२११ ब्राह्मणव्याधसंवादे

भागसूचना

एकादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः

सूचना (हिन्दी)

पञ्चमहाभूतोंके गुणोंका और इन्द्रियनिग्रहका वर्णन

मूलम् (वचनम्)

मार्कण्डेय उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

एवमुक्तः स विप्रस्तु धर्मव्याधेन भारत।
कथामकथयद् भूयो मनसः प्रीतिवर्धनीम् ॥ १ ॥

मूलम्

एवमुक्तः स विप्रस्तु धर्मव्याधेन भारत।
कथामकथयद् भूयो मनसः प्रीतिवर्धनीम् ॥ १ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

मार्कण्डेयजी कहते हैं— भरतनन्दन! धर्मव्याधके इस प्रकार उपदेश देनेपर कौशिक ब्राह्मणने पुनः मनकी प्रसन्नताको बढ़ानेवाली वार्ता प्रारम्भ की॥१॥

मूलम् (वचनम्)

ब्राह्मण उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

महाभूतानि यान्याहुः पञ्च धर्मभृतां वर।
एकैकस्य गुणान् सम्यक् पञ्चानामपि मे वद ॥ २ ॥

मूलम्

महाभूतानि यान्याहुः पञ्च धर्मभृतां वर।
एकैकस्य गुणान् सम्यक् पञ्चानामपि मे वद ॥ २ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

ब्राह्मण बोला— धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ व्याध! जो पाँच महाभूत कहे जाते हैं, उन पाँचोंमेंसे प्रत्येकके गुणोंका मुझसे भलीभाँति वर्णन करो॥२॥

मूलम् (वचनम्)

व्याध उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

भूमिरापस्तथा ज्योतिर्वायुराकाशमेव च ।
गुणोत्तराणि सर्वाणि तेषां वक्ष्यामि ते गुणान् ॥ ३ ॥

मूलम्

भूमिरापस्तथा ज्योतिर्वायुराकाशमेव च ।
गुणोत्तराणि सर्वाणि तेषां वक्ष्यामि ते गुणान् ॥ ३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

धर्मव्याधने कहा— ब्रह्मन्! पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—ये सब पूर्व-पूर्ववाले तत्त्व अपनेसे उत्तर-उत्तरवालोंके गुणोंसे युक्त हैं। मैं उनके गुणोंका वर्णन करता हूँ॥३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

भूमिः पञ्चगुणा ब्रह्मन्नुदकं च चतुर्गुणम्।
गुणास्त्रयस्तेजसि च त्रयश्चाकाशवातयोः ॥ ४ ॥

मूलम्

भूमिः पञ्चगुणा ब्रह्मन्नुदकं च चतुर्गुणम्।
गुणास्त्रयस्तेजसि च त्रयश्चाकाशवातयोः ॥ ४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

विप्रवर! पृथ्वीमें पाँच गुण हैं, जल चार गुणोंसे युक्त है, तेजमें तीन गुण होते हैं, वायुमें दो और आकाशमें एक गुण है॥४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धश्च पञ्चमः।
एते गुणाः पञ्च भूमेः सर्वेभ्यो गुणवत्तरा ॥ ५ ॥

मूलम्

शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धश्च पञ्चमः।
एते गुणाः पञ्च भूमेः सर्वेभ्यो गुणवत्तरा ॥ ५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये भूमिके पाँच गुण हैं। इस प्रकार भूमि अन्य सब भूतोंकी अपेक्षा अधिक गुणवती है॥५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसश्चापि द्विजोत्तम।
अपामेते गुणा ब्रह्मन् कीर्तितास्तव सुव्रत ॥ ६ ॥

मूलम्

शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसश्चापि द्विजोत्तम।
अपामेते गुणा ब्रह्मन् कीर्तितास्तव सुव्रत ॥ ६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

द्विजश्रेष्ठ! शब्द, स्पर्श, रूप और रस—ये चार जलके गुण हैं। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मण! इनका वर्णन पहले भी आपसे किया गया है॥६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

