भागसूचना
अष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
सूचना (हिन्दी)
चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना
मूलम् (वचनम्)
वैशम्पायन उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
ततः स पुनरेवाथ मार्कण्डेयं यशस्विनम्।
पप्रच्छ विनयोपेतो धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ १ ॥
मूलम्
ततः स पुनरेवाथ मार्कण्डेयं यशस्विनम्।
पप्रच्छ विनयोपेतो धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ १ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तदनन्तर विनयशील धर्मराज युधिष्ठिरने यशस्वी मार्कण्डेय मुनिसे पुनः इस प्रकार प्रश्न किया—॥१॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
नैके युगसहस्रान्तास्त्वया दृष्टा महामुने।
न चापीह समः कश्चिदायुष्मान् दृश्यते तव ॥ २ ॥
मूलम्
नैके युगसहस्रान्तास्त्वया दृष्टा महामुने।
न चापीह समः कश्चिदायुष्मान् दृश्यते तव ॥ २ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘महामुने! आपने हजार-हजार युगोंके अन्तमें होनेवाले अनेक महाप्रलयके दृश्य देखे हैं। इस संसारमें आपके समान बड़ी आयुवाला दूसरा कोई पुरुष नहीं दिखायी देता॥२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
वर्जयित्वा महात्मानं ब्रह्माणं परमेष्ठिनम्।
न तेऽस्ति सदृशः कश्चिदायुषा ब्रह्मवित्तम ॥ ३ ॥
मूलम्
वर्जयित्वा महात्मानं ब्रह्माणं परमेष्ठिनम्।
न तेऽस्ति सदृशः कश्चिदायुषा ब्रह्मवित्तम ॥ ३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे! परमेष्ठी महात्मा ब्रह्माजीको छोड़कर दूसरा कोई आपके समान दीर्घायु नहीं है॥३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अनन्तरिक्षे लोकेऽस्मिन् देवदानववर्जिते ।
त्वमेव प्रलये विप्र ब्रह्माणमुपतिष्ठसे ॥ ४ ॥
मूलम्
अनन्तरिक्षे लोकेऽस्मिन् देवदानववर्जिते ।
त्वमेव प्रलये विप्र ब्रह्माणमुपतिष्ठसे ॥ ४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
ब्रह्मन्! जब यह संसार देवता, दानव तथा अन्तरिक्ष आदि लोकोंसे शून्य हो जाता है उस प्रलयकालमें केवल आप ही ब्रह्माजीके पास रहकर उनकी उपासना करते हैं॥४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
प्रलये चापि निर्वृत्ते प्रबुद्धे च पितामहे।
त्वमेकः सृज्यमानानि भूतानीह प्रपश्यसि ॥ ५ ॥
चतुर्विधानि विप्रर्षे यथावत् परमेष्ठिना।
वायुभूता दिशः कृत्वा विक्षिप्यापस्ततस्ततः ॥ ६ ॥
मूलम्
प्रलये चापि निर्वृत्ते प्रबुद्धे च पितामहे।
त्वमेकः सृज्यमानानि भूतानीह प्रपश्यसि ॥ ५ ॥
चतुर्विधानि विप्रर्षे यथावत् परमेष्ठिना।
वायुभूता दिशः कृत्वा विक्षिप्यापस्ततस्ततः ॥ ६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
ब्रह्मर्षे! फिर प्रलयकाल व्यतीत होनेपर जब पितामह ब्रह्मा जागते हैं, तब सम्पूर्ण दिशाओंमें वायुको फैलाकर उसके द्वारा समस्त जलराशिको इधर-उधर छितराकर (सूखे स्थानोंमें) ब्रह्माजीके द्वारा जो जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज नामक चार प्रकारके प्राणी रचे जाते हैं, उन्हें एकमात्र आप ही (सबसे पहले) अच्छी तरह देख पाते हैं॥५-६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
त्वया लोकगुरुः साक्षात् सर्वलोकपितामहः।
आराधितो द्विजश्रेष्ठ तत्परेण समाधिना ॥ ७ ॥
स्वप्रमाणमथो विप्र त्वया कृतमनेकशः।
घोरेणाविश्य तपसा वेधसो निर्जितास्त्वया ॥ ८ ॥
मूलम्
त्वया लोकगुरुः साक्षात् सर्वलोकपितामहः।
आराधितो द्विजश्रेष्ठ तत्परेण समाधिना ॥ ७ ॥
स्वप्रमाणमथो विप्र त्वया कृतमनेकशः।
घोरेणाविश्य तपसा वेधसो निर्जितास्त्वया ॥ ८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
द्विजश्रेष्ठ! आपने तत्परतापूर्वक चित्तवृत्तियोंका निरोध करके सम्पूर्ण लोकोंके पितामह साक्षात् लोकगुरु ब्रह्माजीकी आराधना की है। विप्रवर! आपने अनेक बार इस जगत्की प्रारम्भिक सृष्टिको प्रत्यक्ष किया है और घोर तपस्याद्वारा (मरीचि आदि) प्रजापतियोंको भी जीत लिया है॥७-८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
नारायणाङ्कप्रख्यस्त्वं साम्परायेऽतिपठ्यसे ।
भगवाननेकशः कृत्वा त्वया विष्णोश्च विश्वकृत् ॥ ९ ॥
कर्णिकोद्धरणं दिव्यं ब्रह्मणः कामरूपिणः।
रत्नालंकारयोगाभ्यां दृग्भ्यां दुष्टस्त्वया पुरा ॥ १० ॥
मूलम्
नारायणाङ्कप्रख्यस्त्वं साम्परायेऽतिपठ्यसे ।
भगवाननेकशः कृत्वा त्वया विष्णोश्च विश्वकृत् ॥ ९ ॥
कर्णिकोद्धरणं दिव्यं ब्रह्मणः कामरूपिणः।
रत्नालंकारयोगाभ्यां दृग्भ्यां दुष्टस्त्वया पुरा ॥ १० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
आप भगवान् नारायणके समीप रहनेवाले भक्तोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं। परलोकमें आपकी महिमाका सर्वत्र गान होता है। आपने पहले स्वेच्छासे प्रकट होनेवाले सर्वव्यापक ब्रह्मकी उपलब्धिके स्थानभूत हृदयकमलकी कर्णिकाका (योगकी कलासे) अलौकिक उद्घाटन कर वैराग्य और अभ्याससे प्राप्त हुई दिव्य दृष्टिद्वारा विश्वरचयिता भगवान्का अनेक बार साक्षात्कार किया है॥९-१०॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तस्मात् तवान्तको मृत्युर्जरा वा देहनाशिनी।
न त्वां विशति विप्रर्षे प्रसादात् परमेष्ठिनः ॥ ११ ॥
मूलम्
तस्मात् तवान्तको मृत्युर्जरा वा देहनाशिनी।
न त्वां विशति विप्रर्षे प्रसादात् परमेष्ठिनः ॥ ११ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
इसीलिये सबको मारनेवाली मृत्यु तथा शरीरको जर्जर बना देनेवाली जरा आपका स्पर्श नहीं करती है। ब्रह्मर्षे! इसमें भगवान् परमेष्ठीका कृपाप्रसाद ही कारण है॥११॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
यदा नैवं रविर्नाग्निर्न वायुर्न च चन्द्रमाः।
नैवान्तरिक्षं नैवोर्वी शेषं भवति किंचन ॥ १२ ॥
तस्मिन्नेकार्णवे लोके नष्टे स्थावरजङ्गमे।
नष्टे देवासुरगणे समुत्सन्नमहोरगे ॥ १३ ॥
शयानममितात्मानं पद्मोत्पलनिकेतनम् ।
त्वमेकः सर्वभूतेशं ब्रह्माणमुपतिष्ठसि ॥ १४ ॥
मूलम्
यदा नैवं रविर्नाग्निर्न वायुर्न च चन्द्रमाः।
नैवान्तरिक्षं नैवोर्वी शेषं भवति किंचन ॥ १२ ॥
तस्मिन्नेकार्णवे लोके नष्टे स्थावरजङ्गमे।
नष्टे देवासुरगणे समुत्सन्नमहोरगे ॥ १३ ॥
शयानममितात्मानं पद्मोत्पलनिकेतनम् ।
त्वमेकः सर्वभूतेशं ब्रह्माणमुपतिष्ठसि ॥ १४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
(महाप्रलयके समय) जब सूर्य, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, अन्तरिक्ष और पृथ्वी आदिमेंसे कोई भी शेष नहीं रह जाता, समस्त चराचर जगत् उस एकार्णवके जलमें डूबकर अदृश्य हो जाता है, देवता और असुर नष्ट हो जाते हैं तथा बड़े-बड़े नागोंका संहार हो जाता है, उस समय कमल और उत्पलमें निवास तथा शयन करनेवाले सर्वभूतेश्वर अमितात्मा ब्रह्माजीके पास रहकर केवल आप ही उनकी उपासना करते हैं॥१२—१४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
एतत् प्रत्यक्षतः सर्वं पूर्वं वृत्तं द्विजोत्तम।
तस्मादिच्छाम्यहं श्रोतुं सर्वहेत्वात्मिकां कथाम् ॥ १५ ॥
मूलम्
एतत् प्रत्यक्षतः सर्वं पूर्वं वृत्तं द्विजोत्तम।
तस्मादिच्छाम्यहं श्रोतुं सर्वहेत्वात्मिकां कथाम् ॥ १५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
द्विजोत्तम! यह सारा पुरातन इतिहास आपका प्रत्यक्ष देखा हुआ है। इसलिये मैं आपके मुखसे सबके हेतुभूत कालका निरूपण करनेवाली कथा सुनना चाहता हूँ॥१५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अनुभूतं हि बहुशस्त्वयैकेन द्विजोत्तम।
न तेऽस्त्यविदितं किंचित् सर्वलोकेषु नित्यदा ॥ १६ ॥
मूलम्
अनुभूतं हि बहुशस्त्वयैकेन द्विजोत्तम।
न तेऽस्त्यविदितं किंचित् सर्वलोकेषु नित्यदा ॥ १६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
विप्रवर! केवल आपने ही अनेक कल्पोंकी श्रेष्ठ रचनाका बहुत बार अनुभव किया है। सम्पूर्ण लोकोंमें कभी कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो आपको ज्ञात न हो’॥१६॥
मूलम् (वचनम्)
मार्कण्डेय उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
हन्त ते वर्णयिष्यामि नमस्कृत्वा स्वयम्भुवे।
पुरुषाय पुराणाय शाश्वतायाव्ययाय च ॥ १७ ॥
अव्यक्ताय सुसूक्ष्माय निर्गुणाय गुणात्मने।
स एष पुरुषव्याघ्र पीतवासा जनार्दनः ॥ १८ ॥
एष कर्ता विकर्ता च भूतात्मा भूतकृत् प्रभुः।
अचिन्त्यं महदाश्चर्यं पवित्रमिति चोच्यते ॥ १९ ॥
मूलम्
हन्त ते वर्णयिष्यामि नमस्कृत्वा स्वयम्भुवे।
