१९९ इन्द्रद्युम्नोपाख्याने

भागसूचना

नवनवत्यधिकशततमोऽध्यायः

सूचना (हिन्दी)

राजा इन्द्रद्युम्न तथा अन्य चिरजीवी प्राणियोंकी कथा

मूलम् (वचनम्)

वैशम्पायन उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

मार्कण्डेयमृषयः पाण्डवाः पर्यपृच्छन्नस्ति कश्चिद् भवतश्चिरजाततर इति ॥ १ ॥

मूलम्

मार्कण्डेयमृषयः पाण्डवाः पर्यपृच्छन्नस्ति कश्चिद् भवतश्चिरजाततर इति ॥ १ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! ऋषियों तथा पाण्डवोंने मार्कण्डेयजीसे पूछा—‘भगवन्! कोई आपसे भी पहलेका उत्पन्न चिरजीवी इस जगत्‌में है या नहीं?॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

स तानुवाचास्ति खलु राजर्षिरिन्द्रद्युम्नो नाम क्षीणपुण्यस्त्रिदिवात् प्रच्युतः कीर्तिस्ते व्युच्छिन्नेति स मामुपातिष्ठदथ प्रत्यभिजानाति मां भवानिति॥२॥

मूलम्

स तानुवाचास्ति खलु राजर्षिरिन्द्रद्युम्नो नाम क्षीणपुण्यस्त्रिदिवात् प्रच्युतः कीर्तिस्ते व्युच्छिन्नेति स मामुपातिष्ठदथ प्रत्यभिजानाति मां भवानिति॥२॥

अनुवाद (हिन्दी)

मार्कण्डेयजीने कहा— ‘है क्यों नहीं, सुनो। एक समय राजर्षि इन्द्रद्युम्न अपना पुण्य क्षीण हो जानेके कारण यह कहकर स्वर्गलोकसे नीचे गिरा दिये गये थे कि ‘जगत्‌में तुम्हारी कीर्ति नष्ट हो गयी है।’ स्वर्गसे गिरनेपर वे मेरे पास आये और बोले—‘क्या आप मुझे पहचानते हैं?’॥२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तमहमब्रुवं कार्यचेष्टाकुलत्वान्न वयं वासायनिका ग्रामैकरात्रवासिनो न प्रत्यभिजानीमोऽ-प्यात्मनोऽर्थानामनुष्ठानं न शरीरोपतापेनात्मनः समारभामोऽर्थानामनुष्ठानम्॥३॥

मूलम्

तमहमब्रुवं कार्यचेष्टाकुलत्वान्न वयं वासायनिका ग्रामैकरात्रवासिनो न प्रत्यभिजानीमोऽ-प्यात्मनोऽर्थानामनुष्ठानं न शरीरोपतापेनात्मनः समारभामोऽर्थानामनुष्ठानम्॥३॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘मैंने उनसे कहा—‘हमलोग तीर्थयात्रा आदि भिन्न-भिन्न पुण्य कार्योंकी चेष्टाओंमें व्यग्र रहते हैं, अतः किसी एक स्थानपर सदा नहीं रहते। एक गाँवमें केवल एक रात निवास करते हैं। अपने कार्योंका अनुष्ठान भी हमें भूल जाता है। व्रत-उपवास आदिमें लगे रहनेसे अपने शरीरको सदा कष्ट पहुँचानेके कारण आवश्यक कार्योंका आरम्भ भी हमसे नहीं हो पाता है, ऐसी दशामें हम आपको कैसे जान सकते हैं?’॥३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

(एवमुक्तो राजर्षिरिन्द्रद्युम्नः पुनर्मामब्रवीद् अथास्ति कश्चित् त्वत्तश्चिरं जाततर इति॥)

मूलम्

(एवमुक्तो राजर्षिरिन्द्रद्युम्नः पुनर्मामब्रवीद् अथास्ति कश्चित् त्वत्तश्चिरं जाततर इति॥)

अनुवाद (हिन्दी)

‘मेरे ऐसा कहनेपर राजर्षि इन्द्रद्युम्नने पुनः मुझसे पूछा—‘क्या आपसे भी पहलेका पैदा हुआ कोई पुरातन प्राणी है?’॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

