२०५ पतिव्रतोपाख्याने

भागसूचना

पञ्चाधिकद्विशततमोऽध्यायः

सूचना (हिन्दी)

पतिव्रता स्त्री तथा पिता-माताकी सेवाका माहात्म्य

मूलम् (वचनम्)

वैशम्पायन उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

ततो युधिष्ठिरो राजा मार्कण्डेयं महाद्युतिम्।
पप्रच्छ भरतश्रेष्ठ धर्मप्रश्नं सुदुर्विदम् ॥ १ ॥

मूलम्

ततो युधिष्ठिरो राजा मार्कण्डेयं महाद्युतिम्।
पप्रच्छ भरतश्रेष्ठ धर्मप्रश्नं सुदुर्विदम् ॥ १ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

वैशम्पायनजी कहते हैं— भरतश्रेष्ठ जनमेजय! तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने महातेजस्वी मार्कण्डेय मुनिसे धर्मविषयक प्रश्न किया, जो समझनेमें अत्यन्त कठिन था॥१॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

श्रोतुमिच्छामि भगवन् स्त्रीणां माहात्म्यमुत्तमम्।
कथ्यमानं त्वया विप्र सूक्ष्मं धर्म्यं च तत्त्वतः ॥ २ ॥

मूलम्

श्रोतुमिच्छामि भगवन् स्त्रीणां माहात्म्यमुत्तमम्।
कथ्यमानं त्वया विप्र सूक्ष्मं धर्म्यं च तत्त्वतः ॥ २ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

वे बोले—‘भगवन्! मैं आपके मुखसे (पतिव्रता) स्त्रियोंके सूक्ष्म, धर्मसम्मत एवं उत्तम माहात्म्यका यथार्थ वर्णन सुनना चाहता हूँ॥२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

प्रत्यक्षमिह विप्रर्षे देवा दृश्यन्ति सत्तम।
सूर्याचन्द्रमसौ वायुः पृथिवी वह्निरेव च ॥ ३ ॥
पिता माता च भगवन् गुरुरेव च सत्तम।
यच्चान्यद् देवविहितं तच्चापि भृगुनन्दन ॥ ४ ॥

मूलम्

प्रत्यक्षमिह विप्रर्षे देवा दृश्यन्ति सत्तम।
सूर्याचन्द्रमसौ वायुः पृथिवी वह्निरेव च ॥ ३ ॥
पिता माता च भगवन् गुरुरेव च सत्तम।
यच्चान्यद् देवविहितं तच्चापि भृगुनन्दन ॥ ४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘भगवन्! श्रेष्ठ ब्रह्मर्षे! इस जगत्‌में सूर्य, चन्द्रमा, वायु, पृथिवी, अग्नि, पिता, माता और गुरु—ये प्रत्यक्ष देवता दिखायी देते हैं। भृगुनन्दन! इसके सिवा अन्य जो देवतारूपसे स्थापित देवविग्रह हैं, वे भी प्रत्यक्ष देवताओंकी ही कोटिमें हैं’॥३-४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

मान्या हि गुरवः सर्वे एकपत्न्यस्तथा स्त्रियः।
पतिव्रतानां शश्रूषा दुष्करा प्रतिभाति मे ॥ ५ ॥

मूलम्

मान्या हि गुरवः सर्वे एकपत्न्यस्तथा स्त्रियः।
पतिव्रतानां शश्रूषा दुष्करा प्रतिभाति मे ॥ ५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘समस्त गुरुजन और पतिव्रता नारियाँ भी समादरके योग्य हैं। पतिव्रता स्त्रियाँ अपने पतिकी जैसी सेवा-शुश्रूषा करती हैं; वह दूसरे किसीके लिये मुझे अत्यन्त कठिन प्रतीत होती है॥५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

पतिव्रतानां माहात्म्यं वक्तुमर्हसि नः प्रभो।
निरुद्ध्य चेन्द्रियग्रामं मनः संरुध्य चानघ ॥ ६ ॥
पतिं दैवतवच्चापि चिन्तयन्त्यः स्थिता हि याः।
भगवन् दुष्करं त्वेतत् प्रतिभाति मम प्रभो ॥ ७ ॥