शब्दः स्पर्शश्च रूपं च तेजसोऽथ गुणास्त्रयः।
शब्दः स्पर्शश्च वायौ तु शब्दश्चाकाश एव तु ॥ ७ ॥

मूलम्

शब्दः स्पर्शश्च रूपं च तेजसोऽथ गुणास्त्रयः।
शब्दः स्पर्शश्च वायौ तु शब्दश्चाकाश एव तु ॥ ७ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

शब्द, स्पर्श तथा रूप—ये तेजके तीन गुण हैं, शब्द और स्पर्श—ये दो गुण वायुके हैं तथा आकाशमें एक ही गुण है—शब्द॥७॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

एते पञ्चदश ब्रह्मन् गुणा भूतेषु पञ्चसु।
वर्तन्ते सर्वभूतेषु येषु लोकाः प्रतिष्ठिताः ॥ ८ ॥

मूलम्

एते पञ्चदश ब्रह्मन् गुणा भूतेषु पञ्चसु।
वर्तन्ते सर्वभूतेषु येषु लोकाः प्रतिष्ठिताः ॥ ८ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

ब्रह्मन्! इस प्रकार पाँचों भूतोंमें ये पंद्रह गुण बताये गये हैं। इन्हींमें सम्पूर्ण लोक प्रतिष्ठित हैं॥८॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अन्योन्यं नातिवर्तन्ते सम्यक् च भवति द्विज।
यदा तु विषमं भावमाचरन्ति चराचराः ॥ ९ ॥
तदा देही देहमन्यं व्यतिरोहति कालतः।
आनुपूर्व्या विनश्यन्ति जायन्ते चानुपूर्वशः ॥ १० ॥

मूलम्

अन्योन्यं नातिवर्तन्ते सम्यक् च भवति द्विज।
यदा तु विषमं भावमाचरन्ति चराचराः ॥ ९ ॥
तदा देही देहमन्यं व्यतिरोहति कालतः।
आनुपूर्व्या विनश्यन्ति जायन्ते चानुपूर्वशः ॥ १० ॥

अनुवाद (हिन्दी)

विप्रवर! ये पाँच भूत एक-दूसरेके बिना नहीं रह सकते। परस्पर मिलकर ही भलीभाँति प्रकाशित होते हैं। जिस समय व्यक्त और अव्यक्त पाँचों भूत विषम-भावको प्राप्त होते हैं, उस समय यह जीव कालकी प्रेरणासे अपने संकल्पानुसार दूसरे शरीरको प्राप्त हो जाता है। ये पाँचों भूत मृत्युकालमें प्रतिलोमक्रमसे विलीन हो जाते हैं और उत्पत्तिकालमें अनुलोमक्रमसे उत्पन्न होते हैं॥९-१०॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तत्र तत्र हि दृश्यन्ते धातवः पाञ्चभौतिकाः।
यैरावृतमिदं सर्वं जगत् स्थावरजङ्गमम् ॥ ११ ॥

मूलम्

तत्र तत्र हि दृश्यन्ते धातवः पाञ्चभौतिकाः।
यैरावृतमिदं सर्वं जगत् स्थावरजङ्गमम् ॥ ११ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

विभिन्न शरीरोंमें जितने रक्त आदि धातु दिखायी देते हैं, वे सब पाँच भूतोंके ही परिणाम हैं, जिनसे यह समस्त चराचर जगत् व्याप्त है॥११॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

इन्द्रियैः सृज्यते यद् यत् तत् तद् व्यक्तमिति स्मृतम्।
तदव्यक्तमिति ज्ञेयं लिङ्गग्राह्यमतीन्द्रियम् ॥ १२ ॥

मूलम्

इन्द्रियैः सृज्यते यद् यत् तत् तद् व्यक्तमिति स्मृतम्।
तदव्यक्तमिति ज्ञेयं लिङ्गग्राह्यमतीन्द्रियम् ॥ १२ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