(तं पुनः प्रत्यब्रवम्) अस्ति खलु हिमवति प्रावारकर्णो नामोलूकः प्रतिवसति। स मत्तश्चिरजातो भवन्तं यदि जानीयादितः प्रकृष्टे चाध्वनि हिमवांस्तत्रासौ प्रतिवसतीति॥४॥

मूलम्

(तं पुनः प्रत्यब्रवम्) अस्ति खलु हिमवति प्रावारकर्णो नामोलूकः प्रतिवसति। स मत्तश्चिरजातो भवन्तं यदि जानीयादितः प्रकृष्टे चाध्वनि हिमवांस्तत्रासौ प्रतिवसतीति॥४॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘तब मैंने उन्हें पुनः उत्तर दिया—‘हिमालय पर्वतपर प्रावारकर्ण नामसे प्रसिद्ध एक उलूक निवास करता है। वह मुझसे भी पहलेका उत्पन्न हुआ है। सम्भव है, वह आपको जानता हो। यहाँसे बहुत दूरकी यात्रा करनेपर हिमालय पर्वत मिलेगा। वहीं वह रहता है’॥४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ततः स मामश्वो भूत्वा तत्रावहद्‌ यत्र बभूवोलूकः। अथैनं स राजा पप्रच्छ प्रतिजानाति मां भवानिति॥५॥

मूलम्

ततः स मामश्वो भूत्वा तत्रावहद्‌ यत्र बभूवोलूकः। अथैनं स राजा पप्रच्छ प्रतिजानाति मां भवानिति॥५॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘तब इन्द्रद्युम्न अश्व बनकर मुझे वहाँतक ले गये, जहाँ उलूक रहता था। वहाँ जाकर राजाने उससे पूछा—‘क्या आप मुझे जानते हैं?’॥५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

स मुहूर्तमिव ध्यात्वाब्रवीदेनं नाभिजानामि भवन्तमिति स एवमुक्त इन्द्रद्युम्नः पुनस्तमुलूक-मब्रवीद् राजर्षिः॥६॥

मूलम्

स मुहूर्तमिव ध्यात्वाब्रवीदेनं नाभिजानामि भवन्तमिति स एवमुक्त इन्द्रद्युम्नः पुनस्तमुलूक-मब्रवीद् राजर्षिः॥६॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘उसने दो घड़ीतक सोच-विचारकर उनसे कहा—‘मैं आपको नहीं जानता हूँ।’ उलूकके ऐसा कहनेपर राजर्षि इन्द्रद्युम्नने पुनः उससे पूछा—॥६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अथास्ति कश्चिद् भवतः सकाशाच्चिरजात इति स एवमुक्तोऽब्रवीदस्ति खल्विन्द्रद्युम्नं नाम सरस्तस्मिन् नाडीजङ्घो नाम बकः प्रतिवसति सोऽस्मत्तश्चिरजाततरस्तं पृच्छेति तत इन्द्रद्युम्नो मां चोलूकमादाय तत् सरोऽगच्छद् यत्रासौ नाडीजङ्घो नाम बको बभूव॥७॥

मूलम्

अथास्ति कश्चिद् भवतः सकाशाच्चिरजात इति स एवमुक्तोऽब्रवीदस्ति खल्विन्द्रद्युम्नं नाम सरस्तस्मिन् नाडीजङ्घो नाम बकः प्रतिवसति सोऽस्मत्तश्चिरजाततरस्तं पृच्छेति तत इन्द्रद्युम्नो मां चोलूकमादाय तत् सरोऽगच्छद् यत्रासौ नाडीजङ्घो नाम बको बभूव॥७॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘क्या आपसे भी पहलेका उत्पन्न हुआ कोई चिरजीवी प्राणी है?’ उनके ऐसा पूछनेपर उलूकने कहा—‘इन्द्रद्युम्न नामसे प्रसिद्ध एक सरोवर है। वहाँ नाडीजंघ नामसे प्रसिद्ध एक बक निवास करता है। वह हमसे बहुत पहलेका उत्पन्न हुआ है। उससे पूछिये।’ तब इन्द्रद्युम्न मुझको और उलूकको भी साथ लेकर उस सरोवरपर गये जहाँ नाडीजंघ बक निवास करता था॥७॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

