भागसूचना
दशाधिकद्विशततमोऽध्यायः
सूचना (हिन्दी)
विषयसेवनसे हानि, सत्संगसे लाभ और ब्राह्मी विद्याका वर्णन
मूलम् (वचनम्)
मार्कण्डेय उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
एवमुक्तस्तु विप्रेण धर्मव्याधो युधिष्ठिर।
प्रत्युवाच यथा विप्रं तच्छृणुष्व नराधिप ॥ १ ॥
मूलम्
एवमुक्तस्तु विप्रेण धर्मव्याधो युधिष्ठिर।
प्रत्युवाच यथा विप्रं तच्छृणुष्व नराधिप ॥ १ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
मार्कण्डेयजी कहते हैं— राजा युधिष्ठिर! ब्राह्मणके इस प्रकार पूछनेपर धर्मव्याधने उसे जैसा उत्तर दिया था, वह सब सुनाता हूँ, सुनो॥१॥
मूलम् (वचनम्)
व्याध उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
विज्ञानार्थं मनुष्याणां मनः पूर्वं प्रवर्तते।
तत् प्राप्य कामं भजते क्रोधं च द्विजसत्तम ॥ २ ॥
मूलम्
विज्ञानार्थं मनुष्याणां मनः पूर्वं प्रवर्तते।
तत् प्राप्य कामं भजते क्रोधं च द्विजसत्तम ॥ २ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
धर्मव्याधने कहा— द्विजश्रेष्ठ! इन्द्रियोंद्वारा किसी विषयका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये सबसे पहले मनुष्योंका मन प्रवृत्त होता है। उस विषयको प्राप्त कर लेनेपर मनका उसके प्रति राग या द्वेष हो जाता है॥२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
ततस्तदर्थं यतते कर्म चारभते महत्।
इष्टानां रूपगन्धानामभ्यासं च निषेवते ॥ ३ ॥
मूलम्
ततस्तदर्थं यतते कर्म चारभते महत्।
इष्टानां रूपगन्धानामभ्यासं च निषेवते ॥ ३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
जब किसी विषयमें राग होता है, तब मनुष्य उसे पानेके लिये प्रयत्नशील होता है और उसके लिये बड़े-बड़े कार्योंका आरम्भ करता है। जब वे अभीष्ट रूप, गन्ध आदि विषय प्राप्त हो जाते हैं, तब वह उनका बारंबार सेवन करता है॥३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
ततो रागः प्रभवति द्वेषश्च तदनन्तरम्।
ततो लोभः प्रभवति मोहश्च तदनन्तरम् ॥ ४ ॥
मूलम्
ततो रागः प्रभवति द्वेषश्च तदनन्तरम्।
ततो लोभः प्रभवति मोहश्च तदनन्तरम् ॥ ४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
उनके सेवनसे विषयोंके प्रति उत्कट राग प्रकट होता है। फिर उसकी प्रतिकूलतामें द्वेष होता है; द्वेषके अनन्तर अभीष्ट वस्तुके प्रति लोभका प्रादुर्भाव होता है। तत्पश्चात् बुद्धिपर मोह छा जाता है॥४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
ततो लोभाभिभूतस्य रागद्वेषहतस्य च।
न धर्मे जायते बुद्धिर्व्याजाद् धर्मं करोति च ॥ ५ ॥
मूलम्
ततो लोभाभिभूतस्य रागद्वेषहतस्य च।
न धर्मे जायते बुद्धिर्व्याजाद् धर्मं करोति च ॥ ५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
इस प्रकार लोभसे आक्रान्त और राग-द्वेषसे पीड़ित मनुष्यकी बुद्धि धर्ममें नहीं लगती। यदि वह धर्म करता भी है तो कोई बहाना लेकर॥५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
व्याजेन चरते धर्ममर्थं व्याजेन रोचते।
