भागसूचना
त्रिनवत्यधिकशततमोऽध्यायः
सूचना (हिन्दी)
इन्द्र और बक मुनिका संवाद
मूलम् (वचनम्)
वैशम्पायन उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
मार्कण्डेयमृषयो ब्राह्मणा युधिष्ठिरश्च पर्यपृच्छ-न्नृषिः केन दीर्घायुरासीद् बको मार्कण्डेयस्तु तान् सर्वानुवाच॥१॥
मूलम्
मार्कण्डेयमृषयो ब्राह्मणा युधिष्ठिरश्च पर्यपृच्छ-न्नृषिः केन दीर्घायुरासीद् बको मार्कण्डेयस्तु तान् सर्वानुवाच॥१॥
अनुवाद (हिन्दी)
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! एक दिन ऋषियों, ब्राह्मणों तथा युधिष्ठिरने मार्कण्डेय मुनिसे पूछा—‘ब्रह्मन्! महर्षि बक कैसे दीर्घायु हुए थे?’ तब मार्कण्डेयजीने उन सबसे कहा—॥१॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
महातपा दीर्घायुश्च बको राजन् नात्र कार्या विचारणा ॥ २ ॥
मूलम्
महातपा दीर्घायुश्च बको राजन् नात्र कार्या विचारणा ॥ २ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘राजन्! बक महान् तपस्वी होनेके कारण दीर्घायु हुए थे। इस विषयमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये’॥२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
एतच्छ्रुत्वा तु कौन्तेयो भ्रातृभिः सह भारत।
मार्कण्डेयं पर्यपृच्छद् धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ ३ ॥
मूलम्
एतच्छ्रुत्वा तु कौन्तेयो भ्रातृभिः सह भारत।
मार्कण्डेयं पर्यपृच्छद् धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ ३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
भरतनन्दन जनमेजय! मार्कण्डेयजीका यह कथन सुनकर भाइयोंसहित कुन्तीकुमार धर्मराज युधिष्ठिरने मार्कण्डेयजीसे पुनः पूछा—॥३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
श्रूयते हि महाभाग बको दाल्भ्यो महातपाः।
प्रियः सखा च शक्रस्य चिरजीवी च सत्तम ॥ ४ ॥
मूलम्
श्रूयते हि महाभाग बको दाल्भ्यो महातपाः।
प्रियः सखा च शक्रस्य चिरजीवी च सत्तम ॥ ४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
महाभाग मुनिश्रेष्ठ! दल्भके पुत्र महातपस्वी बक ऋषि चिरजीवी तथा देवराज इन्द्रके प्रिय मित्र सुने जाते हैं॥४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
एतदिच्छामि भगवन् बकशक्रसमागमम् ।
सुखदुःखसमायुक्तं तत्त्वेन कथयस्व मे ॥ ५ ॥
मूलम्
एतदिच्छामि भगवन् बकशक्रसमागमम् ।
सुखदुःखसमायुक्तं तत्त्वेन कथयस्व मे ॥ ५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘भगवन्! बक और इन्द्रका यह समागम (चिरजीवी पुरुषोंके) सुख और दुःखकी वार्तासे युक्त कहा गया है। मैं इसे सुनना चाहता हूँ; आप यथार्थरूपसे इसका वर्णन करें’॥५॥
मूलम् (वचनम्)
मार्कण्डेय उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
वृत्ते देवासुरे राजन् संग्रामे लोमहर्षणे।
त्रयाणामपि लोकानामिन्द्रो लोकाधिपोऽभवत् ॥ ६ ॥
मूलम्
वृत्ते देवासुरे राजन् संग्रामे लोमहर्षणे।
त्रयाणामपि लोकानामिन्द्रो लोकाधिपोऽभवत् ॥ ६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