सोऽस्माभिः पृष्टो भवानिममिन्द्रद्युम्नं राजान-मभिजानातीति स एवं मुहुर्तं ध्यात्वाब्रवीन्ना-भिजानाम्यहमिद्रद्युम्नं राजानमिति। ततः सोऽस्माभिः पृष्टः कश्चिद् भवतोऽन्यश्चिरजाततरोऽस्तीति। स नोऽब्रवीदस्ति खल्वस्मिन्नेव सरस्यकूपारो नाम कच्छपः प्रतिवसति। स मत्तश्चिरजाततरः। स यदि कथंचिदभिजानीयादिमं राजानं तमकूपारं पृच्छध्वमिति॥८॥

मूलम्

सोऽस्माभिः पृष्टो भवानिममिन्द्रद्युम्नं राजान-मभिजानातीति स एवं मुहुर्तं ध्यात्वाब्रवीन्ना-भिजानाम्यहमिद्रद्युम्नं राजानमिति। ततः सोऽस्माभिः पृष्टः कश्चिद् भवतोऽन्यश्चिरजाततरोऽस्तीति। स नोऽब्रवीदस्ति खल्वस्मिन्नेव सरस्यकूपारो नाम कच्छपः प्रतिवसति। स मत्तश्चिरजाततरः। स यदि कथंचिदभिजानीयादिमं राजानं तमकूपारं पृच्छध्वमिति॥८॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘हमलोगोंने उस बकसे पूछा—‘क्या आप—राजा इन्द्रद्युम्नको जानते हैं?’ उसने दो घड़ीतक सोचकर उत्तर दिया—‘मैं राजा इन्द्रद्युम्नको नहीं जानता हूँ।’ तब हमलोगोंने उनसे पूछा—‘क्या दूसरा कोई प्राणी ऐसा है? जिसका जन्म आपसे भी पहले हुआ हो?’ उसने हमसे कहा—‘है; इसी सरोवरमें अकूपार नामक एक कछुआ रहता है। वह मुझसे भी पहले उत्पन्न हुआ है। आपलोग उस अकूपारसे ही पूछिये। सम्भव है, वह इन राजर्षिको किसी तरह जानता हो’॥८॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ततः स बकस्तमकूपारं कच्छपं विज्ञापयामास। अस्माकमभिप्रेतं भवन्तं किञ्चिदर्थमभिप्रष्टुं साध्वागम्यतां तावदिति तच्छ्रुत्वा कच्छपस्तस्मात् सरस उत्थायाभ्यगच्छद् यत्र तिष्ठामो वयं तस्य सरसस्तीरे आगतं चैनं वयमपृच्छाम भवानिन्द्रद्युम्नं राजानमभिजानातीति॥९॥

मूलम्

ततः स बकस्तमकूपारं कच्छपं विज्ञापयामास। अस्माकमभिप्रेतं भवन्तं किञ्चिदर्थमभिप्रष्टुं साध्वागम्यतां तावदिति तच्छ्रुत्वा कच्छपस्तस्मात् सरस उत्थायाभ्यगच्छद् यत्र तिष्ठामो वयं तस्य सरसस्तीरे आगतं चैनं वयमपृच्छाम भवानिन्द्रद्युम्नं राजानमभिजानातीति॥९॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘तब उस बकने अकूपार नामक कछुएको यह सूचना दी कि ‘हमलोग आपसे कुछ अभीष्ट प्रश्न पूछना चाहते हैं। कृपया आइये।’ यह संदेश सुनकर वह कछुआ उस सरोवरसे निकलकर वहीं आया, जहाँ हमलोग तटपर खड़े थे। आनेपर उससे हमलोगोंने पूछा—‘क्या आप राजा इन्द्रद्युम्नको जानते हैं?’॥९॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

स मुहूर्तं ध्यात्वा बाष्पसम्पूर्णनयन उद्विग्न-हृदयो वेपमानो विसंज्ञकल्पः प्राञ्जलिरब्रवीत्। किमहमेनं न प्रत्यभिज्ञास्यामीह ह्यनेन सहस्र-कृत्वश्चितिषु यूपा आहिताः॥१०॥