पुरुषाय पुराणाय शाश्वतायाव्ययाय च ॥ १७ ॥
अव्यक्ताय सुसूक्ष्माय निर्गुणाय गुणात्मने।
स एष पुरुषव्याघ्र पीतवासा जनार्दनः ॥ १८ ॥
एष कर्ता विकर्ता च भूतात्मा भूतकृत् प्रभुः।
अचिन्त्यं महदाश्चर्यं पवित्रमिति चोच्यते ॥ १९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
मार्कण्डेयजी बोले— राजन्! मैं स्वयं प्रकट होनेवाले सनातन, अविनाशी, अव्यक्त, सूक्ष्म, निर्गुण एवं गुणस्वरूप पुराणपुरुषको नमस्कार करके तुम्हें वह कथा अभी सुनाता हूँ। पुरुषसिंह! ये जो हमलोगोंके पास बैठे हुए पीताम्बरधारी भगवान् जनार्दन हैं, ये ही संसारकी सृष्टि और संहार करनेवाले हैं। ये ही भगवान् समस्त प्राणियोंके अन्तर्यामी आत्मा और उनके रचयिता हैं। ये पवित्र, अचिन्त्य एवं महान् आश्चर्यमय तत्त्व कहे जाते हैं॥१७—१९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अनादिनिधनं भूतं विश्वमव्ययमक्षयम् ।
एष कर्ता न क्रियते कारणं चापि पौरुषे ॥ २० ॥
मूलम्
अनादिनिधनं भूतं विश्वमव्ययमक्षयम् ।
एष कर्ता न क्रियते कारणं चापि पौरुषे ॥ २० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
इनका न आदि है, न अन्त। ये सर्वभूतस्वरूप, अव्यय और अक्षय हैं। ये ही सबके कर्ता हैं, इनका कोई कर्ता नहीं है। पुरुषार्थकी प्राप्तिमें भी ये ही कारण हैं॥२०॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
यद्येष पुरुषो वेद वेदा अपि न तं विदुः।
सर्वमाश्चर्यमेवैतन्निवृत्तं राजसत्तम ॥ २१ ॥
आदितो मनुजव्याघ्र कृत्स्नस्य जगतः क्षये।
मूलम्
यद्येष पुरुषो वेद वेदा अपि न तं विदुः।
सर्वमाश्चर्यमेवैतन्निवृत्तं राजसत्तम ॥ २१ ॥
आदितो मनुजव्याघ्र कृत्स्नस्य जगतः क्षये।
अनुवाद (हिन्दी)
ये अन्तर्यामी आत्मा होनेसे सबको जानते हैं, परंतु इन्हें वेद भी नहीं जानते। नृपशिरोमणे! नरश्रेष्ठ! सम्पूर्ण जगत्का प्रलय होनेके पश्चात् इन आदिभूत परमेश्वरसे ही यह सम्पूर्ण आश्चर्यमय जगत् पुनः उत्पन्न हो जाता है॥२१॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
चत्वार्याहुः सहस्राणि वर्षाणां तत् कृतं युगम् ॥ २२ ॥
तस्य तावच्छती संध्या संध्यांशश्च तथाविधः।
मूलम्
चत्वार्याहुः सहस्राणि वर्षाणां तत् कृतं युगम् ॥ २२ ॥
तस्य तावच्छती संध्या संध्यांशश्च तथाविधः।
अनुवाद (हिन्दी)
चार हजार दिव्य वर्षोंका एक सत्ययुग बताया गया है, उतने ही सौ वर्ष उसकी संध्या और संध्यांशके होते हैं (इस प्रकार कुल अड़तालीस सौ दिव्य वर्ष सत्ययुगके हैं)॥२२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
त्रीणि वर्षसहस्राणि त्रेतायुगमिहोच्यते ॥ २३ ॥
तस्य तावच्छती संध्या संध्यांशश्च ततः परम्।
मूलम्
त्रीणि वर्षसहस्राणि त्रेतायुगमिहोच्यते ॥ २३ ॥
तस्य तावच्छती संध्या संध्यांशश्च ततः परम्।
अनुवाद (हिन्दी)
तीन हजार दिव्य वर्षोंका त्रेतायुग बताया जाता है, उसकी संध्या और संध्यांशके भी उतने ही (तीन-तीन) सौ दिव्य वर्ष होते हैं (इस तरह यह युग छत्तीस सौ दिव्य वर्षोंका होता है)॥२३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तथा वर्षसहस्रे द्वे द्वापरं परिमाणतः ॥ २४ ॥
तस्यापि द्विशती संध्या संध्यांशश्च तथाविधः।
मूलम्
तथा वर्षसहस्रे द्वे द्वापरं परिमाणतः ॥ २४ ॥
तस्यापि द्विशती संध्या संध्यांशश्च तथाविधः।
अनुवाद (हिन्दी)
द्वापरका मान दो हजार दिव्य वर्ष है तथा उतने ही सौ दिव्य वर्ष उसकी संध्या और संध्यांशके हैं (अतः सब मिलकर चौबीस सौ दिव्य वर्ष द्वापरके हैं)॥२४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
सहस्रमेकं वर्षाणां ततः कलियुगं स्मृतम् ॥ २५ ॥
तस्य वर्षशतं संधिः संध्यांशश्च ततः परम्।
संधिसंध्यांशयोस्तुल्यं प्रमाणमुपधारय ॥ २६ ॥
मूलम्
सहस्रमेकं वर्षाणां ततः कलियुगं स्मृतम् ॥ २५ ॥
तस्य वर्षशतं संधिः संध्यांशश्च ततः परम्।
संधिसंध्यांशयोस्तुल्यं प्रमाणमुपधारय ॥ २६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
तदनन्तर एक हजार दिव्य वर्ष कलियुगका मान कहा गया है, सौ वर्ष उसकी संध्याके और सौ वर्ष संध्यांशके बताये गये हैं (इस प्रकार कलियुग बारह सौ दिव्य वर्षोंका होता है)। संध्या और संध्यांशका मान बराबर-बराबर ही समझो॥२५-२६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
क्षीणे कलियुगे चैव प्रवर्तेत कृतं युगम्।
एषा द्वादशसाहस्री युगाख्या परिकीर्त्तिता ॥ २७ ॥
मूलम्
क्षीणे कलियुगे चैव प्रवर्तेत कृतं युगम्।
एषा द्वादशसाहस्री युगाख्या परिकीर्त्तिता ॥ २७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
कलियुगके क्षीण हो जानेपर पुनः सत्ययुगका आरम्भ होता है। इस तरह बारह हजार दिव्य वर्षोंकी एक चतुर्युगी बतायी गयी है॥२७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
एतत् सहस्रपर्यन्तमहो ब्राह्ममुदाहृतम् ।
विश्वं हि ब्रह्मभवने सर्वतः परिवर्त्तते ॥ २८ ॥
लोकानां मनुजव्याघ्र प्रलयं तं विदुर्बुधाः।
मूलम्
एतत् सहस्रपर्यन्तमहो ब्राह्ममुदाहृतम् ।
विश्वं हि ब्रह्मभवने सर्वतः परिवर्त्तते ॥ २८ ॥
लोकानां मनुजव्याघ्र प्रलयं तं विदुर्बुधाः।
अनुवाद (हिन्दी)
नरश्रेष्ठ! एक हजार चतुर्युग बीतनेपर ब्रह्माजीका एक दिन होता है। यह सारा जगत् ब्रह्माके दिनभर ही रहता है (और वह दिन समाप्त होते ही नष्ट हो जाता है।) इसीको विद्वान् पुरुष लोकोंका प्रलय मानते हैं॥२८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अल्पावशिष्टे तु तदा चुगान्ते भरतर्षभ ॥ २९ ॥
सहस्रान्ते नराः सर्वे प्रायशोऽनृतवादिनः।
यज्ञप्रतिनिधिः पार्थ दानप्रतिनिधिस्तथा ॥ ३० ॥
व्रतप्रतिनिधिश्चैव तस्मिन् काले प्रवर्तते।
मूलम्
अल्पावशिष्टे तु तदा चुगान्ते भरतर्षभ ॥ २९ ॥
सहस्रान्ते नराः सर्वे प्रायशोऽनृतवादिनः।
यज्ञप्रतिनिधिः पार्थ दानप्रतिनिधिस्तथा ॥ ३० ॥
व्रतप्रतिनिधिश्चैव तस्मिन् काले प्रवर्तते।
अनुवाद (हिन्दी)
भरतश्रेष्ठ! सहस्र युगकी समाप्तिमें जब थोड़ा-सा ही समय शेष रह जाता है, उस समय कलियुगके अन्तिम भागमें प्रायः सभी मनुष्य मिथ्यावादी हो जाते हैं। पार्थ! उस समय यज्ञ, दान और व्रतके प्रतिनिधि कर्म चालू हो जाते हैं अर्थात् यज्ञ, दान, तप मुख्य विधिसे न होकर गौण विधिसे नाममात्र होने लगते हैं॥२९-३०॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
ब्राह्मणाः शूद्रकर्माणस्तथा शूद्रा धनार्जकाः ॥ ३१ ॥
क्षत्रधर्मेण वाप्यत्र वर्तयन्ति गते युगे।
मूलम्
ब्राह्मणाः शूद्रकर्माणस्तथा शूद्रा धनार्जकाः ॥ ३१ ॥
क्षत्रधर्मेण वाप्यत्र वर्तयन्ति गते युगे।
अनुवाद (हिन्दी)
युगकी समाप्तिके समय ब्राह्मण शूद्रोंके कर्म करते हैं और शूद्र वैश्योंकी भाँति धनोपार्जन करने लगते हैं अथवा क्षत्रियोंके कर्मसे जीविका चलाने लगते हैं॥३१॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
निवृत्तयज्ञस्वाध्याया दण्डाजिनविवर्जिताः ॥ ३२ ॥
ब्राह्मणाः सर्वभक्षाश्च भविष्यन्ति कलौ युगे।
अजपा ब्राह्मणास्तात शूद्रा जपपरायणाः ॥ ३३ ॥
मूलम्
निवृत्तयज्ञस्वाध्याया दण्डाजिनविवर्जिताः ॥ ३२ ॥
ब्राह्मणाः सर्वभक्षाश्च भविष्यन्ति कलौ युगे।
अजपा ब्राह्मणास्तात शूद्रा जपपरायणाः ॥ ३३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
(सहस्र चतुर्युगके अन्तिम) कलियुगके अन्तिम भागमें ब्राह्मण यज्ञ, स्वाध्याय, दण्ड और मृगचर्मका त्याग कर देंगे और (भक्ष्याभक्ष्यका विचार छोड़कर) सब कुछ खाने-पीनेवाले हो जायँगे। तात! ब्राह्मण तो जपसे दूर भागेंगे और शूद्र वैदिक मन्त्रोंके जपमें संलग्न होंगे॥३२-३३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
विपरीते तदा लोके पूर्वरूपं क्षयस्य तत्।
बहवो म्लेच्छराजानः पृथिव्यां मनुजाधिप ॥ ३४ ॥
मूलम्
विपरीते तदा लोके पूर्वरूपं क्षयस्य तत्।
बहवो म्लेच्छराजानः पृथिव्यां मनुजाधिप ॥ ३४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
नरेश्वर! इस प्रकार जब लोगोंके विचार और व्यवहार विपरीत हो जाते हैं, तब प्रलयका पूर्वरूप आरम्भ हो जाता है। उस समय इस पृथ्वीपर बहुत-से म्लेच्छ राजा राज्य करने लगते हैं॥३४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
मृषानुशासिनः पापा मृषावादपरायणाः ।
आन्ध्राः शकाः पुलिन्दाश्च यवनाश्च नराधिपाः ॥ ३५ ॥
काम्बोजा बाह्लिकाः शूरास्तथाऽऽभीरा नरोत्तम।
न तदा ब्राह्मणः कश्चित् स्वधर्ममुपजीवति ॥ ३६ ॥
मूलम्
मृषानुशासिनः पापा मृषावादपरायणाः ।
आन्ध्राः शकाः पुलिन्दाश्च यवनाश्च नराधिपाः ॥ ३५ ॥
काम्बोजा बाह्लिकाः शूरास्तथाऽऽभीरा नरोत्तम।