व्याजेन सिध्यमानेषु धनेषु द्विजसत्तम ॥ ६ ॥
तत्रैव रमते बुद्धिस्ततः पापं चिकीर्षति।
मूलम्
व्याजेन चरते धर्ममर्थं व्याजेन रोचते।
व्याजेन सिध्यमानेषु धनेषु द्विजसत्तम ॥ ६ ॥
तत्रैव रमते बुद्धिस्ततः पापं चिकीर्षति।
अनुवाद (हिन्दी)
जो किसी बहानेसे धर्माचरण करता है, वह वास्तवमें धर्मकी आड़ लेकर धन चाहता है। द्विजश्रेष्ठ! जब धर्मके बहानेसे धनकी प्राप्ति होने लगती है, तब उसकी बुद्धि उसीमें रम जाती है और उसके मनमें पापकी इच्छा जाग उठती है॥६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
सुहृद्भिर्वार्यमाणश्च पण्डितैश्च द्विजोत्तम ॥ ७ ॥
उत्तरं श्रुतिसम्बद्धं ब्रवीत्यश्रुतियोजितम् ।
मूलम्
सुहृद्भिर्वार्यमाणश्च पण्डितैश्च द्विजोत्तम ॥ ७ ॥
उत्तरं श्रुतिसम्बद्धं ब्रवीत्यश्रुतियोजितम् ।
अनुवाद (हिन्दी)
विप्रवर! जब उसे हितैषी मित्र तथा विद्वान् पुरुष ऐसा करनेसे रोकते हैं, तब वह उसके समर्थनमें अशास्त्रीय उत्तर देते हुए भी उसे वेद-प्रतिपादित बताता है॥७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अधर्मस्त्रिविधस्तस्य वर्तते रागदोषजः ॥ ८ ॥
पापं चिन्तयते चैव ब्रवीति च करोति च।
तस्याधर्मप्रवृत्तस्य गुणा नश्यन्ति साधवः ॥ ९ ॥
मूलम्
अधर्मस्त्रिविधस्तस्य वर्तते रागदोषजः ॥ ८ ॥
पापं चिन्तयते चैव ब्रवीति च करोति च।
तस्याधर्मप्रवृत्तस्य गुणा नश्यन्ति साधवः ॥ ९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
रागरूपी दोषके कारण उसके द्वारा तीन प्रकारके अधर्म होने लगते हैं—१. वह मनसे पापका चिन्तन करता है, २. वाणीसे पापकी ही बात बोलता है और ३. क्रियाद्वारा भी पापका ही आचरण करता है। इस प्रकार अधर्ममें लग जानेपर उसके सभी अच्छे गुण नष्ट हो जाते हैं॥८-९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
एकशीलैश्च मित्रत्वं भजन्ते पापकर्मिणः।
स तेन दुःखमाप्नोति परत्र च विपद्यते ॥ १० ॥
मूलम्
एकशीलैश्च मित्रत्वं भजन्ते पापकर्मिणः।
स तेन दुःखमाप्नोति परत्र च विपद्यते ॥ १० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
वह अपने ही-जैसे स्वभाववाले पापपरायण मनुष्योंसे मित्रता स्थापित कर लेता है। उस पापसे इस लोकमें तो दुःख होता ही है, परलोकमें भी उसे बड़ी विपत्ति भोगनी पड़ती है॥१०॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
पापात्मा भवति ह्येवं धर्मलाभं तु मे शृणु।
यस्त्वेतान् प्रज्ञया दोषान् पूर्वमेवानुपश्यति ॥ ११ ॥
कुशलः सुखदुःखेषु साधूंश्चाप्युपसेवते ।
तस्य साधुसमारम्भाद् बुद्धिर्धर्मेषु राजते ॥ १२ ॥
मूलम्
पापात्मा भवति ह्येवं धर्मलाभं तु मे शृणु।
यस्त्वेतान् प्रज्ञया दोषान् पूर्वमेवानुपश्यति ॥ ११ ॥
कुशलः सुखदुःखेषु साधूंश्चाप्युपसेवते ।
तस्य साधुसमारम्भाद् बुद्धिर्धर्मेषु राजते ॥ १२ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
