भागसूचना
अष्टनवत्यधिकशततमोऽध्यायः
सूचना (हिन्दी)
देवर्षि नारदद्वारा शिबिकी महत्ताका प्रतिपादन
मूलम् (वचनम्)
वैशम्पायन उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
भूय एव महाभाग्यं कथ्यतामित्यब्रवीत् पाण्डवो मार्कण्डेयम्। अथाचष्ट मार्कण्डेयः। अष्टकस्य वैश्वामित्रेरश्वमेधे सर्वे राजानः प्रागच्छन्॥१॥
मूलम्
भूय एव महाभाग्यं कथ्यतामित्यब्रवीत् पाण्डवो मार्कण्डेयम्। अथाचष्ट मार्कण्डेयः। अष्टकस्य वैश्वामित्रेरश्वमेधे सर्वे राजानः प्रागच्छन्॥१॥
अनुवाद (हिन्दी)
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने मार्कण्डेयजीसे पुनः प्रार्थना की—‘मुने! क्षत्रिय नरेशोंके माहात्म्यका पुनः वर्णन कीजिये।’ तब मार्कण्डेयजीने कहा—‘धर्मराज! विश्वामित्रके पुत्र अष्टकके अश्वमेधयज्ञमें सब राजा पधारे थे॥१॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
भ्रातरश्चास्य प्रतर्दनो वसुमनाः शिबिरौशीनर इति। स च समाप्तयज्ञो भ्रातृभिः सह रथेन प्रायात्। ते च नारदमागच्छन्तमभिवाद्यारोहतु भवान् रथमित्यब्रुवन्॥२॥
मूलम्
भ्रातरश्चास्य प्रतर्दनो वसुमनाः शिबिरौशीनर इति। स च समाप्तयज्ञो भ्रातृभिः सह रथेन प्रायात्। ते च नारदमागच्छन्तमभिवाद्यारोहतु भवान् रथमित्यब्रुवन्॥२॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘अष्टकके तीन भाई प्रतर्दन, वसुमना तथा उशीनर-पुत्र शिबि भी उस यज्ञमें आये थे। यज्ञ समाप्त होनेपर एक दिन अष्टक अपने भाइयोंके साथ रथपर आरूढ़ हो (स्वर्गकी ओर) जा रहे थे। इसी समय रास्तेमें देवर्षि नारदजी आते दिखायी दिये। तब उन तीनोंने उन्हें प्रणाम करके कहा—‘भगवन् आप भी रथपर आ जाइये’॥२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तांस्तथेत्युक्त्वा रथमारुरोह । अथ तेषामेकः सुरर्षिं नारदमब्रवीत् । प्रसाद्य भगवन्तं किञ्चिदिच्छेयं प्रष्टुमिति ॥ ३ ॥
मूलम्
तांस्तथेत्युक्त्वा रथमारुरोह । अथ तेषामेकः सुरर्षिं नारदमब्रवीत् । प्रसाद्य भगवन्तं किञ्चिदिच्छेयं प्रष्टुमिति ॥ ३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘तब नारदजी ‘तथास्तु’ कहकर उस रथपर बैठ गये। तदनन्तर उनमेंसे एकने देवर्षि नारदसे कहा—‘भगवन्! मैं आपको प्रसन्न करके कुछ पूछना चाहता हूँ’॥३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
पृच्छेत्यब्रवीदृषिः । सोऽब्रवीदायुष्मन्तः सर्वगुणप्रमुदिताः । अथायुष्मन्तं स्वर्गस्थानं चतुर्भि-र्यातव्यं स्यात् कोऽवतरेत् । अयमष्टकोऽवतरे-दित्यब्रवीदृषिः ॥ ४ ॥
मूलम्
पृच्छेत्यब्रवीदृषिः । सोऽब्रवीदायुष्मन्तः सर्वगुणप्रमुदिताः । अथायुष्मन्तं स्वर्गस्थानं चतुर्भि-र्यातव्यं स्यात् कोऽवतरेत् । अयमष्टकोऽवतरे-दित्यब्रवीदृषिः ॥ ४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘देवर्षिने कहा—‘पूछो’ तब उसने इस प्रकार कहा—‘भगवन्! हम सब लोग दीर्घायु तथा सर्वगुणसम्पन्न होनेके कारण सदा प्रसन्न रहते हैं। हम चारोंको दीर्घकालतक उपभोगमें आनेवाले स्वर्ग-लोकमें जाना है, किंतु वहाँसे सर्वप्रथम कौन इस भूतलपर उतर आयेगा?’ देवर्षिने कहा—‘सबसे पहले अष्टक उतरेगा’॥४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
