१९० भविष्यकथने

भागसूचना

नवत्यधिकशततमोऽध्यायः

सूचना (हिन्दी)

युगान्तकालिक कलियुगके समयके बर्तावका तथा कल्कि-अवतारका वर्णन

मूलम् (वचनम्)

वैशम्पायन उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

युधिष्ठिरस्तु कौन्तेयो मार्कण्डेयं महामुनिम्।
पुनः पप्रच्छ साम्राज्ये भविष्यां जगतो गतिम् ॥ १ ॥

मूलम्

युधिष्ठिरस्तु कौन्तेयो मार्कण्डेयं महामुनिम्।
पुनः पप्रच्छ साम्राज्ये भविष्यां जगतो गतिम् ॥ १ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तदनन्तर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने महामुनि मार्कण्डेयसे अपने साम्राज्यमें जगत्‌की भावी गतिविधिके विषयमें पुनः इस प्रकार प्रश्न किया॥१॥

मूलम् (वचनम्)

युधिष्ठिर उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

आश्चर्यभूतं भवतः श्रुतं नो वदतां वर।
मुने भार्गव यद् वृत्तं युगादौ प्रभवात्ययम् ॥ २ ॥

मूलम्

आश्चर्यभूतं भवतः श्रुतं नो वदतां वर।
मुने भार्गव यद् वृत्तं युगादौ प्रभवात्ययम् ॥ २ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

युधिष्ठिर बोले— वक्ताओंमें श्रेष्ठ! भृगुवंशविभूषण महर्षे! हमने आपके मुखसे युगके आदिमें संघटित हुई उत्पत्ति और प्रलयके सम्बन्धमें बड़े आश्चर्यकी बातें सुनी हैं॥२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अस्मिन् कलियुगे त्वस्ति पुनः कौतूहलं मम।
समाकुलेषु धर्मेषु किं नु शेषं भविष्यति ॥ ३ ॥

मूलम्

अस्मिन् कलियुगे त्वस्ति पुनः कौतूहलं मम।
समाकुलेषु धर्मेषु किं नु शेषं भविष्यति ॥ ३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

अब मुझे इस कलियुगके विषयमें पुनः विशेषरूपसे सुननेका कुतूहल हो रहा है। जब सारे धर्मोंका उच्छेद हो जायगा, उस समय क्या शेष रह जायगा?॥३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

किंवीर्या मानवास्तत्र किमाहारविहारिणः ।
किमायुषः किंवसना भविष्यन्ति युगक्षये ॥ ४ ॥

मूलम्

किंवीर्या मानवास्तत्र किमाहारविहारिणः ।
किमायुषः किंवसना भविष्यन्ति युगक्षये ॥ ४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

युगान्तकालमें कलियुगके मनुष्योंका बल-पराक्रम कैसा होगा? उनके आहार-विहार कैसे होंगे? उनकी आयु कितनी होगी और उनके परिधान—वस्त्राभूषण कैसे होंगे॥४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

कां च काष्ठां समासाद्य पुनः सम्पत्स्यते कृतम्।
विस्तरेण मुने ब्रूहि विचित्राणीह भाषसे ॥ ५ ॥

मूलम्

कां च काष्ठां समासाद्य पुनः सम्पत्स्यते कृतम्।
विस्तरेण मुने ब्रूहि विचित्राणीह भाषसे ॥ ५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

कलियुगके किस सीमातक पहुँच जानेपर पुनः सत्ययुग आरम्भ हो जायगा? मुने! इन सब बातोंका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये; क्योंकि आपकी कथा बड़ी विचित्र होती है॥५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

इत्युक्तः स मुनिश्रेष्ठः पुनरेवाभ्यभाषत।
रमयन् वृष्णिशार्दूलं पाण्डवांश्च महानृषिः ॥ ६ ॥

मूलम्

इत्युक्तः स मुनिश्रेष्ठः पुनरेवाभ्यभाषत।
रमयन् वृष्णिशार्दूलं पाण्डवांश्च महानृषिः ॥ ६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

युधिष्ठिरके इस प्रकार पूछनेपर मुनिश्रेष्ठ महर्षि मार्कण्डेयने वृष्णिप्रवर श्रीकृष्ण तथा पाण्डवोंको आनन्दित करते हुए पुनः इस प्रकार कहा—॥६॥

मूलम् (वचनम्)

मार्कण्डेय उवाच

विश्वास-प्रस्तुतिः

शृणु राजन् मया दृष्टं यत् पुरा श्रुतमेव च।
अनुभूतं च राजेन्द्र देवदेवप्रसादजम् ॥ ७ ॥
भविष्यं सर्वलोकस्य वृत्तान्तं भरतर्षभ।
कलुषं कालमासाद्य कथ्यमानं निबोध मे ॥ ८ ॥

मूलम्

शृणु राजन् मया दृष्टं यत् पुरा श्रुतमेव च।
अनुभूतं च राजेन्द्र देवदेवप्रसादजम् ॥ ७ ॥
भविष्यं सर्वलोकस्य वृत्तान्तं भरतर्षभ।
कलुषं कालमासाद्य कथ्यमानं निबोध मे ॥ ८ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

मार्कण्डेय बोले— भरतश्रेष्ठ राजन्! मैंने देवाधिदेव भगवान् बालमुकुन्दकी कृपासे पूर्वकालमें, निकृष्ट कलिकालके प्राप्त होनेपर सम्पूर्ण लोकोंके भावी वृत्तान्तके विषयमें जो कुछ देखा-सुना या अनुभव किया है, वह बताता हूँ, सुनो और समझो॥७-८॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

कृते चतुष्पात् सकलो निर्व्याजोपाधिवर्जितः।
वृषः प्रतिष्ठितो धर्मो मनुष्ये भरतर्षभ ॥ ९ ॥

मूलम्

कृते चतुष्पात् सकलो निर्व्याजोपाधिवर्जितः।
वृषः प्रतिष्ठितो धर्मो मनुष्ये भरतर्षभ ॥ ९ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

भरतश्रेष्ठ! सत्ययुगमें मनुष्योंके भीतर वृषरूप धर्म अपने चारों पादोंसे युक्त होनेके कारण सम्पूर्ण रूपमें प्रतिष्ठित होता है। उसमें छल-कपट या दम्भ नहीं होता॥९॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अधर्मपादविद्धस्तु त्रिभिरंशैः प्रतिष्ठितः ।
त्रेतायां द्वापरेऽर्धेन व्यामिश्रो धर्म उच्यते ॥ १० ॥

मूलम्

अधर्मपादविद्धस्तु त्रिभिरंशैः प्रतिष्ठितः ।
त्रेतायां द्वापरेऽर्धेन व्यामिश्रो धर्म उच्यते ॥ १० ॥

अनुवाद (हिन्दी)

किंतु त्रेतामें वह धर्म अधर्मके एक पादसे अभिभूत होकर अपने तीन अंशोंसे ही प्रतिष्ठित होता है। द्वापरमें धर्म आधा ही रह जाता है। आधेमें अधर्म आकर मिल जाता है॥१०॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

त्रिभिरंशैरधर्मस्तु लोकानाक्रम्य तिष्ठति ।
तामसं युगमासाद्य तदा भरतसत्तम ॥ ११ ॥
चतुर्थांशेन धर्मस्तु मनुष्यानुपतिष्ठति ।
आयुर्वीर्यमथो बुद्धिर्बलं तेजश्च पाण्डव ॥ १२ ॥
मनुष्याणामनुयुगं ह्रसतीति निबोध मे।
राजानो ब्राह्मणा वैश्याः शूद्राश्चैव युधिष्ठिर ॥ १३ ॥
व्याजैर्धर्मं चरिष्यन्ति धर्मवैतंसिका नराः।
सत्यं संक्षेप्स्यते लोके नरैः पण्डितमानिभिः ॥ १४ ॥