मूलम्

स मुहूर्तं ध्यात्वा बाष्पसम्पूर्णनयन उद्विग्न-हृदयो वेपमानो विसंज्ञकल्पः प्राञ्जलिरब्रवीत्। किमहमेनं न प्रत्यभिज्ञास्यामीह ह्यनेन सहस्र-कृत्वश्चितिषु यूपा आहिताः॥१०॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘उसने दो घड़ीतक ध्यान करके नेत्रोंमें आँसू भरकर उद्विग्न हृदयसे काँपते हुए अचेतकी-सी दशामें हाथ जोड़कर कहा—‘मैं इन्हें क्यों नहीं पहचानूँगा। इन्होंने एक हजार बार अग्निस्थापनके समय यज्ञ-यूपोंकी स्थापना की है॥१०॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

सरश्चेदमस्य दक्षिणाभिर्दत्ताभिर्गोभिरति-क्रममाणाभिः कृतम् । अत्र चाहं प्रतिवसामीति ॥ ११ ॥

मूलम्

सरश्चेदमस्य दक्षिणाभिर्दत्ताभिर्गोभिरति-क्रममाणाभिः कृतम् । अत्र चाहं प्रतिवसामीति ॥ ११ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘इनके द्वारा दक्षिणामें दी हुई गौओंके आने-जानेसे यह सरोवर बन गया है, जिसमें मैं निवास कर रहा हूँ’॥११॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अथैतत् सकलं कच्छपेनोदाहृतं श्रुत्वा तदनन्तरं देवलोकाद् देवरथः प्रादुरासीद् वाचश्चाश्रूयन्तेन्द्रद्युम्नं प्रति प्रस्तुतस्ते स्वर्गो यथोचितं स्थानं प्रतिपद्यस्व कीर्तिमानस्यव्यग्रो याहीति॥१२॥

मूलम्

अथैतत् सकलं कच्छपेनोदाहृतं श्रुत्वा तदनन्तरं देवलोकाद् देवरथः प्रादुरासीद् वाचश्चाश्रूयन्तेन्द्रद्युम्नं प्रति प्रस्तुतस्ते स्वर्गो यथोचितं स्थानं प्रतिपद्यस्व कीर्तिमानस्यव्यग्रो याहीति॥१२॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘कच्छपके मुँहसे ये सारी बातें सुन लेनेके पश्चात् देवलोकसे एक दिव्य रथ आकर प्रकट हुआ और उसमेंसे इन्द्रद्युम्नके प्रति कही हुई कुछ बातें सुनायी देने लगीं—‘राजन्! आपके लिये स्वर्गलोक प्रस्तुत है। वहाँ चलकर यथोचित स्थान ग्रहण करें। आप कीर्तिमान् हैं। अतः निश्चिन्त होकर स्वर्गलोककी यात्रा करें’॥१२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

भवन्ति चात्र श्लोकाः—
दिवं स्पृशति भूमिं च
शब्दः पुण्यस्य कर्मणः ।
यावत् स शब्दो भवति
तावत् पुरुष उच्यते ॥ १३ ॥

मूलम्

भवन्ति चात्र श्लोकाः—
दिवं स्पृशति भूमिं च
शब्दः पुण्यस्य कर्मणः ।
यावत् स शब्दो भवति
तावत् पुरुष उच्यते ॥ १३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘इस विषयमें ये श्लोक हैं—‘जबतक मनुष्यके पुण्यकर्मका शब्द भूलोक और देवलोकका स्पर्श करता है, जबतक दोनों लोकोंमें उसकी कीर्ति बनी रहती है, तभीतक वह पुरुष स्वर्गलोकका निवासी बताया जाता है॥१३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अकीर्तिः कीर्त्यते लोके
यस्य भूतस्य कस्यचित् ।
स पतत्यधमाल्ँलोकान्
यावच्छब्दः प्रकीर्त्यते ॥ १४ ॥