मूलम्

पतिव्रतानां माहात्म्यं वक्तुमर्हसि नः प्रभो।
निरुद्ध्य चेन्द्रियग्रामं मनः संरुध्य चानघ ॥ ६ ॥
पतिं दैवतवच्चापि चिन्तयन्त्यः स्थिता हि याः।
भगवन् दुष्करं त्वेतत् प्रतिभाति मम प्रभो ॥ ७ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘प्रभो! आप अब हमें पतिव्रता स्त्रियोंकी महिमा सुनावें। निष्पाप सहर्ष! जो अपनी इन्द्रियोंको संयममें रखती हुई मनको वशमें करके अपने पतिका देवताके समान ही चिन्तन करती रहती हैं, वे नारियाँ धन्य हैं। प्रभो! भगवन्! उनका वह त्याग और सेवाभाव मुझे तो अत्यन्त कठिन जान पड़ता है॥६-७॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

मातापित्रोश्च शुश्रूषा स्त्रीणां भर्तरि च द्विज।
स्त्रीणां धर्मात् सुघोराद्धि नान्यं पश्यामि दुष्करम् ॥ ८ ॥

मूलम्

मातापित्रोश्च शुश्रूषा स्त्रीणां भर्तरि च द्विज।
स्त्रीणां धर्मात् सुघोराद्धि नान्यं पश्यामि दुष्करम् ॥ ८ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘ब्रह्मन्! पुत्रोंद्वारा माता-पिताकी सेवा तथा स्त्रियोंद्वारा की हुई पतिकी सेवा बहुत कठिन है। स्त्रियोंके इस कठोर धर्मसे बढ़कर और कोई दुष्कर कार्य मुझे नहीं दिखायी देता है॥८॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

साध्वाचाराः स्त्रियो ब्रह्मन् यत् कुर्वन्ति सदाऽऽदृताः।
दुष्करं खलु कुर्वन्ति पितरं मातरं च वै ॥ ९ ॥
एकपत्न्यश्च या नार्यो याश्च सत्यं वदन्त्युत।

मूलम्

साध्वाचाराः स्त्रियो ब्रह्मन् यत् कुर्वन्ति सदाऽऽदृताः।
दुष्करं खलु कुर्वन्ति पितरं मातरं च वै ॥ ९ ॥
एकपत्न्यश्च या नार्यो याश्च सत्यं वदन्त्युत।

अनुवाद (हिन्दी)

‘ब्रह्मन्! समाजमें सदा आदर पानेवाली सदाचारिणी स्त्रियाँ जो महान् कार्य करती हैं वह अत्यन्त कठिन है। जो लोग पिता-माताकी सेवा करते हैं उनका कर्म भी बहुत कठिन है। पतिव्रता तथा सत्यवादिनी स्त्रियाँ अत्यन्त कठोर धर्मका पालन करती हैं॥९॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

कुक्षिणा दश मासांश्च गर्भं संधारयन्ति याः ॥ १० ॥
नार्यः कालेन सम्भूय किमद्भततरं ततः।

मूलम्

कुक्षिणा दश मासांश्च गर्भं संधारयन्ति याः ॥ १० ॥
नार्यः कालेन सम्भूय किमद्भततरं ततः।

अनुवाद (हिन्दी)

‘स्त्रियाँ अपने उदरमें दस महीनेतक जो गर्भ धारण करती हैं और यथासमय उसको जन्म देती हैं, इससे अद्‌भुत कार्य और कौन होगा?॥१०॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

संशयं परमं प्राप्य वेदनामतुलामपि ॥ ११ ॥
प्रजायते सुतान् नार्यो दुःखेन महता विभो।
पुष्णन्ति चापि महता स्नेहेन द्विजपुङ्गव ॥ १२ ॥

मूलम्

संशयं परमं प्राप्य वेदनामतुलामपि ॥ ११ ॥
प्रजायते सुतान् नार्यो दुःखेन महता विभो।
पुष्णन्ति चापि महता स्नेहेन द्विजपुङ्गव ॥ १२ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘भगवन्! अपनेको भारी प्राणसंकटमें डालकर और अतुल वेदनाको सहकर नारियाँ बड़े कष्टसे संतान उत्पन्न करती हैं! विप्रवर! फिर बड़े स्नेहसे उनका पालन भी करती हैं॥११-१२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

