२०३ धुन्धुमारोपाख्याने

भागसूचना

त्र्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

सूचना (हिन्दी)

ब्रह्माजीकी उत्पत्ति और भगवान् विष्णुके द्वारा मधु-कैटभका वध

मूलम् (वचनम्)

मार्कण्डेय उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

स एवमुक्तो राजर्षिरुत्तङ्केनापराजितः ।
उत्तङ्कं कौरवश्रेष्ठ कृताञ्जलिरथाब्रवीत् ॥ १ ॥

मूलम्

स एवमुक्तो राजर्षिरुत्तङ्केनापराजितः ।
उत्तङ्कं कौरवश्रेष्ठ कृताञ्जलिरथाब्रवीत् ॥ १ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

मार्कण्डेयजी कहते हैं— कौरवश्रेष्ठ! उत्तङ्कके इस प्रकार आग्रह करनेपर अपराजित वीर राजर्षि बृहदश्वने उनसे हाथ जोड़कर कहा—॥१॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

न तेऽभिगमनं ब्रह्मन् मोघमेतद् भविष्यति।
पुत्रो ममायं भगवन् कुवलाश्व इति स्मृतः ॥ २ ॥
धृतिमान् क्षिप्रकारी च वीर्येणाप्रतिमो भुवि।

मूलम्

न तेऽभिगमनं ब्रह्मन् मोघमेतद् भविष्यति।
पुत्रो ममायं भगवन् कुवलाश्व इति स्मृतः ॥ २ ॥
धृतिमान् क्षिप्रकारी च वीर्येणाप्रतिमो भुवि।

अनुवाद (हिन्दी)

‘ब्रह्मन्! आपका यह आगमन निष्फल नहीं होगा। भगवन्! मेरा यह पुत्र कुवलाश्व भूमण्डलमें अनुपम वीर है। यह धैर्यवान् और फुर्तीला है॥२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

प्रियं च ते सर्वमेतत् करिष्यति न संशयः ॥ ३ ॥
पुत्रैः परिवृतः सर्वैः शूरैः परिघबाहुभिः।
विसर्जयस्व मां ब्रह्मन् न्यस्तशस्त्रोऽस्मि साम्प्रतम् ॥ ४ ॥

मूलम्

प्रियं च ते सर्वमेतत् करिष्यति न संशयः ॥ ३ ॥
पुत्रैः परिवृतः सर्वैः शूरैः परिघबाहुभिः।
विसर्जयस्व मां ब्रह्मन् न्यस्तशस्त्रोऽस्मि साम्प्रतम् ॥ ४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

परिघ-जैसी मोटी भुजाओंवाले अपने समस्त शूरवीर पुत्रोंके साथ जाकर यह आपका सारा अभीष्ट कार्य सिद्ध करेगा, इसमें संशय नहीं है। ब्रह्मन्! आप मुझे छोड़ दीजिये। मैंने अब अस्त्र-शस्त्रोंको त्याग दिया है’॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तथास्त्विति च तेनोक्तो मुनिनामिततेजसा।
स तमादिश्य तनयमुत्तङ्काय महात्मने ॥ ५ ॥
क्रियतामिति राजर्षिर्जगाम वनमुत्तमम् ।

मूलम्

तथास्त्विति च तेनोक्तो मुनिनामिततेजसा।
स तमादिश्य तनयमुत्तङ्काय महात्मने ॥ ५ ॥
क्रियतामिति राजर्षिर्जगाम वनमुत्तमम् ।

अनुवाद (हिन्दी)

तब अमित तेजस्वी उत्तङ्क मुनिने ‘तथास्तु’ कहकर राजाको वनमें जानेकी आज्ञा दे दी। तत्पश्चात् राजर्षि बृहदश्वने महात्मा उत्तङ्कको अपना वह पुत्र सौंप दिया और धुन्धुका वध करनेकी आज्ञा दे उत्तम तपोवनकी ओर प्रस्थान किया॥५॥

मूलम् (वचनम्)