किं कारणमित्यपृच्छत्। अथाचष्टाष्टकस्य गृहे मया उषितं स मां रथेनानुप्रावहदथापश्यमनेकानि गोसहस्राणि वर्णशो विविक्तानि तमहमपृच्छं कस्येमा गाव इति सोऽब्रवीत्। मया निसृष्टा इत्येतास्तेनैव स्वयं श्लाघति कथितेन। एषोऽवतरेदथ त्रिभिर्यातव्यं साम्प्रतं कोऽवतरेत्॥५॥
मूलम्
किं कारणमित्यपृच्छत्। अथाचष्टाष्टकस्य गृहे मया उषितं स मां रथेनानुप्रावहदथापश्यमनेकानि गोसहस्राणि वर्णशो विविक्तानि तमहमपृच्छं कस्येमा गाव इति सोऽब्रवीत्। मया निसृष्टा इत्येतास्तेनैव स्वयं श्लाघति कथितेन। एषोऽवतरेदथ त्रिभिर्यातव्यं साम्प्रतं कोऽवतरेत्॥५॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘फिर उसने पूछा—‘क्या कारण है कि अष्टक ही उतरेगा?’ तब नारदजीने कहा—एक दिन मैं अष्टकके घर ही ठहरा था। उस दिन अष्टक मुझे रथपर बिठाकर भ्रमणके लिये ले जा रहे थे। मैंने रास्तेमें देखा, भिन्न-भिन्न रंगकी कई हजार गौएँ पृथक्-पृथक् चर रही हैं। उन्हें देखकर मैंने अष्टकसे पूछा—‘ये किसकी गौएँ हैं।’ इन्होंने उत्तर दिया—‘ये मेरी दान की हुई गौएँ हैं।’ इस प्रकार ये स्वयं अपने किये हुए दानका बखान करके आत्मश्लाघा करते हैं। इसीलिये इन्हें स्वर्गसे पहले उतरना पड़ेगा।’ तत्पश्चात् उन लोगोंने पुनः प्रश्न किया—‘यदि हम शेष तीनों भाई स्वर्गमें जायँ, तो सबसे पहले किसको उतरना पड़ेगा?’॥५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
प्रतर्दन इत्यब्रवीदृषिः। तत्र किं कारणं प्रतर्दनस्यापि गृहे मयोषितं स मां रथेनानुप्रावहत्॥६॥
अथैनं ब्राह्मणोऽभिक्षेताश्वं मे ददातु भवान् निवृत्तो दास्यामीत्यब्रवीद् ब्राह्मणं त्वरितमेव दीयता-मित्यब्रवीद् ब्राह्मणस्त्वरितमेव स ब्राह्मणस्यैवमुक्त्वा दक्षिणं पार्श्वमददत्॥७॥
मूलम्
प्रतर्दन इत्यब्रवीदृषिः। तत्र किं कारणं प्रतर्दनस्यापि गृहे मयोषितं स मां रथेनानुप्रावहत्॥६॥
अथैनं ब्राह्मणोऽभिक्षेताश्वं मे ददातु भवान् निवृत्तो दास्यामीत्यब्रवीद् ब्राह्मणं त्वरितमेव दीयता-मित्यब्रवीद् ब्राह्मणस्त्वरितमेव स ब्राह्मणस्यैवमुक्त्वा दक्षिणं पार्श्वमददत्॥७॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘देवर्षिने उत्तर दिया—‘प्रतर्दनको।’ ‘इसमें क्या कारण है?’ ऐसा प्रश्न होनेपर देवर्षिने उत्तर दिया—‘एक दिन मैं प्रतर्दनके घर भी ठहरा था। ये मुझे रथसे ले जा रहे थे। उस समय एक ब्राह्मणने आकर इनसे याचना की—‘आप मुझे एक अश्व दे दीजिये।’ तब उन्होंने ब्राह्मणको उत्तर दिया—‘लौटनेपर दे दूँगा।’ ब्राह्मणने कहा—‘नहीं, तुरंत दे दीजिये।’ ‘अच्छा तो तुरंत ही लीजिये’ यों कहकर इन्होंने रथके दाहिने पार्श्वका घोड़ा खोलकर उसे दे दिया’॥६-७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अथान्योऽप्यश्वार्थी ब्राह्मण आगच्छत्। तथैव चैनमुक्त्वा वामपार्ष्णिमभ्यदादथ प्रायात् पुनरपि चान्योऽप्यश्वार्थी ब्राह्मण आगच्छत् त्वरितोऽथ तस्मै अपनह्य वामं धुर्यमददत्॥८॥
