१९२ मण्डूकोपाख्याने

भागसूचना

द्विनवत्यधिकशततमोऽध्यायः

सूचना (हिन्दी)

इक्ष्वाकुवंशी परीक्षित्‌का मण्डूकराजकी कन्यासे विवाह, शल और दलके चरित्र तथा वामदेव मुनिकी महत्ता

मूलम् (वचनम्)

वैशम्पायन उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

भूय एव ब्राह्मणमहाभाग्यं वत्कुमर्हसीत्यब्रवीत् पाण्डवेयो मार्कण्डेयम् ॥ १ ॥

मूलम्

भूय एव ब्राह्मणमहाभाग्यं वत्कुमर्हसीत्यब्रवीत् पाण्डवेयो मार्कण्डेयम् ॥ १ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तदनन्तर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने मुनिवर मार्कण्डेयसे कहा—‘ब्रह्मन्! पुनः ब्राह्मणोंकी महिमाका वर्णन कीजिये’॥१॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अथाचष्ट मार्कण्डेयोऽपूर्वमिदं श्रूयतां ब्राह्मणानां चरितम् ॥ २ ॥

मूलम्

अथाचष्ट मार्कण्डेयोऽपूर्वमिदं श्रूयतां ब्राह्मणानां चरितम् ॥ २ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

तब मार्कण्डेयजीने कहा—‘राजन्! ब्राह्मणोंके इस अद्भुत चरित्रका श्रवण करो॥२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

‘अयोध्यायामिक्ष्वाकुकुलोद्वहः पार्थिवः परिक्षिन्नाम मृगयामगमत् ॥ ३ ॥

मूलम्

‘अयोध्यायामिक्ष्वाकुकुलोद्वहः पार्थिवः परिक्षिन्नाम मृगयामगमत् ॥ ३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘अयोध्यापुरीमें इक्ष्वाकुकुलके धुरंधर वीर राजा परीक्षित् रहते थे। वे एक दिन शिकार खेलनेके लिये गये॥३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तमेकाश्वेन मृगमनुसरन्तं मृगो दूरमपाहरत् ॥ ४ ॥

मूलम्

तमेकाश्वेन मृगमनुसरन्तं मृगो दूरमपाहरत् ॥ ४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘उन्होंने एकमात्र अश्वकी सहायतासे एक हिंसक पशुका पीछा किया। वह पशु उन्हें बहुत दूर हटा ले गया॥४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अध्वनि जातश्रमः क्षुत्तृष्णाभिभूतश्चैकस्मिन् देशे नीलं गहनं वनखण्डमपश्यत् ॥ ५ ॥

मूलम्

अध्वनि जातश्रमः क्षुत्तृष्णाभिभूतश्चैकस्मिन् देशे नीलं गहनं वनखण्डमपश्यत् ॥ ५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘मार्गमें उन्हें बड़ी थकावट हुई और वे भूख-प्याससे व्याकुल हो गये। उसी समय उन्हें एक ओर नीले रंगका एक दूसरा वन दिखायी दिया, जो और भी घना था॥५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तच्च विवेश ततस्तस्य वनखण्डस्य मध्येऽतीव रमणीयं सरो दृष्ट्वा साश्व एव व्यगाहत॥६॥

मूलम्

तच्च विवेश ततस्तस्य वनखण्डस्य मध्येऽतीव रमणीयं सरो दृष्ट्वा साश्व एव व्यगाहत॥६॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘तत्पश्चात् राजाने उसके भीतर प्रवेश किया। उस वनस्थलीके मध्यभागमें एक अत्यन्त रमणीय सरोवर था। उसे देखकर राजा घोड़ेसहित सरोवरके जलमें घुस गये॥६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अथाश्वस्तः स बिसमृणालमश्वायाग्रतो निक्षिप्य पुष्करिणीतीरे संविवेश । ततः शयानो मधुरं गीतमशृणोत् ॥ ७ ॥

मूलम्

अथाश्वस्तः स बिसमृणालमश्वायाग्रतो निक्षिप्य पुष्करिणीतीरे संविवेश । ततः शयानो मधुरं गीतमशृणोत् ॥ ७ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘जल पीकर जब वे कुछ आश्वस्त हुए, तब घोड़ेके आगे कुछ कमलकी नालें डालकर स्वयं उस सरोवरके तटपर लेट गये। लेटे-ही-लेटे उनके कानोंमें कहींसे मधुर गीतकी ध्वनि सुनायी पड़ी॥७॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

स श्रुत्वाचिन्तयन्नेह मनुष्यगतिं पश्यामि कस्य खल्वयं गीतशब्द इति॥८॥

मूलम्

स श्रुत्वाचिन्तयन्नेह मनुष्यगतिं पश्यामि कस्य खल्वयं गीतशब्द इति॥८॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘उसे सुनकर राजा सोचने लगे कि ‘यहाँ मनुष्योंकी गति तो नहीं दिखायी देती। फिर यह किसके गीतका शब्द सुनायी देता है’॥८॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अथापश्यत् कन्यां परमरूपदर्शनीयां पुष्पाण्यवचिन्वन्तीं गायन्तीं च। अथ सा राज्ञः समीपे पर्यक्रामत्॥९॥

मूलम्

अथापश्यत् कन्यां परमरूपदर्शनीयां पुष्पाण्यवचिन्वन्तीं गायन्तीं च। अथ सा राज्ञः समीपे पर्यक्रामत्॥९॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘इतनेहीमें उनकी दृष्टि एक कन्यापर पड़ी, जो अपने परम सुन्दर रूपके कारण देखने ही योग्य थी। वह वनके फूल चुनती हुई गीत गा रही थी। धीरे-धीरे भ्रमण करती हुई वह राजाके समीप आ गयी॥९॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तामब्रवीद् राजा कस्यासि भद्रे का वा त्वमिति। सा प्रत्युवाच कन्याऽस्मीति तां राजोवाचार्थी त्वयाहमिति॥१०॥

मूलम्

तामब्रवीद् राजा कस्यासि भद्रे का वा त्वमिति। सा प्रत्युवाच कन्याऽस्मीति तां राजोवाचार्थी त्वयाहमिति॥१०॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘तब राजाने उससे पूछा— ‘कल्याणी! तुम कौन और किसकी हो?’ उसने उत्तर दिया—‘मैं कन्या हूँ—अभी मेरा विवाह नहीं हुआ है।’ तब राजाने उससे कहा—‘भद्रे! मैं तुझे चाहता हूँ’॥१०॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अथोवाच कन्या समयेनाहं शक्या त्वया लब्धुं नान्यथेति राजा तां समयमपृच्छत्। कन्योवाच नोदकं मे दर्शयितव्यमिति॥११॥

मूलम्

अथोवाच कन्या समयेनाहं शक्या त्वया लब्धुं नान्यथेति राजा तां समयमपृच्छत्। कन्योवाच नोदकं मे दर्शयितव्यमिति॥११॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘कन्या बोली’ तुम मुझे एक शर्तके साथ पा सकते हो अन्यथा नहीं।’ राजाने उससे वह शर्त पूछी। कन्याने कहा—‘मुझे कभी जलका दर्शन न कराना’॥११॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

स राजा तां बाढमित्युक्त्वा तामुपयेमे कृतोद्वाहश्च राजा परीक्षित् क्रीडमानो मुदा परमया युक्तस्तूष्णीं सङ्गम्य तया सहास्ते॥१२॥

मूलम्

स राजा तां बाढमित्युक्त्वा तामुपयेमे कृतोद्वाहश्च राजा परीक्षित् क्रीडमानो मुदा परमया युक्तस्तूष्णीं सङ्गम्य तया सहास्ते॥१२॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘तब राजाने उससे ‘बहुत अच्छा’ कहकर उससे (गान्धर्व) विवाह किया। विवाहके पश्चात् राजा परीक्षित् अत्यन्त आनन्दपूर्वक उसके साथ क्रीड़ा-विहार करने लगे और एकान्तमें मिलकर उसके साथ चुपचाप बैठे रहे॥१२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ततस्तत्रैवासीने राजनि सेनान्वगच्छत् ॥ १३ ॥