बाह्य इन्द्रियोंसे जिस-जिसका संसर्ग होता है, वह-वह व्यक्त माना गया है; परंतु जो विषय इन्द्रियग्राह्य नहीं है, केवल अनुमानसे जाना जाता है, उसे अव्यक्त समझना चाहिये॥१२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

यथास्वं ग्राहकाण्येषां शब्दादीनामिमानि तु।
इन्द्रियाणि यदा देही धारयन्निव तप्यते ॥ १३ ॥

मूलम्

यथास्वं ग्राहकाण्येषां शब्दादीनामिमानि तु।
इन्द्रियाणि यदा देही धारयन्निव तप्यते ॥ १३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

अपने-अपने विषयोंका अतिक्रमण न करके इन शब्द आदि विषयोंको ग्रहण करनेवाली इन इन्द्रियोंको जब आत्मा अपने वशमें करता है, तब मानो वह तपस्या करता है॥१३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

लोके विततमात्मानं लोकं चात्मनि पश्यति।
परावरज्ञो यः शक्तः स तु भूतानि पश्यति ॥ १४ ॥

मूलम्

लोके विततमात्मानं लोकं चात्मनि पश्यति।
परावरज्ञो यः शक्तः स तु भूतानि पश्यति ॥ १४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

वह सम्पूर्ण लोकोंमें अपनेको व्याप्त और अपनेमें सम्पूर्ण लोकोंको स्थित देखता है। इस प्रकार जो निर्गुण ब्रह्मको जाननेवाला समर्थ ज्ञानी पुरुष है, वह सम्पूर्ण भूतोंको आत्मरूपसे देखता है॥१४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

पश्यतः सर्वभूतानि सर्वावस्थासु सर्वदा।
ब्रह्मभूतस्य संयोगो नाशुभेनोपपद्यते ॥ १५ ॥

मूलम्

पश्यतः सर्वभूतानि सर्वावस्थासु सर्वदा।
ब्रह्मभूतस्य संयोगो नाशुभेनोपपद्यते ॥ १५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

सब अवस्थाओंमें सदा समस्त भूतोंको आत्मरूपसे देखनेवाले उस ब्रह्मस्वरूप ज्ञानीका कभी भी अशुभ कर्मोंसे सम्पर्क होना सम्भव नहीं है॥१५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अज्ञानमूलं तं क्लेशमतिवृत्तस्य पौरुषम्।
लोकवृत्तिप्रकाशेन ज्ञानमार्गेण गम्यते ॥ १६ ॥

मूलम्

अज्ञानमूलं तं क्लेशमतिवृत्तस्य पौरुषम्।
लोकवृत्तिप्रकाशेन ज्ञानमार्गेण गम्यते ॥ १६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

उस (पूर्वोक्त) अज्ञानजनित क्लेशसे जो पार हो गया है, उस महापुरुषका प्रभाव उसके द्वारा की जानेवाली लौकिक चेष्टाओंसे ज्ञानमार्गके द्वारा जाना जा सकता है॥१६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अनादिनिधनं जन्तुमात्मयोनिं सदाव्ययम् ।
अनौपम्यममूर्तं च भगवानाह बुद्धिमान् ॥ १७ ॥

मूलम्

अनादिनिधनं जन्तुमात्मयोनिं सदाव्ययम् ।
अनौपम्यममूर्तं च भगवानाह बुद्धिमान् ॥ १७ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

बुद्धिमान् भगवान् ब्रह्माने (अपने निःश्वासभूत वेदोंके द्वारा) मुक्त जीवको आदि-अन्तसे रहित, स्वयम्भू, अविकारी, अनुपम तथा निराकार बताया है॥१७॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तपोमूलमिदं सर्वं यन्मां विप्रानुपृच्छसि।
इन्द्रियाण्येव संयम्य तपो भवति नान्यथा ॥ १८ ॥

