२०९ ब्राह्मणव्याधसंवादे

भागसूचना

नवाधिकद्विशततमोऽध्यायः

सूचना (हिन्दी)

धर्मकी सूक्ष्मता, शुभाशुभ कर्म और उनके फल तथा ब्रह्मकी प्राप्तिके उपायोंका वर्णन

मूलम् (वचनम्)

मार्कण्डेय उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

धर्मव्याधस्तु निपुणं पुनरेव युधिष्ठिर।
विप्रर्षभमुवाचेदं सर्वधर्मभृतां वर ॥ १ ॥

मूलम्

धर्मव्याधस्तु निपुणं पुनरेव युधिष्ठिर।
विप्रर्षभमुवाचेदं सर्वधर्मभृतां वर ॥ १ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

मार्कण्डेयजी कहते हैं— सम्पूर्ण धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! तदनन्तर धर्मव्याधने विप्रवर कौशिकसे पुनः कुशलतापूर्वक कहना आरम्भ किया॥१॥

मूलम् (वचनम्)

व्याध उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

श्रुतिप्रमाणो धर्मोऽयमिति वृद्धानुशासनम् ।
सूक्ष्मा गतिर्हि धर्मस्य बहुशाखा ह्यनन्तिका ॥ २ ॥

मूलम्

श्रुतिप्रमाणो धर्मोऽयमिति वृद्धानुशासनम् ।
सूक्ष्मा गतिर्हि धर्मस्य बहुशाखा ह्यनन्तिका ॥ २ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

व्याध बोला— वृद्ध पुरुषोंका कहना है कि ‘धर्मके विषयमें केवल वेद ही प्रमाण है।’ यह ठीक है, तो भी धर्मकी गति बड़ी सूक्ष्म है। उसके अनन्त भेद और अनेक शाखाएँ हैं॥२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

प्राणान्तिके विवाहे च वक्तव्यमनृतं भवेत्।
अनृतेन भवेत् सत्यं सत्येनैवानृतं भवेत् ॥ ३ ॥

मूलम्

प्राणान्तिके विवाहे च वक्तव्यमनृतं भवेत्।
अनृतेन भवेत् सत्यं सत्येनैवानृतं भवेत् ॥ ३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

(वेदके अनुसार सत्य धर्म और असत्य अधर्म हैं, परंतु) यदि किसीके प्राणोंपर संकट आ जाय अथवा कन्या आदिका विवाह तै करना हो तो ऐसे अवसरोंपर प्राणरक्षा आदिके लिये झूठ बोलनेकी आवश्यकता पड़ जाय तो वहाँ असत्यसे ही सत्यका फल मिलता है। इसके विपरीत (यदि सत्यभाषणसे किसीके प्राणोंपर संकट आ गया, तो वहाँ) सत्यसे ही असत्यका फल प्राप्त होता है॥३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

यद् भूतहितमत्यन्तं तत् सत्यमिति धारणा।
विपर्ययकृतोऽधर्मः पश्य धर्मस्य सूक्ष्मताम् ॥ ४ ॥

मूलम्

यद् भूतहितमत्यन्तं तत् सत्यमिति धारणा।
विपर्ययकृतोऽधर्मः पश्य धर्मस्य सूक्ष्मताम् ॥ ४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

जिससे परिणाममें प्राणियोंका अत्यन्त हित होता हो, वह वास्तवमें सत्य है। इसके विपरीत जिससे किसीका अहित होता हो या दूसरोंके प्राण जाते हों, वह देखनेमें सत्य होनेपर भी वास्तवमें असत्य एवं अधर्म है1। इस प्रकार विचार करके देखिये, धर्मकी गति कितनी सूक्ष्म है॥४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

यत् करोत्यशुभं कर्म शुभं वा यदि सत्तम।
अवश्यं तत् समाप्नोति पुरुषो नात्र संशयः ॥ ५ ॥

मूलम्

यत् करोत्यशुभं कर्म शुभं वा यदि सत्तम।
अवश्यं तत् समाप्नोति पुरुषो नात्र संशयः ॥ ५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

सज्जनशिरोमणे! मनुष्य जो शुभ या अशुभ कार्य करता है, उसका फल उसे अवश्य भोगना पड़ता है, इसमें संशय नहीं है॥५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

विषमां च दशां प्राप्तो देवान् गर्हति वै भृशम्।
आत्मनः कर्मदोषाणि न विजानात्यपण्डितः ॥ ६ ॥

मूलम्

विषमां च दशां प्राप्तो देवान् गर्हति वै भृशम्।
आत्मनः कर्मदोषाणि न विजानात्यपण्डितः ॥ ६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

मूर्ख मानव संकटकी दशामें पड़नेपर देवताओंको बहुत कोसता है, उनकी भरपेट निन्दा करता है; किंतु वह यह नहीं समझता कि यह अपने ही कर्मोंका दोषावह परिणाम है॥६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

मूढो नैकृतिकश्चापि चपलश्च द्विजोत्तम।
सुखदुःखविपर्यासान् सदा समुपपद्यते ॥ ७ ॥
नैनं प्रज्ञा सुनीतं वा त्रायते नैव पौरुषम्।

मूलम्

मूढो नैकृतिकश्चापि चपलश्च द्विजोत्तम।
सुखदुःखविपर्यासान् सदा समुपपद्यते ॥ ७ ॥
नैनं प्रज्ञा सुनीतं वा त्रायते नैव पौरुषम्।

अनुवाद (हिन्दी)