मूलम्

ततस्तत्रैवासीने राजनि सेनान्वगच्छत् ॥ १३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘राजा अभी वहीं बैठे थे, इतनेहीमें उनकी सेना आ पहुँची॥१३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

सा सेनोपविष्टं राजानं परिवार्यातिष्ठत्। पर्याश्वस्तश्च राजा तयैव सह शिबिकया प्रायादव-घोटितया स स्वं नगरमनुप्राप्य रहसि तया सहास्ते॥१४॥

मूलम्

सा सेनोपविष्टं राजानं परिवार्यातिष्ठत्। पर्याश्वस्तश्च राजा तयैव सह शिबिकया प्रायादव-घोटितया स स्वं नगरमनुप्राप्य रहसि तया सहास्ते॥१४॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘वह सेना अपने बैठे हुए राजाको चारों ओरसे घेरकर खड़ी हो गयी। अच्छी तरह सुस्ता लेनेके पश्चात् राजा एक साफ-सुथरी चिकनी पालकीमें उसीके साथ बैठकर अपने नगरको चल दिये और वहाँ पहुँचकर उस नवविवाहिता सुन्दरीके साथ एकान्तवास करने लगे॥१४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तत्राभ्याशस्थोऽपि कश्चिन्नापश्यदथ प्रधानामा-त्योऽभ्याशचरास्तस्य स्त्रियोऽपृच्छत् ॥ १५ ॥

मूलम्

तत्राभ्याशस्थोऽपि कश्चिन्नापश्यदथ प्रधानामा-त्योऽभ्याशचरास्तस्य स्त्रियोऽपृच्छत् ॥ १५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘वहाँ निकट होते हुए भी कोई उनका दर्शन नहीं कर पाता था। तब एक दिन प्रधान मन्त्रीने राजाके पास रहनेवाली स्त्रियोंसे पूछा—॥१५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

किमत्र प्रयोजनं वर्तते इत्यथाब्रुवंस्ताः स्त्रियः ॥ १६ ॥

मूलम्

किमत्र प्रयोजनं वर्तते इत्यथाब्रुवंस्ताः स्त्रियः ॥ १६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘यहाँ तुम्हारा क्या काम है?’ उनके ऐसा पूछनेपर उन स्त्रियोंने कहा—॥१६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अपूर्वमिव पश्याम उदकं नात्र नीयत इत्यथामात्योऽनुदकं वनं कारयित्वोदारवृक्षं बहुपुष्य-फलमूलं तस्य मध्ये मुक्ताजालमयीं पार्श्वे वापीं गूढां सुधासलिललिप्तां स रहस्युपगम्य राजान-मब्रवीत्॥१७॥

मूलम्

अपूर्वमिव पश्याम उदकं नात्र नीयत इत्यथामात्योऽनुदकं वनं कारयित्वोदारवृक्षं बहुपुष्य-फलमूलं तस्य मध्ये मुक्ताजालमयीं पार्श्वे वापीं गूढां सुधासलिललिप्तां स रहस्युपगम्य राजान-मब्रवीत्॥१७॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘हमें यहाँ एक अद्भुत-सी बात दिखायी देती है। महाराजके अन्तःपुरमें पानी नहीं जाने पाता है। (हमलोग इसीकी चौकसी करती हैं।)’ उनकी यह बात सुनकर प्रधान मन्त्रीने एक बाग लगवाया, जिसमें प्रत्यक्षरूपसे कोई जलाशय नहीं था। उसमें बड़े सुन्दर और ऊँचे-ऊँचे वृक्ष लगवाये गये थे। वहाँ फल-फूल और कन्द-मूलकी भी बहुतायत थी। उस उपवनके मध्यभागमें एक किनारेकी ओर सुधाके समान स्वच्छ जलसे भरी हुई एक बावली भी बनवायी थी, जो मोतियोंके जालसे निर्मित थी। उस बावलीको (लताओंद्वारा) बाहरसे ढक दिया गया था। उस उद्यानके तैयार हो जानेपर मन्त्रीने किसी दिन राजासे मिलकर कहा—॥१७॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

वनमिदमुदारकं साध्वत्र रम्यतामिति ॥ १८ ॥

मूलम्

वनमिदमुदारकं साध्वत्र रम्यतामिति ॥ १८ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘महाराज! यह वन बहुत सुन्दर है, आप इसमें भलीभाँति विहार करें’॥१८॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

स तस्य वचनात् तयैव सह देव्या तद् वनं प्राविशत्। स कदाचित् तस्मिन् कानने रम्ये तयैव सह व्यवाहरदथ क्षुत्तृष्णार्दितः श्रान्तोऽतिमुक्त-कागारमपश्यत्॥१९॥

मूलम्

स तस्य वचनात् तयैव सह देव्या तद् वनं प्राविशत्। स कदाचित् तस्मिन् कानने रम्ये तयैव सह व्यवाहरदथ क्षुत्तृष्णार्दितः श्रान्तोऽतिमुक्त-कागारमपश्यत्॥१९॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘मन्त्रीके कहनेसे राजाने उसी नवविवाहिता रानीके साथ उस वनमें प्रवेश किया। एक दिन महाराज परीक्षित् उस रमणीय उद्यानमें अपनी उसी प्रियतमाके साथ विहार कर रहे थे। विहार करते-करते जब वे थक गये और भूख-प्याससे बहुत पीड़ित हो गये, तब उन्हें वासन्ती लताद्वारा निर्मित एक मनोहर मण्डप दिखायी दिया॥१९॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तत् प्रविश्य राजा सह प्रियया सुधाकृतां विमलां सलिलपूर्णां वापीमपश्यत्॥२०॥

मूलम्

तत् प्रविश्य राजा सह प्रियया सुधाकृतां विमलां सलिलपूर्णां वापीमपश्यत्॥२०॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘उस मण्डपमें प्रियासहित प्रवेश करके राजाने सुधाके समान स्वच्छ जलसे परिपूर्ण वह बावली देखी॥२०॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

दृष्ट्वैव च तां तस्याश्च तीरे सहैव तया देव्याऽवातिष्ठत्॥२१॥

मूलम्

दृष्ट्वैव च तां तस्याश्च तीरे सहैव तया देव्याऽवातिष्ठत्॥२१॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘उसे देखकर वे अपनी रानीके साथ उसीके तटपर खड़े हुए॥२१॥
अथ तां देवीं स राजाब्रवीत् साध्ववतर वापीसलिलमिति। सा तद्वचः श्रुत्वावतीर्य वापीं न्यमज्जन्न पुनरुदमज्जत्॥२२॥
‘उस समय राजाने उस रानीसे कहा—‘देवि! सावधानीके साथ इस बावलीके जलमें उतरो।’ राजाकी यह बात सुनकर उसने बावलीमें घुसकर गोता लगाया और फिर बाहर नहीं निकली॥२२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तां स मृगयमाणो राजा नापश्यद् वापीमथ निःस्राव्य मण्डूकं श्वभ्रमुखे दृष्ट्वा क्रुद्ध आज्ञापयामास स राजा॥२३॥
सर्वत्र मण्डूकवधः क्रियतामिति यो मयार्थी स मां मृतमण्डूकोपायनमादायोपतिष्ठेदिति॥२४॥

