भागसूचना
एकनवत्यधिकशततमोऽध्यायः
सूचना (हिन्दी)
भगवान् कल्कीके द्वारा सत्ययुगकी स्थापना और मार्कण्डेयजीका युधिष्ठिरके लिये धर्मोपदेश
मूलम् (वचनम्)
मार्कण्डेय उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
ततश्चोरक्षयं कृत्वा द्विजेभ्यः पृथिवीमिमाम्।
वाजिमेधे महायज्ञे विधिवत् कल्पयिष्यति ॥ १ ॥
मूलम्
ततश्चोरक्षयं कृत्वा द्विजेभ्यः पृथिवीमिमाम्।
वाजिमेधे महायज्ञे विधिवत् कल्पयिष्यति ॥ १ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
मार्कण्डेयजी कहते हैं— युधिष्ठिर! उस समय चोर-डाकुओं एवं म्लेच्छोंका विनाश करके भगवान् कल्की अश्वमेध नामक महायज्ञका अनुष्ठान करेंगे और उसमें यह सारी पृथ्वी विधिपूर्वक ब्राह्मणको दे डालेंगे॥१॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
स्थापयित्वा च मर्यादाः स्वयम्भुविहिताः शुभाः।
वनं पुण्ययशःकर्मा रमणीयं प्रवेक्ष्यति ॥ २ ॥
मूलम्
स्थापयित्वा च मर्यादाः स्वयम्भुविहिताः शुभाः।
वनं पुण्ययशःकर्मा रमणीयं प्रवेक्ष्यति ॥ २ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
उनका यश तथा कर्म सभी परम पावन होंगे। वे ब्रह्माजीकी चलायी हुई मंगलमयी मर्यादाओंकी स्थापना करके (तपस्याके लिये) रमणीय वनमें प्रवेश करेंगे॥२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तच्छीलमनुवर्त्स्यन्ति मनुष्या लोकवासिनः ।
विप्रैश्चोरक्षये चैव कृते क्षेमं भविष्यति ॥ ३ ॥
मूलम्
तच्छीलमनुवर्त्स्यन्ति मनुष्या लोकवासिनः ।
विप्रैश्चोरक्षये चैव कृते क्षेमं भविष्यति ॥ ३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
फिर इस जगत्के निवासी मनुष्य उनके शील-स्वभावका अनुकरण करेंगे। इस प्रकार सत्ययुगमें ब्राह्मणोंद्वारा दस्युदलका विनाश हो जानेपर संसारका मंगल होगा॥३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
कृष्णाजिनानि शक्तीश्च त्रिशूलान्यायुधानि च।
स्थापयन् द्विजशार्दूलो देशेषु विजितेषु च ॥ ४ ॥
संस्तूयमानो विप्रेन्द्रैर्मानयानो द्विजोत्तमान् ।
कल्की चरिष्यति महीं सदा दस्युवधे रतः ॥ ५ ॥
मूलम्
कृष्णाजिनानि शक्तीश्च त्रिशूलान्यायुधानि च।
स्थापयन् द्विजशार्दूलो देशेषु विजितेषु च ॥ ४ ॥
संस्तूयमानो विप्रेन्द्रैर्मानयानो द्विजोत्तमान् ।
कल्की चरिष्यति महीं सदा दस्युवधे रतः ॥ ५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
द्विजश्रेष्ठ कल्की सदा दस्युवधमें तत्पर रहकर समस्त भूतलपर विचरते रहेंगे और अपने द्वारा जीते हुए देशोंमें काले मृगचर्म, शक्ति, त्रिशूल तथा अन्य अस्त्र-शस्त्रोंकी स्थापना करते हुए श्रेष्ठ ब्राह्मणोंद्वारा अपनी स्तुति सुनेंगे और स्वयं भी उन ब्राह्मणशिरोमणियोंको यथोचित सम्मान देंगे॥४-५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
हा मातस्तात पुत्रेति तास्ता वाचः सुदारुणाः।
विक्रोशमानान् सुभृशं दस्यून् नेष्यति संक्षयम् ॥ ६ ॥
ततोऽधर्मविनाशो वै धर्मवृद्धिश्च भारत।