मूलम्

तपोमूलमिदं सर्वं यन्मां विप्रानुपृच्छसि।
इन्द्रियाण्येव संयम्य तपो भवति नान्यथा ॥ १८ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

विप्रवर! आप मुझसे जो कुछ पूछते हैं, उसके उत्तरमें मैं यह बता रहा हूँ कि इस सबका मूल तप है। इन्द्रियोंका संयम करनेसे ही वह तपस्या सम्पन्न होती है, और किसी प्रकारसे नहीं॥१८॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

इन्द्रियाण्येव तत् सर्वं यत् स्वर्गनरकावुभौ।
निगृहीतविसृष्टानि स्वर्गाय नरकाय च ॥ १९ ॥

मूलम्

इन्द्रियाण्येव तत् सर्वं यत् स्वर्गनरकावुभौ।
निगृहीतविसृष्टानि स्वर्गाय नरकाय च ॥ १९ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

स्वर्ग और नरक आदि जो कुछ भी है, वह सब इन्द्रियाँ ही हैं, अर्थात् इन्द्रियाँ ही उनकी कारण हैं। वशमें की हुई इन्द्रियाँ स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाली हैं और जिन्हें विषयोंकी ओर खुला छोड़ दिया गया है, वे इन्द्रियाँ नरकमें डालनेवाली हैं॥१९॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

एष योगविधिः कृत्स्नो यावदिन्द्रियधारणम्।
एतन्मूलं हि तपसः कृत्स्नस्य नरकस्य च ॥ २० ॥

मूलम्

एष योगविधिः कृत्स्नो यावदिन्द्रियधारणम्।
एतन्मूलं हि तपसः कृत्स्नस्य नरकस्य च ॥ २० ॥

अनुवाद (हिन्दी)

योगका सम्पूर्णरूपसे अनुष्ठान यही है कि मनसहित समस्त इन्द्रियोंको काबूमें रखा जाय। यही सारी तपस्याका मूल है, और इन्द्रियोंको वशमें न रखना ही नरकका हेतु है॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

इन्द्रियाणां प्रसङ्गेन दोषमार्च्छन्त्यसंशयम् ।
संनियम्य तु तान्येव ततः सिद्धिं समाप्नुयात् ॥ २१ ॥

मूलम्

इन्द्रियाणां प्रसङ्गेन दोषमार्च्छन्त्यसंशयम् ।
संनियम्य तु तान्येव ततः सिद्धिं समाप्नुयात् ॥ २१ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

इन्द्रियोंके संसर्गसे ही मनुष्य निःसंदेह दुर्गुण-दुराचार आदि दोषोंको प्राप्त होते हैं। उन्हीं इन्द्रियोंको अच्छी तरह वशमें कर लेनेपर उन्हें सर्वथा सिद्धि प्राप्त हो सकती है॥२१॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

षण्णामात्मनि नित्यानामैश्वर्यं योऽधिगच्छति ।
न स पापैः कुतोऽनर्थैर्युज्यते विजितेन्द्रियः ॥ २२ ॥

मूलम्

षण्णामात्मनि नित्यानामैश्वर्यं योऽधिगच्छति ।
न स पापैः कुतोऽनर्थैर्युज्यते विजितेन्द्रियः ॥ २२ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

जो अपने शरीरमें ही सदा विद्यमान रहनेवाले मनसहित छहों इन्द्रियोंपर अधिकार पा लेता है वह जितेन्द्रिय पुरुष पापोंमें नहीं लगता। फिर पापजनित अनर्थोंसे तो उसका संयोग ही कैसे हो सकता है?॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

रथः शरीरं पुरुषस्य दृष्ट-
मात्मा नियन्तेन्द्रियाण्याहुरश्वान् ।
तैरप्रमत्तः कुशली सदश्वै-
र्दान्तैः सुखं याति रथीव धीरः ॥ २३ ॥

मूलम्

रथः शरीरं पुरुषस्य दृष्ट-
मात्मा नियन्तेन्द्रियाण्याहुरश्वान् ।
तैरप्रमत्तः कुशली सदश्वै-
र्दान्तैः सुखं याति रथीव धीरः ॥ २३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