मूलम्

त्रिभिरंशैरधर्मस्तु लोकानाक्रम्य तिष्ठति ।
तामसं युगमासाद्य तदा भरतसत्तम ॥ ११ ॥
चतुर्थांशेन धर्मस्तु मनुष्यानुपतिष्ठति ।
आयुर्वीर्यमथो बुद्धिर्बलं तेजश्च पाण्डव ॥ १२ ॥
मनुष्याणामनुयुगं ह्रसतीति निबोध मे।
राजानो ब्राह्मणा वैश्याः शूद्राश्चैव युधिष्ठिर ॥ १३ ॥
व्याजैर्धर्मं चरिष्यन्ति धर्मवैतंसिका नराः।
सत्यं संक्षेप्स्यते लोके नरैः पण्डितमानिभिः ॥ १४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

परंतु भरतश्रेष्ठ! कलियुग आनेपर अधर्म अपने तीन अंशोंद्वारा सम्पूर्ण लोकोंको आक्रान्त करके स्थित होता है और धर्म केवल एक पादसे मनुष्योंमें प्रतिष्ठित होता है। पाण्डुनन्दन! प्रत्येक युगमें मनुष्योंकी आयु, वीर्य, बुद्धि, बल तथा तेज क्रमशः घटते जाते हैं। युधिष्ठिर! अब कलियुगके समयका वर्णन सुनो। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सभी जातियोंके लोग कपटपूर्वक धर्मका आचरण करेंगे और धर्मका जाल बिछाकर दूसरे लोगोंको ठगते रहेंगे। अपनेको पण्डित माननेवाले लोग सत्यका त्याग कर देंगे॥११—१४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

सत्यहान्या ततस्तेषामायुरल्पं भविष्यति ।
आयुषः प्रक्षयाद् विद्यां न शक्ष्यन्त्युपजीवितुम् ॥ १५ ॥

मूलम्

सत्यहान्या ततस्तेषामायुरल्पं भविष्यति ।
आयुषः प्रक्षयाद् विद्यां न शक्ष्यन्त्युपजीवितुम् ॥ १५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

सत्यकी हानि होनेसे उनकी आयु थोड़ी हो जायगी और आयुकी कमी होनेके कारण वे अपने जीवन-निर्वाहके योग्य विद्या प्राप्त नहीं कर सकेंगे॥१५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

विद्याहीनानविज्ञानाल्लोभोऽप्यभिभविष्यति ।
लोभक्रोधपरा मूढाः कामासक्ताश्च मानवाः ॥ १६ ॥
वैरबद्धा भविष्यन्ति परस्परवधैषिणः ।

मूलम्

विद्याहीनानविज्ञानाल्लोभोऽप्यभिभविष्यति ।
लोभक्रोधपरा मूढाः कामासक्ताश्च मानवाः ॥ १६ ॥
वैरबद्धा भविष्यन्ति परस्परवधैषिणः ।

अनुवाद (हिन्दी)

विद्याके बिना ज्ञान न होनेसे उन सबको लोभ दबा लेगा। फिर लोभ और क्रोधके वशीभूत हुए मूढ़ मनुष्य कामनाओंमें फँसकर आपसमें वैर बाँध लेंगे और एक-दूसरेके प्राण लेनेकी घातमें लगे रहेंगे॥१६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः संकीर्यन्तः परस्परम् ॥ १७ ॥
शूद्रतुल्या भविष्यन्ति तपःसत्यविवर्जिताः ।
अन्त्या मध्या भविष्यन्ति मध्याश्चान्त्या न संशयः ॥ १८ ॥

मूलम्

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः संकीर्यन्तः परस्परम् ॥ १७ ॥
शूद्रतुल्या भविष्यन्ति तपःसत्यविवर्जिताः ।
अन्त्या मध्या भविष्यन्ति मध्याश्चान्त्या न संशयः ॥ १८ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—से आपसमें संतानोत्पादन करके वर्णसंकर हो जायँगे। वे सभी तपस्या और सत्यसे रहित हो शूद्रोंके समान हो जायँगे। अन्त्यज (चाण्डाल आदि) क्षत्रिय-वैश्य आदिके कर्म करेंगे और क्षत्रिय-वैश्य आदि चाण्डालोंके कर्म अपना लेंगे, इसमें संशय नहीं है॥१७-१८॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ईदृशो भविता लोको युगान्ते पर्युपस्थिते।
वस्त्राणां प्रवरा शाणी धान्यानां कोरदूषकाः ॥ १९ ॥

मूलम्

ईदृशो भविता लोको युगान्ते पर्युपस्थिते।
वस्त्राणां प्रवरा शाणी धान्यानां कोरदूषकाः ॥ १९ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

युगान्तकाल आनेपर लोगोंकी ऐसी ही दशा होगी। वस्त्रोंमें सनके बने हुए वस्त्र अच्छे समझे जायँगे। धानोंमें कोदोका आदर होगा॥१९॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

भार्यामित्राश्च पुरुषा भविष्यन्ति युगक्षये।
मत्स्यामिषेण जीवन्तो दुहन्तश्चाप्यजैडकम् ॥ २० ॥
गोषु नष्टासु पुरुषा येऽपि नित्यं धृतव्रताः।
तेऽपि लोभसमायुक्ता भविष्यन्ति युगक्षये ॥ २१ ॥

मूलम्

भार्यामित्राश्च पुरुषा भविष्यन्ति युगक्षये।
मत्स्यामिषेण जीवन्तो दुहन्तश्चाप्यजैडकम् ॥ २० ॥
गोषु नष्टासु पुरुषा येऽपि नित्यं धृतव्रताः।
तेऽपि लोभसमायुक्ता भविष्यन्ति युगक्षये ॥ २१ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

उस युगक्षयके समय पुरुष केवल स्त्रियोंसे ही मित्रता करनेवाले होंगे। कितने ही लोग मछलीके मांससे जीविका चलायेंगे। गायोंके नष्ट हो जानेके कारण मनुष्य भेड़ और बकरीका भी दूध दुहकर पीयेंगे। जो लोग सदा व्रत धारण करके रहनेवाले हैं, वे भी युगान्त कालमें लोभी हो जायँगे॥२०-२१॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अन्योन्यं परिमुष्णन्तो हिंसयन्तश्च मानवाः।
अजपा नास्तिकाः स्तेना भविष्यन्ति युगक्षये ॥ २२ ॥

मूलम्

अन्योन्यं परिमुष्णन्तो हिंसयन्तश्च मानवाः।
अजपा नास्तिकाः स्तेना भविष्यन्ति युगक्षये ॥ २२ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

लोग एक-दूसरेको लूटेंगे और मारेंगे। युगान्तकालके मनुष्य जपरहित, नास्तिक और चोरी करनेवाले होंगे॥२२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

सरित्तीरेषु कुद्दालैर्वापयिष्यन्ति चौषधीः ।
ताश्चाप्यल्पफलास्तेषां भविष्यन्ति युगक्षये ॥ २३ ॥

मूलम्

सरित्तीरेषु कुद्दालैर्वापयिष्यन्ति चौषधीः ।
ताश्चाप्यल्पफलास्तेषां भविष्यन्ति युगक्षये ॥ २३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

नदियोंके किनारेकी भूमिको कुदालोंसे खोदकर लोग वहाँ अनाज बोयेंगे। उन अनाजोंमें भी युगान्तकालके प्रभावसे बहुत कम फल लगेंगे॥२३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

श्राद्धे दैवे च पुरुषा येऽपि नित्यं धृतव्रताः।
तेऽपि लोभसमायुक्ता भोक्ष्यन्तीह परस्परम् ॥ २४ ॥

मूलम्

श्राद्धे दैवे च पुरुषा येऽपि नित्यं धृतव्रताः।
तेऽपि लोभसमायुक्ता भोक्ष्यन्तीह परस्परम् ॥ २४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

जो सदा (परान्नका त्याग करके) व्रतका पालन करनेवाले लोग हैं, वे भी उस समय लोभवश देवयज्ञ तथा श्राद्धमें एक-दूसरेके यहाँ भोजन करेंगे॥२४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