भविष्यति कृते प्राप्ते क्रियावांश्च जनस्तथा ॥ ७ ॥
मूलम्
हा मातस्तात पुत्रेति तास्ता वाचः सुदारुणाः।
विक्रोशमानान् सुभृशं दस्यून् नेष्यति संक्षयम् ॥ ६ ॥
ततोऽधर्मविनाशो वै धर्मवृद्धिश्च भारत।
भविष्यति कृते प्राप्ते क्रियावांश्च जनस्तथा ॥ ७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
उस समय चोर और लुटेरे दर्दभरी वाणीमें ‘हाय मैया’, ‘हाय बप्पा’ और ‘हाय बेटा’ इत्यादि कहकर जोर-जोरसे चीत्कार करेंगे और उन सबका भगवान् कल्की विनाश कर डालेंगे। भारत! दस्युओंके नष्ट हो जानेपर अधर्मका भी नाश हो जायगा और धर्मकी वृद्धि होने लगेगी। इस प्रकार सत्ययुग आ जानेपर सब मनुष्य सत्यकर्मपरायण होंगे॥६-७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
आरामाश्चैव चैत्याश्च तटाकावसथास्तथा ।
पुष्करिण्यश्च विविधा देवतायतनानि च ॥ ८ ॥
यज्ञक्रियाश्च विविधा भविष्यन्ति कृते युगे।
ब्राह्मणाः साधवश्चैव मुनयश्च तपस्विनः ॥ ९ ॥
मूलम्
आरामाश्चैव चैत्याश्च तटाकावसथास्तथा ।
पुष्करिण्यश्च विविधा देवतायतनानि च ॥ ८ ॥
यज्ञक्रियाश्च विविधा भविष्यन्ति कृते युगे।
ब्राह्मणाः साधवश्चैव मुनयश्च तपस्विनः ॥ ९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
उस युगमें नये-नये बगीचे लगाये जायँगे। चैत्यवृक्षोंकी स्थापना होगी। पोखरों और धर्मशालाओंका निर्माण होगा। भाँति-भाँतिकी पोखरियाँ तैयार होंगी। कितने ही देवमन्दिर बनेंगे और नाना प्रकारके यज्ञकर्मोंका अनुष्ठान होगा। ब्राह्मण साधु-स्वभावके होंगे। मुनिलोग तपस्यामें तत्पर रहेंगे॥८-९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
आश्रमा हतपाखण्डाः स्थिताः सत्यरताः प्रजाः।
जनिष्यन्ते च बीजानि रोप्यमाणानि चैव ह ॥ १० ॥
मूलम्
आश्रमा हतपाखण्डाः स्थिताः सत्यरताः प्रजाः।
जनिष्यन्ते च बीजानि रोप्यमाणानि चैव ह ॥ १० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
आश्रम पाखण्डियोंसे रहित होंगे और सारी प्रजा सत्यपरायण होगी। खेतोंमें बोये जानेवाले सब प्रकारके बीज अच्छी तरह उगेंगे॥१०॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
सर्वेष्वृतुषु राजेन्द्र सर्वं सस्यं भविष्यति।
नरा दानेषु निरता व्रतेषु नियमेषु च ॥ ११ ॥
मूलम्
सर्वेष्वृतुषु राजेन्द्र सर्वं सस्यं भविष्यति।
नरा दानेषु निरता व्रतेषु नियमेषु च ॥ ११ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
राजेन्द्र! सभी ऋतुओंमें सभी प्रकारके अनाज पैदा होंगे। सब लोग दान, व्रत और नियमोंमें लगे रहेंगे॥११॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
जपयज्ञपरा विप्रा धर्मकामा मुदा युताः।
पालयिष्यन्ति राजानो धर्मेणेमां वसुन्धराम् ॥ १२ ॥
मूलम्
जपयज्ञपरा विप्रा धर्मकामा मुदा युताः।
पालयिष्यन्ति राजानो धर्मेणेमां वसुन्धराम् ॥ १२ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