मूलम्
अथान्योऽप्यश्वार्थी ब्राह्मण आगच्छत्। तथैव चैनमुक्त्वा वामपार्ष्णिमभ्यदादथ प्रायात् पुनरपि चान्योऽप्यश्वार्थी ब्राह्मण आगच्छत् त्वरितोऽथ तस्मै अपनह्य वामं धुर्यमददत्॥८॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘इतनेहीमें एक-दूसरा ब्राह्मण आया। उसे भी घोड़ेकी ही आवश्यकता थी। जब उसने याचना की, तब राजाने पूर्ववत् उससे भी यही कहा—‘लौटनेपर दूँगा।’ परंतु उसके आग्रह करनेपर उन्होंने रथके वाम पार्श्वका एक घोड़ा दिया। फिर वे आगे बढ़ गये। तदनन्तर एक घोड़ा माँगनेवाला दूसरा ब्राह्मण आया। उसने भी जल्दी ही माँगा। तब राजाने उसे बायें धुरेका बोझ ढोनेवाला अश्व खोल करके दे दिया॥८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अथ प्रायात् पुनरन्य आगच्छदश्वार्थी ब्राह्मणस्तमब्रवीदतियातो दास्यामि त्वरितमेव मे दीयतामित्यब्रवीद् ब्राह्मणस्तस्मै दत्त्वाश्वं रथधुरं गृह्णता व्याहृतं ब्राह्मणानां साम्प्रतं नास्ति किंचिदिति॥९॥
मूलम्
अथ प्रायात् पुनरन्य आगच्छदश्वार्थी ब्राह्मणस्तमब्रवीदतियातो दास्यामि त्वरितमेव मे दीयतामित्यब्रवीद् ब्राह्मणस्तस्मै दत्त्वाश्वं रथधुरं गृह्णता व्याहृतं ब्राह्मणानां साम्प्रतं नास्ति किंचिदिति॥९॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘तत्पश्चात् जब वे आगे बढ़े, तब फिर एक अश्वका इच्छुक ब्राह्मण आ पहुँचा। उसके माँगनेपर राजाने कहा—‘मैं शीघ्र ही अपने लक्ष्यतक पहुँचकर घोड़ा दे दूँगा।’ ब्राह्मण बोला—‘मुझे तुरंत दीजिये।’ तब उन्होंने ब्राह्मणको अश्व देकर स्वयं रथका धुरा पकड़ लिया और कहा—‘ब्राह्मणोंके लिये ऐसा करना सर्वथा उचित नहीं है’॥९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
य एष ददाति चासूयति च तेन व्याहृतेन तथावतरेत्। अथ द्वाभ्यां यातव्यमिति कोऽवतरेत्॥१०॥
मूलम्
य एष ददाति चासूयति च तेन व्याहृतेन तथावतरेत्। अथ द्वाभ्यां यातव्यमिति कोऽवतरेत्॥१०॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘ये प्रतर्दन दान देते हैं और ब्राह्मणकी निन्दा भी करते हैं, अतः वह निन्दायुक्त वचन बोलनेके कारण पहले इन्हींको स्वर्गसे उतरना पड़ेगा। तब पुनः प्रश्न किया गया, ‘हम शेष दो भाई जा रहे हैं, उनमेंसे कौन पहले स्वर्गसे नीचे उतरेगा?’॥१०॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
वसुमना अवतरेदित्यब्रवीदृषिः ॥ ११ ॥
मूलम्
वसुमना अवतरेदित्यब्रवीदृषिः ॥ ११ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘देवर्षिने उत्तर दिया—‘वसुमना पहले उतरेंगे’॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
