् पचति पावकः ॥ १२ ॥
मूलम्
समानोदानयोर्मध्ये प्राणापानौ समाहितौ ।
समर्थितस्त्वधिष्ठानं सम्यक् पचति पावकः ॥ १२ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
समान और उदान वायुओंके बीचमें प्राण और अपानवायुकी स्थिति है। उनके संघर्षसे उत्पन्न जठरानल अन्नको पचाता है और उसके रससे इस शरीरको भलीभाँति पुष्ट करता है[^*]॥१२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अस्यापि पायुपर्यन्तस्तथा स्याद् गुदसंज्ञितः।
स्रोतांसि तस्माज्जायन्ते सर्वप्राणेषु देहिनाम् ॥ १३ ॥
मूलम्
अस्यापि पायुपर्यन्तस्तथा स्याद् गुदसंज्ञितः।
स्रोतांसि तस्माज्जायन्ते सर्वप्राणेषु देहिनाम् ॥ १३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
इस जठरानलका स्थान नाभिसे लेकर पायुतक है। इसीको ‘गुदा’ कहते हैं। उस गुदासे देहधारियोंके समस्त प्राणोंमें स्रोत (नाडीमार्ग) प्रकट होते हैं॥१३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अग्निवेगवहः प्राणो गुदान्ते प्रतिहन्यते।
स ऊर्ध्वमागम्य पुनः समुत्क्षिपति पावकम् ॥ १४ ॥
मूलम्
अग्निवेगवहः प्राणो गुदान्ते प्रतिहन्यते।
स ऊर्ध्वमागम्य पुनः समुत्क्षिपति पावकम् ॥ १४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
गुदासे प्राण अग्निके वेगको लेकर गुदान्तमें टकराता है, फिर वहाँसे ऊपरको उठकर वह जठराग्निको भी ऊपर उठाता है॥१४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
पक्वाशयस्त्वधो नाभ्यामूर्ध्वमामाशयः स्थितः ।
नाभिमध्ये शरीरस्य प्राणाः सर्वे प्रतिष्ठिताः ॥ १५ ॥
मूलम्
पक्वाशयस्त्वधो नाभ्यामूर्ध्वमामाशयः स्थितः ।
नाभिमध्ये शरीरस्य प्राणाः सर्वे प्रतिष्ठिताः ॥ १५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
नाभिके नीचे पक्वाशय (पके हुए भोजनका स्थान) है और ऊपर आमाशय (कच्चे भोजनका स्थान) है। शरीरमें स्थित समस्त प्राण नाभिमें ही प्रतिष्ठित हैं—वही उनका केन्द्रस्थान है॥१५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
प्रवृत्ता हृदयात् सर्वे तिर्यगूर्ध्वमधस्तथा।
वहन्त्यन्नरसान् नाड्यो दशप्राणप्रचोदिताः ॥ १६ ॥
मूलम्
प्रवृत्ता हृदयात् सर्वे तिर्यगूर्ध्वमधस्तथा।
वहन्त्यन्नरसान् नाड्यो दशप्राणप्रचोदिताः ॥ १६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
नाड़ियाँ हृदयसे नीचे-ऊपर और इधर-उधर फैली हुई हैं। वे दस प्राणवायुओंसे प्रेरित हो शरीरके सब भागोंमें अन्नके रसोंको पहुँचाती रहती हैं॥१६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
योगिनामेष मार्गस्तु येन गच्छन्ति तत् परम्।
जितक्लमाः समा धीरा मूर्धन्यात्मानमादधुः।
एवं सर्वेषु विततौ प्राणापानौ हि देहिषु ॥ १७ ॥
मूलम्
योगिनामेष मार्गस्तु येन गच्छन्ति तत् परम्।
जितक्लमाः समा धीरा मूर्धन्यात्मानमादधुः।
एवं सर्वेषु विततौ प्राणापानौ हि देहिषु ॥ १७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
जिन्होंने समस्त क्लेशोंको जीत लिया है, जो समदर्शी और धीर हैं, जिन्होंने (सुषुम्णा नाड़ीके द्वारा) अपने प्राणमय आत्माको मस्तक (वर्ती सहस्रारचक्र)-में ले जाकर स्थापित किया है, उन योगियोंके लिये यह (मस्तकसे लेकर पायुतकका सुषुम्णामय) मार्ग है, जिससे वे उस परब्रह्म परमात्माको प्राप्त होते हैं। इस प्रकार समस्त जीवात्माओंके शरीरोंमें ये प्राणवायु और अपानवायु व्याप्त हैं॥१७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
(तावग्निसहितौ ब्रह्मन् विद्धि वै प्राणमात्मनि।)
एकादशविकारात्मा कलासम्भारसम्भृतः ।