न तदा ब्राह्मणः कश्चित् स्वधर्ममुपजीवति ॥ ३६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
छलसे शासन करनेवाले, पापी और असत्यवादी आन्ध्र, शक, पुलिन्द, यवन, काम्बोज, बाह्लीक तथा शौर्यसम्पन्न आभीर इस देशके राजा होंगे। नरश्रेष्ठ! उस समय कोई ब्राह्मण अपने धर्मके अनुसार जीविका चलानेवाला न होगा॥३५-३६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
क्षत्रियाश्चापि वैश्याश्च विकर्मस्था नराधिप।
अल्पायुषः स्वल्पबलाः स्वल्पवीर्यपराक्रमाः ॥ ३७ ॥
मूलम्
क्षत्रियाश्चापि वैश्याश्च विकर्मस्था नराधिप।
अल्पायुषः स्वल्पबलाः स्वल्पवीर्यपराक्रमाः ॥ ३७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
नरेश्वर! क्षत्रिय और वैश्य भी अपना-अपना धर्म छोड़कर दूसरे वर्णोंके कर्म करने लगेंगे। सबकी आयु कम होगी, सबके बल, वीर्य और पराक्रम घट जायँगे॥३७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अल्पसाराल्पदेहाश्च तथा सत्याल्पभाषिणः ।
बहुशून्या जनपदा मृगव्यालावृता दिशः ॥ ३८ ॥
युगान्ते समनुप्राप्ते वृथा च ब्रह्मवादिनः।
भोवादिनस्तथा शूद्रा ब्राह्मणाश्चार्यवादिनः ॥ ३९ ॥
मूलम्
अल्पसाराल्पदेहाश्च तथा सत्याल्पभाषिणः ।
बहुशून्या जनपदा मृगव्यालावृता दिशः ॥ ३८ ॥
युगान्ते समनुप्राप्ते वृथा च ब्रह्मवादिनः।
भोवादिनस्तथा शूद्रा ब्राह्मणाश्चार्यवादिनः ॥ ३९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
मनुष्य नाटे कदके होंगे। उनकी शरीरिक शक्ति बहुत कम हो जायगी और उनकी बातोंमें सत्यका अंश बहुत कम होगा। बहुधा सारे जनपद जनशून्य होंगे। सम्पूर्ण दिशाएँ पशुओं और सर्पोंसे भरी होंगी। युगान्तकाल उपस्थित होनेपर अधिकांश मनुष्य (अनुभव न होते हुए भी) वृथा ही ब्रह्मज्ञानकी बातें कहेंगे। शूद्र द्विजातियोंको भो (ऐ) कहकर पुकारेंगे और ब्राह्मणलोग शूद्रोंको आर्य अर्थात् आप कहकर सम्बोधन करेंगे॥३८-३९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
युगान्ते मनुजव्याघ्र भवन्ति बहुजन्तवः।
न तथा घ्राणयुक्ताश्च सर्वगन्धा विशाम्पते ॥ ४० ॥
मूलम्
युगान्ते मनुजव्याघ्र भवन्ति बहुजन्तवः।
न तथा घ्राणयुक्ताश्च सर्वगन्धा विशाम्पते ॥ ४० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
पुरुषसिंह राजन्! युगान्तकालमें बहुतसे जीव-जन्तु उत्पन्न हो जायँगे। सब प्रकारके सुगन्धित पदार्थ नासिकाको उतने गन्धयुक्त नहीं प्रतीत होंगे॥४०॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
रसाश्च मनुजव्याघ्र न तथा स्वादुयोगिनः।
बहुप्रजा ह्रस्वदेहाः शीलाचारविवर्जिताः ।
मुखे भगाः स्त्रियो राजन् भविष्यन्ति युगक्षये ॥ ४१ ॥
अट्टशूला जनपदाः शिवशूलाश्चतुष्पथाः ।
केशशूलाः स्त्रियो राजन् भविष्यन्ति युगक्षये ॥ ४२ ॥
मूलम्
रसाश्च मनुजव्याघ्र न तथा स्वादुयोगिनः।
बहुप्रजा ह्रस्वदेहाः शीलाचारविवर्जिताः ।
मुखे भगाः स्त्रियो राजन् भविष्यन्ति युगक्षये ॥ ४१ ॥
अट्टशूला जनपदाः शिवशूलाश्चतुष्पथाः ।
केशशूलाः स्त्रियो राजन् भविष्यन्ति युगक्षये ॥ ४२ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
नरव्याघ्र! इसी प्रकार रसीले पदार्थभी जैसे चाहिये वैसे स्वादिष्ट नहीं होंगे। राजन्! उस समयकी स्त्रियाँ नाटे कदकी और बहुत संतान (बच्चा) पैदा करनेवाली होंगी। उनमें शील और सदाचारका अभाव होगा। युगान्तकालमें स्त्रियाँ मुखसे भगसम्बन्धी यानी व्यभिचारकी ही बातें करनेवाली होंगी। राजन्! युगान्त-कालमें हर देशके लोग अन्न बेचनेवाले होंगे। ब्राह्मण वेद बेचनेवाले तथा (प्रायः) स्त्रियाँ वेश्यावृत्तिको अपनानेवाली होंगी1॥४१-४२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अल्पक्षीरास्तथा गावो भविष्यन्ति जनाधिप।
अल्पपुष्पफलाश्चापि पादपा बहुवायसाः ॥ ४३ ॥
ब्रह्मवध्यानुलिप्तानां तथा मिथ्याभिशंसिनाम् ।
नृपाणां पृथिवीपाल प्रतिगृह्णन्ति वै द्विजाः ॥ ४४ ॥
मूलम्
अल्पक्षीरास्तथा गावो भविष्यन्ति जनाधिप।
अल्पपुष्पफलाश्चापि पादपा बहुवायसाः ॥ ४३ ॥
ब्रह्मवध्यानुलिप्तानां तथा मिथ्याभिशंसिनाम् ।
नृपाणां पृथिवीपाल प्रतिगृह्णन्ति वै द्विजाः ॥ ४४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
जनेश्वर! युगान्तकालमें गायोंके थनोंमें बहुत कम दूध होगा। वृक्षपर फल और फूल बहुत कम होंगे और उनपर (अच्छे पक्षियोंकी अपेक्षा) कौए ही अधिक बसेरे लेंगे। भूपाल! ब्राह्मणलोग (लोभवश) ब्रह्महत्या-जैसे पापोंसे लिप्त और मिथ्यावादी नरेशोंसे ही दान-दक्षिणा लेंगे॥४३-४४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
लोभमोहपरीताश्च मिथ्याधर्मध्वजावृताः ।
भिक्षार्थं पृथिवीपाल चञ्चूर्यन्ते द्विजैर्दिशः ॥ ४५ ॥
मूलम्
लोभमोहपरीताश्च मिथ्याधर्मध्वजावृताः ।
भिक्षार्थं पृथिवीपाल चञ्चूर्यन्ते द्विजैर्दिशः ॥ ४५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
राजन्! वे ब्राह्मण लोभ और मोहमें फँसकर झूठे धर्मका ढोंग रचनेवाले होंगे, इतना ही नहीं, वे भिक्षाके लिये सारी दिशाओंके लोगोंको पीड़ित करते रहेंगे॥४५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
करभारभयाद् भीता गृहस्थाः परिमोषकाः।
मुनिच्छद्माकृतिच्छन्ना वाणिज्यमुपजीविनः ॥ ४६ ॥
मिथ्या च नखरोमाणि धारयन्ति तदा द्विजाः।
मूलम्
करभारभयाद् भीता गृहस्थाः परिमोषकाः।
मुनिच्छद्माकृतिच्छन्ना वाणिज्यमुपजीविनः ॥ ४६ ॥
मिथ्या च नखरोमाणि धारयन्ति तदा द्विजाः।
अनुवाद (हिन्दी)
गृहस्थलोग करके भारसे डरकर लुटेरे बन जायँगे। ब्राह्मण मुनियों-जैसी कपटपूर्ण आकृति धारण किये वैश्यवृत्तिसे जीविका चलायेंगे और झूठे दिखावेके लिये नख तथा दाढ़ी-मूछ धारण करेंगे॥४६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अर्थलोभान्नरव्याघ्र तथा च ब्रह्मचारिणः ॥ ४७ ॥
आश्रमेषु वृथाचाराः पानपा गुरुतल्पगाः।
इह लौकिकमीहन्ते मांसशोणितवर्धनम् ॥ ४८ ॥
मूलम्
अर्थलोभान्नरव्याघ्र तथा च ब्रह्मचारिणः ॥ ४७ ॥
आश्रमेषु वृथाचाराः पानपा गुरुतल्पगाः।
इह लौकिकमीहन्ते मांसशोणितवर्धनम् ॥ ४८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
नरश्रेष्ठ! धनके लोभसे ब्रह्मचारी भी आश्रमोंमें दम्भपूर्ण आचारको अपनायेंगे और मद्यपान करके गुरुपत्नीगमन करेंगे। लोग अपने शरीरके मांस और रक्त बढ़ानेवाले इहलौकिक कर्मोंमें ही लगे रहेंगे॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
बहुपाषण्डसंकीर्णाः परान्नगुणवादिनः ।
आश्रमा मनुजव्याघ्र भविष्यन्ति युगक्षये ॥ ४९ ॥
मूलम्
बहुपाषण्डसंकीर्णाः परान्नगुणवादिनः ।
आश्रमा मनुजव्याघ्र भविष्यन्ति युगक्षये ॥ ४९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
नरश्रेष्ठ! युगान्तकालमें सभी आश्रम अनेक प्रकारके पाखण्डोंसे व्याप्त और दूसरोंसे मिले हुए भोजनका ही गुणगान करनेवाले होंगे॥४९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
यथर्तुवर्षी भगवान् न तथा पाकशासनः।
न चापि सर्वबीजानि सम्यग् रोहन्ति भारत ॥ ५० ॥
मूलम्
यथर्तुवर्षी भगवान् न तथा पाकशासनः।
न चापि सर्वबीजानि सम्यग् रोहन्ति भारत ॥ ५० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
भगवान् इन्द्र भी ठीक वर्षाऋतुके समय जलकी वर्षा नहीं करेंगे। भारत! भूमिमें बोये हुए सभी बीज ठीकसे नहीं जमेंगे॥५०॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
हिंसाभिरामश्च जनस्तथा सम्पद्यतेऽशुचिः ।
अधर्मफलमत्यर्थं तदा भवति चानघ ॥ ५१ ॥
मूलम्
हिंसाभिरामश्च जनस्तथा सम्पद्यतेऽशुचिः ।
अधर्मफलमत्यर्थं तदा भवति चानघ ॥ ५१ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
कलियुगमें सब लोग हिंसामें ही सुख माननेवाले तथा अपवित्र रहेंगे। निष्पाप! उस समय अधर्मका फल बहुत अधिक मात्रामें मिलेगा॥५१॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तदा च पृथिवीपाल यो भवेद् धर्मसंयुतः।
अल्पायुः स हि मन्तव्यो न हि धर्मोऽस्ति कश्चन॥५२॥
मूलम्
तदा च पृथिवीपाल यो भवेद् धर्मसंयुतः।
अल्पायुः स हि मन्तव्यो न हि धर्मोऽस्ति कश्चन॥५२॥
अनुवाद (हिन्दी)
भूपाल! उस समय जो भी धर्ममें तत्पर रहेगा, उसकी आयु बहुत थोड़ी देखनेमें आयेगी; क्योंकि उस समय कोई भी धर्म टिक नहीं सकेगा॥५२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
भूयिष्ठं कूटमानैश्च पण्यं विक्रीणते जनाः।
वणिजश्च नरव्याघ्र बहुमाया भवन्त्युत ॥ ५३ ॥
मूलम्
भूयिष्ठं कूटमानैश्च पण्यं विक्रीणते जनाः।
वणिजश्च नरव्याघ्र बहुमाया भवन्त्युत ॥ ५३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
