भागसूचना
द्वादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः
सूचना (हिन्दी)
तीनों गुणोंके स्वरूप और फलका वर्णन
मूलम् (वचनम्)
मार्कण्डेय उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
एवं तु सूक्ष्मे कथिते धर्मव्याधेन भारत।
ब्राह्मणः स पुनः सूक्ष्मं पप्रच्छ सुसमाहितः ॥ १ ॥
मूलम्
एवं तु सूक्ष्मे कथिते धर्मव्याधेन भारत।
ब्राह्मणः स पुनः सूक्ष्मं पप्रच्छ सुसमाहितः ॥ १ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
मार्कण्डेयजी कहते हैं— भारत! इस प्रकार धर्मव्याधके द्वारा सूक्ष्म तत्त्वका निरूपण होनेपर कौशिक ब्राह्मणने एकाग्रचित्त होकर पुनः एक सूक्ष्म प्रश्न उपस्थित किया॥१॥
मूलम् (वचनम्)
ब्राह्मण उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
सत्त्वस्य रजसश्चैव तमसश्च यथातथम्।
गुणांस्तत्त्वेन मे ब्रूहि यथावदिह पृच्छतः ॥ २ ॥
मूलम्
सत्त्वस्य रजसश्चैव तमसश्च यथातथम्।
गुणांस्तत्त्वेन मे ब्रूहि यथावदिह पृच्छतः ॥ २ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
ब्राह्मण बोला— व्याध! मैं यहाँ यथोचितरूपसे एक प्रश्न उपस्थित करता हूँ। वह यह है कि सत्त्व, रज और तमका गुण (स्वरूप) क्या है? यह मुझे यथार्थरूपसे बताओ॥२॥
मूलम् (वचनम्)
व्याध उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
हन्त ते कथयिष्यामि यन्मां त्वं परिपृच्छसि।
एषां गुणान् पृथक्त्वेन निबोध गदतो मम ॥ ३ ॥
मूलम्
हन्त ते कथयिष्यामि यन्मां त्वं परिपृच्छसि।
एषां गुणान् पृथक्त्वेन निबोध गदतो मम ॥ ३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
धर्मव्याधने कहा— ब्रह्मन्! आप मुझसे जो बात पूछ रहे हैं, मैं अब उसे कहूँगा। सत्त्व, रज और तम—इन तीनोंके गुणोंका पृथक्-पृथक् वर्णन करता हूँ, सुनिये॥३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
मोहात्मकं तमस्तेषां रज एषां प्रवर्तकम्।
प्रकाशबहुलत्वाच्च सत्त्वं ज्याय इहोच्यते ॥ ४ ॥
मूलम्
मोहात्मकं तमस्तेषां रज एषां प्रवर्तकम्।
प्रकाशबहुलत्वाच्च सत्त्वं ज्याय इहोच्यते ॥ ४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
इन तीनों गुणोंमें जो तमोगुण है वह मोहात्मक—मोह उत्पन्न करनेवाला है। रजोगुण कर्मोंमें प्रवृत्त करनेवाला है। परंतु सत्त्वगुणमें प्रकाशकी बहुलता है, इसलिये वह सबसे श्रेष्ठ कहा जाता है॥४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अविद्याबहुलो मूढः स्वप्नशीलो विचेतनः।
दुर्हृषीकस्तमोध्वस्तः सक्रोधस्तामसोऽलसः ॥ ५ ॥
मूलम्
अविद्याबहुलो मूढः स्वप्नशीलो विचेतनः।
दुर्हृषीकस्तमोध्वस्तः सक्रोधस्तामसोऽलसः ॥ ५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
जिसमें अज्ञानकी बहुलता है, जो मूढ़ (मोहग्रस्त) और अचेत होकर सदा नींद लेता रहता है, जिसकी इन्द्रियाँ वशमें न होनेके कारण दूषित हैं, जो अविवेकी, क्रोधी और आलसी है, ऐसे मनुष्यको तमोगुणी जानना चाहिये॥५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
प्रवृत्तवाक्यो मन्त्री च यो नराग्र्योऽनसूयकः।
विधित्समानो विप्रर्षे स्तब्धो मानी स राजसः ॥ ६ ॥
मूलम्
प्रवृत्तवाक्यो मन्त्री च यो नराग्र्योऽनसूयकः।
विधित्समानो विप्रर्षे स्तब्धो मानी स राजसः ॥ ६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
ब्रह्मर्षे! जो प्रवृत्तिमार्गकी ही बातें करनेवाला, सलाह देनेमें कुशल और दूसरोंके गुणोंमें दोष न देखनेवाला है; जो सदा कुछ-न-कुछ करनेकी इच्छा रखता है, जिसमें कठोरता और अभिमानकी अधिकता है, वह मनुष्योंपर रोब जमानेवाला पुरुष रजोगुणी कहा गया है॥६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