मूलम्

तां स मृगयमाणो राजा नापश्यद् वापीमथ निःस्राव्य मण्डूकं श्वभ्रमुखे दृष्ट्वा क्रुद्ध आज्ञापयामास स राजा॥२३॥
सर्वत्र मण्डूकवधः क्रियतामिति यो मयार्थी स मां मृतमण्डूकोपायनमादायोपतिष्ठेदिति॥२४॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘राजाने उस वापीमें रानीकी बहुत खोज की, परंतु वह कहीं दिखायी न दी। तब उन्होंने बावलीका सारा जल निकलवा दिया। इसके बाद एक बिलके मुँहपर कोई मेढक दीख पड़ा। इससे राजाको बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने आज्ञा दे दी कि ‘सर्वत्र मेढकोंका वध किया जाय। जो मुझसे मिलना चाहे, वह मरे हुए मेढकका ही उपहार लेकर मेरे पास आवे’॥२३-२४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अथ मण्डूकवधे घोरे क्रियमाणे दिक्षु सर्वासु मण्डूकान् भयमाविवेश। ते भीता मण्डूकराज्ञे यथावृत्तं न्यवेदयन्॥२५॥

मूलम्

अथ मण्डूकवधे घोरे क्रियमाणे दिक्षु सर्वासु मण्डूकान् भयमाविवेश। ते भीता मण्डूकराज्ञे यथावृत्तं न्यवेदयन्॥२५॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘इस आज्ञाके अनुसार चारों ओर मेढकोंका भयंकर संहार आरम्भ हो गया। इससे सब दिशाओंके मेढकोंके मनमें भय समा गया। वे डरकर मण्डूकराजके पास गये और उनसे सब वृत्तान्त ठीक-ठीक बता दिया॥२५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ततो मण्डूकराट् तापसवेषधारी राजानमभ्य-गच्छदुपेत्य चैनमुवाच ॥ २६ ॥

मूलम्

ततो मण्डूकराट् तापसवेषधारी राजानमभ्य-गच्छदुपेत्य चैनमुवाच ॥ २६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘तब मण्डूकराज तपस्वीका वेष धारण करके राजाके पास गया और निकट पहुँचकर उससे इस प्रकार बोला—॥२६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

मा राजन् क्रोधवशं गमः प्रसादं कुरु नार्हसि मण्डूकानामनपराधिनां वधं कर्तुमिति। श्लोकौ चात्र भवतः—॥२७॥

मूलम्

मा राजन् क्रोधवशं गमः प्रसादं कुरु नार्हसि मण्डूकानामनपराधिनां वधं कर्तुमिति। श्लोकौ चात्र भवतः—॥२७॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘राजन्! आप क्रोधके वशीभूत न हों। हमपर कृपा करें। निरपराध मेढकोंका वध न करावें।’ इस विषयमें ये दो श्लोक भी प्रसिद्ध हैं—॥२७॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

मा मण्डूकान् जिघांस त्वं
कोपं संधारयाच्युत ।
प्रक्षीयते धनोद्रेको
जनानामविजानताम् ॥ २८ ॥

मूलम्

मा मण्डूकान् जिघांस त्वं
कोपं संधारयाच्युत ।
प्रक्षीयते धनोद्रेको
जनानामविजानताम् ॥ २८ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

अच्युत! आप मेढकोंको मारनेकी इच्छा न करें। अपने क्रोधको रोकें; क्योंकि अविवेकसे काम लेनेवाले मनुष्योंके धनकी वृद्धि नष्ट हो जाती है॥२८॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

प्रतिजानीहि नैतांस्त्वं
प्राप्य क्रोधं विमोक्ष्यसि ।
अंल कृत्वा तवाधर्मं
मण्डूकैः किं हतैर्हि ते ॥ २९ ॥

मूलम्

प्रतिजानीहि नैतांस्त्वं
प्राप्य क्रोधं विमोक्ष्यसि ।
अंल कृत्वा तवाधर्मं
मण्डूकैः किं हतैर्हि ते ॥ २९ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘प्रतिज्ञा करें कि इन मेढकोंको पाकर आप क्रोध नहीं करेंगे; यह अधर्म करनेसे आपको क्या लाभ है? मण्डूकोंकी हत्यासे आपको क्या मिलेगा?’॥२९॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तमेवंवादिनमिष्टजनशोकपरीतात्मा राजा-थोवाच ॥ ३० ॥

मूलम्

तमेवंवादिनमिष्टजनशोकपरीतात्मा राजा-थोवाच ॥ ३० ॥

अनुवाद (हिन्दी)

राजाका हृदय अपनी प्यारी रानीके विनाशके शोकसे दग्ध हो रहा था। उन्होंने उपर्युक्त बातें कहनेवाले मण्डूकराजसे कहा—॥३०॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

न हि क्षम्यते तन्मया हनिष्याम्येतानेतैर्दुरात्मभिः प्रिया मे भक्षिता सर्वथैव मे वध्या मण्डूका नार्हसि विद्वन् मामुपरोद्धुमिति॥३१॥

मूलम्

न हि क्षम्यते तन्मया हनिष्याम्येतानेतैर्दुरात्मभिः प्रिया मे भक्षिता सर्वथैव मे वध्या मण्डूका नार्हसि विद्वन् मामुपरोद्धुमिति॥३१॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘मैं क्षमा नहीं कर सकता। इन मेढकोंको अवश्य मारूँगा। इन दुरात्माओंने मेरी प्रियतमाको खा लिया है। अतः ये मेढक मेरे लिये सर्वथा वध्य ही हैं। विद्वन्! आप मुझे उनके वधसे न रोकें’॥३१॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

स तद्‌ वाक्यमुपलभ्य व्यथितेन्द्रियमनाः प्रोवाच प्रसीद राजन्नहमायुर्नाम मण्डूकराजो मम सा दुहिता सुशोभना नाम। तस्या हि दौःशील्यमेतद् बहवस्तया राजानो विप्रलब्धाः पूर्वा इति॥३२॥

मूलम्

स तद्‌ वाक्यमुपलभ्य व्यथितेन्द्रियमनाः प्रोवाच प्रसीद राजन्नहमायुर्नाम मण्डूकराजो मम सा दुहिता सुशोभना नाम। तस्या हि दौःशील्यमेतद् बहवस्तया राजानो विप्रलब्धाः पूर्वा इति॥३२॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘राजाकी बात सुनकर मण्डूकराजका मन और इन्द्रियाँ व्यथित हो उठीं। वह बोला—‘महाराज! प्रसन्न होइये। मेरा नाम आयु है। मैं मेढकोंका राजा हूँ। जिसे आप अपनी प्रियतमा कहते हैं, वह मेरी ही पुत्री है। उसका नाम सुशोभना है। वह आपको छोड़कर चली गयी, यह उसकी दुष्टता है। उसने पहले भी बहुत-से राजाओंको धोखा दिया है’॥३२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तमब्रवीद् राजा तया समर्थी सा मे दीयतामिति ॥ ३३ ॥

मूलम्

तमब्रवीद् राजा तया समर्थी सा मे दीयतामिति ॥ ३३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

तब राजाने मण्डूकराजसे कहा—‘मैं तुम्हारी उस पुत्रीको चाहता हूँ, उसे मुझे समर्पित कर दो’॥३३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अथैनां राजे पितादादब्रवीच्चैनामेनं राजानं शुश्रूषस्वेति ॥ ३४ ॥

मूलम्

अथैनां राजे पितादादब्रवीच्चैनामेनं राजानं शुश्रूषस्वेति ॥ ३४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

स एवमुक्त्वा दुहितरं क्रुद्धः शशाप यस्मात् त्वया राजानो विप्रलब्धा बहवस्तस्मादब्रह्मण्यानि तवापत्यानि भविष्यन्त्यानृतिकत्वात् तवेति॥३५॥

सूचना (हिन्दी)

तपस्वीके वेशमें मण्डूकराजका राजाको आश्वासन

अनुवाद (हिन्दी)