मार्कण्डेयजी बोले— राजन्! जब रोंगटे खड़े कर देनेवाला देवासुर-संग्राम समाप्त हो गया, उस समय लोकपाल इन्द्र तीनों लोकोंके अधिपति बना दिये गये॥६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
सम्यग् वर्षति पर्जन्ये सस्यसम्पद उत्तमाः।
निरामयाः सुधर्मिष्ठाः प्रजा धर्मपरायणाः ॥ ७ ॥
मूलम्
सम्यग् वर्षति पर्जन्ये सस्यसम्पद उत्तमाः।
निरामयाः सुधर्मिष्ठाः प्रजा धर्मपरायणाः ॥ ७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
इन्द्रके शासनकालमें मेघ ठीक समयपर अच्छी वर्षा करते और खेतीकी उपज अच्छी होती थी। सारी प्रजा रोग-व्याधिसे रहित, धर्ममें स्थित तथा धर्मको ही अपना परम आश्रय माननेवाली थी॥७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
मुदितश्च जनः सर्वः स्वधर्मेषु व्यवस्थितः।
ताः प्रजा मुदिताः सर्वा दृष्ट्वा बलनिषूदनः ॥ ८ ॥
ततस्तु मुदितो राजन् देवराजः शतक्रतुः।
ऐरावतं समास्थाय ताः पश्चन् मुदिताः प्रजाः ॥ ९ ॥
मूलम्
मुदितश्च जनः सर्वः स्वधर्मेषु व्यवस्थितः।
ताः प्रजा मुदिताः सर्वा दृष्ट्वा बलनिषूदनः ॥ ८ ॥
ततस्तु मुदितो राजन् देवराजः शतक्रतुः।
ऐरावतं समास्थाय ताः पश्चन् मुदिताः प्रजाः ॥ ९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
सब लोग बड़ी प्रसन्नताके साथ अपने-अपने धर्मोंमें स्थित रहते थे। अपनी उन सारी प्रजाको आनन्दित देखकर बलासुरके शत्रु देवराज इन्द्र बड़ी प्रसन्नताका अनुभव करते थे। एक दिनकी बात है, इन्द्र ऐरावत हाथीपर आरूढ़ हो चैनसे दिन बिताती हुई अपनी प्रजाको देखनेके लिये भ्रमण करने लगे॥८-९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
आश्रमांश्च विचित्रांश्च नदीश्च विविधाः शुभाः।
नगराणि समृद्धानि खेटान् जनपदांस्तथा ॥ १० ॥
प्रजापालनदक्षांश्च नरेन्द्रान् धर्मचारिणः ।
उदपानं प्रपा वापी तडागानि सरंसि च ॥ ११ ॥
नाना ब्रह्मसमाचारैः सेवितानि द्विजोत्तमैः।
ततोऽवतीर्य रम्यायां पृथ्व्यां राजञ्छतक्रतुः ॥ १२ ॥
मूलम्
आश्रमांश्च विचित्रांश्च नदीश्च विविधाः शुभाः।
नगराणि समृद्धानि खेटान् जनपदांस्तथा ॥ १० ॥
प्रजापालनदक्षांश्च नरेन्द्रान् धर्मचारिणः ।
उदपानं प्रपा वापी तडागानि सरंसि च ॥ ११ ॥
नाना ब्रह्मसमाचारैः सेवितानि द्विजोत्तमैः।
ततोऽवतीर्य रम्यायां पृथ्व्यां राजञ्छतक्रतुः ॥ १२ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
राजन्! विचित्र आश्रमों, नाना प्रकारकी कल्याण-कारिणी नदियों, समृद्धिशाली नगरों, गाँवों, जनपदों, प्रजापालन-कुशल धर्मात्मा नरेशों, कुओं, पौसलों, बावलियों, तालाबों तथा ब्रह्मचर्यपरायण श्रेष्ठ ब्राह्मणोंद्वारा सेवित अनेकानेक सरोवरोंका अवलोकन करते हुए शतक्रतु इन्द्र एक रमणीय भूभागमें उतरे॥१०—१२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तत्र रम्ये शिवे देशे बहुवृक्षसमाकुले।
पूर्वस्यां दिशि रम्यायां समुद्राभ्याशतो नृप ॥ १३ ॥
तत्राश्रमपदं रम्यं मृगद्विजनिषेवितम् ।
तत्राश्रमपदे रम्ये बकं पश्यति देवराट् ॥ १४ ॥
मूलम्
तत्र रम्ये शिवे देशे बहुवृक्षसमाकुले।
पूर्वस्यां दिशि रम्यायां समुद्राभ्याशतो नृप ॥ १३ ॥
तत्राश्रमपदं रम्यं मृगद्विजनिषेवितम् ।