युधिष्ठिर उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

क एष भगवन् दैत्यो महावीर्यस्तपोधन ॥ ६ ॥
कस्य पुत्रोऽथ नप्ता वा एतदिच्छामि वेदितुम्।

मूलम्

क एष भगवन् दैत्यो महावीर्यस्तपोधन ॥ ६ ॥
कस्य पुत्रोऽथ नप्ता वा एतदिच्छामि वेदितुम्।

अनुवाद (हिन्दी)

युधिष्ठिरने पूछा— तपोधन! भगवन्! यह पराक्रमी दैत्य कौन था? किसका पुत्र और नाती था? मैं यह सब जानना चाहता हूँ॥६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

एवं महाबलो दैत्यो न श्रुतो मे तपोधन ॥ ७ ॥
एतदिच्छामि भगवन् याथातथ्येन वेदितुम्।
सर्वमेव महाप्राज्ञ विस्तरेण तपोधन ॥ ८ ॥

मूलम्

एवं महाबलो दैत्यो न श्रुतो मे तपोधन ॥ ७ ॥
एतदिच्छामि भगवन् याथातथ्येन वेदितुम्।
सर्वमेव महाप्राज्ञ विस्तरेण तपोधन ॥ ८ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

तपस्याके धनी मुनीश्वर! ऐसा महाबली दैत्य तो मैंने कभी नहीं सुना था, अतः भगवन्! मैं इसके विषयमें यथार्थ बातें जानना चाहता हूँ। महामते! आप यह सारी कथा विस्तारपूर्वक बताइये॥७-८॥

मूलम् (वचनम्)

मार्कण्डेय उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

शृणु राजन्निदं सर्वं यथावृत्तं नराधिप।
कथ्यमानं महाप्राज्ञ विस्तरेण यथातथम् ॥ ९ ॥

मूलम्

शृणु राजन्निदं सर्वं यथावृत्तं नराधिप।
कथ्यमानं महाप्राज्ञ विस्तरेण यथातथम् ॥ ९ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

मार्कण्डेयजी कहते हैं— राजन्! तुम बड़े बुद्धिमान् हो। यह सारा वृतान्त मैं यथार्थरूपसे विस्तारपूर्वक कह रहा हूँ, ध्यान देकर सुनो॥९॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

एकार्णवे तदा लोके नष्टे स्थावरजङ्गमे।
प्रणष्टेषु च भूतेषु सर्वेषु भरतर्षभ ॥ १० ॥

मूलम्

एकार्णवे तदा लोके नष्टे स्थावरजङ्गमे।
प्रणष्टेषु च भूतेषु सर्वेषु भरतर्षभ ॥ १० ॥

अनुवाद (हिन्दी)

भरतश्रेष्ठ! बात उस समयकी है जब सम्पूर्ण चराचर जगत् एकार्णवके जलमें डूबकर नष्ट हो चुका था। समस्त प्राणी कालके गालमें चले गये थे॥१०॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

प्रभवं लोककर्तारं विष्णुं शाश्वतमव्ययम्।
यमाहुर्मुनयः सिद्धाः सर्वलोकमहेश्वरम् ॥ ११ ॥
सुष्वाप भगवान् विष्णुरप्सु योगत एव सः।
नागस्य भोगे महति शेषस्यामिततेजसः ॥ १२ ॥

मूलम्

प्रभवं लोककर्तारं विष्णुं शाश्वतमव्ययम्।
यमाहुर्मुनयः सिद्धाः सर्वलोकमहेश्वरम् ॥ ११ ॥
सुष्वाप भगवान् विष्णुरप्सु योगत एव सः।
नागस्य भोगे महति शेषस्यामिततेजसः ॥ १२ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

उस समय वे भगवान् विष्णु एकार्णवके जलमें अमित तेजस्वी शेषनागके विशाल शरीरकी शय्यापर योगनिद्राका आश्रय लेकर शयन करते थे। उन्हीं भगवान्‌को सिद्ध, मुनिगण सबकी उत्पत्तिका कारण, लोकस्रष्टा, सर्वव्यापी, सनातन, अविनाशी तथा सर्वलोकमहेश्वर कहते हैं॥११-१२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