ब्राह्मण प्रसन्नतापूर्वक जपयज्ञमें तत्पर रहेंगे और धर्ममें ही उनकी रुचि होगी। क्षत्रियनरेश धर्मपूर्वक इस पृथ्वीका पालन करेंगे॥१२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
व्यवहाररता वैश्या भविष्यन्ति कृते युगे।
षट्कर्मनिरता विप्राः क्षत्रिया विक्रमे रताः ॥ १३ ॥
शुश्रूषायां रताः शूद्रास्तथा वर्णत्रयस्य च।
मूलम्
व्यवहाररता वैश्या भविष्यन्ति कृते युगे।
षट्कर्मनिरता विप्राः क्षत्रिया विक्रमे रताः ॥ १३ ॥
शुश्रूषायां रताः शूद्रास्तथा वर्णत्रयस्य च।
अनुवाद (हिन्दी)
सत्ययुगके वैश्य सदा न्यायपूर्वक व्यापार करनेवाले होंगे। ब्राह्मण यजन-याजन, अध्ययन-अध्यापन, दान और प्रतिग्रह—इन छः कर्मोंमें तत्पर रहेंगे। क्षत्रिय बल-पराक्रममें अनुराग रखेंगे तथा शूद्र ब्राह्मण आदि तीनों वर्णोंकी सेवामें लगे रहेंगे॥१३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
एष धर्मः कृतयुगे त्रेतायां द्वापरे तथा ॥ १४ ॥
पश्चिमे युगकाले च यः स ते सम्प्रकीर्तितः।
सर्वलोकस्य विदिता युगसंख्या च पाण्डव ॥ १५ ॥
मूलम्
एष धर्मः कृतयुगे त्रेतायां द्वापरे तथा ॥ १४ ॥
पश्चिमे युगकाले च यः स ते सम्प्रकीर्तितः।
सर्वलोकस्य विदिता युगसंख्या च पाण्डव ॥ १५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
धर्मका यह स्वरूप सत्ययुगमें अक्षुण्ण रहेगा। त्रेता, द्वापर तथा कलियुगमें धर्मकी जैसी स्थिति रहेगी, उसका वर्णन तुमसे किया जा चुका है। पाण्डुनन्दन! तुम्हें सम्पूर्ण लोककी युग-संख्याका ज्ञान भी हो चुका है॥१४-१५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
एतत् ते सर्वमाख्यातमतीतानागतं तथा।
वायुप्रोक्तमनुस्मृत्य पुराणमृषिसंस्तुतम् ॥ १६ ॥
मूलम्
एतत् ते सर्वमाख्यातमतीतानागतं तथा।
वायुप्रोक्तमनुस्मृत्य पुराणमृषिसंस्तुतम् ॥ १६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
राजन्! ऋषियोंद्वारा प्रशंसित तथा वायुदेवद्वारा वर्णित पुराणकी बातोंका स्मरण करके मैंने तुमसे यह भूत-भविष्यका सारा वृत्तान्त बताया है॥१६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
एवं संसारमार्गा मे बहुशश्चिरजीविना।
दृष्टाश्चैवानुभूताश्च तांस्ते कथितवानहम् ॥ १७ ॥
मूलम्
एवं संसारमार्गा मे बहुशश्चिरजीविना।
दृष्टाश्चैवानुभूताश्च तांस्ते कथितवानहम् ॥ १७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
इस प्रकार चिरजीवी होनेके कारण मैंने संसारके मार्गोंका अनेक बार दर्शन और अनुभव किया है, जिनका तुम्हारे समक्ष वर्णन कर दिया है॥१७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
इदं चैवापरं भूयः सह भ्रातृभिरच्युत।
धर्मसंशयमोक्षार्थं निबोध वचनं मम ॥ १८ ॥
मूलम्
इदं चैवापरं भूयः सह भ्रातृभिरच्युत।
धर्मसंशयमोक्षार्थं निबोध वचनं मम ॥ १८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
धर्ममर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले युधिष्ठिर! तुम अपने भाइयोंसहित यह मेरी एक बात और सुनो। धर्मविषयक संदेहका निवारण करनेके लिये मेरे वचनको ध्यान देकर सुनो॥१८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