‘तब पिता मण्डूकराजने अपनी पुत्री सुशोभना महाराज परीक्षित्‌को समर्पित कर दी और उससे कहा—‘बेटी! सदा राजाकी सेवा करती रहना।’ ऐसा कहकर मण्डूकराजने जब अपनी पुत्रीके अपराधको याद किया, तब उसे क्रोध हो आया और उसने उसे शाप देते हुए कहा—‘अरी! तूने बहुत-से राजाओंको धोखा दिया है, इसलिये तेरी संतानें ब्राह्मणविरोधी होंगी; क्योंकि तू बड़ी झूठी है’॥३४-३५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

स च राजा तामुपलभ्य तस्यां सुरतगुण-निबद्धहृदयो लोकत्रयैश्वर्यमिवोपलभ्य हर्षेण बाष्प-कलया वाचा प्रणिपत्याभिपूज्य मण्डूकराजमब्रवीद-नुगृहीतोऽस्मीति॥३६॥

मूलम्

स च राजा तामुपलभ्य तस्यां सुरतगुण-निबद्धहृदयो लोकत्रयैश्वर्यमिवोपलभ्य हर्षेण बाष्प-कलया वाचा प्रणिपत्याभिपूज्य मण्डूकराजमब्रवीद-नुगृहीतोऽस्मीति॥३६॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘सुशोभनाके रतिकलासम्बन्धी गुणोंने राजाके मनको बाँध लिया था। वे उसे पाकर ऐसे प्रसन्न हुए, मानो उन्हें तीनों लोकोंका राज्य मिल गया हो। उन्होंने आनन्दके आँसू बहाते हुए मण्डूकराजको प्रणाम किया और उसका यथोचित सत्कार करते हुए हर्षगद्‌गद वाणीमें कहा—‘मण्डूकराज! तुमने मुझपर बड़ी कृपा की है’॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

स च मण्डूकराजो दुहितरमनुज्ञाप्य यथागतमगच्छत् ॥ ३७ ॥

मूलम्

स च मण्डूकराजो दुहितरमनुज्ञाप्य यथागतमगच्छत् ॥ ३७ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘तत्पश्चात् कन्यासे विदा लेकर मण्डूकराज जैसे आया था, वैसे ही अपने स्थानको चला गया॥३७॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अथ कस्यचित् कालस्य तस्यां कुमारास्त्रय-स्तस्य राज्ञः सम्बभूवुः शलो दलो बलश्चेति। तत-स्तेषां ज्येष्ठं शलं समये पिता राज्येऽभिषिच्य तपसि धृतात्मा वनं जगाम॥३८॥

मूलम्

अथ कस्यचित् कालस्य तस्यां कुमारास्त्रय-स्तस्य राज्ञः सम्बभूवुः शलो दलो बलश्चेति। तत-स्तेषां ज्येष्ठं शलं समये पिता राज्येऽभिषिच्य तपसि धृतात्मा वनं जगाम॥३८॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘कुछ कालके पश्चात् सुशोभनाके गर्भसे राजा परीक्षित्‌के तीन पुत्र हुए—शल, दल और बल। इनमें शल सबसे बड़ा था। समय आनेपर पिताने शलका राज्याभिषेक करके स्वयं तपस्यामें मन लगाये तपोवनको प्रस्थान किया॥३८॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अथ कदाचिच्छलो मृगयामनुचरन् मृगमासाद्य रथेनान्वधावत् ॥ ३९ ॥
सूतं चोवाच शीघ्रं मां वहस्वेति स तथोक्तः सूतो राजानमब्रवीत्॥४०॥
न क्रियतामनुबन्धो नैष शक्यस्त्वया मृगोऽयं ग्रहीतुं यद्यपि ते रथे युक्तौ वाम्यौ स्यातामिति। ततोऽब्रवीद् राजा सूतमाचक्ष्व मे वाम्यौ हन्मि च त्वामिति। स एवमुक्तो राजभयभीतः सूतो वामदेव-शापभीतश्च सन् नाचख्यौ राज्ञे। ततः पुनः स राजा खड्‌गमुद्यम्य शीघ्रं कथयस्वेति तमाह हनिष्ये त्वामिति। स तदाऽऽह राजभयभीतः सूतो वामदेवस्याश्वौ वाम्यौ मनोजवाविति॥४१॥

मूलम्

अथ कदाचिच्छलो मृगयामनुचरन् मृगमासाद्य रथेनान्वधावत् ॥ ३९ ॥
सूतं चोवाच शीघ्रं मां वहस्वेति स तथोक्तः सूतो राजानमब्रवीत्॥४०॥
न क्रियतामनुबन्धो नैष शक्यस्त्वया मृगोऽयं ग्रहीतुं यद्यपि ते रथे युक्तौ वाम्यौ स्यातामिति। ततोऽब्रवीद् राजा सूतमाचक्ष्व मे वाम्यौ हन्मि च त्वामिति। स एवमुक्तो राजभयभीतः सूतो वामदेव-शापभीतश्च सन् नाचख्यौ राज्ञे। ततः पुनः स राजा खड्‌गमुद्यम्य शीघ्रं कथयस्वेति तमाह हनिष्ये त्वामिति। स तदाऽऽह राजभयभीतः सूतो वामदेवस्याश्वौ वाम्यौ मनोजवाविति॥४१॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘तदनन्तर एक दिन महाराज शल शिकार खेलनेके लिये वनको गये। वहाँ उन्होंने एक हिंसक पशुको सामने पाकर रथके द्वारा ही उसका पीछा किया और सारथिसे कहा—‘शीघ्र मुझे मृगके निकट पहुँचाओ’। उनके ऐसा कहनेपर सारथि बोला—‘महाराज! आप इस पशुको पकड़नेका आग्रह न करें। यह आपकी पकड़में नहीं आ सकता। यदि आपके रथमें दोनों वाम्य घोड़े जुते होते, तब आप इसे पकड़ लेते।’ यह सुनकर राजाने सूतसे पूछा—‘सारथे! बताओ, वाम्य घोड़े कौन हैं, अन्यथा मैं तुम्हें अभी मार डालूँगा।’ राजाके ऐसा कहनेपर सारथि भयसे काँप उठा। उधर घोड़ोंका परिचय देनेपर उसे वामदेव ऋषिके शापका भी डर था। अतः उसने राजासे कुछ नहीं कहा। तब राजाने पुनः तलवार उठाकर कहा—‘अरे! शीघ्र बता, नहीं तो तुझे अभी मार डालूँगा।’ तब उसने राजाके भयसे त्रस्त होकर कहा—‘महाराज! वामदेव मुनिके पास दो घोड़े हैं जिन्हें ‘वाम्य’ कहते हैं। वे मनके समान वेगशाली हैं’॥३९—४१॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अथैनमेवं ब्रुवाणमब्रवीद् राजा वामदेवाश्रमं प्रयाहीति स गत्वा वामदेवाश्रमं तमृषिमब्रवीत्॥४२॥

मूलम्

अथैनमेवं ब्रुवाणमब्रवीद् राजा वामदेवाश्रमं प्रयाहीति स गत्वा वामदेवाश्रमं तमृषिमब्रवीत्॥४२॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘सारथिके ऐसा कहनेपर राजाने उसे आज्ञा दी, ‘चलो वामदेवके आश्रमपर।’ वामदेवके आश्रमपर पहुँचकर राजाने उन महर्षिसे कहा—॥४२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

भगवन् मृगो मे विद्धः पलायते सम्भावयितुमर्हसि वाम्यौ दातुमिति। तमब्रवीदृषिर्ददानि ते वाम्यौ कृतकार्येण भवता ममैव वाम्यौ निर्यात्यौ क्षिप्रमिति। स च तावश्वौ प्रतिगृह्यानुज्ञाप्य ऋषिं प्रायाद् वामीप्रयुक्तेन रथेन मृगं प्रतिगच्छंश्चाब्रवीत्‌ सूतमश्वरत्नाविमावयोग्यौ ब्राह्मणानां नैतौ प्रतिदेयौ वामदेवायेत्युक्त्वा मृगमवाप्य स्वनगरमेत्याश्वावन्तःपुरेऽस्थापयत्॥४३॥