किं कारणमित्यपृच्छदथाचष्ट नारदः । अहं परिभ्रमन् वसुमनसो गृहमुपस्थितः ॥ १२ ॥
मूलम्
किं कारणमित्यपृच्छदथाचष्ट नारदः । अहं परिभ्रमन् वसुमनसो गृहमुपस्थितः ॥ १२ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘तब उन्होंने पूछा—‘इसका क्या कारण है?’ नारदजी बोले—‘एक दिन मैं घूमता-घामता वसुमनाके घरपर जा पहुँचा॥१२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
स्वस्तिवचनमासीत् पुष्परथस्य प्रयोजनेन तमहमन्वगच्छं स्वस्तिवाचितेषु ब्राह्मणेषु रथो ब्राह्मणानां दर्शितः॥१३॥
मूलम्
स्वस्तिवचनमासीत् पुष्परथस्य प्रयोजनेन तमहमन्वगच्छं स्वस्तिवाचितेषु ब्राह्मणेषु रथो ब्राह्मणानां दर्शितः॥१३॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘उस दिन उनके यहाँ स्वस्तिवाचन हो रहा था। राजाके यहाँ एक ऐसा रथ था, जो पर्वत, आकाश और समुद्र आदि दुर्गम स्थानोंपर भी सुगमतासे आ-जा सकता था। उसका नाम था ‘पुष्परथ’। मैं उसीके प्रयोजनसे राजाके यहाँ गया था। जब ब्राह्मणलोग स्वस्तिवाचन कर चुके, तब राजाने ब्राह्मणोंको अपना वह रथ दिखाया॥१३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तमहं रथं प्राशंसमथ राजाब्रवीद् भगवता रथः प्रशस्तः। एष भगवतो रथ इति॥१४॥
मूलम्
तमहं रथं प्राशंसमथ राजाब्रवीद् भगवता रथः प्रशस्तः। एष भगवतो रथ इति॥१४॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘उस समय मैंने उस रथकी बड़ी प्रशंसा की।’ राजा बोले—‘भगवन्! आपने इस रथकी प्रशंसा की है। अतः यह रथ आपहीका है’॥१४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अथ कदाचित् पुनरप्यहमुपस्थितः पुनरेव च रथप्रयोजनमासीत्। सम्यगयमेष भगवत इत्येवं राजाब्रवीदिति पुनरेव तृतीयं स्वस्तिवाचनं समभावयमथ राजा ब्राह्मणानां दर्शयन् मामभिप्रेक्ष्याब्रवीत्। अथो भगवता पुष्परथस्य स्वस्तिवाचनानि सुष्ठु सम्भावितानि एतेन द्रोहवचने नावतरेत्॥१५॥
मूलम्
अथ कदाचित् पुनरप्यहमुपस्थितः पुनरेव च रथप्रयोजनमासीत्। सम्यगयमेष भगवत इत्येवं राजाब्रवीदिति पुनरेव तृतीयं स्वस्तिवाचनं समभावयमथ राजा ब्राह्मणानां दर्शयन् मामभिप्रेक्ष्याब्रवीत्। अथो भगवता पुष्परथस्य स्वस्तिवाचनानि सुष्ठु सम्भावितानि एतेन द्रोहवचने नावतरेत्॥१५॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘तदनन्तर एक दिन और मैं राजाके यहाँ उपस्थित हुआ। पुनः मेरे जानेका उद्देश्य पुष्परथको प्राप्त करना ही था। उस दिन भी राजाने बड़ी आवभगतके साथ कहा—‘भगवन्! यह रथ आपका ही है।’ फिर तीसरी बार मैंने उनके यहाँ जाकर स्वस्तिवाचनका कार्य सम्पन्न किया। राजाने ब्राह्मणोंको उस रथका दर्शन कराते हुए मेरी ओर देखकर कहा—‘भगवन्! आपने पुष्परथके लिये अच्छे स्वस्तिवाचन किये।’ (ऐसा कहकर भी उन्होंने रथ नहीं दिया।) इस (छलयुक्त) वचनसे वसुमना ही पहले स्वर्गसे पृथ्वीपर उतरेंगे’॥१५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अथैकेन यातव्यं स्यात् कोऽवतरेत् पुनर्नारद आह शिबिर्यायादहमवतरेयमत्र किं कारणमित्यब्रवीत्। असावहं शिबिना समो नास्मि यतो ब्राह्मणः कश्चिदेनमब्रवीत्॥१६॥