धर्मे त्वयाऽऽत्मा संयोज्यो नित्यं धर्मभृतां वर।
धर्मात्मा हि सुखं राजन् प्रेत्य चेह च नन्दति॥१९॥
मूलम्
धर्मे त्वयाऽऽत्मा संयोज्यो नित्यं धर्मभृतां वर।
धर्मात्मा हि सुखं राजन् प्रेत्य चेह च नन्दति॥१९॥
अनुवाद (हिन्दी)
धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महाराज! तुम्हें अपने-आपको सदा धर्ममें ही लगाये रखना चाहिये; क्योंकि धर्मात्मा मनुष्य इस लोक और परलोकमें भी बड़े सुखसे रहता है॥१९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
निबोध च शुभां वाणीं यां प्रवक्ष्यामि तेऽनघ।
न ब्राह्मणे परिभवः कर्तव्यस्ते कदाचन ॥ २० ॥
ब्राह्मणः कुपितो हन्यादपि लोकान् प्रतिज्ञया।
मूलम्
निबोध च शुभां वाणीं यां प्रवक्ष्यामि तेऽनघ।
न ब्राह्मणे परिभवः कर्तव्यस्ते कदाचन ॥ २० ॥
ब्राह्मणः कुपितो हन्यादपि लोकान् प्रतिज्ञया।
अनुवाद (हिन्दी)
निष्पाप नरेश! मेरी इस कल्याणमयी वाणीको समझो, जिसे मैं अभी तुम्हें सुना रहा हूँ। युधिष्ठिर! तुम्हें कभी किसी ब्राह्मणका तिरस्कार नहीं करना चाहिए; क्योंकि यदि ब्राह्मण कुपित हो जाय और किसी बातकी प्रतिज्ञा कर ले, तो वह उस प्रतिज्ञाके अनुसार सम्पूर्ण लोकोंका विनाश कर सकता है॥२०॥
मूलम् (वचनम्)
वैशम्पायन उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
मार्कण्डेयवचः श्रुत्वा कुरूणां प्रवरो नृपः ॥ २१ ॥
उवाच वचनं धीमान् परमं परमद्युतिः।
मूलम्
मार्कण्डेयवचः श्रुत्वा कुरूणां प्रवरो नृपः ॥ २१ ॥
उवाच वचनं धीमान् परमं परमद्युतिः।
अनुवाद (हिन्दी)
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! मार्कण्डेयजीकी यह बात सुनकर परम तेजस्वी और बुद्धिमान् कुरुकुलरत्न राजा युधिष्ठिरने यह उत्तम वचन कहा—॥२१॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
कस्मिन् धर्मे मया स्थेयं प्रजाः संरक्षता मुने ॥ २२ ॥
कथं च वर्तमानो वै न च्यवेयं स्वधर्मतः।
मूलम्
कस्मिन् धर्मे मया स्थेयं प्रजाः संरक्षता मुने ॥ २२ ॥
कथं च वर्तमानो वै न च्यवेयं स्वधर्मतः।
अनुवाद (हिन्दी)
‘मुने! प्रजाकी रक्षा करते हुए किस धर्ममें स्थित रहना चाहिये। मेरा व्यवहार और बर्ताव कैसा हो, जिससे मैं स्वधर्मसे कभी च्युत न होऊँ?’॥२२॥
मूलम् (वचनम्)
मार्कण्डेय उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
दयावान् सर्वभूतेषु हितो रक्तोऽनसूयकः ॥ २३ ॥
सत्यवादी मृदुर्दान्तः प्रजानां रक्षणे रतः।
चर धर्मं त्यजाधर्मं पितॄन् देवांश्च पूजय ॥ २४ ॥
मूलम्
दयावान् सर्वभूतेषु हितो रक्तोऽनसूयकः ॥ २३ ॥
सत्यवादी मृदुर्दान्तः प्रजानां रक्षणे रतः।
चर धर्मं त्यजाधर्मं पितॄन् देवांश्च पूजय ॥ २४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
