भागसूचना
षण्णवत्यधिकशततमोऽध्यायः
सूचना (हिन्दी)
सेदुक और वृषदर्भका चरित्र
मूलम् (वचनम्)
वैशम्पायन उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
भूय एव महाभाग्यं कथ्यतामित्यब्रवीत् पाण्डवः ॥ १ ॥
मूलम्
भूय एव महाभाग्यं कथ्यतामित्यब्रवीत् पाण्डवः ॥ १ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने मार्कण्डेयजीसे पुनः यह अनुरोध किया—‘भगवन्! फिर मुझे क्षत्रियोंका माहात्म्य सुनाइये’॥१॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अथाचष्ट मार्कण्डेयो महाराज वृषदर्भसेदुकनामानौ राजानौ नीतिमार्गरतावस्त्रोपास्त्रकृतिनौ ॥ २ ॥
मूलम्
अथाचष्ट मार्कण्डेयो महाराज वृषदर्भसेदुकनामानौ राजानौ नीतिमार्गरतावस्त्रोपास्त्रकृतिनौ ॥ २ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
तब मार्कण्डेयजीने कहा— ‘महाराज! पूर्वकालमें वृषदर्भ और सेदुक ये दो राजा थे। दोनोंही नीतिके मार्गपर चलनेवाले और अस्त्र तथा उपास्त्रोंकी विद्यामें निपुण थे॥२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
सेदुको वृषदर्भस्य बालस्यैव उपांशुव्रतमभ्यजानात् कुप्यमदेयं ब्राह्मणस्य ॥ ३ ॥
मूलम्
सेदुको वृषदर्भस्य बालस्यैव उपांशुव्रतमभ्यजानात् कुप्यमदेयं ब्राह्मणस्य ॥ ३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘वृषदर्भने बचपनसे ही एक गुप्त व्रत ले रखा था कि ‘ब्राह्मणको सोना-चाँदीके सिवा और कुछ नहीं देना चाहिये (तात्पर्य यह कि उसे सुवर्ण तथा रजत ही प्रदान करना चाहिये)’। उनके इस व्रतको सेदुक जानते थे॥३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अथ तं सेदिकं ब्राह्मणः कश्चिद् वेदाध्ययनसम्पन्न आशिषं दत्त्वा गुर्वर्थी भिक्षितवान्॥४॥
अश्वसहस्रं मे भवान् ददात्विति तं सेदुको ब्राह्मणमब्रवीत् ॥ ५ ॥
नास्ति सम्भवो गुर्वर्थं दातुमिति ॥ ६ ॥
मूलम्
अथ तं सेदिकं ब्राह्मणः कश्चिद् वेदाध्ययनसम्पन्न आशिषं दत्त्वा गुर्वर्थी भिक्षितवान्॥४॥
अश्वसहस्रं मे भवान् ददात्विति तं सेदुको ब्राह्मणमब्रवीत् ॥ ५ ॥
नास्ति सम्भवो गुर्वर्थं दातुमिति ॥ ६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘एक दिन कोई वेदाध्ययनसम्पन्न ब्राह्मण राजा सेदुकके पास आया और उन्हें आशीर्वाद देकर गुरु-दक्षिणाके लिये भिक्षा माँगता हुआ बोला—‘राजन्! आप मुझे एक हजार घोड़े दीजिये।’ तब सेदुकने उस ब्राह्मण-से कहा—‘ब्रह्मन्! आपकी अभीष्ट गुरु-दक्षिणा देना मेरे लिये सम्भव नहीं है॥४-६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
स त्वं गच्छ वृषदर्भसकाशम्। राजा परम-धर्मज्ञो ब्राह्मण तं भिक्षस्व। स ते दास्यति तस्यैतदुपांशुव्रतमिति॥७॥
मूलम्
स त्वं गच्छ वृषदर्भसकाशम्। राजा परम-धर्मज्ञो ब्राह्मण तं भिक्षस्व। स ते दास्यति तस्यैतदुपांशुव्रतमिति॥७॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘अतः आप वृषदर्भके पास चले जाइये। ब्राह्मण! राजा वृषदर्भ बड़े धर्मज्ञ हैं। आप उन्हींसे याचना कीजिये। वे आपकी अभीष्ट वस्तु अवश्य दे देंगे। यह उनका गुप्त नियम है’॥७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अथ ब्राह्मणो वृषदर्भसकाशं गत्वा अश्वसहस्रमयाचत् । स राजा तं कशेनाताडयत् ॥ ८ ॥