पिता पुत्रस्य भोक्ता च पितुः पुत्रस्तथैव च।
अतिक्रान्तानि भोज्यानि भविष्यन्ति युगक्षये ॥ २५ ॥

मूलम्

पिता पुत्रस्य भोक्ता च पितुः पुत्रस्तथैव च।
अतिक्रान्तानि भोज्यानि भविष्यन्ति युगक्षये ॥ २५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

कलियुगके अन्तिम भागमें पिता पुत्रकी और पुत्र पिताकी शय्या आदिका उपभोग करने लगेंगे। उस समय त्याज्य (अभक्ष्य) पदार्थ भी भोजनके योग्य समझे जायँगे॥२५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

न व्रतानि चरिष्यन्ति ब्राह्मणा वेदनिन्दकाः।
न यक्ष्यन्ति न होष्यन्ति हेतुवादविमोहिताः।
निम्नेष्वीहां करिष्यन्ति हेतुवादविमोहिताः ॥ २६ ॥

मूलम्

न व्रतानि चरिष्यन्ति ब्राह्मणा वेदनिन्दकाः।
न यक्ष्यन्ति न होष्यन्ति हेतुवादविमोहिताः।
निम्नेष्वीहां करिष्यन्ति हेतुवादविमोहिताः ॥ २६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

ब्राह्मणलोग व्रत और नियमोंका पालन तो करेंगे नहीं, उलटे वेदोंकी निन्दा करने लग जायँगे। कोरे तर्कवादसे मोहित होकर वे यज्ञ और होम छोड़ बैठेंगे। वे केवल तर्कवादसे मोहित होकर नीच-से-नीच कर्म करनेके लिये प्रयत्नशील रहेंगे॥२६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

निम्ने कृषिं करिष्यन्ति योक्ष्यन्ति धुरि धेनुकाः।
एकहायनवत्सांश्च योजयिष्यन्ति मानवाः ॥ २७ ॥

मूलम्

निम्ने कृषिं करिष्यन्ति योक्ष्यन्ति धुरि धेनुकाः।
एकहायनवत्सांश्च योजयिष्यन्ति मानवाः ॥ २७ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

मनुष्य नीची भूमिमें (अर्थात् गायोंके जल पीने और चरनेकी जगहमें) खेती करेंगे। दूध देनेवाली गायोंको भी बोझ ढोनेके काममें लगा देंगे और सालभरके बछड़ोंको भी हलमें जोतेंगे॥२७॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

पुत्रःपितृवधं कृत्वा पिता पुत्रवधं तथा।
निरुद्वेगो बृहद्वादी न निन्दामुपलप्स्यते ॥ २८ ॥

मूलम्

पुत्रःपितृवधं कृत्वा पिता पुत्रवधं तथा।
निरुद्वेगो बृहद्वादी न निन्दामुपलप्स्यते ॥ २८ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

पुत्र पिताका और पिता पुत्रका वध करके भी उद्विग्न नहीं होंगे। अपनी प्रशंसाके लिये लोग बड़ी-बड़ी बातें बनायेंगे, किंतु समाजमें उनकी निन्दा नहीं होगी॥२८॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

म्लेच्छभूतं जगत् सर्वं निष्क्रियं यज्ञवर्जितम्।
भविष्यति निरानन्दमनुत्सवमथो तथा ॥ २९ ॥

मूलम्

म्लेच्छभूतं जगत् सर्वं निष्क्रियं यज्ञवर्जितम्।
भविष्यति निरानन्दमनुत्सवमथो तथा ॥ २९ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

सारा संसार म्लेच्छोंकी भाँति शुभ कर्म और यज्ञ-यागादि छोड़ देगा तथा आनन्दशून्य और उत्सवरहित हो जायगा॥२९॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

प्रायशः कृपणानां हि तथाबन्धुमतामपि।
विधवानां च वित्तानि हरिष्यन्तीह मानवाः ॥ ३० ॥

मूलम्

प्रायशः कृपणानां हि तथाबन्धुमतामपि।
विधवानां च वित्तानि हरिष्यन्तीह मानवाः ॥ ३० ॥

अनुवाद (हिन्दी)

लोग प्रायः दीनों, असहायों तथा विधवाओंका भी धन हड़प लेंगे॥३०॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

स्वल्पवीर्यबलाः स्तब्धा लोभमोहपरायणाः ।
तत्कथादानसंतुष्टा दुष्टानामपि मानवाः ॥ ३१ ॥
परिग्रहं करिष्यन्ति मायाचारपरिग्रहाः ।
समाह्वयन्तः कौन्तेय राजानः पापबुद्धयः ॥ ३२ ॥
परस्परवधोद्युक्ता मूर्खाः पण्डितमानिनः ।
भविष्यन्ति युगस्यान्ते क्षत्रिया लोककण्टकाः ॥ ३३ ॥

मूलम्

स्वल्पवीर्यबलाः स्तब्धा लोभमोहपरायणाः ।
तत्कथादानसंतुष्टा दुष्टानामपि मानवाः ॥ ३१ ॥
परिग्रहं करिष्यन्ति मायाचारपरिग्रहाः ।
समाह्वयन्तः कौन्तेय राजानः पापबुद्धयः ॥ ३२ ॥
परस्परवधोद्युक्ता मूर्खाः पण्डितमानिनः ।
भविष्यन्ति युगस्यान्ते क्षत्रिया लोककण्टकाः ॥ ३३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

उनके शारीरिक बल और पराक्रम क्षीण हो जायँगे। वे उद्दण्ड होकर लोभ और मोहमें डूबे रहेंगे। वैसे ही लोगोंकी चर्चा करने और उनसे दान लेनेमें प्रसन्नताका अनुभव करेंगे। कपटपूर्ण आचारको अपनाकर वे दुष्टोंके दिये हुए दानको भी ग्रहण कर लेंगे। कुन्तीनन्दन! पापबुद्धि राजा एक-दूसरेको युद्धके लिये ललकारते हुए परस्पर एक-दूसरेके प्राण लेनेको उतारू रहेंगे और मूर्ख होते हुए अपनेको पण्डित मानेंगे। इस प्रकार युगान्तकालके सभी क्षत्रिय जगत्‌के लिये काँटे बन जायँगे॥३१—३३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अरक्षितारो लुब्धाश्च मानाहङ्कारदर्पिताः ।
केवलं दण्डरुचयो भविष्यन्ति युगक्षये ॥ ३४ ॥

मूलम्

अरक्षितारो लुब्धाश्च मानाहङ्कारदर्पिताः ।
केवलं दण्डरुचयो भविष्यन्ति युगक्षये ॥ ३४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

कलियुगकी समाप्तिके समय वे प्रजाकी रक्षा तो करेंगे नहीं, उनसे रुपये ऐंठनेके लिये लोभ अधिक रखेंगे। सदा मान और अहंकारके मदमें चूर रहेंगे। वे केवल प्रजाको दण्ड देनेके कार्यमें ही रुचि रखेंगे॥३४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

आक्रम्याक्रम्य साधूनां दारांश्चापि धनानि च।
भोक्ष्यन्ते निरनुक्रोशा रुदतामपि भारत ॥ ३५ ॥

मूलम्

आक्रम्याक्रम्य साधूनां दारांश्चापि धनानि च।
भोक्ष्यन्ते निरनुक्रोशा रुदतामपि भारत ॥ ३५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

भारत! लोग इतने निर्दयी हो जायँगे कि सज्जन पुरुषोंपर भी बार-बार आक्रमण करके उनके धन और स्त्रियोंका बलपूर्वक उपभोग करेंगे तथा उनके रोने-बिलखनेपर भी दया नहीं करेंगे॥३५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

न कन्यां याचते कश्चिन्नापि कन्या प्रदीयते।
स्वयंग्राहा भविष्यन्ति युगान्ते समुपस्थिते ॥ ३६ ॥

मूलम्

न कन्यां याचते कश्चिन्नापि कन्या प्रदीयते।
स्वयंग्राहा भविष्यन्ति युगान्ते समुपस्थिते ॥ ३६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