मार्कण्डेयजीने कहा— राजन्! तुम सब प्राणियोंपर दया करो। सबके हितैषी बने रहो। सबपर प्रेमभाव रखो और किसीमें दोषदृष्टि मत करो। सत्यवादी, कोमलस्वभाव, जितेन्द्रिय और प्रजापालनमें तत्पर रहकर धर्मका आचरण करो। अधर्मको दूरसे ही त्याग दो तथा देवता और पितरोंकी आराधना करते रहो॥२३-२४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
प्रमादाद् यत् कृतं तेऽभूत् सम्यग् दानेन तज्जय।
अलं ते मानमाश्रित्य सततं परवान् भव ॥ २५ ॥
मूलम्
प्रमादाद् यत् कृतं तेऽभूत् सम्यग् दानेन तज्जय।
अलं ते मानमाश्रित्य सततं परवान् भव ॥ २५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
यदि प्रमादवश तुम्हारेद्वारा किसीके प्रति कोई अनुचित व्यवहार हो गया हो तो उसे अच्छी प्रकार दानसे संतुष्ट करके वशमें करो। मैं सबका स्वामी हूँ, ऐसे अहंकारको कभी पासमें न आने दो। तुम अपनेको सदा पराधीन समझते रहो॥२५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
विजित्य पृथिवीं सर्वां मोदमानः सुखी भव।
एष भूतो भविष्यश्च धर्मस्ते समुदीरितः ॥ २६ ॥
न तेऽस्त्यविदितं किञ्चिदतीतानागतं भुवि।
तस्मादिमं परिक्लेशं त्वं तात हृदि मा कृथाः ॥ २७ ॥
मूलम्
विजित्य पृथिवीं सर्वां मोदमानः सुखी भव।
एष भूतो भविष्यश्च धर्मस्ते समुदीरितः ॥ २६ ॥
न तेऽस्त्यविदितं किञ्चिदतीतानागतं भुवि।
तस्मादिमं परिक्लेशं त्वं तात हृदि मा कृथाः ॥ २७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
सारी पृथ्वीको जीतकर सदा सानन्द और सुखी रहो। तात युधिष्ठिर! मैंने तुम्हें जो यह धर्म बताया है, इसका पालन भूतकालमें भी हुआ है और भविष्यकालमें भी इसका पालन होना चाहिए। भूत और भविष्यकी ऐसी कोई बात नहीं है, जो तुम्हें ज्ञात न हो; अतः इस समय जो यह क्लेश तुम्हें प्राप्त हुआ है, इसके लिये हृदयमें कोई विचार न करो॥२६-२७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
प्राज्ञास्तात न मुह्यन्ति कालेनापि प्रपीडिताः।
एष कालो महाबाहो अपि सर्वदिवौकसाम् ॥ २८ ॥
मूलम्
प्राज्ञास्तात न मुह्यन्ति कालेनापि प्रपीडिताः।
एष कालो महाबाहो अपि सर्वदिवौकसाम् ॥ २८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
तात! विद्वान् पुरुष कालसे पीड़ित होनेपर भी कभी मोहमें नहीं पड़ते। महाबाहो! यह काल सम्पूर्ण देवताओंपर भी अपना प्रभाव डालता है॥२८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
मुह्यन्ति हि प्रजास्तात कालेनापि प्रचोदिताः।
मा च तत्र विशङ्काभूद् यन्मयोक्तं तवानघ ॥ २९ ॥
मूलम्
मुह्यन्ति हि प्रजास्तात कालेनापि प्रचोदिताः।
मा च तत्र विशङ्काभूद् यन्मयोक्तं तवानघ ॥ २९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
युधिष्ठिर! कालसे प्रेरित होकर ही यह सारी प्रजा मोहग्रस्त होती है। अनघ! मैंने तुम्हारे सामने जो कुछ भी कहा है, उसमें तुम्हें किसी प्रकारकी शंका नहीं होनी चाहिये॥२९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
आशङ्क्य मद्वचो ह्येतद् धर्मलोपो भवेत् तव।