मूलम्

अकीर्तिः कीर्त्यते लोके
यस्य भूतस्य कस्यचित् ।
स पतत्यधमाल्ँलोकान्
यावच्छब्दः प्रकीर्त्यते ॥ १४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘संसारमें जिस किसी प्राणीकी अपकीर्ति कही जाती है—जबतक उसके अपयशका शब्द गूँजता रहता है, तबतकके लिये वह नीचेके लोकोंमें गिर जाता है॥१४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तस्मात् कल्याणवृत्तः स्या-
दनन्ताय नरः सदा ।
विहाय चित्तं पापिष्ठं
धर्ममेव समाश्रयेत् ॥ १५ ॥

मूलम्

तस्मात् कल्याणवृत्तः स्या-
दनन्ताय नरः सदा ।
विहाय चित्तं पापिष्ठं
धर्ममेव समाश्रयेत् ॥ १५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘इसलिये मनुष्यको सदा कल्याणकारी सत्कर्मोंमें ही लगे रहना चाहिये। इससे अनन्त फलकी प्राप्ति होती है। पापपूर्ण चित्त (चिन्तन या विचार)-का परित्याग करके सदा धर्मका ही आश्रय लेना चाहिये’॥१५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

इत्येतच्छ्रुत्वा स राजाब्रवीत्‌ तिष्ठ तावद्‌ यावदिमौ वृद्धौ यथास्थानं प्रतिपादयामीति॥१६॥

मूलम्

इत्येतच्छ्रुत्वा स राजाब्रवीत्‌ तिष्ठ तावद्‌ यावदिमौ वृद्धौ यथास्थानं प्रतिपादयामीति॥१६॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘देवदूतकी यह बात सुनकर राजाने कहा—‘जबतक इन दोनों वृद्धोंको इनके स्थानपर पहुँचा न दूँ तबतक ठहरे रहो’॥१६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

स मां प्रावारकर्णं चोलूकं यथोचिते स्थाने प्रतिपाद्य तेनैव यानेन संस्थितो यथोचितं स्थानं प्रतिपेदे। तन्मयानुभूतं चिरजीविनेदृशमिति पाण्डवानुवाच मार्कण्डेयः॥१७॥

मूलम्

स मां प्रावारकर्णं चोलूकं यथोचिते स्थाने प्रतिपाद्य तेनैव यानेन संस्थितो यथोचितं स्थानं प्रतिपेदे। तन्मयानुभूतं चिरजीविनेदृशमिति पाण्डवानुवाच मार्कण्डेयः॥१७॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘यह कहकर राजाने मुझे तथा प्रावारकर्ण नामक उलूकको यथोचित स्थानपर पहुँचा दिया और उसी रथसे स्वर्गकी ओर प्रस्थान करके वहाँ यथोचित स्थान प्राप्त कर लिया। इस प्रकार मैंने चिरजीवी होकर अनुभव किया है’—यह बात पाण्डवोंसे मार्कण्डेयजीने कही॥
पाण्डवाश्चोचुः साधु शोभनं भवता कृतं राजानमिन्द्रद्युम्नं स्वर्गलोकाच्च्युतं स्वे स्थाने प्रतिपादयतेत्यथैतानब्रवीदसौ ननु देवकीपुत्रेणापि कृष्णेन नरके मज्जमानो राजर्षिर्नृगस्तस्मात् कृच्छ्रात् पुनः समुद्‌धृत्य स्वर्गं प्रापित इति॥१८॥
पाण्डव बोले— ‘आपने यह बहुत अच्छा किया कि स्वर्गलोकसे भ्रष्ट हुए राजा इन्द्रद्युम्नको पुनः अपने स्थानकी प्राप्ति करवा दी।’ तब इनसे मार्कण्डेयजीने कहा—‘देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने भी नरकमें डूबते हुए राजर्षि नृगको उस भारी संकटसे छुड़ाकर फिर स्वर्गमें पहुँचा दिया’॥१८॥

मूलम् (समाप्तिः)

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि इन्द्रद्युम्नोपाख्याने नवनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९९ ॥

मूलम् (वचनम्)

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें इन्द्रद्युम्नोपाख्यानविषयक एक सौ निन्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥१९९॥