भागसूचना
सप्ताशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
सूचना (हिन्दी)
वैवस्वत मनुका चरित्र तथा मत्स्यावतारकी कथा
मूलम् (वचनम्)
वैशम्पायन उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
ततः स पाण्डवो विप्रं मार्कण्डेयमुवाच ह।
कथयस्वेति चरितं मनोर्वैवस्वतस्य च ॥ १ ॥
मूलम्
ततः स पाण्डवो विप्रं मार्कण्डेयमुवाच ह।
कथयस्वेति चरितं मनोर्वैवस्वतस्य च ॥ १ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! इसके बाद पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने मार्कण्डेयजीसे कहा—‘अब आप हमसे वैवस्वत मनुके चरित्र कहिये’॥१॥
मूलम् (वचनम्)
मार्कण्डेय उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
विवस्वतः सुतो राजन् महर्षिः सुप्रतापवान्।
बभूव नरशार्दूल प्रजापतिसमद्युतिः ॥ २ ॥
मूलम्
विवस्वतः सुतो राजन् महर्षिः सुप्रतापवान्।
बभूव नरशार्दूल प्रजापतिसमद्युतिः ॥ २ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
मार्कण्डेयजी बोले— नरश्रेष्ठ नरेश! विवस्वान् (सूर्य)-के एक अत्यन्त प्रतापी पुत्र हुआ, जो प्रजापतिके समान कान्तिमान् और महान् ऋषि था॥२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
ओजसा तेजसा लक्ष्म्या तपसा च विशेषतः।
अतिचक्राम पितरं मनुः स्वं च पितामहम् ॥ ३ ॥
मूलम्
ओजसा तेजसा लक्ष्म्या तपसा च विशेषतः।
अतिचक्राम पितरं मनुः स्वं च पितामहम् ॥ ३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
वह बालक मनु ओज, तेज, कान्ति और विशेषतः तपस्याद्वारा अपने पिता भगवान् सूर्य तथा पितामह महर्षि कश्यपसे भी आगे बढ़ गया॥३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
ऊर्ध्वबाहुर्विशालायं बदर्यां स नराधिप।
एकपादस्थितस्तीव्रं चकार सुमहत् तपः ॥ ४ ॥
अवाक्शिरास्तथा चापि नेत्रैरनिमिषैर्दृढम् ।
सोऽतप्यत तपो घोरं वर्षाणामयुतं तदा ॥ ५ ॥
मूलम्
ऊर्ध्वबाहुर्विशालायं बदर्यां स नराधिप।
एकपादस्थितस्तीव्रं चकार सुमहत् तपः ॥ ४ ॥
अवाक्शिरास्तथा चापि नेत्रैरनिमिषैर्दृढम् ।
सोऽतप्यत तपो घोरं वर्षाणामयुतं तदा ॥ ५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
महाराज! उसने बदरिकाश्रममें जाकर दोनों बाँहें ऊपर उठाये एक पैरसे खड़ा हो दस हजार वर्षोंतक बड़ी भारी तपस्या की। उस समय उसका सिर नीचेकी ओर झुका हुआ था और वह एकटक नेत्रोंसे निरन्तर देखता रहता था। इस प्रकार बड़ी दृढ़ताके साथ उस बालकने घोर तप किया॥४-५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तं कदाचित् तपस्यन्तमार्द्रचीरजटाधरम् ।
चीरिणीतीरमागम्य मत्स्यो वचनमब्रवीत् ॥ ६ ॥
मूलम्
तं कदाचित् तपस्यन्तमार्द्रचीरजटाधरम् ।
चीरिणीतीरमागम्य मत्स्यो वचनमब्रवीत् ॥ ६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
(वही बालक वैवस्वत मनुके नामसे प्रसिद्ध हुआ।) एक दिनकी बात है, मनु भीगे चीर और जटा धारण किये चीरिणी नदीके तटपर तपस्या कर रहे थे। उस समय एक मत्स्य आकर इस प्रकार बोला—॥६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
भगवन् क्षुद्रमत्स्योऽस्मि बलवद्भ्यो भयं मम।
मत्स्येभ्यो हि ततो मां त्वं त्रातुमर्हसि सुव्रत ॥ ७ ॥
मूलम्
भगवन् क्षुद्रमत्स्योऽस्मि बलवद्भ्यो भयं मम।
