१९४ शिबिचरिते

भागसूचना

चतुर्नवत्यधिकशततमोऽध्यायः

सूचना (हिन्दी)

क्षत्रिय राजाओंका महत्त्व—सुहोत्र और शिबिकी प्रशंसा

मूलम् (वचनम्)

वैशम्पायन उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

ततः पाण्डवाः पुनर्मार्कण्डेयमूचुः ॥ १ ॥

मूलम्

ततः पाण्डवाः पुनर्मार्कण्डेयमूचुः ॥ १ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तदनन्तर पाण्डवोंने पुनः मार्कण्डेयजीसे प्रश्न किया॥१॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

कथितं ब्राह्मणमहाभाग्यं राजन्यमहाभाग्यमिदानीं शुश्रूषामह इति तानुवाच मार्कण्डेयो महर्षिः श्रूयता-मिति इदानीं राजन्यानां महाभाग्यमिति। कुरूणामन्य-तमः सुहोत्रो नाम राजा महर्षीनभिगम्य निवृत्य रथस्थमेव राजानमौशीनरं शिबिं ददर्शाभिमुखं तौ समेत्य परस्परेण यथावयः पूजां प्रयुज्य गुणसाम्येन परस्परेण तुल्यात्मानौ विदित्वान्योन्यस्य पन्थानं न ददतुस्तत्र नारदः प्रादुरासीत् किमिदं भवन्तौ परस्परस्य पन्थानमावृत्य तिष्ठत इति॥२॥

मूलम्

कथितं ब्राह्मणमहाभाग्यं राजन्यमहाभाग्यमिदानीं शुश्रूषामह इति तानुवाच मार्कण्डेयो महर्षिः श्रूयता-मिति इदानीं राजन्यानां महाभाग्यमिति। कुरूणामन्य-तमः सुहोत्रो नाम राजा महर्षीनभिगम्य निवृत्य रथस्थमेव राजानमौशीनरं शिबिं ददर्शाभिमुखं तौ समेत्य परस्परेण यथावयः पूजां प्रयुज्य गुणसाम्येन परस्परेण तुल्यात्मानौ विदित्वान्योन्यस्य पन्थानं न ददतुस्तत्र नारदः प्रादुरासीत् किमिदं भवन्तौ परस्परस्य पन्थानमावृत्य तिष्ठत इति॥२॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘मुनिवर! आपने ब्राह्मणोंके माहात्म्यका तो वर्णन किया, अब हम क्षत्रियोंकी महत्ताके विषयमें इस समय कुछ सुनना चाहते हैं।’ यह बात सुनकर महर्षि मार्कण्डेयने कहा—‘अच्छा सुनो। अब मैं क्षत्रियोंके माहात्म्यका वर्णन करता हूँ। कुरुवंशी क्षत्रियोंमें सुहोत्र नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं। एक दिन वे महर्षियोंका सत्संग करके जब वहाँसे लौट रहे थे, उस समय उन्होंने अपने सामने ही रथपर बैठे हुए उशीनरपुत्र राजा शिबिको देखा। निकट आनेपर उन दोनोंने अवस्थाके अनुसार एक-दूसरेका सम्मान किया। परंतु गुणमें अपनेको बराबर समझकर एकने दूसरेके लिये राह नहीं दी। इतनेहीमें वहाँ देवर्षि नारदजी प्रकट हो गये और पूछ बैठे ‘यह क्या बात है’ जो कि तुम दोनों इस तरह एक-दूसरेका मार्ग रोककर खड़े हो?’॥२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तावूचतुर्नारदं नैतद् भगवन् पूर्वकर्मकर्त्रादिभि-र्विशिष्टस्य पन्था उपदिश्यते समर्थाय वा आवां च सख्यं परस्परेणोपगतौ तच्चावधानतोऽत्युत्कृष्टमधरो-त्तरं परिभ्रष्टं नारदस्त्वेवमुक्तः श्लोकत्रयमपठत्—॥

मूलम्

तावूचतुर्नारदं नैतद् भगवन् पूर्वकर्मकर्त्रादिभि-र्विशिष्टस्य पन्था उपदिश्यते समर्थाय वा आवां च सख्यं परस्परेणोपगतौ तच्चावधानतोऽत्युत्कृष्टमधरो-त्तरं परिभ्रष्टं नारदस्त्वेवमुक्तः श्लोकत्रयमपठत्—॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘तब उन दोनोंने नारदजीसे कहा—‘भगवन्! ऐसे बात नहीं है। पहलेके कर्म-कर्ताओं (धर्म-व्यवस्थापकों)-ने यह उपदेश दिया है कि जो अपनेसे सभी बातोंमें बढ़ा-चढ़ा हो या अधिक शक्तिशाली हो, उसीको मार्ग देना चाहिए। हम दोनों एक-दूसरेसे मित्रभाव रखकर मिले हैं। विचार करनेपर हम यह निर्णय नहीं कर पाते कि हम दोनोंमेंसे कौन अत्यन्त श्रेष्ठ है और कौन उसकी अपेक्षा अधिक छोटा?’ उनके ऐसा कहनेपर नारदजीने तीन श्लोक पढ़े॥३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