द्विजश्रेष्ठ! मूर्ख, शठ और चंचल चित्तवाला मनुष्य सदा ही भ्रमवश सुखमें दुःख और दुःखमें सुखबुद्धि कर लेता है। उस समय बुद्धि, उत्तम नीति (शिक्षा) तथा पुरुषार्थ भी उसकी रक्षा नहीं कर पाते॥७॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

योऽयमिच्छेद् यथा कामं तं तं कामं स आप्नुयात्॥८॥
यदि स्यादपराधीनं पौरुषस्य क्रियाफलम्।

मूलम्

योऽयमिच्छेद् यथा कामं तं तं कामं स आप्नुयात्॥८॥
यदि स्यादपराधीनं पौरुषस्य क्रियाफलम्।

अनुवाद (हिन्दी)

यदि पुरुषार्थजनित कर्मका फल पराधीन न होता तो जिसकी जो इच्छा होती, उसीको वह प्राप्त कर लेता॥८॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

संयताश्चापि दक्षाश्च मतिमन्तश्च मानवाः ॥ ९ ॥
दृश्यन्ते निष्फलाः सन्तः प्रहीणाः सर्वकर्मभिः।

मूलम्

संयताश्चापि दक्षाश्च मतिमन्तश्च मानवाः ॥ ९ ॥
दृश्यन्ते निष्फलाः सन्तः प्रहीणाः सर्वकर्मभिः।

अनुवाद (हिन्दी)

किंतु बड़े-बड़े संयमी, कार्यकुशल और बुद्धिमान् मनुष्य भी अपना काम करते-करते थक जाते हैं तो भी वे इच्छानुसार फलकी प्राप्तिसे वंचित ही देखे जाते हैं॥९॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

भूतानामपरः कश्चिद्धिंसायां सततोत्थितः ॥ १० ॥
वञ्चनायां च लोकस्य स सुखी जीवते सदा।

मूलम्

भूतानामपरः कश्चिद्धिंसायां सततोत्थितः ॥ १० ॥
वञ्चनायां च लोकस्य स सुखी जीवते सदा।

अनुवाद (हिन्दी)

तथा दूसरा मनुष्य, जो निरन्तर जीवोंकी हिंसाके लिये उद्यत रहता है और सदा लोगोंको ठगनेमें ही लगा रहता है, वह सुखपूर्वक जीवन बिताता देखा जाता है॥१०॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अचेष्टमपि चासीनं श्रीः कंचिदुपतिष्ठति ॥ ११ ॥
कश्चित् कर्माणि कुर्वन् हि न प्राप्यमधिगच्छति।

मूलम्

अचेष्टमपि चासीनं श्रीः कंचिदुपतिष्ठति ॥ ११ ॥
कश्चित् कर्माणि कुर्वन् हि न प्राप्यमधिगच्छति।

अनुवाद (हिन्दी)

कोई बिना उद्योग किये चुपचाप बैठा रहता है और लक्ष्मी उसकी सेवामें उपस्थित हो जाती है और कोई सदा काम करते रहनेपर भी अपने उचित वेतनसे भी वञ्चित रह जाता है (ऐसा देखा जाता है)॥११॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

देवानिष्ट्वा तपस्तप्त्वा कृपणैः पुत्रगृद्धिभिः ॥ १२ ॥
दशमासधृता गर्भे जायन्ते कुलपांसनाः।

मूलम्

देवानिष्ट्वा तपस्तप्त्वा कृपणैः पुत्रगृद्धिभिः ॥ १२ ॥
दशमासधृता गर्भे जायन्ते कुलपांसनाः।

अनुवाद (हिन्दी)

कितने ही दीन मनुष्य पुत्रकी कामना रखकर देवताओंको पूजते और कठिन तपस्या करते हैं, तो भी उनके द्वारा गर्भमें स्थापित तथा दस मासतक माताके उदरमें पालित होकर जो पुत्र पैदा होते हैं वे कुलांगार निकल जाते हैं1॥१२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अपरे धनधान्यैश्च भोगैश्च पितृसंचितैः ॥ १३ ॥
विपुलैरभिजायन्ते लब्धास्तैरेव मङ्गलैः ।

मूलम्

अपरे धनधान्यैश्च भोगैश्च पितृसंचितैः ॥ १३ ॥
विपुलैरभिजायन्ते लब्धास्तैरेव मङ्गलैः ।

अनुवाद (हिन्दी)

और दूसरे बहुत-से ऐसे भी हैं जो अपने पिताके द्वारा जोड़कर रखे हुए धन-धान्य तथा भोग-विलासके प्रचुर साधनोंके साथ पैदा होते हैं और उनकी प्राप्ति भी उन्हीं मांगलिक कृत्योंके अनुष्ठानसे होती है॥१३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

कर्मजा हि मनुष्याणां रोगा नास्त्यत्र संशयः ॥ १४ ॥
आधिभिश्चैव बाध्यन्ते व्याधैः क्षुद्रमृगा इव।

मूलम्

कर्मजा हि मनुष्याणां रोगा नास्त्यत्र संशयः ॥ १४ ॥
आधिभिश्चैव बाध्यन्ते व्याधैः क्षुद्रमृगा इव।

अनुवाद (हिन्दी)