लोककर्ता महाभाग भगवानच्युतो हरिः।
नागभोगेन महता परिरभ्य महीमिमाम् ॥ १३ ॥
स्वपतस्तस्य देवस्य पद्मं सूर्यसमप्रभम्।
नाभ्यां विनिःसृतं दिव्यं तत्रोत्पन्नः पितामहः ॥ १४ ॥
साक्षाल्लोकगुरुर्ब्रह्मा पद्मे सूर्यसमप्रभः ।

मूलम्

लोककर्ता महाभाग भगवानच्युतो हरिः।
नागभोगेन महता परिरभ्य महीमिमाम् ॥ १३ ॥
स्वपतस्तस्य देवस्य पद्मं सूर्यसमप्रभम्।
नाभ्यां विनिःसृतं दिव्यं तत्रोत्पन्नः पितामहः ॥ १४ ॥
साक्षाल्लोकगुरुर्ब्रह्मा पद्मे सूर्यसमप्रभः ।

अनुवाद (हिन्दी)

महाभाग! अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले लोककर्ता भगवान् श्रीहरि नागके विशाल फणके द्वारा धारण की हुई इस पृथ्वीका सहारा लेकर (शेषनागपर) सो रहे थे, उस समय उन दिव्यस्वरूप नारायणकी नाभिसे एक दिव्य कमल प्रकट हुआ, जो सूर्यके समान प्रकाशित हो रहा था। उसीमें सम्पूर्ण लोकोंके गुरु साक्षात् पितामह ब्रह्माजी प्रकट हुए, जो सूर्यके समान तेजस्वी थे॥१३-१४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

चतुर्वेदश्चतुर्मूर्तिस्तथैव च चतुर्मुखः ॥ १५ ॥
स्वप्रभावाद् दुराधर्षो महाबलपराक्रमः ।

मूलम्

चतुर्वेदश्चतुर्मूर्तिस्तथैव च चतुर्मुखः ॥ १५ ॥
स्वप्रभावाद् दुराधर्षो महाबलपराक्रमः ।

अनुवाद (हिन्दी)

वे चारों वेदोंके विद्वान् हैं। जरायुज आदि चतुर्विध जीव उन्हींके स्वरूप हैं। उनके चार मुख हैं। उनके बल और पराक्रम महान् हैं। वे अपने प्रभावसे दुर्धर्ष हैं॥१५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

कस्यचित् त्वथ कालस्य दानवौ वीर्यवत्तमौ ॥ १६ ॥
मधुश्च कैटभश्चैव दृष्टवन्तौ हरिं प्रभुम्।

मूलम्

कस्यचित् त्वथ कालस्य दानवौ वीर्यवत्तमौ ॥ १६ ॥
मधुश्च कैटभश्चैव दृष्टवन्तौ हरिं प्रभुम्।

अनुवाद (हिन्दी)

ब्रह्माजीके प्रकट होनेके कुछ काल बाद मधु और कैटभ नामक दो पराक्रमी दानवोंने सर्वसामर्थ्यवान् भगवान् श्रीहरिको देखा॥१६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

शयानं शयने दिव्ये नागभोगे महाद्युतिम् ॥ १७ ॥
बहुयोजनविस्तीर्णे बहुयोजनमायते ।
किरीटकौस्तुभधरं पीतकौशेयवाससम् ॥ १८ ॥

मूलम्

शयानं शयने दिव्ये नागभोगे महाद्युतिम् ॥ १७ ॥
बहुयोजनविस्तीर्णे बहुयोजनमायते ।
किरीटकौस्तुभधरं पीतकौशेयवाससम् ॥ १८ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

वे शेषनागके शरीरकी दिव्य शय्यापर शयन किये हुए थे। उनका तेज महान् है। वे जिस शय्यापर शयन करते हैं, उसकी लंबाई-चौड़ाई कई योजनोंकी है। भगवान्‌के मस्तकपर किरीट और कण्ठमें कौस्तुभमणिकी शोभा हो रही थी। उन्होंने रेशमी पीताम्बर धारण कर रखा था॥१७-१८॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