कलियुगका अन्त आनेपर न तो कोई किसीसे कन्याकी याचना करेगा और न कोई कन्यादान ही करेगा। उस समयके वर-कन्या स्वयं ही एक-दूसरेको चुन लेंगे॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

राजानश्चाप्यसंतुष्टाः परार्थान् मूढचेतसः ।
सर्वोपायैर्हरिष्यन्ति युगान्ते पर्युपस्थिते ॥ ३७ ॥

मूलम्

राजानश्चाप्यसंतुष्टाः परार्थान् मूढचेतसः ।
सर्वोपायैर्हरिष्यन्ति युगान्ते पर्युपस्थिते ॥ ३७ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

कलियुगकी समाप्तिके समय असंतोषी तथा मूढ़चित्त राजा भी सब तरहके उपायोंसे दूसरोंके धनका अपहरण करेंगे॥३७॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

म्लेच्छीभूतं जगत् सर्वं भविष्यति न संशयः।
हस्तो हस्तं परिमुषेद् युगान्ते समुपस्थिते ॥ ३८ ॥

मूलम्

म्लेच्छीभूतं जगत् सर्वं भविष्यति न संशयः।
हस्तो हस्तं परिमुषेद् युगान्ते समुपस्थिते ॥ ३८ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

उस समय सारा जगत् म्लेच्छ हो जायगा—इसमें संशय नहीं। एक हाथ दूसरे हाथको लूटेगा—सगा भाई भी भाईके धनको हड़प लेगा॥३८॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

सत्यं संक्षिप्यते लोके नरैः पण्डितमानिभिः।
स्थविरा बालमतयो बालाः स्थविरबुद्धयः ॥ ३९ ॥

मूलम्

सत्यं संक्षिप्यते लोके नरैः पण्डितमानिभिः।
स्थविरा बालमतयो बालाः स्थविरबुद्धयः ॥ ३९ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

अपनेको पण्डित माननेवाले मुनष्य संसारमें सत्यको मिटा देंगे। बूढ़ोंकी बुद्धि बालकों-जैसी होगी और बालकोंकी बूढ़ों-जैसी॥३९॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

भीरुस्तथा शूरमानी शूरा भीरुविषादिनः।
न विश्वसन्ति चान्योन्यं युगान्ते पर्युपस्थिते ॥ ४० ॥

मूलम्

भीरुस्तथा शूरमानी शूरा भीरुविषादिनः।
न विश्वसन्ति चान्योन्यं युगान्ते पर्युपस्थिते ॥ ४० ॥

अनुवाद (हिन्दी)

युगान्तकाल उपस्थित होनेपर कायर अपनेको शूर-वीर मानेंगे और शूर-वीर कायरोंकी भाँति विषादमें डूबे रहेंगे। कोई एक-दूसरेका विश्वास नहीं करेंगे॥४०॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

एकाहार्यं युगं सर्वं लोभमोहव्यवस्थितम्।
अधर्मो वर्द्धते तत्र न तु धर्मः प्रवर्तते ॥ ४१ ॥

मूलम्

एकाहार्यं युगं सर्वं लोभमोहव्यवस्थितम्।
अधर्मो वर्द्धते तत्र न तु धर्मः प्रवर्तते ॥ ४१ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

युगके सब लोग लोभ और मोहमें फँसकर भक्ष्याभक्ष्यका विचार किये बिना ही एक साथ सम्मिलित होकर भोजन करने लगेंगे। अधर्म बढ़ेगा और धर्म विदा हो जायगा॥४१॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या न शिष्यन्ति जनाधिप।
एकवर्णस्तदा लोको भविष्यति युगक्षये ॥ ४२ ॥

मूलम्

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या न शिष्यन्ति जनाधिप।
एकवर्णस्तदा लोको भविष्यति युगक्षये ॥ ४२ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

नरेश्वर! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंका नाम भी नहीं रह जायगा। युगान्तकालमें सारा विश्व एक वर्ण, एक जातिका हो जायगा॥४२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

न क्षंस्यति पिता पुत्रं पुत्रश्च पितरं तथा।
भार्याश्च पतिशुश्रूषां न करिष्यन्ति संक्षये ॥ ४३ ॥

मूलम्

न क्षंस्यति पिता पुत्रं पुत्रश्च पितरं तथा।
भार्याश्च पतिशुश्रूषां न करिष्यन्ति संक्षये ॥ ४३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

युगक्षय-कालमें पिता पुत्रके अपराधको क्षमा नहीं करेंगे और पुत्र भी पिताकी बात नहीं सहेगा। स्त्रियाँ अपने पतियोंकी सेवा छोड़ देंगी॥४३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ये यवान्ना जनपदा गोधूमान्नास्तथैव च।
तान् देशान् संश्रयिष्यन्ति युगान्ते पर्युपस्थिते ॥ ४४ ॥

मूलम्

ये यवान्ना जनपदा गोधूमान्नास्तथैव च।
तान् देशान् संश्रयिष्यन्ति युगान्ते पर्युपस्थिते ॥ ४४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

युगान्तकाल आनेपर (लोग) उन प्रदेशोंमें चले जायँगे जहाँ जौ और गेहूँ आदि अनाज अधिक पैदा होते हैं (चाहे वह देश निषिद्ध ही क्यों न हो)॥४४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

स्वैराचाराश्च पुरुषा योषितश्च विशाम्पते।
अन्योन्यं न सहिष्यन्ति युगान्ते पर्युपस्थिते ॥ ४५ ॥

मूलम्

स्वैराचाराश्च पुरुषा योषितश्च विशाम्पते।
अन्योन्यं न सहिष्यन्ति युगान्ते पर्युपस्थिते ॥ ४५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

महाराज! युगान्तकाल आनेपर पुरुष और स्त्रियाँ स्वेच्छाचारी होकर एक-दूसरेके कार्य और विचारको नहीं सहेंगे॥४५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

म्लेच्छभूतं जगत् सर्वं भविष्यति युधिष्ठिर।
न श्राद्धैस्तर्पयिष्यन्ति दैवतानीह मानवाः ॥ ४६ ॥

मूलम्

म्लेच्छभूतं जगत् सर्वं भविष्यति युधिष्ठिर।
न श्राद्धैस्तर्पयिष्यन्ति दैवतानीह मानवाः ॥ ४६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

युधिष्ठिर! उस समय सारा जगत् म्लेच्छ हो जायगा। मनुष्य श्राद्ध और यज्ञ-कर्मोंद्वारा पितरों और देवताओंको संतुष्ट नहीं करेंगे॥४६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

न कश्चित्‌ कस्यचिच्छ्रोता न कश्चित्‌ कस्यचिद्‌ गुरुः।
तमोग्रस्तस्तदा लोको भविष्यति जनाधिप ॥ ४७ ॥

मूलम्

न कश्चित्‌ कस्यचिच्छ्रोता न कश्चित्‌ कस्यचिद्‌ गुरुः।
तमोग्रस्तस्तदा लोको भविष्यति जनाधिप ॥ ४७ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

राजन्! उस समय कोई किसीका उपदेश नहीं सुनेगा और न कोई किसीका गुरु ही होगा। सारा जगत् अज्ञानमय अन्धकारसे आच्छादित हो जायगा॥४७॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

परमायुश्च भविता तदा वर्षाणि षोडश।
ततः प्राणान् विमोक्ष्यन्ति युगान्ते समुपस्थिते ॥ ४८ ॥
पञ्चमे वाथ षष्ठे वा वर्षे कन्या प्रसूयते।
सप्तवर्षाष्टवर्षाश्च प्रजास्यन्ति नरास्तदा ॥ ४९ ॥

मूलम्

परमायुश्च भविता तदा वर्षाणि षोडश।
ततः प्राणान् विमोक्ष्यन्ति युगान्ते समुपस्थिते ॥ ४८ ॥
पञ्चमे वाथ षष्ठे वा वर्षे कन्या प्रसूयते।
सप्तवर्षाष्टवर्षाश्च प्रजास्यन्ति नरास्तदा ॥ ४९ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