इस प्रकार मनुष्य पापात्मा हो जाता है। अब धर्मकी प्राप्ति कैसे होती है, इसको मुझसे सुनो। जो दुःख और सुखके विवेचनमें कुशल है वह अपनी बुद्धि इन विषयसम्बन्धी दोषोंको पहले ही समझ लेता है। अतः उनसे दूर हटकर श्रेष्ठ पुरुषोंका संग करता है और उस श्रेष्ठसंगसे उसकी बुद्धि धर्ममें लग जाती है॥११-१२॥
मूलम् (वचनम्)
ब्राह्मण उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
ब्रवीषि सूनृतं धर्म्यं यस्य वक्ता न विद्यते।
दिव्यप्रभावः सुमहानृषिरेव मतोऽसि मे ॥ १३ ॥
मूलम्
ब्रवीषि सूनृतं धर्म्यं यस्य वक्ता न विद्यते।
दिव्यप्रभावः सुमहानृषिरेव मतोऽसि मे ॥ १३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
ब्राह्मण बोला— धर्मव्याध! तुम धर्मके विषयमें बड़ी मधुर और प्रिय बातें कह रहे हो। इन बातोंको बतानेवाला दूसरा कोई नहीं है। मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि तुम कोई दिव्य प्रभावसे सम्पन्न महान् ऋषि ही हो॥१३॥
मूलम् (वचनम्)
व्याध उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
ब्राह्मणा वै महाभागाः पितरोऽग्रभुजः सदा।
तेषां सर्वात्मना कार्यं प्रियं लोके मनीषिणा ॥ १४ ॥
मूलम्
ब्राह्मणा वै महाभागाः पितरोऽग्रभुजः सदा।
तेषां सर्वात्मना कार्यं प्रियं लोके मनीषिणा ॥ १४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
धर्मव्याधने कहा— ब्रह्मन्! महाभाग ब्राह्मण और पितर ये सदा प्रथम भोजनके अधिकारी माने गये हैं। अतः बुद्धिमान् पुरुषको इस लोकमें सब प्रकारसे उनका प्रिय करना चाहिये॥१४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
यत् तेषां च प्रियं तत् ते वक्ष्यामि द्विजसत्तम।
नमस्कृत्वा ब्राह्मणेभ्यो बाह्मीं विद्यां निबोध मे ॥ १५ ॥
मूलम्
यत् तेषां च प्रियं तत् ते वक्ष्यामि द्विजसत्तम।
नमस्कृत्वा ब्राह्मणेभ्यो बाह्मीं विद्यां निबोध मे ॥ १५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
विप्रवर! उन ब्राह्मणोंको नमस्कार करके उनके लिये जो प्रिय वस्तु है, उसका वर्णन करता हूँ। तुम मुझसे ब्राह्मी विद्या श्रवण करो॥१५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
इदं विश्वं जगत् सर्वमजय्यं चापि सर्वशः।
महाभूतात्मकं ब्रह्म नातः परतरं भवेत् ॥ १६ ॥
मूलम्
इदं विश्वं जगत् सर्वमजय्यं चापि सर्वशः।
महाभूतात्मकं ब्रह्म नातः परतरं भवेत् ॥ १६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
पञ्चमहाभूतोंसे बना हुआ यह सम्पूर्ण चराचर जगत् सब प्रकारसे अजेय ब्रह्मस्वरूप है। ब्रह्मसे उत्कृष्ट दूसरी कोई वस्तु नहीं है॥१६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
महाभूतानि खं वायुरग्निरापस्तथा च भूः।
शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धश्च तद्गुणाः ॥ १७ ॥
मूलम्
महाभूतानि खं वायुरग्निरापस्तथा च भूः।
शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धश्च तद्गुणाः ॥ १७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
आकाश, वायु अग्नि, जल तथा पृथिवी—ये पाँच महाभूत हैं तथा शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये क्रमशः उनके विशेष गुण हैं॥१७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तेषामपि गुणाः सर्वे गुणवृत्तिः परस्परम्।