लोग बाजारमें झूठे माप-तौल बनाकर बहुत-सा माल बेचते रहेंगे। नरश्रेष्ठ! उस समयके बनिये भी बहुत माया जाननेवाले (धूर्त) होंगे॥५३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
धर्मिष्ठाः परिहीयन्ते पापीयान् वर्धते जनः।
धर्मस्य बलहानिः स्यादधर्मश्च बली तथा ॥ ५४ ॥
मूलम्
धर्मिष्ठाः परिहीयन्ते पापीयान् वर्धते जनः।
धर्मस्य बलहानिः स्यादधर्मश्च बली तथा ॥ ५४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
धर्मात्मा पुरुष हानि उठाते दीखेंगे और बड़े-बड़े पापी लौकिक दृष्टिसे उन्नतिशील होंगे। धर्मका बल घटेगा और अधर्म बलवान् होगा॥५४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अल्पायुषो दरिद्राश्च धर्मिष्ठा मानवास्तथा।
दीर्घायुषः समृद्धाश्च विधर्माणो युगक्षये ॥ ५५ ॥
मूलम्
अल्पायुषो दरिद्राश्च धर्मिष्ठा मानवास्तथा।
दीर्घायुषः समृद्धाश्च विधर्माणो युगक्षये ॥ ५५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
युगान्तकालमें धर्मिष्ठ मानव अल्पायु तथा दरिद्र देखे जायँगे और अधर्मी मनुष्य दीर्घायु तथा समृद्धिशाली देखे जायँगे॥५५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
नगराणां विहारेषु विधर्माणो युगक्षये।
अधर्मिष्ठैरुपायैश्च प्रजा व्यवहरन्त्युत ॥ ५६ ॥
मूलम्
नगराणां विहारेषु विधर्माणो युगक्षये।
अधर्मिष्ठैरुपायैश्च प्रजा व्यवहरन्त्युत ॥ ५६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
युगान्तके समय नगरोंके उद्यानोंमें पापी पुरुष अड्डा जमायेंगे और पापपूर्ण उपायोंद्वारा प्रजाके साथ दुर्व्यवहार करेंगे॥५६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
संचयेन तथाल्पेन भवन्त्याढ्यमदान्विताः ।
धनं विश्वासतो न्यस्तं मिथो भूयिष्ठशो नराः ॥ ५७ ॥
हर्तुं व्यवसिता राजन् पापाचारसमन्विताः।
नैतदस्तीति मनुजा वर्तन्ते निरपत्रपाः ॥ ५८ ॥
मूलम्
संचयेन तथाल्पेन भवन्त्याढ्यमदान्विताः ।
धनं विश्वासतो न्यस्तं मिथो भूयिष्ठशो नराः ॥ ५७ ॥
हर्तुं व्यवसिता राजन् पापाचारसमन्विताः।
नैतदस्तीति मनुजा वर्तन्ते निरपत्रपाः ॥ ५८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
राजन्! थोड़ेसे धनका संग्रह हो जानेपर लोग धनाढ्यताके मदसे उन्मत्त हो उठेंगे। यदि किसीने विश्वास करके अपने धनको धरोहरके रूपमें रख दिया तो अधिकांश पापाचारी और निर्लज मनुष्य उस धरोहरको हड़प लेनेकी चेष्टा करेंगे और उससे साफ कह देंगे कि हमारे यहाँ तुम्हारा कुछ भी नहीं है॥५७-५८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
पुरुषादानि सत्त्वानि पक्षिणोऽथ मृगास्तथा।
नगराणां विहारेषु चैत्येष्वपि च शेरते ॥ ५९ ॥
मूलम्
पुरुषादानि सत्त्वानि पक्षिणोऽथ मृगास्तथा।
नगराणां विहारेषु चैत्येष्वपि च शेरते ॥ ५९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
मनुष्यका मांस खानेवाले हिंसक जीव तथा पशु-पक्षी नागरिकोंके बगीचों और देवालयोंमें भी शयन करेंगे॥५९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
सप्तवर्षाष्टवर्षाश्च स्त्रियो गर्भधरा नृप।
दशद्वादशवर्षाणां पुंसां पुत्रः प्रजायते ॥ ६० ॥
मूलम्
सप्तवर्षाष्टवर्षाश्च स्त्रियो गर्भधरा नृप।
दशद्वादशवर्षाणां पुंसां पुत्रः प्रजायते ॥ ६० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
राजन्! युगान्तकालमें सात-आठ वर्षकी स्त्रियाँ गर्भ धारण करेंगी और दस-बारह वर्षकी अवस्थावाले पुरुषोंके भी पुत्र होंगे॥६०॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
भवन्ति षोडशे वर्षे नराः पलितिनस्तथा।
आयुःक्षयो मनुष्याणां क्षिप्रमेव प्रपद्यते ॥ ६१ ॥
मूलम्
भवन्ति षोडशे वर्षे नराः पलितिनस्तथा।
आयुःक्षयो मनुष्याणां क्षिप्रमेव प्रपद्यते ॥ ६१ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
सोलहवें वर्षमें मनुष्योंके बाल पक जायँगे और उनकी आयु शीघ्र ही समाप्त हो जायगी॥६१॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
क्षीणायुषो महाराज तरुणा वृद्धशीलिनः।
तरुणानां च यच्छीलं तद् वृद्धेषु प्रजायते ॥ ६२ ॥
मूलम्
क्षीणायुषो महाराज तरुणा वृद्धशीलिनः।
तरुणानां च यच्छीलं तद् वृद्धेषु प्रजायते ॥ ६२ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
महाराज! उस समयके तरुणोंकी आयु क्षीण होगी और उनका शील-स्वभाव बूढ़ोंका-सा हो जायगा और तरुणोंका जो शील-स्वभाव होना चाहिये, वह बूढ़ोंमें प्रकट होगा॥६२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
विपरीतास्तदा नार्यो वञ्चयित्वार्हतः पतीन्।
व्युच्चरन्त्यपि दुःशीला दासैः पशुभिरेव च ॥ ६३ ॥
मूलम्
विपरीतास्तदा नार्यो वञ्चयित्वार्हतः पतीन्।
व्युच्चरन्त्यपि दुःशीला दासैः पशुभिरेव च ॥ ६३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
उस समयकी विपरीत स्वभाववाली स्त्रियाँ अपने योग्य पतियोंको भी धोखा देकर बुरे शील-स्वभावकी हो जायँगी और सेवकों तथा पशुओंके साथ भी व्यभिचार करेंगी॥६३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
वीरपत्न्यस्तथा नार्यः संश्रयन्ति नरान् नृप।
भर्तारमपि जीवन्तमन्यान् व्यभिचरन्त्युत ॥ ६४ ॥
मूलम्
वीरपत्न्यस्तथा नार्यः संश्रयन्ति नरान् नृप।
भर्तारमपि जीवन्तमन्यान् व्यभिचरन्त्युत ॥ ६४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
राजन्! वीर पुरुषोंकी पत्नियाँ भी परपुरुषोंका आश्रय लेंगी और पतिके जीते हुए भी दूसरोंसे व्यभिचार करेंगी॥६४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तस्मिन् युगसहस्रान्ते सम्प्राप्ते चायुषः क्षये।
अनावृष्टिर्महाराज जायते बहुवार्षिकी ॥ ६५ ॥
मूलम्
तस्मिन् युगसहस्रान्ते सम्प्राप्ते चायुषः क्षये।
अनावृष्टिर्महाराज जायते बहुवार्षिकी ॥ ६५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
महाराज! इस प्रकार आयुको क्षीण करनेवाले सहस्र युगोंके अन्तिम भागकी समाप्ति होनेपर बहुत वर्षोंतक वृष्टि बंद हो जाती है॥६५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
ततस्तान्यल्पसाराणि सत्त्वानि क्षुधितानि वै।
प्रलयं यान्ति भूयिष्ठं पृथिव्यां पृथिवीपते ॥ ६६ ॥
मूलम्
ततस्तान्यल्पसाराणि सत्त्वानि क्षुधितानि वै।
प्रलयं यान्ति भूयिष्ठं पृथिव्यां पृथिवीपते ॥ ६६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
पृथ्वीपते! इससे भूतलके थोड़ी शक्तिवाले अधिकांश प्राणी भूखसे व्याकुल होकर मर जाते हैं॥६६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
ततो दिनकरैर्दीप्तैः सप्तभिर्मनुजाधिप ।
पीयते सलिलं सर्वं समुद्रेषु सरित्सु च ॥ ६७ ॥
मूलम्
ततो दिनकरैर्दीप्तैः सप्तभिर्मनुजाधिप ।
पीयते सलिलं सर्वं समुद्रेषु सरित्सु च ॥ ६७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
नरेश्वर! तदनन्तर प्रचण्ड तेजवाले सात सूर्य उदित होकर सरिताओं और समुद्रोंका सारा जल सोख लेते हैं॥६७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
यच्च काष्ठं तृणं चापि शुष्कं चार्द्रं च भारत।
सर्वं तद् भस्मसाद् भूतं दृश्यते भरतर्षभ ॥ ६८ ॥
मूलम्
यच्च काष्ठं तृणं चापि शुष्कं चार्द्रं च भारत।
सर्वं तद् भस्मसाद् भूतं दृश्यते भरतर्षभ ॥ ६८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
भरतकुलभूषण! उस समय जो भी तृण-काष्ठ अथवा सूखे-गीले पदार्थ होते हैं, वे सभी भस्मीभूत दिखायी देने लगते हैं॥६८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
ततः संवर्तको वह्निर्वायुना सह भारत।
लोकमाविशते पूर्वमादित्यैरुपशोषितम् ॥ ६९ ॥
मूलम्
ततः संवर्तको वह्निर्वायुना सह भारत।
लोकमाविशते पूर्वमादित्यैरुपशोषितम् ॥ ६९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
भारत! इसके बाद ‘संवर्तक’ नामकी प्रलयकालीन अग्नि वायुके साथ उन सम्पूर्ण लोकोंमें फैल जाती है, जहाँका जल पहले सात सूर्योंद्वारा सोख लिया गया है॥६९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
ततः स पृथिवीं भित्त्वा प्रविश्य च रसातलम्।
देवदानवयक्षाणां भयं जनयते महत् ॥ ७० ॥
मूलम्
ततः स पृथिवीं भित्त्वा प्रविश्य च रसातलम्।
देवदानवयक्षाणां भयं जनयते महत् ॥ ७० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
तत्पश्चात् पृथ्वीका भेदन कर वह अग्नि रसातलतक पहुँच जाती है तथा देवता, दानव और यक्षोंके लिये महान् भय उपस्थित कर देती है॥७०॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