दीप्यमानं श्रिया राजंस्तेजसा वपुषा तथा।
सहस्रसूर्यप्रतिममद्भुतोपमदर्शनम् ॥ १९ ॥

मूलम्

दीप्यमानं श्रिया राजंस्तेजसा वपुषा तथा।
सहस्रसूर्यप्रतिममद्भुतोपमदर्शनम् ॥ १९ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

राजन्! वे अपनी कान्ति और तेजसे उद्दीप्त हो रहे थे। शरीरसे वे सहस्रों सूर्योंके समान प्रकाशित होते थे। उनकी झाँकी अद्भुत और अनुपम थी॥१९॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

विस्मयः सुमहानासीन्मधुकैटभयोस्तथा ।
दृष्ट्वा पितामहं चापि पद्मे पद्‌मनिभेक्षणम् ॥ २० ॥
वित्रासयेतामथ तौ ब्रह्माणममितौजसम् ।
वित्रस्यमानो बहुशो ब्रह्मा ताभ्यां महायशाः ॥ २१ ॥
अकम्पयत् पद्मनालं ततोऽबुध्यत केशवः।
अथापश्यत गोविन्दो दानवौ वीर्यवत्तरौ ॥ २२ ॥

मूलम्

विस्मयः सुमहानासीन्मधुकैटभयोस्तथा ।
दृष्ट्वा पितामहं चापि पद्मे पद्‌मनिभेक्षणम् ॥ २० ॥
वित्रासयेतामथ तौ ब्रह्माणममितौजसम् ।
वित्रस्यमानो बहुशो ब्रह्मा ताभ्यां महायशाः ॥ २१ ॥
अकम्पयत् पद्मनालं ततोऽबुध्यत केशवः।
अथापश्यत गोविन्दो दानवौ वीर्यवत्तरौ ॥ २२ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

भगवान्‌को देखकर मधु और कैटभ दोनोंको बड़ा आश्चर्य हुआ। तत्पश्चात् उनकी दृष्टि कमलमें बैठे हुए कमलनयन पितामह ब्रह्माजीपर पड़ी। उन्हें देखकर वे दोनों दैत्य उन अमित तेजस्वी ब्रह्माजीको डराने लगे। उन दोनोंके द्वारा बार-बार डराये जानेपर महायशस्वी ब्रह्माजीने उस कमलकी नालको हिलाया। इससे भगवान् गोविन्द जाग उठे। जागनेपर उन्होंने उन दोनों महापराक्रमी दानवोंको देखा॥२०—२२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

दृष्ट्वा तावब्रवीद् देवः स्वागतं वां महाबलौ।
ददामि वां वरं श्रेष्ठं प्रीतिर्हि मम जायते ॥ २३ ॥

मूलम्

दृष्ट्वा तावब्रवीद् देवः स्वागतं वां महाबलौ।
ददामि वां वरं श्रेष्ठं प्रीतिर्हि मम जायते ॥ २३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

उन महाबली दानवोंको देखकर भगवान् विष्णुने कहा—‘तुम दोनों बड़े बलवान् हो। तुम्हारा स्वागत है। मैं तुम दोनोंको उत्तम वर दे रहा हूँ; क्योंकि तुम्हें देखकर मुझे प्रसन्नता होती है’॥२३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तौ प्रहस्य हृषीकेशं महादर्पौ महाबलौ।
प्रत्यब्रूतां महाराज सहितौ मधुसूदनम् ॥ २४ ॥

मूलम्

तौ प्रहस्य हृषीकेशं महादर्पौ महाबलौ।
प्रत्यब्रूतां महाराज सहितौ मधुसूदनम् ॥ २४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

महाराज! वे दोनों महाबली दानव बड़े अभिमानी थे। उन्होंने हँसकर इन्द्रियोंके स्वामी भगवान् मधुसूदनसे एक साथ कहा—॥२४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