मूर्तिमन्तं हि तं विद्धि नित्यं योगजितात्मकम् ॥ १८ ॥
मूलम्
(तावग्निसहितौ ब्रह्मन् विद्धि वै प्राणमात्मनि।)
एकादशविकारात्मा कलासम्भारसम्भृतः ।
मूर्तिमन्तं हि तं विद्धि नित्यं योगजितात्मकम् ॥ १८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
ब्रह्मन्! वे प्राण और अपान जठरानलके साथ रहते हैं। प्राणको आत्मामें स्थित जानिये। आत्मा एकादश इन्द्रियरूप विकारोंसे युक्त, षोडश[^*] कलाओंके समूहसे सम्पन्न, शरीरको धारण करनेवाला तथा नित्य है। उसने योगबलसे मन-बुद्धिको अपने अधीन कर रखा है। इस प्रकार आत्माके सम्बन्धमें आपको जानना चाहिये॥१८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तस्मिन् यः संस्थितो ह्यग्निर्नित्यं स्थाल्यामिवाहितः।
आत्मानं तं विजानीहि नित्यं योगजितात्मकम् ॥ १९ ॥
मूलम्
तस्मिन् यः संस्थितो ह्यग्निर्नित्यं स्थाल्यामिवाहितः।
आत्मानं तं विजानीहि नित्यं योगजितात्मकम् ॥ १९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
जैसे बटलोईमें आग रखी गयी हो, उसी प्रकार पूर्वोक्त कला-समूहरूप शरीरमें प्रकाशस्वरूप आत्मा सदा विद्यमान रहता है। आप उसे जानिये। वह नित्य तथा योगशक्तिसे मन-बुद्धिको अपने अधीन रखनेवाला है॥१९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
देवो यः संस्थितस्तस्मिन्नब्बिन्दुरिव पुष्करे।
क्षेत्रज्ञं तं विजानीहि नित्यं योगजितात्मकम् ॥ २० ॥
मूलम्
देवो यः संस्थितस्तस्मिन्नब्बिन्दुरिव पुष्करे।
क्षेत्रज्ञं तं विजानीहि नित्यं योगजितात्मकम् ॥ २० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
जैसे कमलके पत्तेपर पड़ी हुई जलकी बूँद निर्लिप्त होती है, उसी प्रकार ये आत्मदेव कलात्मक शरीरमें असंगभावसे स्थित हैं। वे ही क्षेत्रज्ञ हैं, आप उन्हें जानिये। वे योगसे अपने मन और बुद्धिपर अधिकार प्राप्त करनेवाले तथा नित्य हैं॥२०॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
जीवात्मकानि जानीहि रजः सत्त्वं तमस्तथा।
जीवमात्मगुणं विद्धि तथाऽऽत्मानं परात्मकम् ॥ २१ ॥
मूलम्
जीवात्मकानि जानीहि रजः सत्त्वं तमस्तथा।
जीवमात्मगुणं विद्धि तथाऽऽत्मानं परात्मकम् ॥ २१ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
ब्रह्मन्! आप यह जान लें कि सत्त्वगुण (प्रकाश), रजोगुण (प्रवृत्ति) और तमोगुण (मोह)—ये जीवात्मक हैं; अर्थात् जीवात्माके अन्तःकरणके विकार हैं, जीव आत्माका गुण (सेवक) है और आत्मा परमात्मस्वरूप है। भाव यह कि परमात्माको ही यहाँ आत्मा कहा गया है॥२१॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अचेतनं जीवगुणं वदन्ति
स चेष्टते चेष्टयते च सर्वम्।
ततः परं क्षेत्रविदो वदन्ति
प्राकल्पयद् यो भुवनानि सप्त ॥ २२ ॥
मूलम्
अचेतनं जीवगुणं वदन्ति
स चेष्टते चेष्टयते च सर्वम्।
ततः परं क्षेत्रविदो वदन्ति
प्राकल्पयद् यो भुवनानि सप्त ॥ २२ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
शरीर-तत्त्वके ज्ञाता महात्मा पुरुष जड शरीर आदिको जीवका भोग्य बताते हैं। वह जीव शरीरके भीतर रहकर स्वयं चेष्टाशील होता है तथा शरीर और इन्द्रिय आदि सबको चेष्टाओंमें लगाता है। जिन्होंने सातों भुवनोंका निर्माण किया है, उन परमात्माको ज्ञानी पुरुष जीवात्मासे उत्कृष्ट बताते हैं॥२२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
एवं सर्वेषु भूतेषु भूतात्मा सम्प्रकाशते।
दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया ज्ञानवेदिभिः ॥ २३ ॥
मूलम्
एवं सर्वेषु भूतेषु भूतात्मा सम्प्रकाशते।
दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया ज्ञानवेदिभिः ॥ २३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
इस प्रकार सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा परमेश्वर समस्त प्राणियोंके भीतर प्रकाशित हो रहे हैं। ज्ञानी महात्मा अपनी श्रेष्ठ एवं सूक्ष्म बुद्धिके द्वारा उन्हें देख पाते हैं॥२३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
चित्तस्य हि प्रसादेन हन्ति कर्म शुभाशुभम्।
प्रसन्नात्माऽऽत्मनि स्थित्वा सुखमानन्त्यमश्नुते ॥ २४ ॥
मूलम्
चित्तस्य हि प्रसादेन हन्ति कर्म शुभाशुभम्।
प्रसन्नात्माऽऽत्मनि स्थित्वा सुखमानन्त्यमश्नुते ॥ २४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
मनुष्य अपने चित्तकी पवित्रताके द्वारा ही समस्त शुभाशुभ कर्मोंको नष्ट (फल देनेमें असमर्थ) कर देता है। जिसका अन्तःकरण प्रसन्न (पवित्र) है, वह अपने-आपमें ही स्थित होकर अक्षय सुख (मोक्ष)-का भागी होता है॥२४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
लक्षणं तु प्रसादस्य यथा तृप्तः सुखं स्वपेत्।
निवाते वा यथा दीपो दीप्येत् कुशलदीपितः ॥ २५ ॥
मूलम्
लक्षणं तु प्रसादस्य यथा तृप्तः सुखं स्वपेत्।
निवाते वा यथा दीपो दीप्येत् कुशलदीपितः ॥ २५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
जैसे भोजन आदिसे तृप्त हुआ मनुष्य सुखसे सोता है और जैसे वायुरहित स्थानमें चतुर मनुष्यके द्वारा जलाया हुआ दीप निश्चलभावसे प्रकाशित होता है; ऐसा ही लक्षण चित्तकी पवित्रताका भी है॥२५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
पूर्वरात्रे परे चैव युञ्जानः सततं मनः।
लघ्वाहारो विशुद्धात्मा पश्यन्नात्मानमात्मनि ॥ २६ ॥
प्रदीप्तेनेव दीपेन मनोदीपेन पश्यति।
दृष्ट्वाऽऽत्मानं निरात्मानं स तदा विप्रमुच्यते ॥ २७ ॥
मूलम्
पूर्वरात्रे परे चैव युञ्जानः सततं मनः।
लघ्वाहारो विशुद्धात्मा पश्यन्नात्मानमात्मनि ॥ २६ ॥
प्रदीप्तेनेव दीपेन मनोदीपेन पश्यति।
दृष्ट्वाऽऽत्मानं निरात्मानं स तदा विप्रमुच्यते ॥ २७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
मनुष्यको चाहिये कि वह हलका भोजन करे और अन्तःकरणको शुद्ध रखे। रातके पहले और पिछले पहरमें सदा अपना मन परमात्माके चिन्तनमें लगावे। जो इस प्रकार निरन्तर अपने हृदयमें परमात्माके साक्षात्कारका अभ्यास करता है, वह प्रज्वलित दीपकके समान प्रकाशित होनेवाले अपने मनोमय प्रदीपके द्वारा निराकार परमेश्वरका साक्षात्कार करके तत्काल मुक्त हो जाता है॥२६-२७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
सर्वोपायैस्तु लोभस्य क्रोधस्य च विनिग्रहः।
एतत् पवित्रं लोकानां तपो वै संक्रमो मतः ॥ २८ ॥
मूलम्
सर्वोपायैस्तु लोभस्य क्रोधस्य च विनिग्रहः।
एतत् पवित्रं लोकानां तपो वै संक्रमो मतः ॥ २८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
सम्पूर्ण उपायोंसे लोभ और क्रोधकी वृत्तियोंको दबाना चाहिए। संसारमें यही पवित्र तप है और यही सबके लिये भवसागरसे पार उतारनेवाला सेतु माना गया है॥२८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
नित्यं क्रोधात् तपो रक्षेद् धर्मं रक्षेच्च मत्सरात्।
विद्यां मानापमानाभ्यामात्मानं तु प्रमादतः ॥ २९ ॥
मूलम्
नित्यं क्रोधात् तपो रक्षेद् धर्मं रक्षेच्च मत्सरात्।
विद्यां मानापमानाभ्यामात्मानं तु प्रमादतः ॥ २९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