शिबे अन्नार्थ्यस्मीति तमब्रवीच्छिबिः किं क्रियतामाज्ञापयतु भवानिति ॥ १७ ॥
मूलम्
अथैकेन यातव्यं स्यात् कोऽवतरेत् पुनर्नारद आह शिबिर्यायादहमवतरेयमत्र किं कारणमित्यब्रवीत्। असावहं शिबिना समो नास्मि यतो ब्राह्मणः कश्चिदेनमब्रवीत्॥१६॥
शिबे अन्नार्थ्यस्मीति तमब्रवीच्छिबिः किं क्रियतामाज्ञापयतु भवानिति ॥ १७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘यदि आपके साथ हममेंसे एकमात्र शिबिको ही स्वर्गलोकमें जाना हो तो वहाँसे पहले कौन उतरेगा?’ ऐसा प्रश्न होनेपर नारदजीने फिर कहा—‘शिबि जायँगे और मैं उतरूँगा। ‘इसमें क्या कारण है?’ यह पूछे जानेपर देवर्षि नारदने कहा—‘मैं राजा शिबिके समान नहीं हूँ, क्योंकि एक दिन एक ब्राह्मणने शिबिसे कहा—‘शिबे! मैं भोजन करना चाहता हूँ।’ राजाने पूछा—‘आपके लिये क्या रसोई बनायी जाय, आज्ञा कीजिये’॥१६-१७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अथैनं ब्राह्मणोऽब्रवीद् य एष ते पुत्रो बृहद्गर्भो नाम एष प्रमातव्य इति तमेनं संस्कुरु अन्नं चोपपादय ततोऽहं प्रतीक्ष्य इति। ततः पुत्रं प्रमाथ्य संस्कृत्य विधिना साधयित्वा पात्र्यामर्पयित्वा शिरसा प्रतिगृह्य ब्राह्मणममृगयत्॥१८॥
मूलम्
अथैनं ब्राह्मणोऽब्रवीद् य एष ते पुत्रो बृहद्गर्भो नाम एष प्रमातव्य इति तमेनं संस्कुरु अन्नं चोपपादय ततोऽहं प्रतीक्ष्य इति। ततः पुत्रं प्रमाथ्य संस्कृत्य विधिना साधयित्वा पात्र्यामर्पयित्वा शिरसा प्रतिगृह्य ब्राह्मणममृगयत्॥१८॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘तब इनसे ब्राह्मणने कहा—‘यह जो तुम्हारा पुत्र बृहद्गर्भ है, इसे मार डालो।’ फिर उसका दाह-संस्कार करो। तत्पश्चात् अन्न तैयार करो और मेरी प्रतीक्षा करो।’ तब राजाने पुत्रको मारकर उसका दाह-संस्कार कर दिया और फिर विधिपूर्वक अन्न तैयार करके उसे बटलोईमें डालकर (और ढक्कनसे ढककर) अपने सिरपर रख लिया, फिर वे उस ब्राह्मणकी खोज करने लगे॥१८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अथास्य मृगयमाणस्य कश्चिदाचष्ट एष ते ब्राह्मणो नगरं प्रविश्य दहति ते गृहं कोशागारमायुधागारं स्त्र्यगारमश्वशालां हस्तिशालां च क्रुद्ध इति॥१९॥
मूलम्
अथास्य मृगयमाणस्य कश्चिदाचष्ट एष ते ब्राह्मणो नगरं प्रविश्य दहति ते गृहं कोशागारमायुधागारं स्त्र्यगारमश्वशालां हस्तिशालां च क्रुद्ध इति॥१९॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘खोज करते समय किसी मनुष्यने उनके पास आकर कहा—राजन्! आपका ब्राह्मण इधर है। यह नगरमें प्रवेश करके आपके भवन, कोषागार, शस्त्रागार, अन्तःपुर, अश्वशाला और गजशाला सबमें कुपित होकर आग लगा रहा है’॥१९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अथ शिबिस्तथैवाविकृतमुखवर्णो नगरं प्रविश्य ब्राह्मणं तमब्रवीत् सिद्धं भगवन्नन्नमिति ब्राह्मणो न किंचिद् व्याजहार विस्मयादधोमुखश्चासीत्॥२०॥