पूर्वपूर्वगुणाः सर्वे क्रमशो गुणिषु त्रिषु ॥ १८ ॥
मूलम्
तेषामपि गुणाः सर्वे गुणवृत्तिः परस्परम्।
पूर्वपूर्वगुणाः सर्वे क्रमशो गुणिषु त्रिषु ॥ १८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
उन शब्द आदि गुणोंके भी अनेक गुण-भेद हैं, क्योंकि इन गुणोंका परस्पर संक्रमण भी देखा जाता है। पहले-पहलेके सभी गुण क्रमशः बादवाले तीन गुणवान् भूतों (अग्नि, जल और पृथ्वी)-में उपलब्ध होते हैं, अर्थात् अग्निमें शब्द, स्पर्श और रूप; जलमें शब्द, स्पर्श, रूप और रस तथा पृथ्वीमें शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध पाये जाते हैं॥१८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
षष्ठस्तु चेतना नाम मन इत्यभिधीयते।
सप्तमी तु भवेद् बुद्धिरहंकारस्ततः परम् ॥ १९ ॥
मूलम्
षष्ठस्तु चेतना नाम मन इत्यभिधीयते।
सप्तमी तु भवेद् बुद्धिरहंकारस्ततः परम् ॥ १९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
इन पाँच भूतोंके अतिरिक्त छठा तत्त्व है चित्त; इसीको मन कहते हैं। सातवाँ तत्त्व बुद्धि है और उसके बाद आठवाँ अहंकार है॥१९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
इन्द्रियाणि च पञ्चात्मा रजः सत्त्वं तमस्तथा।
इत्येष सप्तदशको राशिरव्यक्तसंज्ञकः ॥ २० ॥
मूलम्
इन्द्रियाणि च पञ्चात्मा रजः सत्त्वं तमस्तथा।
इत्येष सप्तदशको राशिरव्यक्तसंज्ञकः ॥ २० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
इनके सिवा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, प्राण और सत्त्व, रज, तम—इन सत्रह तत्त्वोंका समूह अव्यक्त कहलाता है॥२०॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
सर्वैरिहेन्द्रियार्थैस्तु व्यक्ताव्यक्तैः सुसंवृतैः ।
चतुर्विंशक इत्येष व्यक्ताव्यक्तमयो गुणः।
एतत् ते सर्वमाख्यातं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ २१ ॥
मूलम्
सर्वैरिहेन्द्रियार्थैस्तु व्यक्ताव्यक्तैः सुसंवृतैः ।
चतुर्विंशक इत्येष व्यक्ताव्यक्तमयो गुणः।
एतत् ते सर्वमाख्यातं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ २१ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
पाँच ज्ञानेन्द्रियों तथा मन और बुद्धिके जो व्यक्त और अव्यक्त विषय हैं, जो बुद्धिरूपी गुहामें छिपे रहते हैं, उन्हें सम्मिलित करनेसे चौबीस तत्त्व होते हैं। इन तत्त्वोंका समुदाय ही व्यक्त और अव्यक्तरूप गुण है। (यह सब-का-सब ब्रह्मस्वरूप है।) ब्राह्मण! इस प्रकार ये सब बातें मैंने तुम्हें बतायी हैं, अब और क्या सुनना चाहते हो?॥
मूलम् (समाप्तिः)
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि ब्राह्मणमाहात्म्ये दशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१० ॥
मूलम् (वचनम्)
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें ब्राह्मणमाहात्म्यविषयक दो सौ दसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥२१०॥