इसमें संदेह नहीं कि मनुष्योंके जो रोग होते हैं, वे उनके कर्मोंके ही फल हैं। जैसे बहेलिये छोटे मृगोंको पीड़ा देते हैं, उसी प्रकार वे रोग और आधि-व्याधियाँ जीवोंको पीड़ा देती रहती हैं॥१४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ते चापि कुशलैर्वैद्यैर्निपुणैः सम्भृतौषधैः ॥ १५ ॥
व्याधयो विनिवार्यन्ते मृगा व्याधैरिव द्विज।

मूलम्

ते चापि कुशलैर्वैद्यैर्निपुणैः सम्भृतौषधैः ॥ १५ ॥
व्याधयो विनिवार्यन्ते मृगा व्याधैरिव द्विज।

अनुवाद (हिन्दी)

ब्रह्मन्! (उनका भोग पूरा होनेपर) ओषधियोंका संग्रह करनेवाले चिकित्साकुशल चतुर चिकित्सक उन रोगव्याधियोंका उसी प्रकार निवारण कर देते हैं, जैसे व्याध मृगोंको भगा देते हैं॥१५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

येषामस्ति च भोक्तव्यं ग्रहणीदोषपीडिताः ॥ १६ ॥
न शक्नुवन्ति ते भोक्तुं पश्य धर्मभृतां वर।

मूलम्

येषामस्ति च भोक्तव्यं ग्रहणीदोषपीडिताः ॥ १६ ॥
न शक्नुवन्ति ते भोक्तुं पश्य धर्मभृतां वर।

अनुवाद (हिन्दी)

धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ कौशिक! देखो, जिनके यहाँ भोजनका भण्डार भरा पड़ा है, उन्हें प्रायः संग्रहणी सता रही है, वे उसका उपभोग नहीं कर पाते॥१६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अपरे बाहुबलिनः क्लिश्यन्ते बहवो जनाः ॥ १७ ॥
दुःखेन चाधिगच्छन्ति भोजनं द्विजसत्तम।

मूलम्

अपरे बाहुबलिनः क्लिश्यन्ते बहवो जनाः ॥ १७ ॥
दुःखेन चाधिगच्छन्ति भोजनं द्विजसत्तम।

अनुवाद (हिन्दी)

विप्रवर! दूसरे बहुत-से ऐसे मनुष्य हैं, जिनकी भुजाओंमें बल है—जो स्वस्थ और अन्नको पचानेमें समर्थ हैं, परंतु उन्हें बड़ी कठिनाईसे भोजन मिल पाता है—वे सदा ही अन्नका कष्ट भोगते रहते हैं॥१७॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

इति लोकमनाक्रन्दं मोहशोकपरिप्लुतम् ॥ १८ ॥
स्रोतसासकृदाक्षिप्तं ह्रियमाणं बलीयसा ।

मूलम्

इति लोकमनाक्रन्दं मोहशोकपरिप्लुतम् ॥ १८ ॥
स्रोतसासकृदाक्षिप्तं ह्रियमाणं बलीयसा ।

अनुवाद (हिन्दी)

इस प्रकार यह संसार असहाय तथा मोह, शोकमें डूबा हुआ है। कर्मोंके अत्यन्त प्रबल प्रवाहमें पड़कर बार-बार उसकी आधि-व्याधिरूपी तरंगोंके थपेड़े सहता और विवश होकर इधर-से-उधर बहता रहता है॥१८॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

न म्रियेयुर्न जीर्येयुः सर्वे स्युः सार्वकामिकाः ॥ १९ ॥
नाप्रियं प्रतिपश्येयुर्वशित्वं यदि वै भवेत्।

मूलम्

न म्रियेयुर्न जीर्येयुः सर्वे स्युः सार्वकामिकाः ॥ १९ ॥
नाप्रियं प्रतिपश्येयुर्वशित्वं यदि वै भवेत्।

अनुवाद (हिन्दी)

यदि जीव अपने वशमें होते तो वे न मरते और न बूढ़े ही होते। सभी सब तरहकी मनचाही वस्तुओंको प्राप्त कर लेते। किसीको अप्रिय घटना नहीं देखनी पड़ती॥१९॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

उपर्युपरि लोकस्य सर्वो गन्तुं समीहते।
यतते च यथाशक्ति न च तद् वर्तते तथा॥२०॥

मूलम्

उपर्युपरि लोकस्य सर्वो गन्तुं समीहते।
यतते च यथाशक्ति न च तद् वर्तते तथा॥२०॥

अनुवाद (हिन्दी)

सब लोग सारे जगत्‌के ऊपर-ऊपर जानेकी इच्छा रखते हैं—सभी सबसे ऊँचा होना चाहते हैं और उसके लिये वे यथाशक्ति प्रयत्न भी करते हैं परंतु (सभी जगह) वैसा होता नहीं है॥२०॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

बहवः सम्प्रदृश्यन्ते तुल्यनक्षत्रमङ्गलाः ।
महच्च फलवैषम्यं दृश्यते कर्मसंधिषु ॥ २१ ॥

मूलम्

बहवः सम्प्रदृश्यन्ते तुल्यनक्षत्रमङ्गलाः ।
महच्च फलवैषम्यं दृश्यते कर्मसंधिषु ॥ २१ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

बहुत-से ऐसे मनुष्य देखे जाते हैं, जिनका जन्म एक ही नक्षत्रमें हुआ है और जिनके लिये मंगल कृत्य भी समानरूपसे ही किये गये हैं, परंतु विभिन्न प्रकारके कर्मोंका संग्रह होनेके कारण उन्हें प्राप्त होनेवाले फलमें महान् अन्तर दृष्टिगोचर होता है॥२१॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