निर्दहन् नागलोकं च यच्च किञ्चित् क्षिताविह।
अधस्तात् पृथिवीपाल सर्वं नाशयते क्षणात् ॥ ७१ ॥
मूलम्
निर्दहन् नागलोकं च यच्च किञ्चित् क्षिताविह।
अधस्तात् पृथिवीपाल सर्वं नाशयते क्षणात् ॥ ७१ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
राजन्! वह नागलोकको जलाती हुई इस पृथ्वीके नीचे जो कुछ भी है, उस सबको क्षणभरमें नष्ट कर देती है॥७१॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
ततो योजनविंशानां सहस्राणि शतानि च।
निर्दहत्यशिवो वायुः स च संवर्तकोऽनलः ॥ ७२ ॥
मूलम्
ततो योजनविंशानां सहस्राणि शतानि च।
निर्दहत्यशिवो वायुः स च संवर्तकोऽनलः ॥ ७२ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
इसके बाद वह अमंगलकारी प्रचण्ड वायु और वह संवर्तक अग्नि बाईस हजार योजन तकके लोगोंको भस्म कर डालती है॥७२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
सदेवासुरगन्धर्वं सयक्षोरगराक्षसम् ।
ततो दहति दीप्तः स सर्वमेव जगद् विभुः ॥ ७३ ॥
मूलम्
सदेवासुरगन्धर्वं सयक्षोरगराक्षसम् ।
ततो दहति दीप्तः स सर्वमेव जगद् विभुः ॥ ७३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
इस प्रकार सर्वत्र फैली हुई वह प्रज्वलित अग्नि देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, नाग तथा राक्षसोंसहित सम्पूर्ण विश्वको भस्म कर डालती है॥७३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
ततो गजकुलप्रख्यास्तडिन्मालाविभूषिताः ।
उत्तिष्ठन्ति महामेघा नभस्यद्भुतदर्शनाः ॥ ७४ ॥
मूलम्
ततो गजकुलप्रख्यास्तडिन्मालाविभूषिताः ।
उत्तिष्ठन्ति महामेघा नभस्यद्भुतदर्शनाः ॥ ७४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
इसके बाद आकाशमें महान् मेघोंकी घोर घटा घिर आती है, जो अद्भुत दिखायी देता है। उनमेंसे प्रत्येक मेघ-समूह हाथियोंके झुंडकी भाँति विशालकाय और श्यामवर्ण तथा बिजलीकी मालाओंसे विभूषित होता है॥७४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
केचिन्नीलोत्पलश्यामाः केचित् कुमुदसंनिभाः ।
केचित् किञ्जल्कसंकाशाः केचित् पीताः पयोधराः ॥ ७५ ॥
केचिद्धारिद्रसंकाशाः कारण्डवनिभास्तथा ।
केचित् कमलपत्राभाः केचिद्धिङ्गुलसप्रभाः ॥ ७६ ॥
मूलम्
केचिन्नीलोत्पलश्यामाः केचित् कुमुदसंनिभाः ।
केचित् किञ्जल्कसंकाशाः केचित् पीताः पयोधराः ॥ ७५ ॥
केचिद्धारिद्रसंकाशाः कारण्डवनिभास्तथा ।
केचित् कमलपत्राभाः केचिद्धिङ्गुलसप्रभाः ॥ ७६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
कुछ बादल नील कमलक समान श्याम और कुछ कुमुद-कुसुमके समान सफेद होते हैं। कुछ जलधरोंकी कान्ति केसरोंके समान दिखायी देती है। कुछ मेघ हल्दीके सदृश पीले और कुछ कारण्डव पक्षीके समान दृष्टिगोचर होते हैं। कोई-कोई कमलदलके समान और कुछ हिंगुल-जैसे जान पड़ते हैं॥७५-७६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
केचित् पुरवराकाराः केचिद् गजकुलोपमाः।
केचिदञ्जनसंकाशाः केचिन्मकरसंनिभाः ॥ ७७ ॥
मूलम्
केचित् पुरवराकाराः केचिद् गजकुलोपमाः।
केचिदञ्जनसंकाशाः केचिन्मकरसंनिभाः ॥ ७७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
कुछ श्रेष्ठ नगरोंके समान, कुछ हाथियोंके झुंड-जैसे, कुछ काजलके रंगवाले और कुछ मगरोंकी-सी आकृतिवाले होते हैं॥७७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
विद्युन्मालापिनद्धाङ्गाः समुत्तिष्ठन्ति वै घनाः।
घोररूपा महाराज घोरस्वननिनादिताः ।
ततो जलधराः सर्वे व्याप्नुवन्ति नभस्तलम् ॥ ७८ ॥
मूलम्
विद्युन्मालापिनद्धाङ्गाः समुत्तिष्ठन्ति वै घनाः।
घोररूपा महाराज घोरस्वननिनादिताः ।
ततो जलधराः सर्वे व्याप्नुवन्ति नभस्तलम् ॥ ७८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
वे सभी बादल विद्युन्मालाओंसे अलंकृत होकर घिर आते हैं। महाराज! भयंकर गर्जना करनेके कारण उनका स्वरूप बड़ा भयानक जान पड़ता है। धीरे-धीरे वे सभी जलधर समूचे आकाशमण्डलको ढक लेते हैं॥७८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तैरियं पृथिवी सर्वा सपर्वतवनाकरा।
आपूर्यते महाराज सलिलौघपरिप्लुता ॥ ७९ ॥
मूलम्
तैरियं पृथिवी सर्वा सपर्वतवनाकरा।
आपूर्यते महाराज सलिलौघपरिप्लुता ॥ ७९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
महाराज! उनके वर्षा करनेपर पर्वत, वन और खानोंसहित यह सारी पृथ्वी अगाध जलराशिमें डूबकर सब ओरसे भर जाती है॥७९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
ततस्ते जलदा घोरा राविणः पुरुषर्षभ।
सर्वतः प्लावयन्त्याशु चोदिताः परमेष्ठिना ॥ ८० ॥
मूलम्
ततस्ते जलदा घोरा राविणः पुरुषर्षभ।
सर्वतः प्लावयन्त्याशु चोदिताः परमेष्ठिना ॥ ८० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
पुरुषरत्न! तदनन्तर विधातासे प्रेरित हो गर्जन-तर्जन करनेवाले वे भयंकर मेघ शीघ्र सब ओर वर्षा करके सबको जलसे आप्लावित कर देते हैं॥८०॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
वर्षमाणा महत् तोयं पूरयन्तो वसुंधराम्।
सुघोरमशिवं रौद्रं नाशयन्ति च पावकम् ॥ ८१ ॥
मूलम्
वर्षमाणा महत् तोयं पूरयन्तो वसुंधराम्।
सुघोरमशिवं रौद्रं नाशयन्ति च पावकम् ॥ ८१ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
महान् जल-समूहकी वर्षा करके वसुन्धराको जलमें डुबोनेवाले वे समस्त मेघ उस अत्यन्त घोर, अमंगलकारी और भयानक अग्निको बुझा देते हैं॥८१॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
ततो द्वादशवर्षाणि पयोदास्त उपप्लवे।
धाराभिः पूरयन्तो वै चोद्यमाना महात्मना ॥ ८२ ॥
मूलम्
ततो द्वादशवर्षाणि पयोदास्त उपप्लवे।
धाराभिः पूरयन्तो वै चोद्यमाना महात्मना ॥ ८२ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
तदनन्तर प्रलयकालके वे पयोधर महात्मा ब्रह्माजीकी प्रेरणा पाकर पृथ्वीको परिपूर्ण करनेके लिये बारह वर्षोंतक धारावाहिक वृष्टि करते हैं॥८२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
ततः समुद्रः स्वां वेलामतिक्रामति भारत।
पर्वताश्च विदीर्यन्ते मही चाप्सु निमज्जति ॥ ८३ ॥
मूलम्
ततः समुद्रः स्वां वेलामतिक्रामति भारत।
पर्वताश्च विदीर्यन्ते मही चाप्सु निमज्जति ॥ ८३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
भारत! तदनन्तर समुद्र अपनी सीमाको लाँघ जाता है, पर्वत फट जाते और पृथ्वी पानीमें डूब जाती है॥८३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
सर्वतः सहसा भ्रान्तास्ते पयोदा नभस्तलम्।
संवेष्टयित्वा नश्यन्ति वायुवेगपराहताः ॥ ८४ ॥
मूलम्
सर्वतः सहसा भ्रान्तास्ते पयोदा नभस्तलम्।
संवेष्टयित्वा नश्यन्ति वायुवेगपराहताः ॥ ८४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
तत्पश्चात् समस्त आकाशको घेरकर सब ओर फैले हुए वे मेघ वायुके प्रचण्ड वेगसे छिन्न-भिन्न होकर सहसा अदृश्य हो जाते हैं॥८४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
ततस्तं मारुतं घोरं स्वयम्भूर्मनुजाधिप।
आदिः पद्मालयो देवः पीत्वा स्वपिति भारत ॥ ८५ ॥
मूलम्
ततस्तं मारुतं घोरं स्वयम्भूर्मनुजाधिप।
आदिः पद्मालयो देवः पीत्वा स्वपिति भारत ॥ ८५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
नरेश्वर! इसके बाद कमलमें निवास करनेवाले आदिदेव स्वयं ब्रह्माजी उस भयंकर वायुको पीकर सो जाते हैं॥८५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तस्मिन्नेकार्णवे घोरे नष्टे स्थावरजङ्गमे।
नष्टे देवासुरगणे यक्षराक्षसवर्जिते ॥ ८६ ॥
निर्मनुष्ये महीपाल निःश्वापदमहीरुहे ।
अनन्तरिक्षे लोकेऽस्मिन् भ्रमाम्येकोऽहमाहतः ॥ ८७ ॥
मूलम्
तस्मिन्नेकार्णवे घोरे नष्टे स्थावरजङ्गमे।
नष्टे देवासुरगणे यक्षराक्षसवर्जिते ॥ ८६ ॥
निर्मनुष्ये महीपाल निःश्वापदमहीरुहे ।
अनन्तरिक्षे लोकेऽस्मिन् भ्रमाम्येकोऽहमाहतः ॥ ८७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
इस प्रकार चराचर प्राणियों, देवताओं तथा असुर आदिके नष्ट हो जानेपर यक्ष, राक्षस, मनुष्य, हिंसक जीव, वृक्ष तथा अन्तरिक्षसे शून्य उस घोर एकार्णवमय जगत्में मैं अकेला ही इधर-उधर मारा-मारा फिरता हूँ॥८६-८७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
एकार्णवे जले घोरे विचरन् पार्थिवोत्तम।
अपश्यन् सर्वभूतानि वैक्लव्यमगमं ततः ॥ ८८ ॥
मूलम्
एकार्णवे जले घोरे विचरन् पार्थिवोत्तम।
अपश्यन् सर्वभूतानि वैक्लव्यमगमं ततः ॥ ८८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