उस समय युगान्तकाल उपस्थित होनेपर लोगोंकी आयु अधिक-से-अधिक सोलह वर्षकी होगी, उसके बाद वे प्राणत्याग कर देंगे। पाँचवें या छठे वर्षमें स्त्रियाँ बच्चे पैदा करने लगेंगी और सात-आठ वर्षके पुरुष संतानोत्पादनमें प्रवृत्त हो जायँगे॥४८-४९॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

पत्यौ स्त्री तु तदा राजन् पुरुषो वा स्त्रियं प्रति।
युगान्ते राजशार्दूल न तोषमुपयास्यति ॥ ५० ॥

मूलम्

पत्यौ स्त्री तु तदा राजन् पुरुषो वा स्त्रियं प्रति।
युगान्ते राजशार्दूल न तोषमुपयास्यति ॥ ५० ॥

अनुवाद (हिन्दी)

नृपश्रेष्ठ! युगान्तकाल आनेपर स्त्री अपने पतिसे और पति अपनी स्त्रीसे संतुष्ट नहीं होंगे॥५०॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अल्पद्रव्या वृथालिङ्गा हिंसा च प्रभविष्यति।
न कश्चित्‌ कस्यचिद्‌ दाता भविष्यति युगक्षये ॥ ५१ ॥

मूलम्

अल्पद्रव्या वृथालिङ्गा हिंसा च प्रभविष्यति।
न कश्चित्‌ कस्यचिद्‌ दाता भविष्यति युगक्षये ॥ ५१ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

कलियुगके अन्तभागमें लोगोंके पास धन थोड़ा रहेगा और लोग दिखावेके लिये साधुवेष धारण करेंगे। हिंसाका जोर बढ़ेगा और कोई किसीको कुछ देनेवाला नहीं रहेगा॥५१॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अट्टशूला जनपदाः शिवशूलाश्चतुष्पथाः ।
केशशूलाः स्त्रियश्चापि भविष्यन्ति युगक्षये ॥ ५२ ॥

मूलम्

अट्टशूला जनपदाः शिवशूलाश्चतुष्पथाः ।
केशशूलाः स्त्रियश्चापि भविष्यन्ति युगक्षये ॥ ५२ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

युगक्षयकालमें सभी देशोंके लोग अन्न बेचेंगे। ब्राह्मण वेदविक्रय करेंगे और स्त्रियाँ वेश्या वृत्ति अपना लेंगी॥५२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

म्लेच्छाचाराः सर्वभक्षा दारुणाः सर्वकर्मसु।
भाविनः पश्चिमे काले मनुष्या नात्र संशयः ॥ ५३ ॥

मूलम्

म्लेच्छाचाराः सर्वभक्षा दारुणाः सर्वकर्मसु।
भाविनः पश्चिमे काले मनुष्या नात्र संशयः ॥ ५३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

युगान्तकालके मनुष्य म्लेच्छों-जैसे आचारवाले और सर्वभक्षी यानी अभक्ष्यका भी भक्षण करनेवाले हो जायँगे। वे प्रत्येक कर्ममें अपनी क्रूरताका परिचय देंगे, इसमें संशय नहीं है॥५३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

क्रयविक्रयकाले च सर्वः सर्वस्य वञ्चनम्।
युगान्ते भरतश्रेष्ठ वित्तलोभात् करिष्यति ॥ ५४ ॥

मूलम्

क्रयविक्रयकाले च सर्वः सर्वस्य वञ्चनम्।
युगान्ते भरतश्रेष्ठ वित्तलोभात् करिष्यति ॥ ५४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

भरतश्रेष्ठ! युगान्तकालमें धनके लोभसे क्रय-विक्रयके समय सभी सबको ठगेंगे॥५४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ज्ञानानि चाप्यविज्ञाय करिष्यन्ति क्रियास्तथा।
आत्मच्छन्देन वर्तन्ते युगान्ते समुपस्थिते ॥ ५५ ॥

मूलम्

ज्ञानानि चाप्यविज्ञाय करिष्यन्ति क्रियास्तथा।
आत्मच्छन्देन वर्तन्ते युगान्ते समुपस्थिते ॥ ५५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

क्रियाके तत्त्वको न जानकर भी लोग उसे करनेमें प्रवृत्त होंगे। युगान्तकालके सभी मानव स्वेच्छाचारी हो जायँगे॥५५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

स्वभावात् क्रूरकर्माणश्चान्योन्यमभिशंसिनः ।
भवितारो जनाः सर्वे सम्प्राप्ते तु युगक्षये ॥ ५६ ॥
आरामांश्चैव वृक्षांश्च नाशयिष्यन्ति निर्व्यथाः।
भविता संशयो लोके जीवितस्य हि देहिनाम् ॥ ५७ ॥

मूलम्

स्वभावात् क्रूरकर्माणश्चान्योन्यमभिशंसिनः ।
भवितारो जनाः सर्वे सम्प्राप्ते तु युगक्षये ॥ ५६ ॥
आरामांश्चैव वृक्षांश्च नाशयिष्यन्ति निर्व्यथाः।
भविता संशयो लोके जीवितस्य हि देहिनाम् ॥ ५७ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

सभी स्वभावतः क्रूर और एक-दूसरेपर मिथ्या कलंक लगानेवाले होंगे। युगान्तकाल उपस्थित होनेपर सब लोग बगीचों और वृक्षोंको कटवा देंगे और ऐसा करते समय उनके मनमें पीड़ा नहीं होगी। प्रत्येक मनुष्यके जीवनधारणमें भी शंका हो जायगी। अर्थात् प्रत्येक मनुष्यका जीवन धारण करना कठिन हो जायगा॥५६-५७॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तथा लोभाभिभूताश्च भविष्यन्ति नरा नृप।
ब्राह्मणांश्च हनिष्यन्ति ब्राह्मणस्वोपभोगिनः ॥ ५८ ॥

मूलम्

तथा लोभाभिभूताश्च भविष्यन्ति नरा नृप।
ब्राह्मणांश्च हनिष्यन्ति ब्राह्मणस्वोपभोगिनः ॥ ५८ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

राजन्! सब लोग लोभके वशीभूत होंगे और ब्राह्मणोंका धन उपभोग करनेका जिनका स्वभाव पड़ गया है, वे धनके लिये ब्राह्मणोंको मार भी डालेंगे॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

हाहाकृता द्विजाश्चैव भयार्ता वृषलार्दिताः।
त्रातारमलभन्तो वै भ्रमिष्यन्ति महीमिमाम् ॥ ५९ ॥

मूलम्

हाहाकृता द्विजाश्चैव भयार्ता वृषलार्दिताः।
त्रातारमलभन्तो वै भ्रमिष्यन्ति महीमिमाम् ॥ ५९ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

शूद्रोंके सताये हुए ब्राह्मण भयसे पीड़ित हो हाहाकार करने लगेंगे और अपने लिये कोई रक्षक न मिलनेके कारण सारी पृथ्वीपर निश्चय ही भटकते फिरेंगे॥५९॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

जीवितान्तकराः क्रूरा रौद्राः प्राणिविहिंसकाः।
यदा भविष्यन्ति नरास्तदा संक्षेप्स्यते युगम् ॥ ६० ॥

मूलम्

जीवितान्तकराः क्रूरा रौद्राः प्राणिविहिंसकाः।
यदा भविष्यन्ति नरास्तदा संक्षेप्स्यते युगम् ॥ ६० ॥

अनुवाद (हिन्दी)

जब दूसरोंके जीवनका विनाश करनेवाले क्रूर, भयंकर तथा जीवहिंसक मनुष्य पैदा होने लगें, तब समझ लेना चाहिये कि युगान्तकाल उपस्थित हो गया॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

आश्रयिष्यन्ति च नदीः पर्वतान् विषमाणि च।
प्रधावमाना वित्रस्ता द्विजाः कुरुकुलोद्वह ॥ ६१ ॥

मूलम्

आश्रयिष्यन्ति च नदीः पर्वतान् विषमाणि च।
प्रधावमाना वित्रस्ता द्विजाः कुरुकुलोद्वह ॥ ६१ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