मूलम्
अथ शिबिस्तथैवाविकृतमुखवर्णो नगरं प्रविश्य ब्राह्मणं तमब्रवीत् सिद्धं भगवन्नन्नमिति ब्राह्मणो न किंचिद् व्याजहार विस्मयादधोमुखश्चासीत्॥२०॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘यह सब सुनकर भी राजा शिबिके मुखकी कान्ति पूर्ववत् बनी रही। उसमें तनिक भी विकार न आया। वे नगरमें घुसकर ब्राह्मणसे बोले—‘भगवन्! आपका भोजन तैयार है।’ ब्राह्मण कुछ न बोला। वह आश्चर्यसे मुँह नीचा किये देखता रहा॥२०॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
ततः प्रासादयद् ब्राह्मणं भगवन् भुज्यतामिति । मुहूर्तादुद्वीक्ष्य शिबिमब्रवीत् ॥ २१ ॥
मूलम्
ततः प्रासादयद् ब्राह्मणं भगवन् भुज्यतामिति । मुहूर्तादुद्वीक्ष्य शिबिमब्रवीत् ॥ २१ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘तब राजाने ब्राह्मणको मनाते हुए कहा—‘भगवन्! भोजन कर लीजिये।’ ब्राह्मणने दो घड़ीतक ऊपरकी ओर देखनेके पश्चात् शिबिसे कहा—॥२१॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
त्वमेवैतदशानेति तत्राह तथेति शिबिस्तथैवाविमना महित्वा कपालमभ्युद्धार्य भोक्तुमैच्छत् ॥ २२ ॥
मूलम्
त्वमेवैतदशानेति तत्राह तथेति शिबिस्तथैवाविमना महित्वा कपालमभ्युद्धार्य भोक्तुमैच्छत् ॥ २२ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘तुम्हीं यह सब खा जाओ।’ शिबिने उसी प्रकार मनको प्रसन्न रखते हुए ‘बहुत अच्छा’ कहकर ब्राह्मणकी आज्ञा स्वीकार की और उनका पूजन करके (सिरपर रखे हुए) ढक्कनको उघाड़कर वह सब खानेकी इच्छा की॥२२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अथास्य ब्राह्मणो हस्तमगृह्णात्। अब्रवीच्चैनं जितक्रोधोऽसि न ते किञ्चिदपरित्याज्यं ब्राह्मणार्थे ब्राह्मणोऽपि तं महाभागं सभाजयत्॥२३॥
मूलम्
अथास्य ब्राह्मणो हस्तमगृह्णात्। अब्रवीच्चैनं जितक्रोधोऽसि न ते किञ्चिदपरित्याज्यं ब्राह्मणार्थे ब्राह्मणोऽपि तं महाभागं सभाजयत्॥२३॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘तब ब्राह्मणने उनका हाथ पकड़ लिया और कहा—‘राजन्! तुमने क्रोधको जीत लिया है। तुम्हारे पास कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जिसे तुम ब्राह्मणके लिये न दे सको।’ ऐसा कहकर ब्राह्मणने भी उन महाभाग नरेशका समादर किया॥२३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
स ह्युद्वीक्षमाणः पुत्रमपश्यदग्रे तिष्ठन्तं देवकुमारमिव पुण्यगन्धान्वितमलङ्कृतं सर्वं च तमर्थं विधाय ब्राह्मणोऽन्तरधीयत॥२४॥
मूलम्