तत्राश्रमपदे रम्ये बकं पश्यति देवराट् ॥ १४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
राजन्! परम सुन्दर पूर्वदिशामें समुद्रके निकट एक मनोहर एवं सुखद स्थानमें, जो बहुत-से वृक्षोंसे घिरा हुआ था, एक रमणीय आश्रम दिखायी दिया, जहाँ बहुत-से पशु और पक्षी निवास करते थे। देवराज इन्द्रने उस रमणीय आश्रममें जाकर बक मुनिका दर्शन किया॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
बकस्तु दृष्ट्वा देवेन्द्रं दृढं प्रीतमनाभवत्।
पाद्यासनार्घ्यदानेन फलमूलैरथार्चयत् ॥ १५ ॥
मूलम्
बकस्तु दृष्ट्वा देवेन्द्रं दृढं प्रीतमनाभवत्।
पाद्यासनार्घ्यदानेन फलमूलैरथार्चयत् ॥ १५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
देवराज इन्द्रको उपस्थित देख बकके हृदयमें दृढ़ प्रेम उत्पन्न हुआ। उन्होंने पाद्य, आसन, अर्घ्य और फल-मूलादि देकर देवराजका पूजन किया॥१५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
सुखोपविष्टो वरदस्ततस्तु बलसूदनः ।
ततः प्रश्नं बकं देव उवाच त्रिदशेश्वरः ॥ १६ ॥
मूलम्
सुखोपविष्टो वरदस्ततस्तु बलसूदनः ।
ततः प्रश्नं बकं देव उवाच त्रिदशेश्वरः ॥ १६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
सबको वर देनेवाले बलनिषूदन देवेश्वर इन्द्र जब सुखपूर्वक आसनपर बैठ गये, तब वे मुनिवर बकसे इस प्रकार बोले—॥१६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
शतं वर्षसहस्राणि मुने जातस्य तेऽनघ।
समाख्याहि मम ब्रह्मन् किं दुःखं चिरजीविनाम् ॥ १७ ॥
मूलम्
शतं वर्षसहस्राणि मुने जातस्य तेऽनघ।
समाख्याहि मम ब्रह्मन् किं दुःखं चिरजीविनाम् ॥ १७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘निष्पाप मुने! आपकी अवस्था एक लाख वर्षकी हो गयी। ब्रह्मन्! आप अपने अनुभवके आधारपर यह बताइये कि चिरजीवी मनुष्योंको क्या दुःख होता है’?॥
मूलम् (वचनम्)
बक उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
अप्रियैः सह संवासः प्रियैश्चापि विनाभवः।
असद्भिः सम्प्रयोगश्च तद् दुःखं चिरजीविनाम् ॥ १८ ॥
मूलम्
अप्रियैः सह संवासः प्रियैश्चापि विनाभवः।
असद्भिः सम्प्रयोगश्च तद् दुःखं चिरजीविनाम् ॥ १८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
बकने कहा— देवेश्वर! अप्रिय मनुष्योंके साथ रहना पड़ता है। प्रियजनोंकी मृत्यु हो जानेसे उनके वियोगका दुःख सहते हुए जीवन व्यतीत करना पड़ता है और दुष्ट मनुष्योंका संग प्राप्त होता है। चिरजीवी मनुष्योंके लिये यही महान् दुःख है॥१८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
पुत्रदारविनाशोऽत्र ज्ञातीनां सुहृदामपि ।
परेष्वायत्तताकृच्छ्रं किं नु दुःखतरं ततः ॥ १९ ॥
मूलम्
पुत्रदारविनाशोऽत्र ज्ञातीनां सुहृदामपि ।
परेष्वायत्तताकृच्छ्रं किं नु दुःखतरं ततः ॥ १९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
अपनी आँखोंके सामने स्त्री और पुत्रोंकी मृत्यु होती है। भाई-बन्धु आदि जातिके लोगों और सुहृदोंका सदाके लिये वियोग हो जाता है तथा जीवन-निर्वाहके लिये दूसरोंके अधीन रहकर उनके तिरस्कारका कष्ट भोगना पड़ता है। इससे बढ़कर महान् दुःख और क्या हो सकता है?॥१९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