कुरुकुलतिलक युधिष्ठिर! अत्याचारियोंसे डरे हुए ब्राह्मण इधर-उधर भागकर नदियों, पर्वतों तथा दुर्गम स्थानोंका आश्रय लेंगे॥६१॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

दस्युभिः पीडिता राजन् काका इव द्विजोत्तमाः।
कुराजभिश्च सततं करभारप्रपीडिताः ॥ ६२ ॥
धैर्यं त्यक्त्वा महीपाल दारुणे युगसंक्षये।
विकर्माणि करिष्यन्ति शूद्राणां परिचारकाः ॥ ६३ ॥

मूलम्

दस्युभिः पीडिता राजन् काका इव द्विजोत्तमाः।
कुराजभिश्च सततं करभारप्रपीडिताः ॥ ६२ ॥
धैर्यं त्यक्त्वा महीपाल दारुणे युगसंक्षये।
विकर्माणि करिष्यन्ति शूद्राणां परिचारकाः ॥ ६३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

राजन्! श्रेष्ठ ब्राह्मण भी लुटेरोंसे पीड़ित होकर कौओंकी तरह काँव-काँव करते फिरेंगे। दुष्ट राजाओंके लगाये हुए करोंके भारसे सदा पीड़ित होनेके कारण वे धैर्य छोड़कर चल देंगे और शूद्रोंकी सेवा-शुश्रूषामें लगे रहकर धर्मविरुद्ध कार्य करेंगे। भूपाल! भयंकर कलियुगके अन्तमें जगत्‌की यही दशा होगी॥६२-६३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

शूद्रा धर्मं प्रवक्ष्यन्ति ब्राह्मणाः पर्युपासकाः।
श्रोतारश्च भविष्यन्ति प्रामाण्येन व्यवस्थिताः ॥ ६४ ॥
विपरीतश्च लोकोऽयं भविष्यत्यधरोत्तरः ।
एडूकान् पूजयिष्यन्ति वर्जयिष्यन्ति देवताः ॥ ६५ ॥

मूलम्

शूद्रा धर्मं प्रवक्ष्यन्ति ब्राह्मणाः पर्युपासकाः।
श्रोतारश्च भविष्यन्ति प्रामाण्येन व्यवस्थिताः ॥ ६४ ॥
विपरीतश्च लोकोऽयं भविष्यत्यधरोत्तरः ।
एडूकान् पूजयिष्यन्ति वर्जयिष्यन्ति देवताः ॥ ६५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

शूद्र धर्मोपदेश करेंगे और ब्राह्मणलोग उनकी सेवामें रहकर उसे सुनेंगे तथा उसीको प्रामाणिक मानकर उसका पालन करेंगे। समस्त लोकका व्यवहार विपरीत और उलट-पुलट हो जायगा। ऊँच नीच और नीच ऊँच हो जायँगे। लोग हड्डी जड़ी हुई दीवारोंकी तो पूजा करेंगे और देवविग्रहोंको त्याग देंगे॥६४-६५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

शूद्राः परिचरिष्यन्ति न द्विजान् युगसंक्षये।
आश्रमेषु महर्षीणां ब्राह्मणावसथेषु च ॥ ६६ ॥
देवस्थानेषु चैत्येषु नागानामालयेषु च।
एडूकचिह्ना पृथिवी न देवगृहभूषिता ॥ ६७ ॥

मूलम्

शूद्राः परिचरिष्यन्ति न द्विजान् युगसंक्षये।
आश्रमेषु महर्षीणां ब्राह्मणावसथेषु च ॥ ६६ ॥
देवस्थानेषु चैत्येषु नागानामालयेषु च।
एडूकचिह्ना पृथिवी न देवगृहभूषिता ॥ ६७ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

युगान्तकालमें शूद्र द्विजातियोंकी सेवा नहीं करेंगे। वह समय आनेपर महर्षियोंके आश्रमोंमें, ब्राह्मणोंके घरोंमें, देवस्थानोंमें, चैत्यवृक्षोंके आस-पास और नागालयोंमें जो भूमि होगी, उसपर हड्डी जड़ी हुई दीवारोंका चिह्न तो उपलब्ध होगा; परंतु देवमन्दिर उस भूमिकी शोभा नहीं बढ़ायेंगे॥६६-६७॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

भविष्यति युगे क्षीणे तद् युगान्तस्य लक्षणम्।
यदा रौद्रा धर्महीना मांसादाः पानपास्तथा ॥ ६८ ॥
भविष्यन्ति नरा नित्यं तदा संक्षेप्स्यते युगम्।

मूलम्

भविष्यति युगे क्षीणे तद् युगान्तस्य लक्षणम्।
यदा रौद्रा धर्महीना मांसादाः पानपास्तथा ॥ ६८ ॥
भविष्यन्ति नरा नित्यं तदा संक्षेप्स्यते युगम्।

अनुवाद (हिन्दी)

यह सब युगान्तका लक्षण समझना चाहिये। जब सब मानव सदा भयंकर स्वभाववाले, धर्महीन, मांसखोर और शराबी हो जायँगे, उस समय युगका संहार होगा॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

पुष्पं पुष्पे यदा राजन् फले वा फलमाश्रितम् ॥ ६९ ॥
प्रजास्यति महाराज तदा संक्षेप्स्यते युगम्।
अकालवर्षी पर्जन्यो भविष्यति गते युगे ॥ ७० ॥

मूलम्

पुष्पं पुष्पे यदा राजन् फले वा फलमाश्रितम् ॥ ६९ ॥
प्रजास्यति महाराज तदा संक्षेप्स्यते युगम्।
अकालवर्षी पर्जन्यो भविष्यति गते युगे ॥ ७० ॥

अनुवाद (हिन्दी)

महाराज! जब फूलमें फूल, फलमें फल लगने लगेगा, उस समय युगका संहार होगा। युगान्तकालमें मेघ असमयमें ही वर्षा करेंगे॥६९-७०॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अक्रमेण मनुष्याणां भविष्यन्ति तदा क्रियाः।
विरोधमथ यास्यन्ति वृषला ब्राह्मणैः सह ॥ ७१ ॥

मूलम्

अक्रमेण मनुष्याणां भविष्यन्ति तदा क्रियाः।
विरोधमथ यास्यन्ति वृषला ब्राह्मणैः सह ॥ ७१ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

मनुष्योंकी सारी क्रियाएँ क्रमसे विपरीत होंगी। शूद्र ब्राह्मणोंके साथ विरोध करेंगे॥७१॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

मही म्लेच्छजनाकीर्णा भविष्यति ततोऽचिरात्।
करभारभयाद् विप्रा भजिष्यन्ति दिशो दश ॥ ७२ ॥

मूलम्

मही म्लेच्छजनाकीर्णा भविष्यति ततोऽचिरात्।
करभारभयाद् विप्रा भजिष्यन्ति दिशो दश ॥ ७२ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

सारी पृथ्वी थोड़े ही समयमें म्लेच्छोंसे भर जायगी। ब्राह्मणलोग करोंके भारसे भयभीत होकर दसों दिशाओंकी शरण लेंगे॥७२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

निर्विशेषा जनपदास्तथा विष्टिकरार्दिताः ।
आश्रमानुपलप्स्यन्ति फलमूलोपजीविनः ॥ ७३ ॥

मूलम्

निर्विशेषा जनपदास्तथा विष्टिकरार्दिताः ।
आश्रमानुपलप्स्यन्ति फलमूलोपजीविनः ॥ ७३ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

सारे जनपद एक-जैसे आचार और वेशभूषा बना लेंगे। लोग बेगार लेनेवालों और कर लेनेवालोंसे पीड़ित हो एकान्त आश्रमोंमें चले जायँगे और फल-मूल खाकर जीवन-निर्वाह करेंगे॥७३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

एवं पर्याकुले लोके मर्यादा न भविष्यति।
न स्थास्यन्त्युपदेशे च शिष्या विप्रियकारिणः ॥ ७४ ॥