मत्स्येभ्यो हि ततो मां त्वं त्रातुमर्हसि सुव्रत ॥ ७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘भगवन्! मैं एक छोटा-सा मत्स्य हूँ। मुझे (अपनी जातिके) बलवान् मत्स्योंसे बराबर भय बना रहता है। अतः उत्तम व्रतका पालन करनेवाले सहर्षे! आप उनसे मेरी रक्षा करें॥७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
दुर्बलं बलवन्तो हि मत्स्या मत्स्यं विशेषतः।
आस्वदन्ति सदा वृत्तिर्विहिता नः सनातनी ॥ ८ ॥
मूलम्
दुर्बलं बलवन्तो हि मत्स्या मत्स्यं विशेषतः।
आस्वदन्ति सदा वृत्तिर्विहिता नः सनातनी ॥ ८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘बलवान् मत्स्य विशेषतः दुर्बल मत्स्यको अपना आहार बना लेते हैं, यह सदासे हमारी मत्स्य-जातिकी नियत—वृत्ति है॥८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तस्माद् भयौघान्महतो मज्जन्तं मां विशेषतः।
त्रातुमर्हसि कर्तास्मि कृते प्रतिकृतं तव ॥ ९ ॥
मूलम्
तस्माद् भयौघान्महतो मज्जन्तं मां विशेषतः।
त्रातुमर्हसि कर्तास्मि कृते प्रतिकृतं तव ॥ ९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘इसलिये भयके महान् समुद्रमें मैं डूब रहा हूँ। आप विशेष प्रयत्न करके मुझे बचानेका कष्ट करें। आपके इस उपकारके बदले मैं भी प्रत्युपकार करूँगा’॥९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
स मत्स्यवचनं श्रुत्वा कृपयाभिपरिप्लुतः।
मनुर्वैवस्वतोऽगृह्णात् तं मत्स्यं पाणिना स्वयम् ॥ १० ॥
उदकान्तमुपानीय मत्स्यं वैवस्वतो मनुः।
अलिञ्जरे प्राक्षिपत् तं चन्द्रांशुसदृशप्रभम् ॥ ११ ॥
मूलम्
स मत्स्यवचनं श्रुत्वा कृपयाभिपरिप्लुतः।
मनुर्वैवस्वतोऽगृह्णात् तं मत्स्यं पाणिना स्वयम् ॥ १० ॥
उदकान्तमुपानीय मत्स्यं वैवस्वतो मनुः।
अलिञ्जरे प्राक्षिपत् तं चन्द्रांशुसदृशप्रभम् ॥ ११ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
मत्स्यकी यह बात सुनकर वैवस्वत मनुको बड़ी दया आयी। उन्होंने स्वयं अपने हाथसे चन्द्रमाकी किरणोंके समान श्वेत रंगवाले उस मत्स्यको उठा लिया और पानीके बाहर लाकर मटकेमें डाल दिया॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
स तत्र ववृधे राजन् मत्स्यः परमसत्कृतः।
पुत्रवत् स्वीकरोत् तस्मै मनुर्भावं विशेषतः ॥ १२ ॥
अथ कालेन महता स मत्स्यः सुमहानभूत्।
अलिञ्जरे यथा चैव नासौ समभवत् किल ॥ १३ ॥
मूलम्
स तत्र ववृधे राजन् मत्स्यः परमसत्कृतः।
पुत्रवत् स्वीकरोत् तस्मै मनुर्भावं विशेषतः ॥ १२ ॥
अथ कालेन महता स मत्स्यः सुमहानभूत्।
अलिञ्जरे यथा चैव नासौ समभवत् किल ॥ १३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
राजन्! वहाँ उन्होंने बड़े आदरके साथ उसका पालन-पोषण किया और वह दिन-दिन बढ़ने लगा। मनुने उसके प्रति पुत्रके समान विशेष वात्सल्य भाव प्रकट किया। तदनन्तर दीर्घकाल बीतनेपर वह मत्स्य इतना बड़ा हो गया कि मटकेमें उसका रहना असम्भव हो गया॥१२-१३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अथ मत्स्यो मनुं दृष्ट्वा पुनरेवाभ्यभाषत।
भगवन् साधु मेऽद्यान्यत् स्थानं सम्प्रतिपादय ॥ १४ ॥
मूलम्
अथ मत्स्यो मनुं दृष्ट्वा पुनरेवाभ्यभाषत।
भगवन् साधु मेऽद्यान्यत् स्थानं सम्प्रतिपादय ॥ १४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
तब एक दिन मत्स्यने मनुको देखकर फिर कहा—‘भगवन्! अब आप मेरे लिये इससे अच्छा कोई दूसरा स्थान दीजिये’॥१४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