मूलम्

भगवन् मृगो मे विद्धः पलायते सम्भावयितुमर्हसि वाम्यौ दातुमिति। तमब्रवीदृषिर्ददानि ते वाम्यौ कृतकार्येण भवता ममैव वाम्यौ निर्यात्यौ क्षिप्रमिति। स च तावश्वौ प्रतिगृह्यानुज्ञाप्य ऋषिं प्रायाद् वामीप्रयुक्तेन रथेन मृगं प्रतिगच्छंश्चाब्रवीत्‌ सूतमश्वरत्नाविमावयोग्यौ ब्राह्मणानां नैतौ प्रतिदेयौ वामदेवायेत्युक्त्वा मृगमवाप्य स्वनगरमेत्याश्वावन्तःपुरेऽस्थापयत्॥४३॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘भगवन्! मेरे बाणोंसे घायल हुआ हिंसक पशु भागा जा रहा है। आप अपने वाम्य अश्व मुझे देनेकी कृपा करें।’ तब महर्षिने कहा—‘मैं तुम्हें वाम्य अश्व दिये देता हूँ। परंतु जब तुम्हारा कार्य सिद्ध हो जाय, तब तुम शीघ्र ही ये दोनों अश्व मुझे ही लौटा देना।’ राजाने दोनों अश्व पाकर ऋषिकी आज्ञा ले वहाँसे प्रस्थान किया। वामी घोड़ोंसे जुते हुए रथके द्वारा हिंसक पशुका पीछा करते हुए वे सारथिसे बोले—‘सूत! ये दोनों अश्वरत्न ब्राह्मणोंके पास रहने योग्य नहीं। अतः इन्हें वामदेवके पास लौटानेकी आवश्यकता नहीं है।’ ऐसा कहकर राजा हिंसक पशुको साथ ले अपनी राजधानीको चल दिये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने उन दोनों अश्वोंको अन्तःपुरमें बाँध दिया॥४३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अथर्षिश्चिन्तयामास तरुणो राजपुत्रः कल्याणं पत्रमासाद्य रमते न प्रतिनिर्यातयत्यहो कष्टमिति॥४४॥

मूलम्

अथर्षिश्चिन्तयामास तरुणो राजपुत्रः कल्याणं पत्रमासाद्य रमते न प्रतिनिर्यातयत्यहो कष्टमिति॥४४॥

अनुवाद (हिन्दी)

उधर वामदेव मुनि मन-ही-मन इस प्रकार चिन्ता करने लगे—‘अहो! वह तरुण राजकुमार मेरे अच्छे घोड़ोंको लेकर मौज कर रहा है, उन्हें लौटानेका नाम ही नहीं लेता है। यह तो बड़े कष्टकी बात है!’॥४४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

स मनसा विचिन्त्य मासि पूर्णे शिष्यमब्रवीत् ॥ ४५ ॥
गच्छात्रेय राजानं ब्रूहि यदि पर्याप्तं निर्यातयो-पाध्यायवाम्याविति। स गत्वैवं तं राजानमब्रवीत् तं राजा प्रत्युवाच राज्ञामेतद्वाहनमनर्हा ब्राह्मणा रत्नानामेवंविधानां किं ब्राह्मणानामश्वैः कार्यं साधु गम्यताम्॥४६॥

मूलम्

स मनसा विचिन्त्य मासि पूर्णे शिष्यमब्रवीत् ॥ ४५ ॥
गच्छात्रेय राजानं ब्रूहि यदि पर्याप्तं निर्यातयो-पाध्यायवाम्याविति। स गत्वैवं तं राजानमब्रवीत् तं राजा प्रत्युवाच राज्ञामेतद्वाहनमनर्हा ब्राह्मणा रत्नानामेवंविधानां किं ब्राह्मणानामश्वैः कार्यं साधु गम्यताम्॥४६॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘मन-ही-मन सोच-विचार करते हुए जब एक मास पूरा हो गया, तब वे अपने शिष्यसे बोले—‘आत्रेय! जाकर राजासे कहो कि यदि काम पूरा हो गया हो तो गुरुजीके दोनों वाम्य अश्व लौटा दीजिये।’ शिष्यने जाकर राजासे यही बात दुहरायी। तब राजाने उसे उत्तर देते हुए कहा—‘यह सवारी राजाओंके योग्य है। ब्राह्मणोंको ऐसे रत्न रखनेका अधिकार नहीं है। भला, ब्राह्मणोंको घोड़े लेकर क्या करना है? अब आप सकुशल पधारिये’॥४५-४६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

स गत्वैतदुपाध्यायायाचष्ट तच्छ्रुत्वा वचनमप्रियं वामदेवः क्रोधपरीतात्मा स्वयमेव राजानभिगम्या-श्वार्थमचोदयन्न चाददद् राजा॥४७॥

मूलम्

स गत्वैतदुपाध्यायायाचष्ट तच्छ्रुत्वा वचनमप्रियं वामदेवः क्रोधपरीतात्मा स्वयमेव राजानभिगम्या-श्वार्थमचोदयन्न चाददद् राजा॥४७॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘शिष्यने लौटकर ये सारी बातें उपाध्यायसे कहीं। वह अप्रिय वचन सुनकर वामदेव मन-ही-मन क्रोधसे जल उठे और स्वयं ही उस राजाके पास जाकर उन्हें घोड़े लौटा देनेके लिये कहा। परंतु राजाने वे घोड़े नहीं दिये’॥४७॥

मूलम् (वचनम्)

वामदेव उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

प्रयच्छ वाम्यौ मम पार्थिव त्वं
कृतं हि ते कार्यमाभ्यामशक्यम्।
मा त्वा वधीद् वरुणो घोरपाशै-
र्ब्रह्मक्षत्रस्यान्तरे वर्तमानम् ॥ ४८ ॥

मूलम्

प्रयच्छ वाम्यौ मम पार्थिव त्वं
कृतं हि ते कार्यमाभ्यामशक्यम्।
मा त्वा वधीद् वरुणो घोरपाशै-
र्ब्रह्मक्षत्रस्यान्तरे वर्तमानम् ॥ ४८ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

तब वामदेवने कहा— राजन्! मेरे वाम्य अश्वोंको अब मुझे लौटा दो। निश्चय ही उन घोड़ोंद्वारा तुम्हारा असाध्य कार्य पूरा हो गया है। इस समय तुम ब्राह्मण और क्षत्रियके बीचमें विद्यमान हो। कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारी असत्यवादिताके कारण राजा वरुण तुम्हें अपने भयंकर पाशोंसे बाँध लें॥४८॥

मूलम् (वचनम्)

राजोवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

अनड्‌वाहौ सुव्रतौ साधु दान्ता-
वेतद् विप्राणां वाहनं वामदेव।
ताभ्यां याहि त्वं तत्र कामो महर्षे
छन्दांसि वै त्वादृशं संवहन्ति ॥ ४९ ॥

मूलम्

अनड्‌वाहौ सुव्रतौ साधु दान्ता-
वेतद् विप्राणां वाहनं वामदेव।
ताभ्यां याहि त्वं तत्र कामो महर्षे
छन्दांसि वै त्वादृशं संवहन्ति ॥ ४९ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

राजा बोले— वामदेवजी! ये दो अच्छे स्वभावके सीखे-सिखाये हृष्ट-पुष्ट बैल हैं, जो गाड़ी खींच सकते हैं; ये ही ब्राह्मणोंके लिये उचित वाहन हो सकते हैं। अतः महर्षे! इन्हींको गाड़ीमें जोतकर आप जहाँ चाहें जायँ। आप-जैसे महात्माका भार तो वेदमन्त्र ही वहन करते हैं॥४९॥

मूलम् (वचनम्)