याश्च क्रूरेषु सत्त्वेषु वर्तमाना जुगुप्सिताः।
स्वकर्म कुर्वन्ति सदा दुष्करं तच्च मे मतम् ॥ १३ ॥

मूलम्

याश्च क्रूरेषु सत्त्वेषु वर्तमाना जुगुप्सिताः।
स्वकर्म कुर्वन्ति सदा दुष्करं तच्च मे मतम् ॥ १३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘जो सती-साध्वी स्त्रियाँ क्रूर स्वभावके पतियोंकी सेवामें रहकर उनके तिरस्कारका पात्र बनकर भी सदा अपने सती-धर्मका पालन करती रहती हैं, वह तो मुझे और भी अत्यन्त कठिन प्रतीत होता है॥१३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

क्षत्रधर्मसमाचारतत्त्वं व्याख्याहि मे द्विज।
धर्मः सुदुर्लभो विप्र नृशंसेन महात्मनाम् ॥ १४ ॥

मूलम्

क्षत्रधर्मसमाचारतत्त्वं व्याख्याहि मे द्विज।
धर्मः सुदुर्लभो विप्र नृशंसेन महात्मनाम् ॥ १४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘ब्रह्मन्! आप मुझे क्षत्रियोंके धर्म और आचारका तत्त्व भी विस्तारपूर्वक बताइये। विप्रवर! जो क्रूर स्वभावके मनुष्य हैं, उनके लिये महात्माओंका धर्म अत्यन्त दुर्लभ है॥१४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

एतदिच्छामि भगवन् प्रश्नं प्रश्नविदां वर।
श्रीतुं भृगुकुलश्रेष्ठ शुश्रूषे तव सुव्रत ॥ १५ ॥

मूलम्

एतदिच्छामि भगवन् प्रश्नं प्रश्नविदां वर।
श्रीतुं भृगुकुलश्रेष्ठ शुश्रूषे तव सुव्रत ॥ १५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

भगवन्! भृगुकुलशिरोमणे! आप उत्तम व्रतके पालक और प्रश्नका समाधान करनेवाले विद्वानोंमें श्रेष्ठ हैं। मैंने जो प्रश्न आपके सम्मुख उपस्थित किया है, उसीका उत्तर मैं आपसे सुनना चाहता हूँ’॥१५॥

मूलम् (वचनम्)

मार्कण्डेय उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

हन्त तेऽहं समाख्यास्ये प्रश्नमेतं सुदुर्वचम्।
तत्त्वेन भरतश्रेष्ठ गदतस्तन्निबोध मे ॥ १६ ॥

मूलम्

हन्त तेऽहं समाख्यास्ये प्रश्नमेतं सुदुर्वचम्।
तत्त्वेन भरतश्रेष्ठ गदतस्तन्निबोध मे ॥ १६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

मार्कण्डेयजी बोले— भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे इस प्रश्नका विवेचन करना यद्यपि बहुत कठिन है, तो भी मैं अब इसका यथावत् समाधान करूँगा। तुम मेरे मुखसे सुनो॥१६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

मातॄस्तु गौरवादन्ये पितॄनन्ये तु मेनिरे।
दुष्करं कुरुते माता विवर्धयति या प्रजाः ॥ १७ ॥

मूलम्

मातॄस्तु गौरवादन्ये पितॄनन्ये तु मेनिरे।
दुष्करं कुरुते माता विवर्धयति या प्रजाः ॥ १७ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

कुछ लोग माताओंको गौरवकी दृष्टिसे बड़ी मानते हैं। दूसरे लोग पिताको महत्त्व देते हैं। परंतु माता जो अपनी संतानोंको पाल-पोसकर बड़ा बनाती है, वह उसका कठिन कार्य है॥१७॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तपसा देवतेज्याभिवन्दनेन तितिक्षया ।
सुप्रशस्तैरुपायैश्चापीहन्ते पितरः सुतान् ॥ १८ ॥