जातोऽसि प्रथिते वंशे कुरूणां भरतर्षभ ॥ ३० ॥
कर्मणा मनसा वाचा सर्वमेतत् समाचर।
मूलम्
आशङ्क्य मद्वचो ह्येतद् धर्मलोपो भवेत् तव।
जातोऽसि प्रथिते वंशे कुरूणां भरतर्षभ ॥ ३० ॥
कर्मणा मनसा वाचा सर्वमेतत् समाचर।
अनुवाद (हिन्दी)
मेरे इस वचनमें संदेह करनेपर तुम्हारे धर्मका लोप होगा। भरतकुलभूषण। तुम कौरवोंके प्रख्यात कुलमें उत्पन्न हुए हो; अतः मन, वाणी और क्रियाद्वारा इन सब बातोंका पालन करो॥३०॥
मूलम् (वचनम्)
युधिष्ठिर उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
यत् त्वयोक्तं द्विजश्रेष्ठ वाक्यं श्रुतिमनोहरम् ॥ ३१ ॥
तथा करिष्ये यत्नेन भवतः शासनं विभो।
न मे लोभोऽस्ति विप्रेन्द्र न भयं न च मत्सरः॥३२॥
करिष्यामि हि तत् सर्वमुक्तं यत् ते मयि प्रभो।
मूलम्
यत् त्वयोक्तं द्विजश्रेष्ठ वाक्यं श्रुतिमनोहरम् ॥ ३१ ॥
तथा करिष्ये यत्नेन भवतः शासनं विभो।
न मे लोभोऽस्ति विप्रेन्द्र न भयं न च मत्सरः॥३२॥
करिष्यामि हि तत् सर्वमुक्तं यत् ते मयि प्रभो।
अनुवाद (हिन्दी)
युधिष्ठिरने कहा— द्विजश्रेष्ठ! आपने मुझे जो उपदेश दिया है, वह मेरे कानोंको मधुर एवं मनको प्रिय लगा है। विभो! मैं आपकी आज्ञाका यत्नपूर्वक पालन करूँगा। ब्राह्मणश्रेष्ठ! मेरे मनमें लोभ, भय और ईर्ष्या नहीं है। प्रभो! आपने मेरे लिये जो कहा है, इसका अवश्य पालन करूँगा॥३१-३२॥
मूलम् (वचनम्)
वैशम्पायन उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
श्रुत्वा तु वचनं तस्य मार्कण्डेयस्य धीमतः ॥ ३३ ॥
संहृष्टाः पाण्डवा राजन् सहिताः शार्ङ्गधन्वना।
विप्रर्षभाश्च ते सर्वे ये तत्रासन् समागताः ॥ ३४ ॥
मूलम्
श्रुत्वा तु वचनं तस्य मार्कण्डेयस्य धीमतः ॥ ३३ ॥
संहृष्टाः पाण्डवा राजन् सहिताः शार्ङ्गधन्वना।
विप्रर्षभाश्च ते सर्वे ये तत्रासन् समागताः ॥ ३४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! उन परम बुद्धिमान् मार्कण्डेयजीका वचन सुनकर भगवान् श्रीकृष्णसहित पाँचों पाण्डव बड़े प्रसन्न हुए। साथ ही जो श्रेष्ठ ब्राह्यण वहाँ पधारे थे, उन सबको भी बड़ी प्रसन्नता हुई॥३३-३४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तथा कथां शुभां श्रुत्वा मार्कण्डेयस्य धीमतः।
विस्मिताः समपद्यन्त पुराणस्य निवेदनात् ॥ ३५ ॥
मूलम्
तथा कथां शुभां श्रुत्वा मार्कण्डेयस्य धीमतः।
विस्मिताः समपद्यन्त पुराणस्य निवेदनात् ॥ ३५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
बुद्धिमान् मार्कण्डेयजीके मुखसे वह मंगलमयी कथा सुनकर पुराणोक्त बातोंका ज्ञान हो जानेसे सब लोग बड़े ही विस्मित और प्रसन्न हुए॥३५॥
मूलम् (समाप्तिः)
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि युधिष्ठिरानुशासने एकनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९१ ॥
मूलम् (वचनम्)
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें युधिष्ठिरके लिये उपदेशविषयक एक सौ इक्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥१९१॥