उद्धृत्यालिञ्जरात् तस्मात् ततः स भगवान् मनुः।
तं मत्स्यमनयद् वापीं महतीं स मनुस्तदा ॥ १५ ॥
मूलम्
उद्धृत्यालिञ्जरात् तस्मात् ततः स भगवान् मनुः।
तं मत्स्यमनयद् वापीं महतीं स मनुस्तदा ॥ १५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
तब वे भगवान् मनु उस मत्स्यको उस मटकेसे निकालकर एक बहुत बड़ी बावलीके पास ले गये॥१५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तत्र तं प्राक्षिपच्चापि मनुः परपुरंजय।
अथावर्धत मत्स्यः स पुनर्वर्षगणान् बहून् ॥ १६ ॥
मूलम्
तत्र तं प्राक्षिपच्चापि मनुः परपुरंजय।
अथावर्धत मत्स्यः स पुनर्वर्षगणान् बहून् ॥ १६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
शत्रुविजयी युधिष्ठिर! मनुने उसे वहीं डाल दिया। अब वह मत्स्य अनेक वर्षोंतक उसीमें क्रमशः बढ़ता रहा॥१६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
द्वियोजनायता वापी विस्तृता चापि योजनम्।
तस्यां नासौ समभवन्मत्स्यो राजीवलोचन ॥ १७ ॥
मूलम्
द्वियोजनायता वापी विस्तृता चापि योजनम्।
तस्यां नासौ समभवन्मत्स्यो राजीवलोचन ॥ १७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
कमलनयन! उस बावलीकी लम्बाई दो योजन और चौड़ाई एक योजनकी थी; परंतु उसमें भी उस मत्स्यका रहना कठिन हो गया॥१७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
विचेष्टितुं च कौन्तेय मत्स्यो वाप्यां विशाम्पते।
मनुं मत्स्यस्ततो दृष्ट्वा पुनरेवाभ्यभाषत ॥ १८ ॥
मूलम्
विचेष्टितुं च कौन्तेय मत्स्यो वाप्यां विशाम्पते।
मनुं मत्स्यस्ततो दृष्ट्वा पुनरेवाभ्यभाषत ॥ १८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
नराधिप कुन्तीनन्दन! वह उस बावलीमें हिल-डुल भी नहीं पाता था। अतः मनुको देखकर वह पुनः बोला—॥१८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
नय मां भगवन् साधो समुद्रमहिषीं प्रियाम्।
गङ्गां तत्र निवत्स्यामि यथा वा तात मन्यसे ॥ १९ ॥
निदेशे हि मया तुभ्यं स्थातव्यमनसूयता।
वृद्धिर्हि परमा प्राप्ता त्वत्कृते हि मयानघ ॥ २० ॥
मूलम्
नय मां भगवन् साधो समुद्रमहिषीं प्रियाम्।
गङ्गां तत्र निवत्स्यामि यथा वा तात मन्यसे ॥ १९ ॥
निदेशे हि मया तुभ्यं स्थातव्यमनसूयता।
वृद्धिर्हि परमा प्राप्ता त्वत्कृते हि मयानघ ॥ २० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘भगवन्! साधुबाबा! अब आप मुझे समुद्रकी प्यारी पटरानी गंगाजीमें ले चलिये। मैं वहीं निवास करूँगा। अथवा तात! आप जहाँ उचित समझें, ले चलें। अनघ! मुझे दोषदृष्टिका परित्याग करके सदा आपके आज्ञापालनमें स्थिर रहना है; क्योंकि आपके कारण ही मैं भलीभाँति पुष्ट होकर इतना बड़ा हुआ हूँ’॥१९-२०॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
एवमुक्तो मनुर्मत्स्यमनयद् भगवान् वशी।
नदीं गङ्गां तत्र चैनं स्वयं प्राक्षिपदच्युतः ॥ २१ ॥
मूलम्
एवमुक्तो मनुर्मत्स्यमनयद् भगवान् वशी।
नदीं गङ्गां तत्र चैनं स्वयं प्राक्षिपदच्युतः ॥ २१ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
मत्स्यके ऐसा कहनेपर जितेन्द्रिय, अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले भगवान् मनुने उसे स्वयं ले जाकर गंगामें डाल दिया॥२१॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