मूलम्

तपसा देवतेज्याभिवन्दनेन तितिक्षया ।
सुप्रशस्तैरुपायैश्चापीहन्ते पितरः सुतान् ॥ १८ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

माता-पिता तपस्या, देवपूजा, वन्दना, तितिक्षा तथा अन्य श्रेष्ठ उपायोंद्वारा भी पुत्रोंको प्राप्त करना चाहते हैं॥१८॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

एवं कृष्छ्रेण महता पुत्रं प्राप्य सुदुर्लभम्।
चिन्तयन्ति सदा वीर कीदृशोऽयं भविष्यति ॥ १९ ॥

मूलम्

एवं कृष्छ्रेण महता पुत्रं प्राप्य सुदुर्लभम्।
चिन्तयन्ति सदा वीर कीदृशोऽयं भविष्यति ॥ १९ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

वीर! इस प्रकार बड़ी कठिनाईसे परम दुर्लभ पुत्रको पाकर लोग सदा इस चिन्तामें डूबे रहते हैं कि न जाने यह किस तरहका होगा॥१९॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

आशंसते हि पुत्रेषु पिता माता च भारत।
यशः कीर्तिमथैश्वर्यं प्रजा धर्मं तथैव च ॥ २० ॥

मूलम्

आशंसते हि पुत्रेषु पिता माता च भारत।
यशः कीर्तिमथैश्वर्यं प्रजा धर्मं तथैव च ॥ २० ॥

अनुवाद (हिन्दी)

भारत! पिता और माता अपने पुत्रोंके लिये यश, कीर्ति और ऐश्वर्य, संतान तथा धर्मकी शुभकामना करते हैं॥२०॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तयोराशां तु सफलां यः करोति स धर्मवित्।
पिता माता च राजेन्द्र तुष्यतो यस्य नित्यशः ॥ २१ ॥
इह प्रेत्य च तस्याथ कीर्तिर्धर्मश्च शाश्वतः।

मूलम्

तयोराशां तु सफलां यः करोति स धर्मवित्।
पिता माता च राजेन्द्र तुष्यतो यस्य नित्यशः ॥ २१ ॥
इह प्रेत्य च तस्याथ कीर्तिर्धर्मश्च शाश्वतः।

अनुवाद (हिन्दी)

राजेन्द्र! जो उन दोनोंकी आशाको सफल करता है, वही पुत्र धर्मज्ञ है। जिसके माता-पिता उससे सदा संतुष्ट रहते हैं, उसे इहलोक और परलोकमें भी अक्षय कीर्ति और शाश्वत धर्मकी प्राप्ति होती है॥२१॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

नैव यज्ञक्रियाः काश्चिन्न श्राद्धं नोपवासकम् ॥ २२ ॥
या तु भर्तरि शुश्रूषा तया स्वर्गं जयत्युत।

मूलम्

नैव यज्ञक्रियाः काश्चिन्न श्राद्धं नोपवासकम् ॥ २२ ॥
या तु भर्तरि शुश्रूषा तया स्वर्गं जयत्युत।

अनुवाद (हिन्दी)

नारीके लिये किसी यज्ञकर्म, श्राद्ध और उपवासकी आवश्यकता नहीं है। वह जो पतिकी सेवा करती है, उसीके द्वारा स्वर्गलोकपर विजय प्राप्त कर लेती है॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

एतत् प्रकरणं राजन्नधिकृत्य युधिष्ठिर ॥ २३ ॥
पतिव्रतानां नियतं धर्मं चावहितः शृणु ॥ २४ ॥

मूलम्

एतत् प्रकरणं राजन्नधिकृत्य युधिष्ठिर ॥ २३ ॥
पतिव्रतानां नियतं धर्मं चावहितः शृणु ॥ २४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

राजा युधिष्ठिर! इसी प्रकरणमें पतिव्रताओंके नियत धर्मका वर्णन किया जायगा। तुम सावधान होकर सुनो॥२३-२४॥

मूलम् (समाप्तिः)

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि पतिव्रतोपाख्याने पञ्चाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०५ ॥

मूलम् (वचनम्)

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें पतिव्रतोपाख्यानविषयक दो सौ पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ॥२०५॥