सदा तपको क्रोधसे, धर्मको द्वेषसे, विद्याको मान-अपमानसे और अपने-आपको प्रमादसे बचाना चाहिये॥२९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
आनृशंस्यं परो धर्मः क्षमा च परमं बलम्।
आत्मज्ञानं परं ज्ञानं सत्यं व्रतपरं व्रतम् ॥ ३० ॥
मूलम्
आनृशंस्यं परो धर्मः क्षमा च परमं बलम्।
आत्मज्ञानं परं ज्ञानं सत्यं व्रतपरं व्रतम् ॥ ३० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
क्रूरताका अभाव (दया) सबसे महान् धर्म है, क्षमा सबसे बड़ा बल है, सत्य सबसे उत्तम व्रत है और परमात्माके तत्त्वका ज्ञान ही सर्वोत्तम ज्ञान है॥३०॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
सत्यस्य वचनं श्रेयः सत्यं ज्ञानं हितं भवेत्।
यद् भूतहितमत्यन्तं तद् वै सत्यं परं मतम् ॥ ३१ ॥
मूलम्
सत्यस्य वचनं श्रेयः सत्यं ज्ञानं हितं भवेत्।
यद् भूतहितमत्यन्तं तद् वै सत्यं परं मतम् ॥ ३१ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
सत्य बोलना सदा कल्याणकारी है। यथार्थ ज्ञान ही हितकारक होता है। जिससे प्राणियोंका अत्यन्त हित होता हो उसे ही उत्तम सत्य माना गया है॥३१॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
यस्य सर्वे समारम्भा निराशीर्बन्धनाः सदा।
त्यागे यस्य हुतं सर्वं स त्यागी स च बुद्धिमान्॥३२॥
मूलम्
यस्य सर्वे समारम्भा निराशीर्बन्धनाः सदा।
त्यागे यस्य हुतं सर्वं स त्यागी स च बुद्धिमान्॥३२॥
अनुवाद (हिन्दी)
जिसके सम्पूर्ण आयोजन कभी कामनाओंसे बँधे हुए नहीं होते तथा जिसने त्यागकी आगमें अपना सर्वस्व होम दिया है वही त्यागी और बुद्धिमान् है॥३२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
यतो न गुरुरप्येनं श्रावयेदुपपादयेत्।
तं विद्याद् ब्रह्मणो योगं वियोगं योगसंज्ञितम् ॥ ३३ ॥
मूलम्
यतो न गुरुरप्येनं श्रावयेदुपपादयेत्।
तं विद्याद् ब्रह्मणो योगं वियोगं योगसंज्ञितम् ॥ ३३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
इसलिये दृश्य संसारसे वियोग करानेवाले और योग नामसे कहे जानेवाले इस ब्रह्मयोगको स्वयं जानना और सम्पादन करना चाहिये। गुरुको भी उचित है कि वह इसे अपात्र शिष्यके प्रति न सुनावे॥३३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
न हिंस्यात् सर्वभूतानि मैत्रायणगतश्चरेत्।
नेदं जीवितमासाद्य वैरं कुर्वीत केनचित् ॥ ३४ ॥
मूलम्
न हिंस्यात् सर्वभूतानि मैत्रायणगतश्चरेत्।
नेदं जीवितमासाद्य वैरं कुर्वीत केनचित् ॥ ३४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
किसी प्राणीकी हिंसा न करे। सबमें मित्रभाव रखते हुए विचरे। इस दुर्लभ मनुष्य-जीवनको पाकर किसीके साथ वैर न करे॥३४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
आकिञ्चन्यं सुसंतोषो निराशित्वमचापलम् ।
एतदेव परं ज्ञानं सदात्मज्ञानमुत्तमम् ॥ ३५ ॥
मूलम्
आकिञ्चन्यं सुसंतोषो निराशित्वमचापलम् ।
एतदेव परं ज्ञानं सदात्मज्ञानमुत्तमम् ॥ ३५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
कुछ भी संग्रह न रखना, सभी दशाओंमें अत्यन्त संतुष्ट रहना तथा कामना और लोलुपताको त्याग देना—यही परम ज्ञान है और यही सत्यस्वरूप उत्तम आत्मज्ञान है॥३५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
परिग्रहं परित्यज्य भवेद् बुद्ध्या यतव्रतः।
अशोकं स्थानमाश्रित्य निश्चलं प्रेत्य चेह च ॥ ३६ ॥
मूलम्
परिग्रहं परित्यज्य भवेद् बुद्ध्या यतव्रतः।
अशोकं स्थानमाश्रित्य निश्चलं प्रेत्य चेह च ॥ ३६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