पुरुषका यह प्रत्यक्ष देखनेमें आनेवाला स्थूल शरीर रथ है। आत्मा (बुद्धि) सारथि है और इन्द्रियोंको अश्व बताया गया है। जैसे कुशल, सावधान एवं धीर रथी उत्तम घोड़ोंको अपने वशमें रखकर उनके द्वारा सुखपूर्वक मार्ग तै करता है, उसी प्रकार सावधान, धीर एवं साधन-कुशल पुरुष इन्द्रियोंको वशमें करके सुखसे जीवन-यात्रा पूर्ण करता है॥२३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

षण्णामात्मनि युक्तानामिन्द्रियाणां प्रमाथिनाम् ।
यो धीरो धारयेद् रश्मीन् स स्यात् परमसारथिः ॥ २४ ॥

मूलम्

षण्णामात्मनि युक्तानामिन्द्रियाणां प्रमाथिनाम् ।
यो धीरो धारयेद् रश्मीन् स स्यात् परमसारथिः ॥ २४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

जो धीर पुरुष अपने शरीरमें नित्य विद्यमान छः प्रमथनशील इन्द्रियरूपी अश्वोंकी बागडोर सँभालता है, वही उत्तम सारथि हो सकता है॥२४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

इन्द्रियाणां प्रसृष्टानां हयानामिव वर्त्मसु।
धृतिं कुर्वीत सारथ्ये धृत्या तानि जयेद् ध्रुवम् ॥ २५ ॥

मूलम्

इन्द्रियाणां प्रसृष्टानां हयानामिव वर्त्मसु।
धृतिं कुर्वीत सारथ्ये धृत्या तानि जयेद् ध्रुवम् ॥ २५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

सड़कपर दौड़नेवाले घोड़ोंकी तरह विषयोंमें विचरनेवाली इन इन्द्रियोंको वशमें करनेके लिये धैर्यपूर्वक प्रयत्न करे। धैर्यपूर्वक उद्योग करनेवालेको उनपर अवश्य विजय प्राप्त होती है॥२५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

इन्द्रियाणां विचरतां यन्मनोऽनु विधीयते।
तदस्य हरते बुद्धिं नावं वायुरिवाम्भसि ॥ २६ ॥

मूलम्

इन्द्रियाणां विचरतां यन्मनोऽनु विधीयते।
तदस्य हरते बुद्धिं नावं वायुरिवाम्भसि ॥ २६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

जैसे जलमें चलनेवाली नावको वायु हर लेती है, वैसे ही विषयोंमें विचरती हुई इन्द्रियोंमेंसे मन जिस इन्द्रियके साथ रहता है, वह एक ही इन्द्रिय इस अयुक्त पुरुषकी बुद्धिको हर लेती है॥२६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

येषु विप्रतिपद्यन्ते षट्‌सु मोहात् फलागमम्।
तेष्वध्यवसिताध्यायी विन्दते ध्यानजं फलम् ॥ २७ ॥

मूलम्

येषु विप्रतिपद्यन्ते षट्‌सु मोहात् फलागमम्।
तेष्वध्यवसिताध्यायी विन्दते ध्यानजं फलम् ॥ २७ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

सभी मनुष्य इन छः इन्द्रियोंके शब्द आदि विषयोंमें उनसे प्राप्त होनेवाले सुखरूप फल पानेके सम्बन्धमें मोहसे संशयमें पड़ जाते हैं। परंतु जो उनके दोषोंका अनुसंधान करनेवाला वीतराग पुरुष है, वह उनका निग्रह करके ध्यानजनित आनन्दका अनुभव करता है॥२७॥

मूलम् (समाप्तिः)

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि ब्राह्मणव्याधसंवादे एकादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २११ ॥

मूलम् (वचनम्)

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें ब्राह्मण-व्याध-संवादविषयक दो सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥२११॥