न केचिदीशते ब्रह्मन् स्वयंग्राह्यस्य सत्तम।
कर्मणा प्राक् कृतानां वै इह सिद्धिः प्रदृश्यते ॥ २२ ॥

मूलम्

न केचिदीशते ब्रह्मन् स्वयंग्राह्यस्य सत्तम।
कर्मणा प्राक् कृतानां वै इह सिद्धिः प्रदृश्यते ॥ २२ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

ब्रह्मन्! साधुशिरोमणे! कोई अपने हाथमें आयी हुई वस्तुका भी उपयोग करनेमें समर्थ नहीं है। इस जगत्‌में पूर्वजन्ममें किये हुए कर्मोंके ही फलकी प्राप्ति देखी जाती है॥२२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

यथाश्रुतिरियं ब्रह्मन् जीवः किल सनातनः।
शरीरमध्रुवं लोके सर्वेषां प्राणिनामिह ॥ २३ ॥

मूलम्

यथाश्रुतिरियं ब्रह्मन् जीवः किल सनातनः।
शरीरमध्रुवं लोके सर्वेषां प्राणिनामिह ॥ २३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

विप्रवर! श्रुतिके अनुसार यह जीवात्मा निश्चय ही सनातन है और इस संसारमें समस्त प्राणियोंका शरीर नश्वर है॥२३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

वध्यमाने शरीरे तु देहनाशो भवत्युत।
जीवः सङ्क्रमतेऽन्यत्र कर्मबन्धनिबन्धनः ॥ २४ ॥

मूलम्

वध्यमाने शरीरे तु देहनाशो भवत्युत।
जीवः सङ्क्रमतेऽन्यत्र कर्मबन्धनिबन्धनः ॥ २४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

शरीरपर आघात करनेसे उस शरीरका नाश तो हो जाता है; किंतु अविनाशी जीव नहीं मरता। वह कर्मोंके बन्धनमें बँधकर फिर दूसरे शरीरमें प्रवेश कर जाता है॥

मूलम् (वचनम्)

ब्राह्मण उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

कथं धर्मविदां श्रेष्ठ जीवो भवति शाश्वतः।
एतदिच्छाम्यहं ज्ञातुं तत्त्वेन वदतां वर ॥ २५ ॥

मूलम्

कथं धर्मविदां श्रेष्ठ जीवो भवति शाश्वतः।
एतदिच्छाम्यहं ज्ञातुं तत्त्वेन वदतां वर ॥ २५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

ब्राह्मणने पूछा— धर्मज्ञों तथा वक्ताओंमें श्रेष्ठ व्याध! जीव सनातन कैसे है? मैं इस विषयको यथार्थरूपसे जानना चाहता हूँ॥२५॥

मूलम् (वचनम्)

व्याध उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

न जीवनाशोऽस्ति हि देहभेदे
मिथ्यैतदाहुर्म्रियते किलेति ।
जीवस्तु देहान्तरितः प्रयाति
दशार्धतैवास्य शरीरभेदः ॥ २६ ॥

मूलम्

न जीवनाशोऽस्ति हि देहभेदे
मिथ्यैतदाहुर्म्रियते किलेति ।
जीवस्तु देहान्तरितः प्रयाति
दशार्धतैवास्य शरीरभेदः ॥ २६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

धर्मव्याधने कहा— ब्रह्मन्! देहका नाश होनेपर जीवका नाश नहीं होता। मनुष्योंका यह कथन कि ‘जीव मरता है’ मिथ्या ही है, किंतु जीव तो इस शरीरको छोड़कर दूसरे शरीरमें चला जाता है। शरीरके पाँचों तत्त्वोंका पृथक्-पृथक् पाँच भूतोंमें मिल जाना ही उसका नाश कहलाता है॥२६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अन्यो हि नाश्नाति कृतं हि कर्म
मनुष्यलोके मनुजस्य कश्चित् ।
यत् तेन किंचिद्धि कृतं हि कर्म
तदश्नुते नास्ति कृतस्य नाशः ॥ २७ ॥

मूलम्

अन्यो हि नाश्नाति कृतं हि कर्म
मनुष्यलोके मनुजस्य कश्चित् ।
यत् तेन किंचिद्धि कृतं हि कर्म
तदश्नुते नास्ति कृतस्य नाशः ॥ २७ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

इस मानवलोकमें मनुष्यके किये हुए कर्मको (उस कर्ताके सिवा) दूसरा कोई नहीं भोगता है। उसके द्वारा जो कुछ ही कर्म किया गया है, उसे वह स्वयं ही भोगेगा। किये हुए कर्मोंका कभी नाश नहीं होता॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

सुपुण्यशीला हि भवन्ति पुण्या
नराधमाः पापकृतो भवन्ति ।
नरोऽनुयातस्त्विह कर्मभिः स्वै-
स्ततः समुत्पद्यति भावितस्तैः ॥ २८ ॥

मूलम्

सुपुण्यशीला हि भवन्ति पुण्या
नराधमाः पापकृतो भवन्ति ।
नरोऽनुयातस्त्विह कर्मभिः स्वै-
स्ततः समुत्पद्यति भावितस्तैः ॥ २८ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

पुण्यात्मा मनुष्य पुण्यकर्मोंका अनुष्ठान करते हैं और नीच मनुष्य पापमें प्रवृत्त होते हैं। यहाँ अपने किये हुए कर्म मनुष्यका अनुसरण करते हैं और उनसे प्रभावित होकर वह दूसरा जन्म धारण करता है॥२८॥