नान्यद् दुःखतरं किञ्चिल्लोकेषु प्रतिभाति मे।
अर्थैर्विहीनः पुरुषः परैः सम्परिभूयते ॥ २० ॥
मूलम्
नान्यद् दुःखतरं किञ्चिल्लोकेषु प्रतिभाति मे।
अर्थैर्विहीनः पुरुषः परैः सम्परिभूयते ॥ २० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
निर्धन मनुष्यको जो दूसरोंसे तिरस्कृत होना पड़ता है, इससे बढ़कर महान् कष्टकी बात संसारमें मुझे और कोई नहीं जान पड़ती है॥२०॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अकुलानां कुले भावं कुलीनानां कुलक्षयम्।
संयोगं विप्रयोगं च पश्यन्ति चिरजीविनः ॥ २१ ॥
मूलम्
अकुलानां कुले भावं कुलीनानां कुलक्षयम्।
संयोगं विप्रयोगं च पश्यन्ति चिरजीविनः ॥ २१ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
चिरजीवी मनुष्य अकुलीनोंके कुलकी उन्नति, कुलीनोंके कुलका संहार तथा संयोग और वियोग देखते रहते हैं॥२१॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अपि प्रत्यक्षमेवैतत् तव देव शतक्रतो।
अकुलानां समृद्धानां कथं कुलविपर्ययः ॥ २२ ॥
मूलम्
अपि प्रत्यक्षमेवैतत् तव देव शतक्रतो।
अकुलानां समृद्धानां कथं कुलविपर्ययः ॥ २२ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
देव शतक्रतो! आप भी तो यह प्रत्यक्ष ही देख रहे हैं कि किस प्रकार समृद्धिशाली अकुलीन मनुष्योंके कुलमें उलट-फेर हो जाता है॥२२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
देवदानवगन्धर्वमनुष्योरगराक्षसाः ।
प्राप्नुवन्ति विपर्यासं किं नु दुःखतरं ततः ॥ २३ ॥
मूलम्
देवदानवगन्धर्वमनुष्योरगराक्षसाः ।
प्राप्नुवन्ति विपर्यासं किं नु दुःखतरं ततः ॥ २३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
देवता, दानव, गन्धर्व, मनुष्य, नाग तथा राक्षस—ये सभी विपरीत अवस्थामें पहुँचकर क्यासे क्या हो जाते हैं? इससे बढ़कर महान् दुःख और क्या होगा?॥२३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
कुले जाताश्च क्लिश्यन्ते दौष्कुलेयवशानुगाः।
आढ्यैर्दरिद्राश्चाक्रान्ताः किं नु दुःखतरं ततः ॥ २४ ॥
मूलम्
कुले जाताश्च क्लिश्यन्ते दौष्कुलेयवशानुगाः।
आढ्यैर्दरिद्राश्चाक्रान्ताः किं नु दुःखतरं ततः ॥ २४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
कुलीन मनुष्य भी नीच कुलके लोगोंके वशमें पड़कर क्लेश उठा रहे हैं और धनीलोग दरिद्रोंको सताते हैं। इससे बढ़कर दुःखकी बात और क्या हो सकती है?॥२४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
लोके वैधर्म्यमेतत् तु दृश्यते बहुविस्तरम्।
हीनज्ञानाश्च हृष्यन्ते क्लिश्यन्ते प्राज्ञकोविदाः ॥ २५ ॥
बहुदुःखपरिक्लेशं मानुष्यमिह दृश्यते ।
मूलम्
लोके वैधर्म्यमेतत् तु दृश्यते बहुविस्तरम्।
हीनज्ञानाश्च हृष्यन्ते क्लिश्यन्ते प्राज्ञकोविदाः ॥ २५ ॥
बहुदुःखपरिक्लेशं मानुष्यमिह दृश्यते ।
अनुवाद (हिन्दी)
लोकमें यह विपरीत अवस्था बहुत अधिक दिखायी देती है। ज्ञानहीन मूढ़ मनुष्य तो मौज करते हैं और श्रेष्ठ ज्ञानी मनुष्य क्लेश भोग रहे हैं। यहाँ मानवयोनिमें दुःख और क्लेशकी अधिकता ही दृष्टिगोचर होती है॥२५॥