मूलम्

एवं पर्याकुले लोके मर्यादा न भविष्यति।
न स्थास्यन्त्युपदेशे च शिष्या विप्रियकारिणः ॥ ७४ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

इस तरह उथल-पुथल मच जानेपर संसारमें कोई मर्यादा नहीं रह जायगी। शिष्य गुरुके उपदेशपर नहीं चलेंगे। वे उलटे उनका अहित करेंगे॥७४॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

आचार्योऽपनिधिश्चैव भर्त्स्यते तदनन्तरम् ।
अर्थयुक्त्या प्रवत्स्यन्ति मित्रसम्बन्धिबान्धवाः ॥ ७५ ॥

मूलम्

आचार्योऽपनिधिश्चैव भर्त्स्यते तदनन्तरम् ।
अर्थयुक्त्या प्रवत्स्यन्ति मित्रसम्बन्धिबान्धवाः ॥ ७५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

अपने कुलका आचार्य भी यदि निर्धन हो तो उसे निरन्तर शिष्योंकी डाँट-फटकार सुननी पड़ेगी। मित्र, सम्बन्धी या भाई-बन्धु धनके लालचसे ही अपने पास रहेंगे॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अभावः सर्वभूतानां युगान्ते सम्भविष्यति।
दिशः प्रज्वलिताः सर्वा नक्षत्राण्यप्रभाणि च ॥ ७६ ॥

मूलम्

अभावः सर्वभूतानां युगान्ते सम्भविष्यति।
दिशः प्रज्वलिताः सर्वा नक्षत्राण्यप्रभाणि च ॥ ७६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

युगान्तकाल आनेपर समस्त प्राणियोंका अभाव हो जायगा। सारी दिशाएँ प्रज्वलित हो उठेंगी और नक्षत्रोंकी प्रभा विलुप्त हो जायगी॥७६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

ज्योतींषि प्रतिकूलानि वाताः पर्याकुलास्तथा।
उल्कापाताश्च बहवो महाभयनिदर्शकाः ॥ ७७ ॥

मूलम्

ज्योतींषि प्रतिकूलानि वाताः पर्याकुलास्तथा।
उल्कापाताश्च बहवो महाभयनिदर्शकाः ॥ ७७ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

ग्रह उलटी गतिसे चलने लगेंगे। हवा इतनी जोरसे चलेगी कि लोग व्याकुल हो उठेंगे। महान् भयकी सूचना देनेवाले उल्कापात बार-बार होते रहेंगे॥७७॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

षड्‌भिरन्यैश्च सहितो भास्करः प्रतपिष्यति।
तुमुलाश्चापि निर्ह्रादा दिग्दाहाश्चापि सर्वशः ॥ ७८ ॥

मूलम्

षड्‌भिरन्यैश्च सहितो भास्करः प्रतपिष्यति।
तुमुलाश्चापि निर्ह्रादा दिग्दाहाश्चापि सर्वशः ॥ ७८ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

एक सूर्य तो है ही, छः और उदय होंगे और सातों एक साथ तपेंगे। सब ओर बिजलीकी भयानक गड़गड़ाहट होगी, सब दिशाओंमें आग लगेगी॥७८॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

कबन्धान्तर्हितो भानुरुदयास्तमने तदा ।
अकालवर्षी भगवान् भविष्यति सहस्रदृक् ॥ ७९ ॥

मूलम्

कबन्धान्तर्हितो भानुरुदयास्तमने तदा ।
अकालवर्षी भगवान् भविष्यति सहस्रदृक् ॥ ७९ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

उदय और अस्तके समय सूर्य राहुसे ग्रस्त दिखायी देगा। भगवान् इन्द्र समयपर वर्षा नहीं करेंगे॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

सस्यानि च न रोक्ष्यन्ति युगान्ते पर्युपस्थिते।
अभीक्ष्णं क्रूरवादिन्यः परुषा रुदितप्रियाः ॥ ८० ॥

मूलम्

सस्यानि च न रोक्ष्यन्ति युगान्ते पर्युपस्थिते।
अभीक्ष्णं क्रूरवादिन्यः परुषा रुदितप्रियाः ॥ ८० ॥

अनुवाद (हिन्दी)

युगान्तकाल उपस्थित होनेपर बोयी हुई खेती उगेगी ही नहीं; स्त्रियाँ कठोर स्वभाववाली और सदा कटुवादिनी होंगी। उन्हें रोना ही अधिक पसंद होगा॥८०॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

भर्तॄणां वचने चैव न स्थास्यन्ति ततः स्त्रियः।
पुत्राश्च मातापितरौ हनिष्यन्ति युगक्षये ॥ ८१ ॥

मूलम्

भर्तॄणां वचने चैव न स्थास्यन्ति ततः स्त्रियः।
पुत्राश्च मातापितरौ हनिष्यन्ति युगक्षये ॥ ८१ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

वे पतिकी आज्ञामें नहीं रहेंगी। युगान्तकालमें पुत्र माता-पिताकी हत्या करेंगे॥८१॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूदयिष्यन्ति च पतीन् स्त्रियः पुत्रानपाश्रिताः।
अपर्वणि महाराज सूर्यं राहुरुपैष्यति ॥ ८२ ॥

मूलम्

सूदयिष्यन्ति च पतीन् स्त्रियः पुत्रानपाश्रिताः।
अपर्वणि महाराज सूर्यं राहुरुपैष्यति ॥ ८२ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

नारियाँ अपने बेटोंसे मिलकर पतिकी हत्या करा देंगी। महाराज! अमावस्याके बिना ही राहु सूर्यपर ग्रहण लगायेगा॥८२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

युगान्ते हुतभुक् चापि सर्वतः प्रज्वलिष्यति।
पानीयं भोजनं चापि याचमानास्तदाध्वगाः ॥ ८३ ॥
न लप्स्यन्ते निवासं च निरस्ताः पथि शेरते।

मूलम्

युगान्ते हुतभुक् चापि सर्वतः प्रज्वलिष्यति।
पानीयं भोजनं चापि याचमानास्तदाध्वगाः ॥ ८३ ॥
न लप्स्यन्ते निवासं च निरस्ताः पथि शेरते।

अनुवाद (हिन्दी)

युगान्तकाल आनेपर सब ओर आग भी जल उठेगी। उस समय पथिकोंको माँगनेपर कहीं अन्न, जल या ठहरनेके लिये स्थान नहीं मिलेगा। वे सब ओरसे कोरा जवाब पाकर निराश हो सड़कोंपर ही सो रहेंगे॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

निर्घातवायसा नागाः शकुनाः समृगद्विजाः ॥ ८४ ॥
रूक्षा वाचो विमोक्ष्यन्ति युगान्ते पर्युपस्थिते।
मित्रसम्बन्धिनश्चापि संत्यक्ष्यन्ति नरास्तदा ॥ ८५ ॥
जनं परिजनं चापि युगान्ते पर्युपस्थिते।

मूलम्

निर्घातवायसा नागाः शकुनाः समृगद्विजाः ॥ ८४ ॥
रूक्षा वाचो विमोक्ष्यन्ति युगान्ते पर्युपस्थिते।
मित्रसम्बन्धिनश्चापि संत्यक्ष्यन्ति नरास्तदा ॥ ८५ ॥
जनं परिजनं चापि युगान्ते पर्युपस्थिते।

अनुवाद (हिन्दी)

युगान्तकाल उपस्थित होनेपर बिजलीकी कड़कके समान कड़वी बोली बोलनेवाले कौवे, हाथी, शकुन, पशु और पक्षी आदि बड़ी कठोर वाणी बोलेंगे। उस समयके मनुष्य अपने मित्रों, सम्बन्धियों, सेवकों तथा कुटुम्बीजनोंको भी अकारण त्याग देंगे॥८४-८५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अथ देशान् दिशश्चापि पत्तनानि पुराणि च ॥ ८६ ॥
क्रमशः संश्रयिष्यन्ति युगान्ते पर्युपस्थिते।
हा तात हा सुतेत्येवं तदा वाचः सुदारुणाः ॥ ८७ ॥
विक्रोशमानश्चान्योन्यं जनो गां पर्यटिष्यति।
ततस्तुमुलसङ्घाते वर्तमाने युगक्षये ॥ ८८ ॥