नृपश्रेष्ठ! एकार्णवके उस भयंकर जलमें विचरते हुए जब मैंने किसी भी प्राणीको नहीं देखा, तब मुझे बड़ी व्याकुलता हुई॥८८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
ततः सुदीर्घं गत्वाहं प्लवमानो नराधिप।
श्रान्तः क्वचिन्न शरणं लभाम्यहमतन्द्रितः ॥ ८९ ॥
मूलम्
ततः सुदीर्घं गत्वाहं प्लवमानो नराधिप।
श्रान्तः क्वचिन्न शरणं लभाम्यहमतन्द्रितः ॥ ८९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
नरेश्वर! उस समय आलस्यशून्य होकर सुदीर्घकाल-तक तैरता हुआ मैं दूर जाकर बहुत थक गया। परंतु कहीं भी मुझे कोई आश्रय नहीं मिला॥८९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
ततः कदाचित् पश्यामि तस्मिन् सलिलसंचये।
न्यग्रोधं सुमहान्तं वै विशालं पृथिवीपते ॥ ९० ॥
मूलम्
ततः कदाचित् पश्यामि तस्मिन् सलिलसंचये।
न्यग्रोधं सुमहान्तं वै विशालं पृथिवीपते ॥ ९० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
राजन्! तदनन्तर एक दिन एकार्णवकी उस अगाध जलराशिमें मैंने एक बहुत विशाल बरगदका वृक्ष देखा॥९०॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
शाखायां तस्य वृक्षस्य विस्तीर्णायां नराधिप।
पर्यङ्के पृथिवीपाल दिव्यास्तरणसंस्तृते ॥ ९१ ॥
उपविष्टं महाराज पद्मेन्दुसदृशाननम् ।
फुल्लपद्मविशालाक्षं बालं पश्यामि भारत ॥ ९२ ॥
मूलम्
शाखायां तस्य वृक्षस्य विस्तीर्णायां नराधिप।
पर्यङ्के पृथिवीपाल दिव्यास्तरणसंस्तृते ॥ ९१ ॥
उपविष्टं महाराज पद्मेन्दुसदृशाननम् ।
फुल्लपद्मविशालाक्षं बालं पश्यामि भारत ॥ ९२ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
नराधिप! उस वृक्षकी चौड़ी शाखापर एक पलंग था, जिसके ऊपर दिव्य बिछौने बिछे हुए थे। महाराज! उस पलंगपर एक सुन्दर बालक बैठा दिखायी दिया, जिसका मुख कमलके समान कमनीय शोभा धारण करनेवाला तथा चन्द्रमाके समान नेत्रोंको आनन्द देनेवाला था। उसके नेत्र प्रफुल्ल पद्मदलके समान विशाल थे॥९१-९२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
ततो मे पृथिवीपाल विस्मयः सुमहानभूत्।
कथं त्वयं शिशुः शेते लोके नाशमुपागते ॥ ९३ ॥
मूलम्
ततो मे पृथिवीपाल विस्मयः सुमहानभूत्।
कथं त्वयं शिशुः शेते लोके नाशमुपागते ॥ ९३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
पृथ्वीनाथ! उसे देखकर मुझे बड़ा विस्मय हुआ। मैं सोचने लगा—‘सारे संसारके नष्ट हो जानेपर भी यह बालक यहाँ कैसे सो रहा है?’॥९३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तपसा चिन्तयंश्चापि तं शिशुं नोपलक्षये।
भूतं भव्यं भविष्यं च जानन्नपि नराधिप ॥ ९४ ॥
मूलम्
तपसा चिन्तयंश्चापि तं शिशुं नोपलक्षये।
भूतं भव्यं भविष्यं च जानन्नपि नराधिप ॥ ९४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
नरेश्वर! मैं भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालोंका ज्ञाता होनेपर भी तपस्यासे भलीभाँति चिन्तन करता (ध्यान लगाता) रहा, तो भी उस शिशुके विषयमें कुछ न जान सका॥९४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अतसीपुष्पवर्णाभः श्रीवत्सकृतभूषणः ।
साक्षाल्लक्ष्म्या इवावासः स तदा प्रतिभाति मे ॥ ९५ ॥
मूलम्
अतसीपुष्पवर्णाभः श्रीवत्सकृतभूषणः ।
साक्षाल्लक्ष्म्या इवावासः स तदा प्रतिभाति मे ॥ ९५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
उसकी अंगकान्ति अलसीके फूलकी भाँति श्याम थी। उसका वक्षःस्थल श्रीवत्सचिह्नसे विभूषित था। वह उस समय मुझे साक्षात् लक्ष्मीका निवासस्थान-सा प्रतीत होता था॥९५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
ततो मामब्रवीद् बालः स पद्मनिभलोचनः।
श्रीवत्सधारी द्युतिमान् वाक्यं श्रुतिसुखावहम् ॥ ९६ ॥
जानामि त्वां परिश्रान्तं ततो विश्रामकाङ्क्षिणम्।
मार्कण्डेय इहास्स्व त्वं यावदिच्छसि भार्गव ॥ ९७ ॥
मूलम्
ततो मामब्रवीद् बालः स पद्मनिभलोचनः।
श्रीवत्सधारी द्युतिमान् वाक्यं श्रुतिसुखावहम् ॥ ९६ ॥
जानामि त्वां परिश्रान्तं ततो विश्रामकाङ्क्षिणम्।
मार्कण्डेय इहास्स्व त्वं यावदिच्छसि भार्गव ॥ ९७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
मुझे विस्मयमें पड़ा देख कमलके समान नेत्रवाले उस श्रीवत्सधारी कान्तिमान् बालकने मुझसे इस प्रकार श्रवणसुखद वचन कहा—‘भृगुवंशी मार्कण्डेय! मैं तुम्हें जानता हूँ। तुम बहुत थक गये हो और विश्राम चाहते हो। तुम्हारी जबतक इच्छा हो यहाँ बैठो॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अभ्यन्तरं शरीरे मे प्रविश्य मुनिसत्तम।
आस्स्व भो विहितो वासः प्रसादस्ते कृतो मया ॥ ९८ ॥
मूलम्
अभ्यन्तरं शरीरे मे प्रविश्य मुनिसत्तम।
आस्स्व भो विहितो वासः प्रसादस्ते कृतो मया ॥ ९८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘मुनिश्रेष्ठ! मैंने तुमपर कृपा की है। तुम मेरे शरीरके भीतर प्रवेश करके विश्राम करो। वहाँ तुम्हारे रहनेके लिये व्यवस्था की गयी है’॥९८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
ततो बालेन तेनैवमुक्तस्यासीत् तदा मम।
निर्वेदो जीविते दीर्घे मनुष्यत्वे च भारत ॥ ९९ ॥
मूलम्
ततो बालेन तेनैवमुक्तस्यासीत् तदा मम।
निर्वेदो जीविते दीर्घे मनुष्यत्वे च भारत ॥ ९९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
उस बालकके ऐसा कहनेपर उस समय मुझे अपने दीर्घ-जीवन और मानव-शरीरपर बड़ा खेद और वैराग्य हुआ॥९९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
ततो बालेन तेनास्यं सहसा विवृतं कृतम्।
तस्याहमवशो वक्त्रे दैवयोगात् प्रवेशितः ॥ १०० ॥
मूलम्
ततो बालेन तेनास्यं सहसा विवृतं कृतम्।
तस्याहमवशो वक्त्रे दैवयोगात् प्रवेशितः ॥ १०० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
तदनन्तर उस बालकने सहसा अपना मुख खोला और मैं दैवयोगसे परवशकी भाँति उसमें प्रवेश कर गया॥१००॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
ततः प्रविष्टस्तत्कुक्षिं सहसा मनुजाधिप।
सराष्ट्रनगराकीर्णां कृत्स्नां पश्यामि मेदिनीम् ॥ १०१ ॥
मूलम्
ततः प्रविष्टस्तत्कुक्षिं सहसा मनुजाधिप।
सराष्ट्रनगराकीर्णां कृत्स्नां पश्यामि मेदिनीम् ॥ १०१ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
राजन्! उसमें प्रवेश करते ही मैं सहसा उस बालकके उदरमें जा पहुँचा। वहाँ मुझे समस्त राष्ट्रों और नगरोंसे भरी हुई यह सारी पृथ्वी दिखायी दी॥१०१॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
गङ्गां शतद्रुं सीतां च यमुनामथ कौशिकीम्।
चर्मण्वतीं वेत्रवतीं चन्द्रभागां सरस्वतीम् ॥ १०२ ॥
सिन्धुं चैव विपाशां च नदीं गोदावरीमपि।
वस्वोकसारां नलिनीं नर्मदां चैव भारत ॥ १०३ ॥
नदीं ताम्रां च वेणां च पुण्यतोयां शुभावहाम्।
सुवेणां कृष्णवेणां च इरामां च महानदीम् ॥ १०४ ॥
वितस्तां च महाराज कावेरीं च महानदीम्।
शोणं च पुरुषव्याघ्र विशल्यां किम्पुनामपि ॥ १०५ ॥
एताश्चान्याश्च नद्योऽहं पृथिव्यां या नरोत्तम।
परिक्रामन् प्रपश्यामि तस्य कुक्षौ महात्मनः ॥ १०६ ॥
मूलम्
गङ्गां शतद्रुं सीतां च यमुनामथ कौशिकीम्।
चर्मण्वतीं वेत्रवतीं चन्द्रभागां सरस्वतीम् ॥ १०२ ॥
सिन्धुं चैव विपाशां च नदीं गोदावरीमपि।
वस्वोकसारां नलिनीं नर्मदां चैव भारत ॥ १०३ ॥
नदीं ताम्रां च वेणां च पुण्यतोयां शुभावहाम्।
सुवेणां कृष्णवेणां च इरामां च महानदीम् ॥ १०४ ॥
वितस्तां च महाराज कावेरीं च महानदीम्।
शोणं च पुरुषव्याघ्र विशल्यां किम्पुनामपि ॥ १०५ ॥
एताश्चान्याश्च नद्योऽहं पृथिव्यां या नरोत्तम।
परिक्रामन् प्रपश्यामि तस्य कुक्षौ महात्मनः ॥ १०६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
नरश्रेष्ठ! फिर तो मैं उस महात्मा बालकके उदरमें घूमने लगा। घूमते हुए मैंने वहाँ गंगा, सतलज, सीता, यमुना, कोसी, चम्बल, वेत्रवती, चिनाव, सरस्वती, सिन्धु, व्यास, गोदावरी, वस्वोकसारा, नलिनी, नर्मदा, ताम्रपर्णी, वेणा, शुभदायिनी पुण्यतोया, सुवेणा, कृष्णवेणा, महानदी इरामा, वितस्ता (झेलम), महानदी कावेरी, शोणभद्र, विशल्या तथा किम्पुना—इन सबको तथा इस पृथ्वीपर जो अन्य नदियाँ हैं, उनको भी देखा॥१०२—१०६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
ततः समुद्रं पश्यामि यादोगणनिषेवितम्।
रत्नाकरममित्रघ्न पयसो निधिमुत्तमम् ॥ १०७ ॥
मूलम्
ततः समुद्रं पश्यामि यादोगणनिषेवितम्।
रत्नाकरममित्रघ्न पयसो निधिमुत्तमम् ॥ १०७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
शत्रुसूदन! इसके बाद जलजन्तुओंसे भरे हुए अगाध जलके भण्डार परम उत्तम रत्नाकर समुद्रको भी देखा॥१०७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तत्र पश्यामि गगनं चन्द्रसूर्यविराजितम्।