मूलम्
अथ ब्राह्मणो वृषदर्भसकाशं गत्वा अश्वसहस्रमयाचत् । स राजा तं कशेनाताडयत् ॥ ८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘तब ब्राह्मण देवताने वृषदर्भके पास जाकर एक हजार घोड़े माँगे। यह सुनकर राजा उन्हें कोड़ेसे पीटने लगे’॥८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तं ब्राह्मणोऽब्रवीत् । किं हिंस्यनागसं मामिति ॥ ९ ॥
मूलम्
तं ब्राह्मणोऽब्रवीत् । किं हिंस्यनागसं मामिति ॥ ९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘यह देख ब्राह्मणने उनसे पूछा—‘राजन्! मुझ निरपराधको आप क्यों मार रहे हैं’॥९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
एवमुक्त्वा तं शपन्तं राजाऽऽह। विप्र किं यो न ददाति तुभ्यमुताहोस्विद् ब्राह्मण्यमेतत्॥१०॥
मूलम्
एवमुक्त्वा तं शपन्तं राजाऽऽह। विप्र किं यो न ददाति तुभ्यमुताहोस्विद् ब्राह्मण्यमेतत्॥१०॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘ऐसा कहकर ब्राह्मण देवता शाप देनेको उद्यत हो गये। तब राजाने उनसे कहा—‘विप्रवर! क्या जो आपको अपना धन न दे, उसको शाप देना ही उचित है? अथवा यही ब्राह्मणोचित कर्म है?’॥१०॥
मूलम् (वचनम्)
ब्राह्मण उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
राजाधिराज तव समीपं सेदुकेन प्रेषितो भिक्षितु-मागतः । तेनानुशिष्टेन मया त्वं भिक्षितोऽसि ॥ ११ ॥
मूलम्
राजाधिराज तव समीपं सेदुकेन प्रेषितो भिक्षितु-मागतः । तेनानुशिष्टेन मया त्वं भिक्षितोऽसि ॥ ११ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
ब्राह्मणने कहा— ‘राजाधिराज! आपके पास राजा सेदुकने मुझे भेजा है, तभी आपसे गुरु-दक्षिणा माँगने आया हूँ। उनके उपदेशके अनुसार ही मैंने आपसे याचना की है’॥११॥
मूलम् (वचनम्)
राजोवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
पूर्वाह्णे ते दास्यामि यो मेऽद्य बलिरागमिष्यति। यो हन्यते कशया कथं मोघं क्षेपणं तस्य स्यात्॥१२॥
मूलम्
पूर्वाह्णे ते दास्यामि यो मेऽद्य बलिरागमिष्यति। यो हन्यते कशया कथं मोघं क्षेपणं तस्य स्यात्॥१२॥
अनुवाद (हिन्दी)
राजा बोले— ब्रह्मन्! आज जो भी राजकीय कर मेरे पास आयेगा, उसे कल पूर्वाह्णमें ही आपको दे दूँगा। जिसे कोड़ेसे पीटा जाय, उसे खाली हाथ कैसे लौटाया जा सकता है?॥१२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
इत्युक्त्वा ब्राह्मणाय दैवसिकामुत्पत्तिं प्रादात्।
अधिकस्याश्वसहस्रस्य मूल्यमेवादादिति ॥ १३ ॥
मूलम्
इत्युक्त्वा ब्राह्मणाय दैवसिकामुत्पत्तिं प्रादात्।
अधिकस्याश्वसहस्रस्य मूल्यमेवादादिति ॥ १३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
ऐसा कहकर राजाने ब्राह्मणको एक दिनकी आय दे दी। इस प्रकार उन्होंने एक हजारसे अधिक घोड़ोंका मूल्य ही दिया[^*]॥१३॥
मूलम् (समाप्तिः)
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि सेदुकवृषदर्भचरिते षण्णवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९६ ॥
मूलम् (वचनम्)
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें सेदुकवृषदर्भचरितविषयक एक सौ छियानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥१९६॥