स ह्युद्वीक्षमाणः पुत्रमपश्यदग्रे तिष्ठन्तं देवकुमारमिव पुण्यगन्धान्वितमलङ्कृतं सर्वं च तमर्थं विधाय ब्राह्मणोऽन्तरधीयत॥२४॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘राजाने जब आँख उठाकर देखा, तब उनका पुत्र आगे खड़ा था। वह देवकुमारकी भाँति दिव्य वस्त्राभूषणोंसे विभूषित था। उसके शरीरसे पवित्र सुगन्ध निकल रही थी। ब्राह्मण-देवता सब वस्तुओंको पूर्ववत् ठीक करके अन्तर्धान हो गये॥२४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तस्य राजर्षेर्विधाता तेनैव वेषेण परीक्षार्थमागत इति तस्मिन्नन्तर्हिते अमात्या राजानमूचुः। किं प्रेप्सुना भवता इदमेवं जानता कृतमिति॥२५॥
मूलम्
तस्य राजर्षेर्विधाता तेनैव वेषेण परीक्षार्थमागत इति तस्मिन्नन्तर्हिते अमात्या राजानमूचुः। किं प्रेप्सुना भवता इदमेवं जानता कृतमिति॥२५॥
अनुवाद (हिन्दी)
साक्षात् विधाता ब्राह्मणके वेशमें राजर्षि शिबिकी परीक्षा लेने आये थे। उनके अन्तर्धान हो जानेपर राजाके मन्त्रियोंने उनसे पूछा—‘महाराज! आप क्या चाहते हैं? जिसके लिये सब कुछ जानते हुए भी ऐसा दुःसाहसपूर्ण कार्य किया है?’॥२५॥
मूलम् (वचनम्)
शिबिरुवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
नैवाहमेतद् यशसे ददानि
न चार्थहेतोर्न च भोगतृष्णया।
पापैरनासेवित एष मार्ग
इत्येवमेतत् सकलं करोमि ॥ २६ ॥
मूलम्
नैवाहमेतद् यशसे ददानि
न चार्थहेतोर्न च भोगतृष्णया।
पापैरनासेवित एष मार्ग
इत्येवमेतत् सकलं करोमि ॥ २६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
शिबि बोले— मैं यशके लिये यह दान नहीं देता। धनके लिये अथवा भोगकी लिप्सासे भी दान नहीं करता। यह धर्मात्माओंका मार्ग है। पापी मनुष्य इसपर नहीं चल सकते। ऐसा समझकर ही मैं यह सब कुछ करता रहता हूँ॥२६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
सद्भिः सदाध्यासितं तु प्रशस्तं
तस्मात् प्रशस्तं श्रयते मतिर्मे।
एतन्महाभाग्यवरं शिबेस्तु
तस्मादहं वेद यथावदेतत् ॥ २७ ॥
मूलम्
सद्भिः सदाध्यासितं तु प्रशस्तं
तस्मात् प्रशस्तं श्रयते मतिर्मे।
एतन्महाभाग्यवरं शिबेस्तु
तस्मादहं वेद यथावदेतत् ॥ २७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
श्रेष्ठ पुरुष सदा जिस मार्गसे चले हैं, वही उत्तम मार्ग है। इसीलिये मेरी बुद्धि सदा उस उत्तम पथका ही आश्रय लेती है। यह है राजा शिबिकी सर्वश्रेष्ठ महिमा, जिसे मैं (अच्छी तरह) जानता हूँ। इसीलिये इन सब बातोंका यथावत् वर्णन किया है॥२७॥
मूलम् (समाप्तिः)
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि राजन्यमहाभाग्ये शिबिचरिते अष्टनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९८ ॥
मूलम् (वचनम्)
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें क्षत्रियमाहात्म्यके प्रकरणमें शिबिचरित्रविषयक एक सौ अट्ठानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥१९८॥