भागसूचना
पञ्चाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
सूचना (हिन्दी)
ब्राह्मणकी महिमाके विषयमें अत्रिमुनि तथा राजा पृथुकी प्रशंसा
मूलम् (वचनम्)
मार्कण्डेय उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
भूय एव महाभाग्यं ब्राह्मणानां निबोध मे।
वैन्यो नामेह राजर्षिरश्वमेधाय दीक्षितः ॥ १ ॥
मूलम्
भूय एव महाभाग्यं ब्राह्मणानां निबोध मे।
वैन्यो नामेह राजर्षिरश्वमेधाय दीक्षितः ॥ १ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
मार्कण्डेयजी कहते हैं— राजन्! ब्राह्मणोंका और भी माहात्म्य मुझसे सुनो। पूर्वकालमें वेनके पुत्र राजर्षि पृथुने, जो यहाँ वैन्यके नामसे प्रसिद्ध थे, किसी समय अश्वमेधयज्ञकी दीक्षा ली॥१॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तमत्रिर्गन्तुमारेभे वित्तार्थमिति नः श्रुतम्।
भूयोऽर्थं नानुरुध्यत् स धर्मव्यक्तिनिदर्शनात् ॥ २ ॥
मूलम्
तमत्रिर्गन्तुमारेभे वित्तार्थमिति नः श्रुतम्।
भूयोऽर्थं नानुरुध्यत् स धर्मव्यक्तिनिदर्शनात् ॥ २ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
उन दिनों महात्मा अत्रिने धन माँगनेकी इच्छासे उनके पास जानेका विचार किया, यह बात हमारे सुननेमें आयी है; परंतु ऐसा करनेसे उनको अपना धर्मात्मापन प्रकट करना पड़ता। इसलिये फिर उन्होंने धनके लिये अनुरोध नहीं किया॥२॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
स विचिन्त्य महातेजा वनमेवान्वरोचयत्।
धर्मपत्नीं समाहूय पुत्रांश्चेदमुवाच ह ॥ ३ ॥
मूलम्
स विचिन्त्य महातेजा वनमेवान्वरोचयत्।
धर्मपत्नीं समाहूय पुत्रांश्चेदमुवाच ह ॥ ३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
महातेजस्वी अत्रिने मन-ही-मन कुछ सोच-विचारकर (तपस्याके लिये) वनमें ही जानेका निश्चय किया और अपनी धर्मपत्नी तथा पुत्रोंको बुलाकर इस प्रकार कहा—॥३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
प्राप्स्यामः फलमत्यन्तं बहुलं निरुपद्रवम्।
अरण्यगमनं क्षिप्रं रोचतां वो गुणाधिकम् ॥ ४ ॥
मूलम्
प्राप्स्यामः फलमत्यन्तं बहुलं निरुपद्रवम्।
अरण्यगमनं क्षिप्रं रोचतां वो गुणाधिकम् ॥ ४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘हमलोग वनमें रहकर (तपद्वारा) धर्मका बहुत अधिक उपद्रवशून्य फल पा सकते हैं। अतः शीघ्र वनमें चलनेका विचार तुम सब लोगोंको रुचिकर होना चाहिये; क्योंकि ग्राम्य-जीवनकी अपेक्षा वनमें रहना अधिक लाभप्रद है’॥४॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तं भार्या प्रत्युवाचाथ धर्ममेवानुतन्वती।
वैन्यं गत्वा महात्मानमर्थयस्व धनं बहु ॥ ५ ॥
मूलम्
तं भार्या प्रत्युवाचाथ धर्ममेवानुतन्वती।
वैन्यं गत्वा महात्मानमर्थयस्व धनं बहु ॥ ५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
अत्रिकी पत्नी भी धर्मका ही अनुसरण करनेवाली थी। उसने यज्ञ-यागादिके रूपमें धर्मके ही विस्तारपर दृष्टि रखकर पतिको उत्तर दिया—‘प्राणनाथ! आप धर्मात्मा राजा वैन्यके पास जाकर अधिक धनकी याचना कीजिये॥५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
स ते दास्यति राजर्षिर्यजमानोऽर्थितो धनम्।
तत आदाय विप्रर्षे प्रतिगृह्य धनं बहु ॥ ६ ॥
भृत्यान् सुतान् संविभज्य ततो व्रज यथेप्सितम्।
एष वै परमो धर्मो धर्मविद्भिरुदाहृतः ॥ ७ ॥
मूलम्
स ते दास्यति राजर्षिर्यजमानोऽर्थितो धनम्।
तत आदाय विप्रर्षे प्रतिगृह्य धनं बहु ॥ ६ ॥
भृत्यान् सुतान् संविभज्य ततो व्रज यथेप्सितम्।
एष वै परमो धर्मो धर्मविद्भिरुदाहृतः ॥ ७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘वे राजर्षि इन दिनों यज्ञ कर रहे हैं, अतः इस अवसरपर यदि आप उनसे माँगेंगे तो वे आपको अधिक धन देंगे। ब्रह्मर्षे! वहाँसे प्रचुर धन लाकर भरण-पोषण करनेयोग्य इन पुत्रोंको बाँट दीजिये; फिर इच्छानुसार वनको चलिये। धर्मज्ञ महात्माओंने यही परम धर्म बताया है’॥६-७॥
मूलम् (वचनम्)
अत्रिरुवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
कथितो मे महाभागे गौतमेन महात्मना।
वैन्यो धर्मार्थसंयुक्तः सत्यव्रतसमन्वितः ॥ ८ ॥
मूलम्
कथितो मे महाभागे गौतमेन महात्मना।
वैन्यो धर्मार्थसंयुक्तः सत्यव्रतसमन्वितः ॥ ८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
अत्रि बोले— महाभागे! महात्मा गौतमने मुझसे कहा है कि ‘वेनपुत्र राजा पृथु धर्म और अर्थके साधनमें संलग्न रहते हैं। वे सत्यव्रती हैं’॥८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
द्वेष्टारः किंतु नः सन्ति वसन्तस्तत्र वै द्विजाः।
यथा मे गौतमः प्राह ततो न व्यवसाम्यहम् ॥ ९ ॥
मूलम्
द्वेष्टारः किंतु नः सन्ति वसन्तस्तत्र वै द्विजाः।
यथा मे गौतमः प्राह ततो न व्यवसाम्यहम् ॥ ९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
परंतु एक बात विचारणीय है। वहाँ उनके यज्ञमें जितने ब्राह्मण रहते हैं, वे सभी मुझसे द्वेष रखते हैं, यही बात गौतमने भी कही है। इसीलिये मैं वहाँ जानेका विचार नहीं कर रहा हूँ॥९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तत्र स्म वाचं कल्याणीं धर्मकामार्थसंहिताम्।
मयोक्तामन्यथा ब्रूयुस्ततस्ते वै निरर्थिकाम् ॥ १० ॥
मूलम्
तत्र स्म वाचं कल्याणीं धर्मकामार्थसंहिताम्।
मयोक्तामन्यथा ब्रूयुस्ततस्ते वै निरर्थिकाम् ॥ १० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
यदि मैं वहाँ जाकर धर्म, अर्थ और कामसे युता कल्याणमयी वाणी भी बोलूँगा तो वे उसे धर्म और अर्थके विपरीत ही बतायेंगे; निरर्थक सिद्ध करेंगे॥१०॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
गमिष्यामि महाप्राज्ञे रोचते मे वचस्तव।
गाश्च मे दास्यते वैन्यः प्रभूतं चार्थसंचयम् ॥ ११ ॥
मूलम्
गमिष्यामि महाप्राज्ञे रोचते मे वचस्तव।
गाश्च मे दास्यते वैन्यः प्रभूतं चार्थसंचयम् ॥ ११ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
तथापि महाप्राज्ञे! मैं वहाँ अवश्य जाऊँगा, मुझे तुम्हारी बात ठीक जँचती है। राजा पृथु मुझे बहुत-सी गौएँ तो देंगे ही, पर्याप्त धन भी देंगे॥११॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
एवमुक्त्वा जगामाशु वैन्ययज्ञं महातपाः।
गत्वा च यज्ञायतनमत्रिस्तुष्टाव तं नृपम् ॥ १२ ॥
वाक्यैर्मङ्गलसंयुक्तैः पूजयानोऽब्रवीद् वचः ।
मूलम्
एवमुक्त्वा जगामाशु वैन्ययज्ञं महातपाः।
गत्वा च यज्ञायतनमत्रिस्तुष्टाव तं नृपम् ॥ १२ ॥
वाक्यैर्मङ्गलसंयुक्तैः पूजयानोऽब्रवीद् वचः ।
अनुवाद (हिन्दी)
ऐसा कहकर महातपस्वी अत्रि शीघ्र ही राजा पृथुके यज्ञमें गये। यज्ञमण्डपमें पहुँचकर उन्होंने उस राजाका मांगलिक वचनोंद्वारा स्तवन किया और उनका समादर करते हुए इस प्रकार कहा॥१२॥
मूलम् (वचनम्)
अत्रिरुवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
राजन् धन्यस्त्वमीशश्च भुवि त्वं प्रथमो नृपः ॥ १३ ॥
मूलम्
राजन् धन्यस्त्वमीशश्च भुवि त्वं प्रथमो नृपः ॥ १३ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
अत्रि बोले— राजन्! तुम इस भूतलके सर्वप्रथम राजा हो; अतः धन्य हो, सब प्रकारके ऐश्वर्यसे सम्पन्न हो॥१३॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
स्तुवन्ति त्वां मुनिगणास्त्वदन्यो नास्ति धर्मवित्।
तमब्रवीदृषिः क्रुद्धो वचनं वै महातपाः ॥ १४ ॥
मूलम्
स्तुवन्ति त्वां मुनिगणास्त्वदन्यो नास्ति धर्मवित्।
तमब्रवीदृषिः क्रुद्धो वचनं वै महातपाः ॥ १४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
महर्षिगण तुम्हारी स्तुति करते हैं। तुम्हारे सिवा दूसरा कोई नरेश धर्मका ज्ञाता नहीं है। उनकी यह बात सुनकर महातपस्वी गौतम मुनिने कुपित होकर कहा॥१४॥
मूलम् (वचनम्)
गौतम उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
मैवमत्रे पुनर्ब्रूया न ते प्रज्ञा समाहिता।
अत्र नः प्रथमं स्थाता महेन्द्रो वै प्रजापतिः ॥ १५ ॥
मूलम्
मैवमत्रे पुनर्ब्रूया न ते प्रज्ञा समाहिता।
अत्र नः प्रथमं स्थाता महेन्द्रो वै प्रजापतिः ॥ १५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
गौतम बोलें— अत्रे! फिर कभी ऐसी बात मुँहसे न निकालना। तुम्हारी बुद्धि एकाग्र नहीं है। यहाँ हमारे प्रथम प्रजापतिके रूपमें साक्षात् इन्द्र उपस्थित हैं॥१५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अथात्रिरपि राजेन्द्र गौतमं प्रत्यभाषत।
अयमेव विधाता हि यथैवेन्द्रः प्रजापतिः।
त्वमेव मुह्यसे मोहान्न प्रज्ञानं तवास्ति ह ॥ १६ ॥
मूलम्
अथात्रिरपि राजेन्द्र गौतमं प्रत्यभाषत।
अयमेव विधाता हि यथैवेन्द्रः प्रजापतिः।
त्वमेव मुह्यसे मोहान्न प्रज्ञानं तवास्ति ह ॥ १६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
राजेन्द्र! तब अत्रिने भी गौतमको उत्तर देते हुए कहा—‘मुने! ये पृथु ही विधाता हैं, ये ही प्रजापति इन्द्रके समान हैं। तुम्हीं मोहसे मोहित हो रहे हो; तुम्हें उत्तम बुद्धि नहीं प्राप्त है’॥१६॥
मूलम् (वचनम्)
गौतम उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
जानामि नाहं मुह्यामि त्वमेवात्र विमुह्यते।
स्तौषि त्वं दर्शनप्रेप्सू राजानं जनसंसदि ॥ १७ ॥
मूलम्
जानामि नाहं मुह्यामि त्वमेवात्र विमुह्यते।
स्तौषि त्वं दर्शनप्रेप्सू राजानं जनसंसदि ॥ १७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
गौतम बोले— मैं नहीं मोहमें पड़ा हूँ, तुम्हीं यहाँ आकर मोहित हो रहे हो। मैं खूब समझता हूँ, तुम राजासे मिलनेकी इच्छा लेकर ही भरी सभामें स्वार्थवश उनकी स्तुति कर रहे हो॥१७॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
न वेत्थ परमं धर्मं न चावैषि प्रयोजनम्।
बालस्त्वमसि मूढश्च वृद्धः केनापि हेतुना ॥ १८ ॥
मूलम्
न वेत्थ परमं धर्मं न चावैषि प्रयोजनम्।
बालस्त्वमसि मूढश्च वृद्धः केनापि हेतुना ॥ १८ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
उत्तम धर्मका तुम्हें बिलकुल ज्ञान नहीं है। तुम धर्मका प्रयोजन भी नहीं समझते हो। मेरी दृष्टिमें तुम मूढ हो, बालक हो; किसी विशेष कारणसे बूढ़े बने हुए हो अर्थात् केवल अवस्थासे बूढ़े हो॥१८॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
विवदन्तौ तथा तौ तु मुनीनां दर्शने स्थितौ।
ये तस्य यज्ञे संवृत्तास्तेऽपृच्छन्त कथं त्विमौ ॥ १९ ॥
मूलम्
विवदन्तौ तथा तौ तु मुनीनां दर्शने स्थितौ।
ये तस्य यज्ञे संवृत्तास्तेऽपृच्छन्त कथं त्विमौ ॥ १९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
मुनियोंके सामने खड़े होकर जब वे दोनों इस प्रकार विवाद कर रहे थे, उस समय उन्हें देखकर जिनका यज्ञमें पहलेसे वरण हो चुका था, वे ब्राह्मण पूछने लगे—‘ये दोनों कैसे लड़ रहे हैं?॥१९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
प्रवेशः केन दत्तोऽयमुभयोर्वैन्यसंसदि ।
उच्चैः समभिभाषन्तौ केन कार्येण धिष्ठितौ ॥ २० ॥
ततः परमधर्मात्मा काश्यपः सर्वधर्मवित्।
विवादिनावनुप्राप्तौ तावुभौ प्रत्यवेदयत् ॥ २१ ॥
मूलम्
प्रवेशः केन दत्तोऽयमुभयोर्वैन्यसंसदि ।
उच्चैः समभिभाषन्तौ केन कार्येण धिष्ठितौ ॥ २० ॥
ततः परमधर्मात्मा काश्यपः सर्वधर्मवित्।
विवादिनावनुप्राप्तौ तावुभौ प्रत्यवेदयत् ॥ २१ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
‘किसने इन दोनोंको महाराज पृथुके यज्ञमण्डपमें घुसने दिया है? ये दोनों जोर-जोरसे बातें करते और झगड़ते यहाँ किस कामसे खड़े हैं?’ उस समय परम धर्मात्मा एवं सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता कणादने सब सदस्योंको बताया कि ये दोनों किसी विषयको लेकर परस्पर विवाद कर रहे हैं और उसीके निर्णयके लिये यहाँ आये हैं’॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अथाब्रवीत् सदस्यांस्तु गौतमो मुनिसत्तमान्।
आवयोर्व्याहृतं प्रश्नं शृणुत द्विजसत्तमाः ॥ २२ ॥
वैन्यं विधातेत्याहात्रिरत्र नौ संशयो महान्।
श्रुत्वैव तु महात्मानो मुनयोऽभ्यद्रवन् द्रुतम् ॥ २३ ॥
सनत्कुमारं धर्मज्ञं संशयच्छेदनाय वै।
स च तेषां वचः श्रुत्वा यथातत्त्वं महातपाः।
प्रत्युवाचाथ तानेवं धर्मार्थसहितं वचः ॥ २४ ॥
मूलम्
अथाब्रवीत् सदस्यांस्तु गौतमो मुनिसत्तमान्।
आवयोर्व्याहृतं प्रश्नं शृणुत द्विजसत्तमाः ॥ २२ ॥
वैन्यं विधातेत्याहात्रिरत्र नौ संशयो महान्।
श्रुत्वैव तु महात्मानो मुनयोऽभ्यद्रवन् द्रुतम् ॥ २३ ॥
सनत्कुमारं धर्मज्ञं संशयच्छेदनाय वै।
स च तेषां वचः श्रुत्वा यथातत्त्वं महातपाः।
प्रत्युवाचाथ तानेवं धर्मार्थसहितं वचः ॥ २४ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
तब गौतमने सदस्यरूपसे बैठे हुए उन श्रेष्ठ मुनियोंसे कहा—‘श्रेष्ठ ब्राह्मणो! हम दोनोंके प्रश्नको आपलोग सुनें। अत्रिने राजा पृथुको विधाता कहा है। इस बातको लेकर हम दोनोंमें महान् संशय एवं विवाद उपस्थित हो गया है।’ यह सुनकर वे महात्मा मुनि उक्त संशयका निवारण करनेके लिये तुरंत ही धर्मज्ञ सनत्कुमारजीके पास दौड़े गये। उन महातपस्वीने इनकी सब बातें यथार्थरूपसे सुनकर उनसे यह धर्म एवं अर्थयुक्त वचन कहा—॥२२—२४॥
मूलम् (वचनम्)
सनत्कुमार उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
ब्रह्म क्षत्रेण सहितं क्षत्रं च ब्रह्मणा सह।
संयुक्तौ दहतः शत्रून् वनानीवाग्निमारुतौ ॥ २५ ॥
राजा वै प्रथितो धर्मः प्रजानां पतिरेव च।
स एव शक्रः शुक्रश्च स धाता च बृहस्पतिः॥२६॥
मूलम्
ब्रह्म क्षत्रेण सहितं क्षत्रं च ब्रह्मणा सह।
संयुक्तौ दहतः शत्रून् वनानीवाग्निमारुतौ ॥ २५ ॥
राजा वै प्रथितो धर्मः प्रजानां पतिरेव च।
स एव शक्रः शुक्रश्च स धाता च बृहस्पतिः॥२६॥
अनुवाद (हिन्दी)
सनत्कुमार बोले— ब्राह्मण क्षत्रियसे और क्षत्रिय ब्राह्मणसे संयुक्त हो जायँ तो वे दोनों मिलकर शत्रुओंको उसी प्रकार दग्ध कर डालते हैं, जैसे अग्नि और वायु परस्पर सहयोगी होकर कितने ही वनोंको भस्म कर डालते हैं। राजा धर्मरूपसे विख्यात है। वही प्रजापति, इन्द्र, शुक्राचार्य, धाता और बृहस्पति भी है॥२५-२६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
प्रजापतिर्विराट् सम्राट् क्षत्रियो भूपतिर्नृपः।
य एभिः स्तूयते शब्दैः कस्तं नार्चितुमर्हति ॥ २७ ॥
पुरायोनिर्युधाजिच्च अभिया मुदितो भवः।
स्वर्णेता सहजिद् बभ्रुरिति राजाभिधीयते ॥ २८ ॥
सत्ययोनिः पुराविच्च सत्यधर्मप्रवर्तकः ।
अधर्मादृषयो भीता बलं क्षत्रे समादधन् ॥ २९ ॥
मूलम्
प्रजापतिर्विराट् सम्राट् क्षत्रियो भूपतिर्नृपः।
य एभिः स्तूयते शब्दैः कस्तं नार्चितुमर्हति ॥ २७ ॥
पुरायोनिर्युधाजिच्च अभिया मुदितो भवः।
स्वर्णेता सहजिद् बभ्रुरिति राजाभिधीयते ॥ २८ ॥
सत्ययोनिः पुराविच्च सत्यधर्मप्रवर्तकः ।
अधर्मादृषयो भीता बलं क्षत्रे समादधन् ॥ २९ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
जिस राजाकी प्रजापति, विराट्, सम्राट्, क्षत्रिय, भूपति, नृप आदि शब्दोंद्वारा स्तुति की जाती है, उसकी पूजा कौन नहीं करेगा? पुरायोनि (प्रथम कारण), युधाजित् (संग्रामविजयी), अभिया (रक्षाके लिये सर्वत्र गमन करनेवाला), मुदित (प्रसन्न), भव (ईश्वर), स्वर्णेता (स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला), सहजित् (तत्काल विजय करनेवाला) तथा बभ्रु (विष्णु)—इन नामोंद्वारा राजाका वर्णन किया जाता है। राजा सत्यका कारण, प्राचीन बातोंको जाननेवाला तथा सत्यधर्ममें प्रवृत्ति करानेवाला है। अधर्मसे डरे हुए ऋषियोंने अपना ब्राह्मबल भी क्षत्रियोंमें स्थापित कर दिया था॥२७—२९॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
आदित्यो दिवि देवेषु तमो नुदति तेजसा।
तथैव नृपतिर्भूमावधर्मान्नुदते भृशम् ॥ ३० ॥
मूलम्
आदित्यो दिवि देवेषु तमो नुदति तेजसा।
तथैव नृपतिर्भूमावधर्मान्नुदते भृशम् ॥ ३० ॥
अनुवाद (हिन्दी)
जैसे देवलोकमें सूर्य अपने तेजसे सम्पूर्ण अन्धकारका नाश करता है, उसी प्रकार राजा इस पृथ्वीपर रहकर अधर्मोंको सर्वथा हटा देता है॥३०॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
ततो राज्ञः प्रधानत्वं शास्त्रप्रामाण्यदर्शनात्।
उत्तरः सिद्ध्यते पक्षो येन राजेति भाषितम् ॥ ३१ ॥
मूलम्
ततो राज्ञः प्रधानत्वं शास्त्रप्रामाण्यदर्शनात्।
उत्तरः सिद्ध्यते पक्षो येन राजेति भाषितम् ॥ ३१ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
अतः शास्त्र-प्रमाणपर दृष्टिपात करनेसे राजाकी प्रधानता सूचित होती है। इसलिये जिसने राजाको प्रजापति बतलाया है, उसीका पक्ष उत्कृष्ट सिद्ध होता है॥३१॥
मूलम् (वचनम्)
मार्कण्डेय उवाच
विश्वास-प्रस्तुतिः
ततः स राजा संहृष्टः सिद्धे पक्षे महामनाः।
तमत्रिमब्रवीत् प्रीतः पूर्वं येनाभिसंस्तुतः ॥ ३२ ॥
यस्मात् पूर्वं मनुष्येषु ज्यायांसं मामिहाब्रवीः।
सर्वदेवैश्च विप्रर्षे सम्मितं श्रेष्ठमेव च ॥ ३३ ॥
तस्मात् तेऽहं प्रदास्यामि विविधं वसु भूरि च।
दासीसहस्रं श्यामानां सुवस्त्राणामलंकृतम् ॥ ३४ ॥
दशकोटीर्हिरण्यस्य रुक्मभारांस्तथा दश ।
एतद् ददामि विप्रर्षे सर्वज्ञस्त्वं मतो हि मे ॥ ३५ ॥
मूलम्
ततः स राजा संहृष्टः सिद्धे पक्षे महामनाः।
तमत्रिमब्रवीत् प्रीतः पूर्वं येनाभिसंस्तुतः ॥ ३२ ॥
यस्मात् पूर्वं मनुष्येषु ज्यायांसं मामिहाब्रवीः।
सर्वदेवैश्च विप्रर्षे सम्मितं श्रेष्ठमेव च ॥ ३३ ॥
तस्मात् तेऽहं प्रदास्यामि विविधं वसु भूरि च।
दासीसहस्रं श्यामानां सुवस्त्राणामलंकृतम् ॥ ३४ ॥
दशकोटीर्हिरण्यस्य रुक्मभारांस्तथा दश ।
एतद् ददामि विप्रर्षे सर्वज्ञस्त्वं मतो हि मे ॥ ३५ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
मार्कण्डेयजी कहते हैं— तदनन्तर एक पक्षकी उत्कृष्टता सिद्ध हो जानेपर महामना राजा पृथु बड़े प्रसन्न हुए और जिन्होंने उनकी पहले स्तुति की थी, उन अत्रिमुनिसे इस प्रकार बोले—‘ब्रह्मर्षे! आपने यहाँ मुझे मनुष्योंमें प्रथम (भूपाल), श्रेष्ठ, ज्येष्ठ तथा सम्पूर्ण देवताओंके समान बताया है, इसलिये मैं आपको प्रचुरमात्रामें नाना प्रकारके रत्न और धन दूँगा, सुन्दर वस्त्राभूषणोंसे विभूषित सहस्रों युवती दासियाँ अर्पित करूँगा तथा दस करोड़ स्वर्णमुद्रा और दस भार सोना भी दूँगा। विप्रर्षे! ये सब वस्तुएँ आपको अभी दे रहा हूँ, मैं समझता हूँ, आप सर्वज्ञ हैं’॥३२—३५॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
तदत्रिर्न्यायतः सर्वं प्रतिगृह्याभिसत्कृतः ।
प्रत्युज्जगाम तेजस्वी गृहानेव माहतपाः ॥ ३६ ॥
मूलम्
तदत्रिर्न्यायतः सर्वं प्रतिगृह्याभिसत्कृतः ।
प्रत्युज्जगाम तेजस्वी गृहानेव माहतपाः ॥ ३६ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
तब महान् तपस्वी और तेजस्वी अत्रि मुनि राजासे समादृत हो न्यायपूर्वक मिले हुए उस सम्पूर्ण धनको लेकर अपने घरको चले गये॥३६॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
प्रदाय च धनं प्रीतः पुत्रेभ्यः प्रयतात्मवान्।
तपः समभिसंधाय वनमेवान्वपद्यत ॥ ३७ ॥
मूलम्
प्रदाय च धनं प्रीतः पुत्रेभ्यः प्रयतात्मवान्।
तपः समभिसंधाय वनमेवान्वपद्यत ॥ ३७ ॥
अनुवाद (हिन्दी)
फिर मनपर संयम रखनेवाले वे महामुनि पुत्रोंको प्रसन्नतापूर्वक वह सारा धन बाँटकर तपस्याका शुभ संकल्प मनमें लेकर वनमें ही चले गये॥३७॥
मूलम् (समाप्तिः)
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि ब्राह्मणमाहात्म्ये पञ्चाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८५ ॥
मूलम् (वचनम्)
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें ब्राह्मणमाहात्म्यविषयक एक सौ पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥१८५॥