क्रूरः कौरव्य मृदवे
मृदुः क्रूरे च कौरव।
साधुश्चासाधवे साधुः
साधवे नाप्नुयात् कथम् ॥ ४ ॥

मूलम्

क्रूरः कौरव्य मृदवे
मृदुः क्रूरे च कौरव।
साधुश्चासाधवे साधुः
साधवे नाप्नुयात् कथम् ॥ ४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘उनका सारांश इस प्रकार है—कौरव! अपने साथ कोमलताका बर्ताव करनेवालेके लिये क्रूर मनुष्य भी कोमल बन जाता है। क्रूरतापूर्ण बर्ताव तो वह क्रूर मनुष्योंके प्रति ही करता है, परंतु साधु पुरुष दुष्टोंके प्रति भी साधुताका ही बर्ताव करता है। फिर वह साधु पुरुषोंके साथ साधुताका बर्ताव कैसे नहीं अपनायेगा?॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

कृतं शतगुणं कुर्या-
न्नास्ति देवेषु निर्णयः ।
औशीनरः साधुशीलो
भवतो वै महीपतिः ॥ ५ ॥

मूलम्

कृतं शतगुणं कुर्या-
न्नास्ति देवेषु निर्णयः ।
औशीनरः साधुशीलो
भवतो वै महीपतिः ॥ ५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘मनुष्य भी चाहे तो वह अपने ऊपर किये हुए उपकारका बदला सौगुना करके चुका सकता है। देवताओंमें ही यह प्रत्युपकारका भाव होता है, ऐसा कोई नियम नहीं है। सुहोत्र! उशीनरपुत्र शिबिका शील-स्वभाव तुमसे कहीं अच्छा है॥५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

जयेत् कदर्यं दानेन
सत्येनानृतवादिनम् ।
क्षमया क्रूरकर्माण-
मसाधुं साधुना जयेत् ॥ ६ ॥

मूलम्

जयेत् कदर्यं दानेन
सत्येनानृतवादिनम् ।
क्षमया क्रूरकर्माण-
मसाधुं साधुना जयेत् ॥ ६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘नीच प्रकृतिवाले मनुष्यको दान देकर वशमें करे। असत्यवादीको सत्य भाषणसे जीते। क्रूरको क्षमासे और दुष्टको उत्तम व्यवहारसे अपने वशमें करे॥६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तदुभावेव भवन्तावुदारौ व इदानीं भवद्भ्यामन्य-तमः सोऽपसर्पतु एतद् वै निदर्शनमित्युक्त्वा तूष्णीं नारदो बभूव। एतच्छ्रुत्वा तु कौरव्यः शिबिं प्रदक्षिणं कृत्वा पन्थानं दत्त्वा बहुकर्मभिः प्रशस्य प्रययौ॥७॥

मूलम्

तदुभावेव भवन्तावुदारौ व इदानीं भवद्भ्यामन्य-तमः सोऽपसर्पतु एतद् वै निदर्शनमित्युक्त्वा तूष्णीं नारदो बभूव। एतच्छ्रुत्वा तु कौरव्यः शिबिं प्रदक्षिणं कृत्वा पन्थानं दत्त्वा बहुकर्मभिः प्रशस्य प्रययौ॥७॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘अतः तुम दोनों ही उदार हो; इस समय तुम दोनोंमें से एक, जो अधिक उदार हो, वह मार्ग छोड़कर हट जाय; यही उदारताका आदर्श है।’ ऐसा कहकर नारदजी चुप हो गये। यह सुनकर कुरुवंशी राजा सुहोत्रने शिबिको अपनी दायीं ओर करके मार्ग दे दिया और उनके अनेक सत्कर्मोंका उल्लेख करके उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए वे अपनी राजधानीको चले गये॥७॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तदेतद् राज्ञो महाभाग्यमप्युक्तवान् नारदः ॥ ८ ॥

मूलम्

तदेतद् राज्ञो महाभाग्यमप्युक्तवान् नारदः ॥ ८ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘इस प्रकार साक्षात् नारदजीने राजा शिबिकी महत्ताका अपने मुखसे वर्णन किया’॥८॥

मूलम् (समाप्तिः)

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि शिबिचरिते चतुर्नवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९४ ॥

मूलम् (वचनम्)

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें शिबिचरितविषयक एक सौ चौरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥१९४॥