जाज्वल्यमानं तेजोभिः पावकार्कसमप्रभम् ॥ १०८ ॥
मूलम्
तत्र पश्यामि गगनं चन्द्रसूर्यविराजितम्।
जाज्वल्यमानं तेजोभिः पावकार्कसमप्रभम् ॥ १०८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
वहाँ मुझे चन्द्रमा और सूर्यसे सुशोभित आकाशमण्डल दिखायी दिया, जो अनन्त तेजसे प्रज्वलित तथा अग्नि एवं सूर्यके समान देदीप्यमान था॥१०८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
पश्यामि च महीं राजन् काननैरुपशोभिताम्।
(सपर्वतवनद्वीपां निमग्नाशतसङ्कुलाम् ।)
यजन्ते हि तदा राजन् ब्राह्मणा बहुभिर्मखैः ॥ १०९ ॥
मूलम्
पश्यामि च महीं राजन् काननैरुपशोभिताम्।
(सपर्वतवनद्वीपां निमग्नाशतसङ्कुलाम् ।)
यजन्ते हि तदा राजन् ब्राह्मणा बहुभिर्मखैः ॥ १०९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
राजन्! वहाँकी भूमि विविध काननोंसे सुशोभित, पर्वत, वन और द्वीपोंसे उपलक्षित तथा सैकड़ों सरिताओंसे संयुक्त दिखायी देती थी। ब्राह्मणलोग नाना प्रकारके यज्ञोंद्वारा भगवान् यज्ञपुरुषकी आराधना करते थे॥१०९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
क्षत्रियाश्च प्रवर्तन्ते सर्ववर्णानुरंजनैः ।
वैश्याः कृषिं यथान्यायं कारयन्ति नराधिप ॥ ११० ॥
मूलम्
क्षत्रियाश्च प्रवर्तन्ते सर्ववर्णानुरंजनैः ।
वैश्याः कृषिं यथान्यायं कारयन्ति नराधिप ॥ ११० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
नरेश्वर! क्षत्रिय राजा सब वर्णोंकी प्रजाका अनुरंजन करते—सबको सुखी और प्रसन्न रखते थे। वैश्य न्यायपूर्वक खेतीका काम और व्यापार करते थे॥११०॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
शुश्रूषायां च निरता द्विजानां वृषलास्तदा।
ततः परिपतन् राजंस्तस्य कुक्षौ महात्मनः ॥ १११ ॥
हिमवन्तं च पश्यामि हेमकूटं च पर्वतम्।
निषधं चापि पश्यामि श्वेतं च रजतान्वितम् ॥ ११२ ॥
पश्यामि च महीपाल पर्वतं गन्धमादनम्।
मन्दरं मनुजव्याघ्र नीलं चापि महागिरिम् ॥ ११३ ॥
पश्यामि च महाराज मेरुं कनकपर्वतम्।
महेन्द्रं चैव पश्यामि विन्ध्यं च गिरिमुत्तमम् ॥ ११४ ॥
मलयं चापि पश्यामि पारियात्रं च पर्वतम्।
एते चान्ये च बहवो यावन्तः पृथिवीधराः ॥ ११५ ॥
तस्योदरे मया दृष्टाः सर्वे रत्नविभूषिताः।
सिंहान् व्याघ्रान् वराहांश्च पश्यामि मनुजाधिप ॥ ११६ ॥
मूलम्
शुश्रूषायां च निरता द्विजानां वृषलास्तदा।
ततः परिपतन् राजंस्तस्य कुक्षौ महात्मनः ॥ १११ ॥
हिमवन्तं च पश्यामि हेमकूटं च पर्वतम्।
निषधं चापि पश्यामि श्वेतं च रजतान्वितम् ॥ ११२ ॥
पश्यामि च महीपाल पर्वतं गन्धमादनम्।
मन्दरं मनुजव्याघ्र नीलं चापि महागिरिम् ॥ ११३ ॥
पश्यामि च महाराज मेरुं कनकपर्वतम्।
महेन्द्रं चैव पश्यामि विन्ध्यं च गिरिमुत्तमम् ॥ ११४ ॥
मलयं चापि पश्यामि पारियात्रं च पर्वतम्।
एते चान्ये च बहवो यावन्तः पृथिवीधराः ॥ ११५ ॥
तस्योदरे मया दृष्टाः सर्वे रत्नविभूषिताः।
सिंहान् व्याघ्रान् वराहांश्च पश्यामि मनुजाधिप ॥ ११६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
शूद्र तीनों द्विजातियोंकी सेवा-शुश्रूषामें लगे रहते थे। राजन्! यह सब देखते हुए जब मैं उस महात्मा बालकके उदरमें भ्रमण करता आगे बढ़ा, तब हिमवान्, हेमकूट, निषध, रजतयुक्त श्वेतगिरि, गन्धमादन, मन्दराचल, महागिरि नील, सुवर्णमय पर्वत मेरु, महेन्द्र, उत्तम विन्ध्यगिरि, मलय तथा पारियात्र पर्वत देखे। ये तथा और भी बहुत-से पर्वत मुझे उस बालकके उदरमें दिखायी दिये। वे सब-के-सब नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित थे। राजन्! वहाँ घूमते हुए मैंने सिंह, व्याघ्र और वाराह आदि पशु भी देखे॥१११—११६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
पृथिव्यां यानि चान्यानि सत्त्वानि जगतीपते।
तानि सर्वाण्यहं तत्र पश्यन् पर्यचरं तदा ॥ ११७ ॥
मूलम्
पृथिव्यां यानि चान्यानि सत्त्वानि जगतीपते।
तानि सर्वाण्यहं तत्र पश्यन् पर्यचरं तदा ॥ ११७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
पृथ्वीपते! भूमण्डलमें जितने प्राणी हैं, उन सबको देखते हुए मैं उस समय उस बालकके उदरमें विचरता रहा॥११७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
कुक्षौ तस्य नरव्याघ्र प्रविष्टः संचरन् दिशः।
शक्रादींश्चापि पश्यामि कृत्स्नान् देवगणानहम् ॥ ११८ ॥
मूलम्
कुक्षौ तस्य नरव्याघ्र प्रविष्टः संचरन् दिशः।
शक्रादींश्चापि पश्यामि कृत्स्नान् देवगणानहम् ॥ ११८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
नरश्रेष्ठ! उस शिशुके उदरमें प्रविष्ट हो सम्पूर्ण दिशाओंमें भ्रमण करते हुए इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवताओंके भी दर्शन हुए॥११८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
साध्यान् रुद्रांस्तथाऽऽदित्यान् गुह्यकान् पितरस्तदा।
सर्पान् नागान् सुपर्णांश्च वसूनप्यश्विनावपि ॥ ११९ ॥
गन्धर्वाप्सरसो यक्षानृषींश्चैव महीपते ।
दैत्यदानवसङ्घांश्च नागांश्च मनुजाधिप ॥ १२० ॥
सिंहिकातनयांश्चापि ये चान्ये सुरशत्रवः।
यच्च किंचिन्मया लोके दृष्टं स्थावरजङ्गमम् ॥ १२१ ॥
सर्वं पश्याम्यहं राजंस्तस्य कुक्षौ महात्मनः।
चरमाणः फलाहारः कृत्स्नं जगदिदं विभो ॥ १२२ ॥
मूलम्
साध्यान् रुद्रांस्तथाऽऽदित्यान् गुह्यकान् पितरस्तदा।
सर्पान् नागान् सुपर्णांश्च वसूनप्यश्विनावपि ॥ ११९ ॥
गन्धर्वाप्सरसो यक्षानृषींश्चैव महीपते ।
दैत्यदानवसङ्घांश्च नागांश्च मनुजाधिप ॥ १२० ॥
सिंहिकातनयांश्चापि ये चान्ये सुरशत्रवः।
यच्च किंचिन्मया लोके दृष्टं स्थावरजङ्गमम् ॥ १२१ ॥
सर्वं पश्याम्यहं राजंस्तस्य कुक्षौ महात्मनः।
चरमाणः फलाहारः कृत्स्नं जगदिदं विभो ॥ १२२ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
पृथ्वीपते! साध्य, रुद्र, आदित्य, गुह्यक, पितर, सर्प, नाग, सुपर्ण, वसु, अश्विनीकुमार, गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष तथा ऋषियोंका भी मैंने दर्शन किया। दैत्य-दानवसमूह, नाग, सिंहिकाके पुत्र (राहु आदि) तथा अन्य देवशत्रुओंको भी देखा। राजन्! इस लोकमें मैंने जो कुछ भी स्थावर-जंगम पदार्थ देखे थे, वे सब मुझे उस महात्माकी कुक्षिमें दृष्टिगोचर हुए। महाराज! मैं प्रतिदिन फलाहार करता और इस सम्पूर्ण जगत्में घूमता रहता॥११९-१२२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अन्तःशरीरे तस्याहं वर्षाणामधिकं शतम्।
न च पश्यामि तस्याहं देहस्यान्तं कदाचन ॥ १२३ ॥
मूलम्
अन्तःशरीरे तस्याहं वर्षाणामधिकं शतम्।
न च पश्यामि तस्याहं देहस्यान्तं कदाचन ॥ १२३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
उस बालकके शरीरके भीतर मैं सौ वर्षसे अधिक कालतक घूमता रहा, तो भी कभी उसके शरीरका अन्त नहीं दिखायी दिया॥१२३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
सततं धावमानश्च चिन्तयानो विशाम्पते।
(भ्रमंस्तत्र महीपाल यदा वर्षगणान् बहून्।)
आसादयामि नैवान्तं तस्य राजन् महात्मनः ॥ १२४ ॥
ततस्तमेव शरणं गतोऽस्मि विधिवत् तदा।
वरेण्यं वरदं देवं मनसा कर्मणैव च ॥ १२५ ॥
मूलम्
सततं धावमानश्च चिन्तयानो विशाम्पते।
(भ्रमंस्तत्र महीपाल यदा वर्षगणान् बहून्।)
आसादयामि नैवान्तं तस्य राजन् महात्मनः ॥ १२४ ॥
ततस्तमेव शरणं गतोऽस्मि विधिवत् तदा।
वरेण्यं वरदं देवं मनसा कर्मणैव च ॥ १२५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
युधिष्ठिर! मैं निरन्तर दौड़ लगाता और चिन्तामें पड़ा रहता था। महाराज! जब बहुत वर्षोंतक भ्रमण करनेपर भी उस महात्माके शरीरका अन्त नहीं मिला, तब मैंने मन, वाणी और क्रियाद्वारा उन वरदायक एवं वरेण्य देवताकी ही विधिपूर्वक शरण ली॥१२४-१२५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
ततोऽहं सहसा राजन् वायुवेगेन निःसृतः।
महात्मनो मुखात् तस्य विवृतात् पुरुषोत्तम ॥ १२६ ॥
मूलम्
ततोऽहं सहसा राजन् वायुवेगेन निःसृतः।
महात्मनो मुखात् तस्य विवृतात् पुरुषोत्तम ॥ १२६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
पुरुषरत्न युधिष्ठिर! उनकी शरण लेते ही मैं वायुके समान वेगसे उक्त महात्मा बालकके खुले हुए मुखकी राहसे सहसा बाहर निकल आया॥१२६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
ततस्तस्यैव शाखायां न्यग्रोधस्य विशाम्पते।
आस्ते मनुजशार्दूल कृत्स्नमादाय वै जगत् ॥ १२७ ॥
तेनैव बालवेषेण श्रीवत्सकृतलक्षणम् ।
आसीनं तं नरव्याघ्र पश्याम्यमिततेजसम् ॥ १२८ ॥
मूलम्