स तत्र ववृधे मत्स्यः किंचित्कालमरिंदम।
ततः पुनर्मनुं दृष्ट्वा मत्स्यो वचनमब्रवीत् ॥ २२ ॥
गङ्गायां हि न शक्नोमि बृहत्त्वाच्चेष्टितुं प्रभो।
समुद्रं नय मामाशु प्रसीद भगवन्निति ॥ २३ ॥
उद्धृत्य गङ्गासलिलात् ततो मत्स्यं मनुः स्वयम्।
समुद्रमनयत् पार्थ तत्र चैनमवासृजत् ॥ २४ ॥
मूलम्
स तत्र ववृधे मत्स्यः किंचित्कालमरिंदम।
ततः पुनर्मनुं दृष्ट्वा मत्स्यो वचनमब्रवीत् ॥ २२ ॥
गङ्गायां हि न शक्नोमि बृहत्त्वाच्चेष्टितुं प्रभो।
समुद्रं नय मामाशु प्रसीद भगवन्निति ॥ २३ ॥
उद्धृत्य गङ्गासलिलात् ततो मत्स्यं मनुः स्वयम्।
समुद्रमनयत् पार्थ तत्र चैनमवासृजत् ॥ २४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
शत्रुदमन! फिर वह मत्स्य वहाँ कुछ कालतक बढ़ता रहा। फिर एक दिन मनुको देखकर उसने कहा—‘प्रभो! मेरा शरीर अब इतना बड़ा हो गया है कि मैं गंगाजीमें हिल-डुल नहीं सकता। अतः मुझे शीघ्र ही समुद्रमें ले चलिये। भगवन्! आप प्रसन्न होकर मुझपर इतनी कृपा अवश्य कीजिये।’ कुन्तीनन्दन! तब मनुने स्वयं उस मत्स्यको गंगाजीके जलसे निकालकर समुद्रतक पहुँचाया और उसमें छोड़ दिया॥२२—२४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
सुमहानपि मत्स्यस्तु स मनोर्नयतस्तदा।
आसीद् यथेष्टहार्यश्च स्पर्शगन्धसुखस्य वै ॥ २५ ॥
मूलम्
सुमहानपि मत्स्यस्तु स मनोर्नयतस्तदा।
आसीद् यथेष्टहार्यश्च स्पर्शगन्धसुखस्य वै ॥ २५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
राजन्! यद्यपि वह मत्स्य बहुत विशाल था, तो भी जब मनु उसे ले जाने लगे, तब वह ऐसा बन गया, जिससे आसानीसे ले जाया जा सके। उसका स्पर्श और गन्ध दोनों मनुके लिये बड़े सुखकर थे॥२५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
यदा समुद्रे प्रक्षिप्तः स मत्स्यो मनुना तदा।
तत एनमिदं वाक्यं स्मयमान इवाब्रवीत् ॥ २६ ॥
मूलम्
यदा समुद्रे प्रक्षिप्तः स मत्स्यो मनुना तदा।
तत एनमिदं वाक्यं स्मयमान इवाब्रवीत् ॥ २६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
जब मनुने उस मत्स्यको समुद्रमें डाल दिया, तब इसने उनसे मुसकराते हुए-से कहा—॥२६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
भगवन् हि कृता रक्षा त्वया सर्वा विशेषतः।
प्राप्तकालं तु यत् कार्यं त्वया तच्छ्रूयतां मम ॥ २७ ॥
मूलम्
भगवन् हि कृता रक्षा त्वया सर्वा विशेषतः।
प्राप्तकालं तु यत् कार्यं त्वया तच्छ्रूयतां मम ॥ २७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘भगवन्! आपने विशेष मनोयोगके साथ सब प्रकारसे मेरी रक्षा की है, अब आपके लिये जिस कार्यका अवसर प्राप्त हुआ है, वह बताता हूँ, सुनिये—॥२७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अचिराद् भगवन् भौममिदं स्थावरजङ्गमम्।
सर्वमेव महाभाग प्रलयं वै गमिष्यति ॥ २८ ॥
मूलम्
अचिराद् भगवन् भौममिदं स्थावरजङ्गमम्।
सर्वमेव महाभाग प्रलयं वै गमिष्यति ॥ २८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘भगवन्! यह सारा-का-सारा चराचर पार्थिव जगत् शीघ्र ही नष्ट होनेवाला है। महाभाग! सम्पूर्ण जगत्का प्रलय हो जायगा॥२८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
सम्प्रक्षालनकालोऽयं लोकानां समुपस्थितः ।
तस्मात् त्वां बोधयाम्यद्य यत् ते हितमनुत्तमम् ॥ २९ ॥
मूलम्