इहलोक और परलोकके समस्त भोगोंका एवं सब प्रकारके संग्रहका त्याग करके शोकरहित निश्चल परमधामको लक्ष्य बनाकर बुद्धिके द्वारा मन और इन्द्रियोंका संयम करे॥३६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तपोनित्येन दान्तेन मुनिना संयतात्मना।
अजितं जेतुकामेन भाव्यं सङ्गेष्वसङ्गिना ॥ ३७ ॥
मूलम्
तपोनित्येन दान्तेन मुनिना संयतात्मना।
अजितं जेतुकामेन भाव्यं सङ्गेष्वसङ्गिना ॥ ३७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
जो जितेन्द्रिय है, जिसने मनपर अधिकार प्राप्त कर लिया है तथा जो अजित पदको जीतनेकी इच्छा करता है, नित्य तपस्यामें संलग्न रहनेवाले उस मुनिको आसक्ति-जनक भोगोंसे अलग—अनासक्त रहना चाहिये॥३७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुणागुणमनासङ्गमेककार्यमनन्तरम् ।
एतत् तद् ब्रह्मणो वृत्तमाहुरेकपदं सुखम् ॥ ३८ ॥
मूलम्
गुणागुणमनासङ्गमेककार्यमनन्तरम् ।
एतत् तद् ब्रह्मणो वृत्तमाहुरेकपदं सुखम् ॥ ३८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
जो गुणमें रहता हुआ भी गुणोंसे रहित है, जो सर्वथा संगसे रहित है तथा जो एकमात्र अन्तरात्माके द्वारा ही साध्य है, जिसकी उपलब्धिमें अविद्याके सिवा और कोई व्यवधान नहीं है, वही ब्रह्मका अद्वितीय नित्य सिद्ध पद है और वही (निरतिशय) सुख है॥३८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
परित्यजति यो दुःखं सुखं चाप्युभयं नरः।
ब्रह्म प्राप्नोति सोऽत्यन्तमसङ्गेन च गच्छति ॥ ३९ ॥
मूलम्
परित्यजति यो दुःखं सुखं चाप्युभयं नरः।
ब्रह्म प्राप्नोति सोऽत्यन्तमसङ्गेन च गच्छति ॥ ३९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
जो मनुष्य दुःख और सुख दोनोंको त्याग देता है, वही अनन्त ब्रह्मपदको प्राप्त होता है। अनासक्तिके द्वारा भी उसी पदकी प्राप्ति होती है॥३९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
यथाश्रुतमिदं सर्वं समासेन द्विजोत्तम।
एतत् ते सर्वमाख्यातं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ ४० ॥
मूलम्
यथाश्रुतमिदं सर्वं समासेन द्विजोत्तम।
एतत् ते सर्वमाख्यातं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ ४० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
द्विजश्रेष्ठ! मैंने यह सब जैसा सुना है, वैसा सब-का-सब थोड़ेमें आपसे कह सुनाया है। अब आप और क्या सुनना चाहते हैं?॥४०॥
मूलम् (समाप्तिः)
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि ब्राह्मणव्याधसंवादे त्रयोदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१३ ॥
मूलम् (वचनम्)
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें ब्राह्मणव्याधसंवादविषयक दो सौ तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥२१३॥
सूचना (हिन्दी)
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल ४३ श्लोक हैं)
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तात्पर्य यह है कि हृदयमें रहनेवाला प्राण, नाभिमें रहनेवाले समानसे जाकर मिलता है। इसी तरह गुदामें रहनेवाला अपान कंठवर्ती उदानसे जा मिलता है, इस दशामें प्राण, अपान और समानका नाभिमें संघर्ष होनेसे जो अग्नि उत्पन्न होती है, उसे ही ‘जठरानल’ नाम दिया गया है। वही इस शरीरमें अन्नको पचाकर उसके रससे शरीरको पुष्ट करता है।
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प्राण, श्रद्धा, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, इन्द्रिय, मन, अन्न, वीर्य, तप, मन्त्र, कर्म, लोक तथा नाम—ये सोलह कलाएँ हैं (देखिये प्रश्नोपनिषद् ६।४)।