मूलम् (वचनम्)
इन्द्र उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
पुनरेव महाभाग देवर्षिगणसेवित ॥ २६ ॥
समाख्याहि मम ब्रह्मन् किं सुखं चिरजीविनाम्।
मूलम्
पुनरेव महाभाग देवर्षिगणसेवित ॥ २६ ॥
समाख्याहि मम ब्रह्मन् किं सुखं चिरजीविनाम्।
अनुवाद (हिन्दी)
इन्द्रने पूछा— महाभाग! देवता तथा ऋषियोंके समुदाय आपकी सेवामें उपस्थित रहते हैं। ब्रह्मन्! अब मुझसे फिर यह बताइये कि चिरजीवी मनुष्योंको क्या सुख मिलता है?॥२६॥
मूलम् (वचनम्)
बक उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
अष्टमे द्वादशे वापि शाकं यः पचते गृहे ॥ २७ ॥
कुमित्राण्यनपाश्रित्य किं वै सुखतरं ततः।
यत्राहानि न गण्यन्ते नैनमाहुर्महाशनम् ॥ २८ ॥
मूलम्
अष्टमे द्वादशे वापि शाकं यः पचते गृहे ॥ २७ ॥
कुमित्राण्यनपाश्रित्य किं वै सुखतरं ततः।
यत्राहानि न गण्यन्ते नैनमाहुर्महाशनम् ॥ २८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
बकने कहा— जो दिनके आठवें या बारहवें भागमें अपने घरपर भोजनके लिये केवल शाक पका लेता है परंतु कुमित्रोंकी शरणमें नहीं जाता, उस पुरुषको जो सुख प्राप्त है, उससे बढ़कर सुख और क्या हो सकता है? जहाँ दिन नहीं गिने जाते—जहाँ प्रतिदिन अन्नकी प्राप्तिके लिये चिन्ता नहीं करनी पड़ती; वही सुखी है। उसे लोग अधिक खानेवाला अथवा पेटू नहीं कहते हैं॥२७-२८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अपि शाकं पचानस्य सुखं वै मघवन् गृहे।
अर्जितं स्वेन वीर्येण नाप्यपाश्रित्य कञ्चन ॥ २९ ॥
मूलम्
अपि शाकं पचानस्य सुखं वै मघवन् गृहे।
अर्जितं स्वेन वीर्येण नाप्यपाश्रित्य कञ्चन ॥ २९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
इन्द्र! जो अपने पराक्रमसे उपार्जन करके घरमें केवल शाक बनाकर खाता है, परंतु दूसरे किसीका सहारा नहीं लेता, उसे ही सुख है॥२९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
फलशाकमपि श्रेयो भोक्तुं ह्यकृपणं गृहे।
परस्य तु गृहे भोक्तुः परिभूतस्य नित्यशः ॥ ३० ॥
सुमृष्टमपि न श्रेयो विकल्पोऽयमतः सताम्।
श्ववत् कीलालपो यस्तु परान्नं भोक्तुमिच्छति ॥ ३१ ॥
धिगस्तु तस्य तद् भुक्तं कृपणस्य दुरात्मनः।
मूलम्
फलशाकमपि श्रेयो भोक्तुं ह्यकृपणं गृहे।
परस्य तु गृहे भोक्तुः परिभूतस्य नित्यशः ॥ ३० ॥
सुमृष्टमपि न श्रेयो विकल्पोऽयमतः सताम्।
श्ववत् कीलालपो यस्तु परान्नं भोक्तुमिच्छति ॥ ३१ ॥
धिगस्तु तस्य तद् भुक्तं कृपणस्य दुरात्मनः।
अनुवाद (हिन्दी)
दूसरेके सामने दीनता न दिखाकर अपने घरमें फल और शाक खाकर रहना अच्छा है। परंतु दूसरेके घरमें सदा तिरस्कार सहकर मीठे पकवान खाना भी अच्छा नहीं है; अतः दूसरेके आश्रित रहकर जीवन-निर्वाह करनेके सम्बन्धमें साधु पुरुषोंका सदासे ही विरोध रहा है। जो पराया अन्न खाना चाहता है, वह कुत्तेकी भाँति खून चाटता है। उस दुरात्मा और कृपणके वैसे भोजनको धिक्कार है॥३०-३१॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
यो दत्त्वातिथिभूतेभ्यः पितृभ्यश्च द्विजोत्तमः ॥ ३२ ॥