आवां वरय देव त्वं वरदौ स्वः सुरोत्तम।
दातारौ स्वो वरं तुभ्यं तद् ब्रवीह्यविचारयन् ॥ २५ ॥

मूलम्

आवां वरय देव त्वं वरदौ स्वः सुरोत्तम।
दातारौ स्वो वरं तुभ्यं तद् ब्रवीह्यविचारयन् ॥ २५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘सुरश्रेष्ठ! हम दोनों तुम्हें वर देते हैं। देव! तुम्हीं हमलोगोंसे वर माँगो। हम दोनों तुम्हें तुम्हारी इच्छाके अनुसार वर देंगे। तुम बिना सोचे-विचारे जो चाहो, माँग लो’॥२५॥

मूलम् (वचनम्)

श्रीभगवानुवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

प्रतिगृह्णे वरं वीरावीप्सितश्च वरो मम।
युवां हि वीर्यसम्पन्नौ न वामस्ति समः पुमान् ॥ २६ ॥

मूलम्

प्रतिगृह्णे वरं वीरावीप्सितश्च वरो मम।
युवां हि वीर्यसम्पन्नौ न वामस्ति समः पुमान् ॥ २६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

श्रीभगवान् बोले— वीरो! मैं तुमसे अवश्य वर लूँगा। मुझे तुमसे वर प्राप्त करना अभीष्ट है; क्योंकि तुम दोनों बड़े पराक्रमी हो। तुम्हारे-जैसा दूसरा कोई पुरुष नहीं है॥२६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

वध्यत्वमुपगच्छेतां मम सत्यपराक्रमौ ।
एतदिच्छाम्यहं कामं प्राप्तुं लोकहिताय वै ॥ २७ ॥

मूलम्

वध्यत्वमुपगच्छेतां मम सत्यपराक्रमौ ।
एतदिच्छाम्यहं कामं प्राप्तुं लोकहिताय वै ॥ २७ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

सत्यपराक्रमी वीरो! तुम दोनों मेरे हाथसे मारे जाओ। मैं सम्पूर्ण जगत्‌के हितके लिये तुमसे यही मनोरथ प्राप्त करना चाहता हूँ॥२७॥

मूलम् (वचनम्)

मधुकैटभावूचतुः

विश्वास-प्रस्तुतिः

अनृतं नोक्तपूर्वं नौ स्वैरेष्वपि कुतोऽन्यथा।
सत्ये धर्मे च निरतौ विद्ध्यावां पुरुषोत्तम ॥ २८ ॥

मूलम्

अनृतं नोक्तपूर्वं नौ स्वैरेष्वपि कुतोऽन्यथा।
सत्ये धर्मे च निरतौ विद्ध्यावां पुरुषोत्तम ॥ २८ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

मधु और कैटभने कहा— पुरुषोत्तम! हमलोगोंने पहले कभी स्वच्छन्द (मर्यादारहित) बर्तावमें भी झूठ नहीं कहा है, फिर और समयमें तो हम झूठ बोल ही कैसे सकते हैं? आप हम दोनोंको सत्य और धर्ममें अनुरक्त मानिये॥२८॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

बले रूपे च शौर्ये च न शमे च समोऽस्ति नौ।
धर्मे तपसि दाने च शीलसत्त्वदमेषु च ॥ २९ ॥

मूलम्

बले रूपे च शौर्ये च न शमे च समोऽस्ति नौ।
धर्मे तपसि दाने च शीलसत्त्वदमेषु च ॥ २९ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

बल, रूप, शौर्य और मनोनिग्रहमें हमारी समता करनेवाला कोई नहीं है। धर्म, तपस्या, दान, शील, सत्त्व तथा इन्द्रियसंयममें भी हमारी कहीं तुलना नहीं है॥२९॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

उपप्लवो महानस्मानुपावर्तत केशव ।
उक्तं प्रतिकुरुष्व त्वं कालो हि दुरतिक्रमः ॥ ३० ॥