ततस्तस्यैव शाखायां न्यग्रोधस्य विशाम्पते।
आस्ते मनुजशार्दूल कृत्स्नमादाय वै जगत् ॥ १२७ ॥
तेनैव बालवेषेण श्रीवत्सकृतलक्षणम् ।
आसीनं तं नरव्याघ्र पश्याम्यमिततेजसम् ॥ १२८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
नरश्रेष्ठ राजन्! बाहर आकर देखा तो उसी बरगदकी शाखापर उसी बाल-वेषसे सम्पूर्ण जगत्को अपने उदरमें लेकर श्रीवत्सचिह्नसे सुशोभित वह अमिततेजस्वी बालक पूर्ववत् बैठा हुआ है॥१२७-१२८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
ततो मामब्रवीद् बालः स प्रीतः प्रहसन्निव।
श्रीवत्सधारी द्युतिमान् पीतवासा महाद्युतिः ॥ १२९ ॥
मूलम्
ततो मामब्रवीद् बालः स प्रीतः प्रहसन्निव।
श्रीवत्सधारी द्युतिमान् पीतवासा महाद्युतिः ॥ १२९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
तब महातेजस्वी पीताम्बरधारी श्रीवत्सभूषित कान्तिमान् उस बालकने प्रसन्न होकर हँसते हुए-से मुझसे कहा—॥१२९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अपीदानीं शरीरेऽस्मिन् मामके मुनिसत्तम।
उषितस्त्वं सुविश्रान्तो मार्कण्डेय ब्रवीहि मे ॥ १३० ॥
मूलम्
अपीदानीं शरीरेऽस्मिन् मामके मुनिसत्तम।
उषितस्त्वं सुविश्रान्तो मार्कण्डेय ब्रवीहि मे ॥ १३० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘मुनिश्रेष्ठ मार्कण्डेय! क्या तुम मेरे इस शरीरमें रहकर विश्राम कर चुके? मुझे बताओ’॥१३०॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
मुहूर्तादथ मे दृष्टिः प्रादुर्भूता पुनर्नवा।
यया निर्मुक्तमात्मानमपश्यं लब्धचेतसम् ॥ १३१ ॥
मूलम्
मुहूर्तादथ मे दृष्टिः प्रादुर्भूता पुनर्नवा।
यया निर्मुक्तमात्मानमपश्यं लब्धचेतसम् ॥ १३१ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
फिर दो ही घड़ीमें मुझे एक नवीन दृष्टि प्राप्त हुई, जिससे मैं अपने-आपको मायासे मुक्त और सचेत अनुभव करने लगा॥१३१॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तस्य ताम्रतलौ तात चरणौ सुप्रतिष्ठितौ।
सुजातौ मृदुरक्ताभिरङ्गुलीभिर्विराजितौ ॥ १३२ ॥
प्रयत्नेन मया मूर्ध्ना गृहीत्वा ह्यभिवन्दितौ।
मूलम्
तस्य ताम्रतलौ तात चरणौ सुप्रतिष्ठितौ।
सुजातौ मृदुरक्ताभिरङ्गुलीभिर्विराजितौ ॥ १३२ ॥
प्रयत्नेन मया मूर्ध्ना गृहीत्वा ह्यभिवन्दितौ।
अनुवाद (हिन्दी)
तात! तदनन्तर मैंने कोमल और लाल रंगकी अँगुलियोंसे सुशोभित लाल-लाल तलवेवाले उस बालकके सुन्दर एवं सुप्रतिष्ठित चरणोंको प्रयत्नपूर्वक पकड़कर उन्हें अपने मस्तकसे प्रणाम किया॥१३२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
दृष्ट्वा परिमितं तस्य प्रभावममितौजसः ॥ १३३ ॥
विनयेनाञ्जलिं कृत्वा प्रयत्नेनोपगम्य ह।
दृष्टो मया स भूतात्मा देवः कमललोचनः ॥ १३४ ॥
मूलम्
दृष्ट्वा परिमितं तस्य प्रभावममितौजसः ॥ १३३ ॥
विनयेनाञ्जलिं कृत्वा प्रयत्नेनोपगम्य ह।
दृष्टो मया स भूतात्मा देवः कमललोचनः ॥ १३४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
उस अमित तेजस्वी शिशुका अनन्त प्रभाव देखकर मैं यत्नपूर्वक उसके समीप गया और विनीतभावसे हाथ जोड़कर सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा उस कमलनयन देवताका दर्शन किया॥१३३-१३४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तमहं प्राञ्जलिर्भूत्वा नमस्कृत्येदमब्रुवम् ।
ज्ञातुमिच्छामि देव त्वां मायां चैतां तवोत्तमाम् ॥ १३५ ॥
मूलम्
तमहं प्राञ्जलिर्भूत्वा नमस्कृत्येदमब्रुवम् ।
ज्ञातुमिच्छामि देव त्वां मायां चैतां तवोत्तमाम् ॥ १३५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
फिर हाथ जोड़े नमस्कार करके मैंने उससे इस प्रकार कहा—देव! मैं आपको और आपकी इस उत्तम मायाको जानना चाहता हूँ॥१३५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
आस्येनानुप्रविष्टोऽहं शरीरे भगवंस्तव ।
दृष्टवानखिलान् सर्वान् समस्तान् जठरे हि ते ॥ १३६ ॥
मूलम्
आस्येनानुप्रविष्टोऽहं शरीरे भगवंस्तव ।
दृष्टवानखिलान् सर्वान् समस्तान् जठरे हि ते ॥ १३६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘भगवन्! मैंने आपके मुखकी राहसे शरीरमें प्रवेश करके आपके उदरमें समस्त सांसारिक पदार्थोंका अवलोकन किया है॥१३६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तव देव शरीरस्था देवदानवराक्षसाः।
यक्षगन्धर्वनागाश्च जगत् स्थावरजङ्गमम् ॥ १३७ ॥
मूलम्
तव देव शरीरस्था देवदानवराक्षसाः।
यक्षगन्धर्वनागाश्च जगत् स्थावरजङ्गमम् ॥ १३७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘देव! आपके शरीरमें देवता, दानव, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, नाग तथा समस्त स्थावर-जंगमरूप जगत् विद्यमान है॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
त्वत्प्रसादाच्च मे देव स्मृतिर्न परिहीयते।
द्रुतमन्तःशरीरे ते सततं परिवर्तिनः ॥ १३८ ॥
मूलम्
त्वत्प्रसादाच्च मे देव स्मृतिर्न परिहीयते।
द्रुतमन्तःशरीरे ते सततं परिवर्तिनः ॥ १३८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘प्रभो! आपकी कृपासे आपके शरीरके भीतर निरन्तर शीघ्र गतिसे घूमते रहनेपर भी मेरी स्मरणशक्ति नष्ट नहीं हुई है॥१३८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
निर्गतोऽहमकामस्तु इच्छया ते महाप्रभो।
इच्छामि पुण्डरीकाक्ष ज्ञातुं त्वाहमनिन्दितम् ॥ १३९ ॥
मूलम्
निर्गतोऽहमकामस्तु इच्छया ते महाप्रभो।
इच्छामि पुण्डरीकाक्ष ज्ञातुं त्वाहमनिन्दितम् ॥ १३९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘महाप्रभो! मैं अपनी अभिलाषा न रहनेपर भी केवल आपकी इच्छासे बाहर निकल आया हूँ। कमलनयन! आप सर्वोत्कृष्ट देवताको मैं जानना चाहता हूँ॥१३९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
इह भूत्वा शिशुः साक्षात् किं भवानवतिष्ठते।
पीत्वा जगदिदं सर्वमेतदाख्यातुमर्हसि ॥ १४० ॥
मूलम्
इह भूत्वा शिशुः साक्षात् किं भवानवतिष्ठते।
पीत्वा जगदिदं सर्वमेतदाख्यातुमर्हसि ॥ १४० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘आप इस सम्पूर्ण जगत्को पी करके यहाँ साक्षात् बालकवेषमें क्यों विराजमान हैं? यह सब बतानेकी कृपा करें॥१४०॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
किमर्थं च जगत् सर्वं शरीरस्थं तवानघ।
कियन्तं च त्वया कालमिह स्थेयमरिंदम ॥ १४१ ॥
मूलम्
किमर्थं च जगत् सर्वं शरीरस्थं तवानघ।
कियन्तं च त्वया कालमिह स्थेयमरिंदम ॥ १४१ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘अनघ! यह सारा संसार आपके शरीरमें किसलिये स्थित है? शत्रुदमन! आप कितने समयतक यहाँ इस रूपमें रहेंगे?॥१४१॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
एतदिच्छामि देवेश श्रोतुं ब्राह्मणकाम्यया।
त्वत्तः कमलपत्राक्ष विस्तरेण यथातथम् ॥ १४२ ॥
मूलम्
एतदिच्छामि देवेश श्रोतुं ब्राह्मणकाम्यया।
त्वत्तः कमलपत्राक्ष विस्तरेण यथातथम् ॥ १४२ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘देवेश्वर! कमलनयन! ब्राह्मणमें जो सहज जिज्ञासा होती है, उससे प्रेरित होकर मैं आपसे यह सब बातें यथाविधि विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ॥१४२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
महद्ध्येतदचिन्त्यं च यदहं दृष्टवान् प्रभो।
इत्युक्तः स मया श्रीमान् देवदेवो महाद्युतिः।
सान्त्वयन् मामिदं वाक्यमुवाच वदतां वरः ॥ १४३ ॥
मूलम्
महद्ध्येतदचिन्त्यं च यदहं दृष्टवान् प्रभो।
इत्युक्तः स मया श्रीमान् देवदेवो महाद्युतिः।
सान्त्वयन् मामिदं वाक्यमुवाच वदतां वरः ॥ १४३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘प्रभो! मैंने जो कुछ देखा है, यह अगाध और अचिन्त्य है।’ मेरे इस प्रकार पूछनेपर वे वक्ताओंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी देवाधिदेव श्रीभगवान् मुझे सान्त्वना देते हुए इस प्रकार बोले॥१४३॥
मूलम् (समाप्तिः)
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि अष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८८ ॥
मूलम् (वचनम्)
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें एक सौ अट्ठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥१८८॥
सूचना (हिन्दी)
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल १४४ श्लोक हैं)
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अट्टमन्नं शिवो वेदो ब्राह्मणाश्च चतुष्पथाः। केशो भगं समाख्यातं शूलं तद् विक्रयं विदुः॥ (नीलकण्ठकृत टीका) ↩︎