वामदेव उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

छन्दांसि वै मादृशं संवहन्ति
लोकेऽमुष्मिन् पार्थिव यानि सन्ति।
अस्मिंस्तु लोके मम यानमेत-
दस्मद्विधानामपरेषां च राजन् ॥ ५० ॥

मूलम्

छन्दांसि वै मादृशं संवहन्ति
लोकेऽमुष्मिन् पार्थिव यानि सन्ति।
अस्मिंस्तु लोके मम यानमेत-
दस्मद्विधानामपरेषां च राजन् ॥ ५० ॥

अनुवाद (हिन्दी)

वामदेवने कहा— राजन्! इसमें संदेह नहीं कि हम-जैसे लोगोंके लिये वेदके मन्त्र ही वाहनका काम देते हैं। परंतु वे परलोकमें ही उपलब्ध होते हैं। इस लोकमें तो हम-जैसे लोगोंके तथा दूसरोंके लिये भी ये अश्व ही वाहन होते हैं॥५०॥

मूलम् (वचनम्)

राजोवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

चत्वारस्त्वां वा गर्दभाः संवहन्तु
श्रेष्ठाश्वतर्यो हरयो वातरंहाः ।
तैस्त्वं याहि क्षत्रियस्यैष वाहो
ममैव वाम्यौ न तवैतौ हि विद्धि ॥ ५१ ॥

मूलम्

चत्वारस्त्वां वा गर्दभाः संवहन्तु
श्रेष्ठाश्वतर्यो हरयो वातरंहाः ।
तैस्त्वं याहि क्षत्रियस्यैष वाहो
ममैव वाम्यौ न तवैतौ हि विद्धि ॥ ५१ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

राजाने कहा— ब्रह्मन्! तब चार गधे, अच्छी जातिकी खच्चरियाँ या वायुके समान वेगशाली दूसरे घोड़े आपकी सवारीके लिये प्रस्तुत हो सकते हैं। इन्हीं वाहनोंद्वारा आप यात्रा करें। यह वाहन, जिसे आप माँगने आये हैं, क्षत्रिय नरेशके ही योग्य हैं। इसलिये आप यह समझ लें कि ये वाम्य अश्व मेरे ही हैं, आपके नहीं॥५१॥

मूलम् (वचनम्)

वामदेव उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

घोरं व्रतं ब्राह्मणस्यैतदाहु-
रेतद् राजन् यदिहाजीवमानः ।
अयस्मया घोररूपा महान्त-
श्चत्वारो वा यातुधानाः सुरौद्राः।
मया प्रयुक्तास्त्वद्वधमीप्समाना
वहन्तु त्वां शितशूलाश्चतुर्धा ॥ ५२ ॥

मूलम्

घोरं व्रतं ब्राह्मणस्यैतदाहु-
रेतद् राजन् यदिहाजीवमानः ।
अयस्मया घोररूपा महान्त-
श्चत्वारो वा यातुधानाः सुरौद्राः।
मया प्रयुक्तास्त्वद्वधमीप्समाना
वहन्तु त्वां शितशूलाश्चतुर्धा ॥ ५२ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

वामदेव बोले— राजन्! तुम ब्राह्मणोंके इस धनको हड़पकर जो अपने उपयोगमें लाना चाहते हो, यह बड़ा भयंकर कर्म कहा गया है। यदि मेरे घोड़े वापस न दोगे तो मेरी आज्ञा पाकर विकराल रूपधारी तथा लौह-शरीरवाले अत्यन्त भयंकर चार बड़े-बड़े राक्षस हाथोंमें तीखे त्रिशूल लिये तुम्हारे वधकी इच्छासे टूट पड़ेंगे और तुम्हारे शरीरके चार टुकड़े करके उठा ले जायँगे॥५२॥

मूलम् (वचनम्)

राजोवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

ये त्वां विदुर्ब्राह्मणं वामदेव
वाचा हन्तुं मनसा कर्मणा वा।
ते त्वां सशिष्यमिह पातयन्तु
मद्वाक्यनुन्नाःशितशूलासिहस्ताः ॥ ५३ ॥

मूलम्

ये त्वां विदुर्ब्राह्मणं वामदेव
वाचा हन्तुं मनसा कर्मणा वा।
ते त्वां सशिष्यमिह पातयन्तु
मद्वाक्यनुन्नाःशितशूलासिहस्ताः ॥ ५३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

राजाने कहा— वामदेवजी! आप ब्राह्मण हैं तो भी मन, वाणी एवं क्रियाद्वारा मुझे मारनेको उद्यत हैं, इसका पता हमारे जिन सेवकोंको चल गया है, वे मेरी आज्ञा पाते ही हाथोंमें तीखे त्रिशूल तथा तलवार लेकर शिष्योंसहित आपको पहले ही यहाँ मार गिरावेंगे॥५३॥

मूलम् (वचनम्)

वामदेव उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

ममैतौ वाम्यौ प्रतिगृह्य राजन्
पुनर्ददानीति प्रपद्य मे त्वम्।
प्रयच्छ शीघ्रं मम वाम्यौ त्वमश्वौ
यद्यात्मानं जीवितुं ते क्षमं स्यात् ॥ ५४ ॥

मूलम्

ममैतौ वाम्यौ प्रतिगृह्य राजन्
पुनर्ददानीति प्रपद्य मे त्वम्।
प्रयच्छ शीघ्रं मम वाम्यौ त्वमश्वौ
यद्यात्मानं जीवितुं ते क्षमं स्यात् ॥ ५४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

वामदेव बोले— राजन्! तुमने जब ये मेरे दोनों घोड़े लिये थे, उस समय यह प्रतिज्ञा की थी मैं इन्हें पुनः लौटा दूँगा। ऐसी दशामें यदि अपने-आपको तुम जीवित रखना चाहते हो तो मेरे दोनों वाम्यसंज्ञक घोड़े वापस दे दो॥५४॥

मूलम् (वचनम्)

राजोवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

न ब्राह्मणेभ्यो मृगया प्रसूता
न त्वानुशास्म्यद्यप्रभृति ह्यसत्यम् ।
तवैवाज्ञां सम्प्रणिधाय सर्वां
तथा ब्रह्मन् पुण्यलोकं लभेयम् ॥ ५५ ॥

मूलम्

न ब्राह्मणेभ्यो मृगया प्रसूता
न त्वानुशास्म्यद्यप्रभृति ह्यसत्यम् ।
तवैवाज्ञां सम्प्रणिधाय सर्वां
तथा ब्रह्मन् पुण्यलोकं लभेयम् ॥ ५५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

राजा बोले— ब्रह्मन्! (ये घोड़े शिकारके उपयोग में आने योग्य हैं और) ब्राह्मणोंके लिये शिकार खेलनेकी विधि नहीं है। यद्यपि आप मिथ्यावादी हैं, तो भी मैं आपको दण्ड नहीं दूँगा और आजसे आपके सारे आदेशोंका पालन करूँगा, जिससे मुझे पुण्यलोककी प्राप्ति हो (परन्तु ये घोड़े आपको नहीं मिल सकते)॥५५॥

मूलम् (वचनम्)

वामदेव उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

नानुयोगा ब्राह्मणानां भवन्ति
वाचा राजन् मनसा कर्मणा वा।
यस्त्वेवं ब्रह्म तपसान्वेति विद्वां-
स्तेन श्रेष्ठो भवति हि जीवमानः ॥ ५६ ॥

मूलम्

नानुयोगा ब्राह्मणानां भवन्ति
वाचा राजन् मनसा कर्मणा वा।
यस्त्वेवं ब्रह्म तपसान्वेति विद्वां-
स्तेन श्रेष्ठो भवति हि जीवमानः ॥ ५६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