मूलम्

अथ देशान् दिशश्चापि पत्तनानि पुराणि च ॥ ८६ ॥
क्रमशः संश्रयिष्यन्ति युगान्ते पर्युपस्थिते।
हा तात हा सुतेत्येवं तदा वाचः सुदारुणाः ॥ ८७ ॥
विक्रोशमानश्चान्योन्यं जनो गां पर्यटिष्यति।
ततस्तुमुलसङ्घाते वर्तमाने युगक्षये ॥ ८८ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

प्रायः लोग स्वदेश छोड़कर दूसरे देशों, दिशाओं, नगरों और गाँवोंका आश्रय लेंगे और हा तात! हा पुत्र! इत्यादि रूपसे अत्यन्त दुःखद वाणीमें एक-दूसरेको पुकारते हुए इस पृथ्वीपर विचरेंगे। युगान्तकालमें संसारकी यही दशा होगी। उस समय एक ही साथ समस्त लोकोंका भयंकर संहार होगा॥८६—८८॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

द्विजातिपूर्वको लोकः क्रमेण प्रभविष्यति।
ततः कालान्तरेऽन्यस्मिन् पुनर्लोकविवृद्धये ॥ ८९ ॥
भविष्यति पुनर्दैवमनुकूलं यदृच्छया ।
यदा सूर्यश्च चन्द्रश्च तथा तिष्यबृहस्पती ॥ ९० ॥
एकराशौ समेष्यन्ति प्रपत्स्यति तदा कृतम्।
कालवर्षी च पर्जन्यो नक्षत्राणि शुभानि च ॥ ९१ ॥

मूलम्

द्विजातिपूर्वको लोकः क्रमेण प्रभविष्यति।
ततः कालान्तरेऽन्यस्मिन् पुनर्लोकविवृद्धये ॥ ८९ ॥
भविष्यति पुनर्दैवमनुकूलं यदृच्छया ।
यदा सूर्यश्च चन्द्रश्च तथा तिष्यबृहस्पती ॥ ९० ॥
एकराशौ समेष्यन्ति प्रपत्स्यति तदा कृतम्।
कालवर्षी च पर्जन्यो नक्षत्राणि शुभानि च ॥ ९१ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

तदनन्तर कालान्तरमें सत्ययुगका आरम्भ होगा और फिर क्रमशः ब्राह्मण आदि वर्ण प्रकट होकर अपने प्रभावका विस्तार करेंगे। उस समय लोकके अभ्युदयके लिये पुनः अनायास दैव अनुकूल होगा। जब सूर्य, चन्द्रमा और बृहस्पति एक साथ पुष्य नक्षत्र एवं तदनुरूप एक राशि कर्कमें पदार्पण करेंगे, तब सत्ययुगका प्रारम्भ होगा। उस समय मेघ समयपर वर्षा करेगा। नक्षत्र शुभ एवं तेजस्वी हो जायँगे॥८९—९१॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

प्रदक्षिणा ग्रहाश्चापि भविष्यन्त्यनुलोमगाः ।
क्षेमं सुभिक्षमारोग्यं भविष्यति निरामयम् ॥ ९२ ॥

मूलम्

प्रदक्षिणा ग्रहाश्चापि भविष्यन्त्यनुलोमगाः ।
क्षेमं सुभिक्षमारोग्यं भविष्यति निरामयम् ॥ ९२ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

ग्रह प्रदक्षिणाभावसे अनुकूल गतिका आश्रय ले अपने पथपर अग्रसर होंगे। उस समय सबका मंगल होगा। देशमें सुकाल आ जायगा। आरोग्यका विस्तार होगा। तथा रोग-व्याधिका नाम भी नहीं रहेगा॥९२॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

कल्की विष्णुयशा नाम द्विजः कालप्रचोदितः।
उत्पत्स्यते महावीर्यो महाबुद्धिपराक्रमः ॥ ९३ ॥
सम्भूतः सम्भलग्रामे ब्राह्मणावसथे शुभे।
(महात्मा वृत्तसम्पन्नः प्रजानां हितकृन्नृप।)

मूलम्

कल्की विष्णुयशा नाम द्विजः कालप्रचोदितः।
उत्पत्स्यते महावीर्यो महाबुद्धिपराक्रमः ॥ ९३ ॥
सम्भूतः सम्भलग्रामे ब्राह्मणावसथे शुभे।
(महात्मा वृत्तसम्पन्नः प्रजानां हितकृन्नृप।)

अनुवाद (हिन्दी)

राजन्! युगान्तके समय कालकी प्रेरणासे सम्भल नामक ग्राममें किसी ब्राह्मणके मंगलमय गृहमें एक महान् शक्तिशाली बालक प्रकट होगा, जिसका नाम होगा विष्णुयशा कल्की। वह महान् बुद्धि एवं पराक्रमसे सम्पन्न महात्मा, सदाचारी तथा प्रजावर्गका हितैषी होगा। (वह बालक ही भगवान्‌का कल्की अवतार कहलायेगा)॥९३॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

मनसा तस्य सर्वाणि वाहनान्यायुधानि च ॥ ९४ ॥
उपस्थास्यन्ति योधाश्च शस्त्राणि कवचानि च।
स धर्मविजयी राजा चक्रवर्ती भविष्यति ॥ ९५ ॥

मूलम्

मनसा तस्य सर्वाणि वाहनान्यायुधानि च ॥ ९४ ॥
उपस्थास्यन्ति योधाश्च शस्त्राणि कवचानि च।
स धर्मविजयी राजा चक्रवर्ती भविष्यति ॥ ९५ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

मनके द्वारा चिन्तन करते ही उसके पास इच्छानुसार वाहन, अस्त्र-शस्त्र, योद्धा और कवच उपस्थित हो जायँगे। वह धर्मविजयी चक्रवर्ती राजा होगा॥९४-९५॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

स चेमं संकुलं लोकं प्रसादमुपनेष्यति।
उत्थितो ब्राह्मणो दीप्तः क्षयान्तकृदुदारधीः ॥ ९६ ॥

मूलम्

स चेमं संकुलं लोकं प्रसादमुपनेष्यति।
उत्थितो ब्राह्मणो दीप्तः क्षयान्तकृदुदारधीः ॥ ९६ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

वह उदारबुद्धि, तेजस्वी ब्राह्मण, दुःखसे व्याप्त हुए इस जगत्‌को आनन्द प्रदान करेगा। कलियुगका अन्त करनेके लिये ही उसका प्रादुर्भाव होगा॥९६॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

संक्षेपको हि सर्वस्य युगस्य परिवर्तकः।
स सर्वत्र गतान् क्षुद्रान् ब्राह्मणैः परिवारितः।
उत्सादयिष्यति तदा सर्वम्लेच्छगणान् द्विजः ॥ ९७ ॥

मूलम्

संक्षेपको हि सर्वस्य युगस्य परिवर्तकः।
स सर्वत्र गतान् क्षुद्रान् ब्राह्मणैः परिवारितः।
उत्सादयिष्यति तदा सर्वम्लेच्छगणान् द्विजः ॥ ९७ ॥

अनुवाद (हिन्दी)

वही सम्पूर्ण कलियुगका संहार करके नूतन सत्ययुगका प्रवर्तक होगा। वह ब्राह्मणोंसे घिरा हुआ सर्वत्र विचरेगा और भूमण्डलमें सर्वत्र फैले हुए नीच स्वभाववाले सम्पूर्ण म्लेच्छोंका संहार कर डालेगा॥९७॥

मूलम् (समाप्तिः)

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि भविष्यकथने नवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९० ॥

मूलम् (वचनम्)

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें भविष्यवर्णनविषयक एक सौ नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥१९०॥

सूचना (हिन्दी)

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका श्लोक मिलाकर कुल ९७ श्लोक हैं)