मूलम्

उपप्लवो महानस्मानुपावर्तत केशव ।
उक्तं प्रतिकुरुष्व त्वं कालो हि दुरतिक्रमः ॥ ३० ॥

अनुवाद (हिन्दी)

किंतु केशव! हमलोगोंपर यह महान् संकट आ पहुँचा है। अब आप भी अपनी कही हुई बात पूर्ण कीजिये। कालका उल्लंघन करना बहुत ही कठिन है॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

आवामिच्छावहे देव कृतमेकं त्वया विभो।
अनावृतेऽस्मिन्नाकाशे वधं सुरवरोत्तम ॥ ३१ ॥

मूलम्

आवामिच्छावहे देव कृतमेकं त्वया विभो।
अनावृतेऽस्मिन्नाकाशे वधं सुरवरोत्तम ॥ ३१ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

देव! सुरश्रेष्ठ! विभो! हम दोनों आपके द्वारा एक ही सुविधा चाहते हैं। वह यह है कि आप इस खुले आकाशमें ही हमारा वध कीजिये॥३१॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

पुत्रत्वमधिगच्छाव तव चापि सुलोचन।
वर एष वृतो देव तद् विद्धि सुरसत्तम ॥ ३२ ॥
अनृतं मा भवेद् देव यद्धि नौ संश्रुतं तदा।

मूलम्

पुत्रत्वमधिगच्छाव तव चापि सुलोचन।
वर एष वृतो देव तद् विद्धि सुरसत्तम ॥ ३२ ॥
अनृतं मा भवेद् देव यद्धि नौ संश्रुतं तदा।

अनुवाद (हिन्दी)

सुन्दर नेत्रोंवाले देवेश्वर! हम दोनों आपके पुत्र हों। हमने आपसे यही वर माँगा है। आप इसे अच्छी तरह समझ लें। सुरश्रेष्ठ देव! हमने जो प्रतिज्ञा की है, वह असत्य नहीं होनी चाहिये॥३२॥

मूलम् (वचनम्)

श्रीभगवानुवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

बाढमेवं करिष्यामि सर्वमेतद् भविष्यति ॥ ३३ ॥

मूलम्

बाढमेवं करिष्यामि सर्वमेतद् भविष्यति ॥ ३३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

श्रीभगवान् बोले— बहुत अच्छा, मैं ऐसा ही करूँगा। यह सब कुछ (तुम्हारी इच्छाके अनुसार) होगा॥३३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

स विचिन्त्याथ गोविन्दो नापश्यद् यदनावृतम्।
अवकाशं पृथिव्यां वा दिवि वा मधुसूदनः ॥ ३४ ॥
स्वकावनावृतावूरू दृष्ट्वा देववरस्तदा ।
मधुकैटभयो राजन् शिरसी मधुसूदनः।
चक्रेण शितधारेण न्यकृन्तत महायशाः ॥ ३५ ॥

मूलम्

स विचिन्त्याथ गोविन्दो नापश्यद् यदनावृतम्।
अवकाशं पृथिव्यां वा दिवि वा मधुसूदनः ॥ ३४ ॥
स्वकावनावृतावूरू दृष्ट्वा देववरस्तदा ।
मधुकैटभयो राजन् शिरसी मधुसूदनः।
चक्रेण शितधारेण न्यकृन्तत महायशाः ॥ ३५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

भगवान् विष्णुने बहुत सोचनेपर जब कहीं खुला आकाश न देखा और स्वर्ग अथवा पृथ्वीपर भी जब उन्हें कोई खुली जगह न दिखायी दी, तब महायशस्वी देवेश्वर मधुसूदनने अपनी दोनों जाँघोंको अनावृत (वस्त्ररहित) देखकर मधु और कैटभके मस्तकोंको उन्हींपर रखकर तीखी धारवाले चक्रसे काट डाला॥३४-३५॥

मूलम् (समाप्तिः)

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि धुन्धुमारोपाख्याने त्र्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०३ ॥

मूलम् (वचनम्)

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें धुन्धुमारोपाख्यानविषयक दो सौ तीनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥२०३॥