शिष्टान्यन्नानि यो भुङ्क्ते किं वै सुखतरं ततः।
अतो मृष्टतरं नान्यत् पूतं किञ्चिच्छतक्रतो ॥ ३३ ॥
मूलम्
यो दत्त्वातिथिभूतेभ्यः पितृभ्यश्च द्विजोत्तमः ॥ ३२ ॥
शिष्टान्यन्नानि यो भुङ्क्ते किं वै सुखतरं ततः।
अतो मृष्टतरं नान्यत् पूतं किञ्चिच्छतक्रतो ॥ ३३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
जो श्रेष्ठ द्विज सदा अतिथियों, भूत-प्राणियों तथा पितरोंको अर्पण करके अर्थात् बलिवैश्वदेव करके शेष अन्न स्वयं भोजन करता है, उससे बढ़कर महान् सुख और क्या हो सकता है? देवेन्द्र! इस यज्ञशेष अन्नसे बढ़कर अत्यन्त मधुर और पवित्र दूसरा कोई भोजन नहीं है॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
दत्त्वा यस्त्वतिथिभ्यो वै भुङ्क्ते तेनैव नित्यशः।
यावतो ह्यन्धसः पिण्डानश्नाति सततं द्विजः ॥ ३४ ॥
तावतां गोसहस्राणां फलं प्राप्नोति दायकः।
यदेनो यौवनकृतं तत् सर्वं नश्यते ध्रुवम् ॥ ३५ ॥
मूलम्
दत्त्वा यस्त्वतिथिभ्यो वै भुङ्क्ते तेनैव नित्यशः।
यावतो ह्यन्धसः पिण्डानश्नाति सततं द्विजः ॥ ३४ ॥
तावतां गोसहस्राणां फलं प्राप्नोति दायकः।
यदेनो यौवनकृतं तत् सर्वं नश्यते ध्रुवम् ॥ ३५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
जो प्रतिदिन अतिथियोंको देकर शेष अन्नसे ही भोजनका काम चलाता है, उसके अन्नके जितने ग्रास अतिथि ब्राह्मण नित्य भोजन करता है, उतने ही हजार गौओंके दानका पुण्य उस दाताको प्राप्त होता है, तथा उसके द्वारा युवावस्थामें जो पाप हुए होते हैं, वे सब निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं॥३४-३५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
सदक्षिणस्य भुक्तस्य द्विजस्य तु करे गतम्।
यद् वारि वारिणा सिञ्चेत् तद्ध्येनस्तरते क्षणात् ॥ ३६ ॥
मूलम्
सदक्षिणस्य भुक्तस्य द्विजस्य तु करे गतम्।
यद् वारि वारिणा सिञ्चेत् तद्ध्येनस्तरते क्षणात् ॥ ३६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
ब्राह्मणके भोजन कर लेनेपर जो उसे दक्षिणा दी जाती है, उस समय उसके हाथमें जो प्रतिग्रहका जल रहता है, उसे दाता पुनः उत्सर्गके जलसे सींचे। ऐसा करनेसे वह तत्काल सब पापोंसे छूट जाता है॥३६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
एताश्चान्याश्च वै बह्वीः कथयित्वा कथाः शुभाः।
बकेन सह देवेन्द्र आपृच्छ्य त्रिदिवं गतः ॥ ३७ ॥
मूलम्
एताश्चान्याश्च वै बह्वीः कथयित्वा कथाः शुभाः।
बकेन सह देवेन्द्र आपृच्छ्य त्रिदिवं गतः ॥ ३७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
इस प्रकार देवराज इन्द्र बकके साथ ये तथा और बहुत-सी उत्तम कथा-वार्ताएँ करके उनसे आज्ञा लेकर स्वर्गलोकको चले गये॥३७॥
मूलम् (समाप्तिः)
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि ब्राह्मणमहाभाग्ये बकशक्रसंवादे त्रिनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९३ ॥
मूलम् (वचनम्)
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेय समास्यापर्वमें ब्राह्मणोंके माहात्म्यके सम्बन्धमें बक-इन्द्रसंवादविषयक एक सौ तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥१९३॥