सम्प्रक्षालनकालोऽयं लोकानां समुपस्थितः ।
तस्मात् त्वां बोधयाम्यद्य यत् ते हितमनुत्तमम् ॥ २९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘यह सब लोकोंके सम्प्रक्षालन (एकार्णवके जलसे धुलकर नष्ट होने)-का समय आ गया है। इसलिये मैं आपको सचेत करता हूँ और आपके लिये जो परम उत्तम हितकी बात है, उसे बताता हूँ॥२९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
त्रसानां स्थावराणां च यच्चेङ्गं यच्च नेङ्गति।
तस्य सर्वस्य सम्प्राप्तः कालः परमदारुणः ॥ ३० ॥
मूलम्
त्रसानां स्थावराणां च यच्चेङ्गं यच्च नेङ्गति।
तस्य सर्वस्य सम्प्राप्तः कालः परमदारुणः ॥ ३० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘सम्पूर्ण जंगमों तथा स्थावर पदार्थोंमें जो हिल-डुल सकते हैं और जो हिलने-डुलनेवाले नहीं हैं, उन सबके लिये अत्यन्त भयंकर समय आ पहुँचा है॥३०॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
नौश्च कारयितव्या ते दृढा युक्तवटारका।
तत्र सप्तर्षिभिः सार्धमारुहेथा महामुने ॥ ३१ ॥
मूलम्
नौश्च कारयितव्या ते दृढा युक्तवटारका।
तत्र सप्तर्षिभिः सार्धमारुहेथा महामुने ॥ ३१ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘आपको एक मजबूत नाव बनवानी चाहिये, जिसमें (मजबूत) रस्सी जुटी हो। महामुने! फिर आप सप्तर्षियोंके साथ उस नावपर बैठ जाइये॥३१॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
बीजानि चैव सर्वाणि यथोक्तानि द्विजैः पुरा।
तस्यामारोहयेर्नावि सुसंगुप्तानि भागशः ॥ ३२ ॥
मूलम्
बीजानि चैव सर्वाणि यथोक्तानि द्विजैः पुरा।
तस्यामारोहयेर्नावि सुसंगुप्तानि भागशः ॥ ३२ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘पूर्वकालमें ब्राह्मणोंने जो सब प्रकारके बीज बताये हैं, उनका पृथक्-पृथक् संग्रह करके उन्हें सुरक्षितरूपसे उस नावपर रख लें॥३२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
नौस्थश्च मां प्रतीक्षेथास्ततो मुनिजनप्रिय।
आगमिष्याम्यहं शृङ्गी विज्ञेयस्तेन तापस ॥ ३३ ॥
एवमेतत् त्वया कार्यमापृष्टोऽसि व्रजाम्यहम्।
ता न शक्या महत्यो वै आपस्तर्तुं मया विना॥३४॥
मूलम्
नौस्थश्च मां प्रतीक्षेथास्ततो मुनिजनप्रिय।
आगमिष्याम्यहं शृङ्गी विज्ञेयस्तेन तापस ॥ ३३ ॥
एवमेतत् त्वया कार्यमापृष्टोऽसि व्रजाम्यहम्।
ता न शक्या महत्यो वै आपस्तर्तुं मया विना॥३४॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘मुनिजनोंके प्रेमी तपस्वी नरेश! उस नावमें बैठे रहकर आप मेरी प्रतीक्षा कीजियेगा। मैं आपके पास अपने मस्तकमें सींग धारण किये आऊँगा। उसीसे आप मुझे पहचान लेंगे। इस प्रकार यह सब कार्य आपको करना है। अब मैं आपसे आज्ञा चाहता हूँ और यहाँसे जाता हूँ। उस महान् जलराशिको आपलोग मेरी सहायताके बिना पार नहीं कर सकेंगे॥३३-३४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
नाभिशङ्क्यमिदं चापि वचनं मे त्वया विभो।
एवं करिष्य इति तं स मत्स्यं प्रत्यभाषत ॥ ३५ ॥
मूलम्
नाभिशङ्क्यमिदं चापि वचनं मे त्वया विभो।
एवं करिष्य इति तं स मत्स्यं प्रत्यभाषत ॥ ३५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘प्रभो! आप मेरी इस बातमें तनिक भी संदेह न करें।’ तब राजाने उस मत्स्यसे कहा—‘बहुत अच्छा! मैं ऐसा ही करूँगा’॥३५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
जग्मतुश्च यथाकाममनुज्ञाप्य परस्परम् ।
ततो मनुर्महाराज यथोक्तं मत्स्यकेन ह ॥ ३६ ॥
बीजान्यादाय सर्वाणि सागरं पुप्लुवे तदा।
नौकया शुभया वीर महोर्मिणमरिंदम ॥ ३७ ॥
मूलम्
जग्मतुश्च यथाकाममनुज्ञाप्य परस्परम् ।
ततो मनुर्महाराज यथोक्तं मत्स्यकेन ह ॥ ३६ ॥
बीजान्यादाय सर्वाणि सागरं पुप्लुवे तदा।
नौकया शुभया वीर महोर्मिणमरिंदम ॥ ३७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
शत्रुदमन! वे दोनों एक-दूसरेसे विदा लेकर इच्छानुसार वहाँसे चले गये। महाराज! तदनन्तर मनु मत्स्यभगवान्के कथनानुसार सम्पूर्ण बीज लेकर एक सुन्दर नौकाद्वारा उत्ताल तरंगोंसे भरे हुए महासागरमें तैरने लगे॥३६-३७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
चिन्तयामास च मनुस्तं मत्स्यं पृथिवीपते।
स च तच्चिन्तितं ज्ञात्वा मत्स्यः परपुरंजय ॥ ३८ ॥
शृङ्गी तत्राजगामाशु तदा भरतसत्तम।
तं दृष्ट्वा मनुजव्याघ्र मनुर्मत्स्यं जलार्णवे ॥ ३९ ॥
शृङ्गिणं तं यथोक्तेन रूपेणाद्रिमिवोच्छ्रितम्।
वटारकमयं पाशमथ मत्स्यस्य मूर्धनि ॥ ४० ॥
मूलम्
चिन्तयामास च मनुस्तं मत्स्यं पृथिवीपते।
स च तच्चिन्तितं ज्ञात्वा मत्स्यः परपुरंजय ॥ ३८ ॥
शृङ्गी तत्राजगामाशु तदा भरतसत्तम।
तं दृष्ट्वा मनुजव्याघ्र मनुर्मत्स्यं जलार्णवे ॥ ३९ ॥
शृङ्गिणं तं यथोक्तेन रूपेणाद्रिमिवोच्छ्रितम्।
वटारकमयं पाशमथ मत्स्यस्य मूर्धनि ॥ ४० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
शत्रुनगरविजयी नरेश्वर! तदनन्तर मनुने भगवान् मत्स्यका चिन्तन किया। यह जानकर शृंगधारी भगवान् मत्स्य वहाँ शीघ्र आ पहुँचे। नरश्रेष्ठ भरतकुलशिरोमणे! समुद्रमें अपने पूर्वकथित रूपसे ऊँचे पर्वतकी भाँति शृंगधारी मत्स्य भगवान्को आया देख उनके मस्तकवर्ती सींगमें उन्होंने बँटी हुई रस्सी बाँध दी॥३८—४०॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
मनुर्मनुजशार्दूल तस्मिन् शृङ्गे न्यवेशयत्।
संयतस्तेन पाशेन मत्स्यः परपुरंजय ॥ ४१ ॥
वेगेन महता नावं प्राकर्षल्लवणाम्भसि।
स च तांस्तारयन् नावा समुद्रं मनुजेश्वर ॥ ४२ ॥
नृत्यमानमिवोर्मीभिर्गर्जमानमिवाम्भसा ।
क्षोभ्यमाणा महावातैः सा नौस्तस्मिन् महोदधौ ॥ ४३ ॥
घूर्णते चपलेव स्त्री मत्ता परपुरंजय।
नैव भूमिर्न च दिशः प्रदिशो वा चकाशिरे ॥ ४४ ॥
मूलम्
मनुर्मनुजशार्दूल तस्मिन् शृङ्गे न्यवेशयत्।
संयतस्तेन पाशेन मत्स्यः परपुरंजय ॥ ४१ ॥
वेगेन महता नावं प्राकर्षल्लवणाम्भसि।
स च तांस्तारयन् नावा समुद्रं मनुजेश्वर ॥ ४२ ॥
नृत्यमानमिवोर्मीभिर्गर्जमानमिवाम्भसा ।
क्षोभ्यमाणा महावातैः सा नौस्तस्मिन् महोदधौ ॥ ४३ ॥
घूर्णते चपलेव स्त्री मत्ता परपुरंजय।
नैव भूमिर्न च दिशः प्रदिशो वा चकाशिरे ॥ ४४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
शत्रुकी राजधानीपर विजय पानेवाले पुरुषसिंह! मनुने वह नाव उस सींगमें अटका दी। रस्सीसे बँधे हुए मत्स्यभगवान् उन सबको नौकाद्वारा पार उतारनेके लिये उस खारे पानीके समुद्रमें बड़े वेगसे नाव खींचने लगे। मनुजेश्वर! उस समय समुद्र अपनी लहरोंसे नृत्य करता-सा जान पड़ता था। पानीके हिलोरोंसे भयंकर गर्जना-सी कर रहा था। शत्रुविजयी नरेश्वर! उस महासागरमें प्रचण्ड वायुके झोंकोंसे विक्षुब्ध होकर हिलती-डुलती हुई वह नौका चंचल-चित्तवाली मतवाली स्त्रीके समान झूम रही थी। उस समय न तो भूमिका पता लगता था और न दिशाओं तथा विदिशाओंका ही भान होता था॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
सर्वमाम्भसमेवासीत् खं द्यौश्च नरपुङ्गव।
एवंभूते तदा लोके संकुले भरतर्षभ ॥ ४५ ॥
अदृश्यन्तर्षयः सप्त मनुर्मत्स्यस्तथैव च।
एवं बहून् वर्षगणांस्तां नावं सोऽथ मत्स्यकः ॥ ४६ ॥
चकर्षातन्द्रितो राजंस्तस्मिन् सलिलसंचये ।
ततो हिमवतः शृङ्गं यत् परं भरतर्षभ ॥ ४७ ॥
तत्राकर्षत् ततो नावं स मत्स्यः कुरुनन्दन।
अथाब्रवीत् तदा मत्स्यस्तानृषीन् प्रहसन् शनैः ॥ ४८ ॥
अस्मिन् हिमवतः शृङ्गे नावं बध्नीत मा चिरम्।
सा बद्धा तत्र तैस्तूर्णमृषिभिर्भरतर्षभ ॥ ४९ ॥
नौर्मत्स्यस्य वचः श्रुत्वा शृङ्गे हिमवतस्तदा।
तच्च नौबन्धनं नाम शृङ्गं हिमवतः परम् ॥ ५० ॥
मूलम्
सर्वमाम्भसमेवासीत् खं द्यौश्च नरपुङ्गव।
एवंभूते तदा लोके संकुले भरतर्षभ ॥ ४५ ॥
अदृश्यन्तर्षयः सप्त मनुर्मत्स्यस्तथैव च।
एवं बहून् वर्षगणांस्तां नावं सोऽथ मत्स्यकः ॥ ४६ ॥
चकर्षातन्द्रितो राजंस्तस्मिन् सलिलसंचये ।
ततो हिमवतः शृङ्गं यत् परं भरतर्षभ ॥ ४७ ॥
तत्राकर्षत् ततो नावं स मत्स्यः कुरुनन्दन।
अथाब्रवीत् तदा मत्स्यस्तानृषीन् प्रहसन् शनैः ॥ ४८ ॥
अस्मिन् हिमवतः शृङ्गे नावं बध्नीत मा चिरम्।
सा बद्धा तत्र तैस्तूर्णमृषिभिर्भरतर्षभ ॥ ४९ ॥
नौर्मत्स्यस्य वचः श्रुत्वा शृङ्गे हिमवतस्तदा।
तच्च नौबन्धनं नाम शृङ्गं हिमवतः परम् ॥ ५० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
भरतकुलभूषण नरेश्वर! आकाश और द्युलोक सब कुछ जलमय ही प्रतीत होता था। इस प्रकार जब सारा विश्व एकार्णवके जलमें डूबा हुआ था, उस समय केवल सप्तर्षि, मनु और मत्स्य भगवान्—ये ही नौ व्यक्ति दृष्टिगोचर होते थे। राजन्! इस तरह बहुत वर्षोंतक भगवान् मत्स्य आलस्यरहित होकर उस अगाध जलराशिमें उस नौकाको खींचते रहे। भरतकुलतिलक! तदनन्तर हिमालयका जो सर्वोच्च शिखर था, वहाँ मत्स्यभगवान् उस नावको खींचकर ले गये। कुरुनन्दन! तब वे धीरे-धीरे हँसते हुए उन समस्त ऋषियोंसे बोले—‘आपलोग हिमालयके इस शिखरमें इस नावको शीघ्र बाँध दें।’ भरतश्रेष्ठ! मत्स्यका वह वचन सुनकर उन महर्षियोंने तुरंत वहाँ हिमालयके शिखरमें वह नौका बाँध दी। तभीसे हिमालयका वह उत्तम शिखर ‘नौका-बन्धन’ के नामसे विख्यात हुआ॥४५—५०॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
ख्यातमद्यापि कौन्तेय तद् विद्धि भरतर्षभ।
अथाब्रवीदनिमिषस्तानृषीन् सहितस्तदा ॥ ५१ ॥
मूलम्
ख्यातमद्यापि कौन्तेय तद् विद्धि भरतर्षभ।
अथाब्रवीदनिमिषस्तानृषीन् सहितस्तदा ॥ ५१ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
भरतश्रेष्ठ कुन्तीनन्दन! तुम्हें मालूम होना चाहिये कि वह शिखर आज भी उसी नामसे प्रसिद्ध है। तदनन्तर एकटक दृष्टिवाले भगवान् मत्स्य एक साथ उन सब ऋषियोंसे बोले—॥५१॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अहं प्रजापतिर्ब्रह्मा मत्परं नाधिगम्यते।
मत्स्यरूपेण यूयं च मयास्मान्मोक्षिता भयात् ॥ ५२ ॥
मनुना च प्रजाः सर्वाः सदेवासुरमानुषाः।
स्रष्टव्याः सर्वलोकाश्च यच्चेङ्गं यच्च नेङ्गति ॥ ५३ ॥
मूलम्
अहं प्रजापतिर्ब्रह्मा मत्परं नाधिगम्यते।
मत्स्यरूपेण यूयं च मयास्मान्मोक्षिता भयात् ॥ ५२ ॥
मनुना च प्रजाः सर्वाः सदेवासुरमानुषाः।
स्रष्टव्याः सर्वलोकाश्च यच्चेङ्गं यच्च नेङ्गति ॥ ५३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘मैं प्रजापति ब्रह्मा हूँ। मुझसे भिन्न दूसरी कोई वस्तु नहीं उपलब्ध होती। मैंने ही मत्स्यरूप धारण करके इस महान् भयसे तुमलोगोंकी रक्षा की है। अब मनुको चाहिये कि ये देवता, असुर और मनुष्य आदि समस्त प्रजाकी, सब लोकोंकी और सम्पूर्ण चराचरकी सृष्टि करें॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तपसा चापि तीव्रेण प्रतिभास्य भविष्यति।
मत्प्रसादात् प्रजासर्गे न च मोहं गमिष्यति ॥ ५४ ॥
मूलम्
तपसा चापि तीव्रेण प्रतिभास्य भविष्यति।
मत्प्रसादात् प्रजासर्गे न च मोहं गमिष्यति ॥ ५४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘इन्हें तीव्र तपस्याके द्वारा जगत्की सृष्टि करनेकी प्रतिभा प्राप्त हो जायगी। मेरी कृपासे प्रजाकी सृष्टि करते समय इन्हें मोह नहीं होगा॥५४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
इत्युक्त्वा वचनं मत्स्यः क्षणेनादर्शनं गतः।
स्रष्टुकामः प्रजाश्चापि मनुर्वैवस्वतः स्वयम् ॥ ५५ ॥
प्रमूढोऽभूत् प्रजासर्गे तपस्तेपे महत् ततः।
तपसा महता युक्तः सोऽथ स्रष्टुं प्रचक्रमे ॥ ५६ ॥
मूलम्
इत्युक्त्वा वचनं मत्स्यः क्षणेनादर्शनं गतः।
स्रष्टुकामः प्रजाश्चापि मनुर्वैवस्वतः स्वयम् ॥ ५५ ॥
प्रमूढोऽभूत् प्रजासर्गे तपस्तेपे महत् ततः।
तपसा महता युक्तः सोऽथ स्रष्टुं प्रचक्रमे ॥ ५६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
ऐसा कहकर भगवान् मत्स्य क्षणभरमें अदृश्य हो गये। तदनन्तर स्वयं वैवस्वत मनुको प्रजाओंकी सृष्टि करनेकी इच्छा हुई, किंतु प्रजाकी सृष्टि करनेमें उनकी बुद्धि मोहाच्छन्न हो गयी थी। तब उन्होंने बड़ी भारी तपस्या की और महान् तपोबलसे सम्पन्न होकर उन्होंने सृष्टिका कार्य प्रारम्भ किया॥५५-५६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
सर्वाः प्रजा मनुः साक्षाद् यथावद् भरतर्षभ।
इत्येतन्मात्स्यकं नाम पुराणं परिकीर्तितम् ॥ ५७ ॥
मूलम्
सर्वाः प्रजा मनुः साक्षाद् यथावद् भरतर्षभ।
इत्येतन्मात्स्यकं नाम पुराणं परिकीर्तितम् ॥ ५७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
भरतकुलभूषण! फिर वे पूर्वकल्पके अनुसार सारी प्रजाकी यथावत् सृष्टि करने लगे। इस प्रकार यह संक्षेपसे मत्स्य पुराणका वृत्तान्त बताया गया है॥५७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
आख्यानमिदमाख्यातं सर्वपापहरं मया ।
य इदं शृणुयान्नित्यं मनोश्चरितमादितः।
स सुखी सर्वपूर्णार्थः सर्वलोकमियान्नरः ॥ ५८ ॥
मूलम्
आख्यानमिदमाख्यातं सर्वपापहरं मया ।
य इदं शृणुयान्नित्यं मनोश्चरितमादितः।
स सुखी सर्वपूर्णार्थः सर्वलोकमियान्नरः ॥ ५८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
मेरे द्वारा वर्णित यह उपाख्यान सब पापोंको नष्ट करनेवाला है। जो मनुष्य प्रतिदिन प्रारम्भसे ही मनुके इस चरित्रको सुनता है, वह सुखी हो सम्पूर्ण मनोरथोंको पा लेता और सब लोकोंमें जा सकता है॥५८॥
मूलम् (समाप्तिः)
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि मत्स्योपाख्याने सप्ताशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८७ ॥
मूलम् (वचनम्)
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें मत्स्योपाख्यानविषयक एक सौ सतासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥१८७॥