वामदेवने कहा— राजन्! मन, वाणी अथवा क्रियाद्वारा कोई भी अनुशासन या दण्ड ब्राह्मणोंपर लागू नहीं हो सकता। जो इस प्रकार जानकर कष्टसहनपूर्वक ब्राह्मणकी सेवा करता है; वह उस ब्राह्मणसेवारूप कर्मसे ही श्रेष्ठ होता और जीवित रहता है॥५६॥

मूलम् (वचनम्)

मार्कण्डेय उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

एवमुक्ते वामदेवेन राजन्
समुत्तस्थू राक्षसा घोररूपाः ।
तैः शूलहस्तैर्वध्यमानः स राजा
प्रोवाचेदं वाक्यमुच्चैस्तदानीम् ॥ ५७ ॥

मूलम्

एवमुक्ते वामदेवेन राजन्
समुत्तस्थू राक्षसा घोररूपाः ।
तैः शूलहस्तैर्वध्यमानः स राजा
प्रोवाचेदं वाक्यमुच्चैस्तदानीम् ॥ ५७ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

मार्कण्डेयजी कहते हैं— राजन्! वामदेवकी यह बात पूर्ण होते ही विकराल रूपधारी चार राक्षस वहाँ प्रकट हो गये। उनके हाथमें त्रिशूल थे। जब वे राजापर चोट करने लगे, तब राजाने उच्च स्वरसे यह बात कही—॥५७॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

इक्ष्वाकवो यदि वा मां त्यजेयु-
र्विधेया मे यदि चेमे विशोऽपि।
नोत्स्रक्ष्येऽहं वामदेवस्य वाम्यौ
नैवंविधा धर्मशीला भवन्ति ॥ ५८ ॥

मूलम्

इक्ष्वाकवो यदि वा मां त्यजेयु-
र्विधेया मे यदि चेमे विशोऽपि।
नोत्स्रक्ष्येऽहं वामदेवस्य वाम्यौ
नैवंविधा धर्मशीला भवन्ति ॥ ५८ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘यदि ये इक्ष्वाकुवंशके लोग तथा मेरे आज्ञापालक प्रजावर्गके मनुष्य भी मेरा त्याग कर दें, तो भी मैं वामदेवके इन वाम्य संज्ञक घोड़ोंको कदापि नहीं दूँगा; क्योंकि इनके-जैसे लोग धर्मात्मा नहीं होते हैं’॥५८॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

एवं ब्रुवन्नेव स यातुधानै-
र्हतो जगामाशु महीं क्षितीशः।
ततो विदित्वा नृपतिं निपातित-
मिक्ष्वाकवो वै दलमभ्यषिञ्चन् ॥ ५९ ॥

मूलम्

एवं ब्रुवन्नेव स यातुधानै-
र्हतो जगामाशु महीं क्षितीशः।
ततो विदित्वा नृपतिं निपातित-
मिक्ष्वाकवो वै दलमभ्यषिञ्चन् ॥ ५९ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

ऐसा कहते ही राजा शल उन राक्षसोंसे मारे जाकर तुरंत धराशायी हो गये। इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रियोंको जब यह मालूम हुआ कि राजा मार गिराये गये, तब उन्होंने उनके छोटे भाई दलका राज्याभिषेक कर दिया॥५९॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

राज्ये तदा तत्र गत्वा स विप्रः
प्रोवाचेदं वचनं वामदेवः ।
दलं राजानं ब्राह्मणानां हि देय-
मेवं राजन् सर्वधर्मेषु दृष्टम् ॥ ६० ॥

मूलम्

राज्ये तदा तत्र गत्वा स विप्रः
प्रोवाचेदं वचनं वामदेवः ।
दलं राजानं ब्राह्मणानां हि देय-
मेवं राजन् सर्वधर्मेषु दृष्टम् ॥ ६० ॥

अनुवाद (हिन्दी)

तब पुनः उस राज्यमें जाकर विप्रवर वामदेवने राजा दलसे यह बात कही—‘महाराज! ब्राह्मणोंकी वस्तु उन्हें दे दी जाय, यह बात सभी धर्मोंमें देखी गयी है॥६०॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

बिभेषि चेत् त्वमधर्मान्नरेन्द्र
प्रयच्छ मे शीघ्रमेवाद्य वाम्यौ।
एतच्छ्रुत्वा वामदेवस्य वाक्यं
स पार्थिवः सूतमुवाच रोषात् ॥ ६१ ॥

मूलम्

बिभेषि चेत् त्वमधर्मान्नरेन्द्र
प्रयच्छ मे शीघ्रमेवाद्य वाम्यौ।
एतच्छ्रुत्वा वामदेवस्य वाक्यं
स पार्थिवः सूतमुवाच रोषात् ॥ ६१ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘नरेन्द्र! यदि तुम अधर्मसे डरते हो तो मुझे अभी शीघ्रतापूर्वक मेरे वाम्य अश्वोंको लौटा दो।’ वामदेवकी यह बात सुनकर राजाने रोषपूर्वक अपने सारथिसे कहा—॥६१॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

एकं हि मे सायकं चित्ररूपं
दिग्धं विषेणाहर संगृहीतम् ।
येन विद्धो वामदेवः शयीत
संदश्यमानः श्वभिरार्तरूपः ॥ ६२ ॥

मूलम्

एकं हि मे सायकं चित्ररूपं
दिग्धं विषेणाहर संगृहीतम् ।
येन विद्धो वामदेवः शयीत
संदश्यमानः श्वभिरार्तरूपः ॥ ६२ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

‘सूत! एक अद्भुत बाण ले आओ, जो विषमें बुझाकर रखा गया हो, जिससे घायल होकर यह वामदेव धरतीपर लोट जाय। इसे कुत्ते नोच-नोचकर खायँ और यह पृथ्वीपर पड़ा-पड़ा पीड़ासे छटपटाता रहे’॥६२॥

मूलम् (वचनम्)

वामदेव उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

जानामि पुत्रं दशवर्षं तवाहं
जातं माहिष्यां श्येनजितं नरेन्द्र।
तं जहि त्वं मद्वचनात् प्रणुन्न-
स्तूर्णं प्रियं सायकैर्घोररूपैः ॥ ६३ ॥

मूलम्

जानामि पुत्रं दशवर्षं तवाहं
जातं माहिष्यां श्येनजितं नरेन्द्र।
तं जहि त्वं मद्वचनात् प्रणुन्न-
स्तूर्णं प्रियं सायकैर्घोररूपैः ॥ ६३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

वामदेवने कहा— नरेन्द्र! मैं जानता हूँ, तुम्हारी रानीके गर्भसे श्येनजित् नामक एक पुत्र पैदा हुआ है, जो तुम्हें बहुत प्रिय है और जिसकी अवस्था दस वर्षकी हो गयी है। तुम मेरी आज्ञासे प्रेरित होकर इन भयंकर बाणोंद्वारा अपने उसी पुत्रका शीघ्र वध करोगे॥६३॥

मूलम् (वचनम्)

मार्कण्डेय उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

एवमुक्तो वामदेवेन राज-
न्नन्तःपुरे राजपुत्रं जघान ।
स सायकस्तिग्मतेजा विसृष्टः
श्रुत्वा दलस्तत्र वाक्यं बभाषे ॥ ६४ ॥

मूलम्

एवमुक्तो वामदेवेन राज-
न्नन्तःपुरे राजपुत्रं जघान ।
स सायकस्तिग्मतेजा विसृष्टः
श्रुत्वा दलस्तत्र वाक्यं बभाषे ॥ ६४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

मार्कण्डेयजी कहते हैं— राजन्! वामदेवके ऐसा कहते ही उस प्रचण्ड तेजस्वी बाणने धनुषसे छूटकर रनवासके भीतर जा राजकुमारका वध कर डाला। यह समाचार सुनकर दलने वहाँ पुनः इस प्रकार कहा—॥६४॥

मूलम् (वचनम्)

राजोवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

इक्ष्वाकवो हन्त चरामि वः प्रियं
निहन्मीमं विप्रमद्य प्रमथ्य ।
आनीयतामपरस्तिग्मतेजाः
पश्यध्वं मे वीर्यमद्य क्षितीशाः ॥ ६५ ॥

मूलम्

इक्ष्वाकवो हन्त चरामि वः प्रियं
निहन्मीमं विप्रमद्य प्रमथ्य ।
आनीयतामपरस्तिग्मतेजाः
पश्यध्वं मे वीर्यमद्य क्षितीशाः ॥ ६५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

राजाने कहा— इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रियो! मैं अभी तुम्हारा प्रिय करता हूँ। आज इस ब्राह्मणको रौंदकर मार डालूँगा। एक-दूसरा तेजस्वी बाण ले आओ और आज मेरा पराक्रम देखो॥६५॥

मूलम् (वचनम्)

वामदेव उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

यत् त्वमेनं सायकं घोररूपं
विषेण दिग्धं मम संदधासि।
न त्वेतं त्वं शरवर्षं विमोक्तुं
संधातुं वा शक्यसे मानवेन्द्र ॥ ६६ ॥

मूलम्

यत् त्वमेनं सायकं घोररूपं
विषेण दिग्धं मम संदधासि।
न त्वेतं त्वं शरवर्षं विमोक्तुं
संधातुं वा शक्यसे मानवेन्द्र ॥ ६६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

वामदेवजीने कहा— नरेश्वर! तुम विषके बुझाये हुए इस विकराल बाणको मुझे मारनेके लिये धनुषपर चढ़ा रहे हो, परंतु मैं कहे देता हूँ ‘इस बाणको न तो तुम धनुषपर रख सकोगे और न छोड़ ही सकोगे’॥६६॥

मूलम् (वचनम्)

राजोवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

इक्ष्वाकवः पश्यत मां गृहीतं
न वै शक्नोम्येष शरं विमोक्तुम्।
न चास्य कर्तुं नाशमभ्युत्सहामि
आयुष्मान् वै जीवतु वामदेवः ॥ ६७ ॥

मूलम्

इक्ष्वाकवः पश्यत मां गृहीतं
न वै शक्नोम्येष शरं विमोक्तुम्।
न चास्य कर्तुं नाशमभ्युत्सहामि
आयुष्मान् वै जीवतु वामदेवः ॥ ६७ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

राजा बोले— इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रियो! देखो, मैं फँस गया। अब यह बाण नहीं छोड़ सकूँगा। इसलिये वामदेवको नष्ट करनेका उत्साह जाता रहा। अतः यह महर्षि दीर्घायु होकर जीवित रहे॥६७॥

मूलम् (वचनम्)

वामदेव उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

संस्पृश्यैनां महिषीं सायकेन
ततस्तस्मादेनसो मोक्ष्यसे त्वम् ।
ततस्तथा कृतवान् पार्थिवस्तु
ततो मुनिं राजपुत्री बभाषे ॥ ६८ ॥

मूलम्

संस्पृश्यैनां महिषीं सायकेन
ततस्तस्मादेनसो मोक्ष्यसे त्वम् ।
ततस्तथा कृतवान् पार्थिवस्तु
ततो मुनिं राजपुत्री बभाषे ॥ ६८ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

वामदेवजीने कहा— राजन्! तुम इस बाणसे अपनी रानीका स्पर्श कर लेनेपर ब्रह्महत्याके पापसे छूट जाओगे। तब राजाने ऐसा ही किया। तदनन्तर राजपुत्रीने मुनिसे कहा॥६८॥

मूलम् (वचनम्)

राजपुत्र्युवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

यथा युक्ता वामदेवाहमेनं
दिने दिने संदिशन्ती नृशंसम्।
ब्राह्मणेभ्यो मृगयती सूनृतानि
तथा ब्रह्मन् पुण्यलोकं लभेयम् ॥ ६९ ॥

मूलम्

यथा युक्ता वामदेवाहमेनं
दिने दिने संदिशन्ती नृशंसम्।
ब्राह्मणेभ्यो मृगयती सूनृतानि
तथा ब्रह्मन् पुण्यलोकं लभेयम् ॥ ६९ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

राजपुत्री बोली— वामदेवजी! मैं इन कठोर स्वभाववाले अपने स्वामीको प्रतिदिन सावधान रहकर मीठे वचन बोलनेकी सलाह देती रहती हूँ और स्वयं ब्राह्मणोंकी सेवाका अवसर ढूँढ़ती हूँ। ब्रह्मन्! इन सत्कर्मोंके कारण मुझे पुण्यलोककी प्राप्ति हो॥६९॥

मूलम् (वचनम्)

वामदेव उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

त्वया त्रातं राजकुलं शुभेक्षणे
वरं वृणीष्वाप्रतिमं ददानि ते।
प्रशाधीमं स्वजनं राजपुत्रि
इक्ष्वाकुराज्यं सुमहच्चाप्यनिन्द्ये ॥ ७० ॥

मूलम्

त्वया त्रातं राजकुलं शुभेक्षणे
वरं वृणीष्वाप्रतिमं ददानि ते।
प्रशाधीमं स्वजनं राजपुत्रि
इक्ष्वाकुराज्यं सुमहच्चाप्यनिन्द्ये ॥ ७० ॥

अनुवाद (हिन्दी)

वामदेवने कहा— शुभ दृष्टिवाली अनिन्द्य राजकुमारी! तुमने इस राजकुलको ब्राह्मणके कोपसे बचा लिया। इसके लिये कोई अनुपम वर माँगो। मैं तुम्हें अवश्य दूँगा। तुम इन स्वजनोंके हृदय और विशाल इक्ष्वाकु-राज्यपर शासन करो॥७०॥

मूलम् (वचनम्)

राजपुत्र्युवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

वरं वृणे भगवंस्त्वेवमेष
विमुच्यतां किल्बिषादद्य भर्ता ।
शिवेन चाध्याहि सपुत्रबान्धवं
वरो वृतो ह्येष मया द्विजाग्र्य ॥ ७१ ॥

मूलम्

वरं वृणे भगवंस्त्वेवमेष
विमुच्यतां किल्बिषादद्य भर्ता ।
शिवेन चाध्याहि सपुत्रबान्धवं
वरो वृतो ह्येष मया द्विजाग्र्य ॥ ७१ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

राजकुमारी बोली— भगवन्! मैं यही चाहती हूँ कि मेरे ये पति आज सब पापोंसे छुटकारा पा जायँ। आप यह आशीर्वाद दें कि ये पुत्र और बन्धु-बान्धवोंसहित सुखसे रहें। विप्रवर! मैंने आपसे यही वर माँगा है॥७१॥

मूलम् (वचनम्)

मार्कण्डेय उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

श्रुत्वा वचः स मुनी राजपुत्र्या-
स्तथास्त्विति प्राह कुरुप्रवीर ।
ततः स राजा मुदितो बभूव
वाम्यौ चास्मै प्रददौ सम्प्रणम्य ॥ ७२ ॥

मूलम्

श्रुत्वा वचः स मुनी राजपुत्र्या-
स्तथास्त्विति प्राह कुरुप्रवीर ।
ततः स राजा मुदितो बभूव
वाम्यौ चास्मै प्रददौ सम्प्रणम्य ॥ ७२ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

मार्कण्डेयजी कहते हैं— कुरुकुलके प्रमुख वीर युधिष्ठिर! राजपुत्रीकी यह बात सुनकर वामदेव मुनिने कहा—‘ऐसा ही होगा।’ तब राजा दल बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने महर्षिको प्रणाम करके वे दोनों वाम्य अश्व उन्हें लौटा दिये॥७२॥

मूलम् (समाप्तिः)

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि मण्डूकोपाख्याने द्विनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९२ ॥

मूलम् (वचनम्)

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें मण्डूकोपाख्यानविषयक एक सौ बानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥१९२॥