प्रकाशबहुलो धीरो निर्विधित्सोऽनसूयकः ।
अक्रोधनो नरो धीमान् दान्तश्चैव स सात्त्विकः ॥ ७ ॥
मूलम्
प्रकाशबहुलो धीरो निर्विधित्सोऽनसूयकः ।
अक्रोधनो नरो धीमान् दान्तश्चैव स सात्त्विकः ॥ ७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
जिसमें प्रकाश (ज्ञान)-की बहुलता है, जो धीर और नये-नये कार्य आरम्भ करनेकी उत्सुकतासे रहित है, जिसमें दूसरोंके दोष देखनेकी प्रवृत्तिका अभाव है जो क्रोधशून्य, बुद्धिमान् और जितेन्द्रिय है, वह मनुष्य सात्त्विक माना जाता है॥७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
सात्त्विकस्त्वथ सम्बुद्धो लोकवृत्तेन क्लिश्यते।
यदा बुध्यति बोद्धव्यं लोकवृत्तं जुगुप्सते ॥ ८ ॥
मूलम्
सात्त्विकस्त्वथ सम्बुद्धो लोकवृत्तेन क्लिश्यते।
यदा बुध्यति बोद्धव्यं लोकवृत्तं जुगुप्सते ॥ ८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
सात्त्विक पुरुष ज्ञानसम्पन्न हो रजोगुण और तमोगुणके कार्यभूत लौकिक व्यवहारमें पड़नेका कष्ट नहीं उठाता। वह जब जाननेयोग्य तत्त्वको जान लेता है, तब उसे सांसारिक व्यवहारसे ग्लानि हो जाती है॥८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
वैराग्यस्य च रूपं तु पूर्वमेव प्रवर्तते।
मृदुर्भवत्यहङ्कारः प्रसीदत्यार्जवं च यत् ॥ ९ ॥
मूलम्
वैराग्यस्य च रूपं तु पूर्वमेव प्रवर्तते।
मृदुर्भवत्यहङ्कारः प्रसीदत्यार्जवं च यत् ॥ ९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
सात्त्विक पुरुषमें वैराग्यका लक्षण पहले ही प्रकट हो जाता है। उसका अहंकार ढीला पड़ जाता है और सरलता प्रकाशमें आने लगती है॥९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
ततोऽस्य सर्वद्वन्द्वानि प्रशाम्यन्ति परस्परम्।
न चास्य संशयो नाम क्वचिद् भवति कश्चन ॥ १० ॥
मूलम्
ततोऽस्य सर्वद्वन्द्वानि प्रशाम्यन्ति परस्परम्।
न चास्य संशयो नाम क्वचिद् भवति कश्चन ॥ १० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
तदनन्तर इसके राग-द्वेष आदि सम्पूर्ण द्वन्द्व परस्पर शान्त हो जाते हैं। इसके हृदयमें कभी कोई संशय नहीं उठता॥१०॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
शूद्रयोनौ हि जातस्य सद्गुणानुपतिष्ठतः।
वैश्यत्वं लभते ब्रह्मन् क्षत्रियत्वं तथैव च ॥ ११ ॥
मूलम्
शूद्रयोनौ हि जातस्य सद्गुणानुपतिष्ठतः।
वैश्यत्वं लभते ब्रह्मन् क्षत्रियत्वं तथैव च ॥ ११ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
ब्रह्मन्! शूद्रयोनिमें उत्पन्न मनुष्य भी यदि उत्तम गुणोंका आश्रय ले, तो वह वैश्य तथा क्षत्रियभावको प्राप्त कर लेता है॥११॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
आर्जवे वर्तमानस्य ब्राह्मण्यमभिजायते ।
गुणास्ते कीर्तिताः सर्वे किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ १२ ॥
मूलम्
आर्जवे वर्तमानस्य ब्राह्मण्यमभिजायते ।
गुणास्ते कीर्तिताः सर्वे किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ १२ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
जो ‘सरलता’ नामक गुणमें प्रतिष्ठित है, उसे ब्राह्मणत्व प्राप्त हो जाता है। ब्रह्मन्! इस प्रकार मैंने आपसे सम्पूर्ण गुणोंका वर्णन किया है, अब और क्या सुनना चाहते हैं?॥१२॥
मूलम् (समाप्तिः)
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि ब्राह्मणव्याधसंवादे द्वादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१२ ॥
मूलम् (वचनम्)
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें ब्राह्मण-व्याध-संवादविषयक दो सौ बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥२१२॥