मूलम् (वचनम्)

ब्राह्मण उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

कथं सम्भवते योनौ कथं वा पुण्यपापयोः।
जातीः पुण्यास्त्वपुण्याश्च कथं गच्छति सत्तम ॥ २९ ॥

मूलम्

कथं सम्भवते योनौ कथं वा पुण्यपापयोः।
जातीः पुण्यास्त्वपुण्याश्च कथं गच्छति सत्तम ॥ २९ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

ब्राह्मणने पूछा— सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ! जीव दूसरी योनिमें कैसे जन्म लेता है, पाप और पुण्यसे उसका सम्बन्ध किस प्रकार होता है तथा उसे पुण्ययोनि और पापयोनिकी प्राप्ति कैसे होती है?॥२९॥

मूलम् (वचनम्)

व्याध उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

गर्भाधानसमायुक्तं कर्मेदं सम्प्रदृश्यते ।
समासेन तु ते क्षिप्रं प्रवक्ष्यामि द्विजोत्तम ॥ ३० ॥

मूलम्

गर्भाधानसमायुक्तं कर्मेदं सम्प्रदृश्यते ।
समासेन तु ते क्षिप्रं प्रवक्ष्यामि द्विजोत्तम ॥ ३० ॥

अनुवाद (हिन्दी)

व्याधने कहा— विप्रवर! गर्भाधान आदि संस्कार-सम्बंधी ग्रन्थोंद्वारा यह प्रतिपादन किया गया है ‘कि यह जो कुछ भी दृष्टिगोचर हो रहा है, सब कर्मोंका ही परिणाम है।’ अतः किस कर्मसे कहाँ जन्म होता है? इस विषयका मैं तुमसे संक्षिप्त वर्णन करता हूँ, सुनो॥३०॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

यथा सम्भृतसम्भारः पुनरेव प्रजायते।
शुभकृच्छुभयोनीषु पापकृत् पापयोनिषु ॥ ३१ ॥

मूलम्

यथा सम्भृतसम्भारः पुनरेव प्रजायते।
शुभकृच्छुभयोनीषु पापकृत् पापयोनिषु ॥ ३१ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

जीव कर्मबीजोंका संग्रह करके जिस प्रकार पुनः जन्म ग्रहण करता है, वह बताया जा रहा है। शुभकर्म करनेवाला मनुष्य शुभ योनियोंमें और पापकर्म करनेवाला पापयोनियोंमें जन्म लेता है॥३१॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

शुभैः प्रयोगैर्देवत्वं व्यामिश्रैर्मानुषो भवेत्।
मोहनीयैर्वियोनीषु त्वधोगामी च किल्बिषी ॥ ३२ ॥

मूलम्

शुभैः प्रयोगैर्देवत्वं व्यामिश्रैर्मानुषो भवेत्।
मोहनीयैर्वियोनीषु त्वधोगामी च किल्बिषी ॥ ३२ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

शुभकर्मोंके संयोगसे जीवको देवत्वकी प्राप्ति होती है। शुभ और अशुभ दोनोंके सम्मिश्रणसे उसका मनुष्य-योनिमें जन्म होता है। मोहमें डालनेवाले तामस कर्मोंके आचरणसे जीव पशु, पक्षी आदिकी योनिमें जन्म ग्रहण करता है और जिसने केवल पापका ही संचय किया है, वह नरकगामी होता है॥३२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

जातिमृत्युजरादुःखैः सततं समभिद्रुतः ।
संसारे पच्यमानश्च दोषैरात्मकृतैर्नरः ॥ ३३ ॥

मूलम्

जातिमृत्युजरादुःखैः सततं समभिद्रुतः ।
संसारे पच्यमानश्च दोषैरात्मकृतैर्नरः ॥ ३३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

मनुष्य अपने ही किये हुए अपराधोंके कारण जन्म-मृत्यु और जरासम्बन्धी दुःखोंसे सदा पीडित हो बारंबार संसारमें पचता रहता है॥३३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तिर्यग्योनिसहस्राणि गत्वा नरकमेव च।
जीवाः सम्परिवर्तन्ते कर्मबन्धनिबन्धनाः ॥ ३४ ॥

मूलम्

तिर्यग्योनिसहस्राणि गत्वा नरकमेव च।
जीवाः सम्परिवर्तन्ते कर्मबन्धनिबन्धनाः ॥ ३४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

कर्मबन्धनमें बँधे हुए (पापी) जीव सहस्रों प्रकारकी तिर्यक् योनियों तथा नरकोंमें चक्कर लगाया करते हैं॥३४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

जन्तुस्तु कर्मभिस्तैस्तैः स्वकृतैः प्रेत्य दुःखितः।
तद्‌दुःखप्रतिघातार्थमपुण्यां योनिमाप्नुते ॥ ३५ ॥

मूलम्

जन्तुस्तु कर्मभिस्तैस्तैः स्वकृतैः प्रेत्य दुःखितः।
तद्‌दुःखप्रतिघातार्थमपुण्यां योनिमाप्नुते ॥ ३५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

प्रत्येक जीव अपने किये हुए कर्मोसे ही मृत्युके पश्चात् दुःख भोगता है और उस दुःखका भोग करनेके लिये ही वह (चाण्डालादि) पापयोनिमें जन्म लेता है॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ततः कर्म समादत्ते पुनरन्यं नवं बहु।
पच्यते तु पुनस्तेन भुक्त्वापथ्यमिवातुरः ॥ ३६ ॥

मूलम्

ततः कर्म समादत्ते पुनरन्यं नवं बहु।
पच्यते तु पुनस्तेन भुक्त्वापथ्यमिवातुरः ॥ ३६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

वहाँ फिर नये-नये बहुत-से पापकर्म कर डालता है, जिसके कारण कुपथ्य खा लेनेवाले रोगीकी भाँति उसे नाना प्रकारके कष्ट भोगने पड़ते हैं॥३६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अजस्रमेव दुःखार्तोऽदुःखितः सुखसंज्ञितः ।
ततोऽनिवृत्तबन्धत्वात् कर्मणामुदयादपि ॥ ३७ ॥
परिक्रामति संसारे चक्रवद् बहुवेदनः।

मूलम्

अजस्रमेव दुःखार्तोऽदुःखितः सुखसंज्ञितः ।
ततोऽनिवृत्तबन्धत्वात् कर्मणामुदयादपि ॥ ३७ ॥
परिक्रामति संसारे चक्रवद् बहुवेदनः।

अनुवाद (हिन्दी)

इस प्रकार वह यद्यपि निरन्तर दुःख ही भोगता रहता है, तथापि अपनेको दुःखी नहीं मानता। इस दुःखको ही वह सुखकी संज्ञा दे देता है। जबतक बन्धनमें डालनेवाले कर्मोंका भोग पूरा नहीं होता और नये-नये कर्म बनते रहते हैं तबतक अनेक प्रकारके कष्टोंको सहन करता हुआ वह चक्रकी तरह इस संसारमें चक्कर लगाता रहता है॥३७॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

स चेन्निवृत्तबन्धस्तु विशुद्धश्चापि कर्मभिः ॥ ३८ ॥
तपोयोगसमारम्भं कुरुते द्विजसत्तम ।
कर्मभिर्बहुभिश्चापि लोकानश्नाति मानवः ॥ ३९ ॥

मूलम्

स चेन्निवृत्तबन्धस्तु विशुद्धश्चापि कर्मभिः ॥ ३८ ॥
तपोयोगसमारम्भं कुरुते द्विजसत्तम ।
कर्मभिर्बहुभिश्चापि लोकानश्नाति मानवः ॥ ३९ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

द्विजश्रेष्ठ! जब बन्धनकारक कर्मोंका भोग पूरा हो जाता है और सत्कर्मोंके द्वारा मनुष्यमें शुद्धि आ जाती है, तब वह तप और योगका आरम्भ करता है। अतः बहुत-से शुभकर्मोंके फलस्वरूप उसे उत्तम लोकोंका भोग प्राप्त होता है॥३८-३९॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

स चेन्निवृत्तबन्धस्तु विशुद्धश्चापि कर्मभिः।
प्राप्नोति सुकृताल्ँलोकान् यत्र गत्वा न शोचति ॥ ४० ॥

मूलम्

स चेन्निवृत्तबन्धस्तु विशुद्धश्चापि कर्मभिः।
प्राप्नोति सुकृताल्ँलोकान् यत्र गत्वा न शोचति ॥ ४० ॥

अनुवाद (हिन्दी)

इस प्रकार बन्धनरहित तथा शुद्ध हुआ मनुष्य अपने पुण्य कर्मोंके प्रभावसे पुण्यलोक प्राप्त करता है, जहाँ जाकर कोई भी शोक नहीं करता है॥४०॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

पापं कुर्वन् पापवृत्तः पापस्यान्तं न गच्छति।
तस्मात् पुण्यं यतेत् कर्तुं वर्जयीत च पापकम् ॥ ४१ ॥

मूलम्

पापं कुर्वन् पापवृत्तः पापस्यान्तं न गच्छति।
तस्मात् पुण्यं यतेत् कर्तुं वर्जयीत च पापकम् ॥ ४१ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

पाप करनेवाले मनुष्यको पापकी आदत हो जाती है, फिर उसके पापका अन्त नहीं होता। अतः मनुष्यको चाहिये कि वह पुण्य कर्म करनेका ही प्रयत्न करे और पापको सर्वथा त्याग दे॥४१॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अनसूयुः कृतज्ञश्च कल्याणानि च सेवते।
सुखानि धर्ममर्थं च स्वर्गं च लभते नरः ॥ ४२ ॥

मूलम्

अनसूयुः कृतज्ञश्च कल्याणानि च सेवते।
सुखानि धर्ममर्थं च स्वर्गं च लभते नरः ॥ ४२ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

पुण्यात्मा मनुष्य दोषदृष्टिसे रहित और कृतज्ञ होकर कल्याणकारी कर्मोंका सेवन करता है तथा उसे सुख, धर्म, अर्थ एवं स्वर्गकी प्राप्ति होती है॥४२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

संस्कृतस्य च दान्तस्य नियतस्य यतात्मनः।
प्राज्ञस्यानन्तरा वृत्तिरिह लोके परत्र च ॥ ४३ ॥

मूलम्

संस्कृतस्य च दान्तस्य नियतस्य यतात्मनः।
प्राज्ञस्यानन्तरा वृत्तिरिह लोके परत्र च ॥ ४३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

जो संस्कारसम्पन्न, जितेन्द्रिय, शौचाचारपरायण और मनको काबूमें रखनेवाला है, उस बुद्धिमान् पुरुषको इहलोक और परलोकमें भी सुखकी प्राप्ति होती है॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

सतां धर्मेण वर्तेत क्रियां शिष्टवदाचरेत्।
असंक्लेशेन लोकस्य वृत्तिं लिप्सेत वै द्विज ॥ ४४ ॥

मूलम्

सतां धर्मेण वर्तेत क्रियां शिष्टवदाचरेत्।
असंक्लेशेन लोकस्य वृत्तिं लिप्सेत वै द्विज ॥ ४४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

ब्रह्मन्! अतः मनुष्यको चाहिये कि वह सत्पुरुषोंके धर्मका पालन करे, शिष्ट पुरुषोंके समान बर्ताव करे और जगत्‌में किसी भी प्राणीको कष्ट दिये बिना जिससे जीवन-निर्वाह हो सके—ऐसी आजीविका प्राप्त करनेकी इच्छा करे॥४४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

सन्ति ह्यागमविज्ञानाः शिष्टाः शास्त्रे विचक्षणाः।
स्वधर्मेण क्रिया लोके कर्मणः सोऽप्यसंकरः ॥ ४५ ॥

मूलम्

सन्ति ह्यागमविज्ञानाः शिष्टाः शास्त्रे विचक्षणाः।
स्वधर्मेण क्रिया लोके कर्मणः सोऽप्यसंकरः ॥ ४५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

संसारमें बहुत-से वेदवेत्ता और शास्त्रविचक्षण शिष्ट पुरुष विद्यमान हैं, उनके उपदेशके अनुसार स्वधर्मके पालनपूर्वक प्रत्येक कार्य करना चाहिये, इससे कर्मोंका संकर नहीं हो पाता॥४५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

प्राज्ञो धर्मेण रमते धर्मं चैवोपजीवति।
तस्माद् धर्मादवाप्तेन धनेन द्विजसत्तम ॥ ४६ ॥
तस्यैव सिञ्चते मूलं गुणान् पश्यति तत्र वै।

मूलम्

प्राज्ञो धर्मेण रमते धर्मं चैवोपजीवति।
तस्माद् धर्मादवाप्तेन धनेन द्विजसत्तम ॥ ४६ ॥
तस्यैव सिञ्चते मूलं गुणान् पश्यति तत्र वै।

अनुवाद (हिन्दी)

द्विजश्रेष्ठ! बुद्धिमान् पुरुष धर्मसे ही आनन्द मानता है, धर्मका ही आश्रय लेकर जीवन-निर्वाह करता है और धर्मसे ही उपलब्ध किये हुए धनसे धनका ही मूल सींचता है, अर्थात् धर्मका पालन करता है। वह धर्ममें ही गुण देखता है॥४६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

धर्मात्मा भवति ह्येवं चित्तं चास्य प्रसीदति ॥ ४७ ॥
स मित्रजनसंतुष्ट इह प्रेत्य च नन्दति।

मूलम्

धर्मात्मा भवति ह्येवं चित्तं चास्य प्रसीदति ॥ ४७ ॥
स मित्रजनसंतुष्ट इह प्रेत्य च नन्दति।

अनुवाद (हिन्दी)

इस प्रकार वह धर्मात्मा होता है, उसका अन्तःकरण निर्मल हो जाता है तथा मित्रजनोंसे संतुष्ट होकर वह इहलोक और परलोकमें भी आनन्दित होता है॥४७॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

शब्दं स्पर्शं तथा रूपं गन्धानिष्टांश्च सत्तम ॥ ४८ ॥
प्रभुत्वं लभते चापि धर्मस्यैतत् फलं विदुः।

मूलम्

शब्दं स्पर्शं तथा रूपं गन्धानिष्टांश्च सत्तम ॥ ४८ ॥
प्रभुत्वं लभते चापि धर्मस्यैतत् फलं विदुः।

अनुवाद (हिन्दी)

सज्जनशिरोमणे! धर्मात्मा पुरुष शब्द, स्पर्श, रूप और प्रिय गन्ध—सभी प्रकारके विषय तथा प्रभुत्व भी प्राप्त करता है। उसकी यह स्थिति धर्मका ही फल मानी गयी है॥४८॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

धर्मस्य च फलं लब्ध्वा न तृप्यति महाद्विज ॥ ४९ ॥
अतृप्यमाणो निर्वेदमापेदे ज्ञानचक्षुषा ।

मूलम्

धर्मस्य च फलं लब्ध्वा न तृप्यति महाद्विज ॥ ४९ ॥
अतृप्यमाणो निर्वेदमापेदे ज्ञानचक्षुषा ।

अनुवाद (हिन्दी)

द्विजोत्तम! कोई-कोई धर्मके फलरूपसे सांसारिक सुखको पाकर संतुष्ट नहीं होता। वह ज्ञानदृष्टिके कारण विषयभोगके सुखसे तृप्ति-लाभ न करके निर्वेद (वैराग्य)-को प्राप्त होता है॥४९॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

प्रज्ञाचक्षुर्नर इह दोषं नैवानुरुध्यते ॥ ५० ॥
विरज्यति यथाकामं न च धर्मं विमुञ्चति।

मूलम्

प्रज्ञाचक्षुर्नर इह दोषं नैवानुरुध्यते ॥ ५० ॥
विरज्यति यथाकामं न च धर्मं विमुञ्चति।

अनुवाद (हिन्दी)

इस जगत्‌में ज्ञानदृष्टिसे सम्पन्न पुरुष राग-द्वेष आदि दोषोंका अनुसरण नहीं करता। उसे यथेष्ट वैराग्य होता है तथा वह कभी धर्मका त्याग नहीं करता है॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

सर्वत्यागे च यतते दृष्ट्वा लोकं क्षयात्मकम् ॥ ५१ ॥
ततो मोक्षे प्रयतते नानुपायादुपायतः।

मूलम्

सर्वत्यागे च यतते दृष्ट्वा लोकं क्षयात्मकम् ॥ ५१ ॥
ततो मोक्षे प्रयतते नानुपायादुपायतः।

अनुवाद (हिन्दी)

सम्पूर्ण जगत्‌को नश्वर समझकर वह सबको त्यागनेका प्रयत्न करता है। तत्पश्चात् उचित उपायसे मोक्षके लिये सचेष्ट होता है। अनुपाय (प्रारब्ध आदि)-का अवलम्बन करके बैठ नहीं रहता॥५१॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

एवं निर्वेदमादत्ते पापं कर्म जहाति च ॥ ५२ ॥
धार्मिकश्चापि भवति मोक्षं च लभते परम्।

मूलम्

एवं निर्वेदमादत्ते पापं कर्म जहाति च ॥ ५२ ॥
धार्मिकश्चापि भवति मोक्षं च लभते परम्।

अनुवाद (हिन्दी)

इस प्रकार वह वैराग्यको अपनाता और पापकर्मको छोड़ता जाता है। फिर सर्वथा धर्मात्मा हो जाता और अन्तमें परम मोक्ष प्राप्त कर लेता है॥५२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तपो निःश्रेयसं जन्तोस्तस्य मूलं शमो दमः ॥ ५३ ॥
तेन सर्वानवाप्नोति कामान् यान् मनसेच्छति।

मूलम्

तपो निःश्रेयसं जन्तोस्तस्य मूलं शमो दमः ॥ ५३ ॥
तेन सर्वानवाप्नोति कामान् यान् मनसेच्छति।

अनुवाद (हिन्दी)

जीवके कल्याणका साधन है तप और उसका मूल है शम (मनोनिग्रह) तथा दम (इन्द्रियसंयम)। मनुष्य मनके द्वारा जिन-जिन अभीष्ट पदार्थोंको पाना चाहता है उन सबको वह उस तपके द्वारा प्राप्त कर लेता है॥५३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

इन्द्रियाणां निरोधेन सत्येन च दमेन च।
ब्रह्मणः पदमाप्नोति यत् परं द्विजसत्तम ॥ ५४ ॥

मूलम्

इन्द्रियाणां निरोधेन सत्येन च दमेन च।
ब्रह्मणः पदमाप्नोति यत् परं द्विजसत्तम ॥ ५४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

द्विजश्रेष्ठ! इन्द्रियसंयम, सत्यभाषण और मनोनिग्रह—इनके द्वारा मनुष्य ब्रह्मके परमपदको प्राप्त कर लेता है॥

मूलम् (वचनम्)

ब्राह्मण उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

इन्द्रियाणि तु यान्याहुः कानि तानि यतव्रत।
निग्रहश्च कथं कार्यो निग्रहस्य च किं फलम् ॥ ५५ ॥

मूलम्

इन्द्रियाणि तु यान्याहुः कानि तानि यतव्रत।
निग्रहश्च कथं कार्यो निग्रहस्य च किं फलम् ॥ ५५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

ब्राह्मणने पूछा— उत्तम व्रतका पालन करनेवाले व्याध! जिन्हें इन्द्रिय कहते हैं, वे कौन-कौन हैं? उनका निग्रह कैसे करना चाहिये? और उस निग्रहका फल क्या है?॥५५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

कथं च फलमाप्नोति तेषां धर्मभृतां वर।
एतदिच्छामि तत्त्वेन धर्मं ज्ञातुं निबोध मे ॥ ५६ ॥

मूलम्

कथं च फलमाप्नोति तेषां धर्मभृतां वर।
एतदिच्छामि तत्त्वेन धर्मं ज्ञातुं निबोध मे ॥ ५६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ व्याध! उन इन्द्रियोंके निग्रहका फल कैसे प्राप्त होता है? मैं इस इन्द्रिय-निग्रहरूपी धर्मको यथार्थरूपसे जानना चाहता हूँ। तुम मुझे समझाओ॥५६॥

मूलम् (समाप्तिः)

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि ब्राह्मणव्याधसंवादे नवाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०९ ॥

मूलम् (वचनम्)

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें ब्राह्मण-व्याध-संवादविषयक दो सौ नौवाँ अध्याय पूरा हुआ॥२०९॥


  1. कर्णपर्वके उनहत्तरवें अध्यायमें छियालीसवेंसे तिरपनवें श्लोकोंमें एक कथा आती है। कौशिक नामका एक तपस्वी ब्राह्मण था। उसने यह व्रत ले लिया कि ‘मैं सदा सत्य बोलूँगा।’ एक दिन कुछ लोग लुटेरोंके भयसे छिपनेके लिये उसके आश्रमके पासके वनमें घुस गये। खोज करते हुए लुटेरोंने सत्यवादी कौशिकसे पूछा। उनके पूछनेपर कौशिकने सच्ची बात कह दी। पता लग जानेपर उन निर्दयी डाकुओंने उन लोगोंको पकड़कर मार डाला। इस प्रकार सत्य बोलनेके कारण लोगोंकी हिंसा हो जानेसे उस पापके फलस्वरूप कौशिकको नरक जाना पड